गुजराती लोककथा .फ्रत ही मु.फ्रत एक दिन भीखूभाइर् का मन नारियल खाने का हुआ। ताज़्ाा - मुलायम, कसा हुआ, शक्कर के साथ। म्म्म्म! उसके बारे में सोचते ही भीखूभाइर् ने अपने होठों को चटकारा, फ्वाह क्या मीठा - मीठा सा स्वाद होगा!य् लेकिन एक छोटी - सी समस्या थी। घर में तो एक भी नारियल नहीं था। फ्ओहो! अब मुझे बाज़़्ेगा,य् उन्होंने अपनी पत्नी लाभुबेनाार जाना पडसे कहा। लाभुबेन अपने वंफध्े उचकाकर बोलीं, फ्खाना है तो जाना है।य् एक समस्या और थी। भीखूभाइर् ने कहा, फ्पैसे खचर् करने पड़ेंगे,य् लाभुबेन बोली, फ्हाँ। पैसे तो खचर् करने पड़ेंगे।य् अब तक तो तुम्हें पता लग गया होगा कि भीखूभाइर् ज़्ारा वंफजूस थे। वे करूँ ? मैं क्या करूँ ?य् े बरगद के नीचे जा कर बैठ गए और सोचने लगे, फ्क्या़सीध्े खेत में बूढ 114 मगर नारियल खाने के लिए जी ऐसा ललचाया कि वे जल्दी घर वापस लौटकर लाभुबेन से बोले, फ्अच्छा, मैं बाजार तक हो आता़हँू। पता तो चले कि नारियल आजकल कितने में बिक रहे हैं।य् जूते पहनकर, छड़ी उठाकर, भीखूभाइर् निकल पड़े। बाज़्ाार में लोग अपने - अपने कामों में लगे थे। भीखूभाइर् ने इध्र वुफछ देखा, उध्र वुफछ उठाया और दाम पूछा। देखते - पूछते, वे नारियलवाले के पास पहुँच गए। फ्ऐ नारियलवाले, नारियल कितने में दोगे?य् भीखूभाइर् ने पूछा। नारियलवाले ने कहा, फ्बस, दो रुपए में काका,य् फ्बस, दो रुपए!य् भीखूभाइर् ने आँखंे पैफलाकर कहा, फ्बहुत ज़्यादा है। एक रुपए में दे दो।य् नारियलवाले ने कहा, फ्ना जी ना। दो रुपए, सही दाम। ले लो या छोड़ दो,य् फ्ठीक है! ठीक है!य् भीखूभाइर् बड़बड़ाए। फ्अच्छा तो बताओ, एक रुपए में कहाँ मिलेगा?य् नारियलवाले ने कहा, फ्यहाँ से थोड़ी दूर जो मंडी है, वहाँ शायद मिल जाए।य् सो भीखूभाइर् उसी तरप़्ाफ चल पड़े। फ्चलो देख लेते हैं,य् वे अपने आप से बोले, फ्टहलने का एक मौका है और रुपए भर की बचत भी हो जाएगी।य् खुशी से घुरघुराते भीखूभाइर् ने छड़ी कोे ज़्ामीन पर थपथपाया। मंडी में कोलाहल पैफला हुआ था। व्यापारियों की उँफची - उँफची आवाजें़गूँज रही थीं। फ्बटाटा - आलू, बटाटा - आलू! कांदा - प्याज़्ा कांदा - प्याज़्ा! गाजर गाजर गाजर! कोबी - बंदगोभी कोबी - बंदगोभी!य् माथे का पसीना पोंछकर भीखूभाइर् ने इध्र - उध्र ताका। नारियलवाले को देखकर पूछा, फ्अरे भाइर्, एक नारियल कितने में दोगे?य् फ्सिप़्ार्फ एक रुपया, काका,य् नारियलवाले ने जवाब दिया, फ्जो चाहो ले जाओ। जल्दी।य् फ्शू छे भाइर्?य् भीखूभाइर् ने कहा, फ्यह क्या? मैं इतनी दूर से आया हँू और ़तुम पूरा एक रुपया माँग रहे हो। पचास पैसे कापफी हैं। मैं इस नारियल को लेता और तुम, यह लो, पकडनारियलवाले ने झट भीखूभाइर् के हाथ से नारियल को छीन लिया और बोला, फ्मापफ करो, काका। एक रुपया या पिफर वुफछ नहीं।य् लेकिन भीखूभाइर् ़का निराश चेहरा देखकर बोला, फ्बंदरगाह पर चले जाओ, हो सकता है वहाँ तुम्हें पचास पैसे में मिल जाए।य् ़ो, पचास पैसे।य् हँूशू छे - क्या है 116 भीखूभाइर् अपनी छड़ी से टेक लगाकर सोचने लगे, फ्आख्िार पचास पैसे तो पूरे पचास पैसे हैं। वैसे भी मेरी टाँगों में अभी भी दम है।