जंगल के सवाल पर राजनीति, पानी के सवाल पर राजनीति और वायुमंडल के मसले पर राजनीति! पिफर, किस बात में राजनीति नहीं है! अराल के आसपास बसे हशारों लोगों को अपना घर - बार छोड़ना पड़ा क्योंकि पानी के विषाक्त होने से मत्स्य - उद्योग नष्ट हो गया। जहाजरानी उद्योग और इससे जुड़े तमाम कामकाज खत्म हो गए। पानी में नमक की सांद्रता के श्यादा बढ़ जाने से पैदावार कम हो गइर्। अनेक अनुसंधन हुए लेकिन इस समस्या का समाधन न हो सका। दरअसल इस जगह मशाक - मशाक में लोग एक - दूसरे से कहते हैं कि जितने लोग सागर के अध्ययन के लिए आये वे अगर एक - एक बाल्टी पानी भी लाते तो यह सागर भर गया होता। ;अराल सागर की अवस्िथति देखने समझने के लिए पृष्ठ 24 पर दिए मानचित्रा को देखें। स्रोतः ूूूण्हवइंतजपउमेण्वतह वैश्िवक राजनीति में पयार्वरण कीचिंता क्यों? इस पुस्तक में हमने विश्व - राजनीति पर बड़े सीमित अथो± में चचार् की है, मसलन हमने यु( और संध्ि की बातें कींऋ राज्यशक्ित के उत्थान और पतन की चचार् हुइर् या पिफर हमने अंतरार्ष्ट्रीय पफलक पर अपने देश की नुमाइंदगी करने वाली सरकारों और अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों की बातें कीं। अध्याय सात में हमने विश्व - राजनीति के दायरे को थोड़ा बढ़ाकर उसमें गरीबी और महामारी जैसे विषय भी शामिल कर लिए हैं। ऐसा करने में कोइर् मुश्िकल भी नहीं क्योंकि हम सब मानते हैं कि गरीबी और महामारी पर अंवुफश रखने की जिम्मेदारी सरकार की है। इस अथर् में ये मुद्दे विश्व - राजनीति के दायरे में ही आते हैं। अब शरा इन मुद्दों पर विचार कीजिए। क्या आप मानते हैं कि इन जैसे मुद्दे समकालीन विश्व - राजनीति के दायरे में आते हैं? दुनिया भर में कृष्िा - योग्य भूमि में अबकोइर् बढ़ोत्तरी नहीं हो रही जबकि मौजूदाउपजाऊ जमीन के एक बड़े हिस्से की उवर्रता कम हो रही है। चारागाहों के चारे खत्म होने को हैं और मत्स्य - भंडार घट रहा है। जलाशयों की जलराश्िा बड़ी तेजी से कम हुइर् है उसमें प्रदूषण बढ़ा है। इससे खाद्य - उत्पादन में कमी आ रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की विश्व विकास रिपोटर् ;2006द्ध के अनुसार विकासशील देशों की एक अरब बीस करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध् नहीं होता और यहाँ की दो अरब साठ करोड़ आबादी सापफ - सपफाइर् की सुविध से वंचित हैं। इस वशह से 30 लाख से श्यादा बच्चे हर साल मौत के श्िाकार होते हैं।प्राकृतिक वन जलवायु को संतुलित रखने में मदद करते हैं, इनसे जलचक्र भी संतुलित बना रहता है और इन्हीं वनों में ध्रती की जैव - विविध्ता का भंडार भरा रहता है लेकिन ऐसे वनों की कटाइर् हो रही है और लोग विस्थापित हो रहे हैं। जैव - विविध्ता की हानि जारी है और इसका कारण है उन पयार्वासों का विध्वंस जो जैव - प्रजातियों के मामले में समृ( हैं।ध्रती के ऊपरी वायुमंडल में ओशोन गैस की मात्रा में लगातार कमी हो रही है। इसे ओशोन परत में छेद होना भी कहते हैं। इससे पारिस्िथतिकी तंत्रा और मनुष्य के स्वास्थ्य पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। पूरे विश्व में समुद्रतटीय क्षेत्रों का प्रदूषण भी बढ़ रहा है। यद्यपि समुद्र का मध्यवतीर्भाग अब भी अपेक्षाकृत स्वच्छ है लेकिन इसका तटवतीर् जल जमीनी ियाकलापों से प्रदूष्िात हो रहा है। पूरी दुनिया में समुद्रतटीय इलाकों में मनुष्यों की सघन बसाहट जारी है और इस प्रवृति पर अंवुफश न लगा तो समुद्री पयार्वरण कीगुणवत्ता में भारी गिरावट आएगी। आपको लग सकता है कि ये तो नैसगिर्क घटनाएँ हैं और इनका अध्ययन राजनीति विज्ञान की जगह भूगोल वाली कक्षा में किया जाना चाहिए। लेकिन शरा पिफर से सोचिए। पयार्वरण के नुकसान से जुड़े जिन मसलों की चचार्ऊपर की गइर् है उन पर अंवुफश रखने के लिए अगर विभ्िान्न देशों की सरकारें कदम उठाती हैं तो इन मसलों की परिणति इस अथर् में राजनीतिक होगी। इन मसलों में अध्िकांश ऐसे हैं कि किसी एक देश की सरकार इनका पूरा समाधन अकेले दम पर नहीं कर सकती। इस वजह से ये मसले विश्व - राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं। बहरहाल, पयार्वरण औरप्राकृतिक संसाध्नों के मसले एक और गहरे अथर् में राजनीतिक हैं। कौन पयार्वरण को नुकसान पहुँचाता है? इस पर रोक लगाने के उपाय करने की जिम्मेदारी किसकी है? ध्रतीके प्राकृतिक संसाध्नों पर किसको कितने इस्तेमाल का हक है? इन सवालों के जवाब बहुध इस बात से निधर्रित होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है। इस तरह ये मसले गहरे अथो± में राजनीतिक हैं। हालाँकि पयार्वरण से जुड़े सरोकारों का लंबा इतिहास है लेकिन आथ्िार्क विकास के कारण पयार्वरण पर होने वाले