राम और सुग्रीव राम और लक्ष्मण का अगला पड़ाव रहती थी। सुग्रीव स्वयं भी पहरा देता था। ऋष्यमूक पर्वत था। सुग्रीव वहीं रहते थे। इस डर से कि कहीं बाली के गुप्तचर कबंध और शबरी की बात दोनों भाइयों सैनिक वहाँ न पहुँच जाएँ। एक दिन को याद थी। दोनों ने सुग्रीव से मिलने की सुग्रीव पहाड़ी पर खड़ा था। उसने दो सलाह दी थी। कहा था कि वे सीता की युवकों को उधर आते देखा। ये दोनों खोज में सहायक होंगे। दोनों राजकुमार अवश्य बाली के गुप्तचर होंगे। मुझे मारने शीघ्रता से वहाँ पहुँचना चाहते थे। आ रहे होंगे।” सुग्रीव ने तत्काल अपने सुग्रीव का मूल निवास ऋष्यमूक पर्वत साथियों को बुलाया। नहीं था। किष्किंधा था। ऋष्यमूक में वह “हमें ऋष्यमूक छोड़ देना चाहिए। यह निर्वासन में अपना समय बिता रहे थे। स्थान अब सुरक्षित नहीं है। बाली यहाँ भी सुग्रीव किष्किधा के वानरराज के छोटे आ धमका है," सुग्रीव ने अपने साथियों पुत्र थे। बड़े भाई का नाम बाली था। पिता से कहा। “ मैंने दो युवकों को इधर आते के न रहने पर ज्येष्ठ पुत्र बाली राजा बना। देखा है। उनके हाथों में धनुष हैं।" पहले दोनों भाइयों में बहुत प्रेम था। राजकाज सुग्रीव घबराया हुआ था। पर उसके में किसी बात को लेकर मनमुटाव हुआ। प्रमुख साथी हनुमान इससे सहमत नहीं थे। फिर झगड़ा हो गया। इतना गंभीर कि “मैं जाकर पता लगाता हूँ कि वे कौन हैं। बाली सुग्रीव को मार डालने पर उतर बाली की सेना में ऐसे सैनिक नहीं हैं, आया। जान बचाने के लिए सुग्रीव को हनुमान ने भी दोनों युवकों को देख लिया ऋष्यमूक आना पड़ा। था। हनुमान पर सुग्रीव को भरोसा था। ऋष्यमूक आकर भी सुग्रीव का डर उसने बात मान ली। कम नहीं हुआ था। वह चौकस रहता था। राम और लक्ष्मण पहाड़ी पर चढ़ते-चढ़ते विश्वासपात्र वानर सेना निरंतर पहरे पर थक गए थे। वे पहाड़ी सरोवर के पास | 55 राम और सुग्रीव रुके। थकान मिटाने। मुँह-हाथ धोने। तभी भाई ने छीन ली है। दोनों के पिता भेस बदलकर हनुमान वहाँ पहुँच गए। नहीं हैं। शिष्टता से प्रणाम किया। पूछा, “आप हनुमान ने राम और लक्ष्मण को कंधे पर दोनों कौन हैं? वन में क्यों भटक रहे हैं? बैठाया। कुछ ही पल में वे ऋष्यमूक के आपका भेस मुनियों जैसा है लेकिन चेहरे शिखर पर पहुँच गए। हनुमान ने दोनों को से राजकुमार लगते हैं।" सुग्रीव से मिलाया। दोनों ने अग्नि को साक्षी “हम सुग्रीव से मिलने जा रहे हैं। हमें मानकर मित्रता का वचन लिया। सुग्रीव ने उनकी सहायता की आवश्यकता है। क्या कहा, "आज से हमारे सुख-दु:ख साझा हैं।" आप उन्हें जानते हैं?" राम ने विनम्रता से राम ने सुग्रीव को सीता-हरण के संबंध पूछा। प्रारंभिक बातचीत में ही हनुमान में बताया तो सुग्रीव अचानक उठ खड़े हुए। स्थिति भाँप गए। वे अपने मूल रूप में आ उन्हें कुछ याद आया। बोले, “वानरों ने मुझे गए। प्रणाम करते हुए बोले, “मैं हनुमान एक स्त्री के हरण की बात बताई थी। वह हूँ। सुग्रीव का सेवक। उन्होंने आपका निश्चित रूप से सीता ही रही होंगी। रावण परिचय जानने के लिए यहाँ भेजा था।” का रथ इसी पर्वत के ऊपर से गया था।” | लक्ष्मण ने उन्हें अपना परिचय दिया। वन राम और लक्ष्मण ध्यान से उनकी बात में आने का कारण