बहुत - से नेपाली मजदूर काम करने के लिए भारत आते हैं। क्या यह वैश्वीकरण है? एक हफ्ऱते के अख़बार पर नशर दौड़ाइए और वैश्वीकरण के विषय में जो वुफछ छपा हो उसकी कतरन एकत्रिात कीजिए। वैश्वीकरण की अवधरणा जनादर्न एक काॅल - सेंटर में काम करता है। वह देर दोपहर में काम के लिएनिकलता हैऋ दफ्रतर में घुसने के साथ ही वह जाॅन बन जाता हैऋ नया लहजा अख्ि़तयार कर लेता है और हजारों किलोमीटर दूर बसे अपने ग्राहकों से बात करने के लिए एक नयी भाषा बोलने लगता है। अपने घर में वह न तो यह भाषा और न ही इस लहजे में बोलता है। वह सारी रात काम करता है जो दरअसल उसके विदेशी ग्राहकों के लिए दिन का समय होता है। जनादर्न एक ऐसे आदमी को अपनी सेवा प्रदान कर रहा है जिससे बहुत संभव है, वह कभी आमने - सामने की मुलाकात न कर सके। यही उसकी दिनचयार् है। जनादर्न की छु‘ियाँ भी भारतीय वैफलेंडर से नहीं बल्िक अमरीका के वैफलेंडर से मेल खाती हैं जहाँ उसके ग्राहक रहते हैं। अपनी नौ वषीर्या बेटी को जन्मदिन का उपहार देने के लिए रामधरी बाशार गया है। उसने अपनी बेटी को एक छोटी - सी साइकिल उपहार में देने का वायदा किया है। रामधरी ने बाशार में जाकर ऐसी साइकिल ढूँढ़ने का प़्ौफसला किया जो उसे कीमत के लिहाज से जँच जाए और वुफछ उम्दा क्वालिटी की हो। उसने आख्िारकार एक साइकिल खरीदी जो बनी तो चीन मेें थी लेकिन बिक भारत में रही है। इस साइकिल की कीमत रामधरी की जेब वफो माप्िाफक पड़ी और ‘क्वालिटी’ भी उसे़जँच गइर्। रामधरी ने इसे खरीदने का प़्ौफसला किया। पिछले साल अपनी बेटी की जिद पर रामधरी ने उसे ‘बाबीर् डाॅल’ खरीदकर दिया था जो दरअसल संयुक्त राज्य अमरीका में बनी थी और भारत में बिक रही थी। सारिका अपने परिवार में पहली पीढ़ी की श्िाक्ष्िात है। कठिन मेहनत के बूते स्वूफल और काॅलेज में वह अव्वल साबित हुइर्। अब उसे नौकरी करने और एक स्वतंत्रा वॅफरिअर की शुरुआत करने का अवसर हाथ लगा है। ऐसे अवसर के बारे में उसके परिवार की महिलाएँ सोच भी नहीं सकती थीं। सारिका के रिश्तेदारों में से वुफछ इस नौकरी का विरोध् कर रहे हैं लेकिन सारिका ने आख्िारकार यह नौकरी करने का प़फसला किया क्योंकि उसकी ैपीढ़ी के नौजवानों के सामने नये अवसर मौजूद हैं। ये तीनों उदाहरण वैश्वीकरण का एक न एक पहलू दिखाते हैं। पहले उदाहरण में जनादर्न सेवाओं के वैश्वीकरण में हिस्सेदारी कर रहा है। रामधरी जन्मदिन के लिए जो उपहार खरीद रहा है उसमें हमें विश्व के एक भाग से दूसरे भाग में वस्तुओं की आवाजाही का पता चलता है। सारिका के सामने जीवन - मूल्यों के बीच दुविध की स्िथति है। यह दुविध अंशतः उन अवसरों के कारण पैदा हुइर् है जो उसके परिवार की महिलाओं को पहले उपलब्ध् नहीं थे लेकिन आज वे एक सच्चाइर् हैं और जिन्हें व्यापकस्वीकृति मिल रही है। यदि हम वास्तविक जीवन में ‘वैश्वीकरण’ शब्द के इस्तेमाल को परखें तो पता चलेगा कि इसका इस्तेमाल कइर् तरह के संदभोर्ं में होता है। नीचे वुफछ उदाहरण दिए जा रहे हैं।इन्हें देख्िाए, ये उदाहरण ऊपर के उदाहरणों से वुफछ अलग हैं μ पफसल के मारे जाने से वुफछ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने एक बहुराष्ट्रीय वंफपनी से बड़े महगे बीज खरीदे थे। यूरोप स्िथत एक बड़ी और अपनी प्रतियोगी वंफपनी को एक भारतीय वंफपनी ने खरीद लिया जबकि खरीदी गइर् वंफपनी के मालिक इस खरीददारी का विरोध् कर रहे थे। अनेक खुदरा दुकानदारों को भय है कि अगर वुफछ बड़ी अंतरार्ष्ट्रीय वंफपनियों ने देश में खुदरा दुकानों की अपनी श्रंृखला खोल ली तो उनकी रोजी - रोटी जाती रहेगी। मुम्बइर् के एक पिफल्म - निमार्ता पर आरोप लगे कि उसने हाॅलीवुड में बनी एक पिफल्म की कहानी उठाकर अपनी पिफल्म बना ली है। पश्िचमी परिधन पहनने वाली काॅलेज की छात्राओं को एक उग्रवादी संगठन ने अपने एक बयान में ध्मकी दी है। ये उदाहरण हमें बताते हैं कि वैश्वीकरण हर अथर् में सकारात्मक ही नहीं होताऋ लोगों पर इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं। दरअसल ऐसे लोगों की संख्या श्यादा है जो मानते हैं कि वैश्वीकरण के सकारात्मक प्रभाव कम और नकारात्मक प्रभाव श्यादा हैं। इन उदाहरणों से यह भी पता चलता है कि वैश्वीकरण सिपफर् आथ्िार्क मसलों से नहीं जुड़ा और शरूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा ध्नी मुल्कों से ग़्ारीब मुल्कों की ओर