टिªन{{{...! घंटी बजते ही मनप्रीत ने दरवाशा खोला। बाहर दिव्या और स्वास्ितक को देखते ही वह खुशी से चिल्लाइर्, फ्गुरनूर! देखो तो, कौन आया है?य् गुरनूर दौड़ती हुइर् आइर्। दोस्तों को देखते ही वह खुशी से उनसे लिपट गइर् और बोली, फ्तुम लोग अपने बोडि±ग स्वूफल से कब आए?य् फ्कल ही! तुम्हारे मम्मी - पापा कहाँ हैं? उनसे तो मिल लें,य् स्वास्ितक बोला। फ्वे तो गुरुद्वारे गए हैं। हम भी वहीं जा रहे हैं,य् गुरनूर ने जवाब दिया। फ्अरे, वाह! चलो हम भी चलते हैं,य् दिव्या खुशी से बोली। गुरनूर ने पूछा, फ्तुम तो बस छुिðयों में ही घर आते हो। क्या तुम्हें हाॅस्टल में रहना अच्छा लगता है? वैफसे रह लेते हो मम्मी - पापा के बिना?य् फ्उनकी याद तो आती है, पर हाॅस्टल में बड़े मशे भी आते हैं। भले ही कभी - कभी हमें खाना पसंद नहीं आता, पर सभी बच्चों के साथ एक साथ बैठकर खाने में मशा आता है,य् दिव्या ने बताया। खाना - ख्िालाना फ्हाॅस्टल में जब किसी के घर से खाने की कोइर् चीश आती है, तो सभी बच्चे उसके कमरे में पहुँच जाते हैं, और बस! मिनटों में चीश खत्म,य् स्वास्ितक ने हँसते हुए बताया। झ् क्या तुम बोडि±ग स्वूफल में पढ़ते हो? अगर नहीं, तो किसी हाॅस्टल में रहने वाले बच्चे से बातचीत करके पता करोμ झ् बोडि±ग स्वूफल और दूसरे स्वूफल किन - किन बातों में अलग होते हैं? झ् वहाँ पर वैफसा खाना मिलता है? झ् बच्चे कहाँ बैठकर खाना खाते हैं? झ् झ् बतर्न कौन धेता है? झ् क्या कभी बच्चों को घर के खाने की याद आती है? झ् क्या तुम बोडि±ग स्वूफल में पढ़ना चाहोगे? क्यों? गुरुद्वारे में बच्चे बातें करते हुए गुरुद्वारे पहुँचे। वहाँ सभी ने सिर ढँके। वे गुरुद्वारे के रसोइर् घर में गए, जो बहुत बड़ा था। वहाँ कइर् काम हो रहे थे। खाना बड़े - बड़े बतर्नों में पक रहा था। वहाँ एक बड़े पतीले में उड़द और चने की दाल पक रही थी। दूसरी तरप़फ पतीले में आलू और गोभी की सब्शी बन रही थी। स्वास्ितक ने कहा, फ्अरे! देखो गुरनूर तुम्हारे पापा वहाँ हंै! चलो, मिलकर आते हैं।य् आस - पास मनजीत सिंह बच्चों से बहुत प्यार से मिले और पूछा, फ्तुम सब यहाँ क्या कर रहे हो?य् फ्अंकल! क्या हम भी खाना पकाने में मदद करें? आप क्या बना रहे हैं?य् स्वास्ितक ने पूछा। मनजीत सिंह ने बताया, फ्मैं कड़ाह प्रसाद बना रहा हूँ। इस बड़ी - सी कड़ाही में आटा, घी में भून रहा हूँ, इसमें बड़ी मेहनत लगती है।य् फ्मुझे पता है, यह हलुआ है। इसमें आप चीनी कब डालेंगे?य् दिव्या ने पूछा। तभी उन्हें मनप्रीत की मम्मी दिखाईं दीं। वे लोग मुस्वफराते हुए उनके पास गए। फ्आंटी! आप क्या कर रही हैं?य् दिव्या ने पूछा। फ्बेटा, हम लोग तंदूर में रोटी सेंक रहे हैं,य् उन्होंने बताया। दिव्या ने आश्चयर् से कहा, फ्आंटी, इतनी सारी रोटियाँ एक साथ! मैं भी सेवँूफ?य् फ्हाँ, हाँ, आओ, तुम भी करके देखो। यहाँ तो हर कोइर् सेवा कर सकता है। लेकिन पहले अपने हाथ धो लो,य् आंटी ने कहा। दिव्या जल्दी से हाथ धोकर आ गइर्। तंदूर में हाथ डालते ही उसे बहुत गमर् लगा। सेंकना छोड़ कर वह रोटियों पर घी लगाने लगी। स्वास्ितक ने हैरानी से पूछा, फ्इतने सारे लोगों के लिए खाना पकाने का सामान कौन लाता है?य् एक औरत ने बताया, फ्सभी मिल - जुल कर मदद करते हैं। कोइर् सामान देता है, खाना - ख्िालाना तो कोइर् पैसे। जिसका जैसा मन होता है, वैसे ही काम में मदद करते हैं।य् मनप्रीत ने चिढ़ाते हुए कहा, फ्क्यांे स्वास्ितक! वैफसा लग रहा है? पहले भी कभी रसोइर् का काम किया है क्या?य् फ्नहीं, पर सबके साथ काम करने में बहुत अच्छा लग रहा है,य् स्वास्ितक ने कहा, पता ही नहीं चला कि कब रोटी, चावल, हलुआ, दाल और सब्शी तैयार हो गए। अरदास के बाद सभी को कड़ाह प्रसाद दिया जाने लगा। वुफछ लड़वफों ने जल्दी से बरामदे में दरियाँ बिछा दीं। सब लोग लाइनों में बैठ गए। वुफछ लोग पत्तलों में खाना परोसने लगे और वुफछ लोग पानी। सभी ने मिल - जुलकर खाना खाया। खाने के बाद सब ने अपने - अपने पत्तल उठा कर बड़े से ड्रम में डाले। अंत में खाना - ख्िालाने वाले लोगों ने भी मिलकर एक साथ खाया और वहाँ की सप़फाइर् करके बतर्न भी साप़फ किए। बताओ झ् गुरुद्वारे में एक साथ मिलकर खाना पकाने और खाने को ‘लंगर’ कहते हैं। क्या तुमने कभी लंगर में खाना खाया है? कब और कहाँ? झ् कितने लोग खाना बना रहे थे और कितने लोग खाना परोस रहे थे? झ् क्या किसी दूसरे अवसर पर भी तुमने बहुत से लोगों के साथ मिलकर खाना खाया है? कब और कहाँ? वहाँ किस - किस ने खाना बनाया और परोसा था? आस - पास गुरुद्वारे में लंगर के वुफछ चित्रा

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