नन्हा प़़फनकार वह लड़का एक चैकोर लाल पत्थर के पास बैठ गया। उसने जल्दी - जल्दी कोइर् प्राथर्ना बुदबुदाइर् और छेनी - हथौड़ा उठाकर अपने काम में जुट गया। वुफछ दिन पहले ही उसने इस पत्थर पर घंटियों की कतारें और कडि़याँ उकेरना शुरू किया था। लड़के ने एक अधबनी अधूरी घंटी पर छेनी की नोक टिकाइर् और सावधानीपूवर्क हथौड़े से घंटी पर नक्काशी करने में जुट गया। हथौड़े के वार से पत्थर पर जो कटाव उभरता उससे पत्थर की किरचें छितरा ़लेता। साथ - साथ धीमी आवाज में वह वुफछ गुनगुनाने़भी लगता। उसके चारों ओर दूसरे संगतराश भी अपने - अपने काम में डूबे हए थे।ुकेशव दस साल का था और अभी अपना काम सीख ही रहा था। पिता के एक बार करके दिखा देने पर वह सीधी लकीरों वाले और घुमावदार डिजाइऩउकेर सकता था। अब तक उसने नक्काशी का जो भी काम किया था उनमें से इन घंटियों को बनाना ही सबसे श्यादा मुश्िकल था। केशव जानता था कि एक दिन तो ऐसा ज़्ारूर आएगा जब वह बहुत बारीक जालियाँ, महीन - नप़्ाफीस बेल - बूटे, कमल के पूफल, लहराते हुुए साँप और इठलाकर चलते हए आगरे में ही हुआ था। उसे गुजरात के पुश्तैनी गाँव जाने का तो कभी मौका ही नहीं मिला। आगरे की गलियाँ और अब सीकरी μ बस यही उसका घर थीं। चारों ओर हो रही छेनी - हथौड़ों की ठक - ठक, खड़ - खड़ के बीच केशव को किसी के कदमों की आहट भी न सुनाइर् पड़ी। इसलिए अचानक कानों में एक आवाज़़्ेा पडनपर वह चैंक गया फ्माशा अल्लाह! ये घंटियाँ कितनी सुंदर हैं। तुमने खुद बनाइर् हैं?य् पीछे मुड़कर केशव ने आँखें उठाईं तो उसे एक आदमी दिखा। फ्बेशक, मैंने ही ये घंटियाँ बनाइर् हैं। क्या मैं आपको पत्थरों पर नक्काशी करता नज़़्ार नहीं आ रहा? देखते नहीं, मैं ही पत्थर को तराश रहा हूँ।य् केशव ने बडी तल्खी से जवाब दिया। फ्दिखता तो है। पर तुम इतने छोटे लगते हो न...य् वह आदमी हँसते हुए बोला। फ्मैं दस साल का हूँ!य् फ्दस! अच्छा,य् वह आदमी पास पड़े पत्थर पर बैठते हए बोला, फ्तब तोुकाप़़्े हो। मैंने भी तेरह साल की उम्र में एक लडाइर् में हिस्सा लिया था।य्ाफी बड़अब केशव उस आदमी को अच्छी तरह देख पा रहा था। उसकी उम्र रही होगी तीस से उफपर, कद मँझोला था। वह सपेफद अँगरखा और पाजामा पहने ह़ुए था। उसके लंबे बाल गहरे लाल रंग की पगड़ी में अच्छी तरह से ढके हुए थे। फ्लगता है कोइर् बहुत बड़ा आदमी है,य् केशव ने उस आदमी के गले में पड़ी बड़े - बड़े मोतियों की माला और उँगलियों की अँगूठियों को देखते हए सोचा।ुतीखी नाक, बड़़ुाफ आती घनी मूँछें।़ी - बडी आँखें, होंठो को ढकते हए नीचे की तरप्केशव उस आदमी के व्यक्ितत्व का मुआयना कर ही रहा था कि तभी उस ़आदमी ने एक नक्काशी की तरपफ इशारा करते हुए कहा, फ्इस लड़ी में अभी कापफी काम बाकी है।य् इससे पहले कि केशव कोइर् जवाब देता, उसने किसी़के तेज़्ाी से दौड़कर आने की आवाज़्ा सुनी। यह और कोइर् नहीं, महल का पहरेदाऱथा। फ्हुशूर! मापफ करें। मुझे आपके आने का पता ही नहीं चला।य् हाँपफते हएुउसने कहा। पिफर वह मुड़कर भौंचक से खड़े केशव को घूरते हुए बोला, फ्बेववूफप़्ाफ, खड़ा हो! हशूरे आला के सामने बैठने की जुरर्त वैफसे की तूने, झुककरुसलाम कर इन्हें।