दो वरदान राजा दशरथ के मन में अब एक ही इच्छा बची थी। राम का राज्याभ्िाषेक। उन्हें युवराज का पद देना। अयोध्या लौटने के बाद से ही उन्होंने राम को राज - काज में शामिल करना शुरू कर दिया था। राम यह िाम्मेदारी अच्छी तरह निभा रहे थे। उनकी विनम्रता,विद्वत्ता और पराक्रम का लोहा सभी मानते थे। प्रजा उनको चाहती थी। दशरथ के लिए तो वह प्राणों से प्यारे थे ही। दरबार में राम का सम्मान निरंतर बढ़ रहा था। राजा दशरथ वृ( हो चले थे। मुनि वश्िाष्ठ से विचार - विमशर् के बाद एक दिन उन्होंने दरबार में कहा, फ्मैंने लंबे समय तक राज - काज चलाया। जैसा बन पड़ा। अब मेरे अंग श्िाथ्िाल हो गए हैं। मैं वृ( हो जय - जयकार होने लगी। दशरथ थोड़ी देर तक सुनते रहे। संतोष के साथ। उन्होंने कहा, फ्शुभ काम में देरी नहीं होनी चाहिए। मेरी इच्छा है कि राम का राज्याभ्िाषेक कल सुबह कर दिया जाए।य् यह समाचार पलक झपकते पूरे नगर में पैफल गया। हर जगह बस यही चचार् थी। राज्याभ्िाषेक की तैयारियाँ शुरू हो गईं। भरत और शत्राुघ्न उस समय अयोध्या में नहीं थे। वह अपने नाना केवफयराज के यहाँ गए हुए थे। भरत जब भी अयोध्या लौटने की बात करते, नाना उन्हें रोक लेते। भरत को अयोध्या की घटनाओं की सूचना नहीं थी। उन्हें अपने पिता के निणर्य के संबंध् में नहीं पता था। यह चला हूँको सौंप दँूं। अगर आप सब सहमत हों तो का राज्याभ्िाषेक होने वाला है। केकय से राम को युवराज का पद दे दिया जाए। एक दिन में भरत और शत्राुघ्न का आना अगर आपकी राय इससे भ्िान्न है तो मैं उस संभव नहीं था। । मैं चाहता हूजानकारी भी नहीं थी कि अगले दिन रामँ कि यह कायर्भार राम पर भी विचार करने को तैयार हँसभा ने तुमुलध्वनि से राजा दशरथ चचार् की। कहा कि भरत यहाँ नहीं है पर के प्रस्ताव का स्वागत किया। राम की मैं चाहता हूँ कि राज्याभ्िाषेक का कायर्क्रम ू।य् राजा दशरथ ने इस संबंध् में राम से न रोका जाए। उन्होंने राम से कहा, फ्जनता ने तुम्हें अपना राजा चुना है। तुम राजध्मर् का पालन करना। वुफल की मयार्दा की रक्षा अब तुम्हारे हाथ में है।य् राज्याभ्िाषेक की तैयारियाँ रानी वैफकेयी की दासी ने भी देखीं। मंथरा ने। शुरू में उसे इस चहल - पहल का कारण समझ में नहीं आया। उसने इसे कोइर् अन्य अनुष्ठान समझा। इतनी रौनक! ऐसी सजावट! ऐसा वुफछ उसने अन्य अनुष्ठानों में नहीं देखा था। उसे अचंभा हुआ। पिफर उसने रानी कौशल्या की दासी से पूछा। उसे तब पता चला कि कल राम का राज्याभ्िाषेक होने वाला है। यह उत्सव उसी के लिए है। मंथरा जलभुन गइर्। राम का राज्याभ्िाषेक 15 दो वरदान किसी तरह स्वयं को सँभालते हुए मंथराने कहा, फ्अरे मेरी मूखर् रानी! उठ। तेरे ऊपर भयानक विपदा आने वाली है। यह समयसोने का नहीं है। होश में आओ। विपिा का पहाड़ टूटे, इससे पहले जाग जाओ।य् रानी वैफकेयी नींद से चैंककर उठीं। उन्हें मंथरा की बात समझ में नहीं आइर्। फ्बात क्या है? तुम इतना घबराइर् क्यों हो? सब वुफशल तो है?य् उन्होंने पूछा। फ्वैफसा कुशल? वैफसा मंगल? सब अमंगल होने वाला है। तुम्हारे सुखों का अंत। महाराज दशरथ ने कल राम का राज्याभ्िाषेक करने का निणर्य लिया है। अब राम युवराज होंगे।य् फ्यह तो बहुत शुभ समाचार है!