लगभग दो साल पहले जात्रया का परिवार सिंदूरी गाँव से मुंबइर् आया था। अपना कहने को यहाँ दूर के रिश्तेदार का एक परिवार ही था। उन्हीं की मदद से जात्रयाभाइर् ने मछली पकड़ने के कटे हुए जालों की मरम्मत का काम शुरू किया। इससे तो उनका गुशारा न हो सका। घर का किराया, दवाइर्, खाना, स्वूफल का खचार् ही नहीं, पानी भी पैसों से खरीदना पड़ रहा था। छोटे सीडया को भी पास वाले मछली के कारखाने में काम करना पड़ा। सीडिया सुबह के चार बजे से सात बजे तक मछली साप़्ाफ करता, छोटी - बड़ी मछलियाँ छाँटता। उसके बाद वह घर आता। थोड़ी देर सोकर दोपहर को स्वूफल जाता। शाम को सब्शी - मंडी में घूमता पिफरता। कभी किसी मेमसाहब की थैलियाँ उठाता तो कभी रेलवे स्टेशन पर जाकर पानी की खाली बोतलें ढूँढ़कर कबाड़ीवाले को बेचता। जैसे - तैसे ही चल रही थी उनकी िांदगी। 165 अब तो रात भी हो गइर्, लेकिन सीडया घर नहीं आया। झिमली पड़ोसी के घर की ख्िाड़की से टी.वी. पर नाच देख रही थी। मगर जात्रया का मन टी.वी. देखने में नहीं लगता। यहाँ सब वुफछ कितना अलग था। कितनी नइर्, अजीब दुनिया थी। दिन काम की भगदड़ में चला जाता और शाम पुरानी यादें लेकर आती। सोचो और बताओ ऽ जात्रया भीड़ में रहकर भी अकेला महसूस कर रहा था। क्या तुम्हारे साथ भी कभी ऐसा हुआ है? ऽ अपनी जगह छोड़कर दूर नइर् जगह जाकर रहना वैफसा लगता होगा? ऽ जात्रया जैसे परिवार बड़े शहरों में क्यों आते होंगे? ऽ क्या तुमने ऐसे बच्चों को देखा है, जो काम पर भी जाते हैं? ऽ ये बच्चे किस तरह के काम करते हैं? क्यों करने पड़ते होंगे? पुरानी यादें हरे - भरे घने जंगलों और पहाडि़यों के बीच खेड़ी गाँव में जात्रया का जन्म हुआ था। उसके दादा के जन्म के पहले से ही ये लोग यहाँ रह रहे थे। उनके गाँव में शांति तो थी, लेकिन सन्नाटा नहीं था। गाँव में नदी की कल - कल, पेड़ों की सन - सन, पंछियों की चहक थी। यहाँ के लोग खेती का काम करते थे। गाँव के लोग जंगलों में जाकर कंद - मूल, साग - सब्शी और सूखी टहनियाँ लाते। ये सब काम करते समय लोग बातें करते और गाने गुनगुनाते। बड़ों के साथ काम करके छोटे बच्चे भी ये सभी काम सीख जाते, जैसेμबाँसुरी बजाना, ढोल बजाना, मिलकर नाचना, 166 आस - पास मि‘ी और बाँस के बतर्न बनाना, पंछियों को पहचानना, उनकी नकल करना, आदि। लोग जंगल से इकऋा किया सामान इस्तेमाल करते। बचा हुआ सामान नदी पार के बड़े गाँव में जाकर बेच देते। इन पैसों से वे अपने लिए नमक, तेल और कभी थोड़े कपड़े खरीदते। वैसे तो वह एक गाँव था मगर सब एक बड़े परिवार जैसे रहते थे। जात्रया की बहन की शादी भी उसी गाँव में हुइर् थी। अच्छे - बुरे समय में सब साथ मिलकर एक - दूसरे की मदद करते थे। शादी - ब्याह के काम और झगड़े, गाँव के बड़े - बुशुगर् साथ मिलकर निपटाते। जात्रया अब जवान