मेरी सुरक्षा के बारे में किसने पफैसला किया? वुफछ नेताओं और विशेषज्ञों ने? क्या मैं अपनी सुरक्षा का पफैसला नहीं कर सकती? सुरक्षा क्या है? सुरक्षा का बुनियादी अथर् है खतरे से आशादी। मानव का अस्ितत्व और किसी देश का जीवन खतरों से भरा होता है। तब क्या इसका मतलब यह है कि हर तरह के ख़तरे को सुरक्षा पर खतरा माना जाय? आदमी जब भी अपने घर से बाहर कदम निकालता है तो उसके अस्ितत्व अथवा जीवन - यापन के तरीकों को किसी न किसी अथर् में खतरा शरूर होता है। यदि हमने खतरे का इतना व्यापक अथर् लिया तो पिफर हमारी दुनिया में हर घड़ी और हर जगह सुरक्षा के ही सवाल नशर आयेंगे। इसी कारण जो लोग सुरक्षा विषयक अध्ययन करते हैं उनका कहना है कि केवल उन चीजों को ‘सुरक्षा’ से जुड़ी चीजों का विषय बनाया जाय जिनसे जीवन के ‘वेंफद्रीय मूल्यों’ को खतरा हो। तो पिफर सवाल बनता है कि किसके वेंफद्रीय मूल्य? क्या पूरे देश के ‘वेंफद्रीय मूल्य’? आम स्त्राी - पुरुषों के वेंफद्रीय मूल्य ? क्या नागरिकों की नुमाइंदगी करने वाली सरकार हमेशा ‘वेंफद्रीय मूल्यों’ का वही अथर् ग्रहण करती है जो कोइर् साधरण नागरिक? इसके अतिरिक्त जब हम वेंफद्रीय मूल्यों पर मंडराते ख़तरों की बात कहते हैं तो यह सवाल भी उठता है कि ये ख़तरे कितने गहरे होने चाहिए? जो मूल्य हमें प्यारे हैं कमोबेश उन सभी को बड़े या छोटे ख़तरे होते हैं। क्या हर ख़तरे को सुरक्षा की समझ में शामिल किया जा सकता है? जब भी कोइर् राष्ट्र वुफछ करता है अथवा वुफछ करने में असपफल होता है तो संभव है इससे किसी अन्य देश के वेंफद्रीय मूल्यों को हानि पहुँचती हो। जब भी राहगीर अपनी राह में लूटा जाता है तो आम आदमी के रोजमरार् के जीवन को क्षति पहुँचती है। पिफर भी, अगर हम सुरक्षा का इतना व्यापक अथर् करें तो हाथ - पांव हिलाना भी मुश्िकल हो जाएगाऋ हर जगह हमें ख़तरे नशर आएँगे। इस तरह देखें तो हम इन बातों से एक निष्कषर् निकाल सकते हैं। सुरक्षा का रिश्ता पिफर बड़े गंभीर खतरों से हैऋ ऐसे खतरे जिनको रोकने के उपाय न किए गए तो हमारे वेंफद्रीय मूल्यों को अपूरणीय क्षति पहुँचेगी। ये बातें तो ठीक हैं, पिफर भी हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि ‘सुरक्षा’ अपने आप में भुलैयादार धरणा है। मिसाल के लिए हम यह पूछ सकते हैं कि क्या सदियों अथवा दशकों से विभ्िान्न समाजों में सुरक्षा की एकसमान धरणा चली आ रही है? ऐसा हो तो आश्चयर्जनक है क्योंकि संसार में कितनी ही बातें रोज बदलती रहती हैं। पिफर हम यह सवाल भी कर सकते हैं कि क्या किसी ख़ास समय में विश्व के सभी समाजों में सुरक्षा की एक जैसी धरणा रहती है? यह बात भी हजम नहीं होती और आश्चयर्जनक लगती है कि करीब 200 मुल्कों के 7 अरब लोग सुरक्षा की एक जैसी धरणा रखते हों? ऐसे में आपको यह जानकार कोइर् ध्क्का नहीं लगेगा कि सुरक्षा एक विवादग्रस्त धरणाहै। आइए, सुरक्षा की विभ्िाÂ धरणाओं को दो कोटियों में रखकर समझने की कोश्िाश करते हैं यानी सुरक्षा की पारंपरिक और अपारंपरिक धरणा। पारंपरिक धरणा μ बाहरी सुरक्षा अध्िकांशतया जब हम सुरक्षा के बारे में वुफछ पढ़ या सुन रहे होते हैं तो हमारा सामना सुरक्षा की पारंपरिक अथार्त् राष्ट्रीय सुरक्षा की धरणा से होता है। सुरक्षा की पारंपरिक अवधरणा में सैन्य ख़तरे को किसी देश के लिए सबसे श्यादा ख़तरनाक माना जाता है। इस ख़तरे का स्रोत कोइर् दूसरा मुल्क होता है जो सैन्य हमले की ध्मकी देकर संप्रभुता, स्वतंत्राता और क्षेत्राीय अखंडता जसैे किसी देश के वेंफद्रीय मूल्यों के लिए ख़तरा पैदा करता है। सैन्य कारर्वाइर् से आम नागरिकों के जीवन को भी ख़तरा होता है। शायद ही कभी ऐसा होता हो कि किसी यु( में सिपफर् सैनिक घायल हों अथवा मारे जायें। आम