लौह - स्तंभ „ 122 हमारे अतीतदृप् लौह स्तंभ महरौली ;दिल्लीद्ध में वुफतुबमीनार के परिसर में खड़ा यह लौह स्तंभ भारतीयश्िाल्पकारों की वुफशलता का एक अद्भुत उदाहरण है। इसकी ऊँचाइर् 7.2 मीटर और वशन 3 टन से भी श्यादा है। इसका निमार्ण लगभग 1500 साल पहले हुआ। इसके बनने के समय की जानकारी हमें इस पर खुदे अभ्िालेख से मिलती है। इसमें ‘चन्द्र’ नाम के एक शासक का िाक्र है जो संभवतः गुप्त वंश ;अध्याय 11द्ध के थे। आश्चयर् की बात यह है कि इतने वषो± के बाद भी इसमें जंग नहीं लगा है। ईंटों और पत्थरों की इमारतें हमारे श्िाल्पकारों की वुफशलता के नमूने स्तूपों जैसी वुफछ इमारतों में देखने को मिलते हैं। स्तूप का शाब्िदक अथर् टीला होता है हालांकि स्तूप विभ्िान्न आकार के थे - कभी गोल या लंबे तो कभी बड़े या छोटे। उन सब में एक समानता है। प्रायः सभी स्तूपों के भीतर एक छोटा - सा डिब्बा रखा रहता है। इन डिब्बों में बु( या उनके अनुयायियों के शरीर के अवशेष ;जैसे दाँत, हîóी या राखद्ध या उनके द्वारा प्रयुक्त कोइर् चीश या कोइर् कीमती पत्थर अथवा सिक्के रखे रहते हैं। इसे धतु - मंजूषा कहते हैं। प्रारंभ्िाक स्तूप, धतु - मंजूषा के ऊपर रखा मिट्टðी का टीला होता था। बाद में टीले को ईंटों से ढक दिया गया और बाद के काल में उस गुम्बदनुमा ढाँचे को तराशे हुए पत्थरों से ढक दिया गया। प्रायः स्तूपों के चारों ओर परिक्रमा करने के लिए एक वृत्ताकार पथ बना होता था, जिसे प्रदक्ष्िाणा पथ कहते हैं। इस रास्ते को रे¯लग से घेर दिया जाता था जिसे वेदिका कहते हैं। वेदिका में प्रवेशद्वार बने होते थे। रे¯लग तथा तोरण प्रायः मू£तकला की सुंदर कलावृफतियों से सजे होते थे। मानचित्रा 7 ;पृष्ठ 113द्ध मंे अमरावती ढूँढ़ो। यहाँ कभी एक भव्य स्तूप हुआ करता था। लगभग 2000 साल पहले इस स्तूप को सजाने के लिए श्िालाओं पर चित्रा उकेरे गए। कइर् बार पहाडि़यों को काट कर बनावटी गुपफाएँ बनाइर् जाती थीं। इस तरह की कइर् गुपफाओं को मू£त्तयों तथा चित्रों द्वारा सजाया जाता था। इस काल में वुफछ आरंभ्िाक हिन्दू मंदिरों का भी निमार्ण किया गया। इन मंदिरों में विष्णु, श्िाव तथा दुगार् जैसे देवी - देवताओं की पूजा होती थी। मंदिरों का सबसे महत्वपूणर् भाग गभर्गृह होता था, जहाँ मुख्य देवी या देवता की मू£त को रखा जाता था। इसी स्थान पर पुरोहित धा£मक अनुष्ठान करते थे और भक्त पूजा करते थे। अक्सर गभर्गृह को एक पवित्रा स्थान के रूप में दिखाने के लिए, भ्िातरगाँव जैसे मंदिरों में उसके ऊपर कापफी ऊँचाइर् तक निमार्ण किया जाता था, जिसे श्िाखर कहते थे। श्िाखर निमार्ण के कठिन कायर् के लिए सावधानी ऊपरः साँची का महान स्तूप ;मध्य प्रदेशद्ध। इस तरह के स्तूपों का निमार्ण कइर् सौ सालों तक चलता रहा। इस स्तूप में ईंटों का प्रयोग संभवतः अशोक ;अध्याय 8द्ध के शमाने का है, जबकि रे¯लग और प्रवेशद्वार बाद के शासकों के काल में जोड़े गए। बाएँः अमरावती की एक श्िाल्पवृफति। इस चित्रा को देखकर इसका वणर्न करो। बाएँ ऊपरः उत्तर प्रदेश के भ्िातरगाँव का एक आरंभ्िाक मंदिर। यह