मुझे दे दिए पैसे चार कौन ख्िालौना लेता हूँ मैं तुम भी मन में करो विचार। तुम सोचोगी मैं ले लूँगा। तोता, बिल्ली, मोटर, रेल पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा ये तो हैं बच्चों के खेल। मैं तलवार खरीदूँगा माँ या मैं लूँगा तीर - कमान जंगल में जा, किसी ताड़का को मारूँ गा राम समान। तपसी यज्ञ करेंगे, असुरोंकृ को मैं मार भगाउँफगा यों ही वुफछ दिन करते - करते रामचंद्र बन जाउँफगा। यहीं रहूँगा कौशल्या मैं तुमको यहीं बनाउँफगा। तुम कह दोगी वन जाने को हँसते - हँसते जाउँफगा। पर माँ, बिना तुम्हारे वन में मैं वैफसे रह पाउँफगा। दिन भर घूमूँगा जंगल में लौट कहाँ पर आउँफगा। किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा तो कौन मना लेगा कौन प्यार से बिठा गोद में मनचाही चीशें देगा। सुभद्रा वुफमारी चैहान कविता और तुम 1. तुम्हें किसी - न - किसी बात पर रूठने के मौके तो मिलते ही होंगेकृ ;कद्ध अक्सर तुम किस तरह की बातों पर रूठती हो? ;खद्ध माँ के अलावा घर में और कौन - कौन हैं जो तुम्हें मनाते हैं? 2.हम ऐसे कइर् त्योहार मनाते हैं जो बुराइर् पर अच्छाइर् की जीत पर बल देते हैं। ऐसे त्योहारों के बारे में और उनसे जुड़ी कहानियों के बारे में पता करके कक्षा में सुनाओ। 3.तुमने रामलीला के शरिए या पिफर किसी कहानी के शरिए रामचंद्र के बारे में जाना - समझा होगा। तुम्हें उनकी कौन - सी बातें अच्छी लगीं? 4.नीचे दिए गए भाव कविता की जिन पंक्ितयों में आए हैं, उन्हें छाँटोμ ;कद्ध ख्िालौनेवाला साड़ी नहीं बेचता है। ;खद्ध ख्िालौनेवाला बच्चों को ख्िालौने लेने के लिए आवाशें लगा रहा है। ;गद्ध मुझे कौन - सा ख्िालौना लेना चाहिएμउसमें माँ की सलाह चाहिए। ;घद्ध माँ के बिना कौन मनाएगा और कौन गोद में बिठाएगा। 5. ‘मूँगपफली ले लो मूँगपफली! गरम करारी टाइम पास मूँगपफली!’ तुमने पेफरीवालों को ऐसी आवाज़़्ों लगाते जरूर सुना होगा। तुम्हारे गली - मोहल्ले में ऐसे कौन - से पेफरीवाले आते हैं और वे किस ढंग से आवाश लगाते हैं? उनका अभ्िानय करके दिखाओ। वे क्या बोलते हैं, उसका भी एक संग्रह तैयार करो। खेल - ख्िालौने 1. ;कद्ध तुम यहाँ लिखे ख्िालौनों में से किसे लेना पसंद करोगी। क्यों? गेंद हवाइर् जहाज़ मोटरगाड़ी रेलगाड़ी पिफरकी गुडि़या बतर्न सेट धनुष - बाण बल्ला या वुफछ और 2.ख्िालौनेवाला शब्द संज्ञा में ‘वाला’ जोड़ने से बना है। नीचे लिखे वाक्यों में रेखांकित हिस्सों को ध्यान से देखो और संज्ञा, िया आदि पहचानो। ऽ पानवाले की दुकान आज बंद है। ऽ मेरी दिल्लीवाली मौसी बस वंफडक्टर हैं। ऽ महमूद पाँच बजे वाली बस से आएगा। ऽ नंदू को बोलने वाली गुडि़या चाहिए। ऽ दाढ़ीवाला आदमी कहाँ है? ऽ इस सामान को ऊपर वाले कमरे में रख दो। ऽ मैं रात वाली गाड़ी से जम्मू जाउँफगी। तुम्हारी रामलीला ऽ क्या तुमने रामलीला देखी है? रामलीला की किसी एक लघु - कहानी को चुनकर कक्षा में अपनी रामलीला प्रस्तुत करो। कविता में कथा इस कविता में तीन नामμ राम, कौशल्या और ताड़का आए हैं। ;कद्ध ये तीनों नाम किस प्रसि( कथा के पात्रा हैं? ;खद्ध यहीं रहूँगा कौशल्या मैं तुमको यहीं बनाऊँ गा। इन पंक्ितयों का कथा से क्या संबंध् है? ;गद्ध इस कथा के वुफछ संदभो± की बात कविता में हुइर् है। अपने आस - पास पूछकर इनका पता लगाओ। ऽ तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों को मैं मार भगाउँफगा। ऽ तुम कह दोगी वन जाने को हँसते - हँसते जाउँफगा। इर्दगाह े पूरे तीस रोज़ ों बाद इर्द आइर् है। गाँव े कु तेर् े े े हो गए हैं, उनमें े लिए तेली घर भागा जाता है। े सबसे बड़ े - बूढ़ ों के लिए ाना निकाल कर ी दादी अमीना की गोद नीचे खड़े होकर साथवालों का इंतज़ ार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे - धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। शहर आ गया। बड़ ी - बड़ ी इमारतें आने लगीं, यह अदालत है, यह काॅलेज है, यह क्लब - घर है। इतने बड़े काॅलेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी! बड़े - बड़े आदमी हैं, सच! उनकी बड़ ी - बड़ ी मूँछे हैं। इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर। हामिद के मदरसे में दो - तीन बड़े - बड़े लड़के हैं, बिल्कु ल तीन कौड़ी के ! रोज मार खाते हैं, काम से जी चुरानेवाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या। सहसा इर्दगाह नज़ र आया। नमाज़ खत्म हो गइर् है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाइर् और ख्िालौने की दुकान पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं हैं। यह देखो, हिंडोला है। एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी ज़ मीन पर गिरते हुए। यह चखीर् है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँ ट छड़ों से लटके हुए हैं। