मज़ ाखटोला मज़ाखटोला किताब का यह भाग हास्य या हँसी की रचनाओं का है। ‘किसी बात या रचना में ऐसा क्या है कि उसे सुनने या पढ़ने से हमें हँसी आ जातीहै?’ इस प्रश्न का उत्तर हम एक चुटवुफले की मदद से ढूँढ़ सकते हैंμ अध्यापकμ ‘मैंने तुम्हें गाय और घास का चित्रा बनाने के लिए कहा था, पर तुम्हारा कागज़्ा तो कोरा पड़ा है।’ दिनेशμ ‘सर, मैं घास और गाय का चित्रा बना रहा था पर जब तक चित्रा पूरा होता, गाय घास खाकर अपने घर चली गइर्।’ इस चुटवुफले में तीन ऐसी चीज़्ों साप़्ाफ - साप़्ाफ देखी जा सकती हैं जो लगभग हरेक हास्य रचना में होती हैं - 1.स्िथति का दबाव या लाचारी 2.लाचारी से निपटने के लिए कोइर् एकदम नइर् कल्पना या सूझ 3.शुरू की स्िथति का उलट जाना चुटवुफले की शुरुआत में दिनेश पर यह दबाव है कि वह अपना चित्रा दिखाए। चित्रा उसने बनाया ही नहीं है, दिखाएगा क्या? मगरअपनी कल्पना से वह एक ऐसा उत्तर देता है जिसमें कमी ढूँढ़नामुश्िकल है। उसके उत्तर को हम कल्पनाशील कह सकते हैं। जो चीज़हमें हँसने के लिए मज़्ाबूर करती है, वह यही कल्पनाशीलता या सूझबूझ है जो एक दबाव वाली स्िथति को बदल देती है। ज़्ााहिर है, यह पूरी घटना काल्पनिक है, यानी वास्तव में नहीं हो सकती। इस तरह देखें तो हम कह सकते हैं कि हर हास्य रचना एक काल्पनिक स्िथति का निमार्ण करती है। हमें हँसाकर वह रोज़्ााना की वास्तविक दुनिया या ज्ि़ांदगी के दबावों से थोड़ी देर के लिए मुक्ित दिलाती है। हास्य रचनाएँ हमें वुफछ सिखाने की कोश्िाश नहीं करतीं, वे केवल हँसाती हैं। पर ऐसी रचनाओं को गौर से देखकर हम यह समझ सकते हैं कि कोइर् रचना या उसकी भाषा हमें क्यों और वैफसे हँसाती है। उफपर दी गइर् तीन विशेषताओं को इस खंड में शामिल रचनाओं में ढूँढ़ा जा सकता है। चावल की रोटियाँ शीषर्क नाटक में कोको नाम के लड़के की लाचारी बढ़ती चली जाती है। चावल की रोटियाँ अकेले बैठकर खाने की उसकी इच्छा अंत तक पूरी नहीं होती। दूसरी तरप़्ाफ एक दिन की बादशाहत में रोजाना रहने वाली स्िथति उलट जाती है।़घर के बड़ों को एक दिन बच्चों की तरह जीना पड़ता है। उलटी हुइर् स्िथति का मजा हम़गुरु और चेला में भी देख सकते हैं। यह एक ऐसी अँधेर नगरी की कहानी है जहाँ हर चीज एक जैसी़कीमत पर बिकती है। ऐसी नगरी में गुरु और चेला एक मुसीबत में बुरी तरह पँफस जाते हैं, पर अंत में एक अनोखी स्िथति बनती है और वे बच जाते हैं। इस कविता की भाषा पर ध्यान दें तो हम शब्दों और मुहावरों के प्रयोग में छिपी हँसी को पहचान सकते हैं। स्वामी की दादी शीषर्क कहानी में स्वामीनाथन के भोले - भाले प्रश्न सुनकर उसकी दादी मन - ही - मन खुश होती है। शायद दो बातें इस कहानी को मज़्ोदार बनाती हैंμ एक, दादी स्वामी के सवालों को बहु़त ज्यादा गंभीरता से लेती हैं। दूसरे, दादी - पोता दोनों में अपनी - अपनी बात कहने की उतावली और होड़ होती है। पहेली बुझाने वाली कहानियाँ भी एक अलग तरह का आनंद देती हैं। अकबर - बीरबल के किस्से इसीलिए लोकपि्रय हैं कि उनमें अकबर के कठिन प्रश्नों का जवाब बीरबल बड़ी चतुराइर् से देते हैं। गोनू झा के किस्से भी इसी प्रकार के हैं। मज़्ाा देने