बताया। यह भी बताया सुन रहे थे। सुग्रीव बोलते रहे, “सीता कि वे कबंध और शबरी की सलाह पर आए स्वयं को रावण के चंगुल से छुड़ाने का हैं। सुग्रीव से मिलने। उनसे सहायता माँगने। यत्न कर रही थीं। वानरों को देखकर | हनुमान के चेहरे पर हलकी-सी उन्होंने अपने कुछ आभूषण नीचे फेंक मुसकराहट आ गई। कोई उससे सहायता दिए थे।" गहनों की एक पोटली राम के माँगने आया है, जिसे स्वयं सहायता चाहिए। सामने रखते हुए उन्होंने कहा, “देखिए, हनुमान समझ गए। राम और सुग्रीव की क्या ये गहने सीता के हैं?" स्थिति एक जैसी है। दोनों को एक-दूसरे राम ने आभूषण तुरंत पहचान लिए। की सहायता चाहिए। वे मित्र हो सकते कुछ गहने लक्ष्मण ने भी पहचाने। गहने हैं। एक अयोध्या से निर्वासित है, दूसरा देखकर राम शोक सागर में डूब गए। किष्किंधा से। एक की पत्नी को रावण उनके मुँह से निकला, “धिक्कार है मुझे, उठा ले गया है। दूसरे की पत्नी उसके हे सीते! मैं संकट में तुम्हारी रक्षा नहीं कर 57 राम और सुग्रीव सका। मेरा पौरुष, बल, पराक्रम, ज्ञान विलंब कैसा? बाली को युद्ध के लिए तुम्हारे काम नहीं आया।" । ललकारो। किष्किंधा की राजगद्दी का निर्णय सुग्रीव ने उन्हें सांत्वना दी। “सीता उसी युद्ध में हो जाएगा। अवश्य मिल जाएँगी। मैं हर प्रकार से सुग्रीव चिंतित हो गए। युद्ध में बाली आपकी सहायता करूंगा, मित्र। रावण का को हराना असंभव था। राम बोले, “चिंता सर्वनाश निश्चित है।" | मत करो मित्र। मैं पेड़ की ओट से युद्ध | राम के बाद सुग्रीव ने अपनी व्यथा-कथा देखूगा। जब तुम पर संकट आएगा, तुम्हारी सुनाई। “बाली ने मुझे राज्य से निकाल सहायता करूंगा। बाली की मृत्यु मेरे ही दिया है। मेरी स्त्री छीन ली। मेरा वध करने बाण से होगी। वह मारा जाएगा।" की चेष्टा कर रहा है। संकट के समय योजना बनाकर सब किष्किंधा पहुँच हनुमान, नल और नील ने मेरा साथ गए। सुग्रीव आगे था। राम, लक्ष्मण और दिया। मुझे कभी नहीं छोड़ा।” उसने राम से हनुमान छिप गए थे। ‘मेरे पीछे राम की सहायता माँगी। राम बोले, "चिंता मत करो शक्ति है, सोचते हुए उसने बाली को मित्र। तुम्हें अपना राज्य भी मिलेगा और ललकारा। बाली के क्रोध की सीमा न स्त्री भी।" रही। वह गरजता हुआ निकला। आज | राम देखने में सुकुमार थे। उन्हें शिकार स्वयं मेरे मुँह तक आया है। मैं देखकर उनकी शक्ति का पता नहीं चलता तुझे नहीं छोडूंगा।" था। सुग्रीव को राम के आश्वासन पर भीषण मल्ल युद्ध हुआ। दोनों एक-दूसरे भरोसा नहीं हुआ। बाली महाबलशाली से गुँथ गए। युद्ध में बाली भारी पड़ रहा है। उसे हराना इतना आसान नहीं है। था। लगता था सुग्रीव का अंत निश्चित है। वह शाल के सात वृक्षों को एक साथ राम पेड़ के पीछे खड़े थे। धनुष हाथ में झकझोर सकता है।" था। पर उन्होंने तीर नहीं चलाया। सुग्रीव | राम ने कोई उत्तर नहीं दिया। धनुष वहाँ से किसी तरह जान बचाकर भागा। उठाया और तीर चला दिया। शाल के सीधा ऋष्यमूक पर्वत आकर रुका। राम, सातों विशाल वृक्ष एक ही बाण से कटकर लक्ष्मण और हनुमान भी लौट आए। गिर पड़े। इस शक्ति प्रदर्शन पर सुग्रीव ने सुग्रीव राम पर कुपित था। "यह धोखा हाथ जोड़ लिए। राम ने कहा, “मित्र! अब है। आपने मेरे साथ धोखा