व्यष्िट अथर्शास्त्रा के मूलभूत अध्ययन से आप अवश्य ही पूवर् परिचित होंगे। इस अध्याय के आरंभ में आपको व्यष्िट अथर्शास्त्रा और समष्िट अथर्शास्त्रा के बीच अंतर का एक सरलीवृफत विवरण प्रस्तुत किया गया, जिससे आप परिचित होंगे। आप में से जो आगे चलकर उच्चतर अध्ययन में अथर्शास्त्रा में विश्िाष्टता प्राप्त करने का चुनाव करेंगे, वे आज समष्िट अथर्शास्त्रा के अध्ययन में अथर्शास्ित्रायों द्वारा उपयोग किए गए अध्िक जटिल विश्लेषणों से अवगत होंगे। ¯कतु समष्िट अथर्शास्त्रा के अध्ययन के मूल प्रश्न वही रहेंगे। आप पाएँगे कि ये वास्तव में व्यापक आथ्िार्क प्रश्न हैं, जिनका संबंध् सभी नागरिकों से हैः क्या संपूणर् रूप से कीमतें बढ़ेंगी या घटेंगी? क्या संपूणर् देश में अथवा अथर्व्यवस्था के वुफछ क्षेत्राकों में रोशगार की दशा बेहतर है अथवा बुरी हालत में? अथर्व्यवस्था अच्छी है अथवा बुरी, इसे प्रदश्िार्त करने का संकेतक क्या होगा? राज्य कौन - सा कदम उठाएँगे अथवा लोगों की माँग करेंगे जिससे अथर्व्यवस्था की दशा में सुधार हो? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हमें देश की पूणर् रूप से सुदृढ अथर्व्यवस्था के संबंध् में विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। समष्िट अथर्शास्त्रा में इन प्रश्नों पर जटिलताओं के विभ्िान्न स्तरों पर विचार किया जाता है। इस पुस्तक में आपका परिचय समष्िट अथर्शास्त्राीय विश्लेषण के वुफछ मूल सि(ांतों से होगा। जहाँ तक संभव होगा सि(ांतों का सरल भाषा में वणर्न किया जाएगा। कभी - कभी पाठकों को वुफछ कठिनाइयों से परिचय करवाने के लिए प्रारंभ्िाक बीजगण्िात का प्रयोग किया जाएगा। यदि हम किसी देश की अथर्व्यवस्था को संपूणर् रूप से देखें तो हम पाएँगे कि अथर्व्यवस्था में सभी वस्तुओं और सेवाओं के निगर्त के स्तरों में एक साथसंचलन की प्रवृिा होती है। उदाहरण के लिए, यदि खाद्यान्न के निगर्त में वृि होती है तो आमतौर पर औद्योगिक वस्तुओं का निगर्त स्तर भी बढ़ता है। औद्योगिक वस्तुओं में भी विभ्िान्न प्रकार की वस्तुओं के निगर्त में एक साथ वृिया ”ास की प्रवृिा होती है। इस प्रकार से, विभ्िान्न वस्तुओं और सेवाओं कीकीमत में साधरण तथा एक साथ बढ़ने या घटने की प्रवृिा होती है। हम भ्िान्न - भ्िान्न उत्पादन इकाइयों में रोशगार के स्तर को भी एक साथ घटते या बढ़ते हुए देख सकते हैं। यदि किसी अथर्व्यवस्था के विभ्िान्न उत्पादन इकाइयों में समस्त निगर्त का स्तर, कीमत स्तर या रोशगार का स्तर एक - दूसरे से निकट संबंध्ित हों, तो संपूणर् अथर्व्यवस्था का विश्लेषण कायर् अपेक्षावृफत आसान हो जाता है। उपयर्ुक्त परिवतो± के संबंध् में व्यक्ितगत ;असमग्रद्ध स्तर पर विचार करने के बजाय हम अथर्व्यवस्था के अंतगर्त उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं के एक प्रतिनिध्ि के रूप