डाकिए की कहानी, वँफवरसिंह की ज़़ ुबानी श्िामला की माल रोड पर जनरल पोस्ट आॅप्ि़ाफस है। उसी पोस्ट आॅप्ि़ाफस के एक कमरे में डाक छाँटने का काम चल रहा है। सुबह के 11ः30 बजे हैं, ख्िाड़की से गुनगुनी धूप छनकर आ रही है। इस धूप का मशा लेते हुए दो पैकर और तीन महिला डाकिया पफटापफट डाक छाँटने का काम कर रहे हैं। वहीं पर मैंने सरकार से पुरस्कार पाने वाले डाकिया वँफवर¯सह जी से बात की। यही बातचीत आगे दी जा रही है। ऽ आपका शुभ नाम? मेरा नाम वँफवरसिंह है। मैं हिमाचल प्रदेश के श्िामला िाले के नेरवा गाँव का निवासी हूँ। मेरी उम्र पैंतालीस साल है। ऽ आपके परिवार में कौन - कौन हैं? उनके बारे में वुफछ बताइए। मेरे चार बच्चे हैं। तीन लड़कियाँ और एक लड़का। दो लड़कियों की शादी हो चुकी है। मेरा एक और बेटा भी था। वह मेरे गाँव में एक पहाड़ी से लकडि़याँ लाते हुए गिर गया जिससे उसकी मौत हो गइर्। ऽ आपके बेटे के साथ जो हआ, उसका हमें बहत दुख है। आपके इलाकेुुमें इस तरह की घटनाएँ क्या अक्सर होती हैं? जी, ऐसी घटनाओं का होना असाधारण नहीं है। यहाँ हर साल तिरछी ढलानों या ढांकों से घास काटते हुए कइर् औरतें गिर कर मर जाती हैं। पिफर भी यहाँ ऐसे ही रास्तों से चलना पड़हमारे गाँव में अभी तक बस नहीं पहँच पाती है। हिमाचल में हजारों ऐसे गाँवु़ँच सकते हैं।हैं जहाँता है क्योंकि दूसरे कोइर् रास्ते होते ही नहीं। पैदल चलकर ही पहुऽ पिफर आपके बच्चे पढ़ने वैफसे जाते होंगे? मेरे बच्चे गाँव के स्वूफल में पढ़ने जाते हैं। स्वूफल लगभग पाँच किलोमीटर दूर है। मेरी एक लड़की दसवीं तक पढ़ी है, दूसरी बारहवीं तक। तीसरी लड़की बारहवीं कक्षा में पढ़ रही है। बेटा दसवीं में पढ़ता है। ऽ आप जहाँ काम करते हैं वहाँ आपके अलावा और कौन - कौन हैं? क्या आपको डाकिया ही कहकर बुलाते हैं? पहले मैं भारतीय डाक सेवा में ग्रामीण डाक सेवक था। अब मैं पैकर बन गया हूँ। पर हूँ वही नीली वदीर् वाला डाक सेवक। ऽ डाक सेवक को करना क्या - क्या होता है? मुझे ! मुझे बहत वुफछ करना होता है। चिऋियाँ, रजिस्टरी पत्रा,ुने गाँव - गाँव जाता हूपासर्ल, बिल, बूढ़े लोगों की पेंशन आदि छोड़ऽ क्या यह सब अभी भी करना पड़ता है? क्योंकि अब तो सूचना और संदेश देने के बहत से नए तरीके आ गए हैं।ुशहरों में भले ही आज संदेश देने के कइर् साध्न आ गए हैं, जैसे प़फोन, मोबाइल, इर् - मेल वगैरह, लेकिन गाँव में तो आज भी संदेश पहँचाने का सबसे बड़ाुज़्ारिया डाक ही है। इसलिए गाँव में लोग डाकिए का बड़ा आदर और सम्मान करते हैं। अपनी चिऋी आदि पाने के लिए डाकिए का इंतजार करते हैं। ऽ हमने सुना है कि हमारी डाक सेवा दुनिया की सबसे बड। ी डाक सेवा है, यह भला वैफसे? सुना तो आपने बिल्वुफल ठीक है। हमारे देश की डाक सेवा आज भी दुनिया की सबसे बड़के किसी भी कोने में हम चिऋी भेज सकते हैं। पोस्टकाडर् तो केवल पचास पैसे का ही है। यानी पचास पैसे में भी हम देश के हर कोने में अपना संदेश भेज सकते हैं। ऽ आपको अपनी नौकरी में मज़ा तो बहत आता होगा।