6. बहुत हुआ बादल भइया बहुत हुआ! कीचड़-कीचड़ पानी पानी याद सभी को आई नानी सारा घर । दिन रात चुआ जाएँ कहाँ कहाँ पर खेलें? घर में फंसे बोरियत झेलें ज्यों पिंजरे में मौन सुआ सूरज दादा धूप खिलाएँ ताल नदी सड़कों से जाएँ तुम भी भैया करो दुआ! सुआ-तोता 34 बरसात • बारिश कहने पर तुम्हारे मन में कौन-कौन से शब्द आते हैं? सोचो और लिखो। • जब बहुत बारिश होने लगती है तब तुम कहाँ खेलती हो? कौन-कौन से खेल खेलती हो? । • खूब तेज़ बारिश होगी तो तुम्हारे घर के आसपास कैसा दिखाई देगा? • बारिश में कितना पानी बरसता है? वह सब पानी कहाँ-कहाँ जाता होगा? • ये सब बारिश से बचने के लिए क्या करेंगे? बताओ। । । - लोग । । कबूतर केंचुआ - कुत्ता मछली मोर । 35 बहुत हुआ! बड़े लोग ऐसा कब कहते हैं- • बहुत हुआ, अब चुपचाप बैठो! जब हम । • बहुत हुआ, अब अंदर चलो! जब हम • बहुत हुआ, अब सो जाओ! जब हम • बहुत हुआ, अब टी.वी. बंद करो! जब हम कविता से कविता में ऐसा क्यों कहा गया होगा? • तेज़ बारिश होने पर सड़कें नदी बन जाती हैं। • सब ओर कीचड़ होने पर नानी याद आती है। 36 अब नहीं बरसँगा! एक दिन बादल ने सोचा, मैं अब कभी नहीं बरसँगा। जब मैं बरसता हूँ, तब भी लोग मेरी बुराई करते हैं। जब नहीं बरसता हैं, तब भी मेरी बुराई करते हैं। आज से बरसना बिल्कुल बंद। फिर क्या हुआ होगा? कहानी को आगे बढ़ाओ। एक चित्र कई काम कविता के साथ जो चित्र दिया गया है, उसमें कौन क्या कर रहा है? एक बच्चा •••••••••••चित्र बना•••••••••• रहा है। दूसरा बच्चा दूसरा बच्चा •••••••••••••••••••••••••••••••••••• रहा है। ••••••••• ••••• = बिल्ली 석 c आदमी ••••••••••••••••• ...." he एक बच्ची । mc कुत्ता। ••••• रहा है। तुमने देखा कि चित्र में कई काम हो रहे हैं। इन वाक्यों में जो शब्द किसी काम के बारे में बता रहे हैं उनके नीचे रेखा खींचो।। इन्हें काम वाले शब्द कहते हैं। 37 काले मेघा पानी दे काले मेघा पानी दे। पानी दे गुड़धानी दे।। बरसो खूब झमाझम-झम नाचे मोर छम-छम-छम। खेतों से खलिहानों तक पर्वत से मैदानों तक। धरती को रंग धानी दे काले मेघा पानी दे। भर दे सारे ताल-तलैया गाएँ सब मिल छम्मक-छैया। हमको नई कहानी दे सबको दाना-पानी दे। पानी दे जिंदगानी दे। काले मेघा पानी दे।। 38 सावन का गीत सावन का झूला इस बार इतना बड़ा डालना जिसमें समा जाए संसार। उस डाली पर जो फैली है। आसमान के पार उस रस्सी का कोई न जिसका पारावार। एक पेंग में मंगल ग्रह के द्वार । और दूसरी में। इकदम से अंतरिक्ष के पार।। 39

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