एक था लकड़हारा। जंगल में जाकर रोश लकडि़याँ काटता और शहर में जाकर शाम को बेच देता था। एक दिन वह दूर जंगल के अंदर चला गया। कटकटी का जाड़ा पड़ रहा था। उसकी उँगलियाँ बिल्वुफल सुन्न होती जाती थी। वह थोड़ी - थोड़ी देर बाद वुफल्हाड़ी रख देता और दोनों हाथों को मुँह के पास ले जाकर खूब शोर से उनमें पूँफक मारता कि गमर् हो जाएँ। कोने में खड़े एक मियाँ बालिश्ितये उसे देख रहे थे। घूर - घूरकर उन्होंने जब देखा कि वह बार - बार हाथ में वुफछ पूँफकता है तो सोचने लगे कि यह बात क्या है। मगर वुफछ समझ में न आया तो वे अपनी जगह से उठे और वुफछ दूर चलकर पिफर लौट आए, कि न मालूम कहीं पूछने से यह आदमी बुरा न माने। मगर पिफर रहा न गया। आख्िार वे ठुम्मक - ठुम्मक लकड़हारे के पास गए और कहा, फ्सलाम भाइर्, बुरा न मानो तो एक बात पूछें?य् लकड़हारे को यह शरा - सा आदमी देखकर ताज्जुब भी हुआ, हँसी भी आइर्। मगर उसने हँसी को रोककर कहा, फ्हाँ - हाँ भइर्, शरूर पूछो।य् फ्बस यह पूछता हूँ कि तुम मुँह से हाथ पर पूँफक - सी क्यों मारते हो?य् लकड़हारे ने जवाब दिया, फ्सदीर् बहुत है। हाथ ठिठुरे जाते हैं। मैं मुँह से पूँफककर उन्हें शरा गमार् लेता हूँऋ पिफर ठिठुरने लगते हैं, पिफर पूँफक लेता हूँ।य् मियाँ बालिश्ितये ने कहा, फ्अच्छा - अच्छा, यह बात है।य् यह कहकर बालिश्ितये मियाँ वहाँ से तो ख्िासक गए, मगर रहे आस - पास ही। दोपहर का वक्त आया। लकड़हारे को खाना पकाने की प्ि़ाफव्रफ हुइर्। इध्र - उध्र से दो पत्थर उठाकर चूल्हा बनाया। आग सुलगाकर चूल्हे पर आलू रख दिए। लकड़ी गीली थी। इसलिए आग बार - बार ठंडी हो जाती तो लकड़हारा मुँह से पूँफककर तेश कर देता था। फ्अरे,य् बालिश्ितये ने दूर से देखकर अपने जी में कहा, फ्अब यह पिफर पूँफकता है! क्या इसके मुँह से आग निकलती है?य् लकड़हारे को भूख श्यादा लगी थी इसलिए एक सिका हुआ आलू उठाया। उसे खाना चाहा तो वह ऐसा गमर् था जैसे आग। तो पिफर वह मुँह से ‘पूफ - पूफ’ करके पूँफकने लगा। फ्अरे,य् बालिश्ितये ने पिफर जी में कहा, फ्यह पिफर पूँफकता है! अब क्या इस आलू को पूँफककर जलाएगा?य् थोड़ी देर ‘पूफ - पूफ’ करके लकड़हारे ने उसे अपने मुँह में रख लिया और गपगप खाने लगा। अब तो इस बालिश्ितये की हैरानी का हाल न पूछो! इससे 140 आस - पास पिफर न रहा गया और ठुम्मक - ठुम्मक पिफर लकड़हारे के पास आया और कहाμ फ्सलाम भाइर्, बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ?य् लकड़हारे ने कहा, फ्बुरा क्यों मानूँगा? पूछो।य् बालिश्ितये ने कहा, फ्तुमने सुबह मुझसे कहा था कि मुँह से पूँफककर अपने हाथों को गमार्ता हूँ। अब इस आलू को क्यों पूँफकते थे? यह तो खुद बहुत गमर् था। इसे और गमार्ने से क्या पफायदा?य़्फ्नहीं मियाँ टिटलू। यह आलू बहुत गमर् है। मैं इसे मुँह से पूँफक - पूँफककर ठंडा कर रहा हूँ।य् बात तो वुफछ ऐसी न थी मगर यह सुनकर मियाँ बालिश्ितये का मुँह पीला पड़ गया। डर के मारे कप - कप काँपने लगे। उसके पैर पीछे हटते जाते थे। लकड़हारा भलामानस था। उसने आख्िार पूछा, फ्क्यों मियाँ, क्या हुआ, क्या जाड़ा बहुत लग रहा है?य् मगर मियाँ बालिश्ितये थे कि बराबर पीछे ही हटते चले गए। और जब काप़्ाफी दूर हो गए तो बोले, फ्अरे...यह न जाने क्या बला है। कोइर् भूत है या जिन्न! ‘उसी से ठंडा उसी से गमर्’ हमारी अकल में यह बात नहीं आती।