01_02H F.qxd अध्याय 2 विविधता एवं भेदभाव पिछले पाठ में आपने विविधता के बारे में पढ़ा। कई बार जो लोग दूसरों से अलग होते हैं उन्हें चिढ़ाया जाता है, उनका मजाक उड़ाया जाता है। या फिर उन्हें कई गतिविधियों या समूहों में शामिल नहीं किया जाता। अगर हमारे दोस्त या दूसरे लोग हमारे साथ ऐसा व्यवहार करें तो हमें दुख होता है, गुस्सा आता है और हम असहाय महसूस करते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? इस पाठ में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि ऐसे अनुभव हमारे समाज से और हमारे आस-पास मौजूद असमानताओं से कैसे जुड़े हुए हैं। टू म क्या हैं और हम कैसे हैं, यह कई चीज़ों हैं जो लोगों की मातृभाषाएँ हैं। यहाँ सौ से भी ° पर निर्भर करता है। हम कैसे रहते हैं, ज्यादा तरह के नृत्य किए जाते हैं। कौन-सी भाषाएँ बोलते हैं, क्या खाते हैं, क्या यह विविधता हमेशा खुश होने का कारण पहनते हैं, कौन-से खेल खेलते हैं और कौन-से नहीं बनती। हम उन लोगों के साथ सुरक्षित एवं उत्सव मनाते हैं - इन सब पर हमारे रहने की आश्वस्त महसूस करते हैं जो हमारी तरह दिखते जगह के भूगोल और उसके इतिहास का असर हैं, बात करते हैं, कपडे पहनते हैं और हमारी पड़ता है। तरह सोचते हैं। कभी-कभी जब हम ऐसे लोगों अगर आप संक्षेप में ही निम्नलिखित बिंदुओं से मिलते हैं जो हमसे बहुत भिन्न होते हैं, तो पर ध्यान दें तो भी यह अंदाज़ा लग जाएगा कि हमें वे बहुत अजीब और अपरिचित लग सकते भारत कितनी विविधताओं वाला देश है। हैं। कई बार हम समझ ही नहीं पाते या जान | संसार में आठ मुख्य धर्म हैं। भारत में उन ही नहीं पाते कि वे हमसे अलग क्यों हैं। लोग आठों धर्मों के अनुयायी यानी मानने वाले रहते अपने से अलग दिखने वालों के बारे में खास हैं। यहाँ सोलह सौ से ज्यादा भाषाएँ बोली जाती तरह की राय बना लेते हैं। 2015-16 (12-01-15) 16 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन पूर्वाग्रह उन कथनों को देखिए जो आपको ग्रामीण एवं इनमें से कुछ कथन ग्रामीण लोगों को शहरी लोगों के बारे में सही लगे। जिन कथनों अज्ञानी एवं अंधविश्वासी की तरह देखते हैं। से आप सहमत हैं, उन पर निशान लगाइए। क्या जबकि शहर में रहने वाले लोगों को आलसी, आपके दिमाग में ग्रामीण या शहरी लोगों को चालाक एवं सिर्फ पैसे से सरोकार रखने वालों लेकर किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह हैं? क्या दूसरे की तरह देखते हैं। जब हम किसी के बारे में लोगों के दिमाग में भी ये पूर्वाग्रह हैं? लोगों के | पहले से कोई राय बना लेते हैं और उसे हम दिमाग में ये पूर्वाग्रह क्यों होते हैं? जिन पूर्वाग्रहों अपने दिमाग में बिठा लेते हैं तो वह पूर्वाग्रह को आपने अपने आस-पास महसूस किया है। उनकी एक सूची बनाइए। ये पूर्वाग्रह लोगों के का रूप ले लेती है। ज्यादातर यह राय व्यवहार को कैसे प्रभावित करते हैं? नकारात्मक होती है। जैसा कि कथनों में दिया गया है - लोगों को आलसी, चालाक या कंजूस ग्रामीण लोग मानना भी पूर्वाग्रह है। आधे से ज्यादा भारतीय गाँवों में रहते हैं। ग्रामीण लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर सतर्क जब हम यह सोचने लगते हैं कि किसी नहीं होते। वे बहुत अंधविश्वासी होते हैं। गाँव के लोग बहुत पिछड़े हुए होते हैं और वे काम को करने का कोई एक तरीका ही सबसे कृषि की आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल अच्छा और सही है, तो हम अक्सर दूसरों की करना पसंद नहीं करते हैं। फसल की बुवाई और कटाई के समय परिवार इज्ज़त नहीं कर पाते जो उसी काम को दूसरी के लोग खेतों में 12 से 14 घंटों तक काम तरह से करना पसंद करते हैं। उदाहरण के लिए करते हैं। ग्रामीण लोग काम की तलाश में शहरों की ओर अगर हम सोचें कि अंग्रेज़ी सबसे अच्छी भाषा स्थानान्तरण करने को बाध्य होते हैं। है और दूसरी भाषाएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं, तो हम शहरी लोग। अन्य भाषाओं को बहुत नकारात्मक रूप से शहरी जीवन बड़ा आसान होता है। यहाँ के लोग बिगड़े हुए और आलसी होते हैं। देखेंगे। परिणामस्वरूप हम उन लोगों की शायद शहरों में लोग अपने परिवार के सदस्यों के इज्ज़त नहीं कर पाएँगे जो अंग्रेजी के अलावा साथ बहुत कम समय बिताते हैं। शहरी लोग केवल पैसे की चिंता करते हैं, लोगों अन्य भाषाएँ बोलते हैं। अन्य की नहीं। हम कई चीजों के बारे में पूर्वाग्रही हो सकते शहरी लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, वे चालाक और भ्रष्ट होते हैं। हैं - लोगों के धार्मिक विश्वास, उनकी चमड़ी शहरों में रहना बहुत महँगा पड़ता है। लोगों की | का रंग, जिस क्षेत्र से वे आते हैं, जिस तरह से कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा किराए और आने-जाने में खर्च हो जाता है। वे बोलते हैं, जैसे कपड़े वे पहनते हैं इत्यादि। 2015-16 (12-01-15) विविधता एवं भेदभाव / 17 अक्सर दूसरों के बारे में बनाए गए हमारे पूर्वाग्रह इतने पक्के होते हैं कि हम उनसे दोस्ती नहीं करना चाहते। इस वजह से कई बार हमारा व्यवहार ऐसा होता है कि हम उन्हें दु:ख पहुँचा। देते हैं। लड़के और लड़की में भेदभाव समाज में लड़के और लड़कियों में कई तरह से भेदभाव किया जाता है। हम सभी इस भेदभाव से परिचित हैं। एक लड़का या लड़की होने का अर्थ क्या होता है? आपमें से कई लोग कहेंगे, “हम लड़के या लड़की की तरह जन्म लेते हैं। यह तो ऐसे ही होता है। इसमें सोचने वाली क्या बात है?" आइए, देखें कि क्या सच्चाई यही है? नीचे दिए गए कथनों की सूची में से तालिका को भरिए। अपने उत्तर के कारणों पर चर्चा कीजिए। वे बहुत ही सुशील हैं। उनका बात करने का तरीका बड़ा सौम्य और मधुर है। वे शारीरिक रूप से बलिष्ठ हैं। वे शरारती हैं। वे नृत्य करने और चित्रकारी में निपुण हैं। वे रोते नहीं। वे उधमी हैं। वे खेल में निपुण हैं। वे खाना पकाने में निपुण हैं। वे भावुक हैं। लड़का लड़की - M 1 ८० NE | 5 OTA 2015-16 (12-01-15) 18 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन ऊपर के चित्रों में जो बच्चे हैं उन्हें पहले 'विकलांग' कहा जाता था। इस शब्द को बदलकर आज उनके लिए जो शब्द प्रयोग किए जाते हैं वे हैं - 'ख़ास ज़रूरतों वाले बच्चे। उनके बारे में लोगों के पूर्वाग्रहों को यहाँ बड़े अक्षरों में दिया गया है। साथ में उनकी अपनी भावनाएँ और विचार भी दिए गए हैं। ये बच्चे अपने से जुड़ी रूढिबद्ध धारणाओं के बारे में क्या कह रहे हैं। और क्यों - इस पर चर्चा कीजिए। आपकी राय में क्या खास ज़रूरतों वाले बच्चों को सामान्य स्कूल में पढ़ना चाहिए या उनके लिए अलग स्कूल होने चाहिए? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए। स्रोत: व्हाई आर यू अफ्रेड टू होल्ड माई हैंड, शीला धीर। 