स्त्राी - पुरुष को भी यु( में हानि उठानी पड़ती है। अक्सर निहत्थे और आम औरत - मदर् को जंग का निशाना बनाया जाता हैऋ उनका और उनकी सरकार का हौसला तोड़ने की कोश्िाश होती है। यु( की अथर्व्यवस्था बुनियादी तौर पर किसी सरकार के पास यु( की स्िथति में तीन विकल्प होते हैं μ आत्मसमपर्ण करना तथा दूसरे पक्ष की बात को बिना यु( किए मान लेना अथवा यु( से होने वाले नाश को इस हद तक बढ़ाने के संकेत देना कि दूसरा पक्ष सहमकर हमला करने से बाज आये या यु( ठन जाय तो अपनी रक्षा करना ताकि हमलावर देश अपने मकसद में कामयाब न हो सके और पीछे हट जाए अथवा हमलावार को पराजित कर देना। यु( में कोइर् सरकार भले ही आत्मसमपर्ण कर दे लेकिन वह इसे अपने देश की नीति के रूप में कभी प्रचारित नहीं करना चाहेगी। इस कारण, सुरक्षा - नीति का संबंध् यु( की आशंका को रोकने में होता है जिसे ‘अपरोध्’ कहा जाता है और यु( को सीमित रखने अथवा उसको समाप्त करने से होता है जिसे रक्षा कहा जाता है।परंपरागत सुरक्षा - नीति का एक तत्त्व और है। इसे शक्ित - संतुलन कहते हैं। कोइर् देश यु( का मतलब है असुरक्षा, विध्वंस और मृत्यु! यु( किसी को क्या सुरक्षा दे पाएगा? अपने अड़ोस - पड़ोस में देखने पर पाता है कि वुफछ मुल्क छोटे हैं तो वुफछ बड़े। इससे इशारा मिल जाता है कि भविष्य में किस देश से उसे खतरा हो सकता है। मिसाल के लिए कोइर् पड़ोसी देश संभव है यह न कहे कि वह हमले की तैयारी में जुटा है। हमले का कोइर् प्रकट कारण भी नहीं जान पड़ता हो। पिफर भी यह देखकर कि कोइर् देश बहुत ताकतवर है यह भांपा जा सकता है कि भविष्य में वह हमलावर हो सकता है। इस वजह से हर सरकार दूसरे देश से अपने शक्ित - संतुलन को लेकर बहुत संवेदनशील रहती है। कोइर् सरकार दूसरे देशों से शक्ित - संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में बैठाने के लिए जी - तोड़ कोश्िाश करती है। जो देश नजदीक हों, जिनके साथ अनबन हो या जिन देशों के साथ अतीत में लड़ाइर् हो चुकी हो उनके साथ शक्ित - संतुलन को अपने पक्ष में करने पर ख़ास तौर पर जोर दिया जाता है। शक्ित - संतुलन बनाये रखने की यह कवायद श्यादातर अपनी सैन्य - शक्ित बढ़ाने की होती है लेकिन आथ्िार्क औरप्रौद्योगिकी की ताकत भी महत्त्वपूणर् है क्योंकि सैन्य - शक्ित का यही आधर है।पारंपरिक सुरक्षा - नीति का चैथा तत्त्व है गठबंध्न बनाना। गठबंध्न में कइर् देश शामिल होते हैं और सैन्य हमले को रोकने अथवा उससे रक्षा करने के लिए समवेत कदम उठाते हैं। अध्िकांश गठबंध्नों को लिख्िात संध्ि से एक औपचारिक रूप मिलता है और ऐसे गठबंध्नों को यह बात बिलवुफल स्पष्ट रहती है कि खतरा किससे है। किसी देश अथवा गठबंध्न की तुलना में अपनी ताकत का असर बढ़ाने के लिए देश गठबंध्न बनाते हैं। गठबंधन राष्ट्रीय हितों पर आधरित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबंध्न भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमरीका ने सन् 1980 के दशक में सोवियत संघ के ख्िालापफ इस्लामी उग्रवादियों को समथर्न दिया लेकिन ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल - कायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितंबर 2001 के दिन उस पर हमला किया तो उसने इस्लामी उग्रवादियों के ख्िालापफ मोचार् खोल दिया। सुरक्षा की परंपरागत धरणा में माना जाता है कि किसी देश की सुरक्षा को श्यादातर ख़तरा उसकी सीमा के बाहर से होता है। इसकी वशह है अंतरार्ष्ट्रीय व्यवस्था। इस निमर्म मैदान में ऐसी कोइर् वेंफद्रीय ताकत नहीं जो देशों के व्यवहार - बरताव पर अंवुफश रखने में सक्षम हो। किसी देश के भीतर हिंसा के ख़तरों से निपटने के लिए एक जानी - पहचानी व्यवस्था होती है μ इसे सरकार कहते