य् अब केशव का माथा ठनका। उसे वुफछ - वुफछ समझ आ रहा था। बदहवासी में छेनी हाथ से छूटकर नीचे गिरी और वह जल्दी से उठकर खड़ा हो गया। अरे कहीं ये बादशाह अकबर तो नहीं! यह ख़याल आते ही उसने झुककर सलाम किया और खरगोश की - सी कातर नशरों से अकबर को देखने लगा। अकबर को पहरेदार की यह दखलंदाशी भली न लगी। उन्होंने खीझकर पहरेदार को वहाँ से जाने का इशारा करते हए कहा, फ्ठीकुफ्तुम्हारा नाम क्या है?य् अकबर ने नरम आवाज में पूछा।़फ्केशव,य् उसने नपा - तुला जवाब दिया। फ्केशव, क्या तुम मुझे नक्काशी करना सिखाओगे?य् उलझन में पड़े केशव ने तुरंत सिर हिला दिया। फ्तब तो तुम्हें मेरे लिए हथौड़़े और छेनी का भी इंतजाम करना होगा।य् केशव पुफतीर् से अपने पिता के पास भागा गया और उनका छेनी - हथौड़ा उठाकर उलटे पाँव लौट आया। दोस्ताना अंदाज़़्ा में अकबर केशव के पास जमीन पर बैठ गए और पास में पड़े पत्थर को खींचते हए बोले, फ्ठीक है, अब बताओ कि मुझे क्या करना है।य्ुकेशव ने संदेह भरी नज़्ारों से अकबर की ओर देखा फ्हुज़्ाूर, क्या आप यह सब करेंगे?य् फ्क्यों नहीं? मुझे तो विश्वास है कि मैं सीख ही लूँगा।य् फ्नहीं... नहीं... मेरा मतलब ये नहीं था,य् केशव सकपका गया। फ्दरअसल मैं कहना चाहता था कि आप इतने बड़े बादशाह हैं। ये ठीक नहीं लगता।य्उसने वुफछ अनमने भाव से कहा।अकबर हँसकर बोले, फ्अच्छा, लेकिन पिछले हफ्ऱðते तो मैंने मिट्टी से भरी डलिया ढोने में किसी की मदद की थी। क्या यह काम उससे भी ज़्यादा मुश्िकल है?य् केशव अभी भी असमंजस की स्िथति में था। वह अकबर के पास बैठ गया और उन्हें छेनी पकड़ने का सही तरीका सिखाने लगा। पिफर जैसे कि केशव के पिता ने उसे सिखाया था, उसने कोयले के टुकड़े से पत्थर पर लकीरें खींचकर एक आसान - सा नमूना बनाया और गंभीरता से कहा फ्देख्िाए, सिप़्ार्फ इन्हीं लकीरों को बहु़़त ध्यान से तराशना है, अकबर ने पत्थर पर छेनी रखी और जोर से हथौडे से वार किया, जिससे कटाव ज़्यादा गहरा हो गया। फ्अरे... अरे... नहीं, नहींय्, केशव ने तुरंत गलती पकड़ी। हथौड़े को आहिस्ता से मारना है, ... ऐसे!य् उसने करके दिखाया, फ्और हाँ, अपनी आँखें थोड़ी मींचकर रखें वरना किरचें उड़कर आँखों में चली जाएँगी।य् अकबर मुस्कराए, फ्जी हुज़्ाूर।य् जवाब में केशव भी मुस्करा उठा। वह लगभग भूल ही गया था कि उसकी बगल में बैठा यह व्यक्ित हिंदुस्तान का बादशाह है। एक अनाड़ी - से वयस्क पर अपने काम की धाक जमाने में उसे मज़्ाा आ रहा था। वह बड़े ध्यान से देख रहा था कि अकबर किस तरह लकीरों को उकेर रहे हैं। बादशाह से ज़्ारा - सी भी चूक हो जाने पर प़्ाफौरन उसकी त्यौरियाँ चढ़ जातीं। काम करते - करते अकबर पूछ बैठते, फ्केशव, सही नहीं है क्या?