इकाइर् एक भारतीय लोकतंत्रा में समानता श्िाक्षकों के लिए किताब का यह खंड, भारत के विशेष संदभर् के साथ, लोकतंत्रा में समानता की अहम् भूमिका से विद्याथ्िार्यों का परिचय कराता है। भारत का संविधान समस्त नागरिकों को समानता के लिए आश्वस्त करता है। इसके बावशूद लोगों का रोशमरार् का जीवन समानता से कोसों दूर है। नागरिक शास्त्रा की पहले की पाठ्यपुस्तवंेफ समानता की चचार्ओं में संविधान के प्रावधानों को दोहरा भर देती थीं पर लोगों के जीवन की वास्तविक स्िथति पर पयार्प्त ध्यान नहीं देती थीं। यह इकाइर् एक अलग ढंग से समानता की चचार् को प्रस्तुत करती हैं। विभ्िान्न समुदायों द्वारा आज भी कइर् प्रकार से असमानता का जो व्यवहार किया जाता है और भोगा जाता है, उनके माध्यम से समानता की शरूरत को इसमें उभारा जाएगा। पहला अध्याय विद्याथ्िार्यों को कांता, ओमप्रकाशवाल्मीकि और अंसारी दंपिा से मिलवाता है, जिन्होंने अलग - अलग तरह से असमानता का अनुभव किया। इनके अनुभवों के शरिए हम मानवीय गरिमा की अवधारणा का परिचय दे रहे हैं। असमानताओं को दूर करने के लिए शरूरी कानून और नीतियाँ बनाने में सरकार की भूमिका की चचार् हम यह दिखाने के लिए कर रहे हैं कि मौशूदा असमानताओं को मिटाने की प्रतिब(ता सरकार के काम का एक बड़ा हिस्सा है। इस अध्याय में हम संक्ष्िाप्त रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में असमानता के मुद्दे को भी देखते हैं और यह स्पष्ट कर रहे हंै कि असमानता एक विश्वव्यापी मुद्दा है और कइर् लोकतांत्रिाक देशों में देखने को मिलता है। इस इकाइर् का दूसरा अध्याय इस पुस्तक का दसवाँ पाठ है। पुस्तक में समानता को लेकर जगह - जगह उठाए गए प्रमुख विचारों को इस अंतिम अध्याय में एक साथ बाँधा गया है। इस अध्याय का एक बड़ा अंश समानता की लड़ाइर् में विभ्िान्न लोगों के योगदान की चचार् करता है। इसमें उदाहरणस्वरूप एक सामाजिक आंदोलन पर विशेष ध्यान दिया गया है और साथ ही उन रचनात्मक तरीकों को भी उभारा गया है ;जैसे - लेखन, गीत, कविताएँद्ध, जिनके माध्यम से लोग समानता की माँग व्यक्त करते हैं। इन दोनों ही अध्यायों का उद्देश्य विद्याथ्िार्यों को यह समझने में मदद करना है कि समानता और लोकतंत्रा की अवधारणाएँ गतिमान हैं, स्िथर नहीं। इनकी गतिमयता इस बात से ही दिखाइर् देती है कि सरकार को समानता के लिए नए - नए कानून और कायर्क्रम बनाने पड़ते हैं और विभ्िान्न आथ्िार्क व सामाजिक मुद्दों पर लोगों के आंदोलन चलते रहते हैं। कांता, ओमप्रकाश, अंसारी दंपति और तवा मत्स्य संघ, इन सभी के अनुभवों जैसे ही विभ्िान्न स्थानीय अनुभव हर जगह मौशूद होंगे। इस इकाइर् में निहित अवधारणाओं को विद्याथ्िार्यों के लिए अिाक प्रासंगिक, व्यावहारिक और उपयुक्त बनाने के लिए स्थानीय स्िथतियों का हवाला दिया जाना चाहिए। कक्षा में समानता के मुद्दे पर चचार् होना श्िाक्षक से ऐसी संवेदना और दृढ़ प्रतिब(ता की माँग करता है जिससे प्रत्येक विद्याथीर् की गरिमा अक्षुण्ण बनी रह सके। गिरीश राव कांता देवी सुजाता वुफमारीकिसान श्िाक्ष्िाका व्यापारी छात्रा घरेलू कामगार घरेलू कामगार चुनाव के दिन कांता और उसकी दोस्त सुजाता वोट डालने की बारी का इंतशार कर रही हैं..