जोशीला पास से आगे चलकर जवाहरलाल मातायन पहुँचे तो वहाँ के नवयुवक वुफली ने बताया, फ्शाब,़सामने उस बपर्फ से ढके पहाड़ के पीछे अमरनाथ की गुपफा है।य् फ्लेकिन, शाब, रास्ता बहुत टेढ़ा है।य् किशन ने वुफली की बात काटी। फ्बहुत चढ़ाइर् है। और शाब, दूर भी है।य् फ्कितनी दूर?य् जवाहरलाल ने पूछा। फ्आठ मील, शाब,य् वुफली नेजल्दी से उत्तर दिया। फ्बस! तब तो जरूर चलेंगे।य् जवाहरलाल ने अपने चचेरे भाइर् की ओर प्रश्नसूचक़दृष्िट डाली। दोनों कश्मीर घूमने निकले थे और जोज़्ाीला पास से होकर लद्दाखीइलाके की ओर चले आए थे। अब अमरनाथ जाने में क्या आपिा हो सकती थी? पिफर जवाहरलाल रास्ते की मुश्िकलों के बारे में सुनकर सप़्ाफर के लिए और भी उत्सुक हो गए। फ्कौन - कौन चलेगा हमारे साथ?य् जवाहरलाल ने जानना चाहा। तुरंत किशन बोला, फ्शाब मैं चलूँगा। भेड़ें चराने मेरी बेटी चली जाएगी।य् अगले दिन सुबह तड़के तैयार होकर जवाहरलाल बाहर आ गए। आकाश में रात्रिा की कालिमा पर प्रातः की लालिमा पैफलती जा रही थी। तिब्बती पठार का दृश्य निराला था। दूर - दूर तक वनस्पति - रहित उजाड़ चट्टðानी इलाका दिखाइर् दे रहा था। उदास, पफीके, बप़्ðार्फ से ढके चट्टानी पहाड़ सुबह की पहली किरणों का स्पशर् पाकर ताज की भाँति चमक उठे। दूर से छोटे - छोटे ग्लेश्िायर ऐसे लगते, मानो स्वागत करने के लिए पास सरकते आ रहे हों। सदर् हवा के झोंके हिóयों तक ठंडक पहँुचा रहे थे। जवाहर ने हथेलियाँ आपस में रगड़कर गरम कीं और कमर में रस्सी लपेट कर चलने को तैयार हो गए। हिमालय की दुगर्म पवर्तमाला मुँह उठाए चुनौती दे रही थी। जवाहर इस चुनौती को वैफसे न स्वीकार करते। भाइर्, किशन और वुफली सभी रस्सी के साथ जुड़े थे। किशन गड़ेरिया अब गाइड बन गया। बस आठ मील ही तो पार करने हैं। जोश में आकर जवाहरलाल चढ़ाइर् चढ़ने लगे। यूँ आठ मील की दूरी कोइर् बहत नहीं होती। लेकिन इन पहाड़ी रास्तों परुआठ कदम चलना दूभर हो गया। एक - एक डग भरने में कठिनाइर् हो रही थी। रास्ता बहुत ही वीरान था। पेड़ - पौधों की हरियाली के अभाव में एक अजीब खालीपन - सा महसूस हो रहा था। कहीं एक पूफल दिख जाता तो आँखों को ठंडक मिल जाती। दिख रही थीं सिप़र्फ पथरीली चट्टानें और सप़्ोफद बप़्ार्फ। पिफर भी इसðगहरे सन्नाटे में बहत सुवूफन था। एक ओर सूँ - सूँ करती बप्ुाफीर्ली हवा बदन को़काटती तो दूसरी ओर ताज़्ागी और स्पूफ£त भी देती। जवाहरलाल बढ़ते जा रहे थे। ज्यों - ज्यों उफपर चढ़ते गए, त्यों - त्यों साँस लेने में दिक्कत होने लगी। एक वुफली की नाक से खून बहने लगा। जल्दी से जवाहरलाल ने उसका उपचार किया। खुद उन्हें भी कनपटी की नसों में तनाव महसूस हो