में एक वस्तु के बारे में विचार कर सकते हैं। इस प्रतिनिध्ि वस्तु का उत्पादन स्तर सभी वस्तुओं और सेवाओं के औसत उत्पादन स्तर के अनुवूफल होगा। इसी तरह, इस प्रतिनिध्ि वस्तु का कीमत स्तर अथवा रोशगार स्तर अथर्व्यवस्था के सामान्य कीमत और रोशगार स्तर को प्रतिबिंबित करेगा। समष्िट अथर्शास्त्रा में हमने सामान्यतः इस विश्लेषण को सरलीवृफत किया है कि एकल काल्पनिक वस्तु पर ध्यान वेंफदि्रत करने पर वैफसे देश का वुफल उत्पादन तथा रोशगार के स्तर का संबंध् उन विशेषताओं ;जिन्हें परिवतीर् कहते हैंद्ध जैसे - कीमत, ब्याज दर, मशदूरी दर, लाभ, इत्यादि से है तथा इससे क्या होता है। हम इसे सरलीवृफत करने में सक्षम हैं और इस तरह उपयोगी तरीके से अध्ययन के द्वारा उसका सार प्राप्त करते हैं कि उन अध्िसंख्य वास्तविक वस्तुओं के साथ क्या होता है, जो बाशार में खरीदी और बेची जाती हैं। क्योंकि सामान्यतः हम देखते हैं कि जो कीमत, ब्याज, मशदूरी तथा लाभ, इत्यादि के साथ होता है, कमोेबश वही दूसरी वस्तुओं के साथ भी होता है। खासतौर से जब इन गुणों में तेजी से बदलाव आना शुरू हो जाता है, उसी तरह जैसे कि कीमतें बढ़ती हैं। ;जिसे मुद्रास्पफीति कहा जाता हैद्ध या रोशगार तथा उत्पादन स्तर गिरते जाते हैं ;जिसे मंदी कहा जाता हैद्ध, इन परिवतो± के संचालन की सामान्य दिशा, सभी व्यक्ितगत वस्तुओं के लिए सामान्यतः उसी प्रकार होती है, जैसे वुफल मिलाकर अथर्व्यवस्था के लिए समस्त रूप से दिखलाइर् पड़ती है। हम नीचे देखेंगे कि कभी - कभी हम इस उपयोगी सरलीकरण से विचलन की ओर भी जायेंगे, जब हम यह अनुभव करेंगे कि देश की अथर्व्यवस्था पूणर् रूप से विभ्िान्न क्षेत्राकों से मिलकर बनती प्रतीत होती है। वुफछ निश्िचत उद्देश्यों के लिए अथर्व्यवस्था के दो क्षेत्राकों ;उदाहरण के लिए, वृफष्िा या उद्योगद्ध की अंत£नभर्रता ;यह यहाँ तक कि कीमतों के बीच प्रतिद्वंद्विताद्ध या क्षेत्राकों के बीच संबंध् ;जैसाकि एक प्रजातांत्रिाक व्यवस्था में पारिवारिक क्षेत्राक, व्यापारिक क्षेत्राक और सरकारद्ध एक अथर्व्यवस्था को पूणर् रूप से देखने की अपेक्षा उसे देश के अथर्व्यवस्था की वुफछ चीशों को और अच्छी तरह से समझने में सहायता मिलती है। विभ्िान्न वस्तुओं को छोड़कर प्रतिनिध्ि वस्तु पर ध्यान वेंफदि्रत करना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इस प्रिया में किसी वस्तु विशेष के विश्िाष्ट गुणों की उपेक्षा हो सकती है। उदाहरणाथर् - वृफष्िा और औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन की दशाएँ बिल्वुफल भ्िान्न प्रवृफति की होती हैं अथवा यदि सभी प्रकार के श्रमिकों के लिए एक श्रमिक प्रतिनिध्ि कोटि को लें, तो हम किसी पफमर् के प्रबंध्क और लेखाकार के श्रम के बीच भेद नहीं कर पाएँगे। अतः कइर् मामलों में वस्तु ;श्रम अथवा उत्पादन तकनीकद्ध की एकल प्रतिनिध्ि