करेले। मुझे तो तुम गुड़ - रोटी ही दे दो।य् माँ ने हँसते हुए कहा, फ्कितना मीठा खाओगी! सुबह भी तो तुमने चीनी वाली रोटी खाइर् थी।य् फ्तुम बोर नहीं होती, एक ही तरह के स्वाद की चीशें खाकर?य् झूलन ने झुम्पा को चिढ़ाते हुए कहा। झुम्पा तपाक से बोली, फ्तुम बोर होती हो क्या इमली चाटते - चाटते? शरूर नाम सुनते ही तुम्हारे मुँह में पानी आ गया होगा।य् झूलन बोली, फ्मैं मीठा भी खाती हूँ, नमकीन भी। हाँ, ख‘ी इमली मुझे बहुत ही पसंद है, पर मैं करेला भी खा लेती हूँ।य् यह कहकर झूलन ने माँ को देखा और दोनों शोर से हँस पड़ीं। झूलन झुम्पा से बोली, फ्चलो एक खेल खेलते हैं। मैं तुम्हारे मुँह में खाने की बोली, फ्अब नाक बंद करके पहचानो।य् झुम्पा ने चखा तो वह सोच में पड़ गइर्। फ्वुफछ कड़वा - सा है, वुफछ ख‘ा - सा, वुफछ नमकीन - सा। एक चम्मच और ख्िालाओ,य् वह बोली। झूलन ने चम्मच में करेले की सब्शी ली, झुम्पा की आँखों की प‘ी खोली और बोली, ‘खाओ!’ झुम्पा भी हँसते हुए बोली, फ्लो, ख्िालाओ!य् चचार् करो और लिखो ऽ ख‘ी इमली का नाम सुनते ही झूलन के मुँह में पानी आ गया। तुम्हारे मुँह में कब - कब पानी आता है? अपनी पसंद की पाँच चीशों के नाम और उनके स्वाद लिखो। ऽ तुम्हें एक ही तरह का स्वाद पसंद है या अलग - अलग? क्यों? ऽ झूलन ने झुम्पा को नींबू के रस की वुफछ बूँदें चखाईं। क्या वुफछ बूँदों से स्वाद का पता चल सकता है? ऽ अगर तुम्हारी जीभ पर सौंपफ के दाने पहचान पाओगे? वैफसे?चखने से पचने तक 23 ऽ खेल में झुम्पा ने मछली वैफसे पहचान ली? वे कौन - सी चीशें हैं, जो तुम बिना देखे और चखे, केवल सूँघकर पहचान सकते हो? ऽ क्या तुम्हारे घर पर किसी ने तुम्हें नाक बंद करके दवाइर् पीने को कहा है? वे ऐसा क्यों कहते होंगे? आँख बंद करके स्वाद पहचानो अलग - अलग स्वाद की वुफछ चीशें इकऋी करो और अपने साथी के साथ झूलन और झुम्पा की तरह खेल खेलो। अपने साथी को चीशें चखाओ और पूछोμ ऽ स्वाद वैफसा था? खाने की चीश क्या थी? ऽ जीभ के कौन - से हिस्से में स्वाद श्यादा पता चल रहा थाμआगे, पीछे, बाईं या दाईं तरप़्ाफ? ऽ तुम्हें जीभ के कौन - से हिस्से में कौन - सा स्वाद श्यादा पता चला? अपने अनुभव के आधार पर चित्रा में लिखो। ऽ वुफछ खाने की चीशों को मुँह के किसी और हिस्से पर रखो - होंठ, तालू, जीभ के नीचे। क्या कहीं और भी स्वाद का पता चला? जीभ के अगले हिस्से को किसी साप़्ाफ कपड़े से पोंछो ताकि वह सूखा हो जाए। अब वहाँ चीनी के वुफछ दाने या शक्कर रखो। क्या वुफछ स्वाद आया? सोचो, ऐसा क्यों हुआ होगा? शीशे के सामने खड़े होकर अपनी जीभ की सतह को ध्यान से देखो। वैफसी दिखती है? क्या जीभ पर वुफछ दाने - दाने जैसे दिखते