लगभग 1500 साल पहले पकी ईंट और पत्थरों से बनाया गया था। दाएँ ऊपरः महाबलिपुरम के एकाष्िमक मंदिर। इनमें से प्रत्येक मंदिर एक ही विशाल पहाड़ी को तराश कर बनाया गया है। इसीलिए इन्हें एकाश्म ;उवदवसपजीद्ध कहा गया है। ईंटों से बनाए जाने वाले मंदिरों से यह बिल्वुफल भ्िान्न होते थे। ईंट से बनी इमारतों में नीचे से ईंटों की एक - एक तहजोड़ते हुए उसे ऊपर की ओर ले जाते हैं, जबकि चट्टðान तराश कर बनाए जाने वाले मंदिरों कोपत्थर काटने वाले ऊपर से नीचे के क्रम में बनाते हैं। इन मंदिरों को बनाते समय पत्थर काटने वालों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा, इसकी सूची बनाओ। दाएँः ऐहोल का दुगार् मंदिर। यह लगभग 1400 साल पहले बनाया गया था। „ 124 हमारे अतीतदृप् से योजना बनानी पड़ती थी। अध्िकतर मंदिरों में मण्डप नाम की एक जगह होती थी। यह एक सभागार होता था, जहाँ लोग इकट्टòा होते थे। मानचित्रा 7 ;पृष्ठ 113द्ध मंे महाबलिपुरम और ऐहोल को ढूँढ़ो। इन शहरों में पत्थरों से बने वुफछ उत्वृफष्ट मंदिर हैं। उनमें से वुफछ यहाँ दिखाए गए हैं। स्तूप तथा मंदिर किस तरह बनाए जाते थे? स्तूपों तथा मंदिरों को बनाने की प्रिया में कइर् अवस्थाएँ आती थीं। इसके लिए कापफी ध्न खचर् होता था। इसलिए आमतौर पर राजा या रानी ही इन्हें बनवाने का निश्चय करते थे। पहला काम, अच्छे किस्म के पत्थर ढूँढ़कर श्िालाखंडों को खोदकर निकालना होता था। पिफर मंदिर या स्तूप के लिए सोच - विचार कर तय किए गए स्थान पर श्िालाखंडों को पहुँचाना होता था। यहाँ पत्थरों को काट - छाँटकर तराशने के बाद खंभों, दीवारों की चैखटों, प.फशो± तथा छतों का आकार दिया जाता था। इन सबके तैयार हो जाने पर सही जगहों पर उन्हें लगाना कापफी मुश्िकल का काम था। इस तरह के शानदार ढाँचों का निमार्ण करने वाले श्िाल्पकारों को सारा खचर् संभवतः राजा - रानी ही देते थे। इसके अतिरिक्त इन स्तूपों या मंदिरों में आने वाले भक्त जउपहार अपने साथ लाते थे उनसे इमारत की सजावट की जाती थी। जैसे हाथी दांत का काम करने वाले श्रमिकों के संघ ने साँची के एक अलंवृफत प्रवेशद्वार ;तोरणद्ध को बनाने का खचर् दिया था। इनकी सजावट के लिए पैसे देने वालों में व्यापारी, वृफषक, माला बनाने वाले, इत्रा बनाने वाले, लोहार - सुनार, बाएँः उड़ीसा का जैन मठ। एक पहाड़ी को खोद कर इस दो मंजिली इमारत को बनाया गया है। कमरों के प्रवेशद्वारों को ध्यान से देखो। इनमें जैन भ्िाक्षु रहते और ध्यान करते थे। नीचेः राष्ट्रीय संग्रहालय, नइर् दिल्ली से एक मू£त का चित्रा। क्या तुम यहाँ देख पा रहे हो कि किस प्रकार गुपफाओं की खुदाइर् की गइर् होगी? अजंता के चित्रा तुम्हें इनमें से प्रत्येक चित्रा में जो दिखता है उसका वणर्न करो। तथा ऐसे कइर् स्त्राी - पुरुष शामिल थे जिनके नाम खंभों, रे¯लगों तथा दीवारों पर खुदे हैं, इसलिए जब तुम इन स्थानों को देखने जाओ तो याद रखना कि कितने सारे लोगों ने इन्हें बनाने और सजाने मंे अपना योगदान दिया था। अध्याय 9 के पृष्ठ 91 पर दिए चित्रा की तरह तुम भी मंदिरों तथा