कितनी अच्छी बात है न सुजाता, कि हम सब अपने देश के समान नागरिक के रूप में वोट डाल सकते हैं? जैन साहब भी हमारे साथ इसी लाइन में खड़े हैं! हाँ,बिलवुफल! समानता भारत एक लोकतंत्राीय देश है। कक्षा 6 की पुस्तक में हमनेलोकतंत्राीय सरकार के मुख्य तत्त्वों के बारे में पढ़ा था, जैसे - लोगों की भागीदारी, संघषो± का शांतिपूणर् समाधान, समानता और न्याय। ‘समानता’, लोकतंत्रा की मैं तो उसे वोट दूँगी,चल कांता, अब तेरीमुख्य विशेषता है और इसकी जिसने हमारे मोहल्ले मेंबारी आइर्कायर्प्रणाली के सभी पहलुओं को पानी की पाइप लाइन लाने का वादा किया है।प्रभावित करती है। इस अध्याय में आप समानता के बारे में और अिाक जानंेगे - यह क्या है, लोकतंत्रा के लिए यह आवश्यक क्यों हंै, और भारत में सब समान हैं या नहीं। हम कांता की कहानी से चचार् आरंभ करते हैं। रफख्साना मिशार् अशोक जैन ग्रेसी लैलेंग आइजैक लैलेंगअब्दुल रहमान शबनम बानोे परामशर्दाता सरकारी अिाकारी मीडिया - कमीर्कारीगर गृहिणी योगराज बेरोशगार उद्योगपति कोनों को अच्छे से सापफ करना।़कांता ये ले तेरे पैसे। पर पहले से पैसे माँगने की आदत मत बना, समझी? जी मैडम, नहींबनाउँफगी। उस शाम को..जैन मैडम और जैन साहबबस शरा - सी वोट डालने के लिए लाइनदेर और बेटी! में भले ही खड़े रहे हों, पर अपने बच्चों के इलाज के लिए उन्हें लाइन में नहीं लगना पड़ता है।..मतािाकार की समानता कहानी का प्रारंभ कांता के वोट देने की लाइन में खड़े होने से होता है। पुनः उन विभ्िान्न लोगों की ओर देखो, जो उसके साथ लाइन में खड़े हैं। कांता अपने मालिक अशोक जैन को पहचान लेती है और अपने पड़ोसी छोटेलाल को भी। भारत जैसे एक लोकतंत्राीय देश में सब वयस्कों को मत देने का अिाकार हैऋ चाहे उनका धमर् कोइर् भी हो, श्िाक्षा का स्तर या जाति वुफछ भी हो, वे गरीब हों या अमीर। इसे, जैसा कि आप पिछले वषर् की पुस्तक में पढ़ चुके हैं, सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार कहा जाता है और यह सभी लोकतंत्रों का आवश्यक पहलू है। ‘सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार का विचार’, समानता के विचार पर आधारित है, क्योंकि यह घोष्िात करता है कि देश का हर वयस्क स्त्राी/पुरफष चाहे उसका आथ्िार्क स्तर या जाति वुफछ भी क्यों न हो, एक वोट का हकदार है। कांता वोट देने के लिए बहुत उत्सुक है और यह देख कर बहुत खुश है कि वह अन्य सबके बराबर है, क्योंकि उन सबके पास भी एक ही वोट है। परंतु जैसे - जैसे दिन बीतता जाता है, कांता के मन में समानता के वास्तविक अथर् के बारे में शंका होने लगती है। वह क्या बात है, जिसने कांता के मन में शंका पैदा कर दी? आओ, उसके जीवन की दिनचयार् देखें। वह एक झोपड़पट्टी में रहती है और उसके घर के पीछे एक नाला है। उसकी बेटी बीमार है, परंतु वह अपने काम से एक दिन की भी छुट्टी नहीं ले सकती क्योंकि उसे अपने मालिक से बच्ची को डाॅक्टर के पास ले जाने के लिए पैसे उधार लेने हैं। घरेलू काम की नौकरी उसे थका देती है और अंततः उसके दिन की समाप्ित पिफर लंबी लाइन में खड़े होकर होती है। सरकारी अस्पताल के सामने लगी यह लाइन, उस लाइन से भ्िान्न है, जिसमें वह सुबह लगी थी, क्योंकि इस लाइन में खड़े अिाकांश लोग गरीब हैं। आपके विचार से समानता के बारे में शंका करने के लिए कांता के पास क्या पयार्प्त कारण हैं? उपरोक्त कहानी के आधार पर उसके ऐसा सोचने के तीन कारण बताइए । अन्य प्रकार की असमानताएँ कांता उन बहुत - से लोगों में से एक है, जो भारतीय लोकतंत्रा में रहते हैं और जिन्हें मतािाकार प्राप्त है, लेकिन जिनका दैनिक जीवन