वाली रचनाओं को हम एक और कोण से देख सकते हैंμ हाज्ि़ारजवाबी, व्यंग्य और हँसाने वाली परिस्िथतियाँ, घटनाक्रम तथा अतिशयोक्ित। यदि हम मज़्ााखटोला की रचनाओं को इस दृष्िट से देखें तो गुरु और चेला तथा गोनू झा का किस्सा बिना जड़ का पेड़ हाज्ि़ारजवाबी और सूझबूझ के नमूने हैं। चावल की रोटियाँ और एक दिन की बादशाहत में हास्य के तत्व परिस्िथतियों और घटनाक्रम से पैदा होते हैं। स्वामी की दादी हमें हँसाता नहीं है, पर दादी - पोते के बीच मज़़्ोदार संवाद पढ़कर हम मुस्वुफराते जरूर हैं। ढब्बू जी के पहले काटूर्न में अतिशयोक्ित से हास्य पैदा होता है तो दूसरा काटूर्न व्यंग्य का उदाहरण है।बच्चों में स्वस्थ और बुिमत्ता पूणर् हास्यबोध पैदा करने के लिए हाज्ि़ारजवाबी और सूझबूझ की लोककथाएँ, काटूर्न और हास्य - व्यग्ंय की रचनाएँ अिाक - से - अिाक उपलब्ध कराइर् जानी चाहिए। फ्आरिपफ...सलीम...चलो, प़्ाफौरन सो जाओ,य् अम्मी की आवाज़़ ऐन उस वक्त आती थी, जब वे दोस्तों के साथ बैठे कव्वाली गा रहे होते थे। या पिफर सुबह बड़े मजे़में आइसक्रीम खाने के सपने देख रहे होते कि आपा झिंझोड़कर जगा देतीं फ्जल्दी उठो, स्वूफल का वक्त हो गया,य् दोनों की मुसीबत में जान थी। हर वक्त पाबंदी, हर वक्त तकरार। अपनी मजीऱ़्से चूँ भी न कर सकते थे। कभी आरिपफ को गाने का मूड आता, तो भाइर् - जान डाँटते फ्चुप होता है या नहीं? हर वक्त मेंढक की तरह टरार्ए जाता है!य् बाहर जाओ, तो अम्मी पूछतीं फ्बाहर क्यों गए?य् अंदर रहते, तो दादी अम्मी ने चाहा एक झापड़ रसीद करके सो रहें, मगर याद आया कि आज तो उनके सारे अिाकार छीने जा चुके हैं। पिफर दादी ने सुबह की नमाज पढ़़ने के बाद दवाएँ खाना और बादाम का हरीरा पीना शुरू किया, तो आरिप़्ाफ ने उन्हें रोका फ्तौबा है, दादी! कितना हरीरा पिएँगी आप...पेट पफट जाएगा!य् और दादी ने हाथ उठाया मारने के लिए। नाश्ता मेज़्ाफ ने खानसामा से कहा फ्अंडे ़ा पर आया, तो आरिप्और मक्खन वगैरह हमारे सामने रखो, दलिया और दूध् - बिस्वुफट इन सबको दे दो!य् आपा ने कहर - भरी नजरों से उन्हें घूरा, मगर बेबस थी क्योंकि़रोज़्ा की तरह आज वह तर माल अपने लिए नहीं रख सकती थीं। सब खाने बैठे, तो सलीम ने अम्मी को टोका फ्अम्मी, जरा अपने़दाँत देख्िाए, पान खाने से कितने गंदे हो रहे हैं!य् फ्मैं तो दाँत माँज चुकी हूँ,य् अम्मी ने टालना चाहा! फ्नहीं, चलिए, उठिए!य् अम्मी निवाला तोड़ चुकी थीं, मगर सलीम ने ज़़्ाबरदस्ती वंफधा पकडकर उन्हें उठा दिया। अम्मी को गुसलखाने में जाते देखकर सब हँस पड़े, जैसे रोज़सलीम को ज़्ाबरदस्ती भगा के हँसते थे। ाफ मुडा फ्ज्बाल बढ़े हु़ए, शेव नहीं की, कल कपडे पहने थे और आज इतने मैले कर डाले! आख्िार अब्बा के लिए कितने कपड़े बनाए जाएँगे!य् यह सुनकर अब्बा का हँसते - हँसते बुरा हाल हो गया। आज ये दोनों वैफसी सही नकल उतार रहे थे सबकी! मगर पिफर अपने कपड़े देखकर वह सचमुच शमि±दा हो गए। थोड़ी देर बाद जब अब्बा अपने दोस्तों के बीच बैठे अपनी नइर् गज़़्फ पिफर ाल लहक - लहक कर सुना रहे थे, तो आरिपचिल्लाने लगा फ्बस कीजिए, अब्बा! पफौरन आप्ि़ाफस जाइए, दस ़बज गए!