य् और केशव सिर हिलाकर अपनी असहमति जता देता। अकबर इत्मीनान से बैठ गए और केशव को काम करता हुआ देखने लगे। अपने काम में खोए हुुए उन दोनों को इस बात का एहसास नहीं हआ कि आसपास मौजूद दूसरे संगतराश उन्हें बड़े कौतुहल से देख रहे हैं। अकबर ने गौर किया कि केशव पत्थर पर बने नमूने को ही नहीं तराश रहा था बल्िक अपनी तरप़्ाफ से भी उनमें वुफछ जोडडिशाइन श्यादा खूबसूरत लग रहे थे। लड़के के काम करने के अंदाज़्ा को देखकर अकबर ने धीमे से कहा, फ्केशव, देखना, एक दिन तुम बड़े पफनकार बनोगे। हो सकता है कि एक दिन तुम़मेरे कारखाने में काम करो।य् फ्कारखाना? वैफसा कारखाना?य् फ्बस एक बार ये महल तैयार हो जाए और लोग आगरा से आकर यहाँ रहने लगें, तब मैं कारखाने बनवाउँफगा। इन कारखानों में मेरी ़सल्तनत के सबसे बढि़या पफनकार और श्िाल्पकार काम करेंगे। चित्रा बनाने वाले कलाकार, गलीचों के बुनकर, संगतराश, पत्थर और लकड़ी पर नक्काशी करने वाले श्िाल्पकार सभी वहाँ काम करेंगे। केशव का चेहरा चमक उठा। वह मुस्कराते हएुबोला, फ्मैं वहाँ ज़्ारूर काम करना चाहूँगा।य् ़रहा था जिससे वे अकबर उठ खड़े हुु़े प्यार से केशव का वंफधा थपथपाया औरए। जाते हए बडकहा, फ्अच्छा बेटा, अपना काम जारी रखो।य् फ्हु़शूर! क्या आप दुबारा आएँगे?य् केशव ने बडी उत्सुकता से पूछा। फ्मैं जरूर आउँफगा केशव!य़्पिफर तो पूरे दिन संगतराशों के बीच केशव की धूम मची रही। वह बार - बार बादशाह से हुइर् अपनी मुलाकात सबको सुनाता रहा। रात हो चली थी। केशव बहुुत थका हआ था, पर आँखों में नींद कहाँ? वह धीरे - से अपने पिता के बिस्तर में घुस गया। पिता ने मुस्कराकर कहा, फ्तुम तो अभी से इतने प्रसि( हो गए हो।य् फ्बादशाह सलामत ने कहा है कि एक दिन मैं बहु़त बडा कलाकार बनूँगा।य् अपने सिर को पिता की बाँहों के सहारे टिकाकर केशव धीरे - से बोला, फ्हमारे बादशाह बहुत ही नेक इंसान हैं।य् फ्बिल्वुफल सही।य् पिता ने कहा। वुफछ सोचकर केशव ने पूछा, फ्बाबा, एक बात बताओ, बादशाह के पास आगरा में एक से बढ़कर एक खूबसूरत महल हैं। पिफर वे सीकरी में यह शहर क्यों बनवा रहे हैं?य् पिता ने वुफछ याद करते हुए बताना शुरू किया, फ्हाँ बेटा, बादशाह वफा आगरा बहुत सुंदर शहर है। पर सीकरी में नया शहर बनवाने का भी एक खास कारण है। मैंने सुना है कि जब बादशाह अकबर की कोइर् संतान नहीं थी। इस वजह से वे हर वक्त परेशान रहते थे। वे बहत से साध्ु - संतों और प्ु़ाफकीरों के पास गए। भटकते - भटकते बादशाह ख्वाजा सलीम चिश्ती के पास सीकरी आए। उन्होंने ही बादशाह को बताया कि उनके एक नहीं तीन - तीन संतानें होंगी।य् फ्शाहजादा सलीम, मुराद और दनियालय् केशव ने चहकते ह़ए कहा। ुफ्बिल्वुफल सही। तब बादशाह ने ख्वाजा सलीम चिश्ती के सम्मान में सीकरी में नगर बसाने का पैफसला किया था।य् ़केशव ने कहा, फ्अच्छा! अब समझा। इसीलिए बादशाह अकबर ने अपने बेटे का नाम सलीम रखा है।य् फ्हाँ, और इसी कारण हम यहाँ एक नए शहर के लिए पत्थरों को तराश रहे हैं।य् फ्हु़ँ {{{य् केशव उनींदी आवाज में बोला। पिताजी ने देखा कि उनका लाडला बेटा सो गया है। केशव की घंटियाँ 1.फ्माशा अल्लाह! ये घंटियाँ कितनी सुंदर हैं! तुमने खुद बनाइर् हैं?