चित्रावूफट में भरत भरत केकय राज्य में थे। अपनी ननिहाल में। अयोध्या की घटनाओं से सवर्था अनभ्िाज्ञ। लेकिन वे च्िंातित थे। उन्होंने एक सपना देखा था। पर उसका अथर् पूरी तरह नहीं समझ पा रहे थे। संगी - साथ्िायों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, फ्मैं नहीं जानता कि उसका अथर् क्या है? पर सपने से मुझे डर लगने लगा है। मैंने देखा कि समुद्र सूख गया। चंद्रमा ध्रती पर गिर पड़े। वृक्ष सूख गए। एक राक्षसी पिता को खींचकर ले जा रही है। वे रथ पर बैठे हैं। रथ गध्े खींच रहे हैं।य् जिस समय भरत मित्रों को अपना सपना सुना रहे थे, ठीक उसी समय अयोध्या से घुड़सवार दूत वहाँ पहुँचे। घुड़सवारों ने छोटा रास्ता चुना था। जल्दी पहुँचने के लिए। भरत को संदेश मिला। वे तत्काल अयोध्या जाने के लिए तैयार हो गए। ननिहाल में भरत का मन नहीं लग रहा था। उचट गया था। वे अयोध्या पहुँचने को उतावले थे। केकयराज ने भरत को विदा किया। सौ रथों और सेना के साथ। उन्हें घुड़सवारों से अध्िक समय लगा। लंबा रास्ता पकड़ना पड़ा। सेना और रथ खेतों से होकर नहीं जा सकते थे। वे आठ दिन बाद अयोध्या पहुँचे। नदी - पवर्त लाँघते। थके हुए। और च्िंातित। भरत ने अयोध्या नगरी को दूर से देखा। नगर उन्हें सामान्य नहीं लगा। बदला - बदला सा था। अनिष्ट की आशंका उनके मन में और गहरी हो गइर्। फ्यह मेरी अयोध्या नहीं है? क्या हो गया है इसे?य् उन्होंने पूछा। फ्सड़वेंफ सूनी हैं। बाग - बगीचे उदास हैं। सब लोग कहाँ गए? वह तुमुलनाद कहाँ है? पक्षी भी कलरव नहीं कर रहे हैं। इतनी चुप्पीक्यों?य् किसी ने भरत के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। नगर पहुँचते ही भरत सीध्े राजभवन गए। महाराज दशरथ के प्रासाद की ओर। महाराज वहाँ नहीं थे। पिफर वे वैफकेयी के महल की ओर बढ़े। माँ ने आगे बढ़कर पुत्रा को गले लगा लिया। परंतु भरत की आँखें पिता को ढूँढ़ रहीं थीं। उन्होंने माँ से पूछा। फ्पुत्रा! तुम्हारे पिता चले गए हैं। वहाँ, जहाँ एक दिन हम सबको जाना है। उनका निध्न हो गया।य् भरत यह सुनते ही शोक में डूब गए। पछाड़ खाकर गिर पड़े। विलाप करने लगे। माँ वैफकेयी ने उन्हें उठाया। ढाढ़स बँधया। कहा, फ्उठो पुत्रा! यशस्वी वुफमार शोक नहीं करते। तुम्हारा इस प्रकार दुःखी होना उचित नहीं है। राजगुणों के विरु( है। अपने को सँभालो।य् क्या से क्या हो गया! भरत यह मानकर चल रहे थे कि पिता राज्याभ्िाषेक की तैयारियों में व्यस्त होंगे। सब वुफछ उलटा हो गया। फ्उन्होंने मेरे लिए कोइर् संदेश दिया?य् भरत ने माँ से पूछा। फ्नहीं, अंतिम समय में उनके मुँह से केवल तीन शब्द निकले। हे राम! हे सीते! हे लक्ष्मण! तुम्हारे लिए वुफछ नहीं कहा।य् भरत व्यावुफल थे। विकलता बढ़ती ही जा रही थी। वह तुरंत राम के पास जाना चाहते थे। फ्महाराज ने उन्हें वनवास दे दिया है। चैदह वषर् के लिए। सीता और लक्ष्मण भी राम के साथ गए हैंै।य् वैफकेयी ने भरत का मन पढ़ते हुए कहा। वह जानती थीं कि भरत यहाँ से सीध्े राम के पास ही जाएँगे। फ्परंतु वनवास क्यों? भ्राता राम से कोइर् अपराध् हुआ?