बु( की कहानी बौ( ध्मर् के संस्थापक सि(ाथर् थे जिन्हें गौतम के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म लगभग 2500 वषर् पूवर् हुआ था। यह वह समय था जब लोगों के जीवन में तेशी से परिवतर्न हो रहे थे। जैसा कि तुमने अध्याय 6 में पढ़ा, महाजनपदों के वुफछ राजा इस समय बहुत शक्ितशाली हो गए थे। हशारों सालों के बाद पिफर से नगर उभर रहे थे। गाँवों के जीवन में भी बदलाव आ रहा था ;अध्याय 10 देखोद्ध। बहुत - से विचारक इन परिवतर्नों को समझने का प्रयास कर रहे थे। वे जीवन के सच्चे अथर् को भी जानना चाह रहे थे। बु( क्षत्रिाय थे तथा ‘शाक्य’ नामक एक छोटे से गण से संबंध्ित थे। युवावस्था में ही ज्ञान की खोज में उन्होंने घर के सुखों को छोड़ दिया। अनेक वषो± तक वे भ्रमण करते रहे तथा अन्य विचारकों से मिलकर चचार् करते रहे। अंततः ज्ञान प्राप्ित के लिए उन्होंने स्वयं ही रास्ता ढूँढ़ने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने बोध् गया ;बिहारद्ध में एक पीपल के नीचे कइर् दिनों तक तपस्या की। अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद से वे बु( के रूप में जाने गए। यहाँ से वे वाराणसी के निकट स्िथत सारनाथ गए, जहाँ उन्होंने पहली बार उपदेश दिया। वुफशीनारा में मृत्यु से पहले का शेष जीवन उन्होंने पैदल ही एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करने और लोगों को श्िाक्षा देने में व्यतीत किया। 65 ऽ नए प्रश्न नए विचार सारनाथ स्तूप इस इमारत को स्तूप के नाम से जाना जाता है। यहीं पर बु( ने अपना सवर्प्रथम उपदेश दिया था। इसी घटना की स्मृति में यहाँ स्तूप का निमार्ण किया गया। अध्याय 12 में तुम इन स्तूपों के बारे में और अध्िक पढ़ोगे। बु( ने श्िाक्षा दी कि यह जीवन कष्टों और दुखों से भरा हुआ है और ऐसा हमारी इच्छा और लालसाओं ;जो हमेशा पूरी नहीं हो सकतींद्ध के कारण होता है। कभी - कभी हम जो चाहते हैं वह प्राप्त कर लेने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते हैं एवं और अध्िक ;अथवा अन्यद्ध वस्तुओं को पाने की इच्छा करने लगते हैं। बु( ने इस लिप्सा को त×हा ;तृष्णाद्ध कहा है। बु( ने श्िाक्षा दी कि आत्मसंयम अपनाकर हम ऐसी लालसा से मुक्ित पा सकते हैं। उन्होंने लोगों को दयालु होने तथा मनुष्यों के साथ - साथ जानवरों के जीवन का भी आदर करने की श्िाक्षा दी। वे मानते थे कि हमारे कमो± के परिणाम, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, हमारे वतर्मान जीवन के साथ - साथ बाद के जीवन को भी प्रभावित करते हैं। बु( ने अपनी श्िाक्षा सामान्य लोगों की प्रावृफत भाषा में दी। इससे सामान्य लोग भी उनके संदेश को समझ सके। वेदों की रचना के लिए किस भाषा का प्रयोग हुआ था? बु( ने कहा कि लोग किसी श्िाक्षा को केवल इसलिए नहीं स्वीकार करंे कि यह उनका उपदेश है, बल्िक वे उसे अपने विवेक से मापें। आओ देखो, उन्होंने ऐसा किस