राम का वन - गमन कोपभवन के घटनाक्रम की जानकारी बाहर किसी को नहीं थी। यद्यपि सभी सारी रात जागे थे। वैफकेयी अपनी िाद पर अड़ी हुईं। राजा दशरथ उन्हें समझाते हुए। नगरवासी राज्याभ्िाषेक की तैयारी करते हुए। गुरु वश्िाष्ठ की आँखों में भी नींद नहीं थी। आख्िार, राम का अभ्िाषेक था! दिन चढ़ते के साथ चहल - पहल और बढ़ गइर्। हर व्यक्ित शुभ घड़ी की प्रतीक्षा में। महामंत्राी सुमंत्रा वुफछ असहज थे। मह£ष के पास आए। दोनों ने महाराज के बारे में चचार् की। पिछली शाम से किसी ने महाराज को नहीं देखा था। वुफछ लोगों के लिए इसका कारण आयोजन की व्यस्तता थी। मह£ष ने सुमंत्रा को राजभवन भेजा। समय तेशी से बीत रहा था। शुभ घड़ी निकट आ रही थी। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। केवल महाराज का आना शेष था। सुमंत्रा तत्काल राजभवन पहुँचे। वैफकेयी के महल की सीढि़याँ चढ़ते हुए सुमंत्रा को एक अनजान डर ने घेर लिया। अंदर पहंुँचे। देखा कि महाराजा पलंग पर पड़े हैं। बीमार। दीनहीन। सुमंत्रा का मन भाँपते हुए वैफकेयी ने कहा, फ्च्िंाता की कोइर् बात नहीं है, मंत्रिावर! महाराज राज्याभ्िाषेक के उत्साह में रातभर जागे हैं। वे बाहर निकलने से पूवर् राम से बात करना चाहते हैं।य् फ्वैफसी बात?य् सुमंत्रा ने पूछा। फ्मैं नहीं जानती। अपने मन की बात वे राम को ही बताएँगे। आप उन्हें बुला लाइए।य् दशरथ ने बहुत क्षीण स्वर में राम को बुलाने की आज्ञा दी। सुमंत्रा के मन में कइर् तरह की आशंकाएँ थीं। पर वे उन्हें टालते रहे। राम के निवास के बाहर भारी भीड़ थी। लक्ष्मण भी वहीं थे। भवन को सजाया गया था। उसकी चमक - दमक देखने योग्य थी। सुमंत्रा को देखकर कोलाहल बढ़ गया। लोगों के लिए यह एक संकेत था। राज्याभ्िाषेक के लिए राम को आमंत्रिात करने का। सुमंत्रा ने कहा, फ्राजवुफमार, महाराज ने आपको बुलाया है। आप मेरे साथ ही चलें।य् वुफछ ही पल में राम वहाँ पहुँच गए। लक्ष्मण साथ थे। दोनों भाइर् विस्िमत थे। वे राजसी वस्त्रों में थे। सजे - ध्जे। लोग जय - जयकार करने लगे। पुष्पवषार् होने लगी। राजवुफमार समझ नहीं पा रहे थे कि महाराज ने उन्हें अचानक क्यों बुलाया। लोग समझ रहे थे कि राम राज्याभ्िाषेक के लिए जा रहे हैं। महल में पहुँचकर राम ने पिता को प्रणाम किया। पिफर माता वैफकेयी को। राम को देखते ही राजा दशरथ बेसुध् हो गए। उनके मुँह से एक हलकी - सी आवाश निकली, फ्राम!य् उन्हें होश आया तब भी वे वुफछ बोल नहीं सके। थोड़ी देर तक चुप्पी रही। असहज सन्नाटा। कोइर् वुफछ नहीं बोला तो राम ने पिता से पूछा, फ्क्या मुझसे कोइर् अपराध् हुआ है? कोइर् वुफछ बोलता क्यों नहीं? आप ही बताइए, माते?