जंगल और जनकपुर राजमहल से निकलकर मह£ष विश्वामित्रा सरयू नदी की ओर बढ़े। दोनों राजवुफमार साथ थे। उन्हें नदी पार करनी थी। आश्रम पहुँचने के लिए। विश्वामित्रा ने अयोध्या के निकट नदी पार नहीं की। दूर तक सरयू के किनारे - किनारे चलते रहे। दक्ष्िाणी तट पर। उसी तट पर, जिस पर अयोध्या नगरी थी। वे चलते रहे। नदी के घुमाव के साथ - साथ। राजमहल पीछे छूट गया। उसकी आख्िारी बस्ती भी निकल गइर्। चलते - चलते एक तीखा मोड़ आया तो सब वुफछ दृष्िट से ओझल हो गया। राम और लक्ष्मण ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी नशर सामने थी। मह£ष विश्वामित्रा के सध्े कदमों की ओर। सूरज की चमक ध्ीमी पड़ने लगी। शाम होने को आइर्। राजवुफमारों के चेहरोंपर थकान का कोइर् चिÉ नहीं था। उत्साह था। वे दिन भर पैदल चले थे। और चलने को तैयार थे। मह£ष अचानक रुके। उन्होंने आसमान पर दृष्िट डाली। चिडि़यों के झुंड अपने बसेरे की ओर लौट रहे थे। आसमान मटमैला - लाल हो गया था। चरवाहे लौट रहे थे। गायों के पैर से उठती ध्ूल में आध्े छिपे हुए। फ्हम आज रात नदी तट पर ही विश्राम करेंगे,य् मह£ष ने पीछे मुड़ते हुए कहा। दोनों राजवुफमारों के चेहरे के भाव देखते हुए विश्वामित्रा हलका - सा मुसकराए। राम के निकट आते हुए उन्होंने कहा, फ्मैं तुम दोनों को वुफछ विद्याएँ सिखाना चाहता हूँ। इन्हें सीखने के बाद कोइर् तुम पर प्रहार नहीं कर सकेगा। उस समय भी नहीं, जब तुम नींद में रहो।य् राम और लक्ष्मण नदी में मुँह - हाथ धेकर लौटे। मह£ष के निकट आकर बैठे। विश्वामित्रा ने दोनों भाइयों को ‘बला - अतिबला’ नाम की विद्याएँ सिखाईं। रात में वे लोग वहीं सोए। तिनकों औरपत्तों का बिस्तर बनाकर। नींद आने तक मह£ष उनसे बात करते रहे। सुबह हुइर्। यात्रा पिफर शुरू हुइर्। मागर् वही था। सरयू नदी के किनारे - किनारे। चलते - चलते वे एक ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ दो नदियाँ आपस में मिलती थीं। उस संगम की दूसरी नदी गंगा थी। मह£ष अब भी आगे चल रहे थे। लेकिन एक अंतर आ गया था। राम - लक्ष्मण अब दूरी बनाकर नहीं चलते थे। मह£ष के ठीक पीछे थे ताकि उनकी बातें ध्यान से सुन सवेंफ। रास्ते में पड़ने वाले आश्रमों के बारे में। वहाँ के लोगों के बारे में। वृक्षों - वनस्पतियों के संबंध् में। स्थानीय इतिहास उसमें शामिल होता था। आगे की यात्रा कठिन थी। जंगलों से होकर। उससे पहले उन्हें नदी पार करनी थी। रात में ऐसा करना मह£ष विश्वामित्रा को उचित नहीं लगा। तीनों लोग वहीं रुक गए। संगम पर बने एक आश्रम में। अगली सुबह उन्होंने नाव से गंगा पार की। नदी पार जंगल था। घना। दुगर्म। सूरज की किरणें ध्रती तक नहीं पहुँचती थीं, इतना घना। वह डरावना भी था। हर ओर से झींगुरों की आवाश। जानवरों की दहाड़। कवर्फश ध्वनियाँ। राम और लक्ष्मण को आश्वस्त करते हुए मह£ष ने कहा, फ्ये जानवर और वनस्पतियाँ जंगल की शोभा हैं। इनसे कोइर् डर नहीं है। असली खतरा राक्षसी ताड़का से है। वह यहीं रहती है। तुम्हें वह खतरा हमेशा के लिए मिटा देना है।