असर की चिंता ने 1960 के दशक के बाद से राजनीतिक चरित्रा ग्रहण किया। वैश्िवक मामलों से सरोकार रखने वाले एक विद्वत् समूह ‘क्लब आॅव रोम’ ने 1972 में ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ शीषर्क से एक पुस्तक प्रकाश्िात की। यह पुस्तक दुनिया की बढ़ती जनसंख्या के आलोक में प्राकृतिक संसाध्नों के विनाश के अंदेशे को बड़ी खूबी से बताती है। संयुक्त राष्ट्रसंघ पयार्वरण कायर्क्रम ;न्छम्च्द्ध सहित अनेक अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों ने पयार्वरण से जुड़ी समस्याओं पर सम्मेलन कराये और इस विषय पर अध्ययन को बढ़ावा देना शुरू किया। इस प्रयास का उद्देश्य पयार्वरण की समस्याओं पर श्यादा कारगर और सुलझी हुइर् पहलकदमियों की शुरुआत करना था। तभी से पयार्वरण वैश्िवक राजनीतिका एक महत्त्वपूणर् मसला बन गया। 1992 में संयुक्त राष्ट्रसंघ का पयार्वरण और विकास के मुद्दे पर वेंफित एक सम्मेलन, ब्राजील के रियो डी जनेरियो में हुआ। इसे पृथ्वी सम्मेलन ;म्ंतजी ैनउउपजद्ध कहा जाता है। इस सम्मेलन में 170 देश, हशारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहुराष्ट्रीय निगमों ने भाग लिया। वैश्िवक राजनीति के दायरे में पयार्वरण को लेकर बढ़ते सरोकारों को इस अपने पास - पड़ोस की ऐसी खबरों की कतरनें जुटाएँ जिनमें पयार्वरण और राजनीति के बीच संबंध् दिखाइर् देता हो। सम्मेलन में एक ठोस रूप मिला। इस सम्मेलन से पाँच साल पहले ;1987द्ध ‘अवर काॅमनफ्रयूचर’ शीषर्क बटर्लैंड रिपोटर् छपी थी। रिपोटर् में चेताया गया था कि आथ्िार्क विकास के चालू तौर - तरीके आगे चलकर टिकाऊ साबित नहीं होंगे। विश्व के दक्ष्िाणी हिस्से में औद्योगिक विकास की माँग श्यादा प्रबल है और रिपोटर् में इसी हवाले से चेतावनी दी गइर् थी। रियो - सम्मेलन में यह बात खुलकर सामने आयी कि विश्व के ध्नी और विकसित देश यानी उत्तरी गोला(र् तथा गरीब और विकासशील देश यानी दक्ष्िाणी गोला(र् पयार्वरण केअलग - अलग अजेंडे के पैरोकार हैं। उत्तरी देशों की मुख्य चिंता ओशोन परत की छेद और वैश्िवक तापवृि ;ग्लोबल वमि±गद्ध को लेकर थी। दक्ष्िाणी देश आथ्िार्क विकास और पयार्वरण प्रबंध्न के आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए श्यादा चिंतित थे। रियो - सम्मेलन में जलवायु - परिवतर्न, जैव - विविध्ता और वानिकी के संबंध् में वुफछ नियमाचार निधर्रित हुए। इसमें ‘अजेंडा - 21’ के रूप में विकास के वुफछ तौर - तरीके भी सुझाए गए। लेकिन इसके बाद भी आपसी अंतर और कठिनाइयाँ बनी रहीं। सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि आथ्िार्क वृि का तरीका ऐसा होना चाहिए कि इससे पयार्वरण को नुकसान न पहुँचे। इसे ‘टिकाऊ विकास’ का तरीका कहा गया। लेकिन समस्या यह थीकि ‘टिकाऊ विकास’ पर अमल कैसे किया जाएगा। वुफछ आलोचकों का कहना है कि ‘अजेंडा - 21’ का झुकाव पयार्वरण संरक्षण को सुनिश्िचत करने के बजाय आथ्िार्क वृि की ओर है। आइए, अब पयार्वरण की वैश्िवक राजनीति के वुफछ विवादित मुद्दों पर एक नशर डालते हैं। विश्व की साझी संपदा की सुरक्षा साझी संपदा उन संसाध्नों को कहते हैं जिन पर किसी एक का नहीं बल्िक पूरे समुदाय का अध्िकार होता है। संयुक्त परिवार का चूल्हा, चारागाह, मैदान, वुफआँ या नदी साझी संपदा के उदाहरण हैं। इसी तरह विश्व के वुफछ हिस्से और क्षेत्रा किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राध्िकार से बाहर होते हैं। इसीलिए उनका प्रबंध्न साझे तौर पर अंतरार्ष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया जाता है। इन्हें ‘वैश्िवक संपदा’ या 1970 के दशक में अÚीका की सबसे बड़ी विपदाओं में एक थी अनावृष्िट। इसके कारण पाँच देशों की उपजाऊ जमीन बंजर हो गइर् और उसमें दरार पड़ गइर्। दरअसल पयार्वरणीय शरणाथीर् जैसा अटपटा शब्द इसी घटना के बाद प्रचलित हुआ। खेती - किसानी के असंभव हो जाने के कारण अनेक लोगों को घर - बार छोड़ना पड़ा। स्रोतः ूूूण्हवइंतजपउमेण्वतह क्योटो प्रोटोकाॅल के बारे में और अध्िक जानकारी एकत्रा करें। किन बड़े देशों ने इस पर दस्तखत नहीं किए और क्यों? होता है। इस अथर् में 1980 के दशक के मध्यमें अंटावर्फटिका के ऊपर ओजोन परत में छेद की खोज एक आँख खोल देने वाली घटना है। ठीक इसी तरह वैश्िवक संपदा के रूप में बाहरी अंतरिक्ष के इतिहास से भी पताचलता है कि इस क्षेत्रा के प्रबंध्न पर उत्तरी और दक्ष्िाणी गोला(र् के देशों के बीच मौजूद असमानता का असर पड़ा है। ध्रती के वायुमंडलऔर समुद्री सतह के समान यहाँ भी महत्त्वपूणर् मसला प्रौद्योगिकी और औद्योगिक विकास का है। यह एक शरूरी बात है क्योंकि बाहरी अंतरिक्ष में जो दोहन - कायर् हो रहे हैं