„ 22 हमारे अतीतदृप् विभ्िान्न प्रकार के भोजन आज हमें अपने भोजन का अध्िकांश हिस्सा उगाइर् गइर् प़्ाफसलों और पाले गए पशुओं से मिलता है। भ्िान्न - भ्िान्न प़्ाफसलों को उगाने के लिए भ्िान्न - भ्िान्न जलवायु की आवश्यकता पड़ती है जैसे धन की खेती के लिए गेहूँ या जौ की तुलना में श्यादा पानी की शरूरत पड़ती है। इसीलिए हम देखते हैं कि ़किसान विशेष पफसल विशेष क्षेत्रों में ही उगाते हैं। यही नहीं पशुओं को भी अपने अनुवूफल वातावरण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि सूखी और पहाड़ी जलवायु में मवेश्िायों की तुलना में भेड़ या बकरी अध्िक सहजतापूवर्क जीवित रह सकते हैं। पर जैसाकि तुमने अध्याय 2 में पढ़ा है, स्त्राी - पुरुषों ने अपने भोजन का उत्पादन हमेशा नहीं किया। खेती और पशुपालन की शुरुआत अध्याय 2 में हमने पढ़ा है कि दुनिया की जलवायु बदलती रही है। साथ ही लोग जिन वनस्पतियों और पशुओं का भोजन के रूप में इस्तेमाल करते थे, वे भी बदलते रहे। लोगों का ध्यान वुफछ बातों की ओर गया जैसे खाने योग्य वनस्पतियाँ कहाँ - कहाँ मिल सकती हैं, बीज वैफसे अपनी डंठल से टूट कर गिरते हैं, गिरे बीजों का अंवुफरण और उनसे पौधें का निकलना आदि। इसी तरह उन्होंने पौधें की देखभाल करनी शुरू कर दी होगी। चिडि़यों और जानवरों से पौधें की सुरक्षा की होगी, ताकि वे ठीक से बढ़ सवेंफ और उनके बीज पक सवेंफ। इस प्रकार ध्ीरे - ध्ीरे वे कृषक बन गए होंगे। इसी तरह लोगों ने अपने घरों के आस - पास चारा रखकर जानवरों को आकष्िार्त कर उन्हें पालतू बनाया होगा। सबसे पहले जिस जंगली जानवरको पालतू बनाया गया वह वुफत्ते का जंगली पूवर्ज था। ध्ीरे - ध्ीरे लोग भेड़, बकरी, गाय और सूअर जैसे जानवरों को अपने घरों के नशदीक आने को उत्साहित करने लगे। ऐसे जानवर झुण्ड में रहते थे और श्यादातर घास खाते थे। अक्सर लोग अन्य जंगली जानवरों के आक्रमण से इनकी सुरक्षा किया करते थे और इस तरह ध्ीरे - ध्ीरे वे पशुपालक बन गए होंगे। क्या तुम बता सकती हो कि सबसे पहले वुफत्तों को ही पालतू क्यों बनाया गया? बसने की प्रिया लोगों द्वारा पौध्े उगाने और जानवरों की देखभाल करने को ‘बसने की प्रिया’ का नाम दिया गया है। अपनाए गए ये पौध्े तथा जानवर अक्सर जंगली पौधें तथा जानवरों से भ्िान्न होते हैं। इसकी वजह यह है कि बसने की प्रिया की दिशा में अपनाए गए पौधें या जानवरों का लोग चयन करते हैं। उदाहरण के तौर पर लोग उन्हीं पौधें तथा जानवरों का चयन करते हैं जिनके बीमार होने की संभावना कम हो। यही नहीं, लोग उन्हीं पौधें को चुनते हैं जिनसे बड़े दाने वाले अनाज पैदा होते हैंऋ साथ ही जिनकी मशबूत डंठले अनाज के पके दानों के भार को संभाल सवेंफ। ऐसे पौधें के बीजों को संभालकर रखा जाता है ताकि पिफर से उगाने के लिए उनके गुण सुरक्ष्िात रह सवेंफ। उन्हीं जानवरों को आगे प्रजनन के लिए चुना जाता है, जो आमतौर पर अहिंसक होते हैं। इसलिए हम देखते हैं कि पाले गए जानवर तथा कृष्िा के लिए अपनाए गए पौध्े, जंगली जानवरों तथा पौधें से ध्ीरे - धीरे भ्िान्न होते गए। मिसाल के तौर पर जंगली जानवरों की तुलना में पालतू जानवरों के दाँत और सींग छोटे होते हैं। इन दाँतों को देखो। इनमें से कौन - सा जंगली सूअर का है और कौन - सा पालतू सूअर का? बसने की प्रिया पूरी दुनिया में ध्ीरे - ध्ीरे चलती रही। यह करीब 12,000 साल पहले शुरू हुइर्। वास्तव में आज हम जो भोजन करते हैं वो इसी बसने की प्रिया की वजह से है। कृष्िा के लिए अपनाइर् गइर् सबसे प्राचीन प.फसलों में गेहूँ तथा जौ आते हैं, उसी तरह सबसे पहले पालतू बनाए गए जानवरों में वुफत्ते के बाद भेड़ - बकरी आते हैं। 23 ऽ भोजनः संग्रह से उत्पादन तक एक नवीन जीवन - शैली अनाज के उपयोग तुम किसी पौध्े के बीज को बो कर देखो, तुम पाओगी कि इसे विकसित होने में वुफछ वक्त लगता है। इसमें वुफछ दिन, महीने या पिफर साल तक लग सकता है। इसलिए जब लोग पौध्े उगाने लगे तो उनकी देखभाल के लिए उन्हें एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ा था। बीज बोने से लेकर पफसलों के पकने तक, पौधें की सिंचाइर् करने, खरपतवार हटाने, जानवरों़और चिडि़यों से उनकी सुरक्षा करने जैसे बहुत - से काम शामिल थे। कटाइर् के बाद, अनाज का उपयोग बहुत संभाल कर करना पड़ता था। अनाज को भोजन और बीज, दोनों ही रूपों में बचा कर रखना आवश्यक था, इसलिए लोगों को इसके भंडारण की बात सोचनी पड़ी। बहुत - से इलाकों में लोगों ने मिट्टðी के बड़े - बड़े बतर्न बनाए, टोकरियाँ बुनीं या पिफर शमीन में गîक्का खोदा। क्या तुम्हें लगता है कि श्िाकारी या भोजन - संग्रह करने वाले बतर्न बनाते और उनका प्रयोग करते होंगे? अपने जवाब का कारण बताओ। जानवर: चलते - पिफरते ‘खाद्य - भंडार’ जानवर बच्चे देते हैं जिससे उनकी संख्या बढ़ती है। अगर जानवरों की देखभाल की जाए तो उनकी संख्या तो बढ़ती ही है साथ ही उनसे दूध् भी प्राप्त हो सकता है जो भोजन का एक अच्छा ड्डोत है। यही नहीं जानवरों से हमें मांस भी मिलता है। दूसरे शब्दों में, पशु - पालन भोजन के ‘भंडारण’ का एक तरीका है। भोजन के अतिरिक्त जानवरों से और क्या - क्या मिल सकता है? आज जानवरों का उपयोग किस लिए होता है? आओ, आरंभ्िाक वृफषकों और पशुपालकों के बारे में पता करें? मानचित्रा 2 ;पृष्ठ संख्या 14द्ध देखो। क्या तुम्हें कइर् नीले वगर् दिख रहे हैं?पता है, इनमें से प्रत्येक बिंदु उस जगह को दशार्ता है, जहाँ पुरातत्त्वविदों को „ 24 हमारे अतीतदृप् शुरुआती कृषकों और पशुपालकों के होने के साक्ष्य मिले हैं। ये पूरेउपमहाद्वीप में पाए गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूणर् पश्िचमोत्तर क्षेत्रा में, आध्ुनिक कश्मीर में, और पूवीर् तथा दक्ष्िाण भारत में पाए गए हैं। वास्तव में ये निदिर्ष्ट स्थान कृषकों और पशुपालकों की बस्ितयाँ थीं या नहीं, इसे जाँचने के लिए वैज्ञानिक खुदाइर् में मिले पौधें और पशुओं की हिóयों के नमूनों का अध्ययन करते हैं। इनमें से सबसे रोचक जले हुए अनाज के दानों के अवशेष हैं। ऐसा लगता