कोटि के स्थान पर हम विभ्िान्न प्रकार की वस्तुएँ ले सकते हैं। उदाहरण के लिए अथर्व्यवस्था के अंतगर्त उत्पादित सभी प्रकार की वस्तुओं के लिए, प्रतिनिध्ि के रूप में तीन सामान्य प्रकार की वस्तुएँ ली जा सकती हैंः वृफष्िा वस्तुएँ, औद्योगिक वस्तुएँ और सेवाएँ। इन वस्तुओं की उत्पादन तकनीक और कीमत में अंतर हो सकता है। समष्िट अथर्शास्त्रा में यह भी विश्लेषण करने का प्रयास किया जाता है कि विभ्िान्न वस्तुओं का व्यक्ितगत निगर्त स्तर, कीमतें, रोशगार का स्तर आदि का निधर्रण वैफसे किया जाता है। यहाँ की गइर् इस चचार् और व्यष्िट अथर्शास्त्रा के अपने पूवर् अध्ययन से शायद आपको यह समझ में आ गया होगा कि समष्िट अथर्शास्त्रा, व्यष्िट अथर्शास्त्रा से किस प्रकार भ्िान्न है। संक्ष्िाप्त सार के रूप में देखें तो व्यष्िट अथर्शास्त्रा में आपको फ्वैयक्ितक आथ्िार्क एजेंटय् ;बाॅक्स देख्िाएद्ध और प्रेरणाओं, जिनसे वे चालित होते हैं, की प्रकृति का उल्लेख मिलता है। ये फ्व्यष्िटय् ;जिसका अथर् फ्छोटाय् हैद्ध एजेंट हैं अथार्त् उपभोक्ता जो अपनी रुचि और आय के अनुरूप क्रय करने के लिए वस्तुओं के इष्टतम संयोग का चयन करते हैंऋ उत्पादक जो अपने उत्पादित वस्तुओं से अिाकतम लाभ अजिर्त करने के लिए अपनी लागत को कम से कम रखता है और वस्तुओं कोबाशार में ऊँची से ऊँची कीमत पर बेचता है। दूसरे शब्दों में, व्यष्िट अथर्शास्त्रा माँग और पूतिर् के व्यक्ितगत बाशारों का अध्ययन है जिसमें फ्आथ्िार्क भूमिका निभाने वालाय् अथवा निणर्यकतार् भी व्यक्ित होते हैं ;व्रेफता या विव्रेफता वंफपनियाँ भीद्ध, जो अपने लाभों को अध्िकतम करने का प्रयास करते हैं ;उत्पादक अथवा विव्रेफताद्ध और उनके व्यक्ितगत संतुष्िट अथवा कल्याण स्तर ;उपभोक्ता के रूप मेंद्ध पर बड़ी वंफपनी भी इस अथर् में फ्व्यष्िटय् ही है कि उसे अपने शेयर धरकों के हितों में कायर् करना पड़ता है जो कि संपूणर् देश के हित के लिए नहीं होता है। व्यष्िट अथर्शास्त्रा के लिए फ्मैक्रोय् का तात्पयर् फ्बड़ाय् संपूणर् देश को प्रभावित करता है जैसे स्पफीति अथवा बेरोशगारी का उल्लेख नहीं हैं या पिफर मान लिया गया है। ये ऐसे परिवतर् नहीं हैं कि वैयक्ितक व्रेफता अथवा विव्रेफता बदल सकते हैं। व्यष्िट अथर्शास्त्रा, समष्िट अथर्शास्त्रा के निकट तब आया, जब उसे सामान्य संतुलन यानी माँग तथा पूतिर् का संतुलन अथर्शास्त्रा के प्रत्येक बाशार में दिखलाइर् पड़ा। समष्िट अथर्शास्त्रा में संपूणर् अथर्व्यवस्था की स्िथतियों को संबोध्ित करने का प्रयास किया जाता है। आध्ुनिक अथर्शास्त्रा के जनक एडम स्िमथ ने भी यह सलाह दी है कि यदि प्रत्येक बाशार में व्रेफता और विव्रेफता अपने निजी हित को ध्यान में रखकर ही निणर्य लेंगे तो अथर्शास्ित्रायों को संपूणर् देश के धन और कल्याण के बारे में अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं होगी। ¯कतु, अथर्शास्ित्रायों ने कालक्रम में यह अन्वेषण किया कि उन्हें आगे देखना होगा। अथर्शास्ित्रायों ने पाया कि प्रथम, वुफछ मामलों में बाशार विद्यमान नहीं रहता है, द्वितीय वुफछ अन्य मामलों में बाशार विद्यमान रहता है किंतु संतुलन माँग और पूतिर् का उत्पादन करने में असमथर्रहता है। तृतीय जो सबसे महत्त्वपूणर् है, अध्िकांश स्िथतियों में समाज ;अथवा राज्य अथवा समस्तजनता कोद्ध वुफछ महत्त्वपूणर् सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ित के लिए निःस्वाथर् रूप से ;रोशगार, प्रशासन, प्रतिरक्षा, स्वास्थ्य और श्िाक्षा के क्षेत्रा मेंद्ध कायर् करने का निणर्य लेना पड़ता है जिनके लिए वैयक्ितक आथ्िार्क एजेंटों के द्वारा लिए गए व्यष्िट अथर्शास्त्राीय निणर्यों के वुफछ समस्त प्रभावों में परिवतर्न करना पड़ता है। इन उद्देश्यों के लिए समष्िट अथर्शास्त्रा के विद्वानों को करारोपन और अन्य बजट नीतियों और मुद्रा पूतिर् में बदलाव लाने वाली नीतियों, ब्याज दर, मशदूरी, रोशगार और निगर्त का बाशार में पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना पड़ता है। अतः समष्िट अथर्शास्त्रा का मूल व्यष्िट अथर्शास्त्रा में होता है। क्योंकि इसमें बाशार में माँग और पूतिर् की शक्ितयों के समस्त प्रभावों का अध्ययन करना पड़ता है। यदि आवश्यक हुआ तो इन शक्ितयों के परिवतर्न के लिए लक्ष्िात नीतियों का भी प्रयोग करना पड़ता है। यह बाशार के बाहर समाज की रुचि का अनुकरण करने के लिए होता है। भारत जैसे विकासशील देश में इस प्रकार के चुनाव बेरोशगारी को दूर अथवा कम करने के लिए, सभी नागरिकों के लिए श्िाक्षा और प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध् कराने, सुशासन प्रदान करने, देश को समुचित प्रतिरक्षा आदि प्रदान करने के लिए इस प्रकार का चयन करना पड़ता है। समष्िट अथर्शास्त्रा की दो सामान्य विशेषताएँ हैं, जो उपयुर्क्त सूची की स्िथतियों में प्रयोग करना स्पष्ट है। संक्षेप में, इनका उल्लेख नीचे किया गया है। प्रथम, समष्िट अथर्शास्त्रा में निणर्यकतार् अथवा ;फ्आथ्िार्क भूमिका अदा करने वालेय्द्ध कौन होते हैं? समष्िट अथर्शास्त्राीय नीतियों का अनुपालन राज्य स्वयं अथवा वैधानिक निकाय जैसे भारतीय रिशवर् बैंक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोडर् और इसी प्रकार की संस्था करते हैं। वििा अथवा भारत के संविधन में जैसाकि परिभाष्िात की गइर् है कि ऐसे प्रत्येक निकाय को एक अथवा अिाक सावर्जनिक लक्ष्य का अनुपालन करना होगा। ये लक्ष्य उन वैयक्ितक, आथ्िार्क एजेंटों के लक्ष्य नहीं हैं जो निजी लाभ अथवा कल्याण को अध्िकतम करना चाहते हैं। अतः समष्िट अथर्शास्त्रा के एजेंट मूल रूप से वैयक्ितक निणर्यकतार्ओं से अलग होते हैं। द्वितीयऋ समष्िट अथर्शास्त्रा के निणर्यकतार् क्या