और कायर् करने की स्िथतियाँ समानता से बहुत दूर हैं। निधर्न होने के अतिरिक्त भारत में लोगों को अन्य अनेक कारणों से भी असमानता का सामना करना पड़ता है। इसका आशय हम निम्नलिख्िात दो कहानियों को पढ़कर समझेंगे। ये दोनों ही वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं और भारत में होने वाली विभ्िान्न प्रकार की असमानताओं तोमर राजपूत 30/5 - 9य् मैकेनिकल इंजीनियर सुजलान ;पुणेद्ध हेतु सेवारत, उच्च तकनीकी अहर्ता प्राप्त राजपूतपर प्रकाश डालती हैं। कन्या चाहिए भारत में सामान्यतः प्रचलित असमानताओं में से एक है - जातिगत व्यवस्था। यदि आप ग्रामीण भारत में रहते हैं, तो जातिगत पहचान का अनुभव शायद बहुत छोटी आयु में ही हो जाता है। यदि आप भारत के शहरी क्षेत्रा में रहते हैं, तो शायद यह सोचेंगे कि लोग अब जात - पात में विश्वास नहीं करते। परंतु शरा एक प्रमुख समाचारपत्रा के वैवाहिक विज्ञापन के काॅलम को देख्िाए, तो आप पाएँगे कि उच्च श्िाक्षा प्राप्त शहरी भारतीय के दिमाग में भी जाति कितनीमहत्त्वपूणर् है। उफपर दिए गए वैवाहिक विज्ञापनों में जाति की सूचना देने वाले अंशों पर गोला बनाइए। आइए, अब एक कहानी स्वूफल जाने वाले एक दलित बच्चे के अनुभवों के बारे में पढ़ें। दलितों के बारे में आप पहले ही पिछले वषर् की पुस्तक में पढ़ चुके हैं। ‘दलित’ एक ऐसा शब्द है, जो निचली कही जानी वाली जाति के लोग स्वयं को संबोिात करने के लिए प्रयोग में लाते हैं। ‘दलित’ का अथर् होता है - वुफचला हुआ या टूटा हुआ और इस शब्द का इस्तेमाल करके दलित यह संकेत करते हैं कि पहले भी उनके साथ बहुत भेदभाव होता था और आज भी हो रहा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि एक प्रसि( दलित लेखक हैं। अपनी आत्मकथा जूठन में वे लिखते हैं - फ्कक्षा में मुझे दूसरों से अलग बैठना पड़ता था और वह भी प़फशर् पर, क्योंकि बैठने की टाटपट्टी पर जगह नहीं होती थी। कभी - कभी मुझे सबसे पीछे दूरी पर बैठना पड़ता था... बिलवुफल दरवाशे के पास... कभी - कभी बिना किसी कारण के वे मुझे मारा - पीटा करते थे।य् जब वे कक्षा चार में थे, प्रधानाध्यापक ने ओमप्रकाश से स्वूफल और खेल के मैदान में झाड़ू लगाने को कहा। वे लिखते हैं - फ्मुझ जैसे छोटे एवं कमशोर शरीर वाले की तुलना में मैदान बहुत बड़ा था और उसकी सप़फाइर् करने में आपके विचार से ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ उसके श्िाक्षक और सहपाठियों ने असमानता का व्यवहार क्यों किया था? अपने आपको ओमप्रकाश वाल्मीकि की जगह रखते हुए चार पंक्ितयाँ लिख्िाए कि उक्त स्िथति में आप वैफसा अनुभव करते? आपके विचार से अंसारी दंपति के साथ असमानता का व्यवहार क्यों किया जा रहा था? यदि आप अंसारी दंपति की जगह होते और आपको रहने के लिए इस कारण जगह न मिलती क्योंकि वुफछ पड़ोसी आपके धमर् के कारण आपके पास नहीं रहना चाहते, तो आप क्या करते? मेरी पीठ ददर् करने लगी। मेरा चेहरा धूल से भर गया। धूल मेरे मुँह के अंदर चली गइर् थी। मेरी कक्षा के दूसरे बच्चे पढ़ रहे थे और मैं झाड़ू लगा रहा था। प्रधानाध्यापक अपने कमरे में बैठे मुझे देख रहे थे। मुझे एक बार पानी पीने की भी अनुमति नहीं दी गइर्। मैं दिनभर झाड़ू लगाता रहा। स्वूफल के कमरों के दरवाशों और ख्िाड़कियों से श्िाक्षक और लड़के यह तमाशा देखते रहे।