हो गया था। वह खेती का भारी काम अकेले ही करता। बड़ी नदी के बीचोंबीच मछली भी पकड़ता। अब वह जंगल से पफल, वंफद, दवाइर् केलिए पिायाँ, नदी की मछली, आदि सब लेकर दोस्तों के साथ कस्बे के गाँव में बेचा करता। गाँव में त्योहार के समय अपनी उम्र के लड़के - लड़कियों की टोली में नाचता और ढोल भी बजाता। बताओ ऽ खेड़ी गाँव में बच्चे क्या - क्या सीखते थे? ऽ तुम अपने बड़ों से क्या - क्या सीखते हो? ऽ जिन चीशों का ज्ञान जात्रया को खेड़ी में हासिल हुआ, उनमें से कितना उन्हें मुंबइर् में काम आया होगा? ऽ क्या तुम हर रोश पक्ष्िायों की आवाशें सुनते हो? कौन - कौन से? ऽ क्या तुम किसी पक्षी की आवाश की नकल कर सकते हो? करके दिखाओ। ऽ तुम रोश ऐसी कौन - सी आवाशें सुनते हो, जो खेड़ी के लोग नहीं सुनते होंगे? ऽ क्या तुमने सन्नाटा महसूस किया है? कब और कहाँ? नदी के पास एक दिन गाँव वालों ने सुना कि उनकी नदी पर एक बहुत बड़ा बाँध् बनने वाला है। नदी को रोककर एक बहुत बड़ी दीवार - सी खड़ी की जाएगी। तब खेड़ी और आस - पास के बहुत सारे गाँव पानी में डूब जाएँगे। लोगों को अपने पुरखों ;बाप - दादाद्ध की शमीन, घर - बार छोड़कर नइर् जगह चले जाना होगा। वुफछ दिन बाद सरकारी लोग पुलिस की पलटन को लेकर गाँव - गाँव पहुँचने लगे। गाँव के छोटे बच्चों ने तो पहली बार पुलिस देखी। वुफछ बच्चे उनके पीछे भागते तो वुफछ डर से रोने लगते। वे नदी की चैड़ाइर्, लंबाइर्, गाँव के घर, खेत, जंगल, सब नापने पार बहुत दूर बसने के लिए नइर् जगह दी जाएगी। दूसरी जगह जहाँ शमीन मिलेगी, वहाँ स्वूफल, बिजली, अस्पताल हांेगे, बस और ट्रेनंे भी होंगी। नए गाँव में वह सब होगा, जो आज तक खेड़ी के लोगों ने सोचा भी न था।य् उसके माँ - बाबा और गाँव के कइर् बड़े - बूढ़ों को अपना गाँव छोड़ना पसंद न था। जात्रया भी यह सुनकर थोड़ा सहम जाता, थोड़ा खुश भी हो जाता। सोचता, वह शादी के बाद अपनी दुलहन 168 आस - पास को नए गाँव के नए घर में ले जाएगा। ऐसा घर, जिसमें बटन दबाते ही बिजली जलेगी और घर में नल खोलते ही पानी। बस में बैठकर वह शहर घूमने जाएगा। सोचता, जब बच्चे होंगे, तब उन्हें स्वूफल भेज पाउँफगा। उन्हें अपने जैसा अनपढ़ नहीं रखूँगा। चचार् करो और बताओ ऽ जात्रया के गाँव के कइर् लोगों को अपने जंगल - शमीन छोड़ना मंशूूर न था। ऐसा क्यों? न चाहते हुए भी उन्हें अपना गाँव छोड़ना ही पड़ा। सोचो क्यों? ऽ जात्रया के खेड़ी के परिवार में कितने लोग थे? जात्रया जब अपने परिवार के बारे में सोचता तो उसके मन में कौन - कौन आता? ऽ अपने परिवार के बारे में सोचते हो तो तुम्हारे मन में कौन - कौन आता है? ऽ क्या तुमने ऐसे लोगों के बारे में सुना है, जो अपनी पुरानी जगह से हटना पसंद नहीं करते? उनकी वुफछ बातें बताओ। ऽ क्या तुम कोइर् ऐसी जगह जानते हो, जहाँ स्वूफल है ही नहीं? कल्पना करो ऽ जहाँ बाँध् बनता है, वहाँ के लोगों को क्या - क्या परेशानियाँ होती होंगी? ऽ खेड़ी गाँव और जात्रया के सपनों के नए गाँव के चित्रा अपनी काॅपी में बनाओ। अपने साथी का चित्रा भी देखो। उनमें अंतर ढूँढ़ो। एक नइर् जगह दोपहर का समय था। कड़ी ध्ूप और गमर् हवा से जात्रया बेजान था। डामर ;कोलतारद्ध से बना रास्ता जलते तवे जैसा गमर् था। आस - पास कोइर् छायादार पेड़ भी न था। सिप़्ार्फ वुफछ मकान और दुकानें थीं। दवाइयाँ खरीदकर जात्रया घर की ओर चल पड़ा। उसकी पीठ पर पुराना टायर था। आजकल घर का चूल्हा जलाने के लिए वह ऐसे टायरों के रबड़ के टुकड़ों को जलाता था। ये आग जल्दी पकड़ते थे और इससे लकड़ी भी कम लगती थी। पर इसके जलने से हुइर् बू और ध्ुँए से सब परेशान थे। सिंदूरी नाम के इस नए गाँव में हर चीश पैसों से मिलती थी। दवाइर्, सब्शी, अनाज, पशुओं की खुराक और लकड़ी भी। मि‘ी का तेल तो उनकी पहुँच से बाहर था। कहाँ से लाएँ इतने पैसे? सोचते - सोचते जात्रया अपने घर तक पहुँच गया। छत के नाम पर टीन की चादर भ‘ी जैसी जल रही थी। जात्रया की बीवी तेश बुखार से तप रही थी। उसकी बेटी झिमली अपने छोटे भाइर् सीडया को गोद में लेकर सुला रही थी। घर में और कोइर् बड़ा भी तो नहीं था। माँ और पिताजी तो पहले ही खेड़ी छोड़ने के गम में चल बसे थे। इस नइर् जगह पर उनके गाँव के आठ - दस परिवार ही थे, जो उसके अपने थे। बाकी सारा गाँव यहाँ - वहाँ बिखर गया था। जिन्हें जहाँ शमीन दी गइर्, वे वहीं बस गए। जैसा सपना देखा था, वैसा तो नहीं था यह नया गाँव। बिजली तो थी, मगर वह भी कभी रहती, कभी नहीं। उफपर से बिजली के बिल का नया खचार् भी तो था। वहाँ नल तो थे, पर उनमें पानी न आता। इस गाँव में जात्रया को टीन की चादर से बना हुआ एक कमरे का घर मिला। उसमें पशुओं को रखने की तो जगह ही नहीं थी। थोड़ी - सी खेती की शमीन भी मिली थी। मगर वह खेती के लायक नहीं थी। बड़े - बड़े पत्थरों और वंफकड़ों से भरी थी। जात्रया और उसका परिवार पिफर भी जी - जान से उसमें मेहनत करते। मगर धन - खाद को खरीदने में जो पैसे खचर् होते, उतने भी हाथ न आते। 170 आस - पास वहाँ पुराने गाँव में बीमारी कम थी। अगर कोइर् बीमार हो भी जाता, तो जड़ी - बूटी की दवाइर् जानने वाले बहुत - से लोग थे। उनके इलाज से सेहत सुध्र जाती थी। यहाँ अस्पताल तो थे पर डाॅक्टर मुश्िकल से मिल पाते और दवाइर् भी न मिलती। यहाँ स्वूफल था, पर टीचर खेड़ी के इन बच्चों की तरपफ ध्यान ही नहीं देती थी।