हैं? बताओ ऽ अगर कोइर् हमसे पूछे कि कच्चे आँवले या खीरे का क्या स्वाद है तो हमें सोचना पडे़गा। तुम खाने की इन चीशों, जैसेμटमाटर, प्याश, सौंपफ, लौंग, आदि का क्या स्वाद़बताओगे? स्वाद बताने के लिए वुफछ शब्द ढूँढ़ो और खुद से सोचकर बनाओ। ऽ वुफछ चीशें चखने के बाद झुम्पा बोली ‘सी - सी - सी’। सोचो, उसने क्या खाया होगा? ऽ तुम भी इसी तरह से वुफछ खाने के स्वादों के लिए आवाशें निकालो और अपने साथी को कहो कि वह तुम्हारे हाव - भाव देखकर अनुमान लगाए, तुमने क्या खाया होगा। चबाकर या चबा - चबाकर खाओ - दोनों में अंतर बताओ। सब मिलकर कक्षा में यह गतिविध्ि करो। ब्रेड या रोटी का टुकड़ा या पके हुए चावल लो। ऽ पहले रोटी का टुकड़ा या वुफछ चावल मुँह में डालो और तीन - चार बार चबाकर निगल जाओ। ऽ क्या चबाने से स्वाद में बदलाव आया? ऽ अब रोटी का टुकड़ा या वुफछ चावल मुँह में डालो और 20 - 25 बार चबाओ। ऽ क्या देर तक चबाने से स्वाद में बदलाव आया? चचार् करो ऽ घर में लोग तुम्हें कहते होंगे, फ्खाना धीरे - धीरे खाओ, ठीक से चबाओ, खाना अच्छे से पचेगाय्। सोचो, वे ऐसा क्यों कहते होंगे? ऽ जब तुम कोइर् सख्त चीशμजैसे अमरूद, खाते हो तो उसे मुँह में डालने से लेकर निगलने तक कौन - से बदलाव आते हैं और वैफसे? तुम्हें क्या लगता है शरीर में खाना कहाँ - कहाँ जाता होगा? दिए गए चित्रा में खाना जाने का रास्ता अपने मन से बनाओ। अपने साथी का चित्रा भी देखो। क्या तुम्हारा चित्रा और साथी का चित्रा एक जैसा है या अलग? चचार् करो ऽ क्या तुमने किसी को कहते सुना है, फ्मेरे पेट में चूहे वूफद रहे हैं।य् तुम्हें क्या लगता है, भूख लगने पर सचमुच पेट में चूहे वूफदते हैं? ऽ तुम्हें वैफसे पता चलता है कि तुम्हें भूख लगी है? ऽ सोचो, अगर तुम दो दिन तक वुफछ भी न खाओ तो क्या होगा? चखने से पचने तक 27 भूख से तो मेरे सिर में ददर् हो जाता है। ऽ क्या तुम दो दिन तक पानी के बिना रह सकते हो? सोचो, जो पानी हम पीते हैं, वह कहाँ जाता होगा? जब भूख लगती है तो जब मेरी बहन को भूख मुझे गुस्सा आता है। लगती है तो वहरोती है। नीतू को चढ़ाया गया ग्लूकोश नीतू को पूरा दिन लगातार उल्टी होती रही, साथ में दस्त भी लग गए थे। उप़्ाफ! वुफछ भी खाओ या पियो तो उल्टी। उसके पिताजी ने उसे पानी में नमक और चीनी घोलकर पीने के लिए दिया। शाम को डाॅक्टर के पास जाने के लिए वह बिस्तर से उठी, तो चक्कर खाकर गिर पड़ी। वे उसे गोद में उठाकर डाॅक्टर के पास ले गए। डाॅक्टर ने नीतू को अस्पताल में भतीर् होने को कहा, ग्लूकोश चढ़ाने के लिए। यह सुनकर नीतू सोच में पड़ गइर्। स्वूफल में ‘खेल’ के समय तो टीचर कइर् बार ग्लूकोश पीने को देती हैं, पर अब ग्लूकोश चढ़ाना क्यों है? डाॅ. आँटी ने उसे कहा, फ्खाना और पानी शरीर में न रुकने की वजह से शरीर में कमशोरी आ गइर् है। तुम्हारा पेट खराब है। ग्लूकोश चढ़ने से, बिना खाए - पिए तुम्हें जल्दी ताकत मिल जाएगी और हिम्मत भी।