नेहरू इंस्टीट्यूट आॅपफ माउन्टेनियरिंग, उत्तरकाशी पहाड़ पर चढ़ना सीखने के लिए हम सब इकऋे हुए थे, बड़ी उमंगों के साथ। वैंफप में केंद्रीय विद्यालयों से आइर् करीब बीस टीचर थीं, जिनमें से एक मैं थी। बाकी महिलाएँ बैंक और दूसरी संस्थाओं से थीं। आज वैंफप का दूसरा दिन था। सुबह जैसे ही बिस्तर से नीचे पैर रखे तो ददर् से मेरी चीख निकल गइर्। एक ही दिन में पहाड़ी, सँकरे, उफबड़ - खाबड़ रास्तों पर 26 किलोमीटर चलना, वह भी कमर पर सामान से भरा पिऋू बैग लेकर! बाप रे! कल का वह दिन। मैं आँखों में आँसू लिए, धीरे - धीरे चलकर एडवेंचर कोसर् के डायरेक्टर, बि्रगेडियर ज्ञान सिंह के कमरे मंे जा पहुँची। मैं मन ही मन सोच रही थी कि मुझे उनसे क्या - क्या कहना है, जिससे ट्रैकिंग पर न जाना पड़े। तभी पीछे से उनकी भारी - सी आवाश सुनाइर् पड़ी। फ्मैडम, नाश्ते के समय आप यहाँ क्या कर रही हैं? हरी अप! वरना भूखे ही ट्रैकिंग पर जाना होगा।य् फ्सर, सर {{{{।य् मेरे आगे के शब्द मेरे मुँह में ही रह गए। फ्पैरों में छाले पड़े हैं, चल नहीं सकती। यही कहना चाहती हैं न आप!य् फ्जी, सरय् फ्यह कोइर् नइर् बात नहीं है। जल्दी तैयार हो जाओ!य् मैं मुँह लटकाए चल दी तैयार होने के लिए। अभी मुड़ी ही थी कि पिफर उनकी आवाश सुनाइर् दी 76 फ्सुनिए मैडम। आप ग्रुप नंबर सात की लीडर रहेंगी। किसी भी सदस्य को पहाड़ पर चढ़ने में परेशानी होने पर आपको उनकी मदद करनी होगी। पहाड़ों पर लीडर की क्या - क्या िाम्मेदारियाँ होती हैं, यह सबको बताया जा चुका है।य् बताओ ऽ क्या तुमने कभी पहाड़ देखे हैं? पहाड़ों पर चढ़े हो? कब और कहाँ? ऽ तुम एक ही बार में पैदल कितनी दूर तक चले हो? कितना चल सकते हो? कल्पना करो ऽ पहाड़ों पर चढ़ने के रास्ते वैफसे - वैफसे होते होंगे, चित्रा बनाओ। एक बड़ी िाम्मेदारी गु्रप लीडर को जो बातें बताइर् गइर् थींμ μ बाकी लोगों का सामान उठाने में मदद करना। μ पूरे ग्रुप के आगे बढ़ जाने पर ही आगे बढ़ना। μ जो चल न पाए उसे हाथ पकड़कर चढ़ाना। μ रुकने के लिए जगह ढूँढना। μ बीमार पड़ने पर उसका ध्यान रखना। μ सब के खाने - पीने का इंतशाम देखना। और सबसे बड़ी बात तो यह कि ग्रुप के किसी भी सदस्य से गलती हो जाने पर हँसते हुए सशा भुगतने को तैयार रहना। मैं समझ गइर् कि यहाँ का अनुशासन अपने - आप में अलग ही है। मैं समझ नहीं पा रही थी कि यह सशा है या मशा! गु्रप नंबर सात ग्रुप नंबर सात में असम, मण्िापुर, मिशोरम, मेघालय और नागालैंड राज्यों की लड़कियों में मैं अकेली ही वेंफद्रीय विद्यालय की टीचर थी। इन सभी से मिलना मुझे अच्छा लगा। किसी भी लड़की को ठीक से हिंदी बोलनी नहीं आती थी। मुझे आज