गतिशील हो। चूँकि ‘वैश्वीकरण’ शब्द का प्रयोग अध्िकांशतया सटीक अथोर्ं में नहीं होता इसीलिए यह स्पष्ट करना शरूरी है कि इसका सही - सही अथर् क्या है। एक अवधरणा के रूप में वैश्वीकरण की बुनियादी बात है μ प्रवाह। प्रवाह कइर् तरह के हो सकते हैं μ विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचनाऋ पूँजी का एक से श्यादा जगहों पर जानाऋ वस्तुओं का कइर् - कइर् देशों में पहुँचना और उनका व्यापार तथा बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के इस अध्याय में वैश्वीकरण से जुड़े विभ्िान्न पहलुओं को दशार्ती एक चित्रामाला दी गइर् है। ये चित्रा विश्वभर के अलग - अलग हिस्सों से लिए गए हैं। ये चित्रा वैश्वीकरण के विभ्िान्न रंग - रूप, कारण और अलग - अलग समाजों पर पड़ने वाले प्रभावों की एक झलक देते हैं। 1 और 2 ये चित्रा हमारे सामने विरोध् ाभासी स्िथति रखते हैं। इनमें भ्िान्न संस्कृतियों के लोगों का संपवर्फ दिखाया गया है। इंटरनेट के माध्यम से अप्रत्यक्ष संपवर्फ बहुत श्यादा कारगर हुआ है। 3 न्यूयावर्फ में संयुक्त राष्ट्रसंघ मुख्यालय के सामने प्रदशर्न 4 हांगकांग में चल रही विश्व व्यापार संगठन की बैठक के दौरान विरोध् प्रदशर्न। इन लोगों का मानना है कि वैश्वीकरण ने वुफछ देशों के प्रति भेदभाव और बढ़ाया है। भारत में बिकने वाली चीन की बनी बहुत - सी चीजें तस्करी की होती हैं। क्या वैश्वीकरण के चलते तस्करी होती है? क्या साम्राज्यवाद का ही नया नाम वैश्वीकरण नहीं है? हमें नये नाम की शरूरत क्यों है? एरेस, केगल्स काटर्ून डिजीटल अथर्व्यवस्था का महाचक्र विभ्िान्न हिस्सों में लोगों की आवाजाही। यहाँ सबसे शरूरी बात है ‘विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव’ जो ऐसे प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और कायम भी है। वैश्वीकरण एक बहुआयामी अवधरणाहै। इसके राजनीतिक, आथ्िार्क और सांस्कृतिक अवतार हैं और इनके बीच ठीक - ठीक भेद किया जाना चाहिए। यह मान लेना ग़्ालत है कि वैश्वीकरण केवल आथ्िार्क परिघटना है। ठीक इसी तरह यह मान लेना भी भूल होगीकि वैश्वीकरण एकदम सांस्कृतिक परिघटना है। वैश्वीकरण का प्रभाव बड़ा विषम रहा हैμ यह वुफछ समाजों को बाकियों की अपेक्षा और समाज के एक हिस्से को बाकी हिस्सों की अपेक्षा श्यादा प्रभावित कर रहा है। ऐसे में शरूरी हो जाता है कि विश्िाष्ट संदभोर्ं पर पयार्प्त ध्यान दिए बिना हम वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में सवर् - सामान्य निष्कषर् निकालने से परहेज करें। वैश्वीकरण के कारण क्या है वैश्वीकरण की वशह? अगर वैश्वीकरण विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की आवाजाही से जुड़ी परिघटना है तो शायद यह पूछना असंगत न होगा कि इस परिघटना में क्या वुफछ नयी बात है? अगर इन चार तरह के प्रवाहों की ही बात है तो पिफर वैश्वीकरण मानव - इतिहास के अध्िकांश समय जारी रहा है। बहरहाल, जो लोग तवर्फ देते हैं कि समकालीन वैश्वीकरण के साथ वुफछ ख़ास बात है वे ध्यान दिलाते हैं कि नयी बात है इन प्रवाहों की गति औेर इनवफ प्रसार का ध्रातल। ये दोनों बातें मौजूदा वैश्वीकरण को अनूठा बनाती हैं। वैश्वीकरण का एक मजबूत ऐतिहासिक आधर है इसलिए शरूरी है कि हम इन प्रवाहों को इतिहास के संदभर् में देखें। हालाँकि वैश्वीकरण के लिए कोइर् एक कारक जिम्मेवार नहीं पिफर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहायर् कारण साबित हुइर् है। इसमें कोइर् शक नहीं कि टेलीग्रापफ, टेलीपफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारांे ने विश्व के विभ्िान्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है। शुरू - शुरू में जब छपाइर् ;मुद्रणद्ध की तकनीक आयी थी तो उसने राष्ट्रवाद की आधरश्िाला रखी। इसी तरह आज हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि प्रौद्योगिकी का प्रभाव हमारे सोचने के तरीके पर पड़ेगा। हम अपने बारे में जिस ढंग से सोचते हैं और हम सामूहिक जीवन के बारे में जिस तशर् पर सोचते हैं μ प्रौद्योगिकी का उस पर असर पड़ेगा। विचार, पूँजी, वस्तु और लोगों की विश्व के विभ्िान्न भागों में आवाजाही की आसानी प्रौद्योगिकी में हुइर् तरक्की के कारण संभव हुइर् है। इन प्रवाहों की गति में अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए विश्व के