य् बताओ और चचार् करो तुम्हें याद होगा कि तुमने चैथी कक्षा में नमक - चीनी का घोल बनाया था। नीतू के पिताजी ने भी उसे यही घोल दिया। सोचो, उल्टी - दस्त होने पर यह घोल क्यों देते होंगे? ऽ क्या तुमने कभी ‘ग्लूकोश’ शब्द सुना है या लिखा हुआ देखा है? कहाँ? ऽ क्या तुमने कभी ग्लूकोश चखा है? उसका स्वाद वैफसा होता है? अपने साथ्िायों को बताओ। ऽ क्या तुम्हें या तुम्हारे घर में कभी किसी को ग्लूकोश चढ़ाया गया है? कब और क्यों? उसके बारे में अपने साथ्िायों को बताओ। ऽ नीतू की टीचर उसे हाॅकी खेलते समय बीच - बीच में ग्लूकोश पीने को कहती हैं। सोचो, वह खेल के दौरान ग्लूकोश क्यों पीती होगी? ऽ चित्रा देखकर बताओ, नीतू को ग्लूकोश वैफसे चढ़ाया गया। चित्रा में क्या हो रहा है? कहानी ख्िाड़की वाले पेट की सुनो कहानी एक अनोखे पेट की पेट में था छेद, कहानी छेद की माटिर्न नाम का एक प़्ाफौजी भूल से पेट में लगी गोली चीशें जो करती थीं गड़बड़ हुआ इलाज पर रह गया छेद उन्हें डालकर हाथ झटपट डाॅक्टर के लिए बना खेल बाहर निकाल सकते थे बातें जान लीं उसने भेद की बदले में नया खाना डाल सकते थे सुनो कहानी एक अनोखे पेट की हाँ! दाल - भात और सेव भी सुनो कहानी एक अनोखे पेट कीजब चाहें तब उसमें झाँक लें अंदर का सारा हाल भाँप लें ख्िाड़की जैसे छेद वाले पेट की क्या खाया, क्या चबाया इसके, उसके, सबके पेट की क्या नहीं पचा, क्या पचाया कहानी यह हमने नहीं गढ़ी कर सकते थे यह मीन मेख भी वषो± पहले सच्ची थी घटी सुनो कहानी एक अनोखे पेट की पढ़ो कहानी एक अनोखे पेट की पेट में था छेद, कहानी छेद की - राजेश उत्साही चकमक, अगस्त 1985 चखने से पचने तक 29 कहानीμपेट में झाँका, जाना भेद! तुमने कविता में जिस प़्ाफौजी के बारे में पढ़ा, वह सन् 1822 में अठारह साल का था और बहुत तंदुरुस्त था। जब वह गोली से शख्मी हुआ तो उसे डाॅक्टर बोमोंट के पास ले जाया गया। डाॅक्टर ने माटिर्न की अच्छी तरह से मरहम - प‘ी की। ध्ीरे - धीरे उसका शख्म ठीक होने लगा। पर पेट का छेद नहीं भरा। लगभग डेढ़ साल के बाद डाॅक्टरों ने देखा कि माटिर्न के पेट में एक अद्भुत ख्िाड़की - सी बन गइर् थी। पेट की चमड़ी ने बढ़कर छेद को ढँक तो लिया था, ठीक इस तरह जैसे एक पुफटबाल का वाशर होता है। यानी चमड़ी की एक तह के उफपर एक और तह - सी बन गइर् थी। निचली तह को दबाने पर छेद में से पेट में झाँका जा सकता था। छेद में ट्यूब डालकर पेट का खाना भी