लंका विजय लंका वूफच की तैयारियाँ रातभर चलती रहीं। सभी तत्पर। सभी उद्यत। सुबह वूफच से पहले सुग्रीव ने वानरों को संबोध्ित किया। यु( के बारे में। कहा, फ्यु( भयानक होगा। इसमें केवल वही सैनिक जाएँगे जो शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों। जो दुबर्ल हैं, यहीं रुक जाएँ।य् वानर सेना को यु( के नियम बताए गए। रक्षा और आक्रमण के तरीके। सेना कि¯ष्कध से दहाड़ती, गरजती, किलकारियाँ भरती रवाना हुइर्। राम, लक्ष्मण और सुग्रीव की जयकार से आकाश गूँज उठा। लाखों वानर थे। चारों ओर कोलाहल। वे पेड़ों - पहाड़ों को रौंदते चले जा रहे थे। इसका नेतृत्व नल कर रहे थे। सुग्रीव के सेनापति। जामवंत और हनुमान सबसे पीछे थे। यह सेना की रणनीति का हिस्सा था। दिन - रात चलकर सेना ने महेंद्र पवर्त पर डेरा डाला। वही पवर्त, जहाँ से हनुमान ने छलाँग लगाइर् थी। समुद्र निकट ही था। पवर्त पर सेना का ध्वज लगाया गया। तंबू लगे। पताकाएँ हवा में लहरा रही थीं। उध्र, लंका में खलबली मची हुइर् थी। राक्षसों में बेचैनी थी। उनके मन में डर बैठ गया था। राम की शक्ित को लेकर। जिसका दूत लंका में आग लगा सकता है, वह स्वयं कितना शक्ितशाली होगा! नगर में चचार् का विषय यही था। लेकिन रावण इससे अनभ्िाज्ञ था। उसे कौन बताता? किसी में इतना साहस नहीं था। ये चचार्एँ विभीषण ने सुनीं। नगर की हताशा उनसे देखी नहीं गइर्। फ्ऐसी हताश सेना यु( नहीं कर सकती। उसकी पराजय निश्िचत है।य् वे रावण के पास गए। उसे सही स्िथति बताने। समझाने। राम से यु( न किया जाए। उन्होंने कहा, फ्आप सीता को लौटा दें। सबका कल्याण इसी में है। सीता मिल जाएँगी तो वे आक्रमण नहीं करेंगे।य् रावण ने विभीषण की बात अनसुनी कर दी। उन्हें अपने कक्ष से निकाल दिया। क्रोध् में वह स्वयं भी उठकर चल पड़ा। सभा कक्ष की ओर। उसे राम के समुद्र तट पर पहुँचने का समाचार मिल चुका 70 बाल रामकथा था। सैनिकों ने राम की सेना की पताकाएँ दूर से देख ली थीं। विभीषण रावण के पीछे चलते रहे। बोलते रहे, फ्सीता आपके गले में बँध साँप है। वह आपको डस लेगा। इसे छोटी बात मत समझिए, लंकाध्िराज! ये संकेत महाविनाश के हैं। मैं अब भी कहता हूँ, सीता को लौटा दीजिए। लंका बच जाएगी।य् फ्तुम मेरे भाइर् नहीं, शत्राु हो। मेरे शत्राु के शुभच्िंातक हो,य् रावण का क्रोध् भड़क उठा। फ्निकल जाओ यहाँ से। मुझे तुम्हारा साथ नहीं चाहिए।य् रावण सभागार की ओर मुड़ गया। विभीषण पीछे। दोनों के रास्ते अलग हो गए। विभीषण उसी रात लंका से निकल गए। चार सहायकों के साथ। उन्होंने राम के पास जाना ठीक समझा। समुद्र पार राम के श्िाविर में अचानक खलबली मची। एक वानर चिल्लाकर सबवफो सावधन कर रहा था। फ्हमारे श्िाविर में राक्षस आ गए हैं।