जहाँ चाह वहाँ राह मलमली धोती का बादामी रंग ख्िाल उठा था। किनारों पर कसूती के टाँकों से पिरोइर् हुइर् बेल थी। पल्लू पर भरवाँ टाँके अपना कमाल दिखा रहे थे। सुनहरे - रूपहले बेल - बूटों से जान आ गइर् थी मलमल में। इन बेल - बूटों को सजाया था इला सचानी ने। इला की हिम्मत की अनूठी मिसाल हैं ये कढ़ाइर् के नमूने। छब्बीस साल की इला गुजरात के सूरत िाले में रहती हैं। उनका बचपन अमरेली िाले के राजाकोट गाँव में अपने नाना के यहाँ बीता। साँझ होते ही मोहल्ले के बच्चे घरों से बाहर आ जाते। वुफछ मिट्टðी में आड़ी - तिरछी लकीरें खींचते, वुफछ कनेर के पत्तों से पिटपिटी बजाते, वुफछ गिट्टे ð खेलते, वुफछ इधर - उधर से टूटे - पूफटे घड़òों के ठीकरे बटोरकर पिट्टन्न् खेलते। जब इन खेलों से मन भर जाता तो पेड़ की डालियों पर झूला डालकर उँफची - उँफची पेंगे लेते और उँफचे स्वर में एक साथ गाते - कच्चे नीम की ¯नबौरी सावन जल्दी अइयो रे! इला गाने में तो उनका साथ देती, पर उनके साथ पेंगे नहीं ले पाती। रस्सी पकड़ने को हाथ बढ़ाती मगर हाथ तो उठते ही नहीं थे। वह चुपचाप एक किनारे बैठ जाती। मन - ही - मन सोचती, फ्मैं भी ऐसा वुफछ क्यों नहीं कर पाती हूँ। बच्चे भी चाहते कि इला किसी - न - किसी तरह तो उनके साथ खेल सके। कभी - कभार वह पकड़म - पकड़ाइर् और विष - अमृत के खेल में शामिल हो जाती। साथ्िायों के साथ जमकर दौड़ती मगर जब ‘धप्पा’ करने की बारी आती तो पिफर निराश हो जाती। हाथ ही नहीं उठेंगे तो धप्पा वैफसे देगी? वह बहुत कोश्िाश करती पर उसके हाथों ने तो जैसे उसका साथ न देने की ठान रखी हो। इला ने अपने हाथों की इस िाद को एक चुनौती माना। उसने वह सब अपने पैरों से करना सीखा जो हम हाथों से करते हैं। दाल - भात खाना, दूसरों के बाल बनाना, प़्ाफशर् बुहारना, कपड़े धोना, तरकारी काटना यहाँ तक कि तख्ती पर लिखना भी। उसने एक स्वूफल में दाख्िाला ले लिया। दाख्िाला मिलने में भी उसे परेशानी हुइर्। कहीं तो उसकी सुरक्षा को लेकर ¯चता थी, कहीं उसके काम करने की गति को लेकर। किसी काम को तो वह इतनी पुफतीर् से कर जाती कि देखने वाले दंग रह जाते। पर किसी - किसी काम में थोड़ी बहुत परेशानी तो आती ही थी। वह परेशानियों के आगे घुटने टेकने वाली नहीं थी। उसने दसवीं कक्षा तक पढ़ाइर् की। वह दसवीं की परीक्षा पास नहीं कर पाइर्। इला को यह मालूम न था कि परीक्षा के लिए उसे अतिरिक्त समय नहीं मिल सकता है। उसे ऐसे व्यक्ित की सुविधा भी मिल सकती थी जो परीक्षा मंे उसके लिए लिखने का काम कर सके। यह जानकारी इला को समय रहते मिल जाती तो कितना अच्छा रहता। उसे इस बात का दुख है। पर यहाँ आकर सब वुफछ खत्म तो नहीं हो जाता न! उसकी माँ और दादी कशीदाकारी करती थीं। वह उन्हंे सुइर् में रेशम पिरोने से लेकर बूटियाँ उकेरते हुए देखती। न जाने कब उसने कशीदाकारी करने की ठान ली। यहाँ भी उसने अपने पैर के अँगूठों का सहारा लिया। दोनों अँगूठों के बीच सुइर् थामकर कच्चा रेशम पिरोना कोइर् आसान काम नहीं था। पर कहते हैं न, जहाँ चाह वहाँ राह। उसके विश्वास और धैयर् ने वुफदरत को भी झुठला दिया। पंद्रह - सोलह साल की होते - होते इला काठियावाड़ी कशीदाकारी में माहिर हो चुकी थी। किस वस्त्रा पर किस तरह के नमूने बनाए जाएँ, कौन - से रंगों से नमूना ख्िाल उठेगा और टाँके कौन - से लगें, यह सब वह समझ गइर् थी।