8 शरीर में गति बिलवुफल शांत होकर बैठिए तथा अपने शरीर में होने वाली गतियों का अनुभव कीजिए। आप समय - समय पर अपनी पलवेंफ तो झपकाते ही होंगे। श्वास लेते समय अपने शरीर में होने वाली गतियों का प्रेक्षण कीजिए। हमारे शरीर में स्वतः ही अनेेक गतियाँ निरंतर होती रहती हैं। जब आप अपनी नोटबुक में लिखते हैं, तब आपके शरीर का कौन - सा भाग गति करता है? जब आप मुड़कर अपने मित्रा को देखते हैं, तब शरीर का कौन - सा भाग गति करता है? उपयुर्क्त सभी उदाहरणों में आपके उसी स्थान पर रहते हुए भी आपके शरीर का कोइर् - न - कोइर् भाग गति करता है। आप एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। आप उठकर अपने अध्यापक के पास जाते हैं, कक्षा के बाद विद्यालय के मैदान में जाते हैं अथवा विद्यालय के बाद अपने घर जाते हैं तो, इस स्िथति में आप एक स्थान से दूसरे स्थान तक वास्तव में चलकर जाते हैं। आप चलकर, दौड़कर या वूफदकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। आइए, अपने मित्रों, अध्यापकों एवं अभ्िाभावकों से चचार् करके सारणी 8.1 भरते हुए यह देखते हैं कि सारणी 8.1ः जंतु एक स्थान से दूसरे स्थान तक वैफसे गमन करते हैं? जंतु गाय मनुष्य साँप पक्षी कीट मछली गमन में प्रयुक्त होने वाला भाग/अंग पैर संपूणर् शरीर जंतु वैफसे गमन करते हैं चलती है रेंगकर जंतु एक स्थान से दूसरे स्थान तक किस प्रकार गमन करते हैं। चलना, टहलना, दौड़ना, उड़ना, छलाँग मारना, रेंगना एवं तैरना इत्यादि जंतुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के वुफछ ढंग हैं। जंतुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के तरीके में इतनी अध्िक विविध्ता क्यों है? क्या कारण है कि अनेक जंतु चलते हैं जबकि साँप रेंगता है और मछली तैरती है? 8.1 मानव शरीर एवं इसकी गतियाँ जंतुओं की विविध् गतियों पर ध्यान देने से पूवर् आइए, अपने शरीर की वुफछ गतियों को ध्यानपूवर्क देखें। क्या आपको विद्यालय में शारीरिक व्यायाम करते समय आनंद आता है? विद्यालय में शारीरिक व्यायाम करते समय आपके हाथ एवं पैर किस प्रकार गति करते हैं? आइए, हमारा शरीर जिन गतियों को करने योग्य है, हम उनमें से वुफछ शारीरिक गतियों को करने का प्रयास करें। एक काल्पनिक विकेट पर काल्पनिक गेंद पेंफकने का प्रयास कीजिए। आप अपना हाथ किस प्रकारघुमाते हैं? क्या आप इसे अपने वंफधे से वृत्ताकार रूप में घुमाते हैं? क्या आपका वंफधा भी गति करता है? पीठ के बल लेट जाइए तथा अपने पैर को वूफल्हे केचारों ओर घुमाइए। अपनी भुजा को कोहनी से ऊपर नीचे कीजिए। इसी प्रकार पैरों को घुटने से मोडि़ए। अपने हाथों को अपने पाश्वर् में सीधा तानिए। भुजा को मोड़ते हुए अंगुलियों से वंफधे को छुइए। आपने अपने हाथ का कौन - सा भाग मोड़ा? हाथों को सीधा तानकर नीचे की ओर झुकने का प्रयास कीजिए। क्या आप ऐसा कर पाते हैं? अपने शरीर के विभ्िान्न हिस्सों से गति करने का प्रयास कीजिए एवं प्रेक्षणों को सारणी 8.2 में नोट कीजिए। क्या कारण है कि हम अपने शरीर के वुफछ अंगों को तो स्वतंत्रा रूप से किसी भी दिशा में घुमा सकते हंै, जबकि वुफछ अंगों को केवल एक ही दिशा में घुमा सकते हंै? हम अपने शरीर के वुफछ भागों को घुमाने में असमथर् क्यों रहते हैं? ियाकलाप 1 एक पैमाने को अपने हाथ पर चित्रा 8.1 में दशार्इर् गइर् स्िथति में रख्िाए