य् ओमप्रकाश से अगले दो दिनों तक स्वूफल और खेल के मैदान में झाड़ू लगवाइर् जाती रही और यह क्रम तभी रफका, जब उधर से गुशरते हुए उसके पिता ने अपने बेटे को झाड़ू लगाते देखा। उन्होंने श्िाक्षकों का साहसपूवर्क सामना किया और ओमप्रकाश का हाथ पकड़ कर स्वूफल से बाहर जाते हुए उफँचे स्वर में सबको सुनाते हुए कहा... फ्तुम एक श्िाक्षक हो..इसलिए अभी मैं जा रहा हूँ, लेकिन मास्टर इतना याद रखना... यह यहीं पढ़ेगा, इसी स्वूफल में। और अकेला यही नहीं, इसके बाद और भी बहुत - से यहाँ पढ़ने आएँगे।य् दूसरी कहानी एक ऐसी घटना पर आधारित है, जो भारत के एक बड़े शहर में घटी और देश के अिाकांश भागों में ऐसा होना एक सामान्य बात है। यह कहानी श्री और श्रीमती अंसारी की है, जो शहर में किराए पर एक मकान लेना चाहते थे। वे पैसे वाले थे, इसलिए किराए की कोइर् समस्या नहीं थी। वे मकान ढूँढ़ने में मदद लेने एक प्राॅपटीर् डीलर के पास गए। डीलर ने उन्हें बताया कि वह कइर् खाली मकानों के बारे में जानता है, जो किराए पर मिल सकते हैं। वे पहला मकान देखने गए। अंसारी दंपति को मकान बहुत अच्छा लगा और उन्होंने मकान लेने का निणर्य कर लिया। पिफर जब मकान - मालकिन ने उनके नाम सुने, तो वे बहाने बनाने लगीं कि वो मांसाहारी लोगों को मकान नहीं दे सकतीं, क्योंकि उस बिल्िंडग में कोइर् - भी मांसाहारी व्यक्ित निवास नहीं करता। प्राॅपटीर् डीलर और अंसारी दंपत्िा, दोनों ही यह सुनकर आश्चयर्चकित रह गए, क्योंकि पड़ोस से मछली पकाने की गंध आ रही थी। उनके सामने उन दूसरे और तीसरे मकानों में भी जो उन्हें पसंद आए थे, यही बहाना दुहराया गया। अंत में प्राॅपटीर् डीलर ने सुझाव दिया कि क्या वे अपना नाम बदल कर श्री और श्रीमती वुफमार रखना चाहेंगे। अंसारी दंपति ऐसा करने के इच्छुक नहीं थे, इसलिए उन्होंने वुफछ और मकान देखने का निश्चय किया। अंत में लगभग एक महीने ढूँढ़ने के बाद उन्हें एक मकान - मालकिन मिलीं, जो उन्हें किराए पर मकान देने को तैयार थीं। सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन मानवीय गरिमा का मूल्य अब तक आप समझ गये होगे कि प्रायः वुफछ लोगों के साथ असमानता का व्यवहार बस इस कारण होता है कि उनका जन्म किस जाति, लिंग या धमर् में हुआ और वे उच्च वगर् के हैं या मध्यम या निम्न वगर् के। ओमप्रकाश वाल्मीकि और अंसारी परिवार के साथ असमानता का व्यवहार जातिगत और धमर्गत कारणों से हुआ। जब लोगों के साथ असमानता का व्यवहार होता है, तो उनके सम्मान को ठेस पहुँचती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि तथा अंसारी दंपति, के साथ किए गए व्यवहार के कारण उनकी गरिमा को ठेस पहँुची। ओमप्रकाश वाल्मीकि को उनकी जाति के कारण स्वूफल में झाडू़लगवाकर श्िाक्षकों और छात्रों ने उनके सम्मान को बुरी तरह आहत किया और उन्हें यह महसूस कराया कि वे विद्यालय के अन्य छात्रों के समान नहीं, उनसे कमतर हंै। बच्चा होने के कारण ओमप्रकाश वाल्मीकि स्वयं इस बारे में अिाक वुफछ नहीं कर सके। किंतु जब उनके पिता ने अपने बेटे को झाड़ू लगाते देखा, तो उन्हें इस असमान व्यवहार पर क्रोध आया और उन्होंने श्िाक्षकों के समक्ष विरोध प्रकट किया। जब लोगों ने अंसारी दंपति को अपना मकान किराए पर देने से इंकार कर दिया, तब उनके सम्मान को भी चोट पहुँची। पिफर जब प्राॅपटीर् डीलर ने उन्हें नाम बदलने का सुझाव दिया, तब उनके आत्मसम्मान ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और उन्होंने उस सुझाव को ठुकरा