तुम्हारी नदी 1.तुम्हारी देखी हुइर् नदी भी ऐसी ही है या वुफछ अलग है? अपनी परिचित नदी के बारे में छूटी हइर् जगहों पर लिखोμु....................सी हमारी नदी ............. .............धार ग£मयों में ............. ............., ............. .............जाते पार 2. कविता में दी गइर् इन बातों के आधार पर अपनी परिचित नदी के बारे में बताओμ ऽ धार ऽ पाट ऽ बालू ऽ कीचड़ ऽ किनारे ऽ बरसात में नदी 3.तुम्हारी परिचित नदी के किनारे क्या - क्या होता है? 4.तुम जहाँ रहते हो, उसके आस - पास कौन - कौन सी नदियाँ हैं? वे कहाँ से निकलती हैं और कहाँ तक जाती हैं? पता करो। कविता के बाहर 1.इसी किताब में नदी का जि़क्र और किस पाठ में हआ है? नदी के बारे में क्या लिखा है? ु2.नदी पर कोइर् और कविता खोजकर पढ़ो और कक्षा में सुनाओ। 3.नदी में नहाने के तुम्हारे क्या अनुभव हैं? 4.क्या तुमने कभी मछली पकड़ी है? अपने अनुभव साथ्िायों के साथ बाँटो। ये किसकी तरह लगते हैं? 1.नदी की टेढ़ी - मेढ़ी धार? 2.किचपिच - किचपिच करती मैना? 3.उछल - उछल के नदी में नहाते कच्चे - बच्चे? कविता और चित्रा ऽ कविता के पहले पद को दुबारा पढ़ो। वणर्न पर ध्यान दो। इसे पढ़कर जो चित्रा तुम्हारे मन में उभरा उसे बनाओ। बताओ चित्रा में तुमने क्या - क्या दशार्या? कविता से 1.इस कविता के पद में कौन - कौन से शब्द तुकांत हैं? उन्हें छाँटो। 2.किस शब्द से पता चलता है कि नदी के किनारे जानवर भी जाते थे? 3.इस नदी के तट की क्या खासियत थी? 4.अमराइर् दूजे किनारे चल देतीं। कविता की ये पंक्ितयाँ नदी किनारे का जीता - जागता वणर्न करती हैं। तुम भी निम्नलिख्िातमें से किसी एक का वणर्न अपने शब्दों में करोμ ़ऽ हफ्रते में एक बार लगने वाला हाट ऽ तुम्हारे शहर या गाँव की सबसे ज़्यादा चहल - पहल वाली जगह ऽ तुम्हारे घर की ख्िाड़की या दरवाज़्ो से दिखाइर् देने वाला बाहर का दृश्य ऽ ऐसी जगह का दृश्य जहाँ कोइर् बड़ी इमारत बन रही हो 5.तेज गति़शोर मोहल्ला ध्ूप किनारा घना ऊपर लिखे शब्दों के लिए कविता में वुफछ खास शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। उन शब्दों को नीचे दिए अक्षरजाल में ढूँढ़ो। कलकत्ता के लोग इसे टैगोर भवन कहते हैं। अब से लगभग दो सौ बरस पहले, इर्स्ट इंडिया कं पनी के ज़ माने में, यह मकान बना था। वह छोटी - सी गली और उसका नन्हा - सा श्िाव मंदिर भी पुराना है। उस सारी जगह पर पुरानेपन की छाप आज भी मौजूद है। संकरी गली जहाँ बड़ी सड़क से जा मिलती थी, उसके कोने पर एक छोटा अहाता दिखाइर् पड़ता था। उसमें पीतल के बने चिडि़यों के अîóों की एक कतार थी और हर अîóे पर भड़कीले रंगों वाला एक - एक काकातुआ था। उनकी कड़वी तीखी चीख - चिल्लाहट की आवाज़्ा चारों ओर गूँजती रहती थी। अड़ोस - पड़ोस की सारी जगह कु छ अजीब और गैरमामूली ढंग की थी। टैगोर परिवार तभी से इसमें रहता था। बीच - बीच में वे लोग इसमें बढ़ोतरी भी करते जाते थे। आज से एक सौ बरस पहले, बरसाती मौसम के तीसरे पहर, एक खूबसूरत लड़का ख्िाड़की से झुककर बेचैनी के साथ पानी से भरी गली की ओर देख रहा था। उसने मामूली सूती कपड़े और सस्ते