य् ्उसे षडवैफकेयी की दासी थी। बचपन से। वैफकेयी का हित उसके लिए सवोर्परि था। मंथरा उसे अपना हित मानती थी। वह वैफकेयी की मंँुहलगी थी। रानी वैफकेयी भी उसे बहुत मानती थीं। क्रोध् से आगबबूला मंथरा रनिवास की ओर भागी। सीध्े वैफकेयी के कक्ष में। वह हाँपफ रही थी। क्रोध् से चेहरा लाल था। भागने के कारण साँस उखड़ रही थी। उसने रानी वैफकेयी को सोते हुए देखा। यंत्रा लगा। वैफकेयी के विरु(। वह वैफकेयी ने प्रसन्नता से अपने गले का हार उतारकर मंथरा को दे दिया। फ्मैं बहुत प्रसन्न हँू। राम युवराज पद के लिए हर तरह से योग्य हैं।य् फ्रानी! तुम्हारी बुि पिफर गइर् है। मति मारी गइर् है। सवाल राम की योग्यता का नहीं है। राजा दशरथ के षड्यंत्रा का है। तुम्हारे अध्िकार छीनने का है,य् मंथरा ने हार दूर पेंफकते हुए कहा। फ्यह षड्यंत्रा नहीं तो और क्या है? कल सुबह राज्याभ्िाषेक है। भरत को जानबूझकर ननिहाल भेज दिया। समारोह के लिए बुलाया तक नहीं।य् 16 बाल रामकथा वैफकेयी का स्वर उग्र हो गया। उन्होंने मंथरा को डाँटते हुए कहा, फ्राम के प्रति मेरा अगाध् स्नेह है। वह मुझे माँ के समान मानते हैं। तुझे इसमें षड्यंत्रा दिखाइर् देता है? इसमें षड्यंत्रा नहीं है। राम के बाद भरत ही राजा बनेंगे। राज सवर्दा ज्येष्ठ पुत्रा को ही मिलता है।य् मंथरा पर इस पफटकार का कोइर् प्रभाव नहीं हुआ। उसके लिए यह दशरथ का षड्यंत्रा था। वह रानी वैफकेयी के पलंग पर बैठ गइर्। उनके बहुत निकट। वैफकेयी के चेहरे की ओर देखते हुए उसने कहा, फ्तुम बहुत भोली हो। नादान हो। तुम्हें आसन्न संकट नहीं दिखता। दुःख की जगह प्रसन्नता होती है। इस बुि पर किसी को भी तरस आएगा। समझो रानी! राम राजा बने तो तुम कौशल्या की दासी बन जाओगी। भरत राम के दास हो जाएँगे। वह राजा नहीं बनेंगे। राम के बाद अगला राजा राम का पुत्रा होगा। अनथर् को अथर् समझने की मूखर्ता मत करो, रानी! राम को राज मिला तो वे भरत को देश निकाला दे देंगे। वे भरत को दंड देंगे। इस तिरस्कार से भरत की रक्षा करो, रानी! कोइर् ऐसा उपाय करो कि राजगद्दी भरत को मिले और राम को जंगल भेज दिया जाए।य् वैफकेयी पर मंथरा की बातों का असर होने लगा। उनका सिर चकरा गया। वह पलंग से उठीं तो पाँव सीध्े नहीं पड़े। आँखों में आँसू थे। मन भारी हो गया। प्रसन्नता की जगह अव्यक्त क्रोध् ने ले ली। मंथरा के तको± में उन्हें सच्चाइर् दिखने लगी। फ्तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ?य् वैफकेयी ने आँसू पोंछते हुए मंथरा से कहा। मंथरा पलंग से उठी। वैफकेयी के पास जाकर खड़ी हो गइर्। उसने कहा, फ्याद करो रानी! महाराज दशरथ ने तुम्हें दो वरदान दिए थे। दशरथ से अपना वचन पूरा करने को कहो। एक से भरत के लिए राजगद्दी माँग लो। दूसरे से राम को चैदह वषर् का वनवास।य् वैफकेयी का चेहरा तमतमाया हुआ था। उन्हें मंथरा की बात ठीक लगी। उनके मन में एक प्रश्न अब भी था। यह बात दशरथ से वैफसे कहें? उन्हें रनिवास बुलवाएँ या प्रतीक्षा करें। मंथरा ने वैफकेयी के मन की बात भाँप ली। उसने कहा, फ्तुम मैले कपड़े पहनकर कोपभवन चली जाओ। महाराज दशरथ आएँ तो उनकी ओर मत देखो। बात मत करो। तुम उनकी पि्रय रानी हो। तुम्हारा दुःख देख नहीं पाएँगे। बस उसी समय तुम उन्हें पिछली बात याद दिलाना। दोनों वचन माँग लेना।य् को बुलाऊँषड्यंत्रा सपफल नहीं होने दूँगी।