य् 27 चित्रावूफट में भरत फ्राम ने कोइर् अपराध् नहीं किया। महाराज ने उन्हें दंड भी नहीं दिया। इसके लिए मैंने महाराजा दशरथ से प्राथर्ना की थी। मुझे तुम्हारे हित में यही उचित लगा। मैं तुम्हारा अहित नहीं देख सकती थी,य् वैफकेयी ने कहा। वरदान की पूरी कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा, फ्उठो पुत्रा! राजगद्दी सँभालो। अयोध्या का निष्वंफटक राज्य अब तुम्हारा है।य् भरत अपना क्रोध् रोक नहीं सके। चीख पड़े, फ्यह तुमने क्या किया, माते! ऐसा अनथर्! घोर अपराध्! अपराध्िनी हो तुम। वन तुम्हें जाना चाहिए था, राम को नहीं। मेरे लिए यह राज अथर्हीन है। पिता को खोकर। भाइर् से बिछड़कर। नहीं चाहिए मुझे ऐसा राज्य।य् इस बीच मंत्राीगण और सभासद भी वहाँ आ गए। भरत बोलते रहे, फ्तुमने पाप किया है, माते! इतना साहस कहाँ से आया तुममें? किसने तुम्हारी बुि भ्रष्ट की? उलटा पाठ किसने पढ़ाया? यह अपराध् अक्षम्य है। मैं राजपद नहीं ग्रहण करूँ गा। तुमने ऐसा सोचा वैफसे?य् सभासदों की ओर मुड़ते हुए भरत ने हाथ जोड़कर कहा, फ्आप भी सुन लें। मेरी माँ ने जो किया है, उसमें मेरा कोइर् हाथ नहीं है। मैं राम की सौगंध् खाकर कहता हूँ। मैं राम 28 बाल रामकथा के पास जाऊँगा। उन्हें मनाकर लाऊँगा। प्राथर्ना करूँ गा कि वे गद्दी सँभालेें। मैं दास बनकर रहूँगा।य्भरत बहुत उत्तेजित हो गए थे। स्वयं पर नियंत्राण नहीं रख सके। बोलते - बोलते उनकी साँस उखड़ने लगी। वे चकराकर ध्रती पर गिर पड़े। सुध् - बुध् लौटी तो भरत रानी कौशल्या के महल की ओर चल पड़े। उनसे लिपटकर बच्चों की तरह बिलखकर रोए। उनके चरणों में गिर पड़े। कौशल्या आहत थीं। उन्होंने कहा, फ्पुत्रा, तुम्हारी मनोकामना पूरी हुइर्। तुम जो चाहते थे, हो गया। राम अब जंगल में हैं। अयोध्या का राज तुम्हारा है। मुझे बस एक दुख है। वैफकेयी ने राज लेने का जो तरीका अपनाया वह अनुचित था। निमर्म था। तुम राज करो पुत्रा, पर मुझ पर एक दया करो। मुझे मेरे राम के पास भ्िाजवा दो।य् भरत ने रानी कौशल्या से क्षमा माँगी। सप़्ाफाइर् दी। रानी वैफकेयी के व्यवहार पर ग्लानि व्यक्त की। कहा, फ्राम मेरे पि्रय अग्रज हैं। मैं उनका अहित सोच भी नहीं सकता। मैं निरपराध् हूँ।य् कौशल्या ने भरत को क्षमा कर दिया। उन्हें गले से लगा लिया। भरत सारी रात पूफट - पूफटकर रोते रहे। सुबह तक शत्राुघ्न को पता चल गया था कि वैफकेयी के कान किसने भरे। मंथरा अयोध्या के घटनाक्रम से घबरा गइर् थी। छिप गइर्। वुफछ दिनों से उसे किसी ने नहीं देखा। भरत और शत्राुघ्न राम को वापस लाने पर मंत्राणा कर रहे थे। तभी शत्राुघ्न की दृष्िट, बचकर निकलती मंथरा पर पड़ी। उन्होंने लपककर उसके बाल पकड़ लिए। खींचते हुए भरत के सामने लाए। भरत को दासी की भूमिका बताइर्। शत्राुघ्न उसे जान से मार देने पर उद्यत थे। भरत ने बीच - बचाव किया। मुनि वश्िाष्ठ अयोध्या का राजस्िंाहासन रिक्त नहीं देखना चाहते थे। खाली स्िंाहासन के खतरों से वे परिचित थे। उन्होंने सभा बुलाइर्। भरत और शत्राुघ्न को आमंत्रिात किया। भरत से कहा, फ्वत्स! तुम राजकाज सँभाल लो। पिता के निध्न और बड़े भाइर् के वन - गमन के बाद यही उचित है।य् भरत ने मह£ष का आग्रह अस्वीकार कर दिया। बोले, फ्मुनिवर, यह राज्य राम का है। वही इसके अध्िकारी हैं। मैं यह पाप नहीं कर सकता। हम सब वन जाएँगे। और राम को वापस लाएँगे।