करने का प्रयास करते हैं? स्पष्टतः उनकोआथ्िार्क उद्देश्यों के बाहर जाना पड़ता है और जिन सावर्जनिक आवश्यकताओं की चचार् हमने ऊपर की है, उनके लिए आथ्िार्क संसाध्नों का परिनियोजन करने का निणर्य लेना पड़ता है। इस प्रकार के ियाकलाप का लक्ष्य व्यक्ित के निजी हित के लिए नहीं होता है। इनका अनुपालन संपूणर् देश और उसकी जनता के कल्याण के लिए किया जाता है। समष्िट अथर्शास्त्रा का एक अलग शाखा के रूप में उद्भव बि्रटिश अथर्शास्त्राी जाॅन मेनाडर् कीन्स की प्रस्िा( पुस्तक द जनरल थ्योरी आॅपफ इम्प्लाॅयमेन्ट, इन्टरेस्ट एंड मनी के 1936 इर्में प्रकाश्िात होने के बाद हुआ। कीन्स से पहले अथर्शास्त्रा में इस चिंतन का प्राबल्य था कि सारे श्रमिक जो काम करने के इच्छुक हैं, उन्हें काम मिलेगा और सारे कारखाने अपनी पूणर् क्षमता के साथ कायर् करते रहेंगे। विचारों के इस संप्रदाय को क्लासिकी परंपरा के रूप में जाना जाता है। ¯कतु, 1929 की महामंदी और उसके बाद के वषो± में देखा गया कि यूरोप और उत्तरी अमरीका के देशों में निगर्त और रोशगार के स्तरों में भारी गिरावट आयी। इसका प्रभाव दुनिया के अन्य देशों पर भी पड़ा। बाशार में वस्तुओं की माँग कम थी और कइर् कारखाने बेकार पड़े थे, श्रमिकों को काम से निकाल दिया गया था। संयुक्त राज्य अमरीका में 1929 से 1933 तक बेरोशगारी की दर 3 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत ;बेरोशगारी की दर की परिभाषा इस प्रकार की जा सकती है कि लोगों की संख्या जो काम करने के इच्छुक हैं ¯कतु काम नहीं करते हैं, में लोगों की वुफल संख्या जो काम करने के इच्छुक हैं और काम करते हैं, से भाग देकर जो भागपफल प्राप्त होता है, उस रूप में प्राप्त की जाती हैद्ध। उस अवध्ि के दौरान संयुक्त राज्य अमरीका में समस्त निगर्त में लगभग 33 प्रतिशत की गिरावट आयी। इन घटनाओं ने अथर्शास्ित्रायों को नये तरीके से अथर्व्यवस्था के प्रकायर् के संबंध् में सोचने को प्रेरित किया। यह सच है कि जिस अथर्व्यवस्था में बेरोशगारी लंबी अवध्ि तक विद्यमान होगी, वहाँ एक सि(ांत की प्रस्तुति और उसकी व्याख्या की आवश्यकता होगी। कीन्स की पुस्तक इस दिशा में एक प्रयास साबित हुइर्। अपने पूवर्वतिर्यों के विपरीत उनका दृष्िटकोण अथर्व्यवस्था की कायर्प्रणाली तथा विभ्िान्न क्षेत्रों की परस्पर - निभर्रता का परीक्षण करना था। समष्िट अथर्शास्त्रा जैसे विषय का उद्भव हुआ। हम जानते हैं कि अध्ययन के अंतगर्त इस विषय का एक विशेष ऐतिहासिक संदभर् है। हम इस पुस्तक में पूँजीवादी देश की अथर्व्यवस्था के कायर् का परीक्षण करेंगे। पूँजीवादी देश में उत्पादन ियाकलाप मुख्य रूप से पूँजीवादी उद्यमियों के द्वारा किये जाते हैं। किसी विश्िाष्ट पूँजीवादी उद्यम में एक या अनेक उद्यमी ;उद्यमी ऐसे लोग हैं जो बड़े निणर्यों के नियंत्राण का कायर् करते हैं तथा