व्यापार और व्यापारियों के बारे में जानकारी अध्याय 9 में तुमने उत्तर के काले पाॅलिश वाले बतर्नों के बारे में पढ़ा है। ये खूबसूरत बतर्न, खास तौर से इनकी कटोरियाँ तथा थालियाँ, इस उपमहाद्वीप के अनेक पुरास्थलों से मिले हैं। सवाल उठता है कि इन जगहों पर ये बतर्न वैफसे पहुँचे होंगे? ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि जहाँ ये बनते थे, वहाँ से व्यापारी इन्हें ले जाकर अलग - अलग जगहों पर बेचते थे। दक्ष्िाण भारत सोना, मसाले, खास तौर पर काली मिचर् तथा कीमती पत्थरों के लिए प्रसि( था। काली मिचर् की रोमन साम्राज्य में इतनी माँग थी कि इसे ‘काले सोने’ के नाम से बुलाते थे। व्यापारी इन सामानों को समुद्री जहाशों और सड़कों के रास्ते रोम पहुँचाते थे। दक्ष्िाण भारत में ऐसे अनेक रोमन सोने के सिक्के मिले हैं। इससे यह अंदाशा लगाया जाता है कि उन दिनों रोम के साथ बहुत अच्छा व्यापार चल रहा था। क्या तुम बता सकती हो कि ये सिक्के भारत वैफसे और क्यों पहुँेचे होंगे? 99 ऽ व्यापार से जुड़ी एक कविता व्यापार के प्रमाण हमें संगम कविताओं में भी मिलते हैं। नीचे लिखी कविता में पूवीर् समुद्र तट पर स्िथत पुहार पत्तन पर लाए जाने वाले माल का वणर्न मिलता है। फ्समुद्री जहाशों पर लाए गए तेश तरार्र घोड़े, गाडि़यों पर काली मिचर् की गठरियाँ, हिमालय से मिले रत्न और सोना दक्ष्िाण की पहाडि़यों से चंदन की लकडि़याँ दक्ष्िाणी - सागर के मोती और पूवीर् - सागर के मूंगे गंगा और कावेरी की प.फसलें श्रीलंका से आए खाद्यान्न, म्यांमार के बने मिट्टðी के बतर्न और दुलर्भ कीमती आयात।य् कविता में उल्िलख्िात चीशों की एक सूची बनाओ। क्या तुम बता सकते हो कि इन चीशों का उपयोग किसलिए किया जाता होगा? व्यापारियों ने कइर् समुद्री रास्ते खोज निकाले। इनमें से वुफछ समुद्र के किनारे चलते थे वुफछ अरब सागर और बंगाल की खाड़ी पार करते थे। नाविक मानसूनी हवा का प.फायदा उठाकर अपनी यात्रा जल्दी पूरी कर लेते थे। वे अप़्रफीका या अरब के पूवीर् तट से इस उपमहाद्वीप के पश्िचमी तट पर पहुँचना चाहते थे तो दक्ष्िाणी - पश्िचमी मानसून के साथ चलना पसंद करते थे। इन लंबी यात्राओं के लिए मशबूत जहाशों का निमार्ण किया जाता था। समुद्र तटों से लगे राज्य इस उपमहाद्वीप के दक्ष्िाणी भाग में बड़ा तटीय प्रदेश है। इनमें बहुत - से पहाड़, पठार और नदी के मैदान हैं। नदियों के मैदानी इलाकों में कावेरी का मैदान सबसे उपजाऊ है। मैदानी इलाकों तथा तटीय इलाकों के सरदारों और राजाओं के पास ध्ीरे - ध्ीरे कापफी सम्पिा और शक्ित हो गइर्। संगम कविताओं में मुवेन्दार की चचार् मिलती है। यह एक तमिल शब्द है, जिसका अथर् तीन मुख्िाया है। इसका प्रयोग तीन शासक परिवारों के „ 100 हमारे अतीतदृप् मुख्िायाओं के लिए किया गया है। ये थे - चोल, चेर तथा पांड्य, ;मानचित्रा 7, पृष्ठ 113द्ध जो करीब 2300 साल पहले दक्ष्िाण भारत में कापफी शक्ितशाली माने जाते थे। इन तीनों मुख्िायाओं