है कि ये गलती से या पिफर जानबूझ कर जलाए गए होंगे। वैज्ञानिक इन अनाज के दानों की पहचान कर सकते हैं। इस तरह हमें पता चलता है कि इस उपमहाद्वीप के विभ्िान्न भागों में बहुत सारी पफसलें उगाइर् जाती रही होंगी। वैज्ञानिक विभ्िान्न जानवरों की़हियाóंेकी भी पहचान कर सकते हैं। नीचे की तालिका से तुम यह जान सकती हो कि कहाँ - कहाँ अनाजों और पालतू जानवरों की हियाóंेके अवशेष मिले हैं। अनाज और हिóयाँ पुरास्थल गेहूँ, जौ, भेड़, बकरी, मवेशी मेहरगढ़ ;आध्ुनिक पाकिस्तानद्ध चावल, जानवरों की हिóयों के टुकड़े कोल्िडहवा ;आध्ुनिक उत्तर प्रदेशद्ध चावल, मवेशी ;मिट्टðी पर खुरों के निशानद्ध महागढ़ा ;आध्ुनिक उत्तर प्रदेशद्ध गेहूँ और दलहन गुप़्ाफक्राल ;आध्ुनिक कश्मीरद्ध गेहूँ और दलहन, वुफत्ते, मवेशी, भैंस, भेड़, बकरी बुज़्ार्होम ;आध्ुनिक कश्मीरद्ध गेहूँ, हरे चने, जौ, भैंस, बैल चिराँद ;आध्ुनिक बिहारद्ध ज्वार - बाजरा, मवेशी, भेड़, बकरी, सूअर हल्लूर ;आध्ुनिक आंध््रप्रदेशद्ध काला चना, ज्वार - बाजरा, मवेशी, भेड़, सूअर पैÕयमपल्ली ;आध्ुनिक आंध््रप्रदेशद्ध जिन जगहों पर अनाज तथा हिóयों के अवशेष मिले हैं, ये उनमें से सिपर्फ वुफछ ही हैं। 25 ऽ भोजनः संग्रह से उत्पादन तक स्थायी जीवन की ओर नवपाषाण युग के वुफछ उपकरण। इनकी तुलना पृष्ठ 13 ;अध्याय 2द्ध पर दिखाए गए उपकरणों से करो। तुम्हें इनमें क्या - क्या समानताएँ और भेद दिखाइर् देते हैं? „ 26 हमारे अतीतदृप् पुरातत्त्वविदों को वुफछ पुरास्थलों पर झोपडि़यों और घरों के निशान मिले हैं। जैसे कि बुशर्होम ;वतर्मान कश्मीर मेंद्ध के लोग गîेक्क के नीचे घर बनाते थे जिन्हे गतर्वास कहा जाता है। इनमें उतरने के लिए सीढि़याँ होती थीं। इससे उन्हें ठंढ के मौसम में सुरक्षा मिलती होगी। पुरातत्त्वविदों को झोपडि़यों के अंदर और बाहर दोनों ही स्थानों पर आग जलाने की जगहें मिली हैं। ऐसा लगता है कि लोग मौसम के अनुसार घर के अंदर या बाहर खाना पकाते होंगे। एक गतर्वास का चित्रा बनाओ। बहुत सारी जगहों से पत्थर के औशार भी मिले हैं। इनमें से कइर् ऐसे हैं, जो पुरापाषाणयुगीन उपकरणों से भ्िान्न हैं। इसीलिए इन्हें नवपाषाण युग का माना गया है। इनमें वे औशार भी हैं, जिनकी धार को और अध्िक पैना करने के लिए उन पर पाॅलिश चढ़ाइर् जाती थी। ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज तथा वनस्पतियों से प्राप्त अन्य चीशों को पीसने के लिए किया जाता था। आज हशारों साल बाद भी ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता है। उसी तरह प्राचीन प्रस्तरयुगीन औशारों का निमार्ण और प्रयोग लगातार होता रहा। वुफछ औशार हिóयों से भी बनाए जाते थे। को रखने के लिए किया जाता था। ध्ीरे - ध्ीरे लोग बतर्नों का प्रयोग खाना बनाने के लिए भी करने लगे। चावल, गेहूँ तथा दलहन जैसे अनाज अब आहार का महत्वपूणर् हिस्सा बन गए थे। इसके साथ - साथ अब लोग कपड़े भी बुनने लगे थे। इसके लिए कपास जैसे आवश्यक पौध्े उगाए जा सकते थे। क्या ये परिवतर्न