ऽ तुम्हें क्या लगता है पृथ्वी वैैफसी है? अपनी काॅपी में चित्रा बनाओ। इसमें तुम कहाँ हो, यह भी दिखाओ। अपने साथ्िायों के बनाए चित्रों को भी देखो। वैफसी है हमारी पृथ्वी उशैरा और शाहमीर ग्लोब को घुमा - घुमाकर खेल रहे हैं। तुम भी पढ़ो वे क्या बातें कर रहे हैं। उशैराμ पता है, कल हमारे स्वूफल में सुनीता विलियम्स आ रही हैं। मैंने सुना है कि वे छह महीने से भी श्यादा अंतरिक्ष में रहीं। शाहमीरμयह रहा अमरीका... यह है अप़्रफीका। पर अंतरिक्ष कहाँ है? उशैराμअरे भइर्! ये सारा आसमान, ये तारे, चाँद, सूरज ये सब अंतरिक्ष में हंै। शाहमीरμहाँ, पता है! सुनीता विलियम्स वहाँ स्पेसश्िाप से गइर् थीं। टी.वी. पर बताया था कि वहाँ से उन्होंने पृथ्वी को भी देखा। उशैराμहाँ, वहाँ से पृथ्वी ग्लोब की तरह दिखती है। शाहमीरμअगर हमारी पृथ्वी ग्लोब की तरह है तो इसमें हम कहाँ हैं? ;उशैरा ने एक पेन उठाया और ग्लोब के उफपर टिका दिया।द्ध उशैराμयहाँ, ये रहे हम। यहाँ है इंडिया। शाहमीरμपर ऐसे तो हम गिर ही जाएँगे। शरूर, हम सब ग्लोब के अंदर होंगे! उशैराμ अगर हम ग्लोब के अंदर हैं, तो पिफर आसमान कहाँ है और तारे, सूरज और चाँद कहाँ होंगे? हम ग्लोब के उफपर ही होंगे! सारे समुद्र भी ग्लोब के उफपर होंगे! शाहमीर ;ग्लोब के नीचे की ओर दिखाते हुए कहाद्धμतो प्िाफर यहाँ कोइर् नहीं रहता क्या? उशैराμयहाँ भी लोग रहते तो हैं। यहाँ ब्राशील और अजे±टीना हैं। शाहमीरμ तो यहाँ क्या लोग उलटे खड़े होंगे? ये लोग गिर क्यों नहीं जाते? उशैराμ हाँ, अजीब - सा लगता है! और यह नीला - नीला समुद्र है न। पिफर यह पानी भी क्यों नहीं गिर जाता? तुम्हें क्या लगता है ऽ हम धरती पर वैफसे टिके होंगे? अगर पृथ्वी ग्लोब जैसी गोल है तो हम गिरते क्यों नहीं? ऽ क्या अजे±टीना के लोग उलटे खड़े हैं? सुनीता से बातचीत जब सुनीता विलियम्स भारत आईं तो उशैरा और शाहमीर जैसे हशारों बच्चों को उनसे बातचीत करने का मौका मिला। सुनीता कहती हैं कि उनकी दोस्त कल्पना चावला खुद भारत आकर बच्चों से मिलना चाहती थीं। कल्पना के अधूरे सपने को पूरा करने सुनीता भारत आईं। सुनीता बताती हैं अंतरिक्ष की वुफछ मशेदार बातें! ✡ हम एक जगह टिककर तो बैठ ही नहीं सकते थे। यान में एक जगह दूसरी जगह तैरते हुए पहुँचते। ✡ पानी भी एक जगह टिका नहीं रहता। वह बुलबुलों की तरह इधर - उध्र उड़ता पिफरता। पता है, हाथ - मुँह धेने के लिए हम तैरते बुलबुलों को पकड़कर कपड़ा गीला करते और हाथ - मुँह साप़्ाफ करते! ✡ वहाँ खाना भी अजब तरीके से खाना पड़ता था। सबसे श्यादा मशा तब आता था, जब हम सभी उड़ते हुए खाने वाले कमरे में जाते और उड़ते हुए खाने के पैकेटों को पकड़ते। ✡ अंतरिक्ष में मुझे कंघी करने की शरूरत ही नहीं पड़ती थी। बाल हमेशा ही खड़े रहते! ✡ चल न पाना, हर समय तैरते रहना और हर काम अलग तरीके से करनाμयह सब करने की आदत डालना आसान नहीं था। एक जगह टिककर काम करना हो तो अपने - आप को बेल्ट से बाँधे। कागश को भी ऐसे नहीं छोड़ सकते, उसे भी दीवार के साथ बाँध्कर रखो। अंतरिक्ष में रहना बहुत ही मशेदार था लेकिन मुश्िकल भी। पफोटो देखो और लिखो़ऽ अंतरिक्ष में सुनीता के बाल खड़े क्यों रहते होंगे? बाल नीचे क्यों नहीं बैठते थे? ऽ सुनीता के इन सब चित्रों को देखो और बताओ कि उनमें कब, क्या - क्या होता दिख रहा है। सुनीता अंतरिक्ष में 101 सुनीता विलियम्स पृथ्वी से 360 किलोमीटर दूर स्पेसश्िाप में गइर् थीं। सोचो 360 किलोमीटर कितना होता है? तुम जहाँ रहते हो वहाँ से 360 किलोमीटर कौन - सा शहर है। सुनीता उतनी ही दूर पृथ्वी से बाहर गइर् थीं। ऽ क्या अब बता सकते हो कि अंतरिक्ष में सुनीता के बाल खड़े क्यों थे? ऽ सोचो किसी भी ढलान से पानी नीचे की ओर ही क्यों बहता है? पहाड़ से भी पानी नीचे की ओर ही बहता है, उफपर की ओर क्यों नहीं चढ़ता? जादू 1μनन्हा - सा कागश चला सिक्के की चाल! एक पाँच रुपये का सिक्का लो और कड़े कागश का एक छोटा - सा टुकड़ा जो सिक्के के चैथाइर् भर हो। 1.एक हाथ में सिक्का और दूसरे में नन्हा कागश पकड़कर दोनों एक साथ गिराओ। क्या हुआ? 2.अब नन्हे कागश को सिक्के के उफपर रखो और पिफर दोनों को एक साथ गिराओ। इस बार क्या हुआ? चैंक गए क्या! 1 जादू 2μचूहे ने हाथी को उफपर उठाया! इस खेल के लिए एक छोटा पत्थर ;बेर के बराबरद्ध, एक बड़ा पत्थर ;नींबू के बराबरद्ध और एक कागश का रोल लो। कागश की कइर् तहों से रोल बन सकता है। μ लगभग दो पुफट लंबी डोरी लो। μ डोरी के एक सिरे पर छोटा पत्थर बाँधे। कागश पर चूहा बनाकर पत्थर पर चिपकाओ या बाँधो। μ अब डोरी के दूसरे सिरे को कागश के एक रोल में डालो। इस सिरे पर बड़ा पत्थर बाँधे और कागश पर बनाया हाथी उस पर चिपकाओ। μ कागश के रोल को गोल - गोल घुमाओ ताकि छोटा पत्थर घूमने लगे। खींच रहा है न चूहा हाथी को! खेल में चूहे ने ऐसा कमाल वैफसे दिखाया होगा? 2 लकीरें आख्िार हंै कहाँ स्पेसश्िाप की ख्िाड़की से पृथ्वी को देखकर सुनीता बताती हैं, फ्पृथ्वी बहुत ही अद्भुत और सुंदर दिखती है। इतनी सुंदर कि उसे घंटों तक निहारते रहो। अंतरिक्ष से पृथ्वी की गोलाइर् भी सापफ दिखती है।य़्तुम भी देखो हमारी पृथ्वी का यह प़्ाफोटो जो एक स्पेसश्िाप से लिया गया है। आज तो हम यह पफोटो देख ़पा रहे हैं, पर हशारों सालों से लोग कल्पना ही करते रहे हैं कि भला पूरी पृथ्वी वैफसी दिखती होगी! वैज्ञानिक भी जानने की कोश्िाश करते रहे कि पृथ्वी कितनी बड़ी है, वैफसे घूम रही है। प़्ाफोटो को देखो और बताओ ऽ क्या भारत को पहचान पा रहे हो? ऽ क्या कोइर् और जगह पहचान पा रहे हो? ऽ देखो, समुद्र कहाँ - कहाँ है? ऽ ग्लोब और इस प़्ाफोटो में क्या वुफछ मिलता - जुलता है? ़क्या कोइर् पफवर्फ भी दिखता है? ऽ क्या सुनीता अंतरिक्ष से भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बमार् को अलग - अलग बता सकती थी? ;उशैरा और शाहमीर ग्लोब पर अलग - अलग देशों को देख रहे हैं।