पफमर् या उद्यम के साथ जुड़े बड़े जोख्िाम का वहन करते हैंद्ध होते हैं। वे उद्यम को चलाने के लिए स्वयं पूँजी की पूतिर् करते हैं या वे पूँजी उधर लेते हैं। उत्पादन के संचालन के लिए उन्हें प्रावृफतिक संसाध्नों की भी आवश्यकता पड़ती है। इनमें वुफछ संसाध्नों का उपयोग उत्पादन की प्रिया में होता है ;जैसे - कच्चे मालद्ध तथा वुफछ तो स्थायी पूँजी के रूपमें रहता है ;जैसे - भूखंडद्ध। उत्पादन के संचालन के लिए उन्हें मानव श्रम के महत्त्वपूणर् अंश की आवश्यकता होती है, जिसे हम श्रम के रूप में सूचित करेंगे। इन तीन प्रकार के उत्पादन के कारकों, जैसेμपूँजी, भूमि, श्रम की सहायता से निगर्त का उत्पादन करने के बाद उद्यमी उत्पाद को बाशार में बेचते हैं। इससे प्राप्त मुद्रा को संप्राप्ित कहते हैं। इस संप्राप्ित का वुफछ अंश भूमि को उसके उपयोग के लिए अिाशेष के रूप में प्रदान किया जाता है, इसी प्रकार वुफछ अंश पूँजी की ब्याज के रूप में तथा वुफछ श्रम की मशदूरी के रूप में प्रदान किया जाता है। शेष संप्राप्ित को उद्यमी की आय कहते हैं जो लाभ कहलाता है। इस लाभ का उपयोग उत्पादक आगे नयी मशीन खरीदने अथवा नये कारखाने लगाने के लिए करते हैं ताकि उत्पादन का विस्तार हो। उत्पादन क्षमता में वृि लाने के लिए जो व्यय किया जाता है, उसे निवेश व्यय कहते हैं। संक्षेप में, पूँजीवादी अथर्व्यवस्था की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती हैμ वह अथर्व्यवस्था जिसमें अध्िकांश आथ्िार्क ियाकलापों के निम्नलिख्िात अभ्िालक्षण होंμ ;अद्ध उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है ;बद्ध बाशार में निगर्त को बेचने के लिए ही उत्पादन किया जाता है ;सद्ध श्रमिकों की सेवाओं का क्रय - विक्रय एक निश्िचत कीमत पर होता है, जिसे मशदूरी की दर कहते हैं ;श्रम का क्रय - विक्रय जिस दर पर किया जाता है, उसे श्रमिक की मशदूरी दर कहते हैद्ध। ंयदि हम उपरोक्त तीन मानदंडों को विश्व के देशों के संदभर् में लागू करें तो हम पायेंगे कि पूँजीवादी देश पिछले तीन से चार सौ वषर् के दौरान अस्ितत्व में आए। इसके अतिरिक्त वतर्मानमें भी उत्तरी अमरीका, यूरोप और एश्िाया के वुफछ ही देश पूँजीवादी देशों की श्रेणी में आएँगे। कइर् अल्पविकसित देशों में ;खास करके वृफष्िा मेंद्ध उत्पादन का कायर् किसान परिवारों के द्वारा किया जाता है। मशदूरी श्रम का प्रयोग कभी - कभार होता है और अध्िकतर श्रम कायर् परिवार के सदस्य स्वयं करते हैं। उत्पादन केवल बाशार के लिए नहीं होता है, उत्पादन का एक बड़ा अंश परिवारके द्वारा उपभोग में लाया जाता है। प्रायः किसानों के पूँजी स्टाॅक में कोइर् महत्त्वपूणर् वृि नहीं होती है। अिासंख्य आदिवासी समाज में भूमि का स्वामित्व नहीं होता है। भूमि का स्वामित्व समस्त जनजाती के पास हो सकता है। हमने इस पुस्तक में जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वह ऐसे समाजों पर लागू नहीं होता है। ¯कतु यह सच है कि अनेक विकासशील देशों में जो उत्पादन की इकाइयाँ मौजूद हैं, वह पूँजीवादी सि(ांतों के अनुरूप हैं। इस पुस्तक में उत्पादन इकाइयों को पफमर् कहागया है। किसी पफमर् के कारोबार के संचालन का दायित्व उद्यमियों के ऊपर होता है। उद्यमी ही बाशार से श्रमिकों को किराये पर लाकर अपने उत्पादन प्रक्रम में नियोजित करता है। इसी प्रकार वह भूमि एवं पूँजी का भी नियोजन करता है। इन आगतों के नियोजन के उपरांत उद्यमी उत्पादन प्रिया का संचालन करता है। उनका उद्देश्य वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन कर ;जिसे निगर्त कहा जाता हैद्ध बाशार में उनको बेचना और उससे लाभ प्राप्त करना होता है। इस प्रिया में उसे जोख्िाम एवं अनिश्िचतता का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, वह जिन वस्तुओं का उत्पादन करता है, वह उँफची कीमत पर नहीं बिक पाती हैं। इससे उद्यमी के लाभ में कमी होती है। ध्यातव्य है कि पूँजीवादी देशों में उत्पादन के कारक अपनी आय का सृजन उत्पादन की प्रिया एवं उससे प्राप्त निगर्त को बाशार में बेचकर करते हैं। विकसित एवं विकासशील दोनों प्रकार के देशों में निजी पूँजीवादी क्षेत्रा के अलावा राज्य में उसके अनुरूप एक संस्था होती है। राज्य की भूमिका कानून बनाने, उसे लागू करने और न्याय दिलाने में होती है। कइर् ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ राज्य उत्पादन का कायर् भी करता है - कर लगाने और सावर्जनिक आधरभूत संरचनाओं के निमार्ण पर व्यय करने के अतिरिक्त राज्य के द्वारा स्वूफल - काॅलेज भी चलाए जाते हैं तथा स्वास्थ्य सेवा भी प्रदान की जाती है। जब हम किसी देश की अथर्व्यवस्था का वणर्न करें, तो राज्य के इन आथ्िार्क प्रकायो± का उल्लेख करना आवश्यक है। राज्य को सूचित करने के लिए सुविध की दृष्िट से हम आगे सरकार शब्द का प्रयोग करेंगे। किसी अथर्व्यवस्था में पफमर् और सरकार के अतिरिक्त दूसरा जो बड़ा क्षेत्रा होता है, उसे पारिवारिक क्षेत्राक कहते हैं। यहाँ परिवार से हमारा तात्पयर् एकल व्यक्ितगत उपभोक्ता, जो अपने उपभोग से संबंध्ित निणर्य अथवा कइर् व्यक्ितयों के समूह जिसके उपभोग संबंध्ित निणर्य संयुक्त रूप से लिए जाते हैं, से है। परिवार भी बचत करते हैं और कर अदा करते हैं। उन्हें इन ियाकलापों के लिए पैसे वैफसे मिलते हैं? हम जानते हैं कि परिवार में कइर् लोग होते हैं। ये लोग पफमो± में श्रमिकों के रूप में काम करते हैं और मशदूरी प्राप्त करते हैं। वे सरकारी विभागों में काम करते हैं और वेतन प्राप्त करते हैं। अथवा वे पफमो± के स्वामी भी हो सकते हैं जो लाभ कमाते हैं। पफमो± के उत्पादों की जिस बाशार में बिक्री होती है, वह सचमुच परिवार की माँग के बिना कायर् कर ही नहीं सकता है। मूल संकल्पनाएँ सारांशअभ्यास अभी तक हमने देशीय अथर्व्यवस्था के प्रमुख घटकों का उल्लेख किया है। लेकिन विश्व केसारे देश बाह्य व्यापार भी करते हैं। बाह्य क्षेत्रा, हमारे अध्ययन का चैथा महत्त्वपूणर् क्षेत्रा है। बाह्य क्षेत्रा से व्यापार तीन प्रकार से हो सकता हैः 1.