रहा था, लगता था जैसे दिमाग में खून चढ़ आया हो। पिफर भी जवाहरलाल ने आगे बढ़ने का इरादा नहीं बदला। थोड़ी देर में बप़्ार्फ पड़ने लगी। पिफसलन बढ़ गइर्, चलना भी कठिन हो गया। एक तरप़़्ाफ थकान, उफपर से सीधी चढ़ाइर्। तभी सामने एक बपफीर्ला मैदान नशर आया। चारों ओर हिम श्िाखरों से घ्िारा वह मैदान देवताओं के मुवुफट के समान लग रहा था। प्रवृफति की वैफसी मनोहर छटा थीं आँखों और मन को तरोताजा कऱसे भी उफपर। पर अमरनाथ की गुपफा का दूर - दूर तक पता नहीं था। इस पर भी जवाहरलाल की चाल में न ढीलापन था, न बदन में सुस्ती। हिमालय ने चुनौती जो दी थी। निगर्म पथ पार करने का उत्साह उन्हें आगे खींच रहा था। फ्शाब, लौट चलिए। वापस वैंफप में पहुँचते - पहुँचते दिन ढल जाएगा,य् एक वुफली ने कहा। फ्लेकिन अभी तो अमरनाथ पहुँचे नहीं।य् जवाहरलाल को लौटने का विचार पसंद नहीं आया। फ्वह तो दूर बप़्ार्फ के उस मैदान के पार है,य् किशन बीच में बोल पड़ा। फ्चलो, चलो। चढ़ाइर् तो पार कर ली, अब आधे मील का मैदान ही तो बाकी है,य् कहकर जवाहरलाल ने थके हए वुफलियों को उत्साहित किया।ु़सामने सपाट बपर्फ का मैदान दिखाइर् दे रहा था। उसके पार दूसरी ओर से नीचे उतरकर गुपफा तक पहुँचा जा सकता था। जवाहरलाल पुफतीर् से बढ़ते जा रहे थे। दूर से मैदान जितना सपाट दिख रहा था असलियत में उतना ही उफबड़ - खाबड़ था। ताशी बप़्ार्फ ने उँफची - नीची चट्टानों को एक पतली चादर से ढक कर एकðसमान कर दिया था। गहरी खाइयाँ थीं, गîक्क बप़्ार्फ से ढके हुाब की़ेए थे और गज्पिफसलन थी। कभी पैर पिफसलता और कभी बपर्फ में पैर अंदर धँसता जाता, धँसता़जाता। बहुत नाप - नाप कर कदम रखने पड़ रहे थे। ये तो चढ़ाइर् से भी मुश्िकल था, पर जवाहरलाल को मज़्ाा आ रहा था। तभी जवाहरलाल ने देखा सामने एक गहरी खाइर् मुँह पफाड़े निगलने के लिए तैयार थी। अचानक उनका पैर पिफसला। वे लड़खड़ाए और इससे पहले कि सँभल पाएँ वे खाइर् में गिर पड़े। फ्शाब ... गिर गए!य् किशन चीखा। फ्जवाहर ...!य् भाइर् की पुकार वादियों की शांति भंग कर गइर्। वे खाइर् की ओर तेज़्ाी से बढ़े। रस्सी से बँधे जवाहरलाल हवा में लटक रहे थे। उपफ, वैफसा झटका लगा। दोनों़तरपफ चट्ट़ानें - ही - चट्टानें, नीचे गहरी खाइर्। जवाहरलाल कसकर रस्सी पकड़े थे,ððवही उनका एकमात्रा सहारा था। फ्जवाहर...!