2015-16 (12-01-15) विविधता एवं भेदभाव / 19 अगर हम इस कथन को लें कि वे रोते इसलिए वह दूसरों के सामने रोने से अपने आप नहीं तो आप देखेंगे कि यह गुण आमतौर पर को रोक लेता है। लड़कों या पुरुषों के साथ जोड़ा जाता है। हम लगातार यह सुनते रहते हैं कि लड़के बचपन में जब लड़कों को गिर जाने पर चोट ऐसे होते हैं और लड़कियाँ ऐसी होती हैं। लग जाती है तो माता-पिता एवं परिवार के समाज की इन मान्यताओं को हम बिना अन्य सदस्य अक्सर यह कहकर चुप कराते हैं। सोचे-समझे मान लेते हैं। हम विश्वास कर लेते कि ‘रोओ मत। तुम तो लड़के हो। लड़के हैं कि हमारा व्यवहार इनके अनुसार ही होना बहादुर होते हैं, रोते नहीं हैं। जैसे-जैसे बच्चे चाहिए। हम सभी लड़कों और लड़कियों को बड़े होते जाते हैं, वे यह विश्वास करने लगते उसी छवि के अनुरूप देखना चाहते हैं। हैं कि लड़के रोते नहीं हैं। यहाँ तक कि अगर किसी लड़के को रोना रूढिबद्ध धारणाएँ बनाना । आए भी तो वह अपने आप को रोक लेता है। जब हम सभी लोगों को एक ही छवि में बाँध लड़का यह मानता है कि रोना कमजोरी की देते हैं या उनके बारे में पक्की धारणा बना लेते निशानी है। हालाँकि लड़कों और लड़कियों हैं, तो उसे रूढिबद्ध धारणा कहते हैं। कई बार दोनों का कभी-कभी रोने का मन करता है। हम किसी खास देश, धर्म, लिंग के होने के खासकर जब उन्हें गुस्सा आए या दर्द हो। कारण किसी को कंजूस', 'अपराधी' या लेकिन बड़े होने तक लड़के सीख जाते हैं या ‘बेवकूफ़' ठहराते हैं। ऐसा दरअसल उनके बारे अपने को सिखा लेते हैं कि रोना नहीं है। अगर में मन में एक पक्की धारणा बना लेने के एक बड़ा लड़का रोए तो उसे लगता है कि कारण होता है। हर देश, धर्म आदि में हमें दूसरे उसे चिढ़ाएँगे या उसका मज़ाक बनाएँगे, कंजूस, अपराधी, बेवकूफ़ लोग मिल ही जाते हैं। सिर्फ इसलिए कि कुछ लोग उस समूह में ‘वे कोमल एवं मृदु स्वभाव की हैं, वैसे हैं, पूरे समूह के बारे में ऐसी राय बनाना ‘वे बहुत ही सुशील हैं'–ऐसे कथनों वाजिब नहीं है। इस प्रकार की धारणाएँ हमें को लेकर उन पर चर्चा कीजिए कि प्रत्येक इंसान को एक अनोखे और अलग व्यक्ति ये कैसे केवल लड़कियों पर लागू की तरह देखने से रोक देती हैं। हम नहीं देख किए जाते हैं। क्या लड़कियों में ये पाते कि उस व्यक्ति के अपने कुछ खास गुण गुण जन्म से ही होते हैं या वे ऐसा व्यवहार समाज से सीखती हैं? और क्षमताएँ हैं जो दूसरों से अलग हैं। आपकी उन लड़कियों के बारे में रूढिबद्ध धारणाएँ बड़ी संख्या में लोगों को क्या राय है जो कोमल एवं मृदु एक ही प्रकार के खाँचे में जड़ देती हैं। जैसे स्वभाव की नहीं होतीं और शरारती माना जाता था कि हवाई जहाज़ उड़ाने का होती हैं? काम लड़कियाँ नहीं कर सकतीं। इन धारणाओं 2015-16 (12-01-15) 20 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन का असर हम सब पर पड़ता है। कई बार ये धारणाएँ हमें ऐसे काम करने से रोकती हैं जिनको करने की क़ाबलियत शायद हममें हो। असमानता एवं भेदभाव भेदभाव तब होता है जब लोग पूर्वाग्रहों या रूढिबद्ध धारणाओं के आधार पर व्यवहार करते हैं। अगर आप लोगों को नीचा मुसलमानों के बारे में यह आम रूढिबद्ध धारणा है। दिखाने के लिए कुछ करते हैं, अगर कि वे लड़कियों को पढ़ाने में रुचि नहीं लेते, इसीलिए आप उन्हें कुछ गतिविधियों में भाग लेने से उन्हें स्कूल