वैफसे पता लगाएँ? यह जानने के लिए कि कल क्या हुआ था, तुम रेडियो सुन सकते हो, टेलीविशन देख सकते हो या पिफर अख़बार पढ़ सकते हो। साथ ही यह जानने के लिए कि पिछले साल क्या हुआ था, तुम किसी ऐसे व्यक्ित से बात कर सकते हो जिसे उस समय की स्मृति हो। लेकिन बहुत पहले क्या हुआ था यह वैफसे जाना जा सकता है? अतीत के बारे में हम क्या जान सकते हैं? अतीत के बारे में बहुत वुफछ जाना जा सकता है - जैसे लोग क्या खाते थे, वैफसे कपड़े पहनते थे, किस तरह के घरों में रहते थे? हम आखेटकों ;श्िाकारियोंद्ध, पशुपालकों, वृफषकों, शासकों, व्यापारियों, पुरोहितों, श्िाल्पकारों, कलाकारों, संगीतकारों या पिफर वैज्ञानिकों के जीवन के बारे में जानकारियाँ हासिल कर सकते हैं। यही नहीं हम यह भी पता कर सकते हैं कि उस समय बच्चे कौन - से खेल खेलते थे, कौन - सी कहानियाँ सुना करते थे, कौन - से नाटक देखा करते थे या पिफर कौन - कौन से गीत गाते थे। लोग कहाँ रहते थे? मानचित्रा 1 ;पृष्ठ 2द्ध में नमर्दा नदी का पता लगाओ। कइर् लाख वषर् पहले से लोग इस नदी के तट पर रह रहे हैं। यहाँ रहने वाले आरंभ्िाक लोगों में से वुफछ वुफशल संग्राहक थे जो आस - पास के जंगलों की विशाल संपदा से परिचित थे। अपने भोजन के लिए वे जड़ों, पफलों तथा जंगल के अन्य उत्पादों का यहीं से संग्रह किया करते थे। वे जानवरों का आखेट ;श्िाकारद्ध भी करते थे। 1 ऽ अब तुम उत्तर - पश्िचम की सुलेमान और किरथर पहाडि़यों का पता लगाओ। इसी क्षेत्रा में वुफछ ऐसे स्थान हैं जहाँ लगभग आठ हशार वषर् पूवर् स्त्राी - पुरुषों ने सबसे पहले गेहूँ तथा जौ जैसी पफसलों को़उपजाना आरंभ किया। उन्होंने भेड़, बकरी और गाय - बैल जैसे पशुओं को पालतू बनाना शुरू किया। ये लोग गाँवों में रहते थे। उत्तर - पूवर् में गारो तथा मध्य भारत में ¯वध्य पहाडि़यों का पता लगाओ। ये वुफछ अन्य ऐसे क्षेत्रा थे जहाँ वृफष्िा का विकास हुआ। जहाँ सबसे पहले चावल उपजाया गया वे स्थान ¯वध्य के उत्तर में स्िथत थे। „ 2 हमारे अतीतदृप् मानचित्रा पर ¯सध्ु तथा इसकी सहायक नदियों का पता लगाने का प्रयास करो। सहायक नदियाँ उन्हें कहते हैं जो एक बड़ी नदी में मिल जाती हैं। लगभग 4700 वषर् पूवर् इन्हीं नदियों के किनारे वुफछ आरंभ्िाक नगर पफले - पूफले। गंगा व इसकी सहायक नदियों के किनारे तथा समुद्र तटवत्तीर् इलाकों में नगरों का विकास लगभग 2500 वषर् पूवर् हुआ। गंगा तथा इसकी सहायक नदी सोन का पता लगाओ। गंगा के दक्ष्िाण में इन नदियों के आस - पास का क्षेत्रा प्राचीन काल में ‘मगध्’ नाम से जाना जाता था। इसके शासक बहुत शक्ितशाली थे और उन्होंने एक विशाल राज्य स्थापित किया था। देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे राज्यों की स्थापना की गइर् थी। लोगों ने सदैव