य् उफपर से भाइर् की पुकार सुनाइर् दी। मुँह उफपर उठाया तो भाइर् और किशन के धुँधले चेहरे खाइर् में झाँकते हुए दिखाइर् दिए। फ्हम खींच रहे हैं, रस्सी कस के पकड़े रहना,य् भाइर् ने हिदायत दी। जवाहरलाल जानते थे कि पिफसलन के कारण यूँ उफपर खींच लेना आसान नहीं होगा। फ्भाइर्, मैं चट्टðान पर पैर जमा लूँ,य् वह चिल्लाए। खाइर् की दीवारों से उनकी आवाज़्ा टकराकर दूर - दूर तक गूँज गइर्। हल्की - सी पेंग बढ़ा जवाहरलाल ने खाइर् की दीवार से उभरी चट्टðान को मशबूती से पकड़ लिया और पथरीले धरातल पर पैर जमा लिए। पैरों तले धरती के एहसास से जवाहरलाल की हिम्मत बढ़ गइर्। फ्घबराना मत, जवाहर,य् भाइर् की आवाज़ सुनाइर् दी। फ्मैं बिल्वुफल ठीक हूँ,य् कहकर जवाहरलाल मज़्ाबूती से रस्सी पकड़ एक - एक कदम उफपर की ओर बढ़ने लगे। कभी पैर पिफसलता, कभी कोइर् हल्का - पुफल्का पत्थर पैरों के नीचे से सरक जाता, तो वह मन - ही - मन काँप जाते और मज़्ाबूती से रस्सी पकड़ लेते। रस्सी से हथेलियाँ भी जैसे कटने लगीं थीं पर जवाहरलाल ने उस तरपफ ध्यान नहीं दिया। वुफली और किशन उन्हें खींचकऱबार - बार उफपर चढ़ने में मदद कर रहे थे। धीरे - धीरे सरक कर किसी तरह जवाहरलाल उफपर पहुँचे। मुड़कर उफपर से नीचे देखा कि खाइर् इतनी गहरी थी कि कोइर् गिर जाए तो उसका पता भी न चले। फ्शुक्र है, भगवान का!य् भाइर् ने गहरी साँस ली। फ्शाब, चोट तो नहीं आइर्?य् एक वुफली ने पूछा। गदर्न हिला, कपड़े झाड़ जवाहरलाल पिफर चलने को तैयार हो गए। इस हादसे से हल्का - सा झटका ज़्आ। वहुारूर लगा पिफर भी जोश ठंडा नहीं हअब भी आगे जाना चाहते थे। आगे चलकर इस तरह की गहरी और चैड़ी खाइयों की तादाद बहुत थी। खाइयाँ पार करने का उचित सामान भी तो नहीं था। निराश होकर जवाहरलाल ़को अमरनाथ तक का सपफर अधूरा छोड़कर वापस लौटना पड़ा। अमरनाथ पहुँचने का सपना तो पूरा ना हो सका पर हिमालय की उँफचाइयाँ सदा जवाहरलाल को आक£षत करती रहीं। सुरेखा पणंदीकर © भारत सरकार का प्रतिलिप्यािाकार, 2007। ;1द्ध आंतरिक विवरणों को सही दशार्ने का दायित्व प्रकाशक का है।;2द्ध समुद्र में भारत का जलप्रदेश, उपयुक्त आधार - रेखा से मापे गये बारह समुद्री मील की दूरी तक है। ;3द्ध चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा के प्रशासी मुख्यालय चंडीगढ़ में है।;4द्ध इस मानचित्रा में अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के मध्य में दशार्यी गयी अंतरार्ज्यीय सीमायें, उत्तरी पूवीर् क्षेत्रा ;पुनगर्ठनद्ध अिानियम 1971 के निवार्चनानुसार दश्िार्त है,परंतु अभी सत्यापित होनी है।;5द्ध भारत की बाह्य सीमायें तथा समुद्र तटीय रेखायें भारतीय सवेर्क्षण विभाग द्वारा सत्यापित अभ्िालेख / प्रधान प्रति से मेल खाती है।;6द्ध इस मानचित्रा में उत्तरांचल एवं उत्तरप्रदेश, झारखंड एवं बिहार और छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश के बीच की राज्य सीमायें संबंिात सरकारों द्वारा सत्यापित नहीं की गयी है।