17. पेपरमेशी कागश से तरह - तरह की आकृतियाँ, ख्िालौने, सजावट के लिए झालर, झंडियाँ आदि तो तुमने खूब बनाइर् होंगी, पर कभी मूतिर् बनाइर् है कागश से? हाँ भइर्, कागश से भी मूतिर् बनाइर् जा सकती है। इस कला को अंग्रेशी में पेपरमेशी कहा जाता है। कागश से मूतिर् बनाने की चार विध्ियाँ हैं। इन विध्ियों के बारे में वुफछ मूल बातें यहाँ दे रहे हैं। कागश को भ्िागोकर सबसे पहले यह तय करो कि तुम क्या बनाना चाहते हो क्योंकि जो भी बनाना चाहोगे उसके साँचे की शरूरत पड़ेगी। पुराने अखबार या रद्दी कापी - किताबों को टुकड़े - टुकड़े करके पानी में भ्िागो दो। कागश को डेढ़ - दो घंटे भीगने दो। जब कागश अच्छी तरह भीग जाए तो एक - एक टुकड़ा लेकर साँचे पर चिपकाते जाओ। जब पूरे साँचे परएक तह जम जाए तो उसके ऊपर पाँच - छह तह गोंद की मदद से चिपकाकर बनाओ। अब इसे सूखने के लिए रख दो। सूख जाने पर सावधानी से धीरे - धीरे साँचे पर कागश से बनी रचना को अलग करो। तुम्हारी मूतिर् तैयार है। यह वशन में हलकी भी होगी और गिरने पर टूटने का डर भी नहीं रहेगा। इसे तुम मन चाहे रंगों से रंग भी सकते हो। इस विध्ि से तुम मुखौटे भी बना सकते हो। और हाँ, मुखौटे के लिए तो साँचे की भी आवश्यकता नहीं। बस अपने चेहरे के नाप का तसला या पेपरमेशीध्149 बड़ा कटोरा ;या अन्य कोइर् बरतनद्ध चाहिए। इस पर ऊपर बताए तरीके से ही गीले कागश की पाँच - छह तह चिपकाओ और सूखने के लिए छोड़ दो। जब अच्छी तरह सूख जाए तो इसे मुँह पर लगाकर अनुमान से आँख और नाक के निशान बना लो। आँखों की जगह दो छेद बनाओ। नाक की जगह पर भी छेद बना सकते हो, ताकि तुम्हारी नाक बाहर निकल आए। चाहो तो मुखौटे में कागश की नाक भी बना सकते हो। जब कागश की तीन - चार तह बन जाए तो एक सूखे कागश को हाथ से दबाकर, मुऋी में भींचकरगोला - सा बना लो। इस गोले को दबाकर ऊपर से संकरा और नीचे से थोड़ा चैड़ा नाक जैसा आकार दे दो। अब इसे गोंद लगाकर मुखौटे पर नाक की जगह चिपका दो। मुखौटे पर रंग करके उसे सुंदर बना सकते हो। रंग की मदद से ही आँख की भौंहें, मुँह, मूँछ आदि भी बना लो। भु‘े के बाल, जूट आदि लगाकर भी दाढ़ी, मूँछ या भौंहें बनाइर् जा सकती हैं! 150ध्वस्ंात कागश की लुगदी बनाकर कागश के छोटे - छोटे टुकड़े किसी पुराने मटके या अन्य बरतन में पानी भरकर भ्िागो दो। इन्हें दो - तीन दिन तक गलने दो। जब कागश अच्छी तरह गल जाए तो उसे पत्थर पर कूटकर एक - सा बना लो। अब इस पर गोंद या पिसी हुइर् मेथी का गाढ़ा घोल डालकर अच्छी तरह मिला लो। इस तरह कागश की लुगदी तैयार हो जाएगी। इस लुगदी से मनचाही मूतिर् बना सकते हो। गाँवों में इस विध्ि से डलिया आदि बनाइर् जाती हैं। शायद तुमने भी बनाइर् हो। पर इस तरह की लुगदी से सुघढ़ तथा जटिल डिशाइन वाली मूतिर्याँ या वस्तुएँ नहीं बनाइर् जा सकतीं। लुगदी में खडि़या ;चाॅक पाउडरद्ध मिलाकर एक पाव गोंद, पाँच किलो खडि़या