य् वन जाने के लिए सभी तैयार थे। भरत ने सबके मन की बात कही थी। सबकी इच्छा थी कि राम अयोध्या लौट आएँ। अगली सुबह भरत सभी मंत्रिायों और सभासदों के साथ वन के लिए चले। गुरु वश्िाष्ठ साथ थे। नगरवासी भी थे। अयोध्या की चतुरंगिणी सेना तो थी ही। राम तब तक गंगा पार कर चित्रावूफट पहुँच गए थे। वहाँ एक आश्रम था। मह£ष भरद्वाज का। गंगा - यमुना के संगम पर। राम आश्रम में नहीं रहना चाहते थे। ताकि मह£ष को असुविध न हो। महष्िार् ने उन्हें एक पहाड़ी दिखाइर्। सुंदर स्थान। सुरम्य दृश्य। पणर्वुफटी वहीं बनाइर् गइर्। भरत को सूचना मिल गइर् थी। वे चित्रावूफट ही आ रहे थे। पूरे दल - बल के साथ। सेना के चलने से आसमान ध्ूल से अट गया। हर ओर कोलाहल। वे शंृगवेरपुर पहुँचे। निषादराज गुह को सेना देखकर वुफछ संदेह हुआ। कहीं राजमद में आकर भरत राम पर आक्रमण करने तो नहीं जा रहे हैं? सही स्िथति पता चली तो उन्होंने भरत की अगवानी की। गंगा पार करने के लिए देखते - देखते पाँच सौ नावें जुटा दीं। रास्ते में मुनि भरद्वाज का आश्रम पड़ा। उन्होंने भरत को राम का समाचार दिया। वह मागर् दिखाया, जिध्र से राम गए। वह पहाड़ी दिखाइर्, जहाँ राम ने पणर्वुफटी बनाइर्। अयोध्यावासियों ने रात आश्रम में 29 चित्रावूफट में भरत ही बिताइर्। इस संतोष के साथ कि राम अब दूर नहीं हैं। आगे जंगल घना था। सेना चली तो वन में खलबची मच गइर्। जानवर इध्र - उध्र भागने लगे। पक्ष्िायों ने अपना बसेरा छोड़ दिया। छोटी वनस्पतियाँ सेना के पाँव तले वुफचल गईं। बड़े वृक्ष थरथरा उठे। राम और सीता पणर्वुफटी में थे। लक्ष्मण पहरा दे रहेथे। कोलाहल उन्होंने भी सुना। वे एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गए। देखने के लिए कि मामला क्या है। लक्ष्मण ने देखा कि विराट सेना चली आ रही है। सेना का ध्वज जाना पहचाना था।अयोध्या की सेना थी। वे उत्तर की ओर से आगे बढ़ रहे थे। लक्ष्मण ने पेड़ से ही चीखकर कहा, फ्भैया, भरत सेना के साथ इध्र आ रहे हैं। लगता है वे हमें मार डालना चाहते हैं। ताकि एकछत्रा राज कर सवेंफ।य् राम वुफटी से बाहर आए। उन्होंने लक्ष्मण को समझाया। फ्भरत हम पर हमला नहीं करेगा। कभी नहीं। वह हम लोगों से भंेट करने आ रहा होगा,य् राम ने कहा। फ्भेंट के लिए सेना के साथ आने का क्या औचित्य? दो भाइयों के मिलन में सेना का क्या काम?य् लक्ष्मण आश्वस्त नहीं थे। वे सेना पर आक्रमण करना चाहते थे। राम ने उन्हें रोक दिया। फ्वीर पुरुष ध्ैयर् का साथ कभी नहीं छोड़ते। वुफछ समय प्रतीक्षा करो। इस प्रकार का उतावलापन उचित नहीं है।य् भरत ने सेना पहाड़ी के नीचे रोक दी। नगरवासियों से भी वहीं ठहरने को कहा। कोलाहल थम गया। उसकी जगह पुनः वन की नैस£गक शांति ने ले ली। भरत ने पहाड़ी को प्रणाम किया। शत्राुघ्नको साथ लेकर नंगे पाँव ऊपर चढ़े। पाँवों की गति अचानक बढ़ गइर्। भाइर् से मिलने वफी उत्वंफठा में। वे और प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। पहाड़ी पर दूर से उन्हें एक छवि दिखी। वह राम थे। श्िाला पर बैठे हुए। पास ही सीता और लक्ष्मण बैठे थे। भरत दौड़ पड़े। राम के चरणों में गिर पड़े। उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। शत्राुघ्न ने भी राम की चरण वंदना की। बोले वे भी नहीं। उन्होंने दोनों को उठाकर सीने से लगा लिया। सबकी आँखों में आँसू थे। भरत साहस नहीं जुटा पा रहे थे। बड़े भाइर् को यह सूचना देने का कि पिता दशरथ नहीं रहे। फ्एक दुःखद समाचार है, भ्राता!