के अपने दो - दो सत्ता वेंफद्र थे। इनमें से एक तटीय हिस्से में और दूसरा अंदरूनी हिस्से में था। इस तरह छह वेंफद्रों में से दो बहुत महत्वपूणर् थे। एक चोलों का पत्तन पुहार या कावेरीपिðनम, दूसरा पांड्यों की राजधनी मदुरै। ये मुख्िाया लोगों से नियमित कर के बजाय उपहारों की माँग करते थे। कभी - कभी ये सैनिक अभ्िायानों पर भी निकल पड़ते थे और आस - पास के इलाकों से शुल्क वसूल कर लाते थे। इनमें से वुफछ ध्न वे अपने पास रख लेते थे, बाकी अपने समथर्कों, नाते - रिश्तेदारों, सिपाहियों तथा कवियों के बीच बाँट देते थे। अनेक संगम कवियों ने उन मुख्िायाओं की प्रशंसा में कविताएँ लिखी हैं जो उन्हें कीमती जवाहरात, सोने, घोड़े, हाथी, रथ या सुंदर कपड़े दिया करते थे। इसके लगभग 200 वषोर्ं के बाद पश्िचम भारत ;मानचित्रा 7, पृष्ठ 113द्ध में सातवाहन नामक राजवंश का प्रभाव बढ़ गया। सातवाहनों का सबसे प्रमुख राजा गौतमी पुत्रा श्री सातकणीर् था। उसके बारे में हमें उसकी माँ, गौतमी बलश्री के एक अभ्िालेख से पता चलता है। वह और अन्य सभी सातवाहन शासक दक्ष्िाणापथ के स्वामी कहे जाते थे। दक्ष्िाणापथ का शाब्िदक अथर् दक्ष्िाण की ओर जाने वाला रास्ता होता है। पूरे दक्ष्िाणी क्षेत्रा के लिए भी यही नाम प्रचलित था। श्री सातकणीर् ने पूवीर्, पश्िचमी तथा दक्ष्िाणी तटों पर अपनी सेनाएँ भेजीं। क्या तुम बता सकती हो कि श्री सातकणीर् तटों पर नियंत्राण क्यों करना चाहता था? रेशम मागर् की कहानी कीमती, चमकीले रंग और चिकनी, मुलायम बनावट की वजह से रेशमी कपड़े अध्िकांश समाज में बहुमूल्य माने जाते हैं। रेशमी कपड़ा तैयार करना एक जटिल प्रिया है। रेशम के कीड़े से कच्चा रेशम निकालकर, सूत कताइर् होती है, और पिफर उससे कपड़ा बुना जाता है। रेशम बनाने की 101 ऽ „ 102 हमारे अतीतदृप् तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में करीब 7000 साल पहले हुआ। इस तकनीक को उन्होंने हशारों साल तक बाकी दुनिया से छुपाए रखा। परचीन से पैदल, घोड़ों या ऊँटों पर वुफछ लोग दूर - दूर की जगहों पर जाते थे और अपने साथ रेशमी कपड़े भी ले जाते थे। जिस रास्ते से ये लोग यात्रा करते थे वह रेशम मागर् ;सिल्क रूटद्ध के नाम से प्रसि( हो गया। कभी - कभी चीन के शासक इर्रान और पश्िचमी एश्िाया के शासकों को उपहार के तौर पर रेशमी कपड़े भेजते थे। यहाँ से रेशम के बारे में जानकारी और भी पश्िचम की ओर पैफल गइर्। करीब 2000 साल पहले रोम के शासकों और ध्नी लोगों के बीच रेशमी कपड़े पहनना एक पै.फशन बन गया। इसकी कीमत बहुत ही श्यादा होती थी। क्योंकि चीन से इसे लाने में दुगर्म पहाड़ी और रेगिस्तानी रास्तों से होकर जाना पड़ता था। यही नहीं, रास्ते के आस - पास रहने वाले लोग व्यापारियों से यात्रा - शुल्क भी माँगते थे। मानचित्रा 6 ;पृष्ठ 84 - 85द्ध को देखो। इसमें सिल्क रूट तथा उसकी शाखाओं को दिखाया गया है। वुफछ शासक इसके बड़े - बड़े हिस्सों पर अपना नियंत्राण करना चाहते थे क्योंकि इस रास्ते पर यात्रा कर रहे व्यापारियों से उन्हें कर, शुल्क तथा तोहप.