य् विभीषण वुफछ दूर खड़े थे। वानरों ने उन्हें सुग्रीव के सामने पेश किया। फ्वानरराज! मैं लंका के राजा रावण याचना थी। सुग्रीव को उनकी बात पर पिफर भी भरोसा नहीं हुआ। फ्मेरा नाम विभीषण है। रावण ने मुझे लंका से निकाल दिया। मैंने उससे सीता को लौटाने की बात कही थी। क्रोध् और अहंकार में चूर रावण ने मुझे सभा में अपमानित किया। मैं प्राण बचाकर आया हूँ। एक बार राम से मिलवा दें। मैं उनसे वुफछ कहना चाहता हँ।य् ू सुग्रीव राम के पास गए। मन में शंका अब भी थी। अंगद भी उसे संदेह की दृष्िट से देख रहे थे। राम ने बात सुनी और कहा, फ्हमें विभीषण को स्वीकार करना चाहिए। मैं शरण में आए व्यक्ित को कभी निराश नहीं करता। यह मेरी नीति है। विभीषण को आदर से अंदर लाइए।य् विभीषण राम के पास पहुँचे। राम ने उनका सत्कार किया। लंका का समाचार पूछा। जल्दी ही विभीषण राम के विश्वासपात्रा बन गए। उन्होंने लंका की बहुत सी जानकारी राम को दी। रावण और उसके यो(ाओं की शक्ित के बारे में बताया। कहा, फ्रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए बल और बुि का छोटा भाइर् हूँफ्विभीषण! तुम च्िंाता मत करो। राक्षस। आप मुझे उनके पास पहुँचा दें,य् विभीषण हूँ। मैं राम की शरण में आया दोनों की आवश्यकता है।य् के चेहरे पर डर नहीं था। विश्वास था। मारे जाएँगे। लंका की राजगद्दी तुम्हारी शब्दों में षड्यंत्रा नहीं था। कातरता थी। होगी। भव्िाष्य तुम्हारा है,य् राम ने कहा। राम की सेना के सामने एक बड़ी चुनौती थी। समुद्र। उसे वैफसे पार करें? राम ने समुद्र से विनती की। तीन दिन बैठे रहे कि समुद्र रास्ता दे दे। वह नहीं माना तो राम को क्रोध् आ गया। राम का क्रोध् देखते हुए समुद्र ने उन्हें सलाह दी, फ्आपकी सेना में नल नाम का एक वानर है। वह पुल बना सकता है। उससे वानर सेना पार उतर जाएगी।य् नल ने अगले ही दिन काम प्रारंभ कर 71 लंका विजय चुकी थी। पहले आक्रमण की योजनाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा था। राम ने अपनी सेना को चार भागों में विभक्त कर दिया। लंका के चार द्वार थे। चैतरप़्ाफा आक्रमण होना था। हर टुकड़ी को एक द्वार सौंपा गया। राम ने पवर्त श्िाखर पर चढ़कर स्वयं लंका का निरीक्षण किया। लंका के वैभव से वे भी चकित थे। उन्होंने लक्ष्मण को बताया। सूयोर्दय होते ही राम ने आदेश दिया, फ्लंका को ँदिया। पुल बनने लगा। वानर वश्िालाएफकड़, पत्थर, चारों ओर से घेर लिया जाए।य् वानर सेना ँलाते रहे। नल पुल बनाते रहे। पाँच जयकार करती चल पड़ी। दिन में पुल तैयार हो गया। समुद्र को दो टुकड़ों में बाँटता हुआ। उसका घमंड चूर करता हुआ। सबसे पहले विभीषण पुल से उस पार गए। पीछे - पीछे वानर सेना। सेना का अगला श्िाविर दूसरे तट पर बना। फ्असंभव!