उनके पफायदे न तो मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढि़यों के लिए। साझी परंतु अलग - अलगिाम्मेदारियाँ ऊपर हमने देखा कि पयार्वरण को लेकरउत्तरी और दक्ष्िाणी गोला(र् के देशों के रवैयेमें अंतर है। उत्तर के विकसित देश पयार्वरण के मसले पर उसी रूप में चचार् करना चाहते हैं जिस दशा में पयार्वरण आज मौजूद है। ये देश चाहते हैं कि पयार्वरण के संरक्षण में हर देश की जिम्मेदारी बराबर हो। दक्ष्िाण के विकासशील देशों का तवर्फ है कि विश्व में पारिस्िथतिकी को नुकसान अध्िकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है। यदि विकसित देशों ने पयार्वरण को श्यादा नुकसान पहुँचाया है तो उन्हें इस नुकसान की भरपाइर् की जिम्मेदारी भी श्यादा उठानी चाहिए। इसके अलावा, विकासशील देश अभी औद्योगीकरण की प्रिया से गुजर रहे हैं और शरूरी है कि उन पर वे प्रतिबंध् न लगें जो विकसित देशों पर लगाये जाने हैं। इस प्रकार अंतरार्ष्ट्रीय पयार्वरण कानून के निमार्ण, प्रयोग और व्याख्या में विकासशील देशों की विश्िाष्ट शरूरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। सन् 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस तवर्फ को मान लिया गया और इसे ‘साझी परंतु अलग - अलग जिम्मेदारियाँ’ का सि(ांत कहा गया। इस संदभर् में रियो - घोषणापत्रा का कहना है कि μ फ्ध्रती के पारिस्िथतिकी तंत्रा कीअखंडता और गुणवत्ता की बहाली, सुरक्षा तथा संरक्षण के लिए विभ्िान्न देश विश्व - बंध्ुत्व की भावना से आपस में सहयोग करेंगे। पयार्वरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभ्िान्न राज्यों का योगदान अलग - अलग है। इसे देखते हुए विभ्िान्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग - अलग जिम्मेदारियाँ’ होगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्िवक पयार्वरण पर दबाव श्यादा है और इन देशों के पास विपुलप्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाध्न हैं। इसे देखतेहुए टिकाऊ विकास के अंतरार्ष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।’’ जलवायु के परिवतर्न से संबंध्ित संयुक्त राष्ट्रसंघ के नियमाचार यानी यूनाइटेडनेशंस Úेमववर्फ कंवेंशन आॅन क्लाइमेट चंेज ;न्छथ्ब्ब्ब्.1992द्ध में भी कहा गया है कि इस संध्ि को स्वीकार करने वाले देश अपनी क्षमता के अनुरूप, पयार्वरण के अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधर पर साझी परंतु अलग - अलग िाम्मेदारियाँ निभाते हुए पयार्वरण की सुरक्षा के प्रयास करेंगे। इस नियमाचार को स्वीकार करने वाले देश इस बात पर सहमत थे कि ऐतिहासिक रूप से भी और मौजूदासमय में भी ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सजर्न में सबसे श्यादा हिस्सा विकसित देशों का है। यह बात भी मानी गइर् कि विकासशील देशोंका प्रतिव्यक्ित उत्सजर्न अपेक्षाकृत कम है। इस कारण चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों को क्योटो - प्रोटोकाॅल की बाध्यताओं से अलग रखा गया है। क्योटो प्रोटोकाॅल एक अंतरार्ष्ट्रीय समझौता है। इसके अंतगर्तऔद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सजर्न को कम करने के लक्ष्य निधर्रित किए गए हैं। काबर्न डाइआॅक्साइड, मीथेनऔर हाइड्रो - फ्रलोरो काबर्न जैसी वुफछ गैसों के बारे में माना जाता है कि वैश्िवक तापवृि ;ग्लोबल वामि±गद्ध में इनकी कोइर् - न - कोइर् भूमिका शरूर है। ग्लोबल वामि±ग की परिघटना में विश्व का तापमान बढ़ता है और ध्रती के जीवन के लिए यह बात बड़ी प्रलयंकारी साबित होगी। जापान के क्योटो में 1997 में इस प्रोटोकाॅल पर सहमति बनी। 1992 में इस समझौते के लिए वुफछ सि(ांतों तय किए गए थे और सि(ांत की इसरूपरेखा यानी यूनाइटेड नेशन्स Úेमववर्फ वंफवेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज पर सहमति जताते हुए हस्ताक्षर हुए थे। क्योटो प्रोटोकाॅल पर इन्हीं सि(ांतों के आलोक में सहमति बनी। साझी संपदा साझी संपदा का अथर् होता है ऐसी संपदा जिस पर किसी समूह के प्रत्येक सदस्य का स्वामित्व हो। इसके पीछे मूल तवर्फ यह है कि यह शायज सि(ांत है!हमारे देश में जारीआरक्षण की नीति कीतरह! है न? गोबर टाइम्स के पोस्टर पर आधरित चीन भी जल्दी ही ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सशर्न के मामले में विकसित देशों की भाति अगली कतार में नशर आयेंगे। 