जिससे आपकी कोहनी पैमाने के मध्य में रहे। अपने मित्रा से पैमाने तथा हाथ को एक साथ बाँधने के लिए कहिए। अब अपनी कोहनी को मोड़ने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे मोड़ पाते हंै? चित्रा 8.1 क्या अब आप अपनी भुजा मोड़ पाते हैं? सारणी 8.2 हमारे शरीर में गतियाँ शरीर काभाग गति पूणर्तः घूमता है अंशतः घूमता/मुड़ता है। झुकता है उठता है गति बिल्वुफल नहीं करता। गदर्न हाँ कलाइर् अंगुलियाँ घुटने ऐड़ी पादांगुली पीठ सिर कोहनी भुजा हाँ क्या आपने ध्यान दिया है कि हम शरीर के विभ्िान्न भागों को उसी स्थान से मोड़ अथवा घुमा पाते हैं, जहाँ पर दो हिस्से एक - दूसरे से जुड़े हों - उदाहरण के लिए कोहनी, वंफधा अथवा गदर्न। क्या आप ऐसे वुफछ अन्य भागों के नाम बता सकते हैं? इन स्थानों को संिा कहते हैं। यदि हमारे शरीर में कोइर् संिा नहीं होती तो आपके विचार में क्या हमारे लिए किसी भी प्रकार की गति करना संभव होता? वास्तव में इन संिायों को कौन - सी वस्तु परस्पर बाँधती है? अपनी अंगुली द्वारा अपने सिर, चेहरे, गदर्न, नाक, कान, वंफध्े के पीछे, हाथ, पैर, अंगुली एवं पादांगुलियों को दबाइए। क्या आपको ऐसा अनुभव हुआ कि आपकी अंगुली किसी कठोर वस्तु को दबा रही है? ये कठोर संरचनाएँ अस्िथयाँ हैं। अपने शरीर के अन्य भागों में इस प्रिया को दोहराइए। इतनी सारी अस्िथयाँ! जब अस्िथयों को नहीं मोड़ा जा सकता तब हम अपनी कोहनी को वैफसे मोड़ लेते हैं? हाथ के उफपरी हिस्से से लेकर कलाइर् तक एक ही लंबी अस्िथ नहीं होती। वास्तव में अनेक अस्िथयाँ कोहनी तक जुड़ी रहती हैं। इसी प्रकार हमारे शरीर के प्रत्येक हिस्से में अनेक अस्िथयाँ हैं। हम अपने शरीर को वैफसे उसी स्थान पर हिला या झुका नहीं सकते जहाँ ये अस्िथयाँ एक - दूसरे से मिलती हैं। विभ्िान्न गतिवििायों एवं विभ्िान्न प्रकार की गतियों के लिए हमारे शरीर में अनेक प्रकार की संध्ियाँ होती हैं। आइए, उनमें से कुछ के बारे में जानें। वंफदुक - खल्िलका संिा ियाकलाप 2 कागश की एक पट्टðी को एक बेलन ;सिल्िंाडरद्ध के रूप में मोडि़ए। रबड़ अथवा प्लास्िटक की एक पुरानी गंेद में एक छेद करके ;किसी के निरीक्षण मेंद्ध उसमें मोड़े हुए कागश के बेलन को डालिए, जैसा कि चित्रा 8.2 कंदुक - खल्िलका संिा बनाना चित्रा 8.2 में दशार्या गया है। आप कागश के बेलन को गेंद पर भी चिपका सकते हैं। गेंद को एक छोटी कटोरी में रखकर चारों ओर घुमाने का प्रयास कीजिए। क्या गेंद कटोरी में स्वतंत्रा रूप से घूमती है। क्या कागश का बेलन भी घूमता है? अब कल्पना कीजिए कि कागश का बेलन आपका हाथ है तथा गेंद इसका एक सिरा है। कटोरी कंध्े के उस भाग के समान है जिससे आपका हाथ जुड़ा है। एक अस्िथ का गेंद वाला गोल हिस्सा दूसरी अस्िथ की कटोरी रूपी गुहिका में धंसा हुआ है ;चित्रा 8.3द्ध। इस चित्रा 8.3 कंदुक - खल्िलका संिा प्रकार की संिा सभी दिशाओं में गति प्रदान करती है। क्या आप इन गतियों में उपरोक्त प्रकार की संध्ि का कोइर् अन्य उदाहरण खोज सकते हैं? इस अनुभाग के प्रारंभ में शरीर के विभ्िान्न भागों को हमारे द्वारा दी गइर् गतियों का स्मरण कीजिए। धुराग्र संिा गदर्न तथा सिर को जोड़ने वाली संध्ि, ध्ुराग्र संध्ि है। इसके द्वारा सिर को आगे - पीछे या दाएँ एवं बाएंँ घुमा विज्ञान सकते हंै। इन गतियों को करने का प्रयास कीजिए। यह गति हमारे हाथ की उस गति से किस प्रकार भ्िान्न है, जिसमें कंदुक - खल्िलका संिा द्वारा हाथ को पूणर्तःवृत्ताकार रूप में घुमा सकते हैं? धुराग्र संध्ि में बेलनाकार अस्िथ एक छल्ले में घूमती है। हिंज संिा घर के किसी दरवाशे को बार - बार खोलिए और बंद कीजिए। इसके वफब्शों को ध्यानपूवर्क देख्िाए। यह दरवाशे को आगे और पीछे की ओर खुलने देता है। ियाकलाप 3 आइए, वफब्शे की गति के प्रकार को देखें। एक मोटेकागश अथवा गत्ते का एक बेलन ;सिलिण्डरद्ध बनाइए जैसा कि चित्रा 8.4 में दिखाया गया है। चित्रा केअनुसार गत्ते अथवा कागश के बेलन के मध्य में छेदकरके एक छोटी पेंसिल लगाइए। गत्ते का एक और टुकड़ा लेकर उसको इस प्रकार मोडि़ए कि यह आधा बेलन बन जाए, जिस पर दूसरे बेलन को सरलता से घुमाया जा सके। आधे बेलन पर रखा पूणर् बेलन वफब्शे की भाँति है। पेंसिल लगे बेलन को चलाने का प्रयास कीजिए। यह किस प्रकार गति करता है? यह गति आपके द्वारा बनाए गए वंफदुक - खल्िलका संिा की गति से किस प्रकार भ्िान्न है? हमने ियाकलाप 1 में कोहनी में इसी प्रकार की गति देखी थी। चित्रा 8.4 में जो वुफछ हमने बनाया था वह एक हिंज से भ्िान्न है शरीर में गति लेकिन इससे यह पता चलता है कि हिंज एक दिशा में गति होने देता है। कोहनी में हिंज ;कब्शाद्ध संिा होती है, जिससे केवल आगे और पीछे एक ही दिशा में गति हो सकती है ;चित्रा 8.5द्ध। क्या आप ऐसी संध्ि के वुफछ और उदाहरण सोच सकते हैं? अचल संिा हमारे सिर की अस्िथयों के बीच की कुछ संध्ियाँ उन संध्ियों से भ्िान्न है जिनकी चचार् हमने अब तक की है। ये अस्िथयाँ इन संध्ियों पर हिल नहीं सकतीं। ऐसी संध्ियों को अचल संध्ि कहते हैं। जब आप अपना मुँह खोलते हैं, तो आप अपने निचले जबड़े को सिर सेदूर ले जाते हैं। अब अपने ऊपरी जबड़े को हिलाने काप्रयास कीजिए। क्या आप इसे गति दे पाते हैं? ऊपरी जबड़े एवं कपाल के मध्य अचल संिा है। हमने केवल वुफछ संिायों की ही चचार् की जो हमारी अस्िथयों को एक - दूसरे से जोड़ती हैं। हमारे शरीर के विभ्िान्न अंगों को विभ्िान्न आवृफति कौन प्रदान करता है? यदि आप एक गुडि़या बनाना चाहते हैं तो आप पहले क्या बनाएँगे? संभवतः गुडि़या को एक आवृफति प्रदान करने के लिए आप एक ढाँचा तैयार करेंगे। आप ऐसा नहीं करेंगे? हमारे शरीर की सभी अस्िथयाँ ठीक इसी प्रकार शरीर को एक सुंदर आवृफति प्रदान करने के लिए एक ढाँचे का निमार्ण करती हैं। इस ढाँचे को वंफकाल कहते हैं ;चित्रा 8.6द्ध। हम वैफसे जानते हैं कि यह मानव वंफकाल की आवृफति है? हम शरीर की विभ्िान्न अस्िथयों की आवृफति के विषय में किस प्रकार जान पाते हैं? शरीर के वुफछ अंगों में मौजूद अस्िथयों और उनकी संख्या तथा आवृफति के बारे में हमें तब पता चलता है, जब हम उनका अनुभव करते हैं। एक्स - रे चित्रा से हमें शरीर की सभी कठोर अस्िथयों की आवृफति का पता चलता है। चित्रा 8.6 मानव वंफकाल क्या कभी आपका अथवा आपके परिवार के किसी सदस्य का एक्स - रे हुआ है? कइर् बार चोट लगने पर चिकित्सक एक्स - रे करवाते हंै, जिससे उन्हें अस्िथयों को हुइर् संभावित क्षति के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। एक्स - रे चित्रा से हमें शरीर की अस्िथयों की आवृफति का पता चलता है।