य् सच है, यह बात बालिश्ितये की नन्ही - सी खोपड़ी में आने की थी भी नहीं! μडाॅ. शाकिर हुसैन ऽ सोचो, क्या असल में बालिश्ितये होते हैं? इस कहानी के लेखक ने बालिश्ितये करके देखो बालिश्ितये ने जब यह देखा कि लकड़हारा आग सुलगाने के लिए भी और आलू ठंडा करने के लिए भी पूँफक रहा था तो उसे बड़ी हैरानी हुइर्। ऽ क्या तुमने भी कभी सदीर् में अपने हाथों पर पूँफक मारी है? वैफसा लगता है? ऽ अपने हाथों को मुँह के पास लाकर शोर से दो - तीन बार पूँफक मारो। मुँह से छोड़ी हुइर् पँूफक की हवा आस - पास की हवा के मुकाबले वैफसी लगी? ऽ अगर हाथों को मुँह से थोड़ी दूरी पर रखो, तब भी क्या मुँह से निकली हुइर् हवा गमर् लगेगी? क्यों? उसी से ठंडा उसी से गमर् सोचो और बताओ ऽ क्या तुम कोइर् और ऐसी स्िथति सोच सकते हो जब पूँफक मारने से गमीर् मिलती है? ऽ अपने रूमाल या किसी भी मुलायम कपड़े को दो - तीन बार मोड़ दो। उसे मुँह के पास लाकर दो - तीन बार शोर से पूँफक मारो। क्या रूमाल या कपड़ा वुफछ गमर् हो गया? करके देखो। ऽ बालिश्ितये ने देखा कि लकड़हारा गमर् - गमर् आलू को पूँफक मारकर ठंडा कर रहा था। अगर वह बिना पूँफक मारे ही गमर् - गमर् आलू को खा लेता तो क्या होता? ऽ क्या कभी वुफछ गमर् खाने या पीने से तुम्हारी जीभ जली है? तुम अपने गमर् खाने को वैफसे - वैफसे ठंडा करते हो? ऽ अगर रोटी, चावल और दाल बहुत गमर् हैं तो तुम तीनों को किस - किस अलग - अलग चीशों से सीटी बजाओ ऽ नीचे दी गइर् चीशों से आवाशें निकालकर देखो। लिखो उनमें से किससे सबसे तेश सीटी बजी और किससे सबसे ध्ीरे। आवाश की तेशी को व्रफम में लिखोμ ऽ क्या तुमने कभी देखा या सुना है कि लोग अलग - अलग चीशों के इस्तेमाल से अलग - अलग तरह का संगीत बजाते हैं। जैसेμबाँसुरी, ढोलक, बीन, मृदंग, गिटार, आदि। क्या तुम आँखें बंद करके इनकी आवाशें पहचान सकते हो? इन सभी चीशों के बारे में और बातें पता करो। चित्रा भी इकऋे करो। लिखो ऽ क्या तुम ऐसी चीशों के नाम बता सकते हो, जिनमें पूँफक मारने से सुहावनी आवाश निकलती है? उनके नाम लिखो। करके देखो और चचार् करो ऽ क्या तुमने कभी देखा है कि कोइर् चश्मा साप़्ाफ करने के लिए अपने मुँह से हवा निकाल रहा हो? मुँह से निकली हवा से चश्मा सापफ करने में वैफसे मदद मिलती होगी?़ऽ एक स्टील का गिलास लो। उसे मुँह के पास लाकर मुँह खोलकर शोर से साँस छोड़ो। इस तरह दो - तीन बार साँस छोड़कर देखो। क्या गिलास वुफछ ध्ुँध्ला - सा हो गया है? ऽ क्या तुम इसी तरह शीशे को भी ध्ुँध्ला बना सकते हो? शीशे को छूकर पता लगा सकते हो कि यह ध्ुँध्लापन किस वजह से है? छोड़ी हुइर् हवा सूखी है या गीली? ऽ अपने हाथ को अपनी छाती पर रखो। अब साँस भरो। क्या हुआ? छाती अंदर गइर् या बाहर? ऽ अपनी छाती का नाप लो μ एक लंबी गहरी साँस भरो। μ अपने साथी से कहो कि वह एक धगे से तुम्हारी छाती का नाप ले। नाप μ अब साँस छोड़ो और पिफर अपने साथी से तुम्हारी छाती नापने को कहो। नाप μ क्या छाती के नाप में वुफछ पफवर्फ आया?़हर मिनट में कितनी साँस μ अपनी नाक के आगे अँगुली रखो। क्या तुम नाक से साँस छोड़ते समय हवा को महसूस कर सकते हो? μ अब गिनो कि एक मिनट में तुमने कितनी बार साँस ली और छोड़ी। μ अब अपने स्थान पर तीस बार उँफचा - उँफचा वूफदो। क्या साँस पूफलने लगी? μ अब पिफर अपनी नाक के आगे अँगुली रखकर गिनो कि तुमने एक मिनट में कितनी बार साँस छोड़ी। 146 आस - पास

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