दिया। ओमप्रकाश और अंसारी दंपति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए था। वे उसी सम्मान और उसी गरिमा के हकदार थे, जो अन्य किसी व्यक्ित को मिलती है। भारतीय लोकतंत्रा में समानता भारतीय संविधान सब व्यक्ितयों को समान मानता है। इसका अथर् है कि देश के व्यक्ित चाहे वे पुरफष हों या स्त्राी, किसी भी जाति, धमर्, शैक्ष्िाक और आथ्िार्क पृष्ठभूमि से संबंध रखते हों, वे सब समान माने जाएँगे। लेकिन इसके बाद भी हम यह नहीं कह सकते कि असमानता खत्म हो गइर् है। यह खत्म नहीं हुइर् है, लेकिन पिफर भी यदि आप अंसारी परिवार के एक सदस्य होते, तो प्राॅपटीर् डीलर के नामबदलने के सुझाव का उत्तर किस प्रकार देते? क्या आपको अपने जीवन की कोइर् ऐसी घटना याद है, जब आपकी गरिमा को चोट पहुँची हो? आपको उस समय वैफसा महसूस हुआ था? 1975 में बनी दीवार पि़फल्म में जूते पाॅलिश करने वाला एक लड़का प़ेंफक कर दिए गए पैसे को उठाने से इंकार कर देता है। वह मानता है कि उसके काम की भी गरिमा है और उसे उसका भुगतान आदर के साथ किया जाना चाहिए। अध्याय 1 μ समानता संसद हमारे लोकतंत्रा का आधार स्तंभ है और हम अपने निवार्चित प्रतिनििायों के माध्यम से उसमें प्रतिनििात्व पाते हैं। कम - से - कम भारतीय संविधान में सब व्यक्ितयों की समानता के सि(ांत को मान्य किया गया है। जहाँ पहले भेदभाव और दुव्यर्वहार से लोगों की रक्षा करने के लिए कोइर् कानून नहीं था, अब अनेक कानून लोगों के सम्मान तथा उनके साथ समानता के व्यवहार को सुनिश्िचत करने के लिए मौशूद हैं। समानता को स्थापित करने के लिए संविधान में जो प्रावधान हैं, उनमें से वुफछ निम्नलिख्िात हंै - प्रथम, कानून की दृष्िट में हर व्यक्ित समान है। इसका तात्पयर् यह है कि हर व्यक्ित को देश के राष्ट्रपति से लेकर कांता जैसी घरेलू काम की नौकरी करने वाली महिला तक, सभी को एक ही जैसे कानून का पालन करना है। दूसरा, किसी भी व्यक्ित के साथ उसके धमर्, जाति, वंश, जन्मस्थान और उसके स्त्राी या पुरफष होने के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। तीसरा, हर व्यक्ित सावर्जनिक स्थानों पर जा सकता है, जिनमें खेल के मैदान, होटल, दुकानें और बाशार आदि सम्िमलित हैं। सब लोग सावर्जनिक वुँफओं, सड़कों और नहाने के घाटों का उपयोग कर सकते हैं। चैथा, अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है। शासन ने संविधान द्वारा मान्य किए गए समानता के अिाकार को दो तरह से लागू किया है - पहला, कानून के द्वारा और दूसरा, सरकार की योजनाओं व कायर्क्रमों द्वारा सुविधाहीन समाजों की मदद 10 सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन करके। भारत में ऐसे अनेक कानून हैं, जो व्यक्ित के समान व्यवहार प्राप्त करने के अिाकार की रक्षा करते हैं। कानून के साथ - साथ सरकार ने उन समुदायों जिनके साथ सैकड़ों वषो± तक असमानता का व्यवहार हुआ है, उनका जीवन सुधारने के लिए अनेक कायर्क्रम और योजनाएँ लागू की हैं। ये योजनाएँ यह सुनिश्िचत करने के लिए चलाइर् गइर् हैं कि जिन लोगों को अतीत में अवसर नहीं मिले, अब उन्हें अिाक अवसर प्राप्त हों। इस दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया एक कदम है - मध्याÉ भोजन की व्यवस्था। इस कायर्क्रम के अंतगर्त सभी सरकारी प्राथमिक स्वूफलों के बच्चों को दोपहर का भोजन स्वूफल द्वारा दिया जाता है। यह योजना भारत में सवर्प्रथम