य् पिफर वह अब्बा की तरप़़्ारा अब्बा की गत देख्िाए! ़फ्चु...चु...चोप...य् अब्बा डाँटते - डाँटते रुक गए। बेबसी से गज़्ाल की अध्ूरी पंक्ित दाँतों में दबाए पाँव पटकते आरिपफ के साथ हो लिए। ़फ्रज्ि़़़ाया, जरा मुझे पाँच रुपये तो देना,य् अब्बा दफ्रतर जाने को तैयार होकर बोले। फ्पाँच रुपये का क्या होगा? कार में पैट्रोल तो है।य् आरिपफ ने तुनककर अब्बा़जान की नकल उतारी, जैसे अब्बा कहते हैं कि इकÂी का क्या करोगे, जेब - खचर् तो ले चुके! थोड़ी देर बाद खानसामा आया फ्बेगम साहब, आज क्या पकेगा?य् फ्आलू, गोश्त, कबाब, मिचो± का सालन...य् अम्मी ने अपनी आदत के अनुसार कहना शुरू किया। फ्नहीं, आज ये चीज़्ों नहीं पवेंफगी!य् सलीम ने किताब रखकर अम्मी की नकल उतारी, फ्आज गुलाब - जामुन, गाजर का हलवा और मीठे चावल पकाओ!य् फ्लेकिन मिठाइयों से रोटी वैफसे खाइर् जाएगी?य् अम्मी किसी तरह सब्र न कर सकीं। फ्जैसे हम रोज सिप़्ार्फ मिचो± के सालन से खाते हैं!य् दोनों ने एक साथ कहा।़दूसरी तरप़्ाफ दादी किसी से तू - तू मैं - मैं किए जा रही थीं। ़़फ्ओफ्रपफो! दादी तो शोर के मारे दिमाग पिघलाए दे रही हैं!य् आरिपफ ने दादी की तरह ़दोनों हाथों में सिर थामकर कहा। इतना सुनते ही दादी ने चीखना - चिल्लाना शुरू कर दिया कि आज ये लड़के मेरे पीछे पंजे झाडके पड़ गए हैं। मगर अब्बा के समझाने पर खून का घूँट पीकर रह गईं। काॅलेज का वक्त हो गया, तो भाइर् जान अपनी सप़्ोफद कमीज़ को आरिपफ - सलीम़से बचाते दालान में आए फ्अम्मी, शाम कोमैं देर से आऊँगा, दोस्तों के साथ पिफल्म दजाना है।य् फ्खबरदार!य् आरिप़़्ाफ ने आँखें निकालकर उन्हें ध्मकाया। फ्कोइर् जरूरत नहीं पिफल्म देखने की! इम्ितहान करीब हैं और हर वक्त सैर - सपाटों में गुम रहते हैं आप!य् पहले तो भाइर् जान एक करारा हाथ मारने लपके, पिफर वुफछ सोचकर मुस्करा पड़े। फ्लेकिन, हु़जूरे - आली, दोस्तों के साथ खाकसार पिफल्म देखने की बात पक्की कर चुके हैं इसलिए इजाज़्ात देने की मेहरबानी की जाए!य् उन्होंने हाथ जोड़ के कहा। फ्बना करे... बस, मैंने एक बार कह दिया!य् उसने लापरवाही से कहा और सोप़ेफ पर दराज होकर अखबार देखने लगा।़उसी वक्त आपा भी अपने कमरे से निकली। एक निहायत भारी साड़ी में लचकती - लटकती बड़े ठाठ से काॅलेज जा रही थीं। फ्आप...!य् सलीम ने बड़े गौर से आपा का मुआयना किया। फ्इतनी भारी साड़ी क्यों पहनी? शाम तक गारत हो आएगी। इस साड़ी को बदल कर जाइए। आज वह सपेफद वाॅयल की साड़ी पहनना!य़्फ्अच्छा अच्छा...बहत दे चुके हुक्म...य् आपा चिढ़ गइर्। फ्हमारे काॅलेज मेंुआज प़्ांफक्शन है,य् उन्होंने साड़ी की श्िाकनें दुरस्त कीं। फ्हुआ करे... मैं क्या कह रहा हूँ... सुना नहीं...?य् अपनी इतनी अच्छी नकल देखकर आपा शमिर्दा हो गईं - बिल्वुफल इसी तरह तो वह आरिप़्ाफ और सलीम से उनकी मनपसंद कमीज उतरवा कर निहायत बेकार कपड़े पहनने का हक्म लगायाुकरती हैं। दूसरी सुबह हुइर्। सलीम की आँख खुली, तो आपा नाश्ते की मेज़्ा सजाए उन दोनों के उठने का इंतज़्क्म दे रहीं थीं कि हरुाार कर रही थीं। अम्मी खानसामा को हखाने के साथ एक मीठी चीज़़्ाफ के गाने के ़ा जरूर पकाया करो। अंदर आरिप्साथ भाइर् जान मेज़्ा का तबला बजा रहे थे और अब्बा सलीम से कहरहे थे फ्स्वूफल जाते वक्त एक चवÂी जेब में डाल लिया करो... क्या हज़्ार् है...!