ुमुझे अपनी नौकरी बहुत अच्छी लगती है। जब मैं दूर नौकरी करने वाले सिपाही का मनीआॅडर्र लेकर उसके घर पहँचाता हँ तो उसके बूढ़े माँ - बाप का खुशी भराुूचेहरा देखते ही बनता है। ऐसे ही जब किसी का रजिस्टरी पत्रा पहँचाता हँ जिसमेंुूकभी रिज़्ुाल्ट, कभी नियुक्ित पत्रा होता है तो लोग बहत खुश होते हैं। बूढ़े दादा और बूढ़ी नानी तो पेंशन के पैसे मिलने पर बहुत ही खुश होते हैं। छह महीनों तक वे मेरा इसके लिए इंतजार करते हैं। हिमाचल में बूढ़े लोगों को पंेशन हऱछह महीनों के बाद इकऋी ही दी जाती है। ी डाक सेवा है और सबसे सस्ती भी। केवल पाँच रुपए में देश ऽ आप क्या शुरू से इसी डाकघर में काम कर रहे हैं? शुरू में तो मैंने लाहौल स्पीति जिले के किब्बर गाँव में तीन साल तक नौकरीकी है। यह हिमाचल का सबसे ऊँचा गाँव है। इसके बाद पाँच साल तक इसी ़इन गाँव में टेलीपफोन नहीं थे। बसें भी सिपर्फ मुख्यालयों तक ही जाती थी। अभी़भी कइर् ऐसे गाँव हैं जहाँ न तो बस जाती है और न ही वहाँ टेलीपफोन है। ऐसी जगह में ग्रामीण डाकसेवक का बहत मान किया जाता है।ुजिले के काजा में और पाँच साल तक किन्नौर जिले में नौकरी की है। उस वक्त ऽ आप पहाड़ी इलाके में रहते हैं। ज़ाहिर है डाक पहँचाना आसान काम तोुनहीं होगा। हाँ, मुश्िकलें तो आती ही है। जब मैं किन्नौर जिले के मुख्यालय रिकांगपिओ में नौकरी करता था तो सुबह छह बजे मेरी ड्यूटी शुरू हो जाती थी। मैं छह बजे सुबह श्िामला जाने वाली बस में डाक का बोरा रखता था और रात को आठ बजे श्िामला से आने वाली बस से डाक का बोरा उतारता था। पैकर को ये सब काम करने पड़ते हैं। किन्नौर और लाहौल स्पीति हिमाचल प्रदेश के बहत ठंडेुतथा ऊचे जिले हैं। इन जिलों में अप्रैल महीने में भी बपर्फ ँार्फबारी हो जाती है। बप़़्में चलते हुए पैरों को ठंड से बचाना पड़ता है। वरना स्नोबाइट हो जाते हैं जिससे पैर नीले पड़ जाते हैं और उनमें गैंगरीन हो जाती है जिससे उँगलियाँ झड़ सकती हैं। इन जिलों में मुझे एक घर से दूसरे घर तक डाक पहँचाने के लिए लगभगु26 किलोमीटर रोज़ाना चलना पड़ता था। हिमाचल में एक गाँव से दूसरे गाँव की दूरी लगभग चार या पाँच किलोमीटर तक होती है। हिमाचल के गाँव छोटे - छोटे होते हैं। एक गाँव में बस आठ से दस या कभी - कभी छह - सात घर ाफी