विभ्िान्न भागों के बीच पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही की तुलना में श्यादा तेज और व्यापक होगी। बहरहाल, संचार - साध्नों की तरक्की और उनकी उपलब्ध्ता मात्रा से वैश्वीकरण अस्ितत्व में आया हो μ ऐसी बात नहीं। यहाँ शरूरी बात यह है कि विश्व के विभ्िान्न भागों के लोग अब समझ रहे हैं कि वे आपस में जुड़े हुए हैं। आज हम इस बात को लेकर सजग हैं कि विश्व के एक हिस्से में घटने वाली घटना का प्रभाव विश्व के दूसरे हिस्सेमें भी पड़ेगा। बडर् फ्रलूू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते। ये घटनाएँ राष्ट्रीय - सीमाओं का जोर नहीं मानतीं। ठीक इसी तरह जब बड़ी आथ्िार्क घटनाएँ होती हैं तो उनका प्रभाव उनके मौजूदा स्थान अथवा क्षेत्राीय परिवेश तक ही सीमित नहीं रहता, बल्िक विश्व भर में महसूस किया जाता है। राजनीतिक प्रभाव वैश्वीकरण की समकालीन प्रियाओं के प्रभाव के बारे में जारी बहसों में एक यह है कि इसका राजनीतिक असर क्या हो रहा है? राज्य की संप्रभुता की परंपरागत धरणा पर वैश्वीकरण का असर वैफसे होता है? इस सवाल का शवाब देते समय हमें कम से कम तीन पहलुओं का ध्यान रखना होगा। सबसे सीध - सरल विचार यह है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य की क्षमता यानी सरकारों को जो करना है उसे करने की ताकत में कमी आती है। पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की धरणा अब पुरानी पड़ गइर् है और इसकी जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले ली है। राज्य अब वुफछेक मुख्य कामों तक ही अपने को सीमित रखता है, जैसे कानून और व्यवस्था को बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना। इस तरह के राज्य ने अपने को पहले के कइर् ऐसे लोक - कल्याणकारी कामों से खींच लिया है जिनका लक्ष्य आथ्िार्क और सामाजिक - कल्याण होता था। लोक कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाशार आथ्िार्क और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निधर्रक है। पूरे विश्व में बहुराष्ट्रीय निगम अपने पैर पसार चुके हैं और उनकी भूमिका बढ़ी है। इससे सरकारों के अपने दम पर प़्ौफसला करने की क्षमता में कमी आती है। इसी के साथ एक बात और भी है। वैश्वीकरण से हमेशा राज्य की ताकत में कमी 5 वैश्वीकरण की प्रतीक बन चुकी वुफछ वस्तुएँ। 6 पहली दुनिया के देशों में आप्रवासी लोगों के काम करने की स्िथति की झलक देता एक चित्रा। 7 वैश्वीकरण के दौर में बेगानेपन की स्िथति की ओर इशारा करता एक चित्रा। जो व्यक्ित अपनी जैकेट से ‘शहर सापफ रखो’ का संदेश दे रहा है उसे शायद ही कल्पना हो कि इस जैकेट को बनाने वाले किस हालत में रहते हैं। 8 जमर्नी में संस्कृति कलाकारों को पारंपरिक वेशभूषा में ‘प्रस्तुत’ किया जा रहा है। आती हो - ऐसी बात नहीं। राजनीतिक समुदाय के आधर के रूप में राज्य की प्रधनता को कोइर् चुनौती नहीं मिली है और राज्य इस अथर् में आज भी प्रमुख है। विश्व की राजनीति में अब भी विभ्िान्न देशों के बीच मौजूद पुरानी इर्ष्यार् और प्रतिद्वंद्विता की दखल है। राज्य कानून और व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अपने अनिवायर् कायो± को पूरा कर रहे हैं और बहुत सोच - समझकर अपने कदम उन्हीं दायरों से खींच रहे हैं जहाँ उनकी मजीर् हो। राज्य अभीभी महत्त्वपूणर् बने हुए हैं। वस्तुतः वुफछ मायनों में वैश्वीकरण के पफलस्वरूप राज्य की ताकत में इजापफा हुआ है। अब राज्यों के हाथ में अत्याध्ुनिक प्रौद्योगिकी मौजूद है जिसके बूते राज्य अपने नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं। इस सूचना के दम पर राज्य श्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं। उनकी क्षमता बढ़ी हैऋ कम नहीं हुइर्। इस प्रकार नइर् प्रौद्योगिकी के परिणामस्वरूप राज्य अब पहले से श्यादा ताकतवर हैं। आथ्िार्क प्रभाव वैश्वीकरण के आथ्िार्क पहलू के बारे में सब वुफछ भले ही नहीं जाना जा सके लेकिन, यह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण को लेकर जारी बहसों का बड़ा हिस्सा और इस बहस की दिशा इसी पहलू से संबंध्ित है। इस समस्या का एक पक्ष तो यही है कि आथ्िार्क वैश्वीकरण को वैफसे परिभाष्िात किया जाए। जैसे ही आथ्िार्क वैश्वीकरण का उल्लेख होता है, हमारा ध्यान अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी अंतरार्ष्ट्रीय संस्थाओं तथा विश्व भर में आथ्िार्क नीतियों के निधर्रण में इनके द्वारा निभायी गइर् भूमिका पर जाता है। हालाँकि वैश्वीकरण को इतने संकीणर् नशरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। आथ्िार्क वैश्वीकरण में इन अंतरार्ष्ट्रीय संस्थाओं के अलावा भी कइर् ख्िालाड़ी शामिल हैं। आथ्िार्क वैश्वीकरण को अध्िक व्यापक नशर से समझने के लिए हमें इससे होने वाले आथ्िार्क पफायदों के बँटवारे के अथर् में सोचना चाहिए यानी इस संदभर् में कि किसे वैश्वीकरण से सबसे श्यादा पफायदा हुआ और किसे सबसे कम। यह भी देखने की शरूरत है कि वैश्वीकरण के कारण किसने नुकसान उठाया। अमूमन जिस प्रिया को आथ्िार्क वैश्वीकरण कहा जाता है उसमें दुनिया के विभ्िान्न देशों के बीच आथ्िार्क प्रवाह तेज हो जाता है। वुफछ आथ्िार्क प्रवाह स्वेच्छा से होते हैं जबकि वुफछ अंतरार्ष्ट्रीय संस्थाओं और ताकतवर देशों द्वारा जबरन लादे जाते हैं। जैसा कि हमने इस अध्याय की शुरुआत में देखा, ये प्रवाह कइर् किस्म के हो सकते हैं, जैसे वस्तुओं, पूंजी, जनता अथवा विचारों का प्रवाह। वैश्वीकरण के चलते पूरी दुनिया में वस्तुओं के व्यापार में इजापफा हुआ हैऋ कल अपना खाना जल्दी खत्म करो। चीन और भारत के भूखे लोग तुम्हारा खाना खा जाएंगे..आज अपना होमववर्फ जल्दी पूरा करो। चीन और भारत के लोग तुम्हारी नौकरी खा जाएँगें..मिल्ट प्राइगे, केगल्स काटर्ून वैश्वीकरण के खतरे? अलग - अलग देश अपने यहाँ होने वाले आयात पर प्रतिबंध् लगाते थे लेकिन अब ये प्रतिबंध् कम हो गए हैं। ठीक इसी तरह दुनिया भर में पूंजी की आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध् हैं। व्यावहारिक ध्रातल पर इसका अथर् यह हुआ कि ध्नी देश के निवेशकतार् अपना ध्न अपने देश की जगह कहीं और निवेश कर सकते हैं, खासकर विकासशील देशों में जहाँ उन्हें श्यादा मुनापफा होगा। वैश्वीकरण के चलते अब विचारों के सामने राष्ट्र की सीमाओं की बाध नहीं रही, उनका प्रवाह अबाध् हो उठा है। इंटरनेट और वंफप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका एक उदाहरण है। लेकिन वैश्वीकरण के कारण जिस सीमा तक वस्तुओं और पूंजी का प्रवाह बढ़ा है उस सीमा तक लोगों की आवाजाही नहीं बढ़ सकी है। विकसित देश अपनी वीजा - नीति के जरिए अपनी राष्ट्रीय सीमाओं को बड़ी सतवर्फता से अभेद्य बनाए रखते हैं ताकि दूसरे देशों के नागरिक विकसित देशों में आकर कहीं उनके नागरिकों के नौकरी - ध्ंध्े न हथ्िाया लें। वैश्वीकरण के परिणामों पर सोचते हुए हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हर जगह एक समान नीति अपना लेने का मतलब यह नहीं होता कि हर जगह परिणाम भी समान होंगे। वैश्वीकरण के कारण दुनिया के अलग - अलग हिस्सों में सरकारों ने एकसार आथ्िार्क नीतियों को अपनाया है, लेकिन विश्व के विभ्िान्न भागों में इसके परिणाम बहुत अलग - अलग हुए हैं। यहाँ भी हमें सवर् - सामान्य निष्कषर् निकालने के बजाय संदभर् - विशेष पर ध्यान देना होगा। आथ्िार्क वैश्वीकरण के कारण पूरे विश्व में जनमत बड़ी गहराइर् से बँट गया है। आथ्िार्क वैश्वीकरण के कारण सरकारें वुफछ 9 और 10 दुनिया के विभ्िान्न हिस्सों में बनी चीजें पहली दुनिया के बाशारों में भी बिकती हैं। पहले दो चित्रा बांग्लादेश और बल्गारिया में बनी चीजों को दशार्ते हैं। 11 और 12 वैश्वीकरण के विरोध् में आयोजित विभ्िान्न सांस्कृतिक और राजनीतिक आयोजन। जब हम सामाजिकसुरक्षा - कवच की बातकरते हैं तो इसकासीध - सादा मतलब होताहै कि वुफछ लोग तोवैश्वीकरण के चलतेबदहाल होंगे ही! तभीतो सामाजिक सुरक्षा - कवच की बातकी जाती है। है न? जिम्मदारियों से अपने हाथ खींच रही हैं और इससे सामाजिक न्याय से सरोकार रखने वाले लोग चिंतित हैं। इनका कहना है कि आथ्िार्क वैश्वीकरण से आबादी के एक बड़े छोटे तबके को पफायदा होगा जबकि नौकरी और जन - कल्याण ;श्िाक्षा, स्वास्थ्य, सापफ - सपफाइर् की सुविध आदिद्ध के लिए सरकार पर आश्रित रहने वाले लोग बदहाल हो जाएँगे। सामाजिक न्याय के पक्षध्र इस बात पर जोर देते हैं कि वुफछ सांस्थानिक उपाय किए जाने चाहिए या कहें कि ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ तैयार किया जाना चाहिए ताकि जो लोग आथ्िार्क रूप से कमजोर हैं उन पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सके। दुनिया