मुख्तापुर गाँव में रहने वाले वाणी और प्रसाद के घर में रंग - बिरंगे धगों का ढेर लगा रहता है। उनके अम्मा - अप्पा और परिवार के सभी लोग बुनाइर् का काम करते हैं। यह बुनाइर् बहुत ही सुंदर और अपने - आप में अनोखी होती है। उनका गाँव आँध्र प्रदेश के पोचमपल्ली िाले में है। इस िाले के श्यादातर परिवार बुनकर हैं। इसलिए इस बुनाइर् को पोचमपल्ली नाम से पहचाना जाता है। इन गाँवों के लोग बहुत पुराने समय से यह काम कर रहे हैं। वाणी और प्रसाद के अम्मा - अप्पा ने अपने परिवार के बड़ों से यह बुनाइर् सीखी। अब वाणी और प्रसाद भी स्वूफल से आकर अपने अम्मा - अप्पा की मदद करते हैं। अध्यापक के लिएμबच्चों का ध्यान इस ओर दिलाएँ कि पारंपरिक व्यवसाय अध्िकतर घर में ही सीखे जाते हैं। इनमें पोचमपल्ली कारीगरी की तरह बहुत सारे हुनर सीखने होते हैं। इसी तरह के अन्य पारंपरिक व्यवसायों, जैसे - कालीन बनाना, ख्िालौने बनाना, इत्रा बनाना इत्यादि पर चचार् करवाइर् जा सकती है। बच्चों को भारत के नक्शे में आँध््र प्रदेश ढूँढ़ने के लिए कहें। पोचमपल्ली आस - पास धागे से कपड़े तक अप्पा पोचमपल्ली शहर से धगे की लडि़याँ लाते हैं। अम्मा लडि़यों को उबलते पानी में डालकर उनकी गंदगी और दाग धेतीं हैं। पिफर सब मिलकर धगों को सुंदर रंगों में रंगते हैं और सुखाकर उनकी गट्ठी बनाते हैं। धगे की गटि्ठयाँ करघे पर लपेटी जाती हैं। पिफर इनसे कपड़े बुने जाते हैं। रेशम का धगा हो तो रेशमी कपड़ों, साडि़यों या सूटों के लिए कपड़े बुने जाते हैं। सूती धगे से भी साडि़याँ, कपड़ों के थान और चादरें बुनी जाती हैं। करघे में कइर् सुइयाँ होती हंै। डिशाइन के हिसाब से सुइयों का नंबर घटता - बढ़ता है। कारीगर चमकदार रंगों की बहुत ही सुंदर पोचमपल्ली साडि़याँ बुनते हैं। इन कारीगरों ने अपनी इस कला से इलाके का नाम दुनियाभर में मशहूर कर दिया है। खतरे में कला ऐसी साड़ी बुनने के लिए अच्छी कारीगरी चाहिए। इसके लिए कइर् दिनों की कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। पिफर भी साडि़याँ सही दाम में बेचना बहुत मुश्िकल होता है। रेशम लगातार महँगा होता जा रहा है। बड़े दुकानदार बुनकरों को तो साड़ी का बहुत ही कम पैसा देते हैं। खुद वे भाव बढ़ा - चढ़ा कर बेचते हैं। इसीलिए कइर् बुनकर यह काम छोड़ रहे हैं। वे अपना गाँव छोड़कर बड़े शहरों में मशदूरी करने जा रहे हैं। इस समस्या का वुफछ हल निकालना चाहिए। बरसों पुरानी बुनकरों की यह कला कहीं ध्ीरे - धीरे खो न जाए। अध्यापक के लिएμऐसे परंपरागत व्यवसायों में भी कइर् औशारों और कलाओं का इस्तेमाल होता है। इस बात पर भी शोर डालें कि अकसर एक चीश को बनाने के लिए परिवार के सभी लोग मिलकर काम करते हैं और सभी का काम बँटा होता है। पोचमपल्ली चचार् करो आज वाणी और प्रसाद जैसे कइर् बच्चों ने अपने परिवारों से यह सुंदर कला सीख ली है। क्या बड़े होकर ये भी अपने बच्चों को इस कला के हुनर सिखा पाएँगे? इनके उत्तर काॅपी में लिखो झ् क्या तुमने कभी किसी को करघे पर वुफछ बुनते देखा है? क्या और कहाँ? झ् साड़ी के धगों को रंगा जाता है। क्या तुम किसी और चीश के बारे में जानते हो, जिसको रंगा जाता है? झ् वाणी और प्रसाद के गाँव में जाओ तो लगता है कि जैसे पूरा गाँव साडि़याँ ही बना रहा है। क्या तुम कोइर् ऐसा काम जानते हो, जो एक ही जगह के बहुत सारे लोग करते हैं? झ् क्या वे कोइर् चीश तैयार करते हैं? झ् उस को तैयार करने का तरीका पता करो। झ् उस चीश को बनाने के लिए क्या आदमी और औरतें अलग - अलग तरह के काम करते हैं? झ् क्या उस चीश को बनाने में बच्चे भी मदद करते हैं? पता करो और लिखो झ् किसी लुहार, बढ़इर् या वुफम्हार से बातचीत करो और उनके काम के बारे में पता लगाओ। झ् उन्होंने अपना काम कहाँ से सीखा? आस - पास झ् उनको काम में क्या - क्या चीशें सीखनी पड़ती हैं? झ् क्या उन्होंने अपना काम अपने परिवार में किसी और को भी सिखाया है? झ् नीचे तालिका में वुफछ कामों की सूची दी गइर् है। क्या तुम ऐसे लोगों को जानते हो, जो ये काम जानते हैं? उन लोगों के नाम लिखो। पता करो कि उन्होंने ये काम किस से सीखे। काम उनके नाम, जो यह काम करते हैं उन्होंने यह काम कहाँ से सीखा कपड़े की बुनाइर् करना वाणी, प्रसाद के अम्मा - अप्पा अपने परिवार से खाना पकाना साइकिल रिपेयर करना हवाइर् जहाश उड़ाना सिलाइर् - कढ़ाइर् करना गाना गाना जूते बनाना पतंग उड़ाना खेती करना बाल काटना अध्यापक के लिएμपोचमपल्ली की तरह ही भारत के कइर् इलाकों में वुफछ खास चीशें बनाइर् जाती हैं। इन चीशों के नाम उस इलाके के नाम से ही मशहूर हो गए हैं, जैसे - वुफल्लू की शाॅल, मध्ुबनी पेंटिंग, असम की सिल्क, कश्मीरी कढ़ाइर्। इस पर चचार् करवाइर् जा सकती है।

RELOAD if chapter isn't visible.