स्लीपरों की जोड़ी पहन रखी थी। उसके के श कु छ ज़्यादा ही लंबे थे। वह ऐसा लग रहा था, जैसे कितने ही दिनों से उसकी हज़ ामत न हुइर् हो। कु छ लोगों का कहना था कि वह लड़की जैसा दिखता था। एक बार उसके स्कू ल के एक साथी ने यह अफ़ वाह फै ला दी कि वह सचमुच एक लड़की ही है जो लड़कों जैसे कपड़े पहनती है। इस बात को साबित करने के लिए उसके साथ्िायों ने उसे चाय पीने के लिए बुलाया। उन लोगों ने उसे एक ऊँ चे बेंच पर से कू दने को मज़ बूर किया, क्योंकि उनका खयाल था कि लड़कियाँ नीचे उतरते समय पहले बायाँ पैर उठाती हैं। वह कू ुद तो गया, लेकिन बहत दिनों बाद तक उसे उस चाय - पाटीर् के बारे में कोइर् संदेह नहीं हुआ। लड़के का नाम रबींद्रनाथ या संक्षेप में रबि था। बरसाती मौसम के एक तीसरे पहर, आठ साल का रबि अपने मास्टर के आने की राह देख रहा था। वह मन - ही - मन चाह रहा था कि पानी भरी सड़कों के कारण मास्टर जी न आ पाएँ। लेकिन अ फसोस, वक्त की पूरी पाबंदी के साथ, उसकी तमाम़उम्मीदों को मिट्टðी में मिलाता हुआ, सड़क के मोड़ पर पैबंद लगा एक काला छाता दिख पड़ा। अब अपनी किताबें लेकर नीचे के एक मद्धिम रोशनी वाले कमरे में जा बैठने के सिवा और कोइर् उपाय न था। उसकी आँखें नींद से बोझिल हो रही थीं, लेकिन रात में देर तक पढ़ना था - अँग्रेज़ ी, गण्िात, विज्ञान, इतिहास और भूगोल। यहाँ तक कि आदमी के शरीर की हिóयों की जानकारी पाने के लिए उसे एक नर - कंकाल को भी हाथ लगाना पड़ता था। यह अजीब - सी बात थी कि मास्टर जी के जाते ही उसकी आँखों की नींद गायब हो गइर्। उस ज़ माने में बिजली की बिायाँ नहीं थीं, यहाँ तक कि गैस की रोशनी का भी ज़्यादा चलन नहीं था। पानी के नल का भी कोइर् पता नहीं था। नीचे के एक अँधेरे कमरे में, जहाँ सूरज की रोशनी नहीं पहुँचती थी, मिट्टðी के घड़ों में भरकर साल भर के लिए पीने का पानी इकट्टòा किया जाता था। नन्हा रबि जब कभी उस कमरे में झाँकता, उसका बदन सिहर उठता था। लेकिन घरवालों को नदी का भरपूर पानी मिल जाता था, क्योंकि सीधे गंगा से नहर खोदकर पिछवाड़े के बगीचे और अहाते में लाइर् गइर् थी। जब बाढ़ का पानी चढ़ आता तो रबि बड़े अचरज और बड़ी खुशी से कलकल - छलछल करती नदी के पानी को देखा करता था, जो सूरज की किरणों से रोशनी लेकर चमक - चमक उठता था। कभी - कभी छोटी मछलियाँ धारा के साथ बह आती थीं और उस छोटे - से तालाब में फिसल जाती थीं जिसमें चाचा ने सुनहरी मछलियाँ पाल रखी थीं। छोटी मछलियों के साथ रबि का दिल भी उछल पड़ता था। सचमुच वह अचरज भरा मकान था लोगों की भीड़ से भरा हुआ। पिता, माता, चाचा, चाचियाँ, भाइर्, बहनें, चचेरे भाइर्, भाभ्िायाँ, दोस्त, दोस्तों के दोस्त, कलाकार, गाने - बजानेवाले, लेखक, सभी थे वहाँ। अब यह घर शांति निके तन का एक हिस्सा है। रबि जब बड़ा हुआ तो उसने अपनी ज्िा़ ंदगी का ज़्यादातर हिस्सा शांति निके तन में बिताया। शांति निके तन में उसने अपना निज का स्कू ल बनवाया। यह जगत प्रसिद्ध शांति निके तन विश्वविद्यालय के एक अंग के रूप में आज भी वहाँ मौजूद है। लीला मजूमदार

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