अपने हाथ के अग्र एवं ऊपरी भाग तथा पैर केनिचले एवं ऊपरी भाग की अस्िथयों का अनुभव कीजिए। प्रत्येक अंग की अस्िथयों की संख्या का पता लगाएँ। अपने घुटने और कोहनी की अस्िथयों का ठीक इसी प्रकार अनुभव करें और एक्स - रे चित्रा से तुलना कर प्रत्येक भाग में अस्िथयों की संख्या ज्ञात कीजिए ;चित्रा 8.7द्ध। अपनी अंगुलियों को मोडि़ए। क्या आप उन्हें प्रत्येक संिा - स्थल पर मोड़ सकते हैं? आपकी मध्यमा में कितनी अस्िथयाँ हंै। अपनी हथेली के पिछले भाग का स्पशर् करके अनुभव कीजिए। क्या इसमें अनेक अस्िथयाँ हैं ;चित्रा 8.8द्ध? क्या आपकी कलाइर् लचीली है। यह अनेक छोटी - छोटी अस्िथयों से बनी है। यदि इसमें मात्रा एक ही अस्िथ होती, तो क्या होता? ियाकलाप 4 गहरी साँस भरकर इसे कुछ समय तक रोके रहिए। अपने वक्ष एवं पीठ को हल्के से दबाकर अपनी अस्िथयों का अनुभव कीजिए। जितनी पसलियों ;वक्ष की अस्िथयाँद्ध को आप गिन सकते हैं, गिन लीजिए। चित्रा 8.9 को ध्यान से देख्िाए और वक्ष की अस्िथयों की तुलना अपने उपयुर्क्त अनुभव से कीजिए। हमदेखते हैं कि पसलियाँ विशेष रूप से मुड़ी हुइर् हैं। वे वक्ष की अस्िथ एवं मेरुदंड से जुड़कर एक बक्से की रचना करती हैं। इस शंवुफरूपी बक्से को पसली - पिंजर कहते हैं। हमारे शरीर के कुछ महत्वपूणर् अंग इसमें सुरक्ष्िात रहते हैं। अपने कुछ मित्रों को बिना घुटने मोड़े झुककर अपने पाँव की अंगुलियाँ छूने को कहिए। क्या यह चिकनी, समतल अथवा अखंड है? अपनी अंगुलियों को अपने मित्रा की गदर्न से प्रारंभ करके उसकी पीठ पर नीचे की ओर लाइए। आप के द्वारा अनुभव की गइर् संरचना मेरुदंड है। यह अनेक छोटी - छोटी अस्िथयों से बना है ;चित्रा 8.10द्ध। पसली - पिंजर भी वक्ष क्षेत्रा की इन अस्िथयों से जुड़ा है। यदि मेरुदंड केवल एक ही अस्िथ का बना होता तो क्या आपका मित्रा इस प्रकार नीचे झुक सकता था? अपने मित्रा को खड़े होकर हाथों से किसी दीवार को धक्का लगाने के लिए कहिए। उससे चित्रा 8.10 मेरुदंड कहिए कि वह अपने हाथों से दीवार पर धक्का लगाने का प्रयास करे। क्या आपको उसके कंधांे के समीप दो उभरी हुइर् अस्िथयाँ दिखाइर् देती हैं? इन्हें वंफधे की अस्िथयाँ कहते हैं ;चित्रा 8.11द्ध। चित्रा 8.11 वंफधे की अस्िथयाँ चित्रा 8.12 को ध्यानपूवर्क देख्िाए। यह संरचना श्रोण्िा - अस्िथयाँ हैं, यह बाॅक्स के समान एक ऐसी संरचना बनाती हैं, जो आपके आमाशय के नीचे पाए जाने वाले विभ्िान्न अंगों की रक्षा करता है। यह वूफल्हे वाला वह हिस्सा है, जिसके सहारे आप बैठते हैं। चित्रा 8.12 श्रोण्िा - अस्िथयाँ आपकी खोपड़ी अनेक अस्िथयों के एक - दूसरे से जुड़ने से बनी है ;चित्रा 8.13द्ध। यह हमारे शरीर के अति महत्वपूणर् अंग, मस्ितष्क को परिब( करके चित्रा 8.13: मानव - खोपड़ी उसकी सुरक्षा करती है। हमने अपने वंफकाल की बहुत - सी अस्िथयों तथा संध्ियों के बारे में चचार् की। वंफकाल के वुफछ अतिरिक्त अंग भी हैं जो हंियों जितने कठोर नहीं होते हैं और जिन्हें मोड़ा जा सकता है, उन्हें उपास्िथ कहते हैं। चित्रा 8.14: कान के उफपरी भाग में उपास्िथ होती है अपने कान को स्पशर् कीजिए? क्या आप किसी कठोर अस्िथ भाग का अनुभव करते हैंै जिसे मोड़ा जा सके ;चित्रा 8.14द्ध। ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें कोइर् अस्िथ नहीं है। क्या आपको अंगुलियों के बीच दबाने पर कणर्पालि एवंइसके ऊपर के हिस्से में कोइर् अंतर महसूस हुआ ;चित्रा 8.15द्ध? क्या आपको ऐसा लगा कि कान काऊपरी भाग उतना लचीला चित्रा 8.15: कणर्पालिनहीं है जितना कि हमारी कणर्पालि। परंतु यह अस्िथ जैसा कठोर भी नहीं है। ये उपास्िथ है। शरीर की संिायों में भी उपास्िथ पाइर् जाती है। हमने देखा है कि मानव वंफकाल अनेक अस्िथयों, संिायों एवं उपास्िथयों से मिलकर बना होता है। आप उनमें से बहुत को देख सकते हैं, मोड़ सकते हैं तथा गति दे सकते हैं। अपनी नोटबुक में वंफकाल का स्वच्छ आलेख बनाएँ। हमने अपने शरीर की उन अस्िथयों एवं उनकी संिायों के विषय मंे जानकारी प्राप्त कर ली है, जो विभ्िान्न प्रकार की गति करने में हमारी सहायता चित्रा 8.16 अस्िथ को गति प्रदान करने में दो पेश्िायाँ संयुक्त रूप से कायर् करती हैं करती हैं। अस्िथयों को इस प्रकार की गति करने योग्य कौन बनाता है? आइए, इसका पता लगाएँ। अपने एक हाथ की मुट्टòòी बनाइए। मुट्टी के अंगूठे से इसी बाजू के कंध्े को छूने का प्रयास कीजिए;चित्रा 8.16द्ध। क्या आप अपनी ऊपरी भुजा में वुफछ परिवतर्न अनुभव करते हैं? दूसरे हाथ से इसे छूकर देख्िाए। क्या आपको कोइर् उभरा हुआ भाग दिखाइर् देता है? इसे पेशी कहते हंै। संवुफचित ;लंबाइर् में कमीद्ध होने के कारण पेश्िायाँ उभर आती हंै। अब आप अपने हाथ को पुनः सामान्य स्िथति में लाइए। पेश्िायों का क्या होता है? क्या यह अभी भी संकुचित अवस्था में हैं? चलते अथवा भागते समय आप अपने पैरों की पेश्िायों में भी इसी प्रकार का संवुफचन देख सकते हंै। संवुफचन की अवस्था में पेशी छोटी, कठोर एवं मोटी हो जाती है। यह अस्िथ को खींचती है। किसी अस्िथ को गति प्रदान करनेे के लिए दो पेश्िायांे को संयुक्त रूप से कायर् करना होता है। जब दो पेश्िायों में से कोइर् एक सिकुड़ती है तो अस्िथ उस दिशा में ख्िांच जाती है। युगल की दूसरी पेशी श्िाथ्िाल ;लंबाइर् में बढ़कर पतली हो जाती हैद्ध अवस्था में आ जाती है। अस्िथ को विपरीत दिशा में गति करने के लिए अब श्िाथ्िाल पेशी सिवु़फडकर विज्ञान अस्िथ को अपनी पूवर् स्िथति में खींचती है, जबकि पहली पेशी अब श्िाथ्िाल हो जाती है। पेशी केवल खींच सकती है, वह धक्का नहीं दे सकती। अतः एक अस्िथ को गति देने के लिए दो पेश्िायों को संयुक्त रूप से कायर् करना होता है ;चित्रा 8.16द्ध। क्या गति के लिए हमेशा अस्िथयांे एवं पेश्िायों की आवश्यकता होती है? दूसरे जंतु किस प्रकार चलते हैं? क्या सभी जंतुआंें में अस्िथयाँ पाइर् जाती हैं? वेंफचुए अथवा घोंघे में क्या होता है? आइए, वुफछ जंतुओं की गतियों का अध्ययन करते हैं। 8.2 जंतुओं की चाल वंेफचुआ ियाकलाप 5 बगीचे में चलते हुए एक वेंफचुए का निरीक्षण कीजिए। इसे पकड़कर एक स्याही सोख/पिफल्टर पेपर पर रख्िाए। इसकी गति का प्रेक्षण कीजिए ;चित्रा 8.17द्ध। इसके पश्चात् केंचुए को एक काँच की पट्टðी/टुकड़े, चित्रा 8.17 वेंफचुए की गति टाइल अथवा किसी चिकनी सतह पर रख्िाए तथा इसकी गति का प्रेक्षण कीजिए? क्या यह गति पेपर पर वेंफचुए की गति से भ्िान्न है? उफपर की दो सतहों में से किस पर केंचुआ आसानी से चल सकता है? वेंफचुए का शरीर एक सिरे को दूसरे से सटाकर रखे गए अनेक छल्लों से बना प्रतीत होता है। वेंफचुए के शरीर में अस्िथयाँ नहीं होती परंतु इसमें पेश्िायाँ होती हैं जो इसके शरीर के घटने और बढ़ने में सहायता करती हैं। चलने के दौरान, वंेफचुआ अपने शरीर के पश्च भाग को भूमि में जकड़े रहता है तथा अग्र भाग को