नहीं भेजते। जबकि अध्ययन यह दिखा रहे। रोकते हैं, किसी खास नौकरी को करने से हैं कि मुसलमानों की गरीबी इसका एक महत्त्वपूर्ण रोकते हैं या किसी मोहल्ले में रहने नहीं देते, कारण है। गरीबी की वजह से ही वे लड़कियों को | एक ही कुएँ या हैंडपंप से पानी नहीं लेने स्कूल नहीं भेज पाते या स्कूल से जल्दी निकाल लेते हैं। देते और दूसरों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे जहाँ पर भी गरीबों तक शिक्षा पहुँचाने के प्रयास किए। गए हैं, वहाँ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपनी कप या गिलास में चाय नहीं पीने देते तो लड़कियों को स्कूल भेजने में रुचि दिखाई है। उदाहरण इसका मतलब है कि आप उनके साथ के तौर पर केरल में स्कूल प्रायः घर के पास हैं। भेदभाव कर रहे हैं। सरकारी बस की सुविधा बहुत अच्छी है जिससे | भेदभाव कई कारणों से हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों को स्कूल पहुँचने में मदद आप याद करें कि पिछले पाठ में समीर एक मिलती है। उनमें 60 प्रतिशत से ज्यादा महिला शिक्षक और समीर दो एक-दूसरे से बहुत भिन्न थे। हैं। इन सभी कारकों ने बहुत सारे गरीब परिवार के उदाहरण के लिए उनका धर्म अलग था। यह बच्चों को स्कूल जाने में मदद की है जिनमें मुसलमान लड़कियाँ भी शामिल हैं। विविधता का एक पहलू है। पर यह भेदभाव दूसरे राज्यों में जहाँ ऐसे प्रयास नहीं किए गए, वहाँ का कारण भी बन सकता है। ऐसा तब होता गरीब परिवारों के बच्चों को स्कूल जाने में मुश्किल । है जब लोग अपने से भिन्न प्रथाओं और आती है-चाहे वे मुसलमान हों, जनजातीय हों या रिवाजों को निम्न कोटि का मानते हैं। अनुसूचित जाति के हों। जाहिर है कि मुसलमान दोनों समीरों में एक और अंतर उनकी लड़कियों की स्कूल से गैर-हाजिरी का कारण धर्म आर्थिक पृष्ठभूमि का था। समीर दो गरीब नहीं, गरीबी है। था। जैसा कि आपने पहले पढ़ा है, यह अंतर 2015-16 (12-01-15) विविधता एवं भेदभाव / 21 विविधता का पहलू नहीं है। यह तो असमानता दलित वह शब्द है जो नीची कही जाने वाली है। बहुत लोगों के पास अपने खाने, कपड़े और जाति के लोग अपनी पहचान के रूप में घर की मूल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। वे इस शब्द को 'अछूत' साधन और पैसे नहीं होते हैं। इस कारण से ज्यादा पसंद करते हैं। दलित का मतलब दफ्तरों, अस्पतालों, स्कूलों आदि में उनके साथ है जिन्हें दबाया गया', 'कुचला गया। दलितों भेदभाव किया जाता है। के अनुसार यह शब्द दर्शाता है कि कैसे सामाजिक पूर्वाग्रहों और भेदभाव ने दलित कुछ लोगों को विविधता और असमानता लोगों को ‘दबाकर रखा है। सरकार ऐसे लोगों पर आधारित दोनों ही तरह के भेदभाव का । को ‘अनुसूचित जाति के वर्ग में सामना करना पड़ता है। एक तो इस कारण कि रखती है। वे उस समुदाय के सदस्य हैं जिनकी संस्कृति को मूल्यवान नहीं माना जाता। ऊपर से यदि पहलू है। जाति व्यवस्था में लोगों के समूहों वे गरीब हैं और उनके पास अपनी जरूरतों को । को एक तरह की सीढ़ी के रूप में रखा गया पूरा करने के साधन नहीं, तो इस आधार पर । जिसमें एक जाति, दूसरी जाति के ऊपर या भी भेदभाव किया जाता है। ऐसे दोहरे भेदभाव नीचे थी जिन्होंने अपने आपको इस सीढ़ी में का सामना कई जनजातीय लोगों, धार्मिक । सबसे ऊपर रखा, उन्होंने अपने को ऊँची जाति समूहों और खास क्षेत्र के लोगों को करना । करना