तमिलनाडु राज्य में प्रारंभ की गइर् और 2001 में उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को इसे अपने स्वूफलों में छह माह के अंदर आरंभ करने के निदेर्श दिए। इस कायर्क्रम के काप़फी सकारात्मक प्रभाव हुए। उदाहरण के लिए, दोपहर का भोजन मिलने के कारण गरीब बच्चों ने अिाक संख्या में स्वूफल में प्रवेश लेना और नियमित रूप से स्वूफल जाना शुरू कर दिया। श्िाक्षक बताते हैं कि पहले बच्चे खाना खाने घर जाते थे और पिफर वापस स्वूफल लौटते ही नहीं थे। परंतु अब, जब से स्वूफल मेंमध्याÉ भोजन मिलने लगा है, उनकी उपस्िथति में सुधार आया है। वे माताएँ जिन्हें पहले अपना काम छोड़कर दोपहर को बच्चों को खाना ख्िालाने घर आना पड़ता था, अब उन्हें ऐसा नहीं करना पड़ता है। इस कायर्क्रम से जातिगत पूवार्ग्रहों को कम करने में भी सहायता मिली है, क्योंकि स्वूफल में निम्न व उच्च जाति के बच्चे साथ - साथ भोजन करते हैं और वुफछ स्थानों पर तो भोजन पकाने के लिए दलितमहिलाओं को काम पर रखा गया है। मध्याÉ भोजन कायर्क्रम ने निधर्न विद्याथ्िार्यों की भूख मिटाने में भी सहायता की है, जो प्रायः खाली पेट स्वूफल आते हैं और इस कारण पढ़ाइर् पर ध्यान केंदि्रत नहीं कर पाते हंै। यद्यपि शासकीय कायर्क्रम, अवसरों की समानता बढ़ाने में महत्त्वपूणर् भूमिका निभा रहे हैं, ¯कतु अभी - भी बहुत वुफछ करने की आवश्यकताहै। मध्याÉ भोजन कायर्क्रम ने निधर्न बच्चों का स्वूफलों में प्रवेश और उनकी उपस्िथति तो बढ़ा दी है, लेकिन पिफर भी इस देश में वे स्वूफल जहाँ अमीरों के बच्चे जाते हैं, उन स्वूफलों से बहुत अलग हैं जहाँ उत्तराखंड की एक शासकीय शाला में बच्चों कोउनका मध्याÉ भोजन परोसा जा रहा है। मध्याÉ भोजन कायर्क्रम क्या है? क्या आप इस कायर्क्रम के तीन लाभ बता सकते हैं? आपके विचार से यह कायर्क्रम किस प्रकार समानता की भावना बढ़ा सकता है? अपने क्षेत्रा में लागू की गइर् किसी एक सरकारी योजना के बारे में पता लगाइए। इस योजना में क्या किया जाता है? यह किस के लाभ के लिए बनाइर् गइर् है? फ्अपने आत्मसम्मान को दाँव पर लगा कर जीवित रहना अशोभनीय है। आत्मसम्मान जीवन का सबसे शरफरी हिस्सा है। इसके बिना व्यक्ित नगण्य है। आत्मसम्मान के साथ जीवन बिताने के लिए व्यक्ित को कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करनी होती है। केवल कठिन और निरंतर संघषर् से ही व्यक्ित बल, विश्वास और मान्यता प्राप्त कर सकता है।य् फ्मनुष्य नाशवान है। हर व्यक्ित को किसी - न - किसी दिन मरना है, परंतु व्यक्ित को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने जीवन का बलिदान, आत्मसम्मान के उच्च आदशो± को विकसित करने और अपने मानव जीवन को बेहतर बनाने में करेगा। किसी साहसी व्यक्ित के लिए आत्मसम्मान रहित जीवन जीने से अिाक अशोभनीय और वुफछ नहीं है।य् μ बी.आर. अंबेडकर गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं। आज भी देश में कइर् स्वूफल हैं, जिनमें ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे दलित बच्चों के साथ भेदभाव और असमानता का व्यवहार किया जाता है। इन बच्चों को ऐसी असमान स्िथतियों में ढकेला जाता है, जहाँ उनके सम्मान की रक्षा नहीं हो पाती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कानून बन जाने के बाद भी लोग उन्हें समान समझने से इंकार कर देते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि दृष्िटकोण में बहुत धीरे - धीरे परिवतर्न आता है। यद्यपि लोग यह जानते हैं कि भेदभाव का व्यवहार कानून के विरफ( है, पिफर भी वे जाति, धमर्, अपंगता, आथ्िार्क स्िथति और महिला होने के आधार पर लोगों से असमानता का व्यवहार करते हैं। वतर्मान दृष्िटकोण को बदलना तभी संभव है, जब लोग यह विश्वास करने लगें कि कोइर् भी कमतर नहीं है और हर व्यक्ित सम्मानजनक व्यवहार का अिाकारी है। प्रजातंत्राीय समाज में समानता स्थापित करना एक सतत् संघषर् है, जिसमें व्यक्ितयों और विभ्िान्न समाजों को सहयोग देना है। इस पुस्तक में आप इसके बारे में और अिाक पढ़ेंगे। अन्य लोकतंत्रों में समानता के मुद्दे शायद आप सोच रहे होंगे कि क्या भारतीय लोकतंत्रा ही ऐसा है जहाँ असमानता का अस्ितत्व है और जहाँ समानता के लिए संघषर् जारी है। सच तो यह है कि संसार के अिाकांश लोकतंत्राीय देशों में, समानता के मुद्दे पर विशेष रूप से संघषर् हो रहे हैं। उदाहरणके लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में अÚीकी - अमेरिकन लोग, जिनकेपूवर्ज गुलाम थे और अÚीका से लाए गए थे, वे आज भी अपने जीवन को मुख्य रूप से असमान बताते हैं। जबकि 1950के अंतिम दशक में अÚीकी - अमेरिकनों को समान अिाकारदिलाने के लिए आंदोलन हुआ था। इससे पहले अÚीकी - अमेरिकनों के साथ संयुक्त राज्य में बहुत असमानता का व्यवहार होता था और कानून भी उन्हें समान नहीं मानता था। उदाहरण के लिए बस से यात्रा करते समय उन्हें बस में पीछे बैठना पड़ता था या जब भी कोइर् गोरा आदमी बैठना चाहे, उन्हें अपनी सीट से उठ जाना पड़ता था। 12 सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन रोशा पाक्सर् एक अÚीकी - अमेरिकन महिला थीं। 1 दिसंबर 1955 को दिन भर काम करके थक जाने के बाद बस में उन्होंने अपनी सीट एक गोरे व्यक्ित को देने से मना कर दिया। उस दिन उनके इंकार सेअÚीकी - अमेरिकनों के साथ असमानता को लेकर एक विशाल आंदोलन प्रारंभ हो गया, जो नागरिक अिाकार आंदोलन ;सिविल राइट्स मूवमेंटद्ध कहलाया। 1964 के नागरिक अध्िकार अिानियम ने नस्ल, धमर् और राष्ट्रीय मूल के आधार पर भेदभाव को निषेध करदिया। इसने यह भी कहा कि अÚीकी - अमेरिकन बच्चों के लिए सब स्वूफलों के दरवाशे खोले जाएँगे और उन्हें उन अलग स्वूफलों में नहीं जाना पड़ेगा, जो विशेष रूप से केवल उन्हीं के लिए खोले गए थे।इतना होने के बावशूद भी अिाकांश अÚीकी - अमेरिकन गरीब हैं।अिाकतर अÚीकी - अमेरिकन बच्चे केवल ऐसे सरकारी स्वूफलों में प्रवेश लेने की ही सामथ्यर् रखते हैं, जहाँ कम सुविधाएँ हैं और कम योग्यता वाले श्िाक्षक हैंऋ जबकि गोरे विद्याथीर् निजी स्वूफलों में जाते हैं या उन क्षेत्रों में रहते हैं, जहाँ के सरकारी स्वूफलों का स्तर निजी स्वूफलों जैसा ही उफँचा है। रोशा पाक्सर्, एक अÚीकी - अमेरिकन औरत, जिनकी एक विद्रोही प्रतििया ने अमेरिकी इतिहास की दिशा बदल दी। भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 के अंश धमर्, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध - ;1द्धराज्य, किसी नागरिक के विरफ( केवल धमर्, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोइर् विभेद नहीं करेगा। ;2द्ध कोइर् नागरिक केवल धमर्, मूलवंश, जाति, लिंग जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर - ;कद्ध दुकानों, सावर्जनिक भोजनालयों, होटलों और