य् 9 जंगल और जनकपुर ताड़का के डर से कोइर् उस वन में नहीं आता था। जो भी आता, ताड़का उसे मार डालती। अचानक आक्रमण कर देती। उसका डर इतना था कि उस सुंदर वन का नाम ‘ताड़का वन’ पड़ गया था। राम ने महष्िार् की आज्ञा मान ली। धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाइर्। और उसे एक बार खींचकर छोड़ा। इतना ताड़का को क्रोध्ित करने के लिए बहुत था। टँकार सुनते ही क्रोध् से बिलबिलाइर् ताड़का गरजती हुइर् राम की ओर दौड़ी। दो बालकों को देखकर उसका क्रोध् और भड़क उठा। जंगल में जैसे तूप़्ाफान आ गया। विशालकाय पेड़ काँप उठे। पत्ते टूटकर इध्र - उध्र उड़ने लगे। ध्ूल का घना बादल छा गया। उसमें वुफछ दिखाइर् नहीं पड़ता था। पिफर ताड़का ने पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। राम ने उस पर बाण चलाए। लक्ष्मण ने भी निशाना साध। ताड़का बाणों से घ्िार गइर्। राम का एक बाण उसके हृदय में लगा। वह गिर पड़ी। पिफर नहीं उठ पाइर्। विश्वामित्रा बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राम को गले लगा लिया। उन्होंने दोनों राजवुफमारों को सौ तरह के नए अस्त्रा - शस्त्रा दिए। उनका प्रयोग करने की विध्ि बताइर्।उनका महत्त्व समझाया। 10 बाल रामकथा मह£ष का आश्रम वहाँ से अध्िक दूर नहीं था। लेकिन तब तक रात हो चली थी। विश्वामित्रा ने वह दूरी अगले दिन तय करने का निणर्य लिया। ताड़का मर चुकी थी। उसका भय नहीं था। तीनों ने रात वहीं बिताइर्। ताड़का वन में, जो अब पूरी तरह भयमुक्त था। सुबह जंगल बदला हुआ था। अब वह ताड़का वन नहीं था। क्योंकि ताड़का नहीं थी। भयानक आवाशें गायब हो चुकी थीं।पत्तों से गुशरती हवा थी। उसकी सरसराहट का संगीत था। चिडि़यों की चहचहाहट थी। शांति थी। तसवीर बदल गइर् थी। सि(ाश्रम का अंतिम पड़ाव था - मह£ष का आश्रम। रास्ता छोटा भी था। मनोहारीभी। प्राकृतिक सौंदयर् का आनंद लेते तीनों लोग जल्दी ही आश्रम पहुँच गए। आश्रमवासियों ने उनकी अगवानी की। अभ्िानंदन किया। उनकी प्रसन्नता दुगुनी हो गइर् थी। मह£ष विश्वामित्रा के आश्रम लौटने की खुशी। राम - लक्ष्मण के आगमन का सुख! विश्वामित्रा यज्ञ की तैयारियों में लग गए। अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। आश्रम की रक्षा की िाम्मेदारी राम - लक्ष्मण को सौंपकर मह£ष आश्वस्त थे। अनुष्ठान अपने अंतिम चरण में था। पूरा होने वाला था। वुफछ ही दिनों में। पाँच दिन तक सब ठीक - ठाक चलता रहा। शांति से। नि£वघ्न। लगता था कि राजवुफमारों की उपस्िथति ने ही राक्षसों को भगा दिया है। राम और लक्ष्मण ने यज्ञ पूरा होने तक न सोने का निणर्य किया। वे