य् फ्महाराज दशरथ ने मुझे एक बार दो वरदान दिए थे। मैंने कल रात वही दोनों वर माँगे, जिससे वे पीछे हट रहे हैं। यह शास्त्रा - सम्मत नहीं है। रघुवुफल की नीति के विरु( है।य् वैफकेयी ने बोलना जारी रखा, फ्मैं चाहती हूँ कि राज्याभ्िाषेक भरत का हो और तुम चैदह वषर् वन में रहो। महाराज यही बात तुमसे नहीं कह पा रहे थे।य् 21 राम का वन - गमन राम संयत रहे। उन्होंने दृढ़ता से कहा, फ्पिता का वचन अवश्य पूरा होगा। भरत को राजगद्दी दी जाए। मैं आज ही वनचला जाऊँ गा।य् राम की शांत और सध्ी हुइर् वाणी सुनकर वैफकेयी के चेहरे पर प्रसन्नता छा गइर्। उनकी मनोकामना पूणर् हुइर्। राजा दशरथ चुपचाप सब वुफछ देख रहे थे। स्पंदनहीन। वैफकेयी की ओर देखते हुए उनके मुँह से बस एक शब्द निकलाμ फ्ध्िक्कार!य् वैफकेयी के महल से निकलकर राम सीध्े अपनी माँ के पास गए। उन्होंने माता कौशल्या को वैफकेयी - भवन का विवरण दिया। और अपना निणर्य सुनाया। राम वन जाएँगे। कौशल्या यह सुनकर सुध् खो बैठीं। लक्ष्मण अब तक शांत थे। पर क्रोध् से भरे हुए। राम ने समझाया और उनसे वन जाने की तैयारी के लिए कहा। कौशल्या का मन था कि राम को रोक लें। वन न जाने दें। राजगद्दी छोड़ दें। पर वह अयोध्या में रहें। उन्होंने कहा, फ्पुत्रा! यह राजाज्ञा अनुचित है। उसे मानने की आवश्यकता नहीं है।य् राम ने उन्हें नम्रता सेउत्तर दिया, फ्यह राजाज्ञा नहीं, पिता की आज्ञा है। उनकी आज्ञा का उल्लंघन मेरी शक्ित से परे है। आप मुझे आशीवार्द दें।य् 22 बाल रामकथा लक्ष्मण से राम का संवाद जारी रहा। राम ने वन - गमन को भाग्यवश आया उलटपेफर कहा। लक्ष्मण इससे सहमत नहीं थे। वे इसे कायरों का जीवन मानते थे। उन्होंने राम से कहा, फ्आप बाहुबल से अयोध्या का राज¯सहासन छीन लें। देखता हूँ कौन विरोध् करता है।य् फ्अध्मर् का ¯सहासन मुझे नहीं चाहिए।मैं वन जाऊँगा। मेरे लिए तो जैसा राजस्िंाहासन, वैसा ही वन।य् कौशल्या ने स्वयं को सँभाला। उठीं और राम को गले लगा लिया। वे राम के साथ वन जाना चाहती थीं। राम ने मना कर दिया। कहा कि वृ( पिता को आपके सहारे की अध्िक आवश्यकता है। कौशल्या ने राम को विदा करते हुए कहा, फ्जाओ पुत्रा! दसों दिशाएँ तुम्हारे लिए मंगलकारी हों। मैं तुम्हारे लौटने तक जीवित रहंँूगी।य् कौशल्या - भवन से निकलकर राम सीता के पास गए। सारा हाल बताया। विदा माँगी। माता - पिता की आयु का उल्लेख किया। उनकी सेवा करने का आग्रह किया। कहा, फ्पि्रये! तुम निराश मत होना। चैदह वषर् के बाद हम पिफर मिलेंगे।य् राम के वन - गमन का समाचार तब तक सीता के पास नहीं पहुँचा था। राम को देखकर वुफछ आशंका हुइर्। अनिष्ट की। राम ने विदा माँगी तो सीता व्यावुफल हो गईं। क्रोध्ित भी हुईं। निणर्य पर प्रतिवाद किया। राम नहीं माने तो सीता ने उनके साथ जंगल जाने का प्रस्ताव रखा। सीता ने कहा, फ्मेरे पिता का आदेश है कि मैं छाया की तरह हमेशा आपके साथ रहूँ।