य् रावण क्रोध् से चीख उठा। समुद्र पर पुल वैफसे बन सकता है? इस समाचार से रावण को विस्मय हुआ। भय भी। लेकिन उसने जो मन में ठान लिया था, उससे डिगा नहीं। उसने आदेश दिया, फ्सेना तैयार की जाए। यु( का समय आ पहुँचा है।य् अब दोनों सेनाएँ समुद्र के एक ही ओर थीं। उनका आमना - सामना होना शेष था। आक्रमण की तैयारी थी। रणनीति बन इस बीच राम ने अंगद को बुलाया। कहा, फ्तुम लंका जाओ। मेरे दूत बनकर। सुलह का अंतिम प्रयास करो। ताकि यु( टल जाए। रावण से कहो कि सीता को लौटा दे। अन्यथा उसका अंत होगा।य् अंगद ने ऐसा ही किया। पर रावण नहीं माना। राम का संदेश सुनकर रावण क्रोध्ित हुआ। वुफछ राक्षसों ने उन पर आक्रमण किया। अंगद वहाँ से निकल भागे। राम के पास पहुँचे। कहा, फ्रावण को कोइर् पश्चाताप नहीं है। वह हमारे साथ सुलह के लिए तैयार नहीं है। यु( चाहता है। अब यु( ही एकमात्रा विकल्प है।य् वानर यु( के लिए तैयार थे। राम के आदेश की प्रतीक्षा में थे। आदेश मिलते ही उन्होंने लंका पर चढ़ाइर् कर दी। उध्र, रावण के आदेश पर उसकी मैदान छोड़कर महल की ओर दौड़ा। रावण सेना निकल पड़ी। राक्षस उतावले थे। चीत्कार कर रहे थे। रावण के जयघोष से लगा कि आसमान पफट जाएगा। वे दौडे़ और वानर सेना पर टूट पड़े। भयानक यु( हुआ। हर ओर दहला देने वाला शोर। हाथ्िायों की ¯चघाड़। घोड़ों की हिनहिनाहट। रथों की सरसराहट। कोलाहल। रथ हवा से बातें कर रहे थे। तलवारें ¯खच गईं थीं। बाणों से आसमान भर गया था। भाले उड़ रहे थे। दोनों ओर के कइर् वीर मारे गए। रावण के अनेक पराक्रमी राक्षस ढेर हो गए। ध्रती लाल हो गइर् थी। क्षत - विक्षत शव बिखरे थे। कराहते घायलों की ओर किसी का ध्यान नहीं था। शाम होने को थी। मेघनाद ने राक्षस सेना को पीछे हटते देखा। उसने अपने सैनिकों को ललकारा, फ्आगे बढ़ो! हम विजय के करीब हैं।य् मेघनाद ने सेना का नेतृत्व सँभाल लिया। राक्षस उत्साह से आगे बढ़े। मेघनाद की दृष्िट राम - लक्ष्मण पर थी। वह छिपकर यु( करता था। मायावी था। किसी को दिखाइर् नहीं पड़ता था। उसके बाण राम और लक्ष्मण को लगे। दोनों वहीं मू£च्छत होकर गिर पड़े। मेघनाद ने समझा काम हो गया। उसने दोनों भाइयों को मृत समझ लिया। वह को इसकी सूचना देने। रणक्षेत्रा में वानर राम - लक्ष्मण के पास एकत्रा हो गए। वे च्िंातित थे। अशुभ की आशंका से। विभीषण ने दोनों का उपचार कराया। उनकी मूच्छार् टूटी। वे खड़े हुए तो वानर दल हषर् - ध्वनि करने लगा। अगले दिन यु( के लिए तैयार। रावण की सेना के महाबली एक - एक कर मारे जा रहे थे। ध्ूम्राक्ष मारा गया। वज्रद्रष्ट ध्रती पर गिर पड़ा। अवंफपन वुफचल कर मर गया। प्रहस्त को नील ने ध्वस्त कर दिया। रावण को इसकी सूचनाएँ मिलती रहीं। वह घबरा गया। वह हड़बड़ाकर उठा और स्वयं