बाहर निकाला जा सकता था। अब क्या था। डाॅक्टर बोमोंट को माटिर्न का यह अजूबा पेट क्या मिल गया, मानो एक खशाना मिल गया। सोच सकते हो, कितना समय लगाया होगा उन्होंने इस पेट के साथ प्रयोग करने में? नौ साल! इन नौ सालों में माटिर्न वुफछ काम भी करते रहे और उनकी शादी भी हुइर्। उस समय तक वैज्ञानिकों को यह नहीं मालूम था कि पेट में पाचन की वि्रफया होती वैफसे है? पेट में जो पाचक रस होते हैं, उनका क्या काम होता है? क्या वे पाचन में मदद करते हैं? या केवल भोजन को तरल बनाने के लिए ही होते हैं? पहले तो उन्होंने यह देखना चाहा कि यदि पेट के पाचक रस को बाहर एक गिलास में निकाल लिया जाए और खाने की कोइर् चीश डुबाकर उसमें रख दी जाए तो क्या वह पड़ी - पड़ी पच जाएगी! इसके लिए उन्होंने एक प्रयोग किया। एक ट्यूब से पेट में से वुफछ पाचक रस निकाल लिया। पिफर दस मिलीलीटर पाचक रस में एक उबली हुइर् मछली के बीस बारीक टुकड़े डालकर सुबह साढ़े आठ बजे रख दिए। इस गिलास को उतने ही तापमान में रखा, जितना आमतौर पर हमारे पेट के अंदर होता है। लगभग 300 सेंटीग्रेड। दोपहर के दो बजे तक उन्होंने देखा कि मछली के सब टुकड़े पूरी तरह से घुल चुके थे। पिफर उन्होंने इसी तरह वुफछ और भोजन पेट के पाचक रस में रखा और वही माटिर्न को ख्िालाया। अलग - अलग भोजन पचने में कितनी देर लगी, उसकी 30 आस - पास तालिका बना ली। डाॅक्टर बोमोंट की तालिका देखोμ व्रफ खाने की चीश पचने में लगा समय पेट में गिलास के पाचक रस में 123456 कच्चा दूध् उबला दूध् पूरी तरह उबला अंडा कम उबला अंडा कच्चा अंडा पेंफटा हुआ कच्चा अंडा 2 घंटे 15 मिनट 2 घंटे 3 घंटे 30 मिनट 3 घंटे 2 घंटे 1 घंटे 30 मिनट 4 घंटे 45 मिनट 4 घंटे 15 मिनट 8 घंटे 6 घंटे 30 मिनट 4 घंटे 15 मिनट 4 घंटे कहो, अब क्या सोचते हो? है वुफछ प़्ाफायदा इस पेट का! डाॅक्टर बोमोंट ने माटिर्न के ख्िाड़की वाले पेट के सहारे पाचन के कइर् रहस्य खोले। उन्होंने तालिका से देखा कि पेट में खाना जल्दी पचता है। क्या तुम भी यह देख पाए? जल्दी पचाने के लिए हमारा पेट खाने को खूब घुमाता - हिलाता है। वे यह भी देख पाए जब माटिर्न दुखी या परेशान होता तो उसका खाना ठीक से नहीं पचता। यही नहीं उन्होंने बताया कि हमारे पेट का पाचक रस ‘एसिड’ ;अम्लद्ध की तरह होता है। क्या तुमने किसी को कहते सुना है कि पेट में ‘एसिडिटी’ हो गइर्μखासकर जब ठीक से खाना नहीं खाया हो या पचाया हो? उनकी वैज्ञानिक खोज को दुनिया के सभी वैज्ञानिकों ने सराहा। पिफर कितने ही अन्य प्रयोग दुनिया के कोने - कोने में किए गए। क्या कहा तुमने? पेट में गोली मारकर! नहीं भइर्, बाद में होने वाले ये प्रयोग किसी के पेट में गोली मारकर