2005 के जून में ग्रुप - 8 के देशों की बैठक हुइर्। इसमें भारत ने ध्यान दिलाया कि विकासशील देशों में ग्रीन हाऊस गैसों की प्रति व्यक्ित उत्सजर्न दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्रा है। साझी परंतु अलग - अलग िाम्मदेारियों के सि(ांत के अनुरूप भारत का विचार है कि उत्सजर्न - दर में कमी करने की सबसे श्यादा िाम्मेवारी विकसित देशों की है क्योंकि इन देशों ने एक लंबी अवध्ि तक बहुत श्यादा उत्सजर्न किया है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के जलवायु - परिवतर्न से संबंध्ित बुनियादी नियमाचार न्छथ्ब्ब्ब्द्ध ँके अनुरूप भारत पयार्वरण से जुड़े अंतरार्ष्ट्रीयमसलों में श्यादातर ऐतिहासिक उत्तरदायित्व का तवर्फ रखता है। इस तवर्फ के अनुसारग्रीनहाऊस गैसों के रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही श्यादातर विकसित देशों की है। इसमें जोर देकर कहा गया है कि ‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहायर् प्राथमिकता आथ्िार्क तथा सामाजिक विकास की है।’ हाल में संयुक्त राष्ट्रसंघ के इस नियमाचार ;न्छथ्ब्ब्ब्द्ध के अंतगर्त चचार् चली कि तेजी से औद्योगिक होते देश ;जैसे ब्राजील, चीन और भारतद्ध नियमाचार कीबाध्यताओं का पालन करते हुए ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सजर्न को कम करें। भारत इस बात मैं समझ गया! पहले उनलोगों ने ध्रती को बबार्दकिया और अब ध्रतीको चैपट करने कीहमारी बारी है। क्या यहीहै हमारा पक्ष? के ख्िालापफ है। उसका मानना है कि यह बात इस नियमाचार की मूल भावना के विरु( है। भारत पर इस तरह की बाध्यता आयद करना अनुचित भी है। भारत मंे 2030 तक काबर्न का प्रति व्यक्ित उत्सजर्न बढ़ने के बावजूद विश्व के ;सन् 2000द्ध के औसत ;3.8 टन प्रति व्यक्ितद्ध के आध्े से भी कम होगा। 2000 तक भारत का प्रति व्यक्ित उत्सजर्न 09 टन था और अनुमान है कि 2030 तक यह मात्रा बढ़कर 1.6 टन प्रतिव्यक्ित हो जाएगी। भारत की सरकार विभ्िान्न कायर्क्रमों के जरिए पयार्वरण से संबंध्ित वैश्िवक प्रयासों में श्िारकत कर रही है। मिसाल के लिए भारत नेअपनी नेशनल आॅटो - फ्रयूल पाॅलिसी’ के अंतगर्त वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंध्न अनिवायर् करदिया है। 2001 में ऊजार् - संरक्षण अध्िनियमपारित हुआ। इसमें ऊजार् के श्यादा कारगर इस्तेमाल की पहलकदमी की गइर् है। ठीक इसी तरह 2003 के बिजली अध्िनियम में पुननर्वा ;त्मदमूंइसमद्ध ऊजार् के इस्तेमालको बढ़ावा दिया गया है। हाल में प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के उपयोग पर आधरित प्रौद्योगिकी को अपनाने की तरपफ रुझान बढ़ा है। इससे पता चलता है कि भारत पयार्वरण सुरक्षा के लिहाज से ठोस कदम उठा रहा है। भारत बायोडीजल से संबंध्ित एक राष्ट्रीय मिशन चलाने के लिए भी तत्पर है। इसके अंतगर्त 2011 - 12 तक बायोडीजल तैयार होने लगेगा और इसमें 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि का इस्तेमाल होगा।पुननर्वीकृत होने वाली ऊजार् के सबसे बड़े कायर्क्रमों में से एक भारत में चल रहा है। भारत ने पृथ्वी - सम्मेलन ;रियोद्ध के समझौतों के ियान्वयन का एक पुनरावलोकन 1997 में किया। इसका मुख्य निष्कषर् यह था कि विकासशील देशों को रियायती शतो± पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाध्न तथा पयार्वरण के संदभर् में बेहतर साबित होने वाली प्रौद्योगिकी मुहैया कराने की दिशा में कोइर् साथर्क प्रगति नहीं हुइर् है। भारत इस बात को शरूरी मानता है कि विकसित देशविकासशील देशों को वित्तीय संसाध्न तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकी मुहैया कराने के लिए तुरंत उपाय करें ताकि विकासशील देश ‘प्रफेमववर्फ कन्वेन्शन आॅन क्लाइमेट चेंज’ की मौजूदा प्रतिब(ताओं को पूरा कर सवेंफ। भारत का यह भी मानना है कि ‘दक्षेस’ ;ै।।त्ब्द्ध में शामिल देश पयार्वरण के प्रमुख वैश्िवक मसलों पर एक समान राय बनायें ताकि इस क्षेत्रा की आवाश वशनी हो सके। पयार्वरण आंदोलन μ एक या अनेक पयार्वरण हानि की चुनौतियों से निबटने के लिए सरकारों ने अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर जो पेशकदमी की है हम उस के बारे में जान चुके हैं। लेकिन इन चुनौतियों के मद्देनशरवुफछ महत्त्वपूणर् पेशकदमियाँ सरकारों की तरपफ से नहीं बल्िक विश्व के विभ्िान्न भागों में सिय पयार्वरण के प्रति सचेत कायर्कतार्ओं ने की हैं। इन कायर्कतार्ओं में वुफछ तो अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर और बाकी स्थानीय स्तर पर सिय हैं। आज पूरे विश्व में पयार्वरण आंदोलन सबसे श्यादा जीवंत, विविध्तापूणर् तथा ताकतवर सामाजिक आंदोलनों में शुमार किए जाते हैं। सामाजिक चेतना के दायरे में ही राजनीतिक कारर्वाइर् के नये रूप जन्म लेते हैं या उन्हें खोजा जाता है। इन आंदोलनों से नए विचार निकलते हैं। इन आंदोलनों ने हमें दृष्िट दी है कि वैयक्ितक और सामूहिक जीवन के लिए आगे के दिनों में