सावर्जनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश या ;खद्ध पूणर्तः या भागतः राज्य - नििा से पोष्िात या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समपिर्त वुफँओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सावर्जनिक समागम के स्थानों के उपयोग, के संबंध में किसी भी नियोर्ग्यता, दायित्त्व, निब±धन या शतर् के अधीन नहीं होगा। लोकतंत्रा की चुनौती किसी भी देश को पूरी तरह से लोकतंत्राीय नहीं कहा जा सकता। हमेशा से ही ऐसे समुदाय और व्यक्ित होते हंै, जो लोकतंत्रा को नए अथर् देते हैं और अिाक से अिाक समानता लाने के लिए नए - नए सवाल उठाते हैं। इसके वेंफद्र में वह संघषर् है, जो सब व्यक्ितयों को समानता और सम्मान दिलाने का पक्षधर है। इस पुस्तक में आप पढ़ेंगे कि किस तरह समानता का प्रश्न भारतीय लोकतंत्रा में हमारे दैनिक जीवन के विभ्िान्न पहलुओं को प्रभावित करता है। इन पाठों को पढ़ते हुए विचार कीजिए कि क्या सब व्यक्ितयों की समानता और उनके आत्मसम्मान को उँफचा रखने की भावना को लोग स्वीकार कर रहे हैं या नहीं। 14 सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन 1.लोकतंत्रा में सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार क्यों महत्त्वपूणर् है? 2.बाॅक्स में दिए गए संविधान के अनुच्छेद 15 के अंश को पुनः पढि़ए और दो ऐसे तरीके बताइए, जिनसे यह अनुच्छेद असमानता को दूर करता है? 3.ओमप्रकाश वाल्मीकि का अनुभव, अंसारी दंपति के अनुभव से किस प्रकार मिलता था? 4.फ्कानून के सामने सब व्यक्ित बराबर हंैय् - इस कथन से आप क्या समझतेहैं? आपके विचार से यह लोकतंत्रा में महत्त्वपूणर् क्यों है? 5.भारत सरकार ने 1995 में विकलांगता अिानियम स्वीकृत किया था। यह कानून कहता है कि विकलांग व्यक्ितयों को भी समान अिाकार प्राप्त हैंऔर समाज में उनकी पूरी भागीदारी संभव बनाना सरकार का दायित्त्व है। सरकार को उन्हें निःशुल्क श्िाक्षा देनी है और विकलांग बच्चों को स्वूफलों की मुख्यधारा में सम्िमलित करना है। कानून यह भी कहता है कि सभी सावर्जनिक स्थल, जैसे - भवन, स्वूफल आदि में ढलान बनाए जाने चाहिए, जिससे वहाँ विकलांगों के लिए पहुँचना सरल हो। चित्रा को देख्िाए और उस बच्चे के बारे में सोचिए, जिसे सीढि़यों से नीचे लाया जा रहा है। क्या आपको लगता है कि इस स्िथति में विकलांगता का कानून लागू किया जा रहा है? वह भवन में आसानी से आ - जा सके, उसके लिए क्या करना आवश्यक है? उसे उठाकर सीढि़यों से उतारा जाना, उसके सम्मान और उसकी सुरक्षा को वैफसे प्रभावित करता है? शब्द - संकलन सावर्भौमिक वयस्क मतािाकार - यह लोकतंत्राीय समाज का अत्यंत महत्त्वपूणर् पहलू है। इसका अथर् है कि सभी वयस्क ;18 वषर् एवं उससे अिाक आयु केद्ध नागरिकों को वोट देने का अिाकार है, चाहे उनकी सामाजिक या आथ्िार्क पृष्ठभूमि वुफछ भी हो। गरिमा - इसका तात्पयर् अपने - आपको और दूसरे व्यक्ितयों को सम्मान योग्य समझने से है। संविधान - यह वह दस्तावेश है, जिसमें देश की जनता व सरकार द्वारा पालन किए जाने वाले नियमों और अिानियमों को निरूपित किया गया है। नागरिक अिाकार आंदोलन - एक आंदोलन, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में 1950 के दशक के अंत में प्रारंभ हुआ औरजिसमें अÚीकी - अमेरिकन लोगों ने नस्लगत भेदभाव को समाप्त करने और समान अिाकारों की माँग की।

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