तो तुम्हारा मन भी चाहेगा तुम ऐसे करो। असल में ये बच्चे जंगल में जाकर वूफदते, दौड़ते हैं, पेड़ों पर चढ़ते हैं। अपनी ‘वुफड़ुक’ भाषा में गीत गाते हैं, गिरेहुए पूफल - पत्ते बीनकर मालाएँ, गुलदस्ते बनाते हैं। जंगली पफलों का मशा लेते हैं। तरह - तरह के पक्ष्िायों की बोली निकालते हैं। इन बच्चों के साथ होती हैं इनकी प्यारी दीदी - सूयर्मण्िा। सूयर्मण्िा हर रविवार बच्चों को जंगल में ले जाती हैं। झारखंड के इन जंगलों में घूमते समय सूयर्मण्िा बच्चों को वहाँ के पेड़ - पौधों और जानवरों की पहचान कराती हैं। बच्चों को जंगल में लगी ऐसी क्लास में खूब मशा आता है। फ्जंगल को पढ़ना, किताबें पढ़ने जितना ही शरूरी हैय्, कहती हैं सूयर्मण्िा। वह कहती हैं, फ्हम आदिवासियों की िांदगी जंगलों चचार् करो ऽ तुम्हें क्या लगता है, जंगल क्या होते हैं? ऽ कहीं बहुत सारे पेड़ उगाए गए हों तो क्या वह जंगल बन जाता है? पता करो और लिखो ऽ पेड़ों के अलावा जंगल में और क्या - क्या होता है? ऽ क्या सभी जंगलों में एक ही तरह के पेड़ होते हैं? तुम कितने पेड़ पहचान लेते हो? ऽ सूयर्मण्िा कहती हैं अगर जंगल नहीं बचेंगे तो हम भी नहीं बचेंगे। ऐसा क्यों? सूयर्मण्िा का बचपन बचपन से ही सूयर्मण्िा को जंगल से बहुत लगाव था। वह स्वूफल जाने का सीध रास्ता छोड़ जंगल के रास्ते से आती - जाती थी। सूयर्मण्िा के पिता की छोटी - सी खेती थी। उनका पूरा परिवार पास वाले जंगल से जड़ी - बूटी इकऋी करके बाशार में बेचता था।उसकी माँ बाँस से टोकरी बुनकर और गिरे हुए पत्तों से पत्तल बनाकर बेचती थी।पर जब से शंभु ठेकेदार आया, जंगल से एक पत्ता उठाना भी मुश्िकल हो गया था। सूयर्मण्िा के गाँव के लोग ठेकेदार से डरते थे पर बुध्ियामाइर् नहीं डरती थी। वह कहती, फ्इन जंगलों पर हम आदिवासियों का हक है। हम इनके रखवाले हैं। ठेकेदार की तरह हम जंगल काटते नहीं हैं। हमारे लिए तो जंगल हमारा ‘साँझा - बैंक’ हैμमेरा या तेरा नहीं। जितनी शरूरत है, उतना ही हम जंगल से लेते हैं। जंगल का खशाना हम किसके जंगल? 183 छोटी - सी खेती के सहारे घर चलाना मुश्िकल हो रहा था। सूयर्मण्िा के पिता काम की तलाश में शहर के पास ही रहने लगे। पर पिफर भी हालात नहीं बदले। कभी खाना होता, कभी नहीं। मनिया चाचा अपनी पंसारी की छोटी - सी दुकान से कभी - कभी सूयर्मण्िा के घर अनाश भेज दिया करते। उन्होंने कोश्िाश करके सूयर्मण्िा का दाख्िाला बिशनपुर गाँव के स्वूफल में करा दिया। उसे वहीं रहकर पढ़ना था। स्वूफल से ही पफीस,़खाना, कपड़े, किताबेंμसब वुफछ मुफ्ऱत मिलने वाला था। पर सूयर्मण्िा को अपना गाँव - जंगल छोड़कर दूर जाना पसंद न था। फ्पढ़ोगी नहीं तो भूखों मरोगी,य् मनिया चाचा ने समझाया। फ्भूखों क्यों? यह जंगल है न!य् सूयर्मण्िा का जवाब तैयार था। फ्अरे पगली, हम आदिवासियों को अपने जंगलों से हटाया जा रहा है। कहीं खदान खोद रहे हैं, कहीं बाँध् बना रहे हैं। जंगल के अध्िकारी भी सोचते है जंगल उनके हैं। मेरी मान, पढ़ - लिखकर कायदा - कानून समझेगी तो शायद जंगल बचा पाएगी।