य् पैरों को घसीटते हुए, भीखूभाइर् चलने लगे। हर दो कदम पर रुककर, जेब में से बड़ा सपेफद रुमाल निकालकर, वे अपना पसीना पोंछते। ़सागर के किनारे एक नाववाला बैठा था। उसके सामने दो - चार नारियल पड़थे। फ्अरे भाइर्, एक नारियल कितने में दोगे?य् भीखूभाइर् ने पूछा और कहा, ‘‘ये तो कापफी अच्छे दिखते हैं।’’ ़फ्काका, यह कोइर् पूछने वाली बात है? केवल पचास पैसेय् नाववाले ने कहा। फ्पचास पैसे!य् भीखूभाइर् मानो हैरानी से हक्के - बक्के हो गए। फ्इतनी दूर से पैदल आया हँू। इतना थक गया हँू और तुम कहते हो पचास पैसे? मेरी मेहनत बेकार हो गइर्। ना भाइर् ना! पचास पैसे बहुत श्यादा है। मैं तुम्हें पच्चीस पैसे दूँगा। यह लो, रख लो।’’ ऐसा कहते हुुककर नारियल उठाने ही ए, भीखूभाइर् झवाले थे..से देखा तो शरा ठंडेे दिमाग से बोला, फ्सस्ते में चाहिए? नारियल के बगीचे में चले जाओ। वहाँ ढेर सारे मिल जाएँगे, मनपसंे भीखूभाइर् ने पिफर अपने आप को समझाया, फ्इतनी दूर आया हँू। अब बगीचे ़तक जाने में हजर् ही क्या है?य् सच बात तो यह थी कि वे कापफी थक चुके थे। मगर पच्चीस पैसे बचाने के ख्याल से ही उनमें पुफतीर् आ गइर्। भीखूभाइर् ने सोचा, फ्दोगुना श्यादा चलना पड़ेगा, पर चार आने बच भी तो जाएँगे और पिफर, कोइर् भी चीज़्ा मु .फ्रत में कहाँ मिलती है?य् भीखूभाइर् नारियल के बगीचे में पहँच गए। वहाँ के माली को देखकर उससेुपूछा, फ्यह नारियल कितने में बेचोगे?य् माली ने जवाब दिया, फ्जो पसंद आए ले जाओ, काका, बस, पच्चीस पैसे का एक। देखो, कितने बड़े - बडे़ हैं!य् फ्हे भगवान! पच्चीस पैसे! पूरा रास्ता पैदल आने के बाद भी! जूते घ्िास गए, पैर थक गए और अब पैसे भी देने पड़ेंगे? मेरी बात मानो, एक नारियल मु.फ्रत में ही दे दो, हाँ। देखो, मैं कितना थक गया हँू !य् भीखूभाइर् की बात सुनकर माली ने कहा, फ्अरे, काका। मुफ्रत में चाहिए.न? यह रहा पेड़ और वह रहा नारियल। पेड़ पर चढ़ जाओ और जितने चाहो तोड़ लो। वहाँ नारियल की कोइर् कमी नहीं है। पैसे तो मेरी मेहनत के हैं।य् फ्सच? जितना चाहूँ ले लँू?य् भीखूभाइर् तो खुशी से पूफले न समाए। फ्मेरा यहाँ तक आना बेकार नहीं गया!य् उन्होंने जल्दी - जल्दी पेड़ पर चढ़ना शुरू कर दिया। पेड़़ुपर चढते - चढ़ते भीखूभाइर् ने सोचा ‘‘बहत अच्छे! मेरी तो किस्मत खुल गइर्। जितने नारियल चाहे तोड़ लँू और पैसे भी न दँू। क्या बात है!य् भीखूभाइर् उफपर पहुँच गए। पिफर वे टहनी और तने के बीच आराम से बैठ गए और दोनों हाथों को आगे बढ़ाने लगे सबसे बड़े नारियल को तोड़ने के लिए। श्श्श्क! पैर पिफसल गए। भीखूभाइर् ने एकदम से नारियल को पकड़ 119 लिया। उनके दोनों पैर हवा में झूलते रह गए। फ्ओ माँ! अब मैं क्या करूँ ?य् भीखूभाइर् चिल्लाने लगे, फ्अरे भाइर्! मदद करो!य् उन्होंने नीचे खडे़ माली से विनती की। माली ने कहा, फ्वो मेरा काम नहीं, काका, ़मैंने सिपर्फ नारियल लेने की बात की थी। बाकी सब तुम्हारे और तुम्हारे नारियल के बीच का मामला है। पैसे नहीं, खरीदना नहीं, बेचना नहीं, और मदद नहीं। सब वुफछ मु .फ्रत।य् तभी उँफट पर सवार एक आदमी वहाँ से गुज़्ारा। फ्अरे ओ!