किया। समय 58 बाल रामकथा पर बाण नहीं चलाया। मैं नहीं भागता तो काम तमाम कर देता। तभी राम का बाण आज वह मुझे मार डालता।” राम की उसकी छाती में लगा। वह लड़खड़ाकर कठिनाई दूसरी थी। वे दुविधा में थे। गिर पड़ा। बाली के गिरने पर राम, उन्होंने सुग्रीव को समझाया, “तुम दोनों लक्ष्मण और हनुमान पेड़ों की ओर से भाइयों के चेहरे मिलते-जुलते हैं। दूर से बाहर निकल आए। दोनों एक जैसे लगते हो। मैं बाली को आनन-फानन में राज्याभिषेक की पहचान नहीं पाया। बिना पहचाने बाण तैयारियाँ की गईं। सुग्रीव को राजगद्दी चलाता तो वह तुम्हें भी लग सकता था। मिली। राम की सलाह पर बाली के पुत्र मैं इस चूक के लिए तैयार नहीं था। मैं अंगद को युवराज का पद दिया गया। अपने मित्र को खोना नहीं चाहता था।" राम ने सुग्रीव के लिए संबोधन बदल | लक्ष्मण ने समझा-बुझाकर सुग्रीव को दिया। राजगद्दी पर बैठने के बाद उन्हें तैयार किया। एक और युद्ध के लिए। राम 'मित्र' नहीं कहा। 'वानरराज' कहकर ने कहा, “जाओ मित्र! इस बार बाली को संबोधित किया। सुग्रीव का मन था कि पहचानने में चूक नहीं होगी। इस बार राम कुछ समय वहीं रहें। उनके साथ। उसका अंत निश्चित है।” सुग्रीव डरा हुआ राम ने मना कर दिया। कहा, “यह पिता था। घबराहट थी। पर राम के कहने पर की आज्ञा के विरुद्ध होगा। उन्होंने मुझे तैयार हो गया। | वनवास दिया है। मैं वन में ही रहूँगा।" किष्किंधा पहुँचकर उसने बाली को राम किष्किंधा से लौट आए। वर्षा चुनौती दी। ललकारा। बाली को सुग्रीव का ऋतु के कारण आगे जाना कठिन था। यह साहस समझ में नहीं आया। वह अंत:पुर लंकारोहण कुछ समय के लिए स्थगित में था। अपनी पत्नी रानी तारा के साथ। कर दिया गया। इस अवधि में वे प्रश्रवण बाली जाने लगा तो तारा ने उसे समझाने का पहाड़ पर रहे। प्रयास किया। जाने से मना किया। बाली ने वर्षा ऋतु बीत गई। राम प्रतीक्षा कर उसकी बात नहीं मानी। पैर पटकता बाहर रहे थे। सुग्रीव की वानरसेना की। सीता आया। क्रोध से उबल रहा था। की खोज के लिए। सुग्रीव ने राजतिलक बाली ने हाथ हवा में उठाया। मुट्ठी के दिन राम को इसका आश्वासन दिया भिंची हुई थी। वह एक घूसे से सुग्रीव का था। लेकिन वह अपना वचन भूल गए। 59 राम और सुग्रीव राग-रंग में उलझ गए। राम चिंतित थे। रुके। तुरंत निकल पड़े। लक्ष्मण के दुःखी भी। पीछे-पीछे।। | हनुमान को सुग्रीव का वचन याद था। राम के सामने जाकर भयभीत वानरराज राजतिलक के दिन वे वहीं थे। उन्होंने ने उनसे क्षमा माँगी। अपनी चूक के लिए। सुग्रीव को याद दिलाया। सुग्रीव ने राम ने उन्हें उठाकर गले लगा लिया। राम वानरसेना एकत्र करने का आदेश दिया। और सुग्रीव बात कर ही रहे थे कि उछलकूद यह काम सेनापति नल को सौंपा गया। करती वानर टोलियाँ वहाँ आ पहुँचीं। हनुमान पंद्रह दिन और बीत गए। लेकिन सेना राम के साथ लाखों वानर थे। जामवंत के पीछे के पास नहीं पहुँची। भालुओं की सेना। | राम सुग्रीव के इस व्यवहार से क्षुब्ध इसके बाद लंकारोहण की योजना बनी। थे। क्रोध में उन्होंने सुग्रीव के विनाश तक वानरों को चार टोलियों में बाँटा गया। की बात कही। राम को चिंतित देख लक्ष्मण अंगद को दक्षिण जाने वाले अग्रिम दल से न रहा