एक समय ऐसा भी आया अब उसके द्वारा काढ़े गए परिधानों की प्रदशर्नी लगी। इन परिधानों में काठियावाड़ के साथ - साथ लखनउफ और बंगाल भी झलक रहा था। इला ने काठियावाड़ी टाँकों के साथ - साथ और कइर् टाँके भी इस्तेमालकिए थे। पिायों को चिकनकारी से सजाया था। डंडियों को कांथा से उभारा था। पशु - पक्ष्िायों की ज्यामितीय आवृफतियों को कसूती और शंजीर से उठा रखा था। पारंुपरिक डिशाइनों में यह नवीनता सभी को बहत भाइर्। इला के पाँव अब रुकते नहीं हैं। आँखों में चमक, होंठो पर मुस्कान और अनूठा विश्वास लिए वह सुनहरी रूपहली बूटियाँ उकेरते थकती नहीं हैं। जहाँ चाह वहाँ राह 1.इला या इला जैसी कोइर् लड़की यदि तुम्हारी कक्षा में दाख्िाला लेती तो तुम्हारे मन में कौन - कौन से प्रश्न उठते? 2.इस लेख को पढ़ने के बाद क्या तुम्हारी सोच में वुफछ बदलाव आए? मैं भी वुफछ कर सकती हूँ..1.यदि इला तुम्हारे विद्यालय में आए तो उसे किन - किन कामों में परेशानी आएगी? 2.उसे यह परेशानी न हो इसके लिए अपने विद्यालय में क्या तुम वुफछ बदलाव सुझा सकती हो? प्यारी इला..इला के बारे में पढ़कर जैसे भाव तुम्हारे मन में उठ रहे हैं उन्हंे इला को चिट्टòी लिखकर बताओ। चिट्टòी की रूपरेखा नीचे दी गइर् है। पि्रय इला तुम्हारा/तुम्हारी सवाल हमारे, जवाब तुम्हारे 1. इला को लेकर स्वूफल वाले चिं तित क्यों थे? क्या उनका चिं ता करना सही था या नहीं? अपनेउत्तर का कारण लिखो। 2. इला की कशीदाकारी में खास बात क्या थी? 3.सही के आगे ;✓द्ध का निशान लगाओ। इला दसवीं की परीक्षा पास नहीं कर सकी, क्योंकि..ऽ परीक्षा के लिए उसने अच्छी तरह तैयारी नहीं की थी। ऽ वह परीक्षा पास करना नहीं चाहती थी। ऽ लिखने की गति धीमी होने के कारण वह प्रश्न - पत्रा पूरे नहीं कर पाती थी। ऽ उसको पढ़ाइर् करना कभी अच्छा लगा ही नहीं। 4. क्या इला अपने पैर के अँगूठे से वुफछ भी करना सीख पाती, अगर उसके आस - पास के लोग उसके लिए सभी काम स्वयं कर देते और उसको वुफछ करने का मौका नहीं देते? कशीदाकारी 1.;कद्ध इस पाठ में सिलाइर् - कढ़ाइर् से संबंध्ित कइर् शब्द आए हैं। उनकी सूची बनाओ। अब देखो कि इस पाठ को पढ़कर तुमने कितने नए शब्द सीखे। ;खद्ध नीचे दी गइर् सूची में से किन्हीं दो से संबंध्ित शब्द ;संज्ञा और िया दोनों हीद्ध इकट्टाòकरो। पुफटबाल़बुनाइर् ;ऊनद्ध बागबानी पतंगबाज़्ाी 2.