उपमहाद्वीप के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक यात्रा की। कभी - कभी हिमालय जैसे ऊँचे पवर्तों, पहाडि़यों, रेगिस्तान, नदियांे तथा समुद्रों के कारण यात्रा जोख्िाम भरी होती थी, पिफर भी ये यात्रा उनके लिए असंभव नहीं थीं। अतः कभी लोग काम की तलाश में तो कभी प्रावृफतिक आपदाओं के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे। कभी - कभी सेनाएँ दूसरे क्षेत्रों पर विजय हासिल करने के लिए जाती थीं। इसके अतिरिक्त व्यापारी कभी काप्ि़ाफले में तो कभी जहाशों में अपने साथ मूल्यवान वस्तुएँ लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहते थे। ध£मक गुरू लोगों को श्िाक्षा और सलाह देते हुए एक गाँव से दूसरे गाँव तथा एक कसबे से दूसरे कसबे जाया करते थे। वुफछ लोग नए और रोचक स्थानों को खोजने की चाह में उत्सुकतावश भी यात्रा किया करते थे। इन सभी यात्राओं से लोगों को एक - दूसरे के विचारों को जानने का अवसर मिला। आज लोग यात्राएँ क्यों करते हैं? एक बार पिफर से मानचित्रा 1 को देखो। पहाडि़याँ, पवर्त और समुद्र इस उपमहाद्वीप की प्रावृफतिक सीमा का निमार्ण करते हैं। हालांकि लोगों के लिए इन सीमाओं को पार करना आसान नहीं था, जिन्होंने ऐसा चाहा वे ऐसा कर सके, वे पवर्तों की ऊँचाइर् को छू सके तथा गहरे समुद्रों को पार कर सके। उपमहाद्वीप के बाहर से भी वुफछ लोग यहाँ आए और यहीं बस गए। लोगों के इस आवागमन ने हमारी सांस्वृफतिक परंपराओं को समृ( मानचित्रा 1 दक्ष्िाण एश्िाया ;आध्ुनिक भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंकाद्ध और अपफगानिस्तान, इर्रान,़चीन तथा म्यांमार आदि पड़ोसी देशों को दशार्ता है। दक्ष्िाण एश्िाया एक महाद्वीप से छोटा है, लेकिन विशालता तथा बाकी एश्िाया से समुद्रों, पहाडि़यों तथा पवर्तों से बँटे होने के कारण इसे प्रायः उपमहाद्वीप कहा जाता है। 3 ऽ ताड़पत्रों से बनी पाण्डुलिपि का एक पृष्ठ यह पाण्डुलिपि लगभग एक हशार वषर् पहले लिखी गइर् थी। किताब बनाने के लिए ताड़ केपत्तों को काटकर उनके अलग - अलग हिस्सों को एक साथ बाँध् दिया जाता था। भूजर् पेड़ की छाल से बनी ऐसी ही एक पाण्डुलिपि को तुम यहाँ देख सकते हो। किया। कइर् सौ वषो± से लोग पत्थर को तराशने, संगीत रचने और यहाँ तक कि भोजन बनाने के नए तरीकों के बारे में एक - दूसरे के विचारों को अपनाते रहे हैं। देश के नाम अपने देश के लिए हम प्रायः इण्िडया तथा भारत जैसे नामों का प्रयोग करते हैं। इण्िडया शब्द इण्डस से निकला है जिसे संस्वृफत में सिंध्ु कहा जाता है। अपने एटलस में इर्रान और यूनान का पता लगाओ। लगभग 2500 वषर् पूवर् उत्तर - पश्िचम की ओर से आने वाले इर्रानियों और यूनानियों ने ¯सध्ु को ¯हदोस अथवा इंदोस और इस नदी के पूवर् में स्िथत भूमि प्रदेश