य् भीखूभाइर् ज़़्ाोर - जोर से बुलाने लगे, फ्ओ उँफटवाले! मेरे पैर वापस पेड़ पर टिका दो न! बड़ी मेहरबानी होगी।य् उँफटवाले ने सोचा, फ्चलो, मदद कर देता हँू। मेरा क्या जाता है।य् े होकर उसने भीखूभाइर् के पैरों को पकडउँफट की पीठ पर खड़़उसी समय उँफट को हरे - हरे पत्ते नशर आए। पत्ते खाने के लालच में उँफट ने गदर्नलिया। ठीकझुकाइर् और अपनी जगह से हट गया। बस, वह आदमी उँफट की पीठ से पिफसल गया! अपनी जान बचाने के लिए उसने भीखूभाइर् के पैरों को कसकर पकड़ लिया। अब दोनों क्या करते? इतने में एक घुड़सवार आया। फ्अरे, सांभ्लो छो!य् पेड़ से लटके दोनों पुकारने लगे। फ्सुनो भाइर्, कोइर् बचाओ! बचाओ! घुड़सवार को देखकर भीखूभाइर् ने दुहाइर् दी, फ्ओ मेरे भाइर्, मुझे पेड़ुपर वापस पहँचा दो।य् फ्हम्म्म। एक मिनट भी नहीं लगेगा। मैं घोड़े की पीठ पर चढ़कर इनकी मदद कर देता हूँय् यह सोचकर घुड़सवार घोड़े पर उठ खड़ा हुआ। लेकिन कौन कहता है कि घोड़ा उँफट से बेहतर है? हरी - हरी घास दिखाइर् देने पर तो दोनों एक जैसे ही हैं। घास के चक्कर में घोड़ा शरा आगे बढ़ा और छोड़ चला अपने मालिक को उँफटवाले के पैरों से लटकते हुए। एक, दो और अब तीनों के तीनोंμझूलते रहे नारियल के पेड़ से। फ्काका! काका! कसके पकड़े य्, घुड़सवार ने पसीना - पसीना होते रहना, हाँहए कहा, फ्जब तक कोइर् बचाने वाला न आए, कहीं छोडु़ न देना। मैं आपको सौ रुपए दँूगा।य् फ्काका! काका!य् अब उँफटवाले की बारी थी। फ्मैं आपको दो सौ रुपए दँूगा, लेकिन नारियल को छोड़ना नहीं।य् फ्सौ और दो सौ! बाप रे बाप, तीन सौ रुपए!य् भीखूभाइर् का सिर चकरा गया। फ्इतना! इतना सारा पैसा!य् खुशी से उन्होंने अपनी दोनों बाहों को पैफलाया... और नारियल गया हाथ से छूट। ़ामीन पर गिरेμघुड़सवार,उँफटवालाऔर भीखूभाइर्। भीखूभाइर् ाम से तीनों ज्ध्ड़अपने आप को सँभाल ही रहे थे कि एक बहुत बड़ा नारियल उनके सिर पर आ पूफटा। बिल्वुफल मु .फ्रत। ममता पाण्ड्या अनुवाद - संध्या राव सांभ्ला - सँभालो 121 तुम्हारी समझ ;कद्ध हर बार भीखूभाइर् कम दाम देना चाहते थे। क्यों? ;खद्ध हर जगह नारियल के दाम में पफवर्फ क्यों था?़;गद्ध क्या भीखूभाइर् को नारियल सच में मु.फ्र त में ही मिला? क्यों? ;घद्ध वे खेत में बूढ ़ ेबरगद के नीचे बैठ गए। तुम्हारे विचार से कहानी में बरगद को बूढ ़ ा क्यों कहा गया होगा? भीखूभाइर् ऐसे थे कहानी को पढ़कर तुम भीखूभाइर् के बारे में कापफी वुफछ जान गए होगे।़भीखूभाइर् के बारे में वुफछ बातें बताओ। ;कद्ध उन्हें खाने - पीने का शौक था। ;खद्ध ;गद्ध .......................................................................................................;घद्ध .......................................................................................................;घद्ध क्या बढ़ा, क्या घटा कहानी जैसे - जैसे आगे बढ़ती है, वुफछ चीजें बढ़़ती हैं और वुफछ घटती हैं। बताओ इनका क्या हुआ, ये घटे या बढ़े? नारियल का दाम भीखूभाइर् का लालच रास्ते की लंबाइर् भीखूभाइर् की थकान कहो कहानी यदि इस कहानी में भीखूभाइर् को नारियल नहीं बल्िक आम खाने की इच्छा होती तो कहानी आगे वैफसे बढ़ती? बताओ। बात की बात कहानी में