पैफलाता है। इसके बाद वह अग्र भाग से भूमि को पकड़ता है तथा पश्च भाग को स्वतंत्रा कर देता है। इसके पश्चात् यह शरीर को संवुफचित करता है तथा पश्च भाग को आगे की ओर खींचता है। इससे वह वुफछ दूरी तक आगे बढ़ता है। वेंफचुआ इस प्रिया को बार - बार दोहराते हुए मिट्टð़ी पर आगे बढता है। इसके शरीर में चिकने पदाथर् होते हैं जो इसे चलने में सहायता करते हैं। यह अपने शरीर के हिस्से को शमीन से किस प्रकार टिकाता है? इसके शरीर में छोटे - छोटे अनेक शूक ;बाल जैसी आवृफतिद्ध होते हैं। ये शूक पेश्िायों से जुड़े होते हैं। ये शूक मिट्टðी में उसकी पकड़ को मजबूत बनाते हैं। वेंफचुआ वास्तव में अपने रास्ते में आने वाली मि‘ी को खाता है। उसका शरीर अनपचे पदाथर् को बाहर निकाल देता है। वेंफचुए द्वारा किया गया यह कायर् मि‘ी को उपजाउफ बना देता है जिससे पौधें को पफायदा होता है। घोंघा ियाकलाप 6 किसी बगीचे से एक घोंघा पकडि़ए। क्या आपने इसकी पीठ पर गोल संरचना देखी है ;चित्रा 8.18द्ध? इसे कवच कहते हैं और यह घोंघे का बाह्य - कंकाल है। परंतु यह अस्िथयों का बना नहीं होता। यह कवच चित्रा 8.18 घोंघा एकल एकक होता है और यह घोंघे को चलने में तिलचट्टेðमें विश्िाष्ट पेश्िायाँ होती हैं। पैर की पेश्िायाँ उन्हें कोइर् सहायता नहीं करता। यह घोंघे के साथ ¯खचता चलने में सहायता करती हैं। वक्ष की पेश्िायाँ तिलच‘े के जाता है। घोंघे को काँच की पिðका पर रखकर इसका प्रेक्षण कीजिए। जब यह चलना प्रारंभ करे तो सावधानी से काँच की पिðका को अपने हाथों से अपने सिर सेऊँचा उठाकर काँच के नीचे की ओर से उसके चलने के ढंग का प्रेक्षण कीजिए। कवच का छेद खुलने पर आपने उससे एक मोटी मांसल संरचना एवं सिर बाहर आते देखा है। मोटी संरचना इसका पाद ;पैरद्ध है जो दृढ़ - पेश्िायों का बना होता है। अब सावधानीपूवर्क काँच की प्लेट को एक ओर थोड़ा - सा झुकाइए। पाद ;पैरद्ध की लहरदार गति दिखाइर् देती है। क्या घोंघे की गति वेंफचुए की गति से तीव्र है अथवा ध्ीमी? तिलचट्टाðियाकलाप 7 किसी काॅकरोच ;तिलचट्टðाद्धका प्रेक्षण कीजिए ;चित्रा 8.19द्ध। तिलचट्टðा शमीन पर चलता है, दीवार पर चढ़ता है और वायु में उड़ता भी है। इनमें तीन जोड़ी पैर होते हैं जो चलने में सहायता करते हैं। इसका शरीर कठोर बा“य - वंफकाल द्वारा ढका होता है। यह बाह्य - वंफकाल विभ्िान्न एककों की परस्पर संध्ियों द्वारा बनता है जिसके कारण गति संभव हो पाती है। वक्ष से दो जोड़े पंख भी जुड़े होते हैं। अगले पैर संकरे और पिछले पैर चौड़े एवं बहुत पतले होते हैं। चित्रा 8.19: तिलच‘ा उडपक्षी ियाकलाप 8 पक्षी हवा में उड़ते हैं तथा भूमि पर चलते हैं। बत्तख तथा हंस जैसे वुफछ पक्षी जल में तैरते भी हैं। पक्षी इसीलिए उड़ पाते हैं क्यांेकि उनका शरीर उड़ने वफेलिए अनुवूफलित होता है। उनकी अस्िथयों में वायु प्रकोष्ठ होते हैं जिनके कारण उनकी अस्िथयाँ हल्की परंतु मशबूत होती हैं। पश्च पाद ;पैरोंद्ध की अस्िथयाँ चलने एवं बैठने के लिए अनुवूफलित होती हैं। अग्र पाद की अस्िथयाँ रूपांतरित होकर पक्षी के पंख बनाती हैं। वंफधे की अस्िथयाँ मशबूत होती हैं। वक्ष की अस्िथयाँ उड़ने वाली पेश्िायों को जकड़े रखने के लिए विशेषरूप से रूपांतरित होती हैं तथा पंखों को ऊपर - नीचे करने में सहायक होती हैं ;चित्रा 8.20द्ध। ़ने के समय उसके परों को गति देती हंै। मछली ियाकलाप 9 कागश की एक नाव बनाकर उसे पानी पर इस प्रकार रख्िाए कि उसका नुकीला भाग आगे की ओर रहे। इसे धीरे से धक्का दीजिए ख्चित्रा 8.21 ;ंद्ध,। ;इद्ध चित्रा 8.21 नाव से खेलना क्या यह जल पर आगे की ओर तेशी से जाती है? अब नाव को दोनों सिरों से पकड़कर इस प्रकार धक्का दीजिए कि वह चैड़ी ओर से जल में जाए ख्चित्रा 8.21;इद्ध,। क्या इस प्रकार नाव जल में सरलता से चल सकती है?