को इण्िडया कहा। भरत नाम का प्रयोग उत्तर - पश्िचम में रहने वाले लोगों के एक समूह के लिए किया जाता था। इस समूह का उल्लेख संस्वृफत की आरंभ्िाक ;लगभग 3500 वषर् पुरानीद्ध वृफति )ग्वेद में भी मिलता है। बाद में इसका प्रयोग देश के लिए होने लगा। अतीत के बारे में वैफसे जानें? अतीत की जानकारी हम कइर् तरह से प्राप्त कर सकते हैं। इनमें से एक तरीका अतीत में लिखी गइर् पुस्तकों को ढूँढ़ना और पढ़ना है। ये पुस्तवेंफ हाथ से लिखी होने के कारण पाण्डुलिपि कही जाती हंै। अंग्रेशी में ‘पाण्डुलिपि’ के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘मैन्यूस्िक्रप्ट’ शब्द लैटिन शब्द ‘मेनू’ जिसका अथर् हाथ है, से निकला है। ये पाण्डुलिपियाँ प्रायः ताड़पत्रों अथवा हिमालय क्षेत्रा में उगने वाले भूजर् नामक पेड़ की छाल से विशेष तरीके से तैयार भोजपत्रा पर लिखी मिलती हैं। „ 4 हमारे अतीतदृप् इतने वषो± में इनमें से कइर् पाण्डुलिपियों को कीड़ों ने खा लिया तथा वुफछ नष्ट कर दी गईं। पिफर भी ऐसी कइर् पाण्डुलिपियाँ आज भी उपलब्ध् हैं। प्रायः ये पाण्डुलिपियाँ मंदिरों और विहारों में प्राप्त होती हैं। इन पुस्तकों में ध£मक मान्यताओं व व्यवहारों, राजाओं के जीवन, औषध्ियों तथा विज्ञान आदि सभी प्रकार के विषयों की चचार् मिलती है। इनके अतिरिक्त हमारे यहाँ महाकाव्य, कविताएँ तथा नाटक भी हैं। इनमें से कइर् संस्वृफत में लिखे हुए मिलते हैं जबकि अन्य प्रावृफत और तमिल में हैं। प्रावृफत भाषा का प्रयोग आम लोग करते थे। हम अभ्िालेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं। ऐसे लेख पत्थर अथवा धतु जैसी अपेक्षावृफत कठोर सतहों पर उत्कीणर् किए गए मिलते हैं। कभी - कभी शासक अथवा अन्य लोग अपने आदेशों को इस तरह उत्कीणर् करवाते थे, ताकि लोग उन्हें देख सवेंफ, पढ़ सवेंफ तथा उनका पालन कर सवेंफ। वुफछ अन्य प्रकार के अभ्िालेख भी मिलते हैं जिनमें राजाओं तथा रानियों सहित अन्य स्त्राी - पुरुषों ने भी अपने कायो± के विवरण उत्कीणर् करवाए हैं। उदाहरण के लिए प्रायः शासक लड़ाइयों में अ£जत विजयों का लेखा - जोखा रखा करते थे। क्या तुम बता सकती हो कि कठोर सतह पर लेख लिखवाने के क्या लाभ थे? ऐसा करवाने में क्या - क्या कठिनाइयाँ आती थीं? इसके अतिरिक्त अन्य कइर् वस्तुएँ अतीत में बनीं और प्रयोग में लाइर् जाती थीं। ऐसी वस्तुओं का अध्ययन करने वाला व्यक्ित पुरातत्त्वविद् कहलाता है। पुरातत्त्वविद् पत्थर और ईंट से बनी इमारतों के अवशेषों, चित्रों तथा मू£तयों का अध्ययन करते हैं। वे औशारों, हथ्िायारों, बतर्नों, आभूषणों लगभग 2250 वषर् पुराना यह़अभ्िालेख वतर्मान अपफगानिस्तान के वंफधर से प्राप्त हुआ है। यह अभ्िालेख अशोक नामक शासक के आदेश पर लिखा गया था। इस शासक के विषय में तुम अध्याय 8 में पढ़ोगी। जब हम वुफछ लिखते हैं तब हम किसी लिपि का प्रयोग करते हैं। लिपियाँ अक्षरों अथवा संकेतों से बनी होती हैं। जब हम वुफछ बोलते अथवा पढ़ते हैं तब हम एक भाषा का प्रयोग करते हैं। यह अभ्िालेख इस क्षेत्रा में प्रयुक्त होने वाली यूनानी तथा अरामेइक नामक दो भ्िान्न लिपियों तथा भाषाओं में है। 