नारियल वाले और भीखूभाइर् की बातचीत पिफर से पढ़ो। अब इसे अपने घर की बोली में लिखो। शब्दों की बात नाना - नानी पतीली - पतीला उफपर दिए गए उदाहरणों की मदद से नीचे दी गइर् जगह में सही शब्द लिखो। ................. ................. काका दशीर् मालिन .................. टोकरी ................. ................. ................. मटका गद्दा मंडी फ्मंडी में कोलाहल पैफला हुआ था। व्यापारियों की उँफची - उँफची आवाज़्ों गँूज रही थीं।य् ;कद्ध मंडी में क्या - क्या बिक रहा होगा? ;खद्ध मं़डी में तरह - तरह की आवाजें सुनाइर् देती हंै। जैसे - ताज़्ाा टमाटर! बीस रुपया! बीस रुपया! बीस रुपया! मं़डी मंे और वैफसी आवाजें सुनाइर् देती हैं? ;गद्ध क्या तुम अपने आसपास की ऐसी जगह सोच सकते हो, जहाँ बहुत शोर होता है। उस जगह के बारे में लिखो। गुजरात की झलक ;कद्ध‘मफ्रत ु.ही मु .फ्रत’ गुजरात की लोककथा है। इस लोककथा के चित्रों में ऐसी कौन सी बातें हैं जिनसे तुम यह अंदाशा लगा सकते हो? ;खद्ध गुजरात में किसी का आदर करने के लिए नाम के साथ भाइर्, बेन ;बहनद्ध जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। तेलुगु में नाम के आगे ‘गारू’ और ¯हदी में ‘जी’ जोड़ा जाता है। तुम्हारी कक्षा में भी अलग - अलग भाषा बोलने वाले बच्चे होंगे! पता करो और लिखो कि वे अपनी भाषा में किसी को आदर देने के लिए किन - किन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। बजाओ खुद का बनाया बाजा पिछली कक्षाओं में तुमने पत्तों से पटाखा बनाया, ग्री¯टग काडर् बनाया, कागश से मुखौटे बनाकर नाटक खेला। आओ, इस बार हम बाजे बनाएँ और तरह - तरह की आवाशों का मशा लें। जलतरंगμपानी से भरे हए प्यालोंुपर लकडी की पतली डडी से ़ंचोट करने पर अलग - अलग तरह की आवाशें निकलती हैं जो सुनने में कापफी से भरे प्यालों पर लकड़चोट करो। सुनाइर् दी न मध्ुर - मध्ुर आवाशें। अब अंदाशा लगाओ कि इस बाजे का नाम जलतरंग क्यों पड़ा? ी की डंडी से नगाड़ाμ नगाड़ा तो खूब बड़ा होता है। पर हम एक छोटा - सा नगाड़ा बनाएँगे। इसके लिए नारियल का खोल, एक बड़ा गुब्बारा और धगा ले लो। अब नारियल के मुँह पर गुब्बारे खींचकर धगे से बाँध् दो। लो बन गया नगाड़ा। अब एक पतली लकड़ी के सिरे पर कपड़ा लपेटकर छोटी - सी घंुडी ुुबनाओ। इस लकड़ी से बँध्े हए गुब्बारे पर चोट करो। क्या हआ? नारियल की जगह टीन का डिब्बा, मिट्टी का वुफल्हड भी ले सकते हो। इसी ़ðतरह गुब्बारे की जगह पन्नी का इस्तेमाल कर सकते हो। चीशों के बदलाव से आवाश भी अलग - अलग तरह की निकलेगी। धगे का बाजाμ धगे से बाजा बनाने के लिए तुम पहले पतले धगे का एक टुकड़ा लो। इसके एक सिरे को अपने एक हाथ की उँगली में लपेटकर उसे अपने एक कान से सटाओ। पिफर धगे के दूसरे सिरे को दूसरे तुम्हारे ऐसा करने से अलग - अलग प्रकार की आवाशंे बाहर आएँकी लंबाइर् कम या श्यादा करके आवाशों में बदलाव ला सकते हो। आओ चलते - चलते आवाशों में बदलाव का एक और प्रयोग करें। वंफघी को पतले कागशों में लपेटकर मुँह के पास लाओ। अब उसमें वुफछ बोलो या गुनगुनाओ। देखो

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