प्रकार किया। „ 66 हमारे अतीतदृप् किसागोतमी की कहानी यह बु( के विषय में एक प्रसि( कहानी है। एक समय की बात है किसागोतमी नामक एक स्त्राी का पुत्रा मर गया। इस बात से वह इतनी दुःखी हुइर् कि वह अपने बच्चे को गोद में लिए नगर की सड़कों पर घूम - घूम कर लोगों से प्राथर्ना करने लगी कि कोइर् उसके पुत्रा को जीवित कर दे। एक भला व्यक्ित उसे बु( के पास ले गया। बु( ने कहा, ‘‘मुझे एक मुट्टòी सरसों के बीज लाकर दो, मैं तुम्हारे पुत्रा को जीवित कर दूँगा’’। किसागोतमी बहुत प्रसन्न हुइर्। पर जैसे ही वह बीज लाने के लिए जाने लगी तभी बु( ने उसे रोका और कहा, ‘‘ये बीज एक ऐसे घर से माँग कर लाओ जहाँ किसी की मृत्यु न हुइर् हो।’’ किसागोतमी एक दरवाशे से दूसरे दरवाशे गइर् लेकिन वह जहाँ भी गइर् उसने पाया कि हर घर में किसी न किसी के पिता, माता, बहन, भाइर्, पति, पत्नी, बच्चे, चाचा, चाची, दादा या दादी की मृत्यु हुइर् थी। बु( दुःखी माँ को क्या श्िाक्षा देने का प्रयास कर रहे थे? उपनिषद् जिस समय बु( उपदेश दे रहे थे उसी समय या उससे भी थोड़ा पहले दूसरे अन्य ¯चतक भी कठिन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास कर रहे थे। उनमें से वुफछ मृत्यु के बाद के जीवन के बारे मंे जानना चाहते थे जबकि अन्य यज्ञों की उपयोगिता के बारे में जानने को उत्सुक थे। इनमें से अध्िकांश चिंतकों का यह मानना था कि इस विश्व में वुफछ तो ऐसा है जो कि स्थायी है और जो मृत्यु के बाद भी बचा रहता है। उन्होंने इसका वणर्न आत्मा तथा ब्रह्म अथवा सावर्भौम आत्मा के रूप में किया है। वे मानते थे कि अंततः आत्मा तथा ब्रह्म एक ही हैैं। ऐसे कइर् विचारों का संकलन उपनिषदों में हुआ है। उपनिषद् उत्तर वैदिक ग्रंथों का हिस्सा थे। उपनिषद् का शाब्िदक अथर् है ‘गुरू के समीप बैठना’। इन ग्रंथों में अध्यापकों और विद्याथ्िार्यों के बीच बातचीत का संकलन किया गया है। प्रायः ये विचार सामान्य वातार्लाप के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। 67 ऽ नए प्रश्न नए विचार बुिमान भ्िाखारी यह वातार्लाप छांदोग्य उपनिषद् नामक प्रसि( उपनिषद् की एक कहानी पर आधरित है। शौनक व अभ्िाप्रतारिण नामक दो )ष्िा सावर्भौम आत्मा की उपासना करते थे। एक बार ज्योंही वे भोजन करने के लिए बैठे, एक भ्िाखारी आया और भोजन माँगने लगा। शौनक ने कहा, ‘‘हम तुम्हें वुफछ नहीं दे सकते।’’ भ्िाखारी ने पूछा, ‘‘विद्वज्जन, आप किसकी उपासना करते हैं?’’ अभ्िाप्रतारिण ने उत्तर दिया, ‘‘सावर्भौम आत्मा की।’’ ‘‘ओह! इसका मतलब आप यह जानते हैं कि यह सावर्भौम आत्मा सम्पूणर् विश्व में विद्यमान है।’’ ट्टष्िायों ने कहा, ‘‘हाँ, हाँ, हम यह जानते हैं।’’ भ्िाखारी ने पिफर पूछा, ‘‘अगर यह सावर्भौम आत्मा सम्पूणर् विश्व में विद्यमान है तो यह मेरे अंदर भी विद्यमान है। मैं कौन हूँ? मैं इस विश्व का एक भाग ही तो हूँ।’’ ‘‘तुम सत्य बोलते हो, युवा ब्राह्मण।’’ ‘‘इसलिए हे ट्टष्िायों, मुझे भोजन न देकर आप उस सावर्भौम आत्मा को भोजन देने से मना कर रहे हैं।’’ भ्िाखारी की बात की सच्चाइर् जानकर ट्टष्िायों ने उसे भोजन दे दिया। भ्िाखारी ने भोजन पाने के लिए ट्टष्िायों को किस तरह मनाया? इन चचार्ओं में भाग लेने वाले अध्िकांशतः पुरुष ब्राह्मण तथा राजा होते थे। कभी - कभी गागीर् जैसी स्त्राी - विचारकों का भी उल्लेख मिलता है। विद्वत्ता के लिए प्रसि( गागीर् राजदरबारों में होने वाले वाद - विवाद में भाग लिया करती थीं। निध्र्न व्यक्ित इस तरह के वाद - विवाद में बहुत कम ही हिस्सा लेते थे। इस तरह का एक प्रसि( अपवाद सत्यकाम जाबाल का है। सत्यकाम जाबाल का नाम उसकी दासी माँ के नाम पर पड़ा। सत्यकाम के मन में सत्य जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न हुइर्। गौतम नामक एक ब्राह्मण ने उन्हें अपने विद्याथीर् के रूप में स्वीकार किया तथा वह अपने समय के सवार्ध्िक प्रसि( विचारकों में से एक बन गए। उपनिषदों के कइर् विचारों का विकास बाद में प्रसि( विचारक शंकराचायर् के द्वारा किया गया जिनके बारे में तुम कक्षा 7 में पढ़ोगी। „ 68 हमारे अतीतदृप् व्याकरणविद् पाण्िानि इस युग में वुफछ अन्य विद्वान भी खोज कर रहे थे। उन्हीं प्रसि( विद्वानों में एक पाण्िानि ने संस्वृफत भाषा के व्याकरण की रचना की। उन्होंने स्वरों तथा व्यंजनों को एक विशेष क्रम में रखकर उनके आधर पर सूत्रों की रचना की। ये सूत्रा बीजगण्िात के सूत्रों से कापफी मिलते - जुलते हैं। इसका प्रयोग कर उन्होंने संस्वृफत भाषा के प्रयोगों के नियम लघु सूत्रों ;लगभग 3000द्ध के रूप में लिखे। जैन ध्मर् इसी युग में अथार्त् लगभग 2500 वषर् पूवर् जैन ध्मर् के सवार्ध्िक महत्वपूणर् विचारक वध्र्मान महावीर ने भी अपने विचारों का प्रसार किया। वह वज्िज संघ के लिच्छवि वुफल के एक क्षत्रिाय राजवुफमार थे। इस संघ के विषय में तुमने अध्याय 6 में पढ़ा है। 30 वषर् की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया और जंगल में रहने लगे । बारह वषर् तक उन्होंने कठिन व एकाकी जीवन व्यतीत किया। इसके बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। उनकी श्िाक्षा सरल थी। सत्य जानने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक स्त्राी व पुरुष को अपना घर छोड़ देना चाहिए। उन्हें अहिंसा के नियमों का कड़ाइर् से पालन करना चाहिए अथार्त् किसी भी जीव को न तो कष्ट देना चाहिए और न ही उसकी हत्या करनी चाहिए। महावीर का कहना था, ‘‘सभी जीव जीना चाहते हैं। सभी के लिए जीवन पि्रय है।’’ महावीर ने अपनी श्िाक्षा प्रावृफत में दी। यही कारण है कि साधरण जन भी उनके तथा उनके अनुयायियों की श्िाक्षाओं को समझ सके । देश के अलग - अलग हिस्सों में प्रावृफत के अलग - अलग रूप प्रचलित थे। प्रचलन क्षेत्रा के आधर पर ही उनके अलग - अलग नाम थे जैसे मगध् में बोली जाने वाली प्रावृफत, मागध्ी कहलाती थी। जैन नाम से जाने गए महावीर के अनुयायियों को भोजन के लिए भ्िाक्षा माँगकर सादा जीवन बिताना होता था। उन्हें पूरी तरह से इर्मानदार होना पड़ता था तथा चोरी न करने की उन्हें सख्त हिदायत थी। उन्हें ब्रह्मचयर् का पालन करना होता था। पुरुषों को वस्त्रों सहित सब वुफछ त्याग देना पड़ता था। 69 ऽ नए प्रश्न नए विचार „ 70 हमारे अतीतदृप् अध्िकांश व्यक्ितयों के लिए ऐसे कड़े नियमों का पालन करना बहुत कठिन था। पिफर भी हशारों व्यक्ितयों ने इस नइर् जीवन शैली को जानने और सीखने के लिए अपने घरों को छोड़ दिया। कइर् अपने घरों पर ही रहे और भ्िाक्खु - भ्िाक्खुणी बने लोगों को भोजन प्रदान कर उनकी सहायता करते रहे। मुख्यतः व्यापारियों ने जैन ध्मर् का समथर्न किया । किसानों के लिए इन नियमों का पालन अत्यंत कठिन था क्योंकि प.फसल की रक्षा के लिए उन्हें कीड़े - मकौड़ों को मारना पड़ता था। बाद की सदियों में जैन ध्मर्, उत्तर भारत के कइर् हिस्सों के साथ - साथ गुजरात, तमिलनाडु और कनार्टक में भी पैफल गया। महावीर तथा उनके अनुयायियों की श्िाक्षाएँ कइर् शताब्िदयों तक मौख्िाक रूप में ही रहीं । वतर्मान रूप में उपलब्ध् जैन ध्मर् की श्िाक्षाएँ लगभग 1500 वषर् पूवर् गुजरात में वल्लभी नामक स्थान पर लिखी गइर् थीं ;मानचित्रा 7, पृष्ठ 113 देखेंद्ध। संघ महावीर तथा बु( दोनों का ही मानना था कि घर का त्याग करने पर ही सच्चे ज्ञान की प्राप्ित हो सकती है। ऐसे लोगों के लिए उन्होंने संघ नामक संगठन बनाया जहाँ घर का त्याग करने वाले लोग एक साथ रह सवेंफ। संघ में रहने वाले बौ( भ्िाक्षुओं के लिए बनाए गए नियम विनयपिटक नामक ग्रंथ में मिलते हैं। विनयपिटक से हमें पता चलता है कि संघ में पुरुषों और स्ित्रायों के रहने की अलग - अलग व्यवस्था थी। सभी व्यक्ित संघ में प्रवेश ले सकते थे। हालाँकि संघ में प्रवेश के लिए बच्चों को अपने माता - पिता से, दासों को अपने स्वामी से, राजा के यहाँ काम करने वाले लोगों को राजा से, तथा कशर्दारों को अपने देनदारों से अनुमति लेनी होती थी। एक स्त्राी को इसके लिए अपने पति से अनुमति लेनी होती थी। संघ में प्रवेश लेने वाले स्त्राी - पुरुष बहुत सादा जीवन जीते थे। वे अपना अध्िकांश समय ध्यान करने में बिताते थे और दिन के एक निश्िचत समय में वे शहरों तथा गाँवों में जाकर भ्िाक्षा माँगते थे। यही कारण है कि उन्हें भ्िाक्खु तथा भ्िाक्खुणी ;साध्ु - भ्िाखारी के लिए प्रावृफत शब्दद्ध कहा गया। वे आम लोगों को श्िाक्षा देते थे और साथ ही एक - दूसरे की सहायता भी करते थे। किसी तरह की आपसी लड़ाइर् का निपटारा करने के लिए वे प्रायः बैठवेंफ भी किया करते थे। संघ में प्रवेश लेने वालों में ब्राह्मण, क्षत्रिाय, व्यापारी, मशदूर, नाइर्, गण्िाकाएँ तथा दास शामिल थे। इनमें से कइर् लोगों ने बु( की श्िाक्षाओं के विषय में लिखा तथा वुफछ लोगों ने संघ में अपने जीवन के विषय में संुदर कविताओं की रचना की। पिछले अध्याय में वण्िार्त संघ और इस अध्याय में वण्िार्त संघ के बीच दो भ्िान्नताएँ बताओ। क्या इनमें कोइर् समानताएँ दिखती हैं? पहाड़ी को काटकर बनाइर् गइर् एक गुपफा। यह कालेर् ;वतर्मान महाराष्ट्र मेंद्ध स्िथत एक गुपफा है। भ्िाक्खु - भ्िाक्खुणी इन शरण स्थलों में रहकर ध्यान किया करते थे।