चाहिए। कागश को पानी में भ्िागोकर लुगदी बना लो। अगर पानी श्यादा लगे तो हाथ से दबाकर निकाल दो। अब इसमें खडि़या मिलाते हुए आटे जैसा माड़ते जाओ। बीच में गोंद भी मिला लो। जब तीनों चीशंे अच्छी तरह मिल जाएँ तो मूतिर् के लिए लुगदी तैयार है। पेपरमेशीध्151 मि‘ी की मूतिर्कला के समान कागश की कला ‘पेपरमेशी’ पुरानी नहीं है। अऋारहवीं शताब्दी में इस माध्यम में यूरोप में बहुत काम हुआ। सुंदर डिशाइनों वाले डिब्बे, छोटी - छोटी सजावट की चीशें आदि बनाइर् गईं। दरवाशों और चैखटों पर सुंदर बेलबूटे भी इससे बनाए जाते थे। सन् 1850 के आसपास बड़े - बड़े भवनों के अंदर की सजावट के लिए भी पेपरमेशी का खूब उपयोग हुआ। इससे मुखौटे, गुडि़यों के चेहरे,़चित्रा के चारों तरपफ लगने वाले नक्काशीदार प्रेफम, ब्लाॅक आदि भी बनाए जाते थे। अपने यहाँ भी पेपरमेशी में मूतिर्याँ, डिब्बे इत्यादि खूब बनाए जाते हैं। बिहार में मानव आकार जितनी बड़ी - बड़ी मूतिर्याँ भी बनाइर् जाती हैं और उन्हें वहाँ की प्रसि( चित्रा शैली मधुबनी के समान रंगा भी जाता है। बिहार में इस तरह की मूतिर्याँ बनाने वालों में सुभद्रादेवी का नाम प्रसि( है। कश्मीर में पेपरमेशी से डिब्बे बनानेका काम बहुत सुंदर होता है। उनके ऊपर बेलबूटों के संुदर डिशाइन भी बनाए जाते हैं। अलग - अलग प्रदेशों में लोकनृत्यों और लोककलाओं में कागश के बने मुखौटों का खूब उपयोग किया जाता है। अब इससे तुम जैसी चाहो, वैसी मूतिर् बना सकते हो। साँचे से भी और बिना साँचे के भी। बनने वाली मूतिर्याँ खडि़या के कारण सपेफद होंगी। रंग करके मूतिऱ्को सुंदर बना सकते हो। बाशार में बिकने वाले बहुत से ख्िालौने इसी विध्ि से बनते हैं। लुगदी में मि‘ी मिलाकर इस विध्ि में एक किलो कागश के लिए एक पाव गोंद तथा दस किलो मि‘ी की आवश्यकता होगी। कागश गल जाने पर लुगदी ़तैयार करते समय उसमें सापफ छनी महीन मि‘ी मिलाते जाओ और आटे जैसा गूँथकर एक - सा करते जाओ। गोंद भी इसी बीच मिला दो। 152ध्वस्ंात लुगदी देखने में मि‘ी की तरह दिखेगी, पर हलकी होगी। इससे तुम साँचे या बिना साँचे के उपयोग के मूतिर्याँ बना सकते हो। साँचे से बनाने के लिए अंदाश से आवश्यक लुगदी लो। उसकी गोल लोइर् बना लो। अब पफशर् पर थोड़ी सूखी मि़‘ी परथन की तरह पैफला दो। इस पर लोइर् को रखकर हाथ या बेलन से साँचे के आकार में बड़ा करते जाओ। पर उसकी मोटाइर् बाजरा या ज्वार की रोटी जितनी अवश्य होनी बेलन हलके हाथ से चलाना। जब लोइर् साँचे के आकार की हो जाए तो इसे उठाकर साँचे पर रख दो और हाथ से ध्ीरे - ध्ीरे दबाओ, ताकि उसमें साँचे का आकार अच्छे से आ जाए। जब यह थोड़ा कड़क हो जाए तो साँचे को उलटा करके हलके हाथ से थोड़ा - सा ठोको और साँचे को उठा लो। तुम्हारी मूतिर् तैयार है। इसे पकाया तो नहीं जा सकता, पर हाँ, टूटने पर गोंद ़ोफविकोल से जोड़ शरूर सकते हैं और रंग तो कर ही सकते हैं। ऽ जया विवेक