फों के शरिए लाभ मिलता था। इसके बदले, ये शासक इन व्यापारियों को अपने राज्य से गुशरते वक्त लुटेरों के आक्रमणों से सुरक्षा देते थे। सिल्क रूट पर नियंत्राण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसि( वुफषाण थे।करीब 2000 साल पहले मध्य - एश्िाया तथा पश्िचमोत्तर भारत पर इनका शासन था। पेशावर और मथुरा इनके दो मुख्य शक्ितशाली वेंफद्र थे। तक्षश्िाला भी इनके ही राज्य का हिस्सा था। इनके शासनकाल में ही सिल्करूट की एक शाखा मध्य - एश्िाया से होकर स्िंाध्ु नदी के मुहाने के पत्तनों तक जाती थी। पिफर यहाँ से जहाशों द्वारा रेशम, पश्िचम की ओर रोमन साम्राज्य तक पहुँचता था। इस उपमहाद्वीप में सबसे पहले सोने के सिक्के जारी करने वाले शासकों में वुफषाण थे। सिल्क रूट पर यात्रा करने वाले व्यापारी इनका उपयोग किया करते थे। सिल्क रूट पर गाडि़यों का उपयोग क्यों कठिन होता होगा? चीन से समुद्र के रास्ते भी रेशम का नियार्त होता था। मानचित्रा 6 ;पृष्ठ 84 - 85द्ध में इसे ढूँढ़ो। समुद्र के रास्ते रेशम भेजने में क्या सुविधएँ और क्या समस्याएँ आती होंगी? बौ( ध्मर् का प्रसार वुफषाणों का सबसे प्रसि( राजा कनिष्क था। उसने करीब 1900 साल पहले शासन किया। उसने एक बौ( परिषद् का गठन किया, जिसमें एकत्रा होकर विद्वान महत्वपूणर् विषयों पर विचार - विमशर् करते थे। बु( की जीवनी बु(चरित के रचनाकार कवि अश्वघोष, कनिष्क के दरबार में रहते थे। अश्वघोष तथा अन्य बौ( विद्वानों ने अब संस्वृफत मंे लिखना शुरू कर दिया था। इस समय बौ( ध्मर् की एक नइर् धरा महायान का विकास हुआ। इसकी दो मुख्य विशेषताएँ थी। पहले, मू£तयों में बु( की उपस्िथति सिप.र्फ वुफछ संकेतों के माध्यम से दशार्इर् जाती थी। मिसाल के साँची के स्तूप का एक मू£त चित्रा। यहाँ इस वृक्ष और उसके नीचे के खाली आसन को देखो। मू£तकारों ने यह बताने के लिए खुदाइर् करके यह मू£त बनाइर् कि बु( को ज्ञान की प्राप्ित इसी वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यान करते हुए हुइर्। तौर पर उनकी निवार्ण प्राप्ित को पीपल के पेड़ की मू£त द्वारा दशार्या जाता था पर अब बु्रँ( की पतिमाएबनाइर् जाने लगीं। इनमें से अध्िकांश मथुरा में, तो वुफछ तक्षश्िाला में बनाइर् जाने लगीं। दूसरा परिवतर्न बोध्िसत्त्व में आस्था को लेकर आया। बोध्िसत्त्व उन्हें कहते हैं जो ज्ञान प्राप्ित के बाद एकांत वास करते हुए ध्यान साध्ना कर सकते थे। लेकिन ऐसा करने के बजाए, वे लोगों को श्िाक्षा देने और मदद करने के लिए सांसारिक परिवेश में ही रहना ठीक समझने लगे। ध्ीरे - ध्ीरे बोध्िसत्त्व की पूजा कापफी लोकपि्रय हो गइर्। और पूरे मध्य एश्िाया, चीन और बाद में कोरिया तथा जापान तक भी पैफल गइर्। बौ( ध्मर् का प्रसार पश्िचमी और दक्ष्िाणी भारत में हुआ, जहाँ बौ( भ्िाक्खुओं के रहने के लिए पहाड़ों में दजर्नों गुपफाएँ खोदी गईं। 