का और उत्कृष्ट कहा। जिन समूहों को इस पड़ता है। भेदभाव का सामना करने पर अपनी आजीविका चलाने के लिए लोग अलग-अलग तरह के काम करते हैं जैसे पढ़ाना, बर्तन बनाना, मछली पकड़ना, बढ़ईगिरी, खेती एवं बुनाई इत्यादि। लेकिन कुछ कामों को दूसरों के मुकाबले अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। सफ़ाई करना, कपड़े धोना, बाल काटना, कचरा उठाना जैसे कामों को समाज में कम महत्त्व का माना जाता है। इसलिए जो लोग इन कामों को करते हैं। उनको गंदा और अपवित्र माना जाता है। यह जाति व्यवस्था का एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण जाति के आधार पर कक्षा में किसी बच्चे को दूसरे बच्चों से अलग बैठाना भेदभाव का एक रूप है। 2015-16 (12-01-15) 22 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन सीढी के तले में रखा गया उनको 'अछूत' और अयोग्य कहा गया। जाति प्रथा के नियम एकदम निश्चित थे। इन 'अछूतों को दिए गए। काम के अलावा और कोई काम करने की इजाजत नहीं थी। उदाहरण के लिए कुछ समूहों को सिर्फ कचरा उठाने और मरे हुए। जानवरों को गाँव से हटाने की इजाज़त थी। उन्हें ऊँची जाति के लोगों के घर में घुसने, गाँव के कुएँ से पानी लेने और यहाँ तक कि मंदिर में घुसने की भी इजाज़त नहीं थी। उनके बच्चे दूसरी जाति के बच्चों के साथ स्कूल में बैठ नहीं सकते थे। इस तरह ऊँची जाति के लोगों को जो अधिकार हासिल था, उससे उन्होंने तथाकथित अछूतों को वंचित रखा। रूढिबद्ध धारणाओं एवं भेदभाव में क्या अंतर है? आपके अनुसार जिस व्यक्ति के साथ भेदभाव होता है उसे कैसा महसूस होता है? डा. भीम राव अंबेडकर (1891-1956) को भारतीय संविधान के पिता एवं दलितों के सबसे बड़े नेता के रूप में जाना जाता है। डा. अंबेडकर ने दलित समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी। उनका महार जाति में जन्म हुआ था जो अछूत मानी जाती थी। महार लोग गरीब होते थे, उनके पास जमीन नहीं थी और उनके बच्चों को वही काम करना पड़ता था जो वे खुद करते थे। उन्हें गाँव के बाहर रहना पड़ता था और गाँव के अंदर आने की इजाज़त नहीं थी। अंबेडकर अपनी जाति के पहले व्यक्ति थे जिसने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और वकील बनने के लिए इंग्लैंड गए। उन्होंने दलितों को अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज भेजने के लिए प्रोत्साहित किया। दलितों से अलग-अलग तरह की सरकारी नौकरी करने को कहा ताकि वे जाति व्यवस्था से बाहर निकल पाएँ। दलितों के मंदिर में प्रवेश के लिए जो कई प्रयास किए जा रहे थे, उनका अंबेडकर ने नेतृत्व किया। उन्हें ऐसे धर्म की तलाश थी जो सबको समान निगाह से देखे। जीवन में आगे चल कर उन्होंने धर्म परिवर्तन करके बौद्ध धर्म को अपनाया। उनका मानना था कि दलितों को जाति प्रथा के खिलाफ अवश्य लड़ना चाहिए और ऐसा समाज बनाने की तरफ काम करना चाहिए जिसमें सबकी इज्ज़त हो, न कि कुछ ही लोगों की। अगले पृष्ठ पर हम यह देखेंगे कि कैसे भारत की एक मशहूर हस्ती को भेदभाव का सामना करना पड़ा था। यह भाग हमें यह समझने में मदद करेगा कि कैसे जाति के तहत बहुत बड़ी संख्या में लोग भेदभाव के शिकार हुए। भारत के एक महान नेता डा. भीमराव अंबेडकर ने जाति व्यवस्था पर आधारित भेदभाव के अपने अनुभवों के बारे में लिखा है। यह अनुभव उनको 1901 में हुआ था जब वे केवल 