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मज़ ा लो। महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊँ टों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाइर् ज़ रा - सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता। सब चख्िार्यों से उतरते हैं। अब ख्िालौने लेंगे। इधर दुकानों की कतार लगी हुइर् है। तरह - तरह के ख्िालौने हैंकृसिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भ्िाश्ती और धोबिन और साधू वाह! कितने सुंदर ख्िालौने हैं। अब बोलना ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता है, खाकी वदीर् और लाल पगड़ीवाला, कं धे पर बंदूक रखे हुए। मालूम होता है, अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भ्िाश्ती पसंद आया। कमर झुकी है, ऊपर मशक रखे हुए है। मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है। बस, मशक से पानी उड़ेलना ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्वता है उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफ़ े द अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी ज़ ंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं। यह सब दो - दो पैसे के ख्िालौने हैं। हामिद के पास कु ल तीन पैसे हैं, इतने महँगे ख्िालौने वह कै से ले? ख्िालौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर - चूर हो जाए। ज़ रा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए। ऐसे ख्िालौने लेकर वह क्या करेगा। लेकिन ललचाइर् हुइर् आँखों से ख्िालौनों को देख रहा है और चाहता है कि ज़ रा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। ख्िालौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवडि़याँ ली हैं, किसी ने गुलाबजामुन, किसी ने सोहन हलवा, सभी मज़ े से खा रहे हैं। मिठाइयों के बाद कु छ दुकानें लोहे की चीज़ ों की हैं। कु छ गिलट और कु छ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोइर् आकषर्ण नहीं था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं। हामिद लोहे की दुकान पर रुक जाता है। कइर् चिमटे रखे हुए थे। उसे ख्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी। फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलंेगी। घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी। ख्िालौने से क्या फायदा? हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब - के - सब शबर्त पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं। इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोइर् काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े - फुं सियाँ निकलेंगी, आप की ज़ बान चटोरी हो जाएगी। सब - के - सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसें! मेरी बला से! उसने दुकानदार से पूछाकृ यह चिमटा कितने का है? दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोइर् आदमी साथ न देखकर कहाकृ यह तुम्हारे काम का नहीं है जी! ‘‘बिकाऊ है कि नहीं ?’’ ‘‘बिकाऊ क्यों नहीं है? और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?’’ ‘‘तो बताते क्यों नहीं, कै पैसे का है?’’ ‘‘छह पैसे लगेंगे।’’ हामिद का दिल बैठ गया। ‘‘ठीक - ठीक बताओ।’’ ‘‘ठीक - ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।’’ हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहाकृ तीन पैसे लोगे ? यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दुकानदार ने घुड़ कियाँ नहीं दी। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कं धे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ ता हुआ संगियों के पास आया। ज़ रा सुनें, सब - के - सब क्या - क्या आलोचनाएँ करते हैं। मोहसिन ने हंँसकर कहा कृ यह चिमटा क्यों लाया पगले, इससे क्या करेगा? हामिद ने चिमटे को ज़ मीन पर पटककर कहा कृ ज़ रा अपना भ्िाश्ती ज़ मीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर - चूर हो जाएँ बच्चू की। महमूद बोला कृ तो यह चिमटा कोइर् ख्िालौना है? हामिद कृ ख्िालौना क्यों नहीं है। अभी कं धे पर रखा, बंदूक हो गइर्। हाथ में लिया, फ़ कीरों का चिमटा हो गया। चाहँू तो इससे मंजीरे का काम ले सकता हूँ। एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे ख्िालौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे ख्िालौने कितना ही ज़ ोर लगाएँ, मेरेे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर हैकृ चिमटा। सम्मी ने खंजरी ली थी। प्रभावित होकर बोलाकृमेरी खँजरी से बदलोगे, दो आने की है। हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखाकृमेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले। बस, एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब - ढब बोलने लगी। ज़ रा - सा पानी लग जाए तो खतम हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफ़ ान में बराबर डटा खड़ा रहेगा। चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं। फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, ध्ूाप तेज़्ा हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही हैं। बाप से ज्ि़ाद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता है। हामिद है बड़ ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे। अब बालकों के दो दल हो गए हैं। एक ओर मिट्टðी है, दूसरी ओर लोहा। अगर कोइर् शेर आ जाए, मियाँ भ्िाश्ती के छक्के छूट जाए, मियाँ सिपाही मिट्टðी की बंदूक छोड़ कर भागे, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुँह छिपाकर जमीन पर लेट जाए। मगर यह चिमटा, यह बहादूर, यह रुस्तमें - हिंद लपककर शेर की गदर्न पर सवार हो जाएगा। और उसकी आँखें निकाल लेगा।मोहसिन ने एड़ ी - चोटी का ज़ ोर लगाकर कहाμअच्छा, पानी तो नहीं भर सकता। हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ ा करके कहाμभ्िाश्ती को एक डाँट बताएगा, तो दौड़ ा हुआ पानी लाकर द्वार पर छिड़ कने लगेगा। मोहसिन परास्त हो गया; पर महमूद ने कु मुक पहँुचाइर्μअगर बच्चू पकड़ े जाएँ, तो अदालत में बँधे - बँधे फिरेंगे। तब वकील साहब के ही पैरों पड़ ेंगे। हामिद इस प्रबल तकर् का जवाब न दे सका। उसने पूछाμहमें पकड़ ने कौन आएगा? नूरे ने अकड़ कर कहाμयह सिपाही बंदूकवाला। हामिद ने मुँह चिढ़ ाकर कहाμयह बेचारे हम बहादुर रुस्तमेμहिंद को पकड़ेंगे! अच्छा लाओ, अभी ज़ रा कु श्ती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे। पकड़ ेंगे क्या बेचारे! मोहसिन को एक नइर् चोट सूझ गइर्μतुम्हारे चिमटे का मुँह रोज़्ा आग में जलेगा। उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा; लेकिन यह बात न हुइर्। हामिद ने तुरंत जवाब दिया - आग में बहादुर ही कू दते हैं जनाब। आग में कू दना वह काम है, जो रुस्तमे हिंद ही कर सकता है। महमूद ने एक ज़ ोर लगाया μ वकील साहब कु सीर् - मेज पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावरचीखाने में ज़ मीन पर पड़ा रहेगा। इस तकर् ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया! कितने ठिकाने की बात कही है पट्ठे ने। चिमटा बावरचीखाने में पड़ े रहने के सिवा और क्या कर सकता है? हामिद को कोइर् फड़ कता हुआ जवाब न सूझा, तो उसने धाँधली शुरू कीμमेरा चिमटा बावरचीखाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कु सीर् पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा। कानून को पेट में डालने वाली बात छा गइर्। ऐसी छा गइर् कि तीनों शूरमा मुँह ताकते रह गए। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे हिंद है। अब इसमें मोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी आपिा नहीं हो सकती। औरों ने तीन - तीन, चार - चार आने पैसे खचर् किए, पर कोइर् काम की चीज़ न ले सके । हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, ख्िालौनों का क्या भरोसा? टूट फू ट जाएँगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसो! संध्िा की शते± तय होने लगीं। मोहसिन ने कहा कृ ज़्ारा अपना चिमटा दो, हम भी देखें, तुम हमारा भ्िाश्ती लेकर देखो । महमूद और नूरे ने भी अपने - अपने ख्िालौने पेश किए। हामिद को इन शतो± के मानने में कोइर् आपिा न थी। चिमटा बारी - बारी से सबके हाथ में गया, और उनके ख्िालौने बारी - बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत ख्िालौने हैं! हामिद ने हारनेवालों के आँसू पोंछे कृ मैं तुम्हें चिढ़ ा रहा था, सच! यह चिमटा भला इन ख्िालौनों की क्या बराबरी करेगा? मालूम होता है, अब बोले, तब बोले। मोहसिन कृ लेकिन इन ख्िालौनों के लिए कोइर् हमें दुआ तो न देगा। महमूद कृ दुआ को लिए फिरते हो। उलटे मार न पड़ े। अम्माँ ज़ रूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के ख्िालौने मिले? हामिद को स्वीकार करना पड़ ा कि ख्िालौने को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। फिर अब तो चिमटा रुस्तमे - हिंद है और सभी ख्िालौनों का बादशाह! रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने के ले खाने को दिए। महमूद ने के वल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था। ग्यारह बजे सारे गाँव मंे हलचल मच गइर्। मेलेवाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़ कर भ्िाश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भ्िाश्ती नीचे आ रहे और परलोक सिधारे। इस पर भाइर् - बहन में मार - पीट हुइर्। दोनों खूब रोए। उनकी अम्मा यह शोर सुनकर बिगड़ ी और दोनों को ऊपर से दो - दो चाँटे और लगाए। मियाँ नूरे के वकील का अंत इससे ज़् यादा गौरवमय हुआ। वकील ज़ मीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। दीवार मंे दो ख्ूाटियाँ गाड़ ी गईं। उन पर लकड़ ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज़ का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर विराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। मालूम नहीं, पंखे की हवा से या पंखे की चोट से वकील साहब का चोला माटी में मिल गया। फिर बड़ े ज़ ोर - शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्िथ घूरे पर डाल दी गइर्। अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चाजर् मिल गया। लेकिन पुलिस का सिपाही पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आइर्, उसमें कु छ लाल रंग के फटे - पुराने चिथड़ े बिछाए गए, जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाइर् और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाइर् सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हैं। महमूद को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बंदूक लिए ज़्ामीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल गया है, जिससे वह टूटी टाँग को आनन - फानन में जोड़ सकता है। टाँग जोड़ दी जाती है; लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है। शल्य - िया असफल हुइर्, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम - से - कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चैंकी। ‘‘यह चिमटा कहाँ था?’’ ‘‘मैंने मोल लिया है।’’ ‘‘कितने पैसे में?’’ ‘‘तीन पैसे दिए।’’ अमीना ने छाती पीट ली। यह कै सा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कु छ खाया न पिया। लाया क्या, यह चिमटा! ‘‘सारे मेले में तुझे और कोइर् चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया ?’’ हामिद ने कहा μ तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे ले लिया। बुढि़या का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और कितना विवेक है! दूसरों को ख्िालौने लेते और मिठाइर् खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? वहाँ भी इसे अपनी बुढि़या दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया। वह रोने लगी। दामन फै लाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ ी - बड़ ी बूँदें गिराती जाती थी। प्रेमचंद

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