क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। यहाँ वुफछ उदाहरणों की चचार् की जा रही है जिससे पता चलता है कि मौजूदा पयार्वरण आंदोलनों की एक मुख्य विशेषता उनकी विविध्ता है। दक्ष्िाणी देशों मसलन मैक्िसको, चिले, ब्राशील, मलेश्िाया, इंडोनेश्िाया, महादेशीय अप्रफीका और भारत के वन - आंदोलनों पर बहुत दबाव है। तीन दशकों से पयार्वरण को लेकर सियता का दौर जारी है। इसके बावजूद तीसरी दुनिया के विभ्िान्न देशों में वनों की कटाइर् खतरनाक गति से जारी है। पिछले दशक में विश्व के विशालतम वनों का विनाश बढ़ा है। खनिज - उद्योग पृथ्वी पर मौजूद सबसे ताकतवर उद्योगों में एक है। वैश्िवक अथर्व्यवस्था में उदारीकरण के कारण दक्ष्िाणी गोला(र् के अनेक देशों की अथर्व्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुल चुकी हैं। खनिज उद्योग ध्रती के भीतर मौजूद संसाध्नों को बाहर निकालता है, रसायनों का भरपूर उपयोग चिपको आंदोलन के बारे में और जानकारी जुटाएं। बांग्लादेश के उत्तर - पूवीर् जिले दिनाजपुर के शहर पुफलवाड़ी में एक पूरा - का - पूरा समुदाय कोयला खनन परियोजना के विरोध् में उठ खड़ा हुआ। इस चित्रा में अनेक महिलायें प्रस्तावित कोयला परियोजना के विरोध् में नारे लगा रही हैं। इस चित्रा में एक स्त्राी अपने बच्चे को सीने से लगाए हुए खड़ी है। करता हैऋ भूमि और जलमागो± को प्रदूष्िात करता है और स्थानीय वनस्पतियों का विनाश करता है। इसके कारण जन - समुदायों को विस्थापित होना पड़ता है। कइर् बातों के साथ इन कारणों से विश्व के विभ्िान्न भागों में खनिज - उद्योग की आलोचना और विरोध् हुआ है। इसका एक अच्छा उदाहरण पिफलीपिन्स है जहाँ कइर् समूहों और संगठनों ने एक साथ मिलकर एक आॅस्टेªलियाइर् बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘वेस्टनर् माइनिंग कारपोरेशन’ के ख्िालापफ अभ्िायान चलाया। इस कंपनी का विरोध् खुद इसके स्वदेश यानी आॅस्टेªेलिया में हुआ। इस विरोध् के पीछे परमाण्िवक शक्ित के मुख़ालपफत की भावनाएँ काम कर रही हैं। आॅस्टेªेलिया में इस कंपनी का विरोध् आस्टेªलियाइर् आदिवासियों के बुनियादी अध्िकारों की पैरोकारी के कारण भी किया जा रहा है। वुफछ आंदोलन बड़े बाँधें के ख्िालापफ संघषर् कर रहे हैं। अब बाँध् - विरोध्ी आंदोलन को नदियों को बचाने के आंदोलनों के रूप मेंदेखने की प्रवृिा भी बढ़ रही है क्योंकि ऐसे आंदोलन में नदियों और नदी - घाटियों के श्यादाटिकाऊ तथा न्यायसंगत प्रबंध्न की बात उठायी जाती है। 1980 के दशक के शुरुआती और मध्यवतीर् वषो± में विश्व का पहला बाँध् - विरोध्ी आंदोलन दक्ष्िाणी गोला(र् में चला। आस्टेªलिया में चला यह आंदोलन प्रैफंकलिन नदी तथा इसके परिवतीर् वन को बचाने का आंदोलन था। यह वन और विजनपन की पैरोकारी करने वाला आंदोलन था ही, बाँध् - विरोध्ी आंदोलन भी था। पिफलहाल दक्ष्िाणी गोला(र् के देशों में तुकीर् से लेकर थाइर्लैंड और दक्ष्िाण अप्रफीका तक तथा इंडोनेश्िाया से लेकर चीन तक बड़े बाँधें को बनाने की होड़ लगी है। भारत में बाँध् - विरोध्ी और नदी हितैषी वुफछ अग्रणी आंदोलन चल रहे हैं। इन आंदोलनों में नमर्दा आंदोलन सबसे श्यादा प्रसि( है। यह बात ध्यान देने की है कि भारत में बाँध् विरोध्ी तथा पयार्वरण - बचाव के अन्य आंदोलन एक अथर् में समानध्मीर् हैं क्योंकि ये अहिंसा पर आधरित हैं। संसाध्नों की भू - राजनीति ‘‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’’ μ ‘संसाध्नों की भू - राजनीति’ इन्हीं सवालों से जूझती है। यूरोपीय ताकतों के विश्वव्यापी प्रसार का एक मुख्य साध्न और मकसद संसाध्न रहे हैं। संसाध्नों को लेकर राज्यों के बीच तनातनी हुइर् है। संसाध्नों से जुड़ी भू - राजनीति को पश्िचमी दुनिया ने श्यादातर व्यापारिक संबंध्, यु( तथा ताकत के संदभर् में सोचा। इस सोच के मूल में था विदेश में संसाध्नों की मौजूदगी तथा समुद्री नौवहन में दक्षता। समुद्री नौवहन स्वयं इमारती लकडि़यों पर आधरित था इसलिए जहाज की शहतीरों के लिए इमारती लकडि़यों की आपूतिर् 17वीं सदी से बाद के समय में प्रमुख यूरोपीय शक्ितयों की प्राथमिकताओं में रही। पहले और दूसरे विश्वयु( के दौरान सामरिक संसाध्नों, खासकर तेल की निबार्ध् आपूतिर् कामहत्त्व बहुत अच्छी तरह उजागर हो गया।