य् कोइर् उत्तर नहीं मिला। वैफकेयी रोती रहीं। मंथरा का लक्ष्य पूरा हो गया था। फ्तुम मेरी सबसे पि्रय रानी हो। मैं तुम्हें चलते - चलते उसने रानी वैफकेयी से कहा, प्रसन्न देखना चाहता हँू। तुम्हारी खुशी के फ्राम के लिए चैदह वषर् से कम वनवास लिए मैं वुफछ भी कर सकता हँू। वुफछ भी। फ्मैं ऐसा ही करूँ गी। महाराज का ?य् दशरथ ने कइर् सवाल पूछे।मत माँगना। भरत इतने समय में राज - काज सँभाल लेंगे। जब तक राम लौटेंगे, लोग उन्हें भूल चुके होंगे। अब जल्दी करो, रानी! समय बहुत कम है।य् रानी वैफकेयी कोपभवन चली गईं। मंथरा रनिवास से निकल गइर्। दिनभर की गहमागहमी के बाद महाराज दशरथ को रानियों की याद आइर्। तुरंत रनिवास की ओर चल पडे़। उन्हें शुभ समाचार देने। सबसे पहले वह वैफकेयी के कक्ष की ओर मुडे़। वैफकेयी वहाँ नहीं थीं। प्रतिहारी से पूछा। पता चला कि वे कोपभवन में हैं। दशरथ को च्िंाता हुइर्। वैफकेयी कोपभवन में! परंतु क्यों? क्या इसलिए कि उन्हें अब तक सूचना नहीं मिली। फ्मैं उसे अवश्य मना लूँगा,य् दशरथ ने सोचा। दशरथ कोपभवन का दृश्य देखकर हैरान हो गए। उन्हें वुफछ समझ में नहीं आया। वैफकेयी शमीन पर लेटी हुइर् थीं। बाल बिखरे ध्रती - आसमान एक कर सकता हँने वैफकेयी को मनाने का बहुत प्रयासकिया। उत्तर उन्हें पिफर भी नहीं मिला। दशरथ भी भूमि पर बैठ गए। विनती करते रहे। फ्हाँ, मैं बीमार हँय्, वैफकेयी नेू कहा। फ्मैं अपनी बीमारी के संबंध् मेंआपको बताऊँ गी। लेकिन पहले आप एक वचन दें। मैं जो माँगँू, उसे पूरा करेंगे।य् राजा ने तत्काल हामी भर दी। कहा, फ्मैं राम की सौगंध् खाकर कहता हूँ। तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँ गा।य् महाराज दशरथ ने राम की सौगंध् ली तो वैफकेयी उठकर बैठ गईं। फ्आप मुझे वे दोनों वरदान दीजिए, जिसका संकल्प आपने वषो± पहले रणभूमि में लिया था।य् महाराज दशरथ ने हामी भरी। फ्कल सुबह राज्याभ्िाषेक भरत का हो, राम का नहीं,य् वैफकेयी ने कहा। दशरथ भौचक रह गए। उन पर वज्रपात - सा ू।य् दशरथ े मैले।हुए। गहने कक्ष में बिखरे हुए। कपड़फ्तुम्हें क्या दुःख है? क्या हुआ है हुआ। थोड़ा रुककर वैफकेयी बोलीं, फ्राम तुम्हें? मुझे बताओ। अस्वस्थ हो? राजवैद्य को चैदह वषर् का वनवास हो।य् 19 दो वरदान सकते हैं। पर तब आप दुनिया को मुँह दिखाने योग्य नहीं रहेंगे। रही मेरी बात। आप वरदान नहीं देंगे तो मैं विष पीकर आत्महत्या कर लूँगी। यह कलंक आपके माथे होगा।य् राजा दशरथ यह सुन नहीं सके। दोबारा बेहोश हो गए। रातभर बेसुध् पड़े रहे। बीच - बीच में होश आता। वह वैफकेयी को समझाते। गिड़गिड़ाते, ध्मकाते, डराते। पर वैफकेयी टस - से - मस नहीं हुइर्। सारी रात इसी तरह बीत गइर्। दशरथ का चेहरा सप़्ोफद पड़ गया। अवाक रह गए। सिर चकराने लगा। वे मूच्िर्छत होकर गिर पड़े। वुफछ देर में राजा को होश आया। वैफकेयी की ओर देखा। बड़े कातर भाव से बोले, फ्यह तुम क्या कह रही हो? मुझे विश्वास नहीं होता कि मैंने सही सुना है।य् वैफकेयी अड़ी रहीं। दशरथ वैफकेयी की माँग को अस्वीकार करते रहे। अनथर् बताते रहे। तब वैफकेयी ने अंतिम हथ्िायार चलाया। फ्अपने वचन से पीछे हटना रघुवुफल का अनादर है। आप चाहें तो ऐसा कर

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