स्तूपों के निमार्ण के दौरान आने वाले विभ्िान्न चरणों का चित्रा बनाओ। चित्राकला मानचित्रा 7 में अजंता को ढूँढ़ो। यह वह जगह है, जहाँ के पहाड़ों में सैवफड़ों सालों के दौरान कइर् गुपफाएँ खोदी गईं। इनमें से श्यादातर बौ( भ्िाक्षुओं के लिए बनाए गए विहार थे। इनमें से वुफछ को चित्रों द्वारा सजाया गया था। यहाँ इनके वुफछ उदाहरण दिए गए हैं। गुपफाओं के अंदर अंध्ेरा होने की वजह से, अध्िकांश चित्रा मशालों की रोशनी में बनाए गए थे। इन चित्रों के रंग 1500 साल बाद भी चमकदार हैं। ये रंग पौधें तथा खनिजों से बनाए गए थे। इन महान वृफतियों को बनाने वाले कलाकार अज्ञात हैं। „ 126 हमारे अतीतदृप् पुस्तकों की दुनिया इस युग में कइर् प्रसि( महाकाव्यों की रचना की गइर्। इन उत्वृफष्ट रचनाओं में स्त्राी - पुरुषों की वीरगाथाएँ तथा देवताओं से जुड़ी कथाएँ हैं। करीब 1800 साल पहले एक प्रसि( तमिल महाकाव्य सिलप्पदिकारम की रचना इलांगो नामक कवि ने की। इसमें कोवलन् नाम के एक व्यापारी की कहानी है। वह पुहार में रहता था। अपनी पत्नी कन्नगी की उपेक्षा कर वह एक नतर्की माध्वी से प्रेम करने लगा। बाद में, वह और कन्नगी पुहार छोड़कर मदुरै चले गए। वहाँ पांड्य राजा के दरबारी जौहरी ने कोवलन् पर चोरी का झूठा आरोप लगाया जिस पर राजा ने उसे प्राणदंड दे दिया। कन्नगी जो अभी भी उससे प्रेम करती थी, इस अन्याय के कारण दुःख और रोष से भर गइर्। उसने मदुरै शहर का विनाश कर डाला। सिलप्पदिकारम से लिया गया एक वणर्न यहाँ कवि ने कन्नगी के दुःख का इस तरह वणर्न किया है: फ्ओ मेरा दुःख तो देखो, तुम मुझे साँत्वना तक नहीं दे सकते। क्या यह सही है कि विशु( सोने से भी सुंदर तुम्हारा शरीर बिना ध्ुला, ध्ूल से सना यूँ ही पड़ा है? यह कहाँ का न्याय है कि गोध्ूलि की इस स्व£णम आभा में पूफलमाला से ढके सुन्दर वक्षःस्थल वाले तुम शमीन पर गिरे पड़े हो। मैं अकेली, असहाय और हताश होकर खड़ी हूँ। क्या इर्श्वर नहीं है? क्या इस देश में इर्श्वर नहीं हैं? पर क्या उस स्थान पर इर्श्वर रह सकते हैं जहाँ के राजा की तलवार निदोर्ष नवागन्तुक के प्राण ले लेती है? क्या इर्श्वर नहीं है? नहीं है?य् एक और तमिल महाकाव्य, मण्िामेखलइर् को करीब 1400 साल पहले सत्तनार द्वारा लिखा गया। इसमें कोवलन् तथा माध्वी की बेटी की कहानी है। ये रचनाएँ कइर् सदियों पहले ही खो गइर् थीं। उनकी पाण्डुलिपियाँ दोबारा लगभग एक सौ साल पहले मिलीं। अन्य लेखक, जैसे कालिदास ;जिनके बारे में तुमने अध्याय 11 में पढ़ा हैद्ध संस्वृफत में लिखते थे। 127 ऽ मेघदूत का एक श्लोक यहाँ उनकी सबसे प्रसि( रचना मेघदूत से एक अंश दिया गया है। यहाँ एक विरही प्रेमी बरसात के बादल को अपना संदेशवाहक बनाने की कल्पना करता है। देखो इसमें किस तरह कवि ने बादलों को उत्तर की ओर ले जाती ठंडी हवा का वणर्न किया है: फ्तुम्हारे बौछारों से मुलायम हो उठी मिट्टðी की भीनी खुशबू से भरे, हाथ्िायों की सांस में बसी जंगली गूलर को पकाने वाली, शीतल बयार तुम्हारे साथ ध्ीरे - ध्ीरे बहेगी।