य् अंततः राम को उनकी बात माननी पड़ी। तभी लक्ष्मण भी वहाँ आ गए। वह भी साथ जाने को तैयार थे। राम ने उन्हेंइसकी स्वीकृति दे दी। शीघ्र तैयारी करने को कहा। राम चाहते थे कि सीता वन न जाएँ। अयोध्या में रहें। वे इसकी अनुमति दे चुके थे। पिफर भी उन्होंने एक और प्रयास किया। फ्सीते! वन का जीवन बहुत कठिन है। न रहने का ठीक स्थान, न भोजन का ठिकाना। कठिनाइयाँ कदम - कदम पर। तुम महलों में पली हो। ऐसा जीवन वैफसे जी सकोगी?य्सीता ने उत्तर नहीं दिया। मुसकरा दीं। उन्हें पता था कि राम अपने दिए वचन से पलट नहीं सकते। राम वन जा रहे हैं। यह समाचार पूरे नगर में पैफल चुका था। नगरवासी दशरथ और वैफकेयी को ध्िक्कार रहे थे। वुफछ देर पहले तक जहाँ उत्सव की तैयारियाँ थीं, वहाँ उदासी ने घर कर लिया। सड़वेंफ गीली थीं। लोगों के आँसुओं से। सबकी इच्छा थी कि राम - सीता वन न जाएँ। वे उन्हें रोकना चाहते थे। पर बेबस थे। राम, सीता और लक्ष्मण जंगल जाने से पहले पिता का आशीवार्द लेने गए। महाराज दशरथ ददर् से कराह रहे थे। तीनों रानियाँ वहीं थीं। मंत्राी आसपास थे। मंत्राीगण रानी वैफकेयी को अब भी समझा रहे थे। क्षुब्ध् थे पर तवर्फ का साथ नहीं छोड़ना चाहते थे। ज्ञान, दशर्न, नीति - रीति, परंपरा। सबका हवाला दिया। वैफकेयी अड़ी रहीं। राम ने कक्ष में प्रवेश किया तो दशरथ में जीवन का संचार हुआ। वे उठकर बैठ गए। उन्होंने कहा, फ्पुत्रा! मेरी मति मारी गइर् 23 राम का वन - गमन इसी बीच रानी वैफकेयी ने राम, लक्ष्मण और सीता को वल्कल वस्त्रा दिए। राम ने राजसी वस्त्रा उतार दिए। तपस्िवयों के वस्त्रा पहने। सीता को तपस्िवनी के वेश में देखना सबसे अध्िक दुखदायी था। मह£ष वश्िाष्ठ अब तक शांत थे। उन्हें क्रोध् आ गया। उन्होंने कहा, फ्सीता वन जाएगी तो सब अयोध्यावासी उसके साथ जाएँगे। भरत सूनी अयोध्या पर राज करेंगे। यहाँ कोइर् नहीं होगा। पशु - पक्षी भी नहीं।य् एक बार पिफर राम ने सबसे अनुमति माँगी। आगे - आगे राम। उनके पीछे सीता। उनके पीछे लक्ष्मण। महल के ठीक बाहर मंत्राी सुमंत्रा रथ लेकर खड़े थे। रथ पर है। मैं वचनब( हूँ। पर तुम्हारे ऊपर कोइर्लिए विवश हँ। ऐसा निणर्य करने के चढ़कर राम ने कहा, फ्महामंत्राी, रथ तेश चलाएँ।य् नगरवासी रथ के पीछे दौड़े। ूबंधन नहीं है। मुझे बंदी बना लो और राज सँभालो। यह राजस्िंाहासन तुम्हारा है। केवल तुम्हारा।य् पिता के वचनों ने राम को झकझोर दिया। वे दुःखी हो गए। पर उन्होंने नीति का साथ नहीं छोड़ा। फ्आंतरिक पीड़ा आपको ऐसा कहने पर विवश कर रही है। मुझे राज्य का लोभ नहीं है। मैं ऐसा नहीं कर सकता। आप हमें आशीवार्द देकर विदा करें। विदाइर् का दुःख सहन करना कठिन है। इसे और न बढ़ाएँ।