पूरे शीतयु( के दौरान उत्तरी गोला(र् के विकसित देशों ने इन संसाध्नों की सतत् आपूतिर् के लिए कइर् तरह के कदम उठाये। इसके अंतगर्त संसाध्न - दोहन के इलाकों तथा समुद्री परिवहन - मागो± के इदर् - गिदर् सेना कीतैनाती, महत्त्वपूणर् संसाध्नों का भंडारण, संसाध्नों के उत्पादक देशों में मनपसंद सरकारों की बहाली तथा बहुराष्ट्रीय निगमों और अपने हितसाध्क अंतरार्ष्ट्रीय समझौतों को समथर्न देना शामिल है। पश्िचमी देशों के राजनीतिक चिंतन का वेंफद्रीय सरोकार यह था कि संसाध्नों तक पहुँच अबाध् रूप से बनी रहे क्योंकि सोवियत संघ इसे खतरे में डाल सकता था। एक बड़ी चिंता यह भी थी कि खाड़ी के देशों में मौजूद तेल तथा दक्ष्िाणी और पश्िचमी एश्िाया के देशों में मौजूद खनिज पर विकसित देशों का नियंत्राण बरकरार रहे। शीतयु( की समाप्ित और सोवियत संघ के विघटन के बाद सरकारों की मौजूदा चिंता सुरक्ष्िात आपूतिर् को बनाए रखने की है। अनेक खनिश ख़ासकर रेडियोध्मीर् खनिशों से जुड़े व्यावसायिक ़पैफसलों को लेकर भी सरकारों को चिंता सताती है। बहरहाल, वैश्िवक रणनीति में तेल लगातारसबसे महत्त्वपूणर् संसाध्न बना हुआ है। बीसवीं सदी के अध्िकांश समय में विश्व की अथर्व्यवस्था तेल पर निभर्र रही। यह एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँचाए जा सकने वाले ईंध्न के रूप में अपरिहायर् बना रहा। तेल के साथ विपुल संपदा जुड़ी है और इसी कारण इस पर कब्शा जमाने के लिए राजनीतिक संघषर् छिड़ता है। पेट्रोलियम का इतिहास यु( और संघषो± का भी इतिहास है। यह बात पश्िचम एश्िाया और मध्य एश्िाया में सबसे स्पष्ट रूप से नशर आती है। पश्िचम एश्िाया, ख़ासकर खाड़ी - क्षेत्रा विश्व के वुफल तेल - उत्पादन का 30 प्रतिशत मुहैया कराता है। इस क्षेत्रा में विश्व के ज्ञात तेल - भंडार का 64 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है और इस कारण यही एकलौता क्षेत्रा है जो तेल की माँगमें ख़ास बढ़ोत्तरी होने पर उसकी पूतिर् करसकता है। सऊदी अरब के पास विश्व के वुफल तेल - भंडार का एक चैथाइर् हिस्सा मौजूदहै। सऊदी अरब विश्व में सबसे बड़ा तेल - उत्पादक देश है। इराक का ज्ञात तेल - भंडारसऊदी अरब के बाद दूसरे नंबर पर है। इराक के एक बड़े हिस्से में तेल - भंडारों की मौजूदगी को लेकर खोज - बीन अभी नहीं हुइर् है। संभावना है कि इराक का तेल - भंडार 112 अरब बैरल से कहीं श्यादा हो। संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत में इस तेल की खपत होती है लेकिन ये देश इस इलाके से बहुत दूरी पर हैं। विश्व - राजनीति के लिए पानी एक औरमहत्त्वपूणर् संसाध्न है। विश्व के वुफछ भागों में सापफ पानी की कमी हो रही है। साथ ही, विश्व के हर हिस्से में स्वच्छ जल समान मात्रा में मौजूद नहीं है। इस कारण, संभावना है कि साझे जल - संसाध्न को लेकर पैदा तेल देखो, तेल की धर देखो...!! हमारे जीवन में पेट्रोलियम पर आधरित उत्पादों की कड़ी अंतहीन है। टूथपेस्ट, पेसमेकर, पेंट, स्याही...। दुनिया को परिवहन केलिए जितनी ऊजार् की शरूरत पड़ती है उसका 95 पफीसदी पेट्रोलियम से ही पूरा होता है। पूरी औद्योगिक दुनिया पेट्रोलियम के बूते टिकी है। हम इसके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। हालाँकि जमीन के नीचे अभी अरबों बैरल तेल हमारे इस्तेमाल के इंतजार में पड़ा है पिफर भी देशों के बीच विवाद है। मैं काला सोना मुल्क के शाही ख़ानदान से हूँ। मैं ही हूँ वह शख़्स जिसे लोग ध्नवुफबेर कहते हैं। जबसे मेरे मुल्क़ में काला सोना मिला है, मेरी सल्तनत में क़रामात हो रहे हैं। जनाब बिग आॅयल और उनकी हुवूफमत यहाँ एक रोश बड़ा ख़शाना खोजने आइर्। हमने तेल खोजा और सौदा पटा लिया। इन लोगों ने मुझे हथ्िायार दिए। इतने हथ्िायार कि उनका बोझ मुझे ही भारी लगने लगा है। हथ्िायारों से लदा - पफँदा मैं जब कभी दाँत निपोरता हूँ तो लोग अवाक् रह जाते हैं। उन लोगों ने हथ्िायार दिए और बदले में मैंने बिग आॅयल और उसके बेटे - पोतों को तेल और अपनी वप़फादारी दी। मैं खुशहाल और मालदार हूँ और वे भी मस्ती और मजे में हैं। अगर उनकी प़फौज मेरे मुल्क में गश्त कर रही है तो करे, मुझे क्या? बेशकीमती चीजों की मैं कद्र करता हूँ। बिग आॅयल कहते हैं कि उनके राष्ट्रपति आशादी शेख पैट्रो डाॅलर - उल्लाऔर जम्हूरियत को बड़ा कीमती मानते हैं इसीलिए मैंने भी अपने मुल्क में आजादी और जम्हूरियत को सात तालों के भीतर बंद करके रखा है। काला सोना मुल्क के सुल्तान एक दिन मैंने खुद से पूछा कि आख्िार मैं अपने मुल्क के किस काम आ सकता हूँ। मेरे मुल्क में तेल की भूख विकट है। वह कभी खत्म होने का नाम नहीं लेती, चलो, तो पिफर तेल का इंतजाम करते हैं। मैं बाजार की आशादी का हामी हूँ। मतलब यह कि दूर के देशों में तेल के वुफएँ खोदने की आशादीऋ ध्रती की आबो - हवा को मटियामेट करने की आशादी और ऐसे कठपुतले तानाशाहों की ताजपोशी की आशादी जो अपनी ही जनता पर कोड़े पफटकारे। हम कोइर् राजनीतिक दांवपेंच नहीं करते। चुनाव अभ्िायानों के वक्त हम रुपयों - पैसों से नेताओं की वुफछ मदद भर कर देते हैं। बदले में हम उनसे कहते हैं कि हमारी कंपनी में पैसे लगाओ। इस तरह हमें टीवी केजनाब बिग आॅयल कैमरों के सामने बेववूफपफों की तरह हँसने और हाथ हिलाने के करतब दिखा कर शमर्सार नहीं होना पड़ता।