के अनेक आंदोलनों की मान्यता है कि ‘सामाजिक सुरक्षा - कवच’ की बात अव्यावहारिक है और इतना भर उपाय पयार्प्त नहीं होगा। ऐसे आंदोलनों ने बलपूवर्क किए जा रहे वैश्वीकरण को रोकने की आवाश लगाइर् है क्योंकि इससे ग़्ारीब देश आथ्िार्क - रूप से बबार्दी की कगार पर पहुँच जाएँगेऋ खासकर इन देशों के गरीब लोग एकदम बदहाल हो जाएँगे। वुफछ अथर्शास्ित्रायों ने आथ्िार्क वैश्वीकरण को विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण कहा है। आथ्िार्क वैश्वीकरण की प्रियाओं के समथर्कों का तवर्फ है कि इससे समृि बढ़ती है और ‘खुलेपन’ के कारण श्यादा से श्यादा आबादी की खुशहाली बढ़ती है। व्यापार की बढ़ती से हर देश को अपना बेहतर कर दिखाने का मौका मिलता है। इससे पूरी दुनिया को पफायदा होगा। इन लोगों का कहना है कि आथ्िार्क वैश्वीकरण अपरिहायर् है और इतिहास की धरा को अवरु( करना कोइर् बुिमानी नहीं। वैश्वीकरण के मध्यमागीर् समथर्कों का कहना है कि वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग - सचेत होकर पूरी बुिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए। बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता हैकि ‘पारस्परिक निभर्रता’ की रफ्रतार अब तेज हो चली है। वैश्वीकरण के पफलस्वरूप विश्व के विभ्िान्न भागों में सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है। सांस्कृतिक प्रभाव वैश्वीकरण के परिणाम सिपफर् आथ्िार्क और राजनीतिक दायरों में ही नशर नहीं आतेऋ हम घर में बैठे हों तब भी इसकी चपेट में होते हैं। हम जो वुफछ खाते - पीते - पहनते हैं अथवा सोचते हैं - सब पर इसका असर नशर आता है। हम जिन बातों को अपनी पसंद कहते हैं वे बातेें भी वैश्वीकरण के असर में तय होती हैं। वैश्वीकरण केसांस्कृतिक प्रभावों को देखते हुए इस भय को बल मिला है कि यह प्रियाविश्व की संस्कृतियों को खतरा पहुँचाएगी। वैश्वीकरण से यह होता है क्योंकिवैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता एंडी सिंगर, केगल्स काटर्ून है। सांस्कृतिक समरूपता का यह अथर्नहीं कि किसी विश्व - संस्कृति का उदयहो रहा है। विश्व - संस्कृति के नाम परदरअसल शेष विश्व पर पश्िचमी संस्कृति लादी जा रही है। हम लोग अमरीकी वचर्स्व वाले अध्याय तीन में वचर्स्व केसांस्कृतिक अथर् के अंतगर्त इस बात को पढ़ चुके हैं। वुफछ लोगों का तवर्फ है कि बगर्र अथवा नीली जीन्स की लोकियता का नजदीकी रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है क्योंकि राजनीतिकऔर आथ्िार्क रूप से प्रभुत्वशाली संस्कृति कम ताकतवर समाजों पर अपनी छाप छोड़ती है और संसार वैसा ही दीखताहै जैसा ताकतवर संस्कृति इसे बनाना चाहती है। जो यह तवर्फ देते हैं वे अक्सर दुनिया के ‘मैक्डोनाॅल्डीकरण’ की तरपफ इशारा करते हैं। उनका माननाहै कि विभ्िान्न संस्कृतियाँ अब अपने को प्रभुत्वशाली अमरीकी ढरेर् पर ढालने लगी हैं। चूँकि इससे पूरे विश्व की समृ(सांस्कृतिक ध्रोहर ध्ीरे - ध्ीरे खत्म होती है इसलिए यह केवल गरीब देशों के लिए ही नहीं बल्िक समूची मानवता के लिए खतरनाक है। इसके साथ - साथ यह मान लेना एकभूल है कि वैश्वीकरण के सांस्कृतिकप्रभाव सिपफर् नकारात्मक हैं। संस्कृति कोइर्जड़ वस्तु नहीं होती। हर संस्कृति हर समय बाहरी प्रभावों को स्वीकार करते रहती है। वुफछ बाहरी प्रभाव नकारात्मक होते हैं क्योंकि इससे हमारी पसंदों में कमी आती है। कभी - कभी बाहरी प्रभावों से हमारी पसंद - नापसंद का दायरा बढ़ता हैतो कभी इनसे परंपरागत सांस्कृतिक मूल्यों हम पश्िचमी संस्कृति से क्यों डरते हैं? क्या हमें अपनी संस्कृति पर विश्वास नहीं है? 13 और 14 मुंबइर् और पोटोर् एल्गेरे में संपन्न वल्डर् सोशल पफोरम के दो सम्मेलनों में वैश्वीकरण के विरोध् में प्रदशर्न। 15 आप्रवासियों के समथर्न में एक आंदोलन में श्िारकत करती हुइर् एक श्िाक्ष्िाका। 