जब कोइर् देश अपनी घरेलू वस्तु विश्व के अन्य देशों में बेचते हैं, तो उसे नियार्त कहते हैं। 2.कोइर् देश जब विश्व के अन्य देशों से वस्तुएँ खरीदता है, तो उसे आयात कहते हैं। आयात और नियार्त के आलावा दूसरी तरह से भी विश्व के अन्य देश किसी देश की अथर्व्यवस्था को प्रभावित करते हैं। 3.किसी देश की अथर्व्यवस्था में विदेशी पूँजी का भी प्रवाह हो सकता है अथवा कोइर् देश विदेशों में भी पूँजी का नियार्त कर सकता है। समष्िट अथर्शास्त्रा में किसी अथर्व्यवस्था के समस्त आथ्िार्क परिवतो± पर विचार किया जाता है। इसमें उन विविध् अंतर - सहलग्नताओं की भी चचार् है जो अथर्व्यवस्था के विभ्िान्न क्षेत्राकों में विद्यमान रहती हैं। इन्हीं कारणों से यह व्यष्िट अथर्शास्त्रा से भ्िान्न होता हैऋ जिसमें किसी अथर्व्यवस्था के खास क्षेत्राक में कायर्प्रणाली का परीक्षण किया जाता है और अथर्व्यवस्था के अन्य क्षेत्राकों को एक समान मान लिया जाता है। समष्िट अथर्शास्त्रा का उद्भव एक पृथक विषय के रूप में 1930 में कीन्स के कारण हुआ। महामंदी से विकसित देशों को गहरा धक्का लगा और कीन्स को अपनी पुस्तक लिखने की प्रेरणा मिली। इस पुस्तक में हम प्रायः पूँजीवादी अथर्व्यवस्था की कायर्प्रणाली का ही अध्ययन करेंगे। अतः इसमें विकासशील देशों की कायर्प्रणाली को पूणर् रूप से शामिल करना संभव नहीं होगा। समष्िट अथर्शास्त्रा में अथर्व्यवस्था को परिवार, पफमर्, सरकार और बाह्य क्षेत्राक इन चार क्षेत्राकों के संयोग के रूप में देखा जाता है। ब्याज की दर मशदूरी दर लाभ आथ्िार्क एजेंट या इकाइयाँ महामंदी बेरोशगारी की दर उत्पादन के चार कारक उत्पादन के साध्न आगत भूमि श्रम उद्यमवृिा पूँजी निवेश व्यय मशदूरी श्रम पूँजीवादी देश अथवा पूँजीवादी अथर्व्यवस्था पफमर् पूँजीवादी पफमर् निगर्त परिवार सरकार बाह्य क्षेत्राक नियार्त आयात 1.व्यष्िट अथर्शास्त्रा और समष्िट अथर्शास्त्रा में क्या अंतर है? 2.पूँजीवादी अथर्व्यवस्था की महत्त्वपूणर् विशेषताएँ क्या हैं? 3.समष्िट अथर्शास्त्रा की दृष्िट से अथर्व्यवस्था के चार प्रमुख क्षेत्राकों का वणर्न करें। 4.1929 की महामंदी का वणर्न करें। सुझावात्मक पठन भादुड़ी, ए., 1990, मेक्रोइकोनाॅमिक्सः द डायनाॅमिक्स आॅपफ काॅमोडिटी प्रोडक्शन, पृष्ठ 1 - 27, मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, नयी दिल्ली। मनकीव, एन. जी., 2000, मेक्रोइकोनाॅमिक्स, पृष्ठ 2 - 14, मैकमिलन वथर् पब्िलशसर्, न्यूयावर्फ।

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