विहार जैन तथा बौ( भ्िाक्खुु पूरे साल एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते हुए उपदेश दिया करते थे। केवल वषार् ट्टतु में जब यात्रा करना कठिन हो जाता था तो वे एक स्थान पर ही निवास करते थे। ऐसे समय वे अपने अनुयायियों द्वारा उद्यानों में बनवाए गए अस्थायी निवासों में अथवा पहाड़ेे की पावफतिक गुपफाओं में ी क्षत्रां्रृरहते थे। जैसे - जैसे समय बीतता गया भ्िाक्खु - भ्िाक्खुण्िायों ने स्वयं तथा उनके समथर्कों ने अध्िक स्थायी शरणस्थलों की आवश्यकता का अनुभव किया। तब कइर् शरणस्थल बनाए गए जिन्हें विहार कहा गया। आरंभ्िाक विहार लकड़ी के बनाए गए तथा बाद में इनके निमार्ण में इर्ंटों का प्रयोग होने लगा। पश्िचमी भारत में विशेषकर वुफछ विहार पहाडि़यों को खोद कर बनाए गए। 71 ऽ नए प्रश्न नए विचार एक बौ( ग्रंथ से ज्ञात होता हैः जिस तरह महासागरों मेें मिलने पर नदियों की अलग - अलग पहचान समाप्त हो जाती है ठीक उसी तरह बु( के अनुयायी जब भ्िाक्षुओं की श्रेणी में प्रवेश करते हैं तो वे अपना वणर्, श्रेणी और परिवार सब त्याग देते हैं। प्रायः किसी ध्नी व्यापारी, राजा अथवा भू - स्वामी द्वारा दान में दी गइर् भूमि पर विहार का निमार्ण होता था। स्थानीय व्यक्ित भ्िाक्खु - भ्िाक्खुण्िायों के लिए भोजन, वस्त्रा तथा दवाइर्याँ लेकर आते थे जिसके बदले ये भ्िाक्खु और भ्िाक्खुणी लोगों को श्िाक्षा देते थे। आगे आने वाली शताब्िदयों में बौ( ध्मर् उपमहाद्वीप के विभ्िान्न हिस्सों के साथ - साथ बाहरी क्षेत्रों में भी पफैल गया। अध्याय 10 में तुम इनके बारे में और अध्िक पढ़ोगे। आश्रम - व्यवस्था जैन तथा बौ( ध्मर् जिस समय लोकपि्रय हो रहे थे लगभग उसी समय ब्राह्मणों ने आश्रम - व्यवस्था का विकास किया। यहाँ आश्रम शब्द का तात्पयर् लोगों द्वारा रहने तथा ध्यान करने के लिए प्रयोग में आने वाले स्थान से नहीं है, बल्िक इसका तात्पयर् जीवन के एक चरण से है। ब्रह्मचयर्, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास नामक चार आश्रमों की व्यवस्था की गइर्। ब्रह्मचयर् के अंतगर्त ब्राह्मण, क्षत्रिाय तथा वैश्य से यह अपेक्षा की जाती थी कि इस चरण के दौरान वे सादा जीवन बिताकर वेदों का अध्ययन करेंगे। गृहस्थ आश्रम के अंतगर्त उन्हें विवाह कर एक गृहस्थ के रूप में रहना होता था। वानप्रस्थ के अंतगर्त उन्हें जंगल में रहकर साध्ना करनी थी। अंततः उन्हें सब वुफछ त्यागकर संन्यासी बन जाना था। आश्रम व्यवस्था ने लोगों को अपने जीवन का वुफछ हिस्सा ध्यान में लगाने पर बल दिया। प्रायः स्ित्रायों को वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी और उन्हें अपने पतियों द्वारा पालन किए जाने वाले आश्रमों का ही अनुसरण करना होता था। संघ के जीवन से आश्रमों की यह व्यवस्था किस तरह भ्िान्न थी? यहाँ किन वणो± का उल्लेख हुआ है? क्या सभी चार वणो± को यह आश्रम व्यवस्था अपनाने की अनुमति थी? „ 72 हमारे अतीतदृप् अन्यत्रा एटलस में इर्रान ढूँढ़ो। जरथुस्त्रा एक इर्रानी पैगम्बर थे। उनकी श्िाक्षाओं का संकलन शेन्द - अवेस्ता नामक ग्रंथ में मिलता है। शेन्द - अवेस्ता की भाषा तथा इसमें वण्िार्त रीति - रिवाज, वेदों की भाषा और रीति - रिवाजों से काप.फी मिलते - जुलते हैं। जरथुस्त्रा की मूल श्िाक्षा का सूत्रा है: ‘सद् - विचार, सद् - वचन तथा सद् - कायर्।’ ‘हे इर्श्वर! बल, सत्य - प्रधनता एवं सद्विचार प्रदान कीजिए, जिनके शरिए हम शांति बना सवेंफ।’ एक हशार से अध्िक वषो± तक जरथुस्त्रावाद इर्रान का एक प्रमुख ध्मर् रहा। बाद में वुफछ जरथुस्त्रावादी इर्रान से आकर गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय नगरों में बस गए। वे लोग ही आज के पारसियों के पूवर्ज हैं। कल्पना करो तुम लगभग 2500 वषर् पूवर् के एक उपदेशक को सुनने जाना चाहती हो। वहाँ जाने की अनुमति लेने के लिए तुम अपने माता - पिता को वैफसे सहमत करोगी, इसका वणर्न करो। 1ण् बु( ने लोगों तक अपने विचारों का प्रसार करने के लिए किन - किन बातों पर शोर दिया? 2ण् ‘सही’ व ‘गलत’ वाक्य बताओ। ;कद्ध बु( ने पशुबलि को बढ़ावा दिया। ;खद्ध बु( द्वारा प्रथम उपदेश सारनाथ में देने के कारण इस जगह का बहुत महत्त्व है। 73 ऽ नए प्रश्न नए विचार ;गद्ध बु( ने श्िाक्षा दी कि कमर् का हमारे जीवन पर कोइर् प्रभाव नहीं पड़ता। ;घद्ध बु( ने बोध् गया में ज्ञान प्राप्त किया।ऽ उपनिषदों के विचारक, जैन महावीर तथा बु( ;घद्ध उपनिषदों के विचारकों का मानना था कि आत्मा और ब्रह्म वास्तव;लगभग 2500 वषर् में एक ही हंै।पूवर्द्ध 3ण् उपनिषदों के विचारक किन प्रश्नों का उत्तर देना चाहते थे?ऽ जैन ग्रंथों का लेखन ;लगभग 1500 वषर् 4ण् महावीर की प्रमुख श्िाक्षाएँ क्या थीं?पूवर्द्ध 5ण् अनघा की माँ क्यों चाहती थी कि उनकी बेटी बु( की कहानी से परिचित हो? तुम्हारा इसके बारे में क्या कहना है? 6ण् क्या तुम सोचते हो कि दासों के लिए संघ में प्रवेेश करना आसान रहा होगा, तवर्फ सहित उत्तर दो। 7ण् इस अध्याय में उल्िलख्िात कम से कम पाँच विचारों तथा प्रश्नों की सूची बनाओ। उनमें से किन्हीं तीन का चुनाव कर चचार् करो कि वे आज भी क्यों महत्वपूणर् हैं? 8ण् आज दुनिया का त्याग करने वाले स्ित्रायों और पुरुषों के बारे में और अध्िक जानने का प्रयास करो। ये लोग कहाँ रहते हंै, किस तरीके के कपड़े पहनते हैं तथा क्या खाते हैं? ये दुनिया का त्याग क्यों करते हैं? „ 74 हमारे अतीतदृप्

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