भी दुख है कि मैं डायरी: कमर सीधी, ऊपर चढ़ो! मिशोरम की खोनदोनबी से एक बार भी बात नहीं कर पाइर्। उसे केवल मिशो भाषा ही आती थी, लेकिन पिफर भी हमारे दिल एक - दूसरे से जुड़े रहे। बताओ ऽ गु्रप लीडर की िाम्मेदारियों के बारे में तुम क्या सोचते हो? ऽ अगर तुम्हें ऐसे वैंफप में लीडर चुना जाए तो तुम्हें वैफसा लगेगा? ऽ तुम्हारी कक्षा में माॅनीटर की क्या - क्या िाम्मेदारियाँ होती हैं? ऽ क्या तुम माॅनीटर बनना पसंद करोगे? क्यों? जब नदी पार की....रोश की तरह सभी को नाश्ते में सुबह विटामिन ‘सी’ और आयरन की गोलियों के साथ गरम - गरम चाॅकलेट वाला दूध् मिला। ठंड से बचाव और श्यादा शक्ित के लिए। सुबह सभी का मेडिकल चेकअप होता। प‘ियाँ बाँध्ते और ददर् की मरहम मलते हुए हम रोश एक - एक दिन गिनते। करीब 8 किलोमीटर की ट्रेकिंग ;चढ़नेद्ध के बाद हम नदी के पास थे। नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक मोटा, मशबूत रस्सा बँध था। इसे दोनों किनारों पर बड़े - बड़े ‘पिट - आॅन’ ;खूँटोंद्ध से मशबूती से बाँध था। मन में अजीब - सी बेचैनी थी। पता नहीं क्यों, मुझे बार - बार लग रहा था कि कहीं रस्सा खुल गया तो? ये हुक उखड़ गए तो? मैं मन ही मन नदी की चैड़ाइर् आँक रही थी! हमारे प्रश्िाक्षक ने कमर पर रस्सी बाँधी, उसमें स्िलंग ;एक तरह का हुकद्ध डाला और उस स्िलंग को नदी पर बँध्े मोटे रस्से में डाला। बप़्ाफीर्ले पानी में छप - छप - छप करते हुए 78 आस - पास वे नदी के पार थे। उस तेश बहाव वाले पानी में उतरने को कोइर् तैयार नहीं था। सभी एक - दूसरे को पहले जाने को कह रहे थे। मैं भी लाइन में सबसे पीछे सबकी नशर से बचते हुए जा खड़ी हुइर्। तभी प्रश्िाक्षक हुक और रस्सी लेकर मेरे पास आ खड़े हुए। मैं आइर् हुइर् मुसीबत को समझ गइर्। बचाव का कोइर् रास्ता न था। मैं नदी में उतरने को तैयार तो हो गइर् पर साहस नहीं जुटा पा रही थी। सर मेरे मन की हालत को समझ रहे थे। वे शोर से बोले, ‘थ्री चीयसर् पफाॅर संगीता मैडम’। इसके साथ ही किसी ने हल्के से मुझे पानी में ध्केल दिया! लगा, पैर सुन्न हो गए। मैं काँपने लगी। किट - किट - किट मेरे दाँत बज रहे थे। मैं रस्सा पकड़कर पैर जमाते हुए चल रही थी। किनारे पर तो पानी कम था। पर धीरे - धीरे पानी मेरी गदर्न तक पहुँच गया। नदी के बीचोंबीच, शमीन पर मेरे पैर टिक नहीं रहे थे, पिफसल रहे थे। डर, घबराहट और ठंड के मारे मेरे हाथ से रस्सा छूट गया। मैं शोर - शोर से मदद के लिए चिल्लाने लगी। लगा, अब तो बह जाउँफगी। पर नहीं, मैं तो हुक के सहारे रस्से से बँधी हुइर् पानी पर पड़ी थी। रस्सा पकड़ो! रस्सा पकड़ो! की आवाशें अब मुझे सुनाइर् दीं। पिफर