16 माॅल मे झलकती नइर् बाशारसंस्कृति। को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है। बगर्र मसाला - डोसा का विकल्प नहीं है इसलिए बगर्र से वस्तुतः कोइर् खतरा नहीं है। इससे हुआ मात्रा इतना है कि हमारे भोजन की पसंद में एक चीश और शामिल हो गइर् है। दूसरी तरपफ, नीली जीन्स भी हथकरघा पर बुने खादी के वुफतेर् के साथ खूब चलती है। यहाँ हम बाहरी प्रभाव सेयह बात तो सही है कि एक अनूठी बात देखते हैं कि नीलीकभी - कभी मुझे नए गीत जीन्स के ऊपर खादी का वुफतार् पहना जाअच्छे लगते हैं। क्या हम सबको थोड़ा नृत्य करना रहा है। मशेदार बात तो यह है कि इस अच्छा नहीं लगता भले अनूठे पहरावे को अब उसी देश कोही बजायी जा रही ध्ुन नियार्त किया जा रहा है जिसने हमें नीलीपर पश्िचमी संगीत का जीन्स दी है। जीन्स के ऊपर वुफतार् पहनेअसर हो? अमरीकियों को देखना अब संभव है। उपफ! पिफर से एक हिंदुस्तानी। काॅल सेन्टर की कहानी एक कमर्चारी की शबानी काॅल - सेन्टर में काम करना अपने आप में आँख खोल देने वाला साबित हो सकता है। आप अमरीकियों के पफोन - काॅल निबटाते हैं और आपको असली अमरीकी संस्कृति की एक झलक मिलती है। एक औसत अमरीकी हमारी अपेक्षा से कहीं श्यादा जीवंत और इर्मानदार होता है..बहरहाल, हर पफोन काॅल या बातचीत खुशगवार नहीं होती। आपके पास अविवेकी और बदशबान लोगों के भी पफोनकाॅल आते हैं। ‘काॅल’ हिन्दुस्तान में ‘अटेन्ड’ की जा रही है, यह जानकर पफोन करने वाले का लहजा कभी - कभी नपफरत से भर उठता है और उससे निबटना बहुत तनाव का काम़होता है। अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो..आपको वुफछ पफोन ऐसे भी अटेंड करने होते हैं जिनकी शुरुआत इस पंक्ित से होती है - फ्चंद मिनट पहले मैंने एक दक्ष्िाण अप्रफीकी से बात की और अब एक हिन्दुस्तानी से मुखातिब हूँय् या फ्आह री किस्मत! पिफर एक हिन्दुस्तानी! प्लीज किसी अमरीकी से बात कराइए...!य् ऐसी स्िथति में सामने वाले से पटरी बैठाना मुश्िकल होता है। स्रोत μ 10 जनवरी 2005 के द हिंदू में रंजीता उसर् की रिपोटर्। सांस्कृतिक समरुपता वैश्वीकरण का एक पहलू है तो वैश्वीकरण से इसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है। वैश्वीकरणसे हर संस्कृति कहीं श्यादा अलग और विश्िाष्ट होते जा रही है। इस प्रिया कोसांस्कृतिक वैभ्िान्नीकरण कहते हैं। इसकामतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में उनकी ताकत का सवाल गौण है परंतु इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए किसांस्कृतिक प्रभाव एकतरपफा नहीं होता। भारत और वैश्वीकरण हमने पहले इशारा किया था कि दुनिया के विभ्िान्न भागों में वैश्वीकरण इतिहास की विभ्िान्न कालावध्ियों में पहले भी हो चुका है। पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कइर् सदियों का है। औपनिवेश्िाक दौर में बि्रटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के परिणामस्वरूप भारत आधरभूत वस्तुओं और कच्चे माल का नियार्तक तथा बने - बनाये सामानों का आयातक देश था। आशादी हासिल करने के बाद, बि्रटेन के साथ अपने इन अनुभवों से सबक लेते हुए हमने प़्ौफसला किया कि दूसरे पर निभर्र रहने के बजाय खुद सामान बनाया जाए। हमने यह भी प़्ौफसला किया कि दूसरों देशों को नियार्त की अनुमति नहीं होगी ताकि हमारे अपने उत्पादक चीजों को बनाना सीख सवेंफ। इस ‘संरक्षणवाद’ से वुफछ नयी दिक्कतें पैदा हुइर्ं। वुफछ क्षेत्रों में तरक्की हुइर् तो वुफछ शरूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक श्िाक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हकदार थे। भारत में आथ्िार्क - वृि की दर ध्ीमी रही।1991 में, वित्तीय संकट से उबरने औरआथ्िार्क वृि की ऊँची दर हासिल करने की इच्छा से भारत में आथ्िार्क - सुधरों की योजना शुरू हुइर्। इसके अंतगर्त विभ्िान्न क्षेत्रों पर आयद बाधएँ हटायी गईं। इन क्षेत्रों में व्यापार और विदेशी निवेश भी शामिल थे। यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के लिए यह सब कितना अच्छा साबित हुआ है क्योंकि अंतिमकसौटी ऊँची वृि - दर नहीं बल्िक इस बात को सुनिश्िचत करना है कि आथ्िार्क बढ़वार के पफायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोइर् खुशहाल बने। वैश्वीकरण का प्रतिरोध् हम देख चुके हैं कि वैश्वीकरण बड़ा बहसतलब मुद्दा है और पूरी दुनिया में इसकी आलोचना हो रही है। वैश्वीकरण के आलोचक कइर् तवर्फ देते हैं। वामपंथी राजनीतिक रुझान रखने वालों का तवर्फ है कि मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूंजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो ध्निकों को और श्यादा ध्नी ;तथा इनकी संख्या में कमीद्ध और गरीब को और श्यादा ग़्ारीब बनाती है। राज्य के कमजोर होने से गरीबों के हित की रक्षा करने की