य् राजा दशरथ और माता कौशल्या भी पीछे - पीछे गए। सब रो रहे थे। सबकी आँखों में आँसू थे। पुरुष, महिलाएँ, बूढ़े, जवान, बच्चे। मीलों तक नंगे पाँव दौड़ते रहे। राम यह दृश्य देखकर विचलित हो गए। भावुक भी। उनसे यह देखा नहीं जा रहा था। उन्होंने सुमंत्रा से रथ को और गति से हाँकने को कहा। ताकि लोग हार जाएँ। थककर पीछे छूट जाएँ। घर लौट जाएँ। राजा दशरथ लगातार रथ की दिशा में नशरें गड़ाए रहे। खड़े रहे, जब तक रथ 25 राम का वन - गमन सुमंत्रा का खाली रथ अयोध्या पहुँचा तो लोगों ने उसे घेर लिया। वे राम के बारे में जानना चाहते थे। सुमंत्रा बिना वुफछ बोले सीध्े राजभवन गए। राजा दशरथ कौशल्या - भवन में थे। बेचैन। सुमंत्रा की प्रतीक्षा में। उन्होंने कहा, फ्महामंत्राी! राम कहाँ हैं? सीता वैफसी हैं? लक्ष्मण का क्या समाचार है? वे कहाँ रहते हैं? क्या खाते हैं?य् सुमंत्रा की आँखों में आँसू थे। उन्होंने एक - एक कर महाराज के सभी प्रश्नोंका उत्तर दिया। सुमंत्रा को पता था किदशरथ को इन उत्तरों से संतोष नहीं होगा। महाराज की बेचैनी बनी रही। बढ़ती गइर्। वन - गमन के छठे दिन दशरथ ने प्राण त्याग दिए। राम का वियोग उनसे सहा नहीं गया। दूसरे दिन मह£ष वश्िाष्ठ ने मंत्रिापरिषद् से चचार् की। सबकी राय थी कि राजगद्दी खाली नहीं रहनी चाहिए। तय हुआ कि भरत को तत्काल अयोध्या बुलाया जाए। घुड़सवार दूत रवाना किए गए। इस निदेर्श के साथ कि उन्हें अयोध्या की घटनाओं के संबंध् में मौन रहना है। आँखों से ओझल नहीं हो गया। रथ दिखना बंद हुआ तो वे ध्रती पर गिर पड़े। रथ दिनभर दौड़ता रहा। वन अभी दूर था। तमसा नदी के तट तक पहुँचते - पहुँचते शाम हो गइर्। वनवासियों ने रात वहीं बिताइर्। अगली सुबह वे दक्ष्िाण दिशा की ओर चले। हरे - भरे खेतों के बीच से। गोमती नदी पारकर राम - सीता और लक्ष्मण सइर् नदी के तट पर पहुँचे। महाराज दशरथ के राज्य की सीमा वहीं समाप्त होती थी। राम ने मुड़कर अपनी जन्मभूमि को देखा। उसे प्रणाम किया। कहा, फ्हे जननी!य् अब चैदह वषर् बाद ही तुम्हारे दशर्न कर सवूँफगा।य् शाम होते - होते वे गंगा के किनारे पहुँच गए। शृंगवेरपुर गाँव में। निषादराज गुह ने उनका स्वागत किया। राम ने रात वहीं विश्राम किया। गुहराज के अतिथ्िा के रूप में। वन क्षेत्रा आ गया था। नदी के उस पार। अगली सुबह राम ने महामंत्राी को समझा बुझाकर वापस भेज दिया। दोनों राजवुफमारों और सीता ने नाव से नदी पार की। सुमंत्रा तट पर खड़े रहे। वनवासियों के उस पार उतरने तक। उसके बाद वे अयोध्या लौट आए।

RELOAD if chapter isn't visible.