दोस्त की पोशाक एक बार नसीरूद्दीन अपने बहुत पुराने दोस्त जमाल साहब से मिले। अपने पुराने दोस्त से मिलकर वे बड़े खुश हए। वुफछ देर गपशप करने के बादुउन्होंने कहा, फ्चलो दोस्त, मोहल्ले में घूम आएँ।य् जमाल साहब ने जाने से मना कर दिया और कहा, फ्अपनी इस मामूली सी पोशाक में मैं लोगों से नहीं मिल सकता।य् नसीरूद्दीन ने कहा, फ्बस इतनी सी बात!य् त उनके लिए अपनी एक भडऔर कहा, फ्इसे पहन लो। इसमें तुम खूब अच्छे लगोगे। सब देखते रह जाएँगे।य् बनठन कर दोनों घूमने निकले। दोस्त को लेकर नसीरूद्दीन पड़ोसी के घर गए। नसीरूद्दीन ने पड़ोसी से कहा, फ्ये हैं मेरे खास दोस्त, जमाल साहब। आज कइर् सालों बाद इनसे मुलाकात हुइर् है। वैसे जो अचकन इन्होंने पहन रखी है, वह मेरी है।य् यह सुनकर जमाल साहब पर तो मानो घड़ों पानी पड़ गया। बाहर निकलते ही मुँह बनाकर उन्होंने नसीरूद्दीन से कहा, फ्तुम्हारी वैफसी अकल है! क्या यह बताना शरूरी था कि यह अचकन तुम्हारी है? तुम्हारा पड़ोसी सोच रहा होगा कि मेरे पास अपने कपड़े हैं ही नहीं।य् नसीरूद्दीन तुरं़कीली अचकन निकाल कर लाए नसीरूद्दीन ने माप़्ाफी माँगते हुए कहा, फ्गलती हो गइर्। अब ऐसा नहीं कहूँगा।य् अब नसीरूद्दीन उन्हें हुसैन साहब से मिलवाने ले गए। हुसैन साहब ने गमर्जोशी से उनका स्वागत सत्कार किया। जब जमाल साहब के बारे में पूछा तो नसीरूद्दीन ने कहा, फ्जमाल साहब मेरे पुराने दोस्त हैं और इन्होंने जो अचकन पहनी है वह इनकी अपनी ही है।य् जमाल साहब पिफर नाराज़्ा हो गए। बाहर आकर बोले, फ्झूठ बोलने को किसने कहा था तुमसे?य् फ्क्यों?य् नसीरूद्दीन ने कहा, फ्तुमने जैसा चाहा, मैंने वैसा ही तो कहा।य् फ्पोशाक की बात कहे बिना काम नहीं चलता क्या? उसके बारे में न कहना ही अच्छा हैय्, जमाल साहब ने समझाया। जमाल साहब को लेकर नसीरूद्दीन आगे बढ़े। तभी एक अन्य पड़ोसी मिल गए। नसीरूद्दीन ने जमाल साहब का परिचय उनसे करवाया, फ्मैं आपका परिचय अपने पुराने दोस्त से करवा दूँ। यह हैं जमाल साहब और इन्होंने जो अचकन पहनी है उसके बारे में मैं चुप ही रहूँ तो अच्छा है।य् ;खद्ध जमाल साहब अपने मामूली से कपड़ों में घूमने क्यों नहीं जाना चाहते होंगे? ;गद्ध नसीरूद्दीन अपनी अचकन के बारे में हमेशा क्यों बताते होंगे? गपशप जब जमाल साहब और नसीरूद्दीन हुसैन साहब के घर से बाहर निकले तो उन्होंने अपनी बेगम को नसीरूद्दीन और जमाल साहब से मुलाकात का किस्सा सुनाया। उन दोनों के बीच में क्या बातचीत हुइर् होगी? लिखकर बताओ। बेगम - कौन आया था? हुसैन साहबμनसीरूद्दीन अपने दोस्त के साथ आया था। बेगम μ घूमना - पिफरना नसीरूद्दीन ने कहा, फ्चलो दोस्त, मोहल्ले में घूम आएँ।