द्ध उशैराμग्लोब पर तो सारे देशों के बीच लकीरें दिखाइर् देती हैं। क्या पृथ्वी पर ऐसी लाइनें ख्िांची होती हंै? शाहमीरμलकीरें तो होती हंै। हमारी किताब में इंडिया के नक्शे में भी हैं। देखो, राज्यों के बीच में लाइनें सापफ दिखाइर् देती हैं। ़सुनीता अंतरिक्ष में 105 उशैराμ अगर हम दिल्ली से राजस्थान जाएँगे तो क्या रास्ते में शमीन पर ऐसी लाइनें दिखेंगी? किताब में दिए नक्शे को देखो और बताओ ऽ क्या तुम अपने राज्य को पहचान पाए? नक्शे पर उसका नाम लिखो। ऽ तुम्हारे राज्य से लगे हुए कौन - से राज्य हैं? ऽ क्या तुम कभी किसी और राज्य में गए हो? ऽ शाहमीर यह सोचता है कि राज्यों के बीच में शमीन पर लाइन बनी होती है। तुम इस बारे में क्या सोचते हो? जब सुनीता ने अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखा तो उसे बहुत सुंदर लगी और उसके मन में कइर् ख्याल आए। सुनीता कहती हैं, फ्इतनी दूर से बस इतना दिखता है कि पृथ्वी पर समुद्र कहाँ है और शमीन कहाँ है। अलग - अलग देश नहीं दिखते। शमीन का देशों में बँटवारा तो हमारा ही किया हुआ है। ये लाइनें तो कागश पर ही होती हैं। मैं चाहूँगी तुम भी इसके बारे में सोचो कि लकीरें आख्िार हैं कहाँ?य् चलो आसमान को देखें शाहमीरμ ;एक आँख बंद करके, चाँद की तरप़्ाफ देखते हुए और सिक्के को थोड़ा आगे - पीछे करते हुएद्ध मैं चाँद को सिक्के से छुपा सकता हूँ। उशैराμ वाह! इतने बड़े चाँद को इतने छोटे - से सिक्के ने छुपा दिया। ऽ तुम भी सिक्का लेकर चाँद को छुपाने की कोश्िाश करो। सिक्के को आँखों से कितने सेंटीमीटर की दूरी पर रखकर चाँद को छुपा पाए? सोचो ऽ क्या चाँद सिक्के की तरह चपटा होगा या बाॅल की तरह गोल? क्या तुमने कभी रात में आसमान को गौर से देखा है। अँधेरी रात में चमकते तारों को देखने का मशा ही वुफछ निराला है! कभी तो चाँद चाँदनी बिखराता है, तो कभी घुप अँध्ेरी रात में ढूँढ़ते नहीं मिलता। 106 आस - पास ऽ आज चाँद को देखो और उसका चित्रा बनाओ। एक हफ्ऱते बाद वैफसा दिखता है और 15 दिन बाद वैफसा दिखता है, उसका भी चित्रा बनाओ। आज की तारीख एक हफ्ऱते बाद की तारीख 15 दिन बाद की तारीख पता करो ऽ पूणर्मासी कब है? उस दिन चाँद किस समय निकलेगा? वैफसा दिखेगा? ऽ चाँद से जुड़े कौन - कौन - से त्योहार मनाए जाते हैं? ऽ आसमान को ध्यान से 5 मिनट तक देखो। μ क्या - क्या देख पाए? μ क्या कोइर् चीश चलती हुइर् सी भी दिखी? यह क्या हो सकता है? μ क्या वह तारा होगा या ‘टूटता तारा’ या कोइर् उपग्रहμजिसका इस्तेमाल टी.वी. के लिए, टेलीपफोन या मौसम की जानकारी के लिए करते हैं। पता करो। अभ्यास दिल्ली में वुफछ दिनों तक चाँद के निकलने और डूबने का समय तालिका में दिया गया है। तारीख चाँद निकलने का समय घंटा: मिनट चाँद डूबने का समयघंटा: मिनट 28.10.2007 29.10.2007 30.10.2007 31.10.2007 19रू16 20रू17 21रू22 22रू29 08रू5 10रू03 11रू08 12रू03 सुनीता अंतरिक्ष में 107 तालिका देखो और बताओ 28 अक्तूबर को चाँद शाम के बजकर मिनट पर निकला। 29 अक्तूबर को चाँद शाम के बजकर मिनट पर निकला। 29 अक्तूबर को चाँद निकलने में घंटे ़मिनट का पफवर्फ आया। ऽ अगर तुमने आज शाम को सात बजे चाँद निकलते देखा तो क्या कल भी ठीक सात बजे चाँद देख पाओगे? बारह बजे चाँद देखा है? दिन में हमें चाँद - तारे आसानी से क्यों नहीं दिखते? कवि भी इस कविता में वुफछ इसी तरह के सवाल उठा रहे हैं। सुनीता अंतरिक्ष में 109

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