वीर, तुम बढे़ चलो । ध्ीर, तुम बढे़ चलो ।। हाथ में ध्वजा रहे, बाल - दल सजा रहे, ध्वज कभी झुके नहीं, दल कभी रफके नहीं। वीर, तुम बढे़ चलो । सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो, तुम निडर, हटो नहीं, तुम निडर, डटो वहीं । वीर तुम बढे़ चलो । ध्ीर तुम बढे़ चलो।। मेघ गरजते रहें मेघ बरसते रहें बिजलियाँ कड़क उठें बिजलियाँ तड़क उठें वीर तुम बढे़ चलो ध्ीर तुम बढ़े चलो प्रात हो कि रात हो संग हो न साथ हो सूयर् से बढे़ चलो चंद्र से बढे़ चलो । वीर तुम बढे़ चलो ध्ीर तुम बढे़ चलो द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी शब्दाथर् वीर - वीर पुरफष, साहसी ध्ीर - ध्ैयर्वान ध्वजा - झंडा निडर - जो किसी से नहीं डरता डटो - पीछे मत हटो कड़क - कड़क - बिजलियों के कड़कने की आवाश प्रात - सुबह भावाथर् यह एक ‘प्रयाण’ गीत है। कवि कहता है कि हे वीर, ध्ीर! तुम आगे बढ़ो। हाथ में राष्ट्रीय ध्वज लेकर बिना रफके बढ़ते रहो। चाहे सामने पहाड़ हो या सिंह गरज रहा हो, बिलकुल डरो नहीं, डटकर सामना करो और आगे बढ़ो। चाहे बादल गरज रहे हों, बिजलियाँ कड़क रही हों, सुबह हो या रात, कोइर् साथ में हो या न हो, सूयर् और चंद्रमा के समान आगे बढ़ते रहो। इसमें कवि ने पक्के इरादे के साथ आगे बढ़ने की बात की है। लगातार चलने से मुश्िकलें भी आसान हो जाती हैं।128 1.कविता की पंक्ितयाँ पूरी करो ;कद्धवीर तुम बढे़ चलो ;खद्ध ध्वज कभी झुके नहीं ;गद्धतुम निडर, हटो नहीं ;घद्ध सूयर् से बढे़ चलो 2.समान अथर्वाले शब्दों को रेखा खींचकर मिलाओ 3.पाठ के आधर पर निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर दो 1.वीरों के हाथ में क्या रहना चाहिए? 2.वीरों को निडर होकर क्या करना चाहिए? 3.मेघ और बिजलियाँ क्या - क्या करती हैं? 4.वीरों को किस - किस की तरह बढ़ना चाहिए?

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