लगातार जागते रहे। चैकस रहे। कमर में तलवार। पीठ पर तुणीर। हाथ में ध्नुष। प्रत्यंचा चढ़ी हुइर्। हर स्िथति के लिए तैयार। अनुष्ठान का अंतिम दिन। अचानक भयानक आवाशों से आसमान भर गया। सुबाहु और मारीच ने राक्षसों के दल - बल के साथ आश्रम पर धवा बोल दिया। मारीच क्रोध्ित था। यज्ञ के अलावा भी। इस बात से कि राम - लक्ष्मण ने उसकी माँ को मारा था। ताड़का को। राम ने राक्षसों का हमला होते ही कारर्वाइर् की। ध्नुष उठाया और मारीच को निशाना बनाया। मारीच बाण लगते ही मूच्िर्छत हो गया। बाण के वेग से बहुत दूर जाकर गिरा। समुद्र के किनारे। वह मरा नहीं। जब होश आया तो उठकर दक्ष्िाण दिशा की ओर भाग गया। राम का दूसरा बाण सुबाहु को लगा। उसके प्राण वहीं निकल गए। सुबाहु के मरने पर राक्षस सेना में भगदड़ मच गइर्। वे चीखते - चिल्लाते भागे। वुफछ लक्ष्मण के बाणों का श्िाकार हुए। अन्य जान बचाकर भाग खड़े हुए। महष्िार् विश्वामित्रा का अनुष्ठान संपन्न हुआ। राम ने महष्िार् को प्रणाम करते हुए पूछा, फ्अब हमारे लिए क्या आज्ञा है, मुनिवर?य् मह£ष ने राम को गले लगाया। कहा, फ्हम लोग यहाँ से मिथ्िाला जाएँगे। महाराज जनक के यहाँ। विदेहराज के दरबार में। मैं चाहता हँू कि तुम दोनों मेरे साथ चलो। उनके आयोजन में हिस्सा लेने। महाराज के पास एक अद्भुत श्िाव - ध्नुष है। तुम भी उसे देखो।य् राम और लक्ष्मण अगली यात्रा को लेकर उत्साहित थे। नए स्थान देखने और जानने का अवसर! सोन नदी पार कर विश्वामित्रा मिथ्िाला की सीमा के पास पहुँचे। अपने श्िाष्यों और राजवुफमारों के साथ। वे गौतम )ष्िा के आश्रम से होते हुए नगर में पहुँचे। राजा जनक ने महल से बाहर आकर विश्वामित्रा का स्वागत किया। तभी उनकी दृष्िट राजवुफमारों पर पड़ी। विदेहराज चकित रह गए। वे स्वयं को रोक नहीं पाए। मह£ष से पूछा, फ्ये सुंदर राजवुफमार कौन हैं? मैं इनके आकषर्ण से ¯खचता जा रहा हूँ।य् फ्ये राम और लक्ष्मण हैं। महाराज दशरथ के पुत्रा। मैं इन्हें अपने साथ लाया हँ। आपका अद्भुत ध्नुष दिखाने।य्ू 11 जंगल और जनकपुर विदेहराज ने मह£ष, उनके श्िाष्यों और राजवुफमारों के ठहरने की व्यवस्था की। एक सुंदर उद्यान में। अगले दिन सभी आमंत्रिात लोग, )ष्िा - मुनि और राजवुफमार यज्ञशाला में उपस्िथत हुए। वहाँ मह£ष ने पिफर ध्नुष का उल्लेख किया। महाराज जनक ने अपने अनुचरों को आज्ञा दी, फ्श्िाव - ध्नुष को यज्ञशाला में लाया जाए।य् श्िाव - ध्नुष सचमुच विशाल था। लोहे की पेटी में रखा हुआ था। पेटी में पहिए लगे हुए थे। आठ पहिए। उसे उठाना लगभग असंभव था। पहियों के सहारे ख्िासकाकर उसे एक से दूसरी जगह ले जाया जाता था। अनुचर मुश्िकल से उसे खींचते हुए यज्ञशाला में ले आए। ध्नुष देखते ही विदेहराज एक पल के लिए उदास हो गए। उन्होंने कहा, फ्मुनिवर! मैंने प्रतिज्ञा की है। अपनी पुत्राी सीता के विवाह के संबंध् में। जो यह ध्नुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा उसी के साथ सीता का विवाह होगा। अनेक राजवुफमारों ने प्रयास किया और लज्िजत हुए। उठाना तो दूर, वे इसे हिला तक नहीं सके। प्रत्यंचा क्या चढ़ाते!