य् बादशाह अकबर ने यह बात किसलिए कही होगीμ ;कद्ध केशव के काम की तारीप़्ाफ में ;खद्ध यह जानने के लिए कि घंटियाँ कितनी सुंदर हैं ;गद्ध केशव से बातचीत शुरू करने के लिए ;घद्ध घंटियाँ किसने बनाइर्, यह जानने के लिए ;घद्ध क्योंकि उन्हें यकीन नहीं था कि 10 साल का बच्चा केशव इतनी सुंदर घंटियाँ बना सकता है। ;चद्ध कोइर् और कारण जो तुम्हें ठीक लगता हो। 2.केशव पत्थर पर घंटियाँ तथा कडि़याँ तराश रहा था। उसके द्वारा तराशी जा रही घंटियों और कडि़यों का चित्रा अपनी काॅपी में बनाओ। तुम्हें क्या कोइर् खास इमारत याद आ रही है जिसमें नक्काशी की गइर् हो। संभव हो तो उसकी तस्वीर चिपकाओ। आना - जाना केशव के पिता गुजरात से आगरा आकर बस गए थे। हो सकता है तुम या तुम्हारे वुफछ साथ्िायों के माता - पिता भी कहीं और से यहाँ आकर बस गए हों। बातचीत करके पता लगाओ कि ऐसा करने के क्या कारण होते हैं? कहानी से 3. अकबर को पहरेदार की दखलंदाज़्ाी अच्छी क्यों नहीं लगी? 4.फ्लगता है कोइर् बहुत बड़ा आदमी हैय्, यहाँ पर ‘बड़े आदमी’ से केशव का क्या मतलब है? 5.फ्खरगोश की - सी कातर आँखेंय् पशु - पक्ष्िायों से तुलना करते हुए और भी बहुत - सी बातें कही जाती हैं जैसेμ‘हिरन जैसी चाल’। ऐसे ही वुफछ उदाहरण तुम भी बताओ। 6.अकबर ने जब नक्काशी सीखना चाहा, तो केशव ने उन्हें संदेहभरी नज़्ारों से क्यों देखा? 7.केशव दस साल का है। क्या उसकी उम्र के बच्चों का इस तरह के काम से जुड़ना ठीक है? अपने उत्तर के कारण ज़्ारूर बताओ। 8. फ्केशव बार - बार सबको सुनाता।य् केशव सबसे क्या कहता होगा? कल्पना करके केशव के शब्दों में लिखो। शब्दों की निराली दुनिया 1.;कद्ध नक्काशी जैसे किसी एक काम को चुनो ;बढ़इर्गिरि, मिस्त्राी इत्यादिद्ध जिसमें औज़्ाारों का इस्तेमाल होता है। उन ख़ास औज़्ाारों के नाम और काम पता करके लिखो। ;खद्ध छैनी, हथौड़ा, तराशना, किरचेंμये सब पत्थर के काम से जुड़े हुए शब्द हैं। लकड़ी के दुकानदार और बढ़इर् से बात करके लकड़ी के काम से जुड़े शब्द इकऋे करो और कक्षा में उन पर सामूहिक रूप से बातचीत करो। वुफछ शब्द हम यहाँ दे रहे हैं। आरी, रंदा, बुरादा, प्लाइर्, सूत ..;गद्ध हो सकता है कि तुम्हारे इलाके में इन चीज़्ाों और कामों के लिए वुफछ अलग किस्म के शब्द इस्तेमाल होते हों। उन पर भी बातचीत करो। 2.‘कटाव’ शब्द ‘कट’ िया से पैदा हआ है। नीचे लिखी संज्ञाएँ किन ियाओं से बनी हैं?ुइन संज्ञाओं का अथर् समझो और वाक्य में प्रयोग करो। पड3.फ्लड़के ने जल्दी - जल्दी कोइर् प्राथर्ना बुदबुदाइर्।य् रेखांकित शब्द और नीचे लिखे शब्दों में क्या अंतर है? वाक्य बनाकर अंतर स्पष्ट करो। पुफसपुफसाना बड़बड़ाना भुनभुनाना 4.‘‘बेववूफप़़्ा हो। हुशूरे आला के सामने बैठने की जुरर्त वैफसे की तूने! झुककर इन्हेाफ, खडं सलाम कर।’’ महल के पहरेदार ने केशव से यह इसीलिए कहा, क्योंकिμ ;कद्ध बादशाह के सामने बैठे रहना उनका अपमान करने जैसा है। ;खद्ध पहरेदार यह कहकर अपनी वपफादारी दिखाना चाहता था।़;गद्ध पहरेदार को बादशाह के आने का पता नहीं चला, इसीलिए वह घबरा गया था। ;घद्ध बादशाह का केशव से बात करना पहरेदार को अच्छा नहीं लगा। चुनाव़ाव बहाव लगाव

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