य् क्या तुम्हें लगता है कि कालिदास को प्रवृफतिप्रेमी कहा जा सकता है? पुरानी कहानियों का संकलन तथा संरक्षण हिंदू ध्मर् से जुड़ी कइर् कहानियाँ जो बहुत पहले से प्रचलित थीं, इसी काल में लिखी गईं। इनमें पुराण भी शामिल हैं। पुराण का शब्िदक अथर् है प्राचीन या पुराण। पुराणों में विष्णु, श्िाव, दुगार् या पावर्ती जैसे देवी - देवताओं से जुड़ी कहानियाँ हैं। इनमें इन देवी - देवताओं की पूजा की विध्ियाँ दी गइर् हैं। इसके अतिरिक्त इनमें संसार की सृष्िट तथा राजाओं के बारे में भी कहानियाँ हैं। अध्िकतर पुराण सरल संस्वृफत श्लोक में लिखे गए हैं, जिससे सब उन्हें सुन और समझ सवेंफ। स्ित्रायाँ तथा शूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी वे भी इसे सुन सकते थे। पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे जिसे लोग सुनने आते थे। दो संस्वृफत महाकाव्य महाभारत और रामायण लंबे असेर् से लोकपि्रय रहे हैं। तुममें से भी वुफछ बच्चे इन कहानियों से परिचित होंगे। महाभारत कौरवों „ 128 हमारे अतीतदृप् और पांडवों के बीच यु( की कहानी है। इस यु( का उद्देश्य पुरु - वंश की राजधनी हस्ितनापुर की गद्दी प्राप्त करना था। यह कहानी तो बहुत ही पुरानी है, पर आज इसे हम जिस रूप में जानते हैं, वह करीब 1500 साल पहले लिखी गइर्। माना जाता है कि पुराणों और महाभारत दोनों को ही व्यास नाम के ट्टष्िा ने संकलित किया था। महाभारत में ही भगवद् गीता भी है, जिसके बारे में तुमने अध्याय 10 में पढ़ा था। रामायण की कथा कोसल के राजवुफमार राम के बारे में है। उनके पिता ने उन्हें वनवास दे दिया था। वन में उनकी पत्नी सीता का लंका के राजा रावण ने अपहरण कर लिया था। सीता को वापस पाने के लिए राम को लड़ाइर् लड़नी पड़ी। वे विजयी होकर कोसल की राजधनी अयोध्या लौटे। महाभारत की तरह ही रामायण भी एक प्राचीन कहानी है, जिसे बाद में लिख्िात रूप दिया गया। संस्वृफत रामायण के लेखक वाल्मीकि माने जाते हैं। इस उपमहाद्वीप के विभ्िान्न भागोें में महाभारत और रामायण के भ्िान्न - भ्िान्न रूपांतर लोकपि्रय हैं। इनके आधर पर नाटक, गीत और नृत्य परंपराएँ भी उभरीं। पता करो तुम्हारे राज्य में कौन - सा रूपांतर प्रचलित है। आम लोगों द्वारा कही जाने वाली कहानियाँ आम लोग भी कहानियाँ कहते थे, कविताओं और गीतों की रचना करते थे, गाने गाते थे, नाचते थे और नाटकों को खेलते थे। इनमें से वुफछ तो इस समय के आस - पास जातक और पंचतंत्रा की कहानियों के रूप में लिखकर सुरक्ष्िात कर लिए गए। जातक कथाएँ तो अक्सर स्तूपों की रे¯लगों तथा अजंता के चित्रों में दशार्यी जाती थीं। इनमें से एक कहानी अगले पृष्ठ पर दी गइर् है: बंदर राजा की कहानी एक समय बंदरों का एक महान राजा हुआ। वह हिमालय पर गंगा के किनारे अपने 80,000 अनुयायियों के साथ रहता था। इन सारे बंदरों को एक खास आम के पेड़ के पफल बहुत पि्रय थे। ये आम बड़े मीठे होते थे। इतने स्वादिष्ट आम ध्रातल पर नहीं उगते थे। एक दिन एक पका हुआ आम गंगा नदी में गिर कर बहते - बहते वाराणसी पहुँच गया। उस वक्त नदी में वहाँ का राजा नहा रहा था। उसे वह आम मिला, उसे चखकर वह हैरान रह गया। उसने अपने राज्य के जंगलों की देखभाल करने वालों से पूछा कि क्या वे इस आम के पेड़ को ढूँढ़ सकते हैं या नहीं। वे राजा को हिमालय की पहाड़ी पर ले गए। वहाँ पहुँचकर राजा तथा उसके दरबारियों ने खूब आम खाए। रात में राजा ने देखा कि बंदर भी पके आमों का मशा ले रहे हैं। राजा को यह बात बुरी लगी और उसने उन्हें मार डालने का प.