क्या आपने ध्यान दिया है कि नाव की आकृति कापफी सीमा तक मछली जैसी है ;चित्रा 8.22द्ध?़मछली वफा सिर एवं पूँछ उसके मध्य भाग की अपेक्षापतला एवं नुकीला होता है। शरीर की ऐसी आकृति धारा रेखीय कहलाती है। चित्रा 8.22 मछली इसकी विशेष आकृति के कारण जल इधर - उधर बहकर निकल जाता है और मछली जल में सरलता से तैर सकती है। मछली का वंफकाल दृढ़ पेश्िायों से ढका रहता है। तैरने की प्रिया में शरीर का अग्र भाग एक ओर मुड़ जाता है तथा पँूछ विपरीत दिशा में जाती है। शरीर में गति मछली चित्रा 8.23 के अनुसार शरीर को मोड़ती है तो तीव्रता से उसकी पूँछ दूूसरी दिशा में मुड़ जाती है। इससे एक झटका - सा लगता है और मछली आगे की ओर चली जाती है। इस प्रकार के क्रमिक ताल से मछली आगे की ओर तैरती रहती है। पूँछ के पख इस कायर् में उसकी सहायता करते हैं। मछली के शरीर पर और भी पख होते हैं जो तैरते समय जल में संतुलन बनाए रखने एवं दिशा निधार्रण में सहायता करते हैं। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि गोताखोर अपने पैरों में इन पखों की तरह के विशेष अरित्रा ;सिपचचमतद्ध पहनते हंै जो उन्हें जल में तैरने में सहायता करते हैं? सपर् वैफसे चलते हैं? क्या आपने साँप को पिफसलते हुए आगे बढ़ते देखा है? क्या यह सीधा चलता है ;चित्रा 8.24द्ध? सपर् का मेरुदंड लंबा होता है। शरीर की पेश्िायाँ क्षीण एवं असंख्य होती हंै। वे परस्पर जुड़ी होती हंै चित्रा 8.24 सपर् में गति चाहे वे दूर ही क्यों न हों। पेश्िायाँ मेरुदंड, पसलियों एवं त्वचा को भी एक - दूसरे से जोड़ती हंै। सपर् का शरीर अनेक वलय में मुड़ा होता है। इसी प्रकार सपर् का प्रत्येक वलय उसे आगे की ओर धकेलता है। इसका शरीर अनेक वलय बनाता है और प्रत्येक वलय आगे को धक्का देता है, इस कारण सपर् बहुत तेश गति से आगे की ओर चलता है परंतु सरल रेखा में नहीं चलता। हमने विभ्िान्न जंतुओं को गति प्रदान करने वाली अस्िथयों एवं पेश्िायों के विषय में जानकारी प्राप्त की। पहेली एवं बूझो के पिटारे में विभ्िान्न जंतुओं की गतियों से संबंिात अनेक प्रश्न हैं। इसी प्रकार आपके मस्ितष्क में अनेक प्रश्न उभर रहे होंगे। प्रसि( ग्रीक दाशर्निक मेरुदंड वंफदुक - खल्िलका संध्ि अरस्तु ने अपनी पुस्तक गैट आॅपफ एनिमल्स में स्वयं अपने आप से ऐसे अनेक प्रश्न पूछे थे। विभ्िान्न जतंअुांे के शरीर में विभ्िान्न भाग क्यों होते हैं? यह विशेष अंग उन जंतुओं की विशेष गति में किस प्रकार सहायक हैं? विभ्िान्न जंतुओं के शारीरिक अंगों में क्या समानताएँ एवं विभ्िान्नताएँ हैं? विभ्िान्न जंतुओं को चलने के लिए कितने अंगों की आवश्यकता होती है? मनुष्य के दो पैर तथा गाय और भैंस के चार पैर क्यों होते हैं? बहुत से जंतु समपादी होते हैं, क्यों? हमारे पैरों के मुड़ने का ढंग हमारे हाथों की तुलना में अलग क्यों है? इतने अध्िक प्रश्न! संभवतः अपने ियाकलापोंद्वारा हमने वुफछ प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने का प्रयासकिया है। हमें वुफछ और प्रश्नों के उत्तर खोजने हैं। पेशी बाह्य वंफकाल शूक श्रोण्िा - अस्िथयाँ उपास्िथ गुहिका अचल संध्ि जंतुओं की चाल हिन्ज संध्ि ध्ुराग्र संध्ि पसली - पिंजर वंफध्े की अस्िथयाँ कंकाल धरारेख्िाय ऽ अस्िथ एवं उपास्िथ मानव वंफकाल बनाते हैं। यह शरीर का पिंजर बनाता है और इसे एकआकृति भी देता है। वंफकाल चलने में सहायक है और अंातरिक अंगों की सुरक्षा करता है। ऽ मानव वंफकाल खोपड़ी, मेरुदंड, पसलियों, वक्ष की अस्िथ, वंफध्े एवं श्रोण्िा मेखला तथा हाथ एवं पाँव की अस्िथयों से बनता है। ऽ पेश्िायों के जोड़े के एकांतर क्रम में सिवुफड़ने एवं पैफलने से अस्िथयाँ गति करती हैं। ऽ अस्िथयों की संध्ियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। यह उस संध्ि की प्रकृति एवं गति की दिशा पर निभर्र करता है। ऽ पक्ष्िायों की दृढ़ पेश्िायाँ तथा हल्की अस्िथयाँ मिलकर उन्हें उड़ने में सहायता करती हंै। ये पंखों को पफड़पफड़ा कर उड़ते हैं। ऽ मछली शरीर के दोनोें ओर एकांतर क्रम में वलय बनाकर जल मंे तैरती है। ऽ सपर् अपने शरीर के दोनों ओर एकांतर क्रम में वलय बनाते हुए भूमि पर वलयाकार गति करता हुआ आगे की ओर पिफसलता है। बहुत सारी अस्िथयाँ एवं उससें जुड़ी पेश्िायाँ शरीर को आगे की ओर धक्का देती हैं। ऽ तिलच‘े का शरीर एवं पैर कठोर आवरण से ढके होते हैं जो बाह्य - कंकाल बनाता है। वक्ष की पेश्िायाँ तीन जोड़ी पैरों एवं दो जोड़ी पंखों से जुड़ी होती है जो तिलच‘े को चलने एवं उड़ने में सहायता करती हैं। ऽ वेंफचुए में गति शरीर की पेश्िायों के बारी - बारी से विस्तरण एवं संवुफचन से होती है। शरीर की अध्ः सतह पर शूक वेंफचुए को भूमि पर पकड़ बनाने में सहायक है। ऽ घोंघा पेशीय पाद की सहायता से चलता है। 1. रिक्त स्थानों की पूतिर् कीजिएः ;कद्ध अस्िथयों की संध्ियाँ शरीर को - - - - - - - - - - - - - - - - - - में सहायता करती हैं। ;खद्ध अस्िथयाँ एवं उपास्िथ संयुक्त रूप से शरीर का - - - - - - - - - - - - - - - - - - बनाते हैं। ;गद्ध कोहनी की अस्िथयाँ - - - - - - - - - - - - - - - - - - संध्ि द्वारा जुड़ी होती हैं। ;घद्ध गति करते समय - - - - - - - - - - - - - - - - - - के संवुफचन से अस्िथयाँ ख्िांचती हैं। 2.निम्न कथनों के आगे सत्य ;ज् द्ध तथा असत्य ;थ्द्ध को इंगित कीजिए। ;कद्ध सभी जंतुओं की गति एवं चलन बिलवुफल एक समान होता है। ; द्ध ;खद्ध उपास्िथ अस्िथ की अपेक्षा कठोर होती हैं। ; द्ध ;गद्ध अंगुलियों की अस्िथयों में संध्ि नहीं होतीं। ; द्ध ;घद्ध अग्रभुजा में दो अस्िथयाँँ होती हैं। ; द्ध ;घद्ध तिलचट्टð; द्ध ों में बाह्य - कंकाल पाया जाता है। 3.काॅलम 1 में दिए गए शब्दों का संबंध् काॅलम 2 के एक अथवा अध्िक कथन से जोडि़ए: काॅलम 1 काॅलम 2 ऊपरी जबड़ा शरीर पर पंख होते हैं। मछली बाह्य - कंकाल होता है। पसलियाँ हवा में उड़ सकता है। घांघा ेएक अचल संध्ि है। तिलच‘ा हृदय की सुरक्षा करती है। बहुत ध्ीमी गति से चलता है। का शरीर धरा रेखीय होता है। 4.निम्न प्रश्नों के उत्तर दीजिए: ;कद्ध वंफदुक - खल्िलका संध्ि क्या है? ;खद्ध कपाल की कौन - सी अस्िथ गति करती है? ;गद्ध हमारी कोहनी पीछे की ओर क्यों नहीं मुड़ सकती?

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