कमान सँभाल ली। पहली मुठभेड़ में वह लक्ष्मण पर भारी पड़ा। लेकिन राम के बाणों ने उसका मुवुफट ध्रती पर गिरा दिया। वह लज्िजत होकर लौट गया। अब तक रावण को राम की शक्ित का वुफछ अनुमान हो गया था। जब उसे कोइर् और रास्ता नहीं सूझा तो उसने वंुफभकणर् को जगाया। वह महाबली था पर छह महीने सोता था। वंुफभकणर् दुगर् से बाहर आया। उसे देखते ही वानर सेना में खलबली मच गइर्। वे उसे रोकने में अक्षम थे। उसने हनुमान और अंगद को घायल कर दिया। लक्ष्मण यह यु( देख रहे थे। उन्होंने राम की ओर देखा। पिफर दोनों भाइयों ने बाणों की वषार् कर उसे मार दिया। वंुफभकणर् रणभूमि के अंक में सो गया। सदा के लिए। रावण निराश हो गया। वंुफभकणर् पर उसे गवर् था। वह उसे अपना दाहिना हाथ मानता था। उसे लगा कि अब लंका में वीर नहीं हैं। वह अनाथ हो गइर्। मेघनाद ने रावण को सहारा दिया, फ्मेरे रहते आप क्यों च्िंाता करते हैं? मुझे यु( की अनुमति दें। मैं दोनों भाइयों को मारकर आपके चरणों में रख दूँगा।य् मेघनाद और लक्ष्मण का भीषण यु( हुआ। मेघनाद पराक्रमी था। उसने एक बार इंद्र को परास्त कर दिया। और इंद्रजित कहलाया। उसके बाणों ने कइर् प्रमुख वानरों 75 लंका विजय आगे बढ़ना कठिन था। मेघनाद पीछे मुड़ा। महल की ओर भागा। लक्ष्मण ने वुफछ दूर तक उसका पीछा किया। पिफर रुक गए। मेघनाद महल में घुस गया। लक्ष्मण को महल की संरचना नहीं पता थी। रास्ता नहीं मालूम था। विभीषण लक्ष्मण की दुविध समझ गए। उन्होंने एक गुप्त मागर् दिखाया। शेष काम आसान था। मेघनाद महल में ही मारा गया। अपने ज्येष्ठ पुत्रा की मृत्यु से रावण एकदम टूट गया। विलाप करने लगा। मू£च्छत हो गया। होश आया तो उसकी दशा पागलों जैसी थी। क्रोध् से बिलबिलाता हुआ। फ्लंका अनाथ हो गइर्। अब उसका कोइर् सहारानहीं। अब मैं स्वयं रणक्षेत्रा में जाऊँगा।य् को घायल कर दिया। मेघनाद को रोक पाना वानरसेना के बूते की बात नहीं थी। वह चक्रवात की तरह आगे बढ़ता। जो भी आसपास होता, ध्वस्त हो जाता। वानर सेना मेघनाद की गति और शक्ितसे चकित थी। चमत्कृत। उनके मन में निराशा बैठती जा रही थी। तब लक्ष्मण ने उसे चुनौती दी। दोनों का निशाना अचूक था। बाण हवा में टकराते और नष्ट हो जाते। अचानक लक्ष्मण का एक बाण उसे लगा। वह घायल लक्ष्मण के साथ वानर सेना भी महल में प्रवेश कर गइर् थी। उनके हाथों में जलती हुइर् मशालें थीं। वानरों ने लंका में जहाँ - तहाँ आग लगा दी। अन्न भंडार पूँफक दिए। शस्त्रागार जला दिया। मारकाट मच गइर्। जो भी सामने पड़ा, मारा गया। वंफपन, प्रजंघ, यूपाक्ष, वंुफभ मारे गए। हनुमान ने निवंुफभ, देवांतक और त्रिाश्िारा को मौत की नींद सुला दिया। अंगद ने नरांतक का काम तमाम कर दिया। लक्ष्मण ने अतिकाय का सिर काट डाला। राक्षस सेना