>Chapter_17>

17

साँस-साँस में बाँस

एक जादूगर थे चंगकीचंगलनबा। अपने जीवन में उन्होंने कई बड़े-बड़े करतब दिखलाए। जब मरने को हुए तो लोगों से बोले, "मुझे दफ़नाए जाने के छठे दिन मेरी कब्र खोदकर देखोगे तो कुछ नया-सा पाओगे।"

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कहा जाता है कि मौत के छठे दिन उनकी कब्र खोदी गई और उसमें से निकले बाँस की टोकरियों के कई सारे डिज़ाइन। लोगों ने उन्हें देखा, पहले उनकी नकल की और फिर नए डिज़ाइन भी बनाए।

बाँस भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुतायत में होता है। भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सातों राज्यों में बाँस बहुत उगता है। इसलिए वहाँ बाँस की चीज़ें बनाने का चलन भी खूब है। सभी समुदायों के भरण-पोषण में इसका बहुत हाथ है। यहाँ हम खासतौर पर देश के उत्तरी-पूर्वी राज्य नागालैंड की बात करेंगे। नागालैंड के निवासियों में बाँस की चीज़ें बनाने का खूब प्रचलन है।

इंसान ने जब हाथ से कलात्मक चीज़ें बनानी शुरू कीं, बाँस की चीज़ें तभी से बन रही हैं। आवश्यकता के अनुसार इसमें बदलाव हुए हैं और अब भी हो रहे हैं।

कहते हैं कि बाँस की बुनाई का रिश्ता उस दौर से है, जब इंसान भोजन इकट्ठा करता था। शायद भोजन इकट्ठा करने के लिए ही उसने ऐसी डलियानुमा चीज़ें बनाई होंगी। क्या पता बया जैसी किसी चिड़िया के घाेंसले से टोकरी के आकार और बुनावट की तरकीब हाथ लगी हो!

बाँस से केवल टोकरियाँ ही नहीं बनतीं। बाँस की खपच्चियों से ढेर चीज़ें बनाई जाती हैं, जैसे-तरह-तरह की चटाइयाँ, टोपियाँ, टोकरियाँ, बरतन, बैलगाड़ियाँ, फ़र्नीचर, सजावटी सामान, जाल, मकान, पुल और खिलौने भी।

बाँस से मेरा रिश्ता

बाँस का यह झुरमुट मुझे अमीर बना देता है। इससे मैं अपना घर बना सकता हूँ, बाँस के बरतन और औज़ार इस्तेमाल करता हूँ, सूखे बाँस को मैं ईंधन की तरह इस्तेमाल करता हूँ, बाँस का कोयला जलाता हूँ, बाँस का अचार खाता हूँ, बाँस के पालने में मेरा बचपन गुज़रा, पत्नी भी तो मैंने बाँस की टोकरी के ज़रिए पाई और फिर अंत में बाँस पर ही लिटाकर मुझे मरघट ले जाया जाएगा।

 

असम में ऐसे ही एक जाल, जकाई से मछली पकड़ते हैं। छोटी मछलियों को पकड़ने के लिए इसे पानी की सतह पर रखा जाता है या फिर धीरे-धीरे चलते हुए खींचा जाता है। बाँस की खपच्चियों को इस तरह बाँधा जाता है कि वे एक शंकु का आकार ले लें। इस शंकु का ऊपरी सिरा अंडाकार होता है। निचले नुकीले सिरे पर खपच्चियाँ एक-दूसरे में गुँथी हुई होती हैं।

खपच्चियों से तरह-तरह की टोपियाँ भी बनाई जाती हैं। असम के चाय बागानों के चित्रों में तुम्हें लोग ऐसी टोपियाँ पहने दिख जाएँगे और हाँ उनकी पीठ पर टँगी बाँस की बड़ी-सी टोकरी देखना न भूलना।