बिग आॅयल एंेर्ेड सस वफ सीइआहमारे गैराज में एक शानदार चीज नुमाया है। है ना? एकदम पतली, चकाचक और चमकीली कार। इसमें पाॅवर स्टेयरिंग और आॅटोमेटिक गेयसर् भी हैं। इसकी पिक - अप लाशवाब है और माइलेज के तो क्या कहने! इससे ध्ुआँ वगैरह भी कापफी कमनिकलता है। देख्िाए, हमें जल्दी - जल्दी पहुँचना है। हमें खूबसूरत जिंदगी की थोड़ी हड़बड़ी है। ऊपर वाला सबका भला करे। तो । हेु..चलंरर्श्री एवं श्रीमती बड़बोले जनाब तख़्तापलट आजादी और जम्हूरियत की हिप़फाजत की बात करते हैं। शायद इसी वजह से वे बंदूक और मिसाइल को लेकर बड़े दरियादिल हैं। ऐसी ही मिसाइल और बंदूवेंफ उन्होंने हमें रूसी भालुओं से लड़ने के लिए दी थीं। उन्होंने तो हमें लड़ने के दाँवपेंच भी सिखाए। हमें नहीं पता था कि ये लोग तेल के पीछे पड़े हैं। बिग आॅयल हमेशा मीठी - मीठी बातें करते हैं और मन मोह लेते हैं। लेकिन हम लोग अभी आपस में जंगों की कबड्डी खेल रहे हैं। अब हमने खेल के अपने ही नियम बना लिए हैं। जनाब तख़्तापलट की सरकार अपने कायदे - कानून बदलते रहती है। हमने कहा यह बात ठीक नहीं है। हमारे वुफछ लोग अब जनाब तख्तापलट, उनकी हुवूफमत और वहाँ के लोगों से नपफरत करने लगे हैं। मजा यह है कि तख़्तापलट को उसके ही खेल में जब मात देनी होती है तो उनके दिए़गोले - बारूद और मिसाइल हमारे लिए बड़े काम के साबित होते हैं। जनाब ग़्ालत - निशानची एरेस, केगल्स काटर्ून मतभेद 21वीं सदी में पफसाद की जड़ साबित हों। इस जीवनदायी संसाध्न को लेकर हिंसक संघषर् होने की संभावना है और इसी को इंगित करने के लिए विश्व - राजनीति के वुफछ विद्वानों ने ‘जलयु(’ शब्द गढ़ा है। मिसाल के लिए हम एक प्रचलित मतभेद की चचार् करें। जलधरा के उद्गम से दूर बसा हुआ देश उद्गम के नजदीक बसे हुए देश द्वारा इस पर बाँध् बनाने, इसके माध्यम से अत्यध्िक सिंचाइर्करने या इसे प्रदूष्िात करने पर आपिा जताता है क्योंकि ऐसे कामों से दूर बसे हुए देश को मिलने वाले पानी की मात्रा कम होगी या उसकी गुणवत्ता घटेगी। देशों के बीच स्वच्छ जल - संसाध्नों को हथ्िायाने या उनकी सुरक्षा करने के लिए हिंसक झड़पें हुइर् हैं। इसका एक उदाहरण है μ 1950 और 1960 के दशक में इशरायल, सीरिया तथा जाडर्न के बीच हुआ संघषर्। इनमें से प्रत्येक देश ने जाॅडर्न और यारमुक नदी से पानी का बहाव मोड़ने की कोश्िाश की थी। पिफलहाल तुकीर्, सीरिया और इराक के बीच पफरात नदी पर बाँध् के निमार्ण को लेकर एक - दूसरे से ठनी हुइर् है। बहुत से देशों के बीच नदियों का साझा है और उनके बीच सैन्य - संघषर् होते रहते हैं। मूलवासी ;प्दकपहमदवने च्मवचसमद्ध और उनके अध्िकार मूलवासियों का सवाल पयार्वरण, संसाध्न और राजनीति को एक साथ जोड़ देता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1982 में इनकी एक शुरुआती परिभाषा दी। इन्हें ऐसे लोगों का वंशज बताया गया जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे। पिफर किसी दूसरीसंस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से उस देश में आये और इन लोगों को अध्ीन बना लिया। किसी देश के ‘मूलवासी’ आज भी उस देश की संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से श्यादा अपनी परंपरा,सांस्कृतिक रिवाश तथा अपने ख़ास सामाजिक, आथ्िार्क ढरेर् पर जीवन - यापन करना पसंद करते हैं। भारत सहित विश्व के विभ्िान्न हिस्सों में मौजूद लगभग 30 करोड़ मूलवासियों के सवर्सामान्य हित विश्व - राजनीति के संदभर् में क्या हैं? पिफलीपिन्स के कोरडिलेरा क्षेत्रा में 20 लाख मूलवासी लोग रहते हैं। चिले में मापुशे नामक मूलवासियों की संख्या 10 लाख है। हमारे देश में भी पानी को लेकर बड़े झगड़े - टंटे चल रहे हैं। ये संघषर् उनसे किस तरह अलग है? आदिवासी जनता और उनके आंदोलनों के बारे में वुफछ श्यादा बातें क्यों नहीं सुनायी पड़तीं? क्या मीडिया का उनसे कोइर् मनमुटाव है? बांग्लादेश के चटगांव पवर्तीय क्षेत्रा में 6 लाखआदिवासी बसे हैं। उत्तर अमरीकी मूलवासियों की संख्या 3 लाख 50 हजार है। पनामा नहर के पूरब में वुफना नामक मूलवासी 50 हशार कीतादाद में हैं और उत्तरी सोवियत में ऐसे लोगों की आबादी 10 लाख है। दूसरे सामाजिक आंदोलनों की तरह मूलवासी भी अपने संघषर्, अजेंडा और अध्िकारों की आवाश उठाते हैं। विश्व - राजनीति में मूलवासियों की आवाश विश्व - बिरादरी में बराबरी का दशार् पाने के लिए उठी है। मूलवासियों के निवास वाले स्थान मध्य और दक्ष्िाण अमरीका, अप्रफीका, दक्ष्िाणपूवर् एश्िाया तथा भारत में है