भागतोडहो गया। झुक गया। लक्ष्मण ने ताबड़़ बाणों की बरसात कर दी। खड़ी हुइर्। रावण के पास अब कोइर् विकल्प नहीं था। यु(नाद हुआ। अकेला बचा रावण यु( के लिए निकला। पुफपफकारते हुए। पफन वुफचले साँप की तरह। वह जिध्र मुड़ता, भगदड़ मच जाती। वानरों को भागते देख लक्ष्मण आगे आए। ध्नुष - बाण लिए। रावण के सामने अभेद्य दीवार की तरह खड़े हो गए। थोड़ी ही देर में विभीषण वहाँ पहुँच गए। उसके बाद राम। उनके सामने रावण की एक न चली। विभीषण को राम की सेना में देख रावण उबल पड़ा। उसके लिए यह देशद्रोह था। छोटे भाइर् का विश्वासघात। उसने विभीषण पर निशाना लगाया। लक्ष्मण ने वह बाण बीच में ही काट दिया। उसने दूसरा घातक बाण चलाया। इस बार लक्ष्मण बीच में आ गए। उन्होंने विभीषण को अपने पीछे छिपा लिया। बाण लगते ही लक्ष्मण अचेत हो गए। गिर 77 लंका विजय बुलाया। हनुमान संजीवनी बूटी लाए। चिकित्सा शुरू हुइर्। ध्ीरे - ध्ीरे रक्त का रिसाव बंद हो गया। घाव भर गया। संजीवनी का प्रभाव चमत्कारी था। सुग्रीव ने लक्ष्मण के स्वस्थ होने की सूचना राम तक पहँुचाइर्। वह स्िंाह की भाँति रावण पर टूट पड़े। राम - रावण यु( भयानक था। शस्त्रों की गति से वँफपा देने वाली ध्वनियाँ निकल रही थीं। हवा थम गइर् थी। सूरज बादलों के पीछे छिप गया था। शस्त्रों की चमक बिजली की तरह कौंध् रही थी। गड़गड़ाहट थी। थरार् देने वाली। दोनों यो(ा अपनीपूरी शक्ित से लड़ रहे थे। कोइर् एक रत्ती भी पीछे ख्िासकने को तैयार नहीं। वुफछ ही देर में लगा कि यु( समाप्त होने को है। दोनों पक्ष के यो(ा हाथ बाँध् कर खड़े हो गए। छोटे - छोटे यु( थम गए। सबकी नशरें राम और रावण पर थीं। सबकी आँखें पफटी रह गईं। पलवेंफ झुकना े़पड। राम ने यह देखा। उनकी आँखें क्रोध् से भूल गईं। उन्होंने ऐसा यु( पहले कभी लाल हो गईं। आग बरसने लगी। उन्होंने लक्ष्मण को सुग्रीव की निगरानी में छोड़ा और रावण को चुनौती दी। कहा, फ्रावण! काल तुझे मेरे सामने ले आया है। आज अन्याय पर न्याय की विजय होगी। तेरा अंत निश्िचत है।य् उध्र, हनुमान लक्ष्मण को उठाकर रणक्षेत्रा से दूर ले गए। वैद्य सुषेण को नहीं देखा था। लेकिन महासंग्राम समाप्त नहीं हुआ था। रावण का एक बाण राम को लगा। उनके रथ की ध्वजा कटकर गिर पड़ी। राम ने प्रहार किया। बाण रावण के मस्तक में लगा। रक्त की धरा बह निकली। बीच में यु( वुफछ पल के लिए रुका। रावण 78 बाल रामकथा अपने महल चला गया। घोड़े और रथ बदलने। राम को इसकी आवश्यकता नहीं पड़ी। यु( पिफर शुरू हुआ। अब उनके रथ एक - दूसरे के सामने थे। यो(ा आँखों में आँखें डालकर देख सकते थे। घोड़ों के मुँह मिल गए थे। राम के बाणों ने रावण के रथ का मुँह मोड़ दिया। यह पराजय का संकेत था। रावण हिम्मत हारने लगा। जब तक वह