;7द्ध इस मानचित्रा में दश्िार्त नामों का अक्षरविन्यास विभ्िान्न सूत्रों द्वारा प्राप्त किया है। कहाँ क्या है 1.;कद्ध लद्दाख जम्मू - कश्मीर राज्य में है। ऊपर दिए भारत के नक्शे में ढूँढ़ो कि लद्दाख कहाँ है और तुम्हारा घर कहाँ है? ;खद्ध अनुमान लगाओ कि तुम जहाँ रहते हो वहाँ से लद्दाख पहुँचने में कितने दिन लग सकते हैं और वहाँ किन - किन जरियों से पह़ँचा जा सकता है?ु;गद्ध किताब के शुरू में तुमने तिब्बती लोककथा ‘राख की रस्सी’ पढ़ी थी। नक्शे में तिब्बत को ढूँढ़ो। वाद - विवाद 1.;कद्ध बपर्फ से ढके चट्ट़ानी पहाड़ों के उदास और पफीके लगने की क्या वजह हो सकती थी?ð;खद्ध बताओ, ये जगहें कब उदास और पफीकी लगती हैं और यहाँ कब रौनक होती है? घर बाशार स्वूफल खेत 2.‘जवाहरलाल को इस कठिन यात्रा के लिए तैयार नहीं होना चाहिए।’ तुम इससे सहमत हो तो भी तवर्फ दो, नहीं हो तो भी तवर्फ दो। अपने तको± को तुम कक्षा के सामने प्रस्तुत भी कर सकते हो। कोलाज ‘कोलाज’ उस तस्वीर को कहते हैं जो कइर् तस्वीरों को छोटे - छोटे टुकड़ों में काटकर एक कागज़पर चिपका कर बनाइर् जाती है। 1.तुम मिलकर पहाड़ों का एक कोलाज बनाओ। इसके लिए पहाड़ों से जुड़ी विभ्िान्न तस्वीरें इकट्टòा करोकृ पवर्तारोहण, चट्टðान, पहाड़ों के अलग - अलग नज़्ाारे, चोटी, अलग - अलग किस्म के पहाड़। अब इन्हें एक बड़े से कागज पर पहाड़ के आकार में ही चिपकाओ। यदि़चाहो तो ये कोलाज तुम अपनी कक्षा की एक दीवार पर भी बना सकते हो। 2.अब इन चित्रों पर आधरित शब्दों का एक कोलाज बनाओ। कोलाज में ऐसे शब्द हों जो इन चित्रों का वणर्न कर पा रहे हों या मन में उठने वाली भावनाओं को बता रहे हों। अब इन दोनों कोलाजों को कक्षा में प्रद£शत करो। तुम्हारी समझ से 1.इस वृत्तांत को पढ़ते - पढ़ते तुम्हें भी अपनी कोइर् छोटी या लंबी यात्रा याद आ रही हो तो उसके बारे में लिखो। 2. जवाहरलाल को अमरनाथ तक का सपफर अधूरा क्यों छोड़ना पड़ा?़3. जवाहरलाल, किशन और वुफली सभी रस्सी से क्यों बँधे थे? 4.;कद्ध पाठ में नेहरू जी ने हिमालय से चुनौती महसूस की। वुफछ लोग पवर्तारोहण क्यों करना चाहते हैं? ;खद्ध ऐसे कौन - से चुनौती भरे काम हैं जो तुम करना पसंद करोगे? बोलते पहाड़ 1.ऽ उदास पफीके बपर्फ से ढके चट्ट़ानी पहाड़ðऽ हिमालय की दुगर्म पवर्तमाला मुँह उठाए चुनौती दे रही थी। फ्उदास होनाय् और फ्चुनौती देनाय् मनुष्य के स्वभाव हैं। यहाँ निजीर्व पहाड़ ऐसा कर रहे हैं। ऐसे और भी वाक्य हैं। जैसेμ ऽ बिजली चली गइर्। ऽ चाँद ने शरमाकर अपना मुँह बादलों के पीछे कर लिया। इस किताब के दूसरे पाठों में भी ऐसे वाक्य ढूँढ़ो।

RELOAD if chapter isn't visible.