हर जगह एक साथ ही आ गए होंगे? ऐसी बात नहीं है। एक तरपफ जहाँ कइर् जगहों पर स्त्राी - पुरुष श्िाकार और भोजन - संग्रह करने़का काम करते रहे थे वहीं अन्य लोगों ने हशारों सालों के दरम्यान ध्ीरे - धीरे खेती और पशुपालन को अपना लिया। बहुत जगह लोग मौसम के मुताबिक बदल - बदल कर अपनी जीविका चलाया करते थे। अन्य रीति - रिवाज पुरातत्त्वविद् बहुत स्पष्ट रूप से इस बारे में वुफछ नहीं कह सकते। विद्वानों ने ऐसे किसानों का अध्ययन किया है। इनमें प्रायः कृषक और पशुपालक समूह में रहते हैं जिन्हें जनजाति कहते हैं। विद्वानों ने पाया है कि ये लोग वुफछ ऐसे रीति - रिवाजों को मानते हैं, जो संभवतः पहले से ही प्रचलित रहे हैं। 27 ऽ भोजनः संग्रह से उत्पादन तक ऽ वुफछ व्यक्ितयों को नेता मान लिया जाता है। वे अनुभवी वृ( व्यक्ित, नौजवान यो(ा या पिफर पुरोहित हो सकते हंै। वयस्क महिलाओं को भी उनके ज्ञान तथा अनुभव के लिए विश्िाष्ट सम्मान दिया जाता है। ऽ जनजातियों की सांस्कृतिक - परम्पराएँ बहुत समृ( तथा विश्िाष्ट होती हैं। इनमें उनकी भाषाएँ, संगीत, कहानियाँ तथा चित्राकारी भी शामिल हैं। उनके अपने देवी - देवता होते हैं। ऽ शमीन, जंगल, घास के मैदान तथा पानी पूरे वुफनबे की सम्पिा मानी जाती है जिनका उपयोग सभी एक साथ करते हैं। इनमें गरीब और अमीर के बीच कोइर् ख़ास अंतर नहीं होता। इसलिए जनजातीय समाज अन्य समाजों से भ्िान्न होते हैं। इन अन्य समाजों के बारे में तुम आगे पढ़ोगी। पुरुषों द्वारा किए जाने वाले कामों की एक सूची बनाओ। महिलाएँ क्या - क्या काम करती हैं? कौन - से ऐसे काम हैं, जो स्त्राी - पुरुष दोनों करते हैं? सूक्ष्म - निरीक्षण ;कद्ध मेहरगढ़ में जीवन - मृत्यु मानचित्रा 2 ;पृष्ठ 14द्ध में मेहरगढ़ ढूँढ़ो। यह इर्रान जाने वाले सबसे महत्वपूणर् रास्ते, बोलन दरेर् के पास एक हराभरा समतल स्थान है। मेहरगढ़ संभवतः वह स्थान है, जहाँ के स्त्राी - पुरुषों ने, इस इलाके में सबसे पहले जौ, गेहूँ उगाना और भेड़ - बकरी पालना सीखा।गाँव यहाँ खुदाइर् में सबसे पहले के स्तरों से पुरातत्त्वविदों को विभ्िान्न प्रकारगाँवों की यह के जानवरों की हिóयाँ मिलीं। इनमें हिरण तथा सूअर जैसे जंगली जानवरोंविशेषता है कि वहाँ की हिóयाँ भी शामिल हैं। उसके बाद के स्तरों से भेड़ और बकरियोंरहने वाले अध्िकांश की हिóयाँ श्यादा मिली हैं। उसके ऊपर श्यादातर मवेश्िायों की हीलोग भोजन उत्पादन में हिóयाँ मिली हैं, इससे ऐसा लगता है कि ये लोग मवेश्िायों को पालनेलगे होते हैं। लगे थे मेहरगढ़ में इसके अलावा चैकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष भी मिले हैं। प्रत्येक घर में चार या उससे श्यादा कमरे हैं, जिनमें से वुफछ संभवतः भंडारण के काम आते होंगे। „ 28 हमारे अतीतदृप् मत्यु के बाद सामान्यतया मृतक के सगे संबंध्ी उसके प्रति सम्मान जताते हैं। लोगों की आस्था है कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है। इसीलिए कब्रों में मृतकों के साथ वुफछ सामान भी रखे जाते थे। मेहरगढ़ में ऐसी कइर् कब्रें मिली हैं। एक कब्र में एक मृतक के साथ एक बकरी को भी दप.