नहीं किए गए! ये प्रयोग दूसरे वैज्ञानिकों ने मशीनों की सहायता से किए। तो कहो, वैफसी लगी माटिर्न के पेट उपर्फ तुम्हारे पेट की कहानी! - अनीता रामपाल चकमक, अगस्त 1985 सोचो और चचार् करो ऽ अगर डाॅ बोमोंट की जगह तुम होते तो पेट के रहस्य जानने के लिए क्या - क्या प्रयोग करते? प्रयोग के नतीजे भी बताओ। सही खाना और सही सेहत डाॅक्टर अपणार् के पास इलाज के लिए दो बच्चे आएμरश्िम और वैफलाश। दोनों बच्चों से डाॅक्टर अपणार् ने बातचीत की। बातचीत से वुफछ जानकारी मिली जो नीचे दी है, तुम भी पढ़ो। 3 साल की लगती है। हाथ - पैर पतले और पेट पूफला हुआ है, अकसर बीमार रहती है। थकान के कारण बहुत बार स्वूफल भी नहीं जा पाती। खेलने की ताकत भी नहीं होती। खानाμपूरे दिन में थोड़े - से चावल या एक - आध् रोटी भी मिली तो समझो आज बहुत मिल गया। वैफलाश, 7 साल उम्र से बड़ा दिखता है। बदन मोटा और थुलथुला है, पैरों में ददर् रहता है, पुफतीर् से कोइर् भी काम नहीं कर पाता। बस से स्वूफल जाना, दिन में कइर् घंटे टी.वी. देखना। खानाμ;घर का बना खाना उसको पसंद नहींद्ध दाल - चावल, रोटी - सब्शी से दूर रहता है। बाशार के चिप्स, बगर्र, कोल्ड डिªंक, बस यही भाता है उसे। डाॅक्टर ने दोनों का कद और वशन नापा और जाँच भी की। दोनों बच्चों को कहा कि तुम्हारी बीमारी का एक ही इलाज हैμ‘सही खाना’ 32 आस - पास चचार् करो ऽ तुम्हें क्या लगता है रश्िम पूरे दिन में एक ही रोटी क्यों खाती होगी? ऽ क्या वैफलाश को खेल - वूफद में दिलचस्पी होगी? ऽ सही खाने से तुम क्या समझते हो? ऽ तुम्हारे हिसाब से रश्िम और वैफलाश का खाना ठीक क्यों नहीं है? लिखो पता करो ऽ दादा - दादी से पूछो कि वे जब तुम्हारी उम्र के थे तब वे एक दिन मंे क्या - क्या काम करते थे और क्या और कितना खाते थे? अब तुम अपना सोचो तुम जो खाते हो और जो काम करते हो क्या उनके जैसा भरपेट खाना - सभी बच्चों का हक? एक तरप़्ाफ है वैफलाश जो घर का खाना पसंद नहीं करता और दूसरी तरपफ़है रश्िम जिसको पेटभर खाने को मिलता ही नहीं। भरपेट खाना सभी बच्चों का अध्िकार है। हमारे देश में लगभग आधे बच्चे रश्िम जैसे हैं। उनको ठीक तरह से बढ़ने के लिए जितना खाना चाहिए उतना भी नहीं मिलता। ये बच्चे कमशोर रहते हैं और कइर् बीमारियों के श्िाकार हो जाते हैं। चखने से पचने तक 33 उड़ीसा के कालाहांडी िाले के बारे में पढ़ो सोचो और चचार् करो ऽ क्या तुम किसी ऐसे बच्चे को जानते हो जिसे दिनभर में खाने को वुफछ नहीं मिलता? इसके क्या - क्या कारण हो सकते हैं? ऽ क्या तुमने कभी ऐसा गोदाम देखा है जहाँ बहुत सारा अनाज रखा हो? कहाँ? 34 आस - पास

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