य् विदेहराज का संकेत समझकर मह£ष विश्वामित्रा ने राम से कहा, फ्उठो वत्स! यह ध्नुष देखो।य् राम ने सिर झुकाकर गुरु की आज्ञा स्वीकार की। आगे बढ़े। पेटी का ढक्कन खोल दिया। राम ने पहले ध्नुष देखा पिफर मह£ष को। गुरु का संकेत मिलने पर राम ने वह विशाल ध्नुष सहज ही उठा लिया। यज्ञशाला में उपस्िथत सभी लोग हतप्रभ थे। फ्इसकी प्रत्यंचा चढ़ा दूँ, मुनिवर?य् राम ने पूछा। फ्अवश्य। यदि ऐसा कर सकते हो।य् विदेहराज चकित थे। राम ने आसानी से ध्नुष झुकाया। उफपर से दबाकर प्रत्यंचा खींची। दबाव से ध्नुष बीच से टूट गया। उसके दो टुकड़े हो गए। बच्चों के ख्िालौने की तरह। यज्ञशाला में सन्नाटा छा गया। सब चुप थे। एक - दूसरे की ओर देख रहे थे। सभागार की चुप्पी महाराज जनक ने तोड़ी। उनकी खुशी का ठिकाना न था। उन्हें सीता के लिए योग्य वर मिल गया था। उनकी प्रतिज्ञा पूरी हुइर्। जनकराज ने कहा, फ्मुनिवर! आपकी अनुमति हो तो मैं महाराज दशरथ के पास संदेश भेजूँ। बारात लेकर आने का निमंत्राण। यह शुभ संदेश उन्हें शीघ्र भेजना चाहिए।य् मह£ष की अनुमति से दूत अयोध्या भेजे गए। सबसे तेश चलने वाले रथों से। इस बीच जनकपुर में ध्ूम मच गइर्। बारात के स्वागत की तैयारियाँ होने लगीं। नगर की प्रसन्नता चरम पर थी। 13 जंगल और जनकपुर महाराज जनक का संदेश मिलते ही अयोध्या में भी खुशी छा गइर्। आनन - पफानन में बारात तैयार हुइर्। हाथी, घोड़े, रथ, सेना। बारात को मिथ्िाला पहुँचने में पाँच दिन लग गए। जनकपुरी जगमगा रही थी। हर मागर् पर तोरणद्वार। हर जगह पूफलों की चादर। एक - एक कोना सुवासित। हर घर के प्रवेशद्वार पर वंदनवार। एक - एक घर से मंगलगीत। मुख्यमागर् पर दशर्कों की अपार भीड़। ख्िाड़कियों और छज्जों से झाँकती महिलाएँ। एक नशर राम को देख लें। राम - सीता की जोड़ी दिख जाए। विवाह से ठीक पहले विदेहराज ने महाराज दशरथ से कहा, फ्राजन! राम ने मेरी प्रतिज्ञा पूरी कर बड़ी बेटी सीता को अपना लिया। मेरी इच्छा है कि छोटी पुत्राी उ£मला का विवाह लक्ष्मण से हो जाए। मेरे छोटे भाइर् वुफशध्वज की भी दो पुत्रिायाँहैं - - माँडवी और श्रुतकीतिर्। कृपया उन्हें भरत और शत्राुघ्न के लिए स्वीकार करें।य् राजा दशरथ ने यह प्रस्ताव तत्काल मान लिया। विवाह के बाद बारात वुफछ दिन जनकपुरी में रुकी। बाराती बहुओं को लेकर अयोध्या लौटे तो रानियों ने पुत्रा - वधुओं की आरती उतारी। स्ित्रायों ने पूफल बरसाए। शंखध्वनि से गलियाँ गूँज उठीं। यह आनंदोत्सव लगातार कइर् दिनों तक चलता रहा।

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