़नइर् भाषा की पढ़ाइर् इन बच्चों के लिए कठिन भी थी। सिंदूरी गाँव के लोगों को इन लोगों का यहाँ आना पसंद न था। उनको खेड़ी के लोगों की भाषा, रहन - सहन सब अजीब लगता। वे खेड़ी वालों को ‘बिन बुलाए मेहमान’ कहकर, उनका मशाक भी उड़ाते थे। क्या सोचा था, और क्या हुआ? लिखो ऽ क्या सिंदूरी गाँव जात्रया के सपनों के गाँव जैसा था? ऽ ‘सिंदूरी’ और ‘अपने सपनों के गाँव’ में उसे क्या अंतर मिला? ऽ क्या तुम कभी किसी के घर ‘बिन - बुलाए मेहमान’ थे? वैफसा लगा? ऽ जब तुम्हारे यहाँ वुफछ दिन मेहमान रहने आते हैं, तब तुम्हारे परिवार वाले क्या - क्या करते हैं? वुफछ साल बाद जात्रया ने वुफछ साल सिंदूरी में ही बिताए। बच्चे भी बड़े हो रहे थे। मगर जात्रयाभाइर् का मन अब सिंदूरी में नहीं लगता था। उन्हें तो बस अपने खेड़ी गाँव की याद सताती रहती, पर अब खेड़ी था कहाँ? खेड़ी और आस - पास के इलाके में थाμएक बहुत बड़ा बाँध् और रुके हुए पानी का एक बड़ा - सा तालाब। जात्रयाभाइर् ने सोचा, ‘बिन बुलाए मेहमान’ ही कहलाना है, तो ऐसी जगह जाएँ, जहाँ अपने सपने पूरे तो हों। उन्होंने अपनी शमीन और जानवर बेच दिए और वे मुंबइर् आ गए। अब उसके परिवार की नइर् िांदगी शुरू हुइर्। बच्चे स्वूफल में जाएँ, वुफछ बनें, बस यही चाहते थे। यहाँ के हालात अच्छे तो नहीं थे, मगर ध्ीरे - ध्ीरे शायद सब ठीक हो जाएगा। यही वे सोचते थे। जात्रया ने अपनी खोली ;एक कमरे की रहने की जगहद्ध की मरम्मत के लिए पैसे बचाने शुरू किए। उनके रिश्तेदारों ने कहा, फ्मत बरबाद करो ये पैसे। शायद जाएँ तो जाएँ कहाँ 171 वाले लोगों के लिए मुंबइर् में रहने की जगह नहीं है।य् जात्रयाभाइर् यह सुनकर डर गए। उन्होंने सोचाμखेड़ी छोड़कर सिंदूरी गाँव में, उसके बाद अब यहाँ मुंबइर् में। अब यहाँ से भी हटना पड़ेगा, तो जाएँगे कहाँ? क्या इतने बड़े शहर में मेरे छोटे - से परिवार के लिए एक छोटा - सा घर भी नहीं है? सोचो ऽ जात्रयाभाइर् ने क्या सोचकर मुंबइर् जाने की ठानी? क्या उन्हें मुंबइर् वैसा ही मिला? ऽ जात्रयाभाइर् के बच्चे मुंबइर् में किस तरह के स्वूफल में जाते होंगे? पता करो और लिखो ऽ क्या तुम किसी बच्चे या परिवार को जानते हो, जो अपनी जगह से हटाए गए हों? उनसे बात करो। μ वे कहाँ से आए हैं? उन्हें यहाँ क्यों आना पड़ा? μ उनकी पहली जगह वैफसी थी? उसकी तुलना में नइर् जगह वैफसी है? μ क्या उनकी भाषा और रहन - सहन यहाँ के लोगों से अलग है? वैफसे? μ उनकी भाषा के वुफछ शब्द सीखकर लिखो। μ क्या वे वुफछ ऐसी चीशें बनाना जानते हैं, जो तुम नहीं जानते? क्या? चचार् करो ऽ तुमने शहर की किसी बस्ती को हटाने के बारे में सुना या पढ़ा है? तुम्हें इसके बारे में वैफसा लगता है? ऽ नौकरी में तबादला होने पर भी अपने रहने की जगह से दूर जाना पड़ता है। तब वैफसा लगता है? वाद - विवाद करो ऽ वुफछ लोग ऐसा सोचते हैंμफ्शहरी लोग गंदगी नहीं पैफलाते। शहर का गंद तो झुग्गी - झोंपडि़यों से है।य् तुम्हें क्या लगता हैμआपस में बात करो, बहस करो। जाएँ तो जाएँ कहाँ 173

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