हिम्मत करके मैंने रस्सा पकड़कर आगे बढ़ना शुरू किया। धीरे - धीरे, हिम्मत बटोरती आख्िारकार मैं किनारे पर पहुँच गइर्। नदी से बाहर निकलते ही मुझे एक खास खुशी का एहसास हुआ। खुशीμएक जोख्िाम भरा काम कर पाने की। अब किनारे पर खड़ी मैं, बाकी लोगों को चिल्ला - चिल्लाकर रस्सा कसकर पकड़ने की सलाह दे रही थी। जोख्िाम से जूझने के बाद जो विश्वास और साहस मुझे मिला, यह उसी का परिणाम था। पता करो और लिखो पहाड़ों पर चढ़ने के लिए किन - किन चीशों की शरूरत पड़ती है? रस्सी और हुक का इस्तेमाल किसी और चीश में होते देखा है? कहाँ? पहाड़ी नदी पार करने के लिए हम और किन - किन चीशों का इस्तेमाल कर सकते हैं? पहाड़ों पर श्यादा शक्ित की शरूरत क्यों होती है? क्या तुमने कभी किसी से जोख्िाम भरे काम के बारे में सुना है? क्या? क्या तुमने कभी कोइर् हिम्मत भरा काम किया है? यदि हाँ, तो अपनी कक्षा में सुनाओ। उसे अपने शब्दों में लिखो भी। राॅक क्लाइम्िबंग ;च‘ानों पर चढ़नाद्ध 15 किलोमीटर चढ़कर हमें टेकला गाँव पहुँचना था। यह गाँव लगभग 1600 मीटर की उँफचाइर् पर था। खाने का डिब्बा, पानी की बोतल, रस्सी, हुक, प्लास्िटक शीट, डायरी, टाॅचर्, तौलिया, साबुन, विंडचीटर ;जैकेटद्ध, सीटी, ग्लूकोश, गुड़, चना और वुफछ खाने - पीने का सामान पिऋू बैग में लिए हम टेकला में खड़े थे। सीढ़ीदार खेतों में मौसम के अनुसार पफल और सब्िशयाँ उगी थीं। सामने की एक बड़ी, बिल्वुफल सपाट, लगभग 90 मीटर उँफची च‘ान के उफपर कनर्ल राम सिंह खूँटे गाड़कर रस्सों के साथ खड़े थे। हमें बताया गया था कि च‘ान पर पहले पैर और हाथ जमाने की मशबूत जगह पहचान लें। 80 आस - पास आज मेरा मन पीछे हटने को नहीं था। मैं लाइन में सबसे आगे खड़ी थी। तभी हमारे प्रश्िाक्षक ने कमर पर रस्सी बाँध्ी, स्िलंग डाला और नीचे लटकता मोटा रस्सा पकड़कर, च‘ान पर चढ़ना शुरू किया। मुझे लगा वे उस च‘ान पर दौड़ रहे थे। मैंने भी स्िलंग डालकर च‘ान पर पैर बढ़ाया। लेकिन पैर बढ़ाते ही मैं पिफसली और उस रस्से से झूलने लगी। फ्90° का कोण बनाते हुए चलो।य् आवाश आइर्। फ्कमर सीध्ी रखो, आगे मत झुको।य् मैं एक बार पिफर बढ़ी। च‘ान को शमीन मानकर मैं उस पर सीध्ी चढ़ने लगी। अभी वापिस उतरना बाकी था, जिसे पवर्तारोहण की भाषा में ‘रैप्िलंग’ कहते हैं। एक बार पिफर मैं बेझिझक हो, निडरता से च‘ान से नीचे उतरने को खड़ी थी। बताओ ऽ क्या तुम कभी पेड़ पर चढ़े हो? वैफसा लगा? ऽ पेड़ पर चढ़ते हुए तुम्हें डर लगा या नहीं? क्या कभी गिरे भी? ऽ क्या तुमने कभी किसी को छोटी दीवारों पर चढ़ते देखा है? दीवार पर चढ़ने और उँफची च‘ान पर चढ़ने में तुम्हें क्या अंतर लगता