य् जब नसीरूद्दीन अपने दोस्त से मिले, वे उसे अपना मोहल्ला दिखाने ले गए। जब तुम अपने दोस्तों से मिलते हो, तब क्या - क्या करते हो? करके दिखाओ नीचे वुफछ वाक्य लिखे हैं। तुम्हें इनका अभ्िानय करना है। तुम चाहो तो कहानी में देख सकते हो कि इन कामों का ज्ि़ाव्रफ कहाँ आया है। ● बनठन कर घूमने के लिए निकलना। ● घड़ों पानी पड़ना। ● मुँह बनाकर श्िाकायत करना। ● गमर्जोशी से स्वागत करना। ● नाराज़्ा होना। ● देखते ही रह जाना। पास - पड़ोस पड़ोस के घर में जाकर नसीरूद्दीन पड़ोसी से मिले। तुम अपने पड़ोसी बच्चों के साथ बहुत - से खेल खेलते हो। पर क्या तुम उनके परिवार के बारे में जानते हो? चलो, दोस्तों के बारे में और जानकारी इकऋी करते हैं। यदि तुम चाहो तो उनसे ये बातें पूछ सकते होμ ● घर में वुफल कितने लोग हैं? ● उनके नाम क्या हैं? ● उनकी आयु क्या है? ● वे क्या काम करते हैं? इस सूची में तुम अपने मन से बहुत - से सवाल जोड़ सकते हो। शब्दों का हेरपेफर इन शब्दों को बोलकर देखो। ये मिलती - जुलती आवाज़्ा वाले शब्द हैं। ज़्ारा से अंतर से भी शब्द का अथर् बदल जाता है। नीचे इसी तरह के वुफछ शब्दों के जोडे़ दिए गए हैं। इन सबके अथर् अलग - अलग हैं। इन शब्दों का वाक्यों में प्रयोग करो। नसीरूद्दीन का निशाना ़एक दिन नसीरूद्दीन अपने दोस्तों के साथ बैठे बतिया रहे थे। बात ही बात में उन्होेंने गप्प मारना शुरू कर दिया, फ्तीरंदाजी में मेरा मुकाबला कोइर् नहीं कर सकता। मैं ध्नुष कसता हूँ, निशाना साध्ता हँू और तीर छोड़ता हूँ, शूँ... उँफ... उँफ। तीर सीध्े निशाने पर लगता है।य् दोस्तों को विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने नसीरूद्दीन की परीक्षा लेने का पैफसला किया। एक दोस्त भागा - भागा़गया और तीर - ध्नुष खरीदकर ले आया। नसीरूद्दीन को थमाते हुए उसने कहा, फ्ये लो तीर - ध्नुष और अब साधे अपना निशाना उस लक्ष्य पर। देखते हैं कि तुम सच बोल रहे हो या झूठ।य् नसीरूद्दीन पँफस गए। उन्होंने ध्नुष अपने हाथों में उठाया, डोर खींची, निशाना साध और छोड़ दिया तीर को। शूँ... उँफ... उँफ...। तीर निशाने पर नहीं लगा। बल्िक वह तो बीच में ही कहीं गिर गया। फ्हा! हा! हा! हा! हा!य् सभी दोस्त हँसने लगे। फ्क्या यही तुम्हारा बेहतरीन निशाना था?य् उन्होंने कहा। फ्नहीं, नहीं! हरगिज नहीं! यह तो काज़्निशाना था। मैं तो तुम्हें दिखा रहा था कि काजी वैफसे निशाना लगाता हैय्, इतना़कहते हए नसीरूद्दीन ने दुबारा ध्नुषुउठाया, डोर खींची, निशाना साध और तीर को छोड़ दिया। शूँ... उँफ... उँफ...। इस बार तीर पहले वाले तीर से तो थोेड़ा आगे गिरा पर निशाना पिफर भी चूक गया। दोस्तों ने कहा, फ्यह तो ज़्ारूर तुम्हारा ही निशाना था नसीरूद्दीन।य् फ्बिल्वुफल नहींय्, नसीरूद्दीन ने कहा, फ्यह मेरा नहीं, सेनापति का निशाना था।य् एक दोस्त ने ताना कसा, फ्सूची में अब अगला कौन है?य् इतना सुनते ही सबने जमकर ठहाका लगाया। नसीरूद्दीन खामोश रहा। उसने चुपचाप एक और तीर उठाया। नसीरूद्दीन ने एक बार पिफर तीर चलाया। शूँ... उँफ... उँफ... ! इस बार तीर ठीक निशाने पर लग गया। सभी आश्चयर् से नसीरूद्दीन

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