उसकी क्षमता में कमी आती है। वैश्वीकरण के दक्ष्िाणपंथी आलोचकइसके राजनीतिक, आथ्िार्क और सांस्कृतिक प्रभावों को लेकर चिंतित हैं। राजनीतिक अथोर्ं में उन्हें राज्य के कमजोर होने की चिंता है। वे चाहते हैं कि कम से कम वुफछ क्षेत्रों में आथ्िार्क आत्मनिभर्रता और ‘संरक्षणवाद’ कादौर पिफर कायम हो। सांस्कृतिक संदभर् मेंइनकी चिंता है कि परंपरागत संस्कृति की हानि होगी और लोग अपने सदियों पुराने जीवन - मूल्य तथा तौर - तरीकों से हाथ धे देंगे। यहाँ हम गौर करें कि वैश्वीकरण - विरोध्ी आंदोलन भी विश्वव्यापी नेटववर्फ में भागीदारी 17 विज्ञापन को बेअसर करता एक आम आदमी। 18 चीनी माल से अँटा जापानी बाजार। 19 ग्लोबल बाजार का लोकल चेहरा - पश्िचम एश्िाया में बड़ी वंफपनियों वफा देशीकरण। चरण ऐसी गतिविध्ियों से छात्रों को यह समझने में मदद मिलेगी कि वैश्वीकरण ने वैफसे हमारे जीवन में प्रवेश किया है और वैश्वीकरण का सवर्व्यापी प्रभाव व्यक्ित, समुदाय तथा राष्ट्रों पर किस तरह पड़ा है। ऽ वुफछ उत्पादों की सूची बनाएँ, मसलन - खाद्य - उत्पाद, बिजली से चलने वाले घरेलू इस्तेमाल के उपकरण और सुख - सुविध के ऐसे सामान जिनसे आप परिचित हैं। ऽ अपने पसंदीदा टी.वी. कायर्क्रमों के नाम लिखें। ऽ अध्यापक इस सूची को एकत्रा करें और एक साथ मिलायें। ऽ कक्षा को छोटे - छोटे समूह में बाँटें और प्रत्येक समूह को वस्तुओं तथा टी.वी. कायर्क्रमों की वुफछ सूची दें। अगर सूची श्यादा लंबी हो तो समूह में छात्रों की संख्या श्यादा रखें। ऽ छात्रों से रोजमरार् के उपयोग की इन वस्तुओं के निमार्ताओं और अपने पसंदीदा टीवी कायर्क्रमों के प्रायोजकों के नाम बताने को कहें। ऽ अध्यापक ;छात्रों की मदद सेद्ध इन उत्पादों के निमार्ताओं को तीन वगोर्ं में सूचीब( करेंः ;1द्ध पूणर्तया विदेशी वंफपनी ;2द्ध पूणर्तया भारतीय और ;3द्ध साझेदारी में काम करने वाली वंफपनियाँ। इस वगीर्करण से यह तथ्य सामने आएगा कि छात्रों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अध्िकांश उत्पादों की विनिमार्ता वंफंपनियाँ विदेशी हैं जो स्थानीय वंफपनी के साथ मिलकर इन वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। शेष दो कोटियों के अंतगर्त आनेवाले उत्पाद अपेक्षतया कम हैं। अध्यापकों के लिए ऽ अध्यापक विद्याथ्िार्यों से चचार् करें कि वैश्वीकरण वैफसे हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है। इस चचार् में श्यादा जोर रोशमरार् के इस्तेमाल की चीशों और टीवी के कायर्क्रमों पर दें। ऽ छात्रों को किन्हीं चार भारतीय वंफपनियों के बारे में बताएँ जो विभ्िान्न उद्योगों में विदेशी वंफपनियों के साथ साझेदारी कर रही हैं और जिनके ठिकाने दूसरे देशों में भी हैं। ऽ छात्रों का ध्यान वैश्वीकरण के दूसरे पहलू पर भी खींचें। विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल जैसे - जैसे बढ़ा है वैसे - वैसे हमारे छोटे स्वदेशी उद्योगों के ग्राहक कम हुए हैं और ये उद्योग बंद हो रहे हैं। ऽ इस गतिविध्ि का समापन वैश्वीकरण को लेकर जारी बहसों से छात्रों का परिचय कराकर हो सकता है। ख़ासतौर से विद्याथ्िार्यों को यह बतायें कि विकासशील और अविकसित देशों पर वैश्वीकरण के प्रभावों को लेकर क्या बातें कही जा रही हैं। विश्व - व्यापार संगठन से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद दुनिया भर में इसके विरु( ध्रना और विरोध् - प्रदशर्न हुए। छात्रों को इनकी जानकारी दें। करते हैं और अपने से मिलती - जुलती सोच रखने वाले दूसरे देशों के लोगों से गठजोड़ करते हैं। वैश्वीकरण - विरोध्ी बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धरणा के विरोध्ी नहीं बल्िक वैश्वीकरण के किसी खास कायर्क्रम के विरोध्ी हैं जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं। 1999 में, सिएट्ल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्राी - स्तरीय बैठक हुइर्। यहाँ बड़े पैमाने पर विरोध् - प्रदशर्न हुए। आथ्िार्क रूप से ताकतवर देशों द्वारा व्यापार के अनुचित तौर - तरीकों के अपनाने के विरोध् में ये प्रदशर्न हुए थे। विरोध्ि यों का तवर्फ था कि उदीयमान वैश्िवक आथ्िार्क - व्यवस्था में विकासशील देशों के हितोंको समुचित महत्त्व नहीं दिया गया है। नव - उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध् का एक विश्व - व्यापी मंच ‘वल्डर् सोशल पफोरम’ ;ॅैथ्द्ध है। इस मंच के तहतमानवाध्िकार - कायर्कत्तार्, पयार्वरणवादी,मजदूर, युवा और महिला कायर्कत्तार् एकजुट होकर नव - उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध् करते हैं। ‘वल्डर् सोशल पफोरम’ की पहली बैठक 2001 में ब्राजील के पोटोर् अलगेरे में हुइर्। 