य् छोटी सूयर्मण्िा मनिया चाचा की बात वुफछ - वुफछ समझ पाइर्। सोचो और लिखो ऽ तुम किसी को जानते हो जिसे जंगल से बहुत लगाव है? ऽ ठेकेदार ने सूयर्मण्िा के गाँव वालों को जंगल में जाने से रोका। सोचो क्यों? ऽ क्या तुम्हारे आस - पास कोइर् ऐसी जगह है, जो तुम सोचते हो सभी के लिए होनी चाहिए पर वहाँ जाने से लोगों को रोका जाता है? चचार् करो ऽ तुम्हें क्या लगता हैμजंगल किसके हैं? ऽ बुध्ियामाइर् ने कहाμजंगल तो हमारा ‘साँझा बैंक’ हैμन तेेरा, न मेरा। क्या कोइर् और ऐसी चीश है जो हम सबका साँझा खशाना है, कोइर् उसका श्यादा इस्तेमाल करे तो सभी को नुकसान होगा? सूयर्मण्िा का सप़्ाफर बिशनपुर गाँव का स्वूफल देखते ही सूयर्मण्िा का मन ख्िाल उठा। स्वूफल घने जंगल के पास जो था। स्वूफल में सूयर्मण्िा ने खूब मेहनत की और स्काॅलरश्िाप ;वशीपफाद्ध लेकर 184 आस - पास बी.ए. पास किया। वह गाँव की ऐसी पहली लड़की थी। काॅलेज में उसकी पहचान वासवी दीदी से हुइर् जो पत्राकार थीं। उनके साथ मिलकर सूयर्मण्िा ‘झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन’ का काम करने लगी। इस काम के लिए उसे जगह - जगह दूर शहर में जाना पड़ता। उसके पिताजी को यह बात पसंद न थी। पर सूयर्मण्िा ने जंगल बचाने का काम भी जारी रखा और गाँववालों के हक के लिए भी लड़ना शुरू किया। इसमें उसका साथ दिया उसके बचपन के साथी बिजय ने। सूयर्मण्िा का एक और साथी था ‘मिचीर्’, जो दिन - रात उसके साथ रहता। सूयर्मण्िा अपने सपने और मन की हर बात उसे बताती। ‘मिचीर्’ सुनता और कहता ‘चीं - चीं’। सूयर्मण्िा का एक सपना था कि वह अपने ‘वुफड़ुक’ समाज की पहचान बनाए। आदिवासी होने पर जो गवर् उसे महसूस होता है, वह सभी गाँव वालों को भी हो। ऽ क्या तुम्हारा ऐसा कोइर् साथी है, जिसे तुम अपने मन की हर बात बता सकते हो? ऽ कइर् लोग जंगल से इतनी दूर हो गए हैं कि अकसर आदिवासियों की िांदगी नहीं समझते। वुफछ तो उन्हें जंगली भी कह देते हैं। ऐसा कहना क्यों सही नहीं है? ऽ आदिवासी वैफसे रहते हैं इस बारे में तुम क्या जानते हो? लिखो और चित्रा बनाओ। ऽ क्या तुम्हारा कोइर् आदिवासी दोस्त है? उससे जंगल के बारे में तुमने क्या - क्या सीखा? सूयर्मण्िा का ‘तोरांग’ सूयर्मण्िा 21 साल की थी जब उसने वासवी दीदी और कइर् लोगों की मदद से एक वेंफद्र खोला। उसने इस जगह का नाम रखा ‘तोरांग’। वुफड़ुक भाषा में ‘तोरांग’ का मतलब हैμ जंगल। सूयर्मण्िा चाहती थी कि लोग त्योहारों पर अपने गीत - गानों को गाएँ, उन्हें भूलें न और अपने पहनावे को चाव से पहनंे। जड़ी - बूटियों की समझ और बाँस की चीशें बनाने की कला बच्चे भी सीखें। अपनी स्वूफल की भाषा तो सीखें ही, अपनी वुफड़क भाषा का रिश्ताुभी उससे जोड़ें। यह सब तोरांग वेंफद्र में होता है। ‘तोरांग’ में वुफड़ुक समाज और अन्य आदिवासियों की खास किताबों को सँभालकर रखा गया है। गाने - बजाने की कइर् चीशें, जैसेμबाँसुरी, तरह - तरह के ढोल भी हैं। कहीं अन्याय हो रहा हो, किसी को डर हो कि उसकी शमीन हड़प ली जाएगी...कोइर् रोशगार छिन जाने से परेशान हो...