103 ऽ व्यापारी, राजा और तीथर्यात्राी बाएँः मथुरा में बनी बु( की एक प्रतिमा का चित्रा। दाएँः तक्षश्िाला में बनी बु( की प्रतिमा का एक चित्रा। इन चित्रों को देखकर बताओ कि इनके बीच क्या - क्या समानताएँ हैं और क्या - क्या भ्िान्नताएँ हैं? इनमें से वुफछ गुपफाएँ राजा और रानियों के आदेश पर बनाइर् गईं तो वुफछ व्यापारियों तथा वृफषकों द्वारा। इनमें से श्यादातर गुपफाएँ पश्िचमी घाट के दरो± के पास बनाइर् गइर् थीं। दक्कन के शहरों और तटों के समृ( बंदरगाहों और इन्हें जोड़ने वाली सड़वेंफ भी इन्हीं दरो± से होकर गुजरती थीं। ऐसा लगता है कि यात्रा करने वाले व्यापारी इन गुपफाओं वाले मठों मंे विश्राम के लिए रुकते थे। बौ( ध्मर् दक्ष्िाण - पूवर् की ओर श्रीलंका, म्यांमार, थाइलैंड तथा इंडोनेश्िाया सहित दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया के अन्य भागों में भी पैफला। थेरवाद नामक बौ( ध्मर् का आरंभ्िाक रूप इन क्षेत्रों में कहीं अध्िक प्रचलित था। पृष्ठ 100 को एक बार पिफर पढ़ो। क्या तुम बता सकती हो कि बौ( ध्मर् इन इलाकों में वैफसे पैफला होगा? तीथर्यात्रिायों की जिज्ञासा व्यापारी कापि.फलों में तथा जहाशों पर दूर - दूर जाया करते थे। बहुत - से तीथर्यात्राी भी उनके साथ यात्रा पर निकल पड़ते थे। इसी तरह भारत की यात्रा पर आया चीनी बौ( तीथर्यात्राी पफा - श्िाएन कापफी प्रसि( है। वह करीब 1600 साल पहले आया। श्वैन त्सांग 1400 साल पहले भारत आया और उसके करीब 50 साल बाद इ¯त्सग आया। वे सब बु( ;अध्याय 7द्ध के जीवन से जुड़ी जगहों और प्रसि( मठों को देखने के लिए भारत आए थे। इनमें से प्रत्येक तीथर्यात्राी ने अपनी यात्रा का वणर्न लिखा। इन्होंने अपनी यात्रा के दौरान आइर् मुश्िकलों के बारे में भी लिखा। इन यात्राओं में कइर् वषर् लग जाया करते थे। जिन देशों और मठों को उन्होंने देखा, उनके बारे में उन्होंने लिखा और उन किताबों के बारे में भी उन्होंने लिखा, जिन्हें वे अपने साथ ले गए थे। 105 ऽ पफा - श्िाएन चीन वापस वैफसे लौटा पफा - श्िाएन ने अपने घर चीन वापस लौटने के लिए अपनी यात्रा बंगाल से शुरू की। वह व्यापारियों के एक जहाश पर चढ़ा। मुश्िकल से वे दो दिन ही चल पाए थे कि एक समुद्री तूप.फान में पँफस गए। व्यापारी अपने जहाश को डूबने से बचाने के लिए उसमें से अपने माल को पेंफककर जहाज को हल्का करने की कोश्िाश करने लगे। पफा - श्िाएन ने भी अपने सामान को तो पेंफक दिया, पर अपनी उन पाण्डुलिपियों और बु( की मू£तयों को नहीं पेंफका, जिन्हें उसने अपनी भारत यात्रा के दौरान संकलित की थी। अंततः तेरह दिनों के बाद आँध्ी रुकी। उसने समुद्र का वणर्न इस प्रकार किया है: ‘समुद्र असीम है - सूयर्, चाँद या तारों की गति को देखे बिना यह पता लगा पाना असंभव है कि पूवर् किधर है, या पश्िचम किस दिशा में है। अगर बरसात और अंध्ेरा हो, तो जहाश को हवा की रुख में ले जाने के अलावा और कोइर् चारा नहीं।’ जावा पहुँचने में उसे 90 दिन से भी श्यादा लगे। वहाँ वह पाँच महीने के लिए रुका। इसके बाद दूसरे व्यापारी जहाश में चढ़कर वह चीन पहुँचा। मानचित्रा 6 ;पृष्ठ 84 - 85द्ध में पफा - श्िाएन द्वारा तय किए गए रास्ते को ढूँढ़ो। बताओ कि पफा - श्िाएन अपनी पाण्डुलिपियों और मू£तयों को क्यों नहीं पेंफकना चाहता था। श्वैन त्सांग भू - मागर् से ;उत्तर - पश्िचम और मध्य - एश्िाया होकरद्ध चीन वापस लौटा। उसने सोने, चाँदी और चंदन की लकड़ी की बनी बु( की मू£तयाँ तथा 600 से भी श्यादा पाण्डुलिपियाँ एकत्रा की थीं। इन्हें वह 20 घोड़ों पर लादकर ले गया। पर इसमें से 50 पाण्डुलिपियाँ उस समय खो गईं, जब स्िंाधु नदी पार करते हुए उसकी नाव उलट गइर्। अपने जीवन का बाकी हिस्सा उसने बची हुइर् पाण्डुलिपियों का संस्वृफत से चीनी अनुवाद करने में लगा दिया। नालंदा - श्िाक्षा का एक विश्िाष्ट वेंफद्र श्वैन त्सांग तथा अन्य तीथर्यात्रिायों ने उस समय के सबसे प्रसि( बौ( विद्या वेंफद्र नालंदा ;बिहारद्ध में अध्ययन किया। उसने नालंदा के बारे में इस प्रकार लिखा है: यहाँ के श्िाक्षक योग्यता तथा बुि में सबसे आगे हैं। बु( के उपदेशों का वह पूरी इर्मानदारी से पालन करते हैं। मठ के नियम कापफी सख्त हैं, जिन्हें सबको मानना पड़ता है। पूरे दिन वाद - विवाद चलते ही रहते हैं। जिससे युवा और वृ( दोनों ही एक - दूसरे की मदद करते हैं। विभ्िान्न शहरों से विद्वान लोग अपनी शंकाएँ दूर करने यहाँ आते हैं। नए आगन्तुकों से पहले द्वारपाल ही कठिन प्रश्न पूछते हैं। उन्हें अंदर जाने की अनुमति तभी मिलती है, जब वे द्वारपाल को सही उत्तर दे पाते हैं। दस में से सात - आठ सही उत्तर नहीं दे पाते हैं। श्वैन त्सांग नालंदा में क्यों पढ़ना चाहता था, कारण बताओ? दृ भक्ित की शुरुआत इन्हीं दिनों देवी - देवताओं की पूजा का चलन भी शुरू हुआ। बाद में हिन्दू ध्मर् की यह प्रमुख पहचान बन गइर्। इनमें श्िाव, विष्णु और दुगार् जैसे देवी - देवता शामिल हैं। इन देवी - देवताओं की पूजा भक्ित परम्परा के माध्यम से की जाती थी। भक्ित उस समय कापफी लोकपि्रय परम्परा बन गइर्। किसी देवी या देवता के प्रति श्र(ा को ही भक्ित कहा जाता है। भक्ित का पथ सबके लिए खुला था, चाहे वह ध्नी हो या गरीब, ऊँची जाति का हो या नीची जाति का, स्त्राी हो या पुरुष। भक्ित मागर् की चचार् हिन्दुओं के पवित्रा ग्रंथ भगवद्गीता में की गइर् है। भगवद्गीता महाभारत ;अध्याय 12 देखोद्ध का एक हिस्सा है। इसमें भगवान वृफष्ण अपने भक्त और मित्रा अजुर्न को सभी ध्मो± को छोड़कर उनकी शरण में आने का उपदेश देते हैं। क्योंकि केवल वृफष्ण ही अजुर्न को सारी बुराइयों से मुक्ित दिला सकते हैं। पूजा का यह रूप ध्ीरे - ध्ीरे देश के विभ्िान्न भागों में प.