आज मालू के घर में बहुत चहल - पहल है। चि‘प्पन और उनका परिवार पाँच साल बाद घर आए हैं। पाँच साल पहले चि‘प्पन की नौकरी अबू धबी में लगी थी। तभी से वे वहीं रह रहे हैं। मालू और उसके अप्पा, चि‘प्पन के परिवार को लेने हवाइर् अंे गए। हवाइर् जहाश के पहुँचने के बाद सभी यात्रिायांे का सामान उतरने में काप़फी समय लग गया। आख्िारकार, चि‘प्पन, वुफंजम्मा और बच्चे हवाइर् अंे से बाहर आते दिखाइर् दिए। फ्शांता और शश्िा कितने बड़े हो गए हैं!य् अप्पा एकाएक बोल पड़े। सारा सामान टैक्सी में रखा और सब चल दिए, मालू के घर की ओर। फ्शांता, तुम इतने लंबे सप़फर के बाद बहुत थक गइर् होगी। अप्पा बता रहे थे कि अबू धबी भारत से बहुत दूर है।य् मालू ने कहा। फ्अरे नहीं, हम तो बिलवुफल नहीं थके। माना, अबू धबी यहाँ से बहुत दूर है, पर हवाइर् जहाश से पहुँचने में हमें दो ही घंटे लगे। हवाइर् जहाश बहुत तेश जो उड़ता है।य् शांता बोली। अध्यापक के लिएμमलयालम में चि‘प्पन - पिता का छोटा भाइर्, वुंफजम्मा - पिता के छोटे भाइर् की पत्नी अथार्त् चाची। मालू यह सुनकर बहुत हैरान हुइर्। उसे याद आया, जब वह अपने स्वूफल के टिªप पर चेन्नइर् गइर् थी, तो उसे ट्रेन में पूरे 12 घंटे लगे थे लेकिन नक्शे में तो चेन्नइर् और कोच्ची बहुत पास दिखाइर् देते थे। हवाइर् अड्डे से घर तक के रास्ते में मालू, शांता और शश्िा ने बहुत सारी बातें कीं। मालू को याद आया कि वह जब अपने स्वूफल के बच्चों के साथ टिªप पर गइर् थी, तो उसे बहुत ही अच्छा लगा था। वह शांता से भी पूरे सप़फर की बातें जानना चाहती थी। रेत ही रेत! मालू ने पूछा, फ्क्या तुमने हवाइर् जहाश से बहुत - सी मशेदार चीशें देखीं?य् फ्हाँ! श्यादातर हवाइर् जहाश से बादल - ही - बादल दिखाइर् दिए, क्योंकि हवाइर् जहाश बादलों से बहुत उफपर उड़ रहा था। इससे पहले वुफछ समय तक तो नीचे रेत - ही - रेत दिखाइर् दी, पर रेत का रंग बदलता रहाμकभी सप़ेफद, कभी भूरा तो कभी पीला, लाल या काला। कभी - कभी उन्हें रेत के पहाड़ भी दिखाइर् दिए। पिफर नीचे शमीन दिखाइर् देनी बंद हो गइर्,य् शांता बोली। फ्इन्हें रेत के टीले भी कहते हैं,य् शश्िा ने आगे कहा। फ्मैंने तो केवल समुद्र के किनारे ही रेत देखी है,य् मालू बोल पड़ी। फ्तब तो तुम्हें अबू धबी शरूर आना चाहिए,य् चि‘प्पन बोले। दूर देश की बात उन्होंने बताया कि अबू धबी और आस - पास के देश रेगिस्तानी इलाके में हैं। शहर से थोड़ी ही दूर जाओ, तो चारों ओर दूर - दूर तक रेत ही रेत दिखाइर् देती है। न कोइर् पेड़, न ही हरियाली, केवल रेत! फ्केरल में बने अपने घर के आस - पास की हरियाली और ठंडे पानी को मैं बहुत याद करती थी, अब यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा है,य् वुंफजम्मा बोली। आस - पास इतने सारे पफलों के पेड़ देखकर हैरान रह गएμनारियल, केले, पपीते, सुपारी, कटहलμकितनी ही तरह के पेड़! शश्िा बोली, फ्अबू धबी में तो सिप़र्फ खजूर के ही पेड़ दिखाइर् देते हैं क्योंकि वही एक ऐसा पेड़ है, जो वहाँ उग सकता है।