गया। उन्होंने धनुष उठाया तो का नेता बनाया गया। उस दल में हनुमान, राम ने उन्हें रोक दिया। कहा, “सुग्रीव को नल और नील भी थे। राम की यही इच्छा बस समझाना है। वह हमारा मित्र है।" थी। उन्होंने कहा, “वानरों की सेना भेजने लक्ष्मण किष्किंधा चले गए। सुग्रीव को से पहले चतुर और बुद्धिमान दूतों को समझाने। वहाँ पहुँचकर उन्होंने धनुष पर लंका भेजा जाए। यही उचित है।" प्रत्यंचा चढ़ाई। डोरी खींचकर छोड़ी। उसकी राम और सुग्रीव की जय-जयकार करते टंकार से सुग्रीव काँप गया। वानर अपनी निर्धारित दिशाओं की ओर | धनुष की टंकार सुनते ही उसे राम चल पड़े। दक्षिण जाने वाले दल को राम को दिया वचन पुनः याद आ गया। तारा ने रोक लिया। उन्होंने हनुमान को अपने ने सलाह दी कि वे तत्काल जाकर राम पास बुलाया। अपनी उँगली से अँगूठी से मिले। क्षमा याचना करें। सुग्रीव ने उतारकर उन्हें दे दी। अँगूठी पर राम का ऐसा ही किया। राम के पास जाने से पूर्व चिह्न था। उन्होंने कहा, “जब सीता से भेंट सुग्रीव ने हनुमान को आवश्यक निर्देश हो तो यह अँगूठी उन्हें दे देना। वे इसे दिए। वानर सेना एकत्र करने का आदेश। पहचान जाएँगी। समझ जाएँगी तुम्हें मैंने इस बार सुग्रीव सेना एकत्र होने तक नहीं भेजा है। तुम मेरे दूत हो।" 60 बाल रामकथा दक्षिण की टोली किष्किंधा से चली। करेगा? कैसे करेगा? अंगद उदास हो गए। अंगद और हनुमान आगे-आगे चल रहे लक्ष्य सामने था। पर विकट था। उन्हें थे। चलते-चलते वे ऐसे स्थान पर पहुँच कुछ सूझ नहीं रहा था। बूढ़ा संपाति उनकी गए, जिसके आगे भूमि नहीं थी। केवल सहायता कर सकता था। पर इस आयु में जल था। विशाल समुद्र। उसकी गहराई इतनी लंबी उड़ान संभव नहीं थी। अथाह थी। लहरों की गरज कँपा देती थी। वानर दल असमंजस में पड़ गया। समुद्र को देखकर सबका साहस जवाब दे अंगद ने पहले ही कह दिया था कि काम गया। वानर थक-हारकर वहीं बैठ गए। पूरा किए बिना कोई किष्किधा वापस नहीं वानर राम के बारे में चर्चा करने लगे। जाएगा। वे न आगे जा सकते थे, न पीछे। अंगद ने कहा, "राम की सेवा में प्राण भी वे एक-दूसरे की ओर देख रहे थे। इस चले जाएँ तो दुख नहीं होगा। जटायु ने दल में सबसे बुद्धिमान जामवंत थे। सब । अपनी जान दे दी। हम भी पीछे नहीं उनके पास गए। उनके पास भी इस कठिन हटेंगे।" • प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। तभी एक विशाल गिद्ध पहाड़ी के पीछे तभी जामवंत की दृष्टि हनुमान पर से निकला। वह जटायु का भाई था। संपाति। पड़ी। वे सबसे दूर बैठे थे। चुपचाप। जामवंत उसने कहा, “सीता लंका में हैं। मैं जानता जानते थे कि यह काम हनुमान कर सकते हूँ। रावण उन्हें लेकर गया है। आप लोगों हैं। वे पवन-पुत्र हैं। उनकी शक्ति अपार है। को यह समुद्र पार करना होगा। सीता तक लेकिन उन्हें स्वयं इसका अनुमान नहीं है। पहुँचने का बस यही एक रास्ता है।" उनकी सोई हुई शक्ति जामवंत ने जगाई। सीता की सूचना मिलने से प्रसन्न हुआ कहा, "हनुमान! आपको जाना होगा। यह वानर दल फिर निराश हो गया। समुद्र कार्य केवल आप कर सकते हैं।” सबकी सामने था। विकराल था। उसे कौन पार आँखें उन्हीं पर टिक गईं।

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