रथ घुमाता, राम का एक बाण उसके पार निकल गया। रथ मुड़ा। लेकिन रावण के हाथ से धनुष छूट गया। वह पृथ्वी पर गिर पड़ा। रणक्षेत्रा में केवल एक व्यक्ित दुःखी था। शोक से व्यावुफल। विलाप करता हुआ। अपने भाइर् के मृत शरीर के पास खड़ा। राम ने विभीषण को समझाया, फ्मित्रा, शोक मत करो। रावण महान यो(ा था। उसकी अंत्येष्िट महानता के अनुरूप होनी चाहिए। मृत्यु सत्य है। उसे स्वीकार करो।य् राम ने एक - एक वानर का आभार माना। सुग्रीव को गले लगा लिया। लक्ष्मण से विभीषण के राज्याभ्िाषेक की तैयारी करने को कहा। चाहते थे कि रावण की अंत्येष्िट के बाद राजतिलक हो। उसमें विलंब न किया जाए। उन्होंने हनुमान को मारा गया। बची हुइर् राक्षस सेना हडगइर्। जान बचाकर भागी। उनका दिशा - ज्ञान शून्य हो गया। जिसे जिध्र अवसर मिला, भागा। वुफछ राक्षस वानर सेना की ओर दौड़ पड़े। वुफछ भागते हुए समुद्र में जा गिरे। लंका विजय अभ्िायान पूरा हुआ। राम की जयकार होने लगी। वुफछ समय पूवर् का रणक्षेत्रा एकदम बदल गया। शस्त्रों की टंकार की जगह किलकारियों ने ले ली। वानर सेना उछल - वूफद करने लगी। समुद्र से ठंडी हवा आ रही थी। शस्त्रों से उत्पन्न गरमी वह अपने साथ बहा ले गइर्। कोलाहल तुमुलनाद में परिवतिर्त हो गया। प्रसन्नता सवर्व्याप्त थी। बड़़ा बुलाया। अशोक वाटिका जाने का निदेर्श दिया। फ्यह संदेश आपको ही सीता तक पहुँचाना है। उन्हें लंका विजय का समाचार दीजिए। उनका संदेश लेकर शीघ्र आइए।य् विभीषण के अंत्येष्िट से लौटने तक उनके राज्याभ्िाषेक की तैयारी हो चुकी थी। लक्ष्मण राजमहल पहुँच गए थे। वानर स्वणर् - कलश में समुद्र का पानी ले आए थे। लक्ष्मण विभीषण के पास गए। उन्हें साथ लेकर राज¯सहासन तक आए। सोने का चमचमाता हुआ ¯सहासन। रत्नों - मण्िायों जटित। समुद्र जल से उन्होंने सभासदों के सामने विभीषण का अभ्िाषेक किया। अब विभीषण लंका के राजा थे। 79 लंका विजय उत्सुकता बढ़ गइर्। सुग्रीव, जामवंत और नल - नील भी उत्सुक थे। अंगद को प्रतीक्षा थी। हनुमान को छोड़कर किसी ने सीता को नहीं देखा था। सीता आईं तो सबको अपनी कल्पनाओं से अध्िक लगीं। सुंदर, सौम्य, शांत। उस सुंदरता में एक वषर् बाद पति से मिलन की प्रसन्नता शामिल थी। कष्ट इतिहास हो गया था। इस बीच, हनुमान अशोक वाटिका से लौट आए। राम के पास। उन्होंने कहा, फ्माता सीता लंका विजय का समाचार सुनकर प्रसन्न हुईं। वे आपसे मिलने के लिए अध्ीर हैं।य् तब तक विभीषण वहीं आ गए थे। राम उनकी ओर मुड़े। कहा, फ्लंकापति, सीता अब भी आपकी अशोक वाटिका में हैं। उन्हें यहाँ लाने की व्यवस्था की जाए।य् वानर सेना चुहल कर रही थी। अठखेलियों में लगी थी। राम का निदेर्श सुनकर उनकी

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