एक सादा रूमाल लो या कपड़ा काटकर बनाओ। उस पर नीचे दिए गए टाँकों में से किसी एक टाँके का इस्तेमाल करते हुए बड़ों की मदद से कढ़ाइर् करो। जंजीऱमछली टाँका भरवाँ टाँका उल्टी बख्िाया ये काम कक्षा के लड़के - लड़कियाँ सब करें। बात का सप़फर बात का सप़फर वैब वैफमरा, कम्यूनीकेटर, कबूतर, इंटरनैट, पोस्ट - काडर्, हरकारा, संकेत भाषा, वूफरियर, टैक्स्ट मैसेज, तार... इस लंबी सूची में और क्या जोड़ा जा सकता है? इन सभी में क्या समानता है? सड़कों के चैराहे पर खड़ा ट्रैप्िाफक पुलिस का आदमी क्या़करता है? कत्थक, भरतनाट्यम जैसे शास्त्राीय नृत्य की भाव - भंगिमाएँ क्या अभ्िाव्यक्त करती हैं? या पिफर एक क्लास में जहाँ टीचर पढ़ाने में मशगूल हो, दो बच्चे आँखों के इशारे से, होठों को हिलाकर या किसी कागज़्ा के टुकड़े पर वुफछ लिखकर क्या कर रहे होंगे? ऐसा तो हर किसी के साथ जरूर होता होगा। अपनी बात कहने की़ज़्ारूरत तो सभी को होती है। तरीका भले ही बदल जाए। रिमझिम के इस भाग में बात है बीते कल की और ऐसे भविष्य की जो बच्चों को रोमांचित करे। वे दिन भी क्या दिन थे विज्ञान कथा के प्रसि( लेखक आइजक ऐसीमोव की लिखी कहानी है। यह़कहानी आज से डेढ़ सौ साल बाद के स्वूफलों की कल्पना करती है। कहानी पढ़कर शायद इन स्वूफलों को कोइर् स्वूफल ही न कहना चाहे। कल्पना है ऐसे भविष्य की जहाँ स्वूफल में कोइर् श्िाक्षक न हो और विद्याथीर् एक ही हो। ऐसे स्वूफल में बच्चे सीखंेगे किससे, बातें किससे करेंगे, खेलेंगे किसके साथ? हम जो पत्रा लिखते हैं, उसके जवाब का भी इंतज़्ाार करते हैं। पत्रा को ले जाने वाला और उसका जवाब लाने वाला है डाकिया। डाकिए की कहानी, वुँफवरसिंह की ज़ ुबानी एक भेंटवातार् है। रिमझिम की श्रृंखला में पहली बार भेंटवातार् की विध आ रही है। इसमें बच्चे देखेंगे कि किस तरह से ऐसे प्रश्न पूछे गए हैं जिनसे श्यादा - से - श्यादा जानकारी हासिल हो सके और व्यक्ित को अपने विचारों और अनुभवों को खुलकर अभ्िाव्यक्त करने का मौका मिले। वुँफवरसिंह जो पहाड़ी इलाके में डाक बाँटने का काम करते हैं, अपने काम, निजी ज्ि़ांदगी और काम में पेश आने वाली दिक्कतों के बारे में बात करते हैं। डाक के ज़्ुारिए संदेश पहँचाने का काम थका देने वाला ही नहीं, जोख्िाम भरा भी हो सकता है। चिऋी का सप़़्ाफर एक ऐसे सपफर पर ले जाएगा जो अतीत और वतर्मान के संदेशवाहकों की झलकियाँ देगा। संदेश पहुँचाने की शरूरत इंसानों को हमेशा से रही है। आज डाक का क्षेत्रा बेहद पैफला हआ है। समय के साथ यह तकनीकी भी हो गया है। वुफछ दशकोंुपहले तक संदेश वुफछ दिनों में पहुँचता था और आज पलक झपकते ही अपनी बात हम सैकड़ों मील दूर तक पहुँचा सकते हैं। अपनी बात किसी तक पहुँचाने का तरीका समय के साथ बदलता रहा है। समय के साथ संप्रेषण और संचार के माध्यमों में बदलाव आया है। इन माध्यमों का इस्तेमाल अलग - अलग उद्देश्यों के लिए, समाज के विभ्िाÂ वगो± के लिए हुआ है। एक माँ की बेबसीμ मन को छू लेने वाली कविता है। कविता पाठक को किस तरह से प्रभावित करती है यह पाठक के अनुभव पर निभर्र करेगा। यह कविता एक ऐसे बच्चे के बारे में है जो बोल नहीं सकता। गली - मोहल्ले के बच्चों के लिए वह ‘अजूबा’ था। बातचीत के शरिए हम दूसरों को समझ और जान पाते हैं। संवाद न होने से वह दूसरा हमारे लिए अनजाना बना रहता है। पर मौख्िाक बातचीत के अलावा भी दूसरों के भावों को समझने के कइर् तरीके हो सकते हैं। पत्रा

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