ैफसला किया। बंदरों के राजा ने अपनी प्रजा को बचाने की एक योजना बनाइर्। उसने आम के पेड़ की टहनियों को तोड़कर, उन्हें आपस में बांध्कर, नदी पर एक पुल बनाया। इसके एक छोर को वह तब तक पकड़े रहा जब तक उसकी सारी प्रजा ने नदी को पार न कर लिया। पर इस प्रयास से वह इतना थक गया कि मरणासन्न होकर गिर गड़ा। राजा ने जब यह सब देखा तो उसने बंदर राजा को बचाने की कापफी कोश्िाश की। पर वह सपफल न हुआ। बंदर राजा की मृत्यु पर उसे शोक हुआ और राजा ने उसे पूरा सम्मान दिया। मध्यभारत में भरहुत के एक स्तूप से मिले एक पत्थर पर उकेरे गए चित्रा में इसे दिखाया गया है। क्या तुम बता सकते हो कि इसमें कहानी का कौन - सा हिस्सा दिखाया गया है? यह हिस्सा क्यों चुना गया होगा? „ 130 हमारे अतीतदृप् विज्ञान की पुस्तवेंफ इसी समय गण्िातज्ञ तथा खगोलशास्त्राी आयर्भटð ðने संस्वृफत में आयर्भटीयम नामक पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने लिखा कि दिन और रात पृथ्वी के अपनी धुरी पर चक्कर काटने की वजह से होते हैं, जबकि लगता है कि रोश सूयर् निकलता है और डूबता है। उन्होंने ग्रहण के बारे में भी एक वैज्ञानिक तवर्फ दिया। उन्होंने वृत्त की परिध्ि को मापने की भी विध्ि ढूँढ़ निकाली, जो लगभग उतनी ही सही है, जितनी कि आज प्रयुक्त होने वाली विध्ि। शून्य अंकों का प्रयोग पहले से होता रहा था, पर अब भारत के गण्िातज्ञों ने शून्य के लिए एक नए चिÉ का आविष्कार किया। गिनती की यह प(ति अरबों द्वारा अपनाइर् गइर् और तब यूरोप में भी पैफल गइर्। आज भी यह पूरी दुनिया में प्रयोग की जाती है। रोम के निवासी शून्य का प्रयोग किए बगैर गिनती करते थे। उसके बारे में और भी जानकारी हासिल करने की कोश्िाश करो। अन्यत्रा कागश आज हमारे रोशमरार् की िान्दगी का हिस्सा बन गया है। जो किताबें हम पढ़ते हैं वे कागश पर छपी होती हैं, उसी तरह लिखने के लिए भी हम कागश का ही उपयोग करते हैं। कागश का आविष्कार करीब 1900 साल पहले काइर् लून नाम के व्यक्ित ने चीन में किया। उसने पौधें के रेशों, कपड़ों, रस्िसयों और पे़डकी छालों को पीट - पीट कर लुगदी बनाकर उसे पानी में भ्िागो दिया। पिफर उस लुगदी को दबाकर उसका पानी निचोड़ा और तब सुखा कर कागश बनाया। आज भी हाथ से कागश बनाने के लिए इसी विध्ि को अपनाया जाता है। कागश बनाने की तकनीक को सदियों तक गुप्त रखा गया। करीब 1400 साल पहले यह कोरिया तक पहुँची। इसके तुरंत बाद ही यह जापान तक पैफल गइर्। करीब 1800 साल पहले यह बगदाद में पहुँची। पिफर बगदाद से यह यूरोप, अप़्रफीका और एश्िाया के अन्य भागों में पैफली। इस उपमहाद्वीप में भी कागश की जानकारी बगदाद से ही आइर्। प्राचीन भारत की पाण्डुलिपियाँ किस चीश पर तैयार की जाती थीं? ;संकेत: अध्याय 1द्ध तुम एक मंदिर के मण्डप में बैठे हो। अपने चारों तरप.