5 ऽ बाएँः एक प्राचीन नगर से प्राप्त पात्रा। इस तरह के पात्रों का प्रयोग 4700 वषर् पूवर् होता था। दाएँः एक पुराना चाँदी का सिक्का। इस तरह के सिक्कों का प्रयोग लगभग 2500 वषर् पूवर् होता था। हमारे द्वारा आज प्रयोग में आने वाले सिक्कों से यह सिक्का वैफसे भ्िान्न है? „ 6 हमारे अतीतदृप् तथा सिक्कों की प्राप्ित के लिए छान - बीन तथा खुदाइर् भी करते हैं। इनमें से वुफछ वस्तुएँ पत्थर, पकी मि‘ी तथा वुफछ धतु की बनी हो सकती हैं।ऐसे तत्त्व कठोर तथा जल्दी नष्ट न होने वाले होते हैं। पुरातत्त्वविद् जानवरों, चिडि़यों तथा मछलियों की हिóयाँ भी ढूँढ़ते हैं। इससे उन्हें यह जानने में भी मदद मिलती है कि अतीत में लोग क्या खाते थे। वनस्पतियों के अवशेष बहुत मुश्िकल से बच पाते हैं। यदि अन्न के दाने अथवा लकड़ी के टुकड़े जल जाते हैं तो वे जले हुए रूप में बचे रहते हैं।क्या पुरातत्त्वविदों को बहुध कपड़ों के अवशेष मिलते होंगे? पाण्डुलिपियों, अभ्िालेखों तथा पुरातत्त्व से ज्ञात जानकारियों के लिए इतिहासकार प्रायः स्रोत शब्द का प्रयोग करते हैं। इतिहासकार उन्हें कहते हैं जो अतीत का अध्ययन करते हैं। स्रोत के प्राप्त होते ही अतीत के बारे में पढ़ना बहुत रोचक हो जाता है, क्योंकि इन स्रोतों की सहायता से हम ध्ीरे - ध्ीरे अतीत का पुन£नमार्ण करते जाते हैं। अतः इतिहासकार तथापुरातत्त्वविद् उन जासूसों की तरह हैं जो इन सभी स्रोतों का प्रयोग सुराग के रूप में कर अतीत को जानने का प्रयास करते हैं। अतीत, एक या अनेक? क्या तुमने इस पुस्तक के शीषर्क हमारे अतीत पर ध्यान दिया है? यहाँ ‘अतीत’ शब्द का प्रयोग बहुवचन के रूप में किया गया है। ऐसा इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाने के लिए किया गया है कि अलग - अलग समूह के लोगों के लिए इस अतीत के अलग - अलग मायने थे। उदाहरण के लिए पशुपालकों अथवा वृफषकों का जीवन राजाओं तथा रानियों के जीवन से तथा व्यापारियों का जीवन श्िाल्पकारों के जीवन से बहुत भ्िान्न था। जैसाकि हम आज भी देखते हैं, उस समय भी देश के अलग - अलग हिस्सों में लोग अलग - अलग व्यवहारों और रीति - रिवाशों का पालन करते थे। उदाहरण के लिए आज अंडमान द्वीप के अध्िकांश लोग अपना भोजन मछलियाँ पकड़ कर, श्िाकार करके तथा पफल - पूफल के संग्रह द्वारा प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत शहरों में रहने वाले लोग खाद्य आपू£त के लिए अन्य