फनाया गया था। संभवतः इसे परलोक में मृतक के खाने के लिए रखा गया होगा। 29 ऽ भोजनः संग्रह से उत्पादन तक ;खद्ध दाओजली हेडिंग मानचित्रा 2 ;पृष्ठ 14द्ध में दाओजली हेडिंग ढूँढ़ो। यह पुरास्थल चीन और म्यांमार की ओर जाने वाले रास्ते में ब्रह्मपुत्रा की घाटी की एक पहाड़ी पर है। यहाँ खरल और मूसल जैसे पत्थरों के उपकरण मिले हैं। इससे पता चलता है कि यहाँ लोग भोजन के लिए अनाज उगाते थे। साथ ही यहाँ से जेडाइट पत्थर भी मिला है। संभवतः यह पत्थर चीन से आया होगा। इसके अतिरिक्त इस पुरास्थल से काष्ठाश्म ;अति प्राचीन लकड़ी, जो सख्त होकर पत्थर बन गइर् हैद्ध के औशार और बतर्न भी मिले हैं। अन्यत्रा एटलस में तुकीर् ढूँढ़ो। नवपाषाण युग के सबसे प्रसि( पुरास्थलों में एक चताल ह्यूक तुकीर् में है। यहाँ दूर - दराज स्थानों से कइर् चीशें लाइर् जाती थीं और उनका उपयोग किया जाता था। जैसे सीरिया से लाया गया चकमक पत्थर, लाल सागर की कौडि़याँ तथा भूमध्य सागर की सीपियाँ। ध्यान रहे कि उस समय तक पहिए वाले वाहन का विकास नहीं हुआ था। लोग सामान खुद या जानवरों की पीठ पर लादकर ले जाया करते थे। बताओ कौडि़यों तथा सीपियों का क्या उपयोग होता होगा? कल्पना करो अगर तुम्हारे पास शमीन का एक छोटा - सा टुकड़ा हो तो तुम उसमें कौन - सी प.फसल उगाओगी। बीज कहाँ से मिलेंगे? और तुम उन्हें वैफसे बोओगी? अपने पौधें की देखभाल तुम वैफसे करोगी? और वैफसे यह समझोगी कि अब प.फसल काटने लायक हो गइर् है? ऽ बसने की प्रिया का1ण् खेती करने वाले लोग एक ही स्थान पर लंबे समय तक क्यों रहते थे? आरंभ ;लगभग 2ण् पृष्ठ 25 की तालिका को देखो। नेइनुओ अगर चावल खाना चाहती है, तो उसे 12,000 साल पहलेद्ध किन स्थानों पर जाना चाहिए। ऽ मेहरगढ़ में बस्ती का आरंभ3ण् पुरातत्त्वविद् ऐसा क्यों मानते हैं कि मेहरगढ़ के लोग पहले केवल श्िाकारी थे, ;लगभग 8000 सालऔर बाद में उनके लिए पशुपालन श्यादा महत्वपूणर् हो गया? पहलेद्ध 4ण् सही या गलत बताओ। ;कद्ध हल्लूर मंे ज्वार - बाजरा मिला है। ;खद्ध बुशर्होम में लोग आयताकार घरों में रहते थे। ;गद्ध चिराँद कश्मीर का एक पुरास्थल है। ;घद्ध जेडाइट, जो दाओजली हेडिंग में मिला है, चीन से लाया गया होगा। 5ण् कृषकों - पशुपालकों का जीवन आखेटक - खाद्य संग्राहकों के जीवन से कितना भ्िान्न था, तीन अंतर बताओ। 6ण् पृष्ठ 25 की तालिका में दिए गए जानवरों की एक सूची बनाओ और यह भी बताओ कि इनका उपयोग किस रूप में किया जाता था। 7ण् तुम जिन अनाजों को खाते हो उनकी एक सूची बनाओ। 8ण् प्रश्न 7 के उत्तर में लिखे अनाजों को क्या तुम स्वयं उगाते हो? अगर हाँ, तो एक तालिका बनाकर उसकी खेती की विभ्िान्न अवस्थाओं को दिखाओ। अगर नहीं, तो एक तालिका बनाकर दिखाओ कि ये अनाज किसान से लेकर तुम्हारे पास तक वैफसे पहुँचे। 31 ऽ भोजनः संग्रह से उत्पादन तक

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