है? एक मशेदार घटना शाम हो चली थी। खोनदोनबी को भूख लगी थी और हमारा खाने का सामान भी खत्म था। मेरे देखते ही देखते वह वँफटीली तारें पार करके एक बगीचे में घुस गइर्। वहाँ से वह दो बड़े - बड़े पहाड़ी खीरे तोड़ लाइर्। तभी पीछे से एक पहाड़ी महिला ने उसका बैग पकड़ लिया। अपनी भाषा में वह खोनदोनबी से वुफछ कह रही थी। उसकी पहाड़ी भाषा हमारी समझ से बाहर थी। खोनदोनबी बीच - बीच में मिशो भाषा में वुफछ जवाब देती जो हमें समझ न आता। मैं उन दोनों को हिंदी में वुफछ समझाती। लेकिन किसी को भी किसी की बात समझ नहीं आ रही थी। आख्िार हावभाव से मैंने उस महिला को समझाया और गलती मानी। इतनी देर में सारा गु्रप बहुत आगे निकल चुका था। अँध्ेरा हो चुका था और मुझे लगा हम गलत रास्ते पर बढ़ रहे थे। हम बहुत घबरा गए। टाॅचर् से भी वुफछ नशर नहीं आ रहा था। हमने घबराकर हाथ पकड़ लिए। ठंड में भी मेरे पसीने छूट रहे थे। मैंने शोर से आवाश लगाइर्, फ्कहाँ हो तुम सब?य् पहाड़ों पर मेरी आवाश गूँजने लगी। हमने शोर - शोर से सीटियाँ बजानी शुरू की और टाॅचर् से रोशनी की। तब तक शायद गु्रप को पता चल चुका था। जवाबी सीटियाँ बजने लगीं। हम उस संकेत को समझ गए। टाॅचर् जलाए हुए, हाथ पकड़े, पसीने से तर - बतर हम वहीं अपनी जगह खड़े हो गए। खोनदोनबी को लगा कि हमें वुफछ - न - वुफछ बोलते रहना चाहिए। उसने मिशो भाषा में शोर - शोर से कोइर् गीत गाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में हमें ग्रुप मिल गया। तब जाकर हमारी जान में जान आइर्। बताओ ऽ क्या तुम्हारी कक्षा में कोइर् ऐसा बच्चा है, जिसे तुम्हारी भाषा समझ नहीं आती या जिसकी भाषा तुम समझ नहीं पाते? ऐसे में तुम लोग क्या करते हो? ऽ क्या कभी तुम भी रास्ता भूले हो? तब तुमने क्या किया? ऽ खोनदोनबी ने ऐसी स्िथति में शोर - शोर से गीत क्यों गाया होगा? ऽ क्या डर से उभरने के लिए तुमने किसी और को वुफछ खास करते हुए देखा है? क्या और कब? करके देखो ऽ बिना बात किए अपने दोस्त से किताब या वुफछ चीशें माँगो। इसी तरह कक्षा में बिना बोले अपनी बात समझाने की कोश्िाश करो। 82 आस - पास एक खास मुलाकात रात को खाने के बाद हमें एक खास मेहमान से मिलवाया गया। वे थीं - बछेन्द्री पाल। उन्हें माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाइर् के लिए चुना गया था। वे बि्रगेडियर ज्ञान सिंह से आशीवार्द लेने आइर् थीं। उस खुशी के माहौल में सभी गा - बजा रहे थे। बछेन्द्री भी एक मशहूर पहाड़ी गीत गाते हुए नाचने लगींμबेडु पाको बारा मासा, कापफल पाको चैता मेरी छैला। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि यही बछेन्द्री एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बनने का इतिहास रचेंगी। वैंफप हम अब लगभग 2134 मीटर की उँफचाइर् पर खड़े थे। हमें रात को यहीं रुकना था। हम अपना - अपना टेंट लगाने की कोश्िाश में लगे थे। टेंट लगाने के लिए और बिछाने के लिए हमारे पास प्लास्िटक की दो तह वाली शीट थी, जिसमें हवा रुकी रहती है और ठंड नहीं आती। हमने खूँटे गाडे़ और टेंट बाँध्ने शुरू किए। पर यह क्या? एक तरप़़्ाफ से बाँध्ते तो दूसरी तरपफ से उड़ जाता! बड़ी मुश्िकल से टेंट लगे। पिफर हमने टेंट के चारों तरपफ नाली़खोदी। अब हम सभी भूख से बेहाल थे। हमने पत्थरों से चूल्हा बनाया। लकडि़याँ इकऋी करके चूल्हा जलाया और खाना पकाया। खाना खाकर छिलके और वूफड़ा एक पैकेट में इकऋा किया और जगह सापफ की।़सोने के लिए हम स्लीपिंग बैग में घुस गए। हमारे स्लीपिंग बैग की तहों में पंख भरे हुए थे, जिनसे गरमी रहती हैं। मैं सोच रही थीμक्या इसमें मैं सो पाउँफगी? लेकिन हम इतने थके हुए थे कि स्लीपिंग बैग में घुसते ही नींद आ गइर्। सुबह उठे तो बपर्फ गिर रही थी। सप़़्ोफद - सप़्ोफद रूइर् के कतरों की तरह थी बरप़्ाफ! वाह! देखते ही मशा आ गया। पेड़ - पौध्े, घास, पहाड़, सभी वुफछ सप़्ोफद दिख रहे थे। आज हमें बरप़्ाफ पर और उफपर लगभग 2700 मीटर की उँफचाइर् पर चढ़ना था। उफपर चढ़ने के लिए हमें छडि़याँ दी गईं। हम छड़ी के सहारे पैर जमा - जमाकर बढ़ रहे थे। बार - बार पैर पिफसल रहे थे। दोपहर होते - होते हम बरपफ से ढँके पहाड़ों पऱथे। वहाँ हमने स्नोमैन बनाया और बरप़्ाफ के गोलों से भी खेले। वैंफप का आख्िारी दिन ‘वैंफप पफायर’ ;आग जलानेद्ध की तैयारियाँ चल रही थीं। सभी गु्रप अपना - अपना प्रोग्राम तैयार करके आए थे। खाने के बाद आग के चारांे तरपफ नाच - गाना,़चुटवुफले, हँसी - मजाक में कब रात के बारह बज गए, पता ही नहीं चला। तभी बि्रगेडियर ज्ञान सिंह उठे और उन्होंने मुझे बुलाया। मैंने सोचा कि आज आख्िारी दिन भी कोइर् गड़बड़ हो गइर् है। पर उन्होंने जब ‘बेस्ट परपफाॅमे±स अवाडर्’ के लिए मेरे नाम की घोषणा की तो मैं अवाव्फ उन्हें देखती रह गइर्। बि्रगेडियर साहब का आशीवार्द भरा हाथ मेरे सिर पर था और मेरी आँखों से खुशी के आँसू टपक रहे थे। कल्पना करो और लिखो ऽ तुम पहाड़ पर हो। तुम्हें वहाँ वैफसा लग रहा है? क्या - क्या दिख रहा है? क्या - क्या करने को मन कर रहा है? ऽ झंडा कब - कब पफहराते हैं? ऽ क्या तुमने किसी और देश का झंडा देखा है? कहाँ? ऽ अब 6 या 8 बच्चों के समूहों में बँट जाओ। अपने - अपने समूह के लिए झंडे का डिशाइन बनाओ। झंडे का यह डिशाइन तुमने क्यों चुना? 86 आस - पास

RELOAD if chapter isn't visible.