य् कितने सुंदर तोहफ़े और फ़ोटो सबसे मिलने के बाद वुंफजम्मा ने अपने बैग और अटैची खोले। वे सभी के लिए तोहप़ेफ लाईं थीं, और खजूर भी, मीठे - मीठे और स्वादिष्ट। शश्िा ने मालू को अबू धबी में चलने वाले नोट और सिक्के भी दिखाए। शांता ने बताया कि वहाँ अलग तरह के रुपये होते हैं, जिन्हें ‘दिरहम’ कहा जाता है। उन पर वहाँ की अरबी भाषा में वुफछ लिखा होता है। उन्होंने अपने घर और आस - पास की जगहों की तसवीरें भी दिखाईं। चि‘प्पन ने मालू को एक ग्लोब निकालकर दिया। बोले, फ्मालू ढूँढ़ो, अबू धबी कहाँ है और केरल कहाँ।य् सब बच्चे ग्लोब पर अलग - अलग जगह ढूँढ़ कर मशे लेने लगे। मालू ने चेन्नइर् और कोच्ची भी ढूँढ़ा। शाम को बरामदे में बैठे सभी ठंडी - ठंडी हवा का मशा ले रहे थे और अबू धबी की तसवीरें देख रहे थे। बहुत उफँची - उफँची इमारतें और उनमें बड़ी - बड़ी शीशे की ख्िाड़कियाँ! उनको देख मालू झट बोली, फ्इन ख्िाड़कियों से कितनी ठंडी हवा आती होगी।य् चि‘प्पन बोले, फ्अबू धबी में ख्िाड़कियाँ खोलने का तो सवाल ही नहीं उठता। बाहर बहुत ही गमीर् होती है। श्यादातर जगह तो एयर - कंडीश्नर चलते हैं। गमीर् की वजह से वहाँ के लोग ढीले - ढाले सूती कपड़े दूर देश की बात पहनते हैं और पूरा शरीर और सिर भी ढँककर रखते हैं। इससे वे तेश ध्ूप से बच जाते हैं।य् मालू को वहाँ की तसवीरें देखने में बहुत मशा आ रहा था। उसे कितनी सारी नइर् - नइर् बातें भी सुनने को मिल रही थीं। वह हर तसवीर की अपने शहर से तुलना भी कर रही थी। उसने सोच लिया कि वह अबू धबी की एक रिपोटर् भी अपनी कक्षा के लिए तैयार करेगी। चचार् करो और लिखो झ् तुम भी अपने शहर की तुलना अबू धबी से करते हुए एक छोटी - सी रिपोटर् तैयार करो। उसमें तसवीरें या चित्रा बनाकर भी लगा सकते हो। अपनी रिपोटर् में इन बातों के बारे में लिखना मत भूलनाμ जलवायु और मौसमऽऽऽ पेड़ - पौध्े ऽऽऽलोगों का पहनावाऽऽऽ इमारतें ऽऽऽसड़कों पर वाहनऽऽऽ भाषा ऽऽऽखान - पान ऽऽऽ झ् रेगिस्तानी इलाके में पेड़ - पौध्े कम क्यों होते हैं? झ् क्या तुम्हारी जान - पहचान के कोइर् व्यक्ित किसी और देश में रहते हैं? झ् वे वहाँ कब से रहते हैं? वे वहाँ पढ़ाइर् करने गए थे या काम करने? क्या उनके वहाँ जाने का कोइर् अन्य कारण था? झ् इन नोटों को देखो। हर नोट के सामने के बक्से में उसका मूल्य लिखो। दूर देश की बात झ् ये कौन - से देश के नोट हैं? तुम वैफसे जानोगे? झ् नोटों पर किसकी तसवीर बनी है? झ् क्या नोटों पर मूल्य के अलावा और भी नंबर लिखे हैं? झ् क्या दो नोटों पर एक ही नंबर छपा हो सकता है? झ् एक दस रुपये के नोट को ध्यान से देखो। इस पर लिखी कितनी भाषाओं को तुम पहचान सकते हो? झ् सिक्कों पर मूल्य के अलावा और क्या - क्या लिखा है? झ् इन नोटों को देखो। क्या ये सभी नोट भारत के हैं? जो नोट भारत के नहीं हैं, उन पर लाल गोले बनाओ। पता करो और लिखो कि बचे हुए नोट कहाँ के हैं?

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