पड़शामिल हो चुका है ग्रामीण डाकिए की ¯शदगी में तो चलना ही चलना है। ऽ आपने बताया था कि पहले आप डाक सेवक थे, अब पैकर हैं, इसके आगे भी कोइर् प्रमोशन है क्या? पैकर के बाद डाकिया बन सकते हैं बस एक इम्ितहान पास करना पड़ता है। अभी तो काम के हिसाब से हमारा वेतन कापफी कम रहता है। सारा दिन वुफसीऱ्पर बैठकर काम करने वाले बाबू का वेतन कहीं ज्यादा होता है। पैकर का वेतऩबाबू के जितना ही हो जाता है। अब तो डाकिए की नौकरी में लगना भी बहतुही होते हैं। इसीलिए चलना काप़्ता है। चलना तो खैर हमारी आदत में ही मुश्िकल हो चुका है। हममें से जितने डाकिए रिटायर हो चुके हैं उनकी जगह नए डाकियों को नहीं रखा जा रहा है। इससे पुराने डाकियों पर काम का बोझ दिन - प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। न जाने, आने वाला समय वैफसा होगा? ऽ काम के दौरान कभी कोइर् बहुत ख़ास बात हुइर् हो? एक घटना आपको सुनाता हँ। मेरा तबादलाू़श्िामला के जनरल पोस्ट आॅप्िाफस में हो गया था। वहाँ मुझे रात के समय रैस्ट हाउस और पोस्ट आॅप्िाफस चैकीदारी का काम ़दिया गया था। यह 1998 की बात है। 29 जनवरी को रात लगभग साढ़े दस बजे का समय था। बाहर से किसी ने पोस्ट आॅप्िाफस का दरवाज़्ाा खटखटाया।़मैंने पूछा ‘कौन है?’ जबाव आया ‘दरवाज़्ाा खोलो तुम से बात करनी है’। मैंने दरवाज़्ाा खोला तो अचानक पाँच - छह लोग अंदर घुसे और मुझे पीटना शुरू कर दिया। मैंने पूछा क्यों पीट रहे हैं तो उन्होंने कोइर् जबाव नहीं दिया। सारे आॅप्िाफस की लाइटें बंद कर दीं। इससे पहले कि मैं वुफछ समझ पाता मेरे सिर ़पर किसी भारी चीश से कइर् बार मारा जिससे मेरा सिर पफट गया। मैं लगातार चिल्लाता रहा। उसके बाद मैं बेहोश हो गया और मुझे वुफछ भी पता न चला। अगले दिन जब मुझे होश आया तो मैं श्िामला के इंदिरा गांध्ी मेडिकल काॅलेज के अस्पताल में दाख्िाल था। सिर में भयंकर ददर् हो रहा था। उन दिनों मेरा 17 साल का बेटा मेरे साथ ही रहता था। उसी से पता चला कि मेरे चिल्लाने ़़की आवाज सुनकर लड़का और आॅप्िाफस के दूसरे लोग जो नशदीक ही रहते थे, दरवाज़़्ुाों के शीशे तोडकर अंदर आए और मुझे अस्पताल पहँचाया। मेरे सिर पर कइर् टाँके लगे थे। उसकी वजह से आज भी मेरी एक आँख से दिखाइर् नहीं देता। सरकार ने मुझे जान पर खेल कर डाक की चीशें बचाने के लिए ‘बैस्ट पोस्टमैन’ का इनाम दिया। यह इनाम 2004 में मिला। इस इनाम में 500 रुपये और प्रशस्ित पत्रा दिया जाता है। मैं और मेरा परिवार बहुुत खुश हए। आज भी मैं गवर् से कहता हूँ - फ्मैं बेस्ट पोस्ट मैन हूँ।य् प्रतिमा शमार्

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