य् जीलानी बानो उदूर् से अनुवाद - लक्ष्मीचंद्र गुप्त कहानी की बात 1.अन्ना ने क्या सोचकर आरिप़्ाफ की बात मान ली? 2.वह एक दिन बहुत अनोखा था जब बच्चों को बड़ों के अध्िकार मिल गए थे। वह दिन बीत जाने के बाद इन्होंने क्या सोचा होगाμ ऽ आरिप़्ाफ ने ऽ अम्मा ने ऽ दादी ने तुम्हारी बात 1.अगर तुम्हें घर में एक दिन के लिए सारे अध्िकार दे दिए जाएँ तो तुम क्या - क्या करोेगी? 2.कहानी में ऐसे कइर् काम बताए गए हैं जो बड़े लोग आरिप़्ाफ और सलीम से करने के लिए कहते थे। तुम्हारे विचार से उनमें से कौन - कौन से काम उन्हें बिना श्िाकायत किए कर लेने चाहिए थे और कौन - कौन से कामों के लिए मना कर देना चाहिए था? तरकीब फ्दोनों घंटों बैठकर इन पाबंदियों से बच निकलने की तरकीबें सोचा करते थे।य् 1.तुम्हारे विचार से वे कौन कौन - सी तरकीबें सोचते होंगे? 2.कौन - सी तरकीब से उनकी इच्छा पूरी हो गइर् थी? 3.क्या तुम उन दोनों को इस तरकीब से भी अच्छी तरकीब सुझा सकती हो? अध्िकारों की बात फ्...आज तो उनके सारे अध्िकार छीने जा चुके हैं।’’ 1.अम्मी के अध्िकार किसने छीन लिए थे? 2.क्या उन्हें अम्मी के अध्िकार छीनने चाहिए थे? 3.उन्होंने अम्मी के कौन - कौन से अध्िकार छीने होंगे? बादशाहत 1.‘बादशाहत’ क्या होती है? चचार् करो। 2.तुम्हारे विचार से इस कहानी का नाम ‘एक दिन की बादशाहत’ क्यों रखा गया है? तुम भी अपने मन से सोचकर कहानी को कोइर् शीषर्क दो। 3.कहानी में उस दिन बच्चों को सारे बड़ों वाले काम करने पड़े थे। ऐसे में कौन एक दिन का असली ‘बादशाह’ बन गया था? तर माल फ्रोज की तरह आज वह तर माल अपने लिए न रख सकती थी।य़्1.कहानी में किन - किन चीज़्ाों को तर माल कहा गया है? 2.इन चीजों के अलावा और किन - किन चीज़्ाों को ‘तर माल’ कहा जा सकता है?़3.वुफछ ऐसी चीज़्ाों के नाम भी बताओ, जो तुम्हें ‘तर माल’ नहीं लगतीं। 4.इन चीज़्ाों को तुम क्या नाम देना चाहोगी? सुझाओ। मनपसंद कपड़े फ्बिल्वुफल इसी तरह तो वह आरिपफ और सलीम से उनकी मनपसंद कमीज़़ उतरवा कर निहायत बेकार कपड़े पहनने का हक्म लगाया करती हैं।य्ु1.तुम्हें भी अपना कोइर् खास कपड़ा सबसे अच्छा लगता होगा। उस कपड़े के बारे में बताओ। वह तुम्हें सबसे अच्छा क्यों लगता है? 2.कौन - कौन सी चीजें तुम्हें बिल्वुफल बेकार लगती हैं? ;कद्ध पहनने की चीज़्ों ;खद्ध खाने - पीने की चीज़्ों ;गद्ध करने के काम ;घद्ध खेल हल्का - भारी ;कद्ध फ्इतनी भारी साड़ी क्यों पहनी?य् यहाँ पर ‘भारी साड़ी’ से क्या मतलब है? μसाड़ी का वज़़न ज्यादा था। μ साड़ी पर बड़े - बड़े नमूने बने हए थे।ुμ साड़ी पर बेल - बूटों की कढ़ाइर् थी। ;खद्ध ऽ भारी साड़ी ऽ भारी अटैची ऽ भारी काम ऽ भारी बारिशऊपर ‘भारी’ विशेषण का चार अलग - अलग संज्ञाओं के साथ इस्तेमाल किया गया है। इन चारों में ‘भारी’ का अथर् एक - सा नहीं है। इनमें क्या अंतर है? ;गद्ध ‘भारी’ की तरह हल्का का भी अलग - अलग अथो± में इस्तेमाल करो।

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