2004 में इसकी चैथी बैठक मुंबइर् में हुइर् थी। इसकी सातवीं बैठक नैरोबी ;कीनियाद्ध में जनवरी, 2007 में हुइर् है। भारत और वैश्वीकरण का प्रतिरोध् वैश्वीकरण के प्रतिरोध् को लेकर भारत के अनुभव क्या हैं? सामाजिक आंदोलनों से लोगों को अपने पास - पड़ोस की दुनिया को समझने में मदद मिलती है। लोगों को अपनी समस्याओं के हल तलाशने में भी सामाजिक आंदोलनों से मदद मिलती है। भारत में वैश्वीकरण का विरोध् कइर् हलकों से हो रहा है। आथ्िार्क वैश्वीकरण के ख्ि़ालापफ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरपफ से उठी हैं तो इंडियन सोशल पफोरम जैसे मंचों से भी। औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध् किया है। वुफछ वनस्पतियों मसलन ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय पफमोर्ं ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए। इसका भी कड़ा विरोध् हुआ। वैश्वीकरण का विरोध् राजनीति के दक्ष्िाणपंथी खेमों से भी हुआ है। यह खेमाविभ्िान्न सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध् कर रहा है जिसमें केबल नेटववर्फ के जरिए उपलब्ध् कराए जा रहे विदेशी टी.वी. चैनलों से लेकर वैलेन्टाइर्न - डे मनाने तथा स्वूफल - काॅलेज के छात्रा - छात्राओं की पश्िचमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभ्िारुचि तक का विरोध् शामिल है। प्रश्नावली1. वैश्वीकरण के बारे में कौन - सा कथन सही है? ;कद्ध वैश्वीकरण सिपफर् आथ्िार्क परिघटना है। ;खद्ध वैश्वीकरण की शुरुआत 1991 में हुइर्। ;गद्ध वैश्वीकरण और पश्िचमीकरण समान हैं। ;घद्ध वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है। 2.वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में कौन - सा कथन सही है? ;कद्ध विभ्िान्न देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव विषम रहा है। ;खद्ध सभी देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव समान रहा है। ;गद्ध वैश्वीकरण का असर सिपफर् राजनीतिक दायरे तक सीमित है। ;घद्ध वैश्वीकरण से अनिवायर्तया सांस्कृतिक समरूपता आती है। 3.वैश्वीकरण के कारणों के बारे में कौन - सा कथन सही है? ;कद्ध वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूणर् कारण प्रौद्योगिकी है। ;खद्ध जनता का एक खास समुदाय वैश्वीकरण का कारण है। ;गद्ध वैश्वीकरण का जन्म संयुक्त राज्य अमरीका में हुआ। ;घद्ध वैश्वीकरण का एकमात्रा कारण आथ्िार्क ध्रातल पर पारस्परिक निभर्रता है। 4.वैश्वीकरण के बारे कौन - सा कथन सही है? ;कद्ध वैश्वीकरण का संबंध् सिपफर् वस्तुओं की आवाजाही से है। ;खद्ध वैश्वीकरण में मूल्यों का संघषर् नहीं होता।;गद्ध वैश्वीकरण के अंग के रूप में सेवाओं का महत्त्व गौण है। ;घद्ध वैश्वीकरण का संबंध् विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है। 5.वैश्वीकरण के बारे में कौन - सा कथन गलत है?़;कद्ध वैश्वीकरण के समथर्कों का तवर्फ है कि इससे आथ्िार्क समृि बढ़ेगी। ;खद्ध वैश्वीकरण के आलोचकों का तवर्फ है कि इससे आथ्िार्क असमानता और श्यादा बढ़ेगी।;गद्ध वैश्वीकरण के पैरोकारों का तवर्फ है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी। ;घद्ध वैश्वीकरण के आलोचकों का तवर्फ है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी। 6.विश्वव्यापी ‘पारस्परिक जुड़ाव’ क्या है? इसके कौन - कौन से घटक हैं? 7.वैश्वीकरण में प्रौद्योगिकी का क्या योगदान है? 8. वैश्वीकरण के संदभर् में विकासशील देशों में राज्य की बदलती भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें? 9.वैश्वीकरण की आथ्िार्क परिणतियाँ क्या हुइर् हैं? इस संदभर् में वैश्वीकरण ने भारत पर वैफसे प्रभाव डाला है।? 10.क्या आप इस तवर्फ से सहमत हैं कि वैश्वीकरण से सांस्कृतिक विभ्िान्नता बढ़ रही है? 11.वैश्वीकरण ने भारत को वैफसे प्रभावित किया है और भारत वैफसे वैश्वीकरण को प्रभावित कर रहा है?

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