व्यक्ितयों पर निभर्र करते हैं। इस तरह के भेद अतीत में भी विद्यमान थे। इसके अतिरिक्त एक अन्य तरह का भेद है। उस समय शासक अपनी विजयों का लेखा - जोखा रखते थे। यही कारण है कि हम उन शासकों तथा उनके द्वारा लड़ी जाने वाली लड़ाइयों के बारे में कापफी वुफछ जानते हैं। जबकि श्िाकारी, मछुआरे, संग्राहक, वृफषक अथवा पशुपालक जैसे आम आदमी प्रायः अपने कायो± का लेखा - जोखा नहीं रखते थे। पुरातत्त्व की सहायता से हमें उनके जीवन को जानने में मदद मिलती है। हालांकि अभी भी इनके बारे में बहुत वुफछ जानना शेष है। तिथ्िायों का मतलब अगर कोइर् तुमसे तिथ्िा के विषय में पूछे तो तुम शायद उस दिन की तारीख, माह, वषर् जैसे कि 2000 या इसी तरह का कोइर् और वषर् बताओगी। वषर् की यह गणना इर्साइर् धमर् - प्रवतर्क इर्सा मसीह के जन्म की तिथ्िा से की जाती है। अतः 2000 वषर् कहने का तात्पयर् इर्सा मसीह के जन्म के 2000 वषर् के बाद से है। इर्सा मसीह के जन्म के पूवर् की सभी तिथ्िायाँ इर्.पू. ;इर्सा से पहलेद्ध के रूप में जानी जाती हंै। इस पुस्तक में हम 2000 को अपना आरंभ्िाक बिन्दु मानते हुए वतर्मान से पूवर् की तिथ्िायों का उल्लेख करेंगे। 7 ऽ इतिहास और तिथ्िायाँ अंग्रेशी में बी.सी. ;¯हदी में इर्.पू.द्ध का तात्पयर् ‘बिप़्ाफोर क्राइस्ट’ ;इर्सा पूवर्द्ध होता है। कभी - कभी तुम तिथ्िायों से पहले ए.डी. ;¯हदी में इर्.द्ध लिखा पाती हो। यह ‘एनो डाॅमिनी’ नामक दो लैटिन शब्दों से बना है तथा इसका तात्पयर् इर्सा मसीह के जन्म के वषर् से है। कभी - कभी ए.डी. की जगह सी.इर्. तथा बी.सी. की जगह बी.सी.इर्. का प्रयोग होता है। सी.इर्. अक्षरों का प्रयोग ‘काॅमन एरा’ तथा बी.सी.इर्. का ‘बिप़्ाफोर काॅमन एरा’ के लिए होता है। हम इन शब्दों का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि विश्व के अध्िकांश देशों में अब इस वैफलेंडर का प्रयोग सामान्य हो गया। भारत में तिथ्िायों के इस रूप का प्रयोग लगभग दो सौ वषर् पूवर् आरंभ हुआ था। ़कभी - कभी अंग्रेशी के बी.पी. अक्षरों का प्रयोग होता है जिसका तात्पयर् ‘बिपफोर प्रेजेन्ट’ ;वतर्मान से पहलेद्ध है। पृष्ठ 3 पर दो तिथ्िायाँ हैं, उनका पता लगाओ। इनके लिए तुम किस अक्षर समूह का प्रयोग करोगी? अन्यत्रा जैसाकि हमने पहले पढ़ा, अभ्िालेख कठोर सतहों पर उत्कीणर् करवाए जाते हैं। इनमें से कइर् अभ्िालेख कइर् सौ वषर् पूवर् लिखे गए थे। सभी अभ्िालेखों में लिपियों और भाषाओं का प्रयोग हुआ है। समय के साथ - साथ अभ्िालेखों में प्रयुक्त भाषाओं तथा लिपियों में बहुत बदलाव आ चुका है। विद्वान यह वैफसे जान पाते हैं कि क्या लिखा था? इसका पता अज्ञात लिपि का अथर् निकालने की एक प्रिया द्वारा लगाया जा सकता है। इस प्रकार से अज्ञात लिपि को जानने की एक प्रसि( कहानी