जहाँ इन्हें आदिवासी या जनजाति कहा जाता है। आॅस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत ओसियाना क्षेत्रा के बहुत से द्वीपीय देशों में हजारों सालों से पाॅलिनेश्िाया, मैलनेश्िाया और माइक्रोनेश्िाया वंश के मूलवासी रहते हैं। सरकारों से इनकी माँग है कि इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्रा पहचान रखने वाला समुदाय माना जाए। अपने मूल वासस्थान पर हक की दावेदारी में विश्वभर के मूलनिवासी यह जुमला इस्तेमाल करते हैं कि हम यहाँ ‘अनंत काल से रहते चले आ रहे हैं’। भौगोलिक रूप से चाहे मूलवासी अलग - अलग जगहों पर कायम हैं लेकिन जमीन और उस पर आधरित विभ्िान्न जीवन - प्रणालियों के बारे में इनकी विश्वदृष्िट आश्चयर्जनक रूप से एक जैसी है। भूमि की हानि का अथर् है, आथ्िार्क - संसाध्नों के एक आधर की हानि और यह मूलवासियों के जीवन के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। उस राजनीतिक आशादी का क्या मतलब जो जीने के लिए साध्न ही न मुहैया कराये? भारत में ‘मूलवासी’ के लिए अनुसूचित जनजाति या आदिवासी शब्द प्रयोग किया जाता है। ये वुफल जनसंख्या का आठ प्रतिशत हैं। अपवादस्वरूप वुफछेक घुमन्तू जनजातियों को छोड़ दें तो भारत की अध्िकांश आदिवासी जनता अपने जीवन - यापन के लिए खेती पर निभर्र हैं। सदियों से ये लोग बेध्ड़क जितनी बन पड़े उतनी जमीन पर खेती करते आ रहे थे। लेकिन, बि्रतानी औपनिवेश्िाक शासन कायम होने के बाद से जनजातीय समुदायों का सामना बाहरी लोगों से हुआ। एरेस, केगल्स काटर्ून हालाँकि राजनीतिक प्रतिनिध्ित्व के 1970 के दशक में विश्व के विभ्िान्न लिहाज से इनको संवैधनिक सुरक्षा हासिल भागों के मूलवासियों के नेताओं के बीच है लेकिन देश के विकास का इन्हें श्यादा संपवर्फ बढ़ा। इससे इनके साझे अनुभवों और लाभ नहीं मिल सका है। आजादी के बाद से सरोकारों को एक शक्ल मिली। 1975 में विकास की बहुत सी परियोजनाएँ चलीं और ‘वल्डर् काउंसिल आॅपफ इंडिजिनस पीपल’ का बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। ऐसी गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सबसे पहले परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह इस परिषद् को परामशर्दायी परिषद् का दशार् समुदाय सबसे बड़ा है। दरअसल इन लोगों ने दिया गया। इसके अतिरिक्त आदिवासियों के विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है। सरोकारों से संब( 10 अन्य स्वयंसेवी संगठनों मूलवासी समुदायों के अध्िकारों से जुड़े को भी यह दशार् दिया गया है। अगले अध्याय मुद्दे राष्ट्रीय और अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति में लंबे में वैश्वीकरण के विरोध् में चल रहे आंदोलन समय तक उपेक्ष्िात रहे हैं। हाल के दिनों में की चचार् की गइर् है। इनमें अनेक आंदोलनों ने इस सवाल पर ध्यान दिया जाने लगा है। मूलवासियों के अध्िकारों पर जोर दिया है। चरण ऽ हर छात्रा से कहें कि अपने रोजमरार् के इस्तेमाल की दस वस्तुओं की सूची बनाए। ;इस सूची में कलम/कागश/इरेजर/वंफप्यूटर/पानी आदि के नाम लिए जा सकते हैं।द्ध ऽ छात्रों से कहें कि वे इन वस्तुओं के निमार्ण में प्रयुक्त प्राकृतिक संसाध्नों की मात्रा का आकलन करें। कलम/कागज/वंफप्यूटर आदि बनी - बनायी चीश हो तो छात्रा इसमें लगे प्राकृतिक संसाध्न की मात्रा बतााएँ। अगर सूची में पानी या इस जैसी कोइर् चीज हो तो छात्रों से कहें कि प्रति गैलन पानी की पंपिंग और परिशोध्न में लगी बिजली की मात्रा की गणना करें। हर छात्रा आकलन करे और अंदाशे से एक मात्रा को लिखे। अध्यापकों के लिए ऽ हर छात्रा द्वारा बतायी गइर् संख्या को एकत्रा कर लें पिफर इसे जोड़ दें ताकि पता लगे कि उक्त कक्षा के छात्रों द्वारा संसाध्नों की कितनी मात्रा का उपयोग हुआ ;अध्यापक मदद करें और छात्रों को खुद से गणना करने देंद्ध। ऽ इसी विद्यालय की बाकी कक्षाओं से इस अभ्यास को जोड़ें पिफर देश के सभी विद्यालयों के लिए इसका आकलन करें। देश के स्तर पर जो आंकड़ा आए उसका इस्तेमाल दूसरे देशों के स्वूफल में उपभोग किए जा रहे संसाध्नों की मात्रा से तुलना करने में भी हो सकता है। ;अध्यापक के पास पहले से वुफछ चुनिन्दा देशों के छात्रों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे संसाध्नों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। देशों का चयन करते समय ध्यान रखें कि वे विकसित/विकासशील/अविकसित देशों में से होंद्ध ऽ छात्रों से कहें कि वे उस मात्रा का अनुमान लगाएँ जिसका हम उपभोग कर रहे हैं। उनसे भविष्य में किए जाने वाले उपभोग की मात्रा का अनुमान लगाने को कहें।

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