9 साल के थे। वे महाराष्ट्र में 2015-16 (12-01-15) विविधता एवं भेदभाव / 23 कोरेगाँव में अपने भाइयों के साथ पिता से मिलने गए थे। | बड़ी देर हमने इंतज़ार किया, पर कोई नहीं आया। एक घंटा बीत गया तो स्टेशन मास्टर पूछने आ गए। उन्होंने हमसे हमारे टिकट माँगे जो हमने दिखा दिए। उन्होंने पूछा कि हम वहाँ क्यों रुके हुए थे। हमने बताया कि हमें कोरेगाँव जाना था और हम पिताजी या उनके नौकर के आने का हावी हो गई थी। उन्होंने जैसे ही मेरा जवाब इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन दोनों में से कोई सुना, वे अपने कमरे में वापस चले गए और भी नहीं पहुंच पाया था और हमें पता नहीं था हम वहीं के वहीं खड़े रह गए। पंद्रह-बीस कि कोरेगाँव कैसे पहुंचते हैं। हमने बहुत अच्छे मिनट बीत गए, सूरज बिल्कुल छिप-सा गया कपड़े पहन रखे थे। हमारे कपड़ों और बोली था। पिताजी आए नहीं थे और न ही उनका से कोई भी यह अंदाज़ नहीं लगा सकता था नौकर और अब स्टेशन मास्टर भी हमें छोड़कर कि हम अछूतों के बच्चे थे। निश्चय ही स्टेशन चले गए थे। हम काफी घबराए हुए थे। यात्रा मास्टर को यह लगा कि हम ब्राह्मण बच्चे हैं के शुरू में जो खुशी और उत्साह की भावना और वे हमारी मुश्किल को देखकर बडे परेशान थी उसकी जगह अब अत्यधिक उदासी ने ले हुए। जैसा कि हिंदुओं में होता ही है, स्टेशन ली थी। मास्टर ने हमसे पूछा कि हम कौन हैं। बिना आधे घंटे के बाद स्टेशन मास्टर लौटकर एक पल भी सोचे मेरे मुंह से निकल गया कि आए तो पूछा कि हम क्या करने की सोच रहे हम महार हैं। (बंबई प्रांत में महार समुदाय को हैं। हमने कहा कि अगर हमें किराए पर एक अछूत माना जाता था।) उनको एकदम से बैलगाड़ी मिल जाती तो हम कोरेगाँव जा सकते धक्का लगा। वे भौंचक्के रह गए। उनके चेहरे थे। अगर कोरेगाँव ज्यादा दूर नहीं हो तो हम पर अचानक परिवर्तन हुआ। हमने देख लिया फौरन निकलना चाहते थे। वहाँ किराए पर कई कि एक अजीब-सी घृणा की भावना उन पर बैलगाड़ियाँ चल रही थीं। लेकिन मैंने स्टेशन 2015-16 (12-01-15) 24 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन मास्टर को जो जवाब दिया था कि हम महार हैं, कल्पना करके देखिए कि यह कितना उसका पता सबको चल गया था। कोई भी मुश्किल होगा अगर लोगों को एक जगह से गाड़ीवान अछूत वर्ग की सवारी को ले जाकर दूसरी जगह जाने न दिया जाए। यह कितना अपने आप को गंदा और नीचा नहीं बनाना अपमानजनक और दुखदायी होगा अगर लोग चाहता था। हम दुगुना किराया देने को तैयार थे, आपसे दूर-दूर रहें, आपको छूने से मना करें पर हमें एहसास हुआ कि बात पैसे से नहीं बन और आपको पानी न पीने दें। यह छोटी-सी सकती थी। स्टेशन मास्टर जो हमारे लिए घटना दिखाती है कि कैसे गाड़ी से एक से गाडीवानों से मोल-तोल कर रहे थे, चुपचाप खड़े दूसरी जगह जाने के साधारण काम की सुविधा हो गए। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें? भी इन बच्चों के पास नहीं थी जबकि वे पैसा स्रोत : डा. बी.आर. अंबेडकर, राइटिंग एंड स्पीचेज़ । दे सकते थे। स्टेशन के सभी गाड़ीवानों ने खंड 12 संपादन : वंसत मन, बंबई शिक्षा विभाग, बच्चों को ले जाने से मना कर दिया। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार बच्चों के साथ भेदभाव भरा व्यवहार किया। इस कहानी से यह बिल्कुल साफ़ है कि जाति पर आधारित भेदभाव न केवल दलितों * बच्चे पैसा देने को तैयार थे, को कई गतिविधियों से वंचित रखता है, बल्कि फिर भी गाड़ीवानों ने उन्हें ले वह उन्हें आदर और सम्मान भी नहीं मिलने जाने से मना कर दिया। क्यों? देता जो दूसरों को मिलता है। स्टेशन पर लोगों ने डा. अंबेडकर और उनके भाइयों के साथ कैसे समानता के लिए संघर्ष भेदभाव किया? ब्रिटिश शासन से आज़ादी पाने के लिए जो | महार होने का पता चलने पर स्टेशन मास्टर की जो प्रतिक्रिया संघर्ष किया गया था उसमें समानता के हुई थी, उसे देखकर बचपन में व्यवहार के लिए किया गया संघर्ष भी शामिल अंबेडकर को कैसा लगा होगा? था। दलितों, औरतों, जनजातीय लोगों और अपने शब्दों में वर्णन कीजिए। किसानों ने अपने जीवन में जिस गैर-बराबरी | क्या आपको कभी अपने प्रति का अनुभव किया, उसके खिलाफ़ उन्होंने लोगों के पूर्वाग्रह का अनुभव लड़ाई लड़ी। हुआ है? या आपने दूसरों के जैसा कि पहले भी बात हुई, बहुत सारे प्रति भेदभाव भरे व्यवहार को दलितों ने संगठित होकर मंदिर में प्रवेश पाने देखा है? उससे आपको कैसा के लिए संघर्ष किया। महिलाओं ने माँग की महसूस हुआ? कि जैसे पुरुषों के पास शिक्षा का अधिकार है। 2015-16 (12-01-15) विविधता एवं भेदभाव / 25 वैसे उन्हें भी अधिकार मिले। किसानों और दलितों ने अपने आपको ज़मींदारों और उनकी ऊँची ब्याज़ की दर से छुटकारा दिलाने के लिए संघर्ष किया। 1947 में भारत जब आज़ाद हुआ और एक राष्ट्र बना तो हमारे नेताओं ने समाज में व्याप्त कई तरह की असमानताओं पर विचार किया। संविधान को लिखने वाले लोग भी इस बात से अवगत थे कि हमारे समाज में कैसे भेदभाव किया जाता है और लोगों ने उसके खिलाफ किस तरह संघर्ष किया है। कई नेता इन लड़ाइयों के हिस्सा थे जैसे डा. अंबेडकर। इसलिए नेताओं ने संविधान में ऐसी दृष्टि और लक्ष्य रखा जिससे भारत में सभी लोगों को बराबर माना जाए। समानता को एक अहम मूल्य की तरह माना गया है जो हम सभी को एक भारतीय के रूप में जोड़ती है। प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार और समान अवसर प्राप्त हैं। अस्पृश्यता यानी छुआछूत को अपराध की तरह देखा जाता है और दलित के अलावा कई अन्य समुदाय हैं। जिनके साथ भेदभाव किया जाता है। क्या आप भेदभाव के कुछ अन्य उदाहरण सोच सकते हैं? उन तरीकों पर चर्चा कीजिए जिनके द्वारा ‘खास ज़रूरतों वाले लोगों के साथ भेदभाव किया जा सकता है। अपने अधिकारों की माँग करती हुई औरतें इसे कानूनी रूप से खत्म कर दिया गया है। लोग अपनी पसंद का काम चुनने के लिए बिल्कुल आज़ाद हैं। नौकरियाँ सभी लोगों के लिए खुली हुई हैं। इन सबके अलावा संविधान ने सरकार पर यह विशेष जिम्मेदारी डाली थी कि वह गरीबों और मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ गए समुदायों को इस समानता के अधिकार के फायदे दिलवाने के लिए विशेष कदम उठाए। 2015-16 (12-01-15) 26 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन हालाँकि हमारे संविधान में इन विचारों पर जोर दिया गया है, पर यह पाठ इसी बात को उठाता है कि असमानता आज भी मौजूद है। समानता वह मूल्य है जिसके लिए हमें निरंतर संघर्ष करते रहना होगा। भारतीयों के लिए समानता का मूल्य वास्तविक जीवन का हिस्सा बने, सच्चाई बने इसके लिए लोगों के संघर्ष, उनके आंदोलन और सरकार द्वारा उठाए भारत का संविधान लिखने वाली समिति के कुछ सदस्य जाने वाले कदम बहुत ज़रूरी