उत्तरी अप़्रफीकी देश मिस्र से मिलती है। लगभग 5000 वषर् पूवर् यहाँ राजा - रानी रहते थे। च् ज् व् स् ड प् प् ै ज्ञ स् प् व् च् । क् ;ज्द्ध त् । „ 8 हमारे अतीतदृप् मिस्र के उत्तरी तट पर रोसे‘ा नाम का एक कसबा है। यहाँ से एक ऐसा उत्की£णत पत्थर मिला है जिस पर एक ही लेख तीन भ्िान्न - भ्िान्न भाषाओं तथा लिपियों ;यूनानी तथा मिस्री लिपि के दो प्रकारोंद्ध में है। वुफछ विद्वान यूनानी भाषा पढ़ सकते थे। उन्होंने बताया कि यहाँ राजाओं तथा रानियों के नाम एक छोटे से प्रेफम में दिखाए गए हैं। इसे ‘कारतूश’ कहा जाता है। इसके बाद विद्वानों ने यूनानी तथा मिस्री संकेतों को अगल - बगल रखते हुए मिस्री अक्षरों की समानाथर्क ध्वनियों की पहचान की। जैसाकि तुम देख सकते हो यहाँ एल अक्षर के लिए शेर तथा ए अक्षर के लिए चिडि़या के चित्रा बने हैं। एक बार, जब उन्होंने यह जान लिया कि विभ्िान्न अक्षर किनके लिए प्रयुक्त हुए हैं, तो वे आसानी से अन्य अभ्िालेखों को भी पढ़ सके। उपयोगी शब्द कल्पना करो यात्रा पाण्डुलिपितुम्हें एक पुरातत्त्वविद् का साक्षात्कार लेना है। तुम उन पाँच प्रश्नों की एक सूची अभ्िालेखतैयार करो जिन्हें तुम पुरातत्त्वविद् से पूछना चाहोगी। पुरातत्त्व इतिहासकार स्रोत अज्ञात लिपि का अथर् निकालना वुफछ महत्वपूणर् 1ण् निम्नलिख्िात का सुमेल करो: तिथ्िायाँ नमर्दा घाटी पहला बड़ा राज्य ऽ वृफष्िा का आरंभ ;8000 वषर् पूवर्द्ध मगध् आखेट तथा संग्रहण ऽ स्िंाध्ु सभ्यता के प्रथम नगर ;4700 वषर् पूवर्द्धगारो पहाडि़याँ लगभग 2500 वषर् पूवर् के नगर ऽ गंगा घाटी के नगर, मगधस्िंाध्ु तथा इसकी सहायक नदियाँ आरंभ्िाक वृफष्िा का बड़ा राज्य ;2500 वषर् पूवर्द्धगंगा घाटी प्रथम नगर ऽ वतर्मान ;लगभग 20002ण् पाण्डुलिपियों तथा अभ्िालेखों में एक प्रमुख अंतर बताओ। वषर् पूवर्द्ध 9 ऽ 3ण् रशीदा के प्रश्न को पिफर से पढ़ो। इसके क्या उत्तर हो सकते हैं? 4ण् पुरातत्त्वविदों द्वारा पाइर् जाने वाली सभी वस्तुओं की एक सूची बनाओ। इनमें से कौन - सी वस्तुएँ पत्थर की बनी हो सकती हैं? 5ण् साधरण स्त्राी तथा पुरुष अपने कायो± का विवरण क्यों नहीं रखते थे? इसके बारे में तुम क्या सोचती हो? 6ण् कम से कम दो ऐसी बातों का उल्लेख करो जिनसे तुम्हारे अनुसार राजाओं और किसानों के जीवन में भ्िान्नता का पता चलता है। 7ण् पृष्ठ 1 पर श्िाल्पकार शब्द का पता लगाओ। आज प्रचलित कम से कम पंाच भ्िान्न - भ्िान्न श्िाल्पों की सूची बनाओ। क्या ये श्िाल्पकार ;कद्ध स्त्राी, ;खद्ध पुरुष, ;गद्ध स्त्राी तथा पुरुष दोनों होते हैं? 8ण् अतीत में पुस्तवेंफ किन - किन विषयों पर लिखी गइर् थीं? तुम इनमंे से किन पुस्तकों को पढ़ना पसंद करोगी? „ 10 हमारे अतीतदृप्

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