फ के दृश्य का वणर्न करो। 1ण् निम्नलिख्िात का सुमेल करो। स्तूप देवी - देवता की मू£त स्थापित करने की जगह श्िाखर टीला मण्डप स्तूप के चारों तरप.फ वृत्ताकार पथ गभर्गृह मंदिर में लोगों के इकट्टòा होने की जगह ऽ स्तूप निमार्ण की शुरुआत ;2300 साल पहलेद्ध प्रदक्ष्िाणापथ गभगर्ृह वेफ ऊपर लंबाइर् में निमाण्र्ा ऽ अमरावती ;2000 साल पहलेद्ध ऽ कालिदास ;1600 साल पहलेद्ध ऽ लौह स्तंभ, भ्िातरगाँव का मंदिर, अजंता की 2ण् खाली जगहों को भरो: ;कद्ध कृकृकृकृकृकृकृकृएक बड़े गण्िातज्ञ थे। ;खद्ध कृकृकृकृकृकृकृकृमें देवी - देवताओं की कहानियाँ मिलती हैं। ;गद्ध कृकृकृकृकृकृकृकृ को संस्वृफत रामायण का लेखक माना जाता है। ;घद्ध कृकृकृकृकृकृकृकृ और कृकृकृकृकृकृकृकृदो तमिल महाकाव्य हैं। पहलेद्ध 3ण् धतुओं के प्रयोग पर जिन अध्यायों में चचार् हुइर् है, उनकी सूची बनाओ। धतु से बनी किन - किन चीशों के बारे में चचार् हुइर् है या उन्हें दिखाया गया है? 4ण् पृष्ठ 130 पर लिखी कहानी को पढ़ो। जिन राजाओं के बारे में तुमने अध्याय 6 और 11 में पढ़ा है उनसे यह बंदर राजा वैफसे भ्िान्न या समान था? „ 132 हमारे अतीतदृप् 5ण् और भी जानकारी इकट्टòी कर किसी महाकाव्य से एक कहानी सुनाओ। 6ण् इमारतों तथा स्मारकों को अन्य प्रकार से सक्षम व्यक्ितयों ;विकलांगद्ध के लिए और अध्िक प्रवेश योग्य वैफसे बनाया जाए? इसके लिए सुझावों की एक सूची बनाओ। 7ण् कागश के अध्िक से अध्िक उपयोगों की एक सूची बनाओ। 8ण् इस अध्याय में बताए गए स्थानों में से तुम्हें किसी एक को देखने का मौका मिले तो किसे चुनोगे और क्यों? अगले साल हमारे अतीत के बारे में तुम और अध्िक पढ़ोगे। इसमें तुम अगले हशार साल के इतिहास के बारे में पढ़ोगे, जिसकी शुरुआत आठवीं सदी से होगी। इसमें तुम: ऽ देखोगे कि पाण्डुलिपियों, अभ्िालेखों तथा पुरातािवक वस्तुओं, मुख्यतः इमारतों के अवशेषों के अलावा, इतिहास जानने के और भीड्डोत होते हैं। ऽ नए राजाओं तथा राज्यों के बारे में पढ़ोगे, जिसमें मुगल साम्राज्य शामिल होगा। ऽ स्थापत्य - कला के बारे में और भी जानोगे, जिसमें मंदिरों, मस्िजदों, बगीचों, वि़फलों तथा अन्य इमारतों के बारे में जानकारी होगी। ऽ शहरों के बारे में पढ़ोगे, जिसमें श्िाल्पकारों, व्यापारियों तथानगरीय - संस्कृति के विषय में जानकारी होगी। ऽ आखेटक - संग्राहकों, पशुपालकों तथा कृषकों के बारे में पढ़ोगेे। ऽ तुम यह भी पढ़ोगे कि किस प्रकार धमिर्क - आस्थाओं तथा उनके व्यवहारिक स्वरूपों में परिवतर्न आए। ऽ संगीत, कविता तथा अन्य साहित्ियक रचनाओं के लिए किस तरह नइर् भाषाओं का प्रयोग हुआ। ये सब पढ़ने के दौरान तुम पाओगे कि इतने सारे नए परिवतर्नों के बावजूद अतीत के साथ सम्पवर्फ का सूत्रा निरंतर बना रहा। ध्यान दो क्या बदला और क्या अपने पुराने स्वरूप में रह गया। नोट दृ नोट दृ

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