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जुलाई से अक्टूबर, घनघोर बारिश के महीने! यानी लोगों के पास बहुत सारा खाली वक्त या कहो आसपास के जंगलों से बाँस इकट्ठा करने का सही वक्त। आमतौर पर वे एक से तीन साल की उम्र वाले बाँस काटते हैं। बूढ़े बाँस सख्त होते हैं और टूट भी तो जाते हैं। बाँस से शाखाएँ और पत्तियाँ अलग कर दी जाती हैं। इसके बाद ऐसे बाँसों को चुना जाता है जिनमें गाँठें दूर-दूर होती हैं। दाओ यानी चौड़े, चाँद जैसी फाल वाले चाकू से इन्हें छीलकर खपच्चियाँ तैयार की जाती हैं। खपच्चियों की लंबाई पहले से ही तय कर ली जाती है। मसलन, आसन जैसी छोटी चीज़ें बनाने के लिए बाँस को हरेक गठान से काटा जाता है। लेकिन टोकरी बनाने के लिए हो सकता है कि दो या तीन या चार गठानों वाली लंबी खपच्चियाँ काटी जाएँ। यानी कहाँ से काटा जाएगा यह टोकरी की लंबाई पर निर्भर करता है।

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आमतौर पर खपच्चियों की चौड़ाई एक इंच से ज़्यादा नहीं होती है। चौड़ी खपच्चियाँ किसी काम की नहीं होतीं। इन्हें चीरकर पतली खपच्चियाँ बनाई जाती हैं। पतली खपच्चियाँ लचीली होती हैं। खपच्चियाँ चीरना उस्तादी का काम है। हाथों की कलाकारी के बिना खपच्चियों की मोटाई बराबर बनाए रखना आसान नहीं। इस हुनर को पाने में काफ़ी समय लगता है।

टोकरी बनाने से पहले खपच्चियों को चिकना बनाना बहुत ज़रूरी है। यहाँ फिर दाओ काम आता है। खपच्ची बाएँ हाथ में होती है और दाओ दाएँ हाथ में। दाओ का धारदार सिरा खपच्ची को दबाए रहता है जबकि तर्जनी दाओ के एकदम नीचे होती है। इस स्थिति में बाएँ हाथ से खपच्ची को बाहर की ओर खींचा जाता है। इस दौरान दायाँ अँगूठा दाओ को अंदर की ओर दबाता है और दाओ खपच्ची पर दबाव बनाते हुए घिसाई करता है। जब तक खपच्ची एकदम चिकनी नहीं हो जाती, यह प्रक्रिया दोहराई जाती है। इसके बाद होती है खपच्चियों की रंगाई। इसके लिए ज़्यादातर गुड़हल, इमली की पत्तियों आदि का उपयोग किया जाता है। काले रंग के लिए उन्हें आम की छाल में लपेटकर कुछ दिनों के लिए मिट्टी में दबाकर रखा जाता है।

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बाँस की बुनाई वैसे ही होती है जैसे कोई और बुनाई। पहले खपच्चियों को चित्र में दिखाए गए तरीके से आड़ा-तिरछा रखा जाता है। फिर बाने को बारी-बारी से ताने के ऊपर-नीचे किया जाता है। इससे चैक का डिज़ाइन बनता है। पलंग की निवाड़ की बुनाई की तरह।

टुइल बुनना हो तो हरेक बाना दो या तीन तानों के ऊपर और नीचे से जाता है। इससे कई सारे डिज़ाइन बनाए जा सकते हैं।


 

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टोकरी के सिरे पर खपच्चियों को या तो चोटी की तरह गूँथ लिया जाता है या फिर कटे सिरों को नीचे की ओर मोड़कर फँसा दिया जाता है और हमारी टोकरी तैयार! चाहो तो बेचो या घर पर ही काम में ले लो।

एलेक्स एम. जॉर्ज

(अनुवाद-शशि सबलोक)

अभ्यास-प्रश्न

निबंध से

  1. बाँस को बूढ़ा कब कहा जा सकता है? बूढ़े बाँस में कौन सी विशेषता होती है जो युवा बाँस में नहीं पाई जाती?
  2. बाँस से बनाई जाने वाली चीज़ों में सबसे आश्चर्यजनक चीज़ तुम्हें कौन सी लगी और क्यों?
  3. बाँस की बुनाई मानव के इतिहास में कब आरंभ हुई होगी?
  4. बाँस के विभिन्न उपयोगों से संबंधित जानकारी देश के किस भू-भाग के संदर्भ में दी गई है? एटलस में देखो।

निबंध से आगे

  1. बाँस के कई उपयोग इस पाठ में बताए गए हैं। लेकिन बाँस के उपयोग का
    दायरा बहुत बड़ा है। नीचे दिए गए शब्दों की मदद से तुम इस दायरे को पहचान
    सकते हो-
    • संगीत
    • प्रकाशन
    • मच्छर
    • एक नया संदर्भ
    • फर्नीचर