हैं। संविधान के लेखकों ने यह भी कहा कि विविधता की इज्ज़त करना, उसे मूल्यवान मानना समानता सुनिश्चित करने में बहुत ही महत्त्वपूर्ण कारक है। उन्होंने यह महसूस किया कि लोगों को अपने धर्म का पालन करने, अपनी भाषा बोलने, अपने त्योहार मनाने और अपने आप को खुले रूप से अभिव्यक्त करने की आज़ादी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई एक भाषा, धर्म या त्योहार सबके लिए अनिवार्य नहीं बनना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि सरकार सभी धर्मों को बराबर मानेगी। इसीलिए भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ लोग बिना भेदभाव के अपने धर्म का पालन करते हैं। इसे हमारी एकता के महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में देखा जाता है कि हम इकट्ठ रहते हैं और एक दूसरे की इज्ज़त । संविधान का पहला पृष्ठ जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि सभी भारतीयों को समान प्रतिष्ठा और समान अवसर प्राप्त हैं। करते हैं। 2015-16 (12-01-15) विविधता एवं भेदभाव / 27 अभ्यास 1. निम्नलिखित कथनों का मेल कराइए। रूढिबद्ध धारणाओं को कैसे चुनौती दी जा रही है, इस पर चर्चा कीजिएः । 1. दमा का पुराना मरीज़ है। (क) दो डॉक्टर खाना खाने बैठे थे और उनमें से एक ने मोबाइल पर फोन करके (ख) जिस बच्चे ने चित्रकला प्रतियोगिता जीती, वह मंच पर। 2. एक अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना अंततः पूरा हुआ। | 3. (ग) संसार के सबसे तेज़ धावकों में से एक अपनी बेटी से बात की जो उसी समय स्कूल से लौटी थी। (घ) वह बहुत अमीर नहीं थी, लेकिन उसका 4. पुरस्कार लेने के लिए एक पहियोंवाली कुर्सी पर गया। 2. लड़कियाँ माँ-बाप के लिए बोझ हैं, यह रूढिबद्ध धारणा एक लड़की के | जीवन को किस तरह प्रभावित करती है? उसके अलग-अलग पाँच प्रभावों का उल्लेख कीजिए। 3. भारत का संविधान समानता के बारे में क्या कहता है? आपको यह क्यों लगता है कि सभी लोगों में समानता होना जरूरी है? 4. कई बार लोग हमारी उपस्थिति में ही पूर्वाग्रह से भरा आचरण करते हैं। ऐसे में अक्सर हम कोई विरोध करने की स्थिति में नहीं रहते, क्योंकि मुँह 2015-16 (12-01-15) 28 / सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन पर तुरंत कुछ कहना मुश्किल जान पड़ता है। अपनी कक्षा को दो समूहों में बाँटिए और प्रत्येक समूह इस पर चर्चा करे कि दी गई परिस्थिति में वे क्या करेंगे : (क) गरीब होने के कारण एक सहपाठी को आपका दोस्त चिढ़ा रहा है। (ख) आप अपने परिवार के साथ टी.वी. देख रहे हैं और उनमें से कोई सदस्य किसी खास धार्मिक समुदाय पर पूर्वाग्रहग्रस्त टिप्पणी करता है। (ग) आपकी कक्षा के बच्चे एक लड़की के साथ मिलकर खाना खाने से इनकार कर देते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि वह गंदी है। (घ) किसी समुदाय के खास उच्चारण का मजाक उड़ाते हुए कोई आपको चुटकुला सुनाता है। (ड) लड़के, लड़कियों पर टिप्पणी कर रहे हैं कि लड़कियाँ उनकी तरह नहीं खेल सकतीं। उपर्युक्त परिस्थितियों में विभिन्न समूहों ने कैसा बर्ताव करने की बात की है, इस पर कक्षा में चर्चा कीजिए, साथ ही इन मुद्दों को उठाते समय कक्षा में कौन-सी समस्याएँ आ सकती हैं, इस पर भी बातचीत कीजिए। 2015-16 (12-01-15)

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