ैफलने लगा। भक्ित मागर् अपनाने वाले लोग आडंबर के साथ पूजा - पाठ करने के बजाए इर्श्वर के प्रति लगन और व्यक्ितगत पूजा पर शोर देते थे। भक्ित मागर् अपनाने वालों का यह मानना है कि अगर अपने आराध्य देवी या देवता की सच्चे मन से पूजा की जाए, तो वह उसी रूप में दशर्न देंगे, जिसमें भक्त उसे देखना चाहता है। इसलिए आराध्य देवी या देवता मानव के रूप में भी हो सकते हैं या पिफर ¯सह, पेड़ या अन्य किसी भी रूप में। जैसे - जैसे इस विचार को समाज द्वारा स्वीवृफति मिलती गइर्, कलाकार, देवी - देवताओं की एक से बढ़कर एक खूबसूरत मू£तयाँ तैयार करने लगे। वराह के रूप में विष्णु। एरण, मध्य प्रदेश की यह शानदार मू£त विष्णु के ‘वराह’ रूप की है। पुराणों ;अध्याय 12द्ध के अनुसार जल में डूबी पृथ्वी को बचाने के लिए विष्णु ने वराह रूप धरण किया था। यहाँ पृथ्वी को एक स्त्राी के रूप में दशार्या गया है। 107 ऽ भक्ित भक्ित भज् शब्द से बना है, जिसका अथर् ‘विभाजित करना या हिस्सेदारी’ होता है। इसका अथर् यह है कि भक्ित, भगवान और भक्त के बीच परस्पर एक अंतरंग संबंध् है। भक्ित, भगवत् या भगवान के प्रति झुकाव है। भगवत् का एक अथर् यह भी है - जो अपने ऐश्वयर् तथा सुख को भक्तों के साथ बाँटता है। यानी भक्त या भागवत् अपने देवी - देवता के भग का हिस्सेदार होता है। एक भक्त द्वारा लिखी गइर् एक कविता अध्िकांश भक्ित साहित्य हमें यही बताते हैं कि ध्न, ऐश्वयर् या ऊँचे पद के शरिए कभी इर्श्वर से आत्मीयता नहीं बन सकती। करीब 1400 साल पहले श्िावभक्त अप्पार द्वारा तमिल में लिखी एक कविता का यह एक अंश है। अप्पार एक वेल्लाल ;अध्याय 9द्ध था। ‘नष्ट होते अंगों वाला वुफष्ठ रोगी ब्राह्मणों की नशर में निचली जाति का व्यक्ित। वूफड़ा करकट बटोर कर अपनी जीविका चलाने वाला इंसान, अगर ये लोग भी गंगा को अपनी जटाओं में छिपा लेने वाले श्िाव के दास बन जाएँ, तो मैं उनकी आराध्ना करूँगा। क्योंकि वे मेरे इर्श्वर समान हैं।’ कवि सामाजिक प्रतिष्ठा और भक्ित में किसको श्यादा महत्व देते हैं? देवी - देवताओं का विशेष सम्मान होता था। इसलिए विशेष जगहों पर ही इनकी मू£तयों को रखा जाता था। इन स्थानों को ही मंदिर कहते हैं। अध्याय 12 में तुम इन मंदिरों के बारे में पढ़ोगी। भक्ित परम्परा ने चित्राकला, श्िाल्पकला और स्थापत्य कला के माध्यम से अभ्िाव्यक्ित की प्रेरणा दी है। हिन्दू ‘हिन्दू’ शब्द ‘इण्िडया’ शब्द की तरह ही स्िंाध्ु या इण्डस से निकला है। यह शब्द अरबों तथा इर्रानियों द्वारा उन लोगों के लिए उपयोग किया जाता था, जो स्िंाध्ु नदी के पूवर् में रहते थे। यही शब्द उनके ध£मक विश्वास तथा सांस्वृफतिक परम्पराओं के लिए भी प्रयुक्त होता था। „ 108 हमारे अतीतदृप् अन्यत्रा करीब 2000 साल पहले पश्िचमी एश्िाया में इर्साइर् ध्मर् का उदय हुआ। इर्सा मसीह का जन्म बेथलेहम में हुआ, जो उस समय रोमन साम्राज्य का हिस्सा था। इर्सा मसीह ने स्वयं को इस संसार का उ(ारक बताया। उन्होंने दूसरों को प्यार देने और उसी तरह दूसरों पर विश्वास करने का उपदेश दिया, जिस तरह हर व्यक्ित दूसरों से प्यार और विश्वास की उम्मीद करता है। बाइबिल में इर्सा मसीह के उपदेश की बातें लिखी हैं। यहाँ इसका एक अंश दिया गया है: ध्न्य हैं वे लोग जो ध्मर् और न्याय के लिए भूखे प्यासे रहते हैं, उनकी कामनाएँ पूरी होंगी। जो दयालु हैं, वे ध्न्य हैं, क्योंकि उन्हें दया मिलेगी। ध्न्य हंै वे जो दिल से पवित्रा हैं, क्योंकि वे इर्श्वर के दशर्न कर सवेंफगे। ध्न्य हंै वे जो शांति स्थापित करते हैं, वही इर्श्वर की संतान कहलाएँगे। इर्सा मसीह के उपदेश साधरण लोगों को बहुत पसंद आए और ध्ीरे - ध्ीरे यह पश्िचमी एश्िाया, अप़्रफीका तथा यूरोप में पैफल गए। इर्सा मसीह की मृत्यु के सौ सालों के अंदर ही भारतीय उपमहाद्वीप के पश्िचमी तट पर पहले इर्साइर् ध्मर् प्रचारक, पश्िचमी एश्िाया से आए। मानचित्रा 6 ;पृष्ठ 84 - 85द्ध देखो और पता लगाओ कि किस रास्ते से इर्साइर् ध्मर् प्रचारक भारत आए होंगे? केरल के इर्साइर्यों को ‘सिरियाइर् इर्साइर्’ कहा जाता है क्योंकि संभवतः वे पश्िचम एश्िाया से आए थे, वे विश्व के सबसे पुराने इर्साइर्यों में से हैं। कल्पना करो तुम्हारे पास कोइर् पाण्डुलिपि है, जिसे एक चीनी तीथर्यात्राी अपने साथ ले जाना चाहता है। उसके साथ अपनी बातचीत का वणर्न करो। 1ण् निम्नलिख्िात के उपयुक्त जोड़े बनाओ दक्ष्िाणापथ के स्वामी बु(चरित मुवेन्दार महायान बौ( ध्मर् अश्वघोष सातवाहन शासक बोध्िसत्त्व चीनी यात्राी श्वैन त्सांग चोल, चेर, पांड्य वुफछ महत्वपूणर् तिथ्िायाँ ऽ रेशम बनाने की कला की खोज ;लगभग 7000 साल पहलेद्ध ऽ चोल, चेर तथा पांड्य ;लगभग 2300 साल पूवर्द्ध ऽ रोमन - साम्राज्य में रेशम की बढ़ती मांग ;लगभग 2000 साल पहलेद्ध ऽ वुफषाण शासक कनिष्क ;लगभग 1900 साल पहलेद्ध ऽ पफा - श्िाएन का भारत आगमन ;लगभग 1600 वषर् पहलेद्ध ऽ श्वैन त्सांग की भारत यात्रा, अप्पार की श्िाव स्तुति की रचना ;लगभग 1400 साल पहलेद्ध 2ण् राजा सिल्क रूट पर अपना नियंत्राण क्यों कायम करना चाहते थे? 3ण् व्यापार तथा व्यापारिक रास्तों के बारे में जानने के लिए इतिहासकार किन - किन साक्ष्यों का उपयोग करते हैं? 4ण् भक्ित की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? 5ण् चीनी तीथर्यात्राी भारत क्यों आए? कारण बताओ। 6ण् साधरण लोगों का भक्ित के प्रति आक£षत होने का कौन - सा कारण होता है? 7ण् तुम बाशार से क्या - क्या सामान खरीदती हो उनकी एक सूची बनाओ। बताओ कि तुम जिस शहर या गाँव में रहती हो, वहाँ इनमें से कौन - कौन सी चीशें बनी थीं और किन चीशों को व्यापारी बाहर से लाए थे? 8ण् आज भारत में लोग बहुत तीथर्यात्राएँ करते हैं। उनमें से एक के विषय में पता करो और एक संक्ष्िाप्त विवरण दो। ;संकेत: तीथर्यात्रा में स्त्राी, पुरुष या बच्चों में से कौन जा सकते हैं? इसमें कितना वक्त लगता है? लोग किस तरह यात्रा करते हैं? वे अपनी यात्रा के दौरान क्या - क्या ले जाते हैं? तीथर् स्थानों पर पहुँंचकर वे क्या करते हैं? क्या वे वापस आते समय वुफछ लाते हैं?द्ध „ 110 हमारे अतीतदृप्

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