जिस किसी को भी मदद की शरूरत होती, वह सूयर्मण्िा की मदद लेता। सूयर्मण्िा सबके हक के लिए लड़ती है। सूयर्मण्िा ने अपने साथी बिजय के साथ शादी कर ली है। दोनों साथ में काम करते हैं। आज उनके काम को कइर् लोग सराहते हैं। उन्हें विदेश भी बुलाते हैं, उनके अनुभवों से सीखने के लिए। जंगल के नए कानून बनाने के लिए भी आज वहाँ लोग अपनी आवाश उठा रहे हैं। 186 आस - पास सोचो पढ़ो और बताओ ऽ उड़ीसा के एक स्वूफल की दसवीं क्लास की लड़की सिकिया ने वहाँ के मुख्यमंत्राी को पत्रा लिखा। उसका एक हिस्सा पढ़ो। फ्हम आदिवासियों के लिए जंगल ही सब वुफछ है। हम एक दिन भी जंगल से दूर नहीं रह सकते। तरक्की के नाम पर जंगल में सरकार द्वारा बहुत से प्रोजेक्ट्स चलाए जा रहे हैंμकहीं बाँध् बन रहे हैं तो कहीं प़्ौफक्टरी। जंगल जिस पर हमारा अध्िकार है, हमसे छीना जा रहा है। इन प्रोजेक्ट्स के चलते यह सोचने की शरूरत है कि हम आदिवासी कहाँ जाएँगे और रोशी - रोटी का क्या होगा? इन जंगलों में रहने वाले लाखों जानवर कहाँ जाएँगे? अगर जंगल न रहे, खानों में से एल्यूमीनियम जैसे खनिज निकालकर शमीन को खोखला कर दें, तो बचेगा क्या? सिप़्ार्फ दूष्िात हवा और पानी, और मीलों दूर तक पैफली बंजर शमीन..ऽ क्या तुम्हारे आस - पास कोइर् प़्ौफक्टरी है या कोइर् काम चल रहा है? किस तरह का काम? ऽ प़्ौफक्टरी की वजह से क्या शमीन और पेड़ों पर कोइर् असर पड़ रहा है? क्या वहाँ के लोगों ने भी इस बात को उठाया है? ऽ तुमने सिकिया की चिऋी पढ़ी। नक्शे में देखो उड़ीसा कहाँ है? ऽ क्या उड़ीसा के किसी किनारे पर समुद्र है? समुद्र वैफसे पहचाना? ऽ नक्शे में और कौन - कौन से ऐसे राज्य हैं, जिनके किसी किनारे पर समुद्र है? ऽ नक्शे में सूयर्मण्िा का राज्य झारखंड कहाँ है? ऽ नक्शे में जंगल कहाँ - कहाँ हैं? वैफसे पहचानोगे? ऽ यह वैफसे पहचाना, कहाँ श्यादा घने जंगल हैं और कहाँ कम घने जंगल हैं? ऽ नक्शे में कौन - सा राज्य है जहाँ सबसे श्यादा घने जंगल हैं? ऽ अगर कोइर् मध्य प्रदेश में है तो देश के सबसे श्यादा घने जंगल उसकी किस दिशा में होंगे? उन राज्यों के नाम लिखो। किसके जंगल? 187 मिशोरम में खेती की लाॅटरी झारखंड के जंगलों के बारे में तुमने सूयर्मण्िा की कहानी में पढ़ा। अब तुम मिशोरम राज्य के पहाड़ों पर वैफसे जंगल होते हैं, वहाँ लोग वैफसे रहते हैं, वैफसे खेती करते हैंμउसके बारे में पढ़ो। टन् - टन् - टन्! स्वूफल छूटने की घंटी बजते ही लाॅमटे - आ, डिंगा, डिंकीमा ने अपने बस्ते उठाए और चल दिए घर की ओर। बीच में सभी ने झरने से पानी पीयाμवहीं पर रखे बाँस के बने कप में। आज सभी बच्चे ही नहीं उनके ‘सायमा सर’ भी गाँव पहुँचने की जल्दी में हैं। आज शाम गाँव की खास सभा बैठने वाली है। इस साल किस परिवार को खेती की कितनी शमीन मिलेगी इसकी लाॅटरी निकलने वाली है। शमीन को साँझा मानकर सब लोगों को बारी - बारी उस शमीन पर खेती करने का मौका मिलता है। बाँस के एक सुंदर बतर्न को हिलाकर उसमें से एक पचीर् निकाली गइर्। वाह! ‘सायमा सर’ के परिवार का नंबर पहला आया। वे बोले, फ्झूम खेती की पहली पचीर् मेरे परिवार के नाम आइर् है, यह मेरे लिए खुशी की बात है। मगर इस साल हम श्यादा शमीन नहीं ले पाएँगे। पिछली बार मैंने श्यादा शमीन ले ली थी और मैं अपनी िाम्मेदारी पूरी नहीं किसके जंगल? 189 कर पाया था। मेरी बहन झीरी की शादी के बाद, स्वूफल की नौकरी के साथ अकेले खेती का काम करना मेरे लिए मुश्िकल है।य् सायमा सर ने ‘तीन टीन’ शमीन माँग ली। छोटी माथनी पूछ बैठी, फ्तीन टीन शमीन?य् चाँमुइर् ने समझाया, फ्एक टीन बीज हम जितनी शमीन में बोते हैं उसे ही ‘एक टीन’ शमीन बोलते हैं।य् ध्ीरे - ध्ीरे ऐसे ही लाॅटरी से गाँव के सभी परिवारों को खेती के लिए बाकी शमीन मिल गइर्। पता करो ऽ नक्शे में मिशोरम और उसके आस - पास के राज्यों के नाम पढ़ो। ऽ तुमने शमीन को टीन से नापने का तरीका पढ़ा। शमीन को नापने के और तरीके क्या - क्या हैं? ऽ स्वूफल से आते हुए बच्चों ने रास्ते में बाँस के बने कप से पानी पीया। तुम्हें क्या लगता है, जंगल में कप किसने बनाकर रखा होगा? क्यों? ऽ तुमने ऐसी कोइर् चीश देखी है जो लोग इस्तेमाल करते हों और जिसकी रखवाली के लिए कोइर् बैठा न हो? झूम खेती झूम खेती का तरीका निराला है। एक प़्ाफसल कटने के बाद शमीन को वुफछ साल तक आराम करने देते हैं, उसमें खेती नहीं करते। इस जगह जो बाँस या जंगल उग जाता है उसे उखाड़ते नहीं। बस गिराकर जला देते हैं। यह राख शमीन में खाद का काम करती है। शमीन को जलाते हुए आस - पास के पेड़ न जलें, जंगलों को नुकसान न पहुँचे, यह भी देखना पड़ता है। पिफर जब इस शमीन में खेती की बारी आती है तो शमीन को जोता नहीं जाता। मि‘ी को हल्के से हिलाकर बीज छिड़क देते हैं। एक ही खेत में अलग - अलग तरह के बीज - जैसे मकइर्, सब्िशयाँ, मिचर् और चावल बोए जाते हैं। प़्ाफसल के समय भी अनचाही घास और पौधें को उखाड़ते नहीं हैं, उन्हें गिरा देते हैं। ताकि वे शमीन की मि‘ी में मिल जाएँ। इससे भी शमीन उपजाउफ बनती है। अगर किसी परिवार में किसी कारण खेती का काम पिछड़ जाता है तो दूसरे लोग मदद के 190 आस - पास लिए आ जाते हैं। बस उस परिवार को उन्हें खाना ख्िालाना पड़ता है। मुख्य प़्ाफसल चावल की ही होती है। प़्ाफसल तैयार होने पर उसे घर ले जाना पीठ तोड़ मेहनत का काम है। सड़वेंफ तो हैं नहीं। बस उँफचे - नीचे पहाड़ हैं। पीठ पर ही लादकर सारी प़्ाफसल इन रास्तों से घर तक लानी पड़ती है। कइर्हफ्ऱते लग जाते हैं। प़्ाफसल पकने पर गाँव में सबसे बड़ा त्योहार मनाया जाता है। सब साथ में खाना पकाते हैं, खाते हैं और मशे करते हैं। ‘चेराओ’ नाच भी करते हैं। इस नाच में शमीन पर बाँस की डंडी लेकर दो - दो लोगों की जोड़ी आमने - सामने बैठती है। ढोल की ताल पर डंडियों को शमीन पर पीटते हैं। डंडियों के बीच लोग एक कतार में खड़े होकर वूफदते हैं और नाचते हैं। ऽ ‘चराओ’ नाच के बारे में पता करो। कक्षा में नाच करो। मिशोरम में लगभग तीन - चैथाइर् लोग जंगलों से जुड़े हैं। मुश्िकल जीवन जीते हुए भी लगभग सभी बच्चे स्वूफल जाते हैं। इस चित्रा में देखोμबच्चे वैफसेमस्ती में पत्तों से सीटी बजा रहे हैं। ऐसी कइर् सीटियाँ तुमने भी तो बनाइर् हैं!

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