य् बहुत कठिनाइर् से उन्होंने कहा। फ्पिता दशरथ नहीं रहे। आपके आने के छठे दिन। दुख में प्राण त्याग दिए।य् राम सन्न रह गए। शोक में डूब गए। 31 चित्रावूफट में भरत राम को पता चला कि भरत के साथ केवल सेना नहीं आइर् है। नगरवासी आए हैं। गुरुजन हैं। माता हैं। वैफकेयी भी। राम - लक्ष्मण पहाड़ी से उतरकर उनसे भेंट करने आए। सबसे स्नेह से मिले। सीता को तपस्िवनी के वेश में देखकर माताएँ दुःखी हुईं। राम ने वैफकेयी को प्रणाम किया। सहज भाव से। वैफकेयी मन - ही - मन पछता रही थीं। अगले दिन भरत ने राम से राजग्रहण का आग्रह किया। समझाया। विनती की कि अयोध्या लौट चलें। राम इसके लिए तैयार नहीं हुए। फ्पिता की आज्ञा का पालन अनिवायर् है। पिता की मृत्यु के बाद मैं उनका वचन नहीं तोड़ सकता।य् भरत को राजकाज समझाया। कहा कि अब तुम ही गद्दी सँभालो। यह पिता की आज्ञा है। राम - भरत संवाद के समय मंत्राी और सभासद वहाँ उपस्िथत थे। मुनि वश्िाष्ठ भी। भरत बार - बार राम से लौटने का आग्रह करते रहे। राम हर बार पूरी विनम्रता और दृढ़ता के साथ इसे अस्वीकार करते रहे। मह£ष वश्िाष्ठ ने कहा, फ्राम! रघुवुफल की परंपरा में राजा ज्येष्ठ पुत्रा ही होता है। तुम्हें अयोध्या लौटकर अपना दायित्व निभाना चाहिए। इसी में वुफल का मान है।य् 32 बाल रामकथा राम ने बहुत संयत स्वर में कहा, फ्चाहे चंद्रमा अपनी चमक छोड़ दे, सूयर् पानी की तरह ठंडा हो जाए, हिमालय शीतल न रहे, समुद्र की मयार्दा भंग हो जाए, परंतु मैं पिता की आज्ञा से विरत नहीं हो सकता। मैं उन्हीं की आज्ञा से कहा, फ्चैदह वषर् तक अयोध्या पर इन चरण - पादुकाओं का शासन रहेगा।य् सबको प्रणाम कर राम ने उन्हें चित्रावूफट से विदा किया। राम की चरण - पादुकाओं को एक सुसज्िजत हाथी पर रखा गया। प्रतिहारी वन आया हँू। उन्हीं की आज्ञा से भरत को राजगद्दी सँभालनी चाहिए।य् राम किसी तरह लौटने को तैयार नहीं हुए। भरत के चेहरे पर निराशा के भाव थे। वे विपफल हो गए थे। राम को मनाने में। फ्आप नहीं लौटेंगे तो मैं भी खालीहाथ नहीं जाऊँगा। आप मुझे अपनी खड़ाऊँ दे दें। मैं चैदह वषर् उसी की आज्ञा से राजकाज चलाउफँ गा।य् भरत का यह आग्रह राम ने स्वीकारकर लिया। अपनी खड़ाऊँ दे दी। भरत ने खड़ाउफँ को माथे से लगाया और ँउस पर चवर डुलाते रहे। अयोध्या पहुँचकर भरत ने पादुका - पूजन किया। कहा, फ्ये पादुकाएँ राम की ध्रोहर हैं। मैं इनकी रक्षा करूँ गा। इनकी गरिमा को आँच नहीं आने दूँगा।य् भरत अयोध्या में कभी नहीं रुके। तपस्वी के वस्त्रा पहने और नंदीग्राम चले गए। जाते समय उन्होंने कहा, फ्मेरी अब केवल एक इच्छा है। इन पादुकाओं को उन चरणों में देखूँ, जहाँ इन्हें होना चाहिए। मैं राम के लौटने की प्रतीक्षा करूँ गा। चैदह वषर्।य्

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