  2. इस लेख में दैनिक उपयोग की चीज़ें बनाने के लिए बाँस का उल्लेख प्राकृतिक संसाधन के रूप में हुआ है। नीचे दिए गए प्राकृतिक संसाधनों से दैनिक उपयोग की कौन-कौन सी चीज़ें बनाई जाती हैं -
  3.    प्राकृतिक संसाधन      दैनिक उपयोग की वस्तुएँ

    • चमड़ा    ......................................
    • घास के तिनके     ......................................
    • पेड़ की छाल    ......................................
    • गोबर     ......................................
    • मिट्टी      ......................................

    इनमें से किन्हीं एक या दो प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए कोई एक चीज़ बनाने का तरीका अपने शब्दों में लिखो।

  4. जिन जगहों की साँस में बाँस बसा है, अखबार और टेलीविजन के ज़रिए उन जगहों की कैसी तसवीर तुम्हारे मन में बनती है?

अनुमान और कल्पना

इस पाठ में कई हिस्से हैं जहाँ किसी काम को करने का तरीका समझाया गया है? जैसे-

छोटी मछलियों को पकड़ने के लिए इसे पानी की सतह पर रखा जाता है या फिर धीरे-धीरे चलते हुए खींचा जाता है। बाँस की खपच्चियों को इस तरह बाँधा जाता है कि वे एक शंकु का आकार ले लें। इस शंकु का ऊपरी सिरा अंडाकार होता है। निचले नुकीले सिरे पर खपच्चियाँ एक-दूसरे में गुँथी हुई होती हैं।

  • इस वर्णन को ध्यान से पढ़कर नीचे दिए प्रश्नों के उत्तर अनुमान लगाकर दो। यदि अंदाज़ लगाने में दिक्कत हो तो आपस में बातचीत करके सोचाे-

(क) बाँस से बनाए गए शंकु के आकार का जाल छोटी मछलियों को पकड़ने के लिए ही क्यों इस्तेमाल किया जाता है?

(ख) शंकु का ऊपरी हिस्सा अंडाकार होता है तो नीचे का हिस्सा कैसा दिखाई देता है?

(ग) इस जाल से मछली पकड़ने वालों को धीरे-धीरे क्यों चलना पड़ता है?

शब्दों पर गौर

हाथों की कलाकारी   घनघोर बारिश   बुनाई का सफ़र

आड़ा-तिरछा      डलियानुमा      कहे मुताबिक

  • इन वाक्यांशों का वाक्यों में प्रयोग करो।

व्याकरण

  1. ‘बुनावट’ शब्द ‘बुन’ क्रिया में ‘आवट’ प्रत्यय जोड़ने से बनता है। इसी प्रकार नुकीला, दबाव, घिसाई भी मूल शब्द में विभिन्न प्रत्यय जोड़ने से बने हैं। इन चारों शब्दों में प्रत्ययों को पहचानो और उन से तीन-तीन शब्द और बनाओ। इन शब्दों का वाक्यों में भी प्रयोग कराे-
  2. बुनावट   नुकीला  दबाव   घिसाई

  3. नीचे पाठ से कुछ वाक्य दिए गए हैं-
  4. (क) वहाँ बाँस की चीज़ें बनाने का चलन भी खूब है।

    (ख) हम यहाँ बाँस की एक-दो चीज़ों का ही जि़क्र कर पाए हैं।

    (ग) मसलन आसन जैसी छोटी चीज़ें बनाने के लिए बाँस को हरेक गठान से काटा जाता है।

    (घ) खपच्चियों से तरह-तरह की टोपियाँ भी बनाई जाती हैं।

    रेखांकित शब्दों को ध्यान में रखते हुए इन बातों को अलग ढंग से लिखो।

  5. तर्जनी हाथ की किस उँगली को कहते हैं? बाकी उँगलियों को क्या कहते हैं? सभी उँगलियों के नाम अपनी भाषा में पता करो और कक्षा में अपने साथियों और शिक्षक को बताओ।
  6. अंगुष्ठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा-ये पाँच उँगलियों के नाम हैं। इन्हें पहचान कर सही क्रम में लिखो।

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