हैं। लेकिन, विश्व - राजनीति मेंऐसी कोइर् वेंफद्रीय सत्ता नहीं जो सबके ऊपर हो। यह सोचने का लालच हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ऐसी सत्ता है अथवा ऐसा बन सकता है। बहरहाल, पिफलहाल अपनी बनावट के अनुरूप संयुक्त राष्ट्रसंघ अपने सदस्य देशों का दास है और इसके सदस्य देश जितनी सत्ता इसको सौंपते और स्वीकारतेहैं उतनी ही सत्ता इसे हासिल होती है। अतः विश्व - राजनीति में हर देश को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होती है। पारंपरिक धरणा - आंतरिक सुरक्षा इतनी बातों को पढ़ने के बाद आपके जेहन में यह सवाल शरूर कौंध होगा कि क्या सुरक्षा आंतरिक शांति और कानून - व्यवस्था पर निभर्र नहीं करती? अगर किसी देश के भीतर रक्तपात हो रहा हो अथवा होने की आशंका हो तो वह देश सुरक्ष्िात कैसे हो सकता है? यह बाहर के हमलों से निपटने की तैयारी कैसे करेगा जबकि खुद अपनी सीमा के भीतर सुरक्ष्िात नहीं है? इसी कारण सुरक्षा की परंपरागत धरणा का शरूरी रिश्ता अंदरूनी सुरक्षा से भी है। दूसरे विश्वयु( के बाद से इस पहलू पर श्यादा जोर नहीं दिया गया तो इसका कारण यही था कि दुनिया के अध्िकांश ताकतवर देश अपनी अंदरूनी सुरक्षा के प्रति कमोबेश आश्वस्त थे। हमने पहले कहा था कि संदभर् और स्िथति को नशर में रखना शरूरी है। आंतरिक सुरक्षा ऐतिहासिक रूप से सरकारों का सरोकार बनी चली आ रही थी लेकिन दूसरे विश्वयु( के बाद ऐसे हालात और संदभर् सामने आये कि आंतरिक सुरक्षा पहलेकी तुलना में कहीं कम महत्त्व की चीज बन गइर्। सन् 1945 के बाद ऐसा जान पड़ा कि संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघअपनी सीमा के अंदर एकीकृत और शांति संपन्न हैं। अध्िकांश यूरोपीय देशों, खासकर ताकतवर पश्िचमी मुल्कों के सामने अपनी सीमा के भीतर बसे समुदायों अथवा वगोर्ं से कोइर् गंभीर खतरा नहीं था। इस कारण इन देशों ने अपना ध्यान सीमापार के खतरों पर वेंफ्रित किया। इन देशों के सामने बाहरी खतरे क्या थे? यहाँ पर पिफर हमें संदभर् और स्िथति पर ध्यान देना होगा। हम इस बात को जानते हैं कि दूसरे विश्वयु( के बाद शीतयु( का दौर चला और इस दौर में संयुक्त राष्ट्र अमरीका के नेतृत्व वाला पश्िचमी गुट तथा सोवियत संघ की अगुआइर् वाला साम्यवादी गुट एक - दूसरे के आमने - सामने थे। सबसे बड़ी बात यह किदोनों गुटों को अपने ऊपर एक - दूसरे से सैन्य हमले का भय था। इसके अतिरिक्त, वुफछ यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों मेंउपनिवेशीकृत जनता से खून - खराबे की चिंता सता रही थी। अब ये लोग आशादी चाहते थे। इस सिलसिले में हम याद करें कि 1950 के दशक में प्रफांस को वितयनाम अथवा सन् 1950 और 1960 के दशक में बि्रटेन को केन्या में जूझना पड़ा। उपनिवेशों ने 1940 के दशक के उत्तरा(र् से आजाद होना शुरू किया और उनके सुरक्षा - सरोकार अक्सर यूरोपीय ताकतों के समान ही थे। वुफछ नव स्वतंत्रा देश यूरोपीय ताकतों के समान शीतयु(कालीन गुटों में एक न एक के सदस्य बन गए। ऐसे में इन देशों को जोर पकड़ते शीतयु( की चिंता करनी थी और दूसरे खेमे में जाने वाले अपने पड़ोसी देश अथवा दूसरे गुट के नेता ;संयुक्त राज्य अमरीका अथवा सोवियत संघद्ध से दुश्मनी ठाननी थी या अमरीका अथवा सोवियत संघ के किसी साथी देश से वैर मोलना था। दूसरे विश्वयु( के बाद जितने यु( हुए उसमें एक तिहाइर् जो अपने ही देश के ख्िालापफ लड़ते हैं निश्िचत ही वे किन्हीं बातों से नाखुश होते हैं। शायद यह उनकी असुरक्षा ही है जो देश के लिए असुरक्षा पैदा करती है। यु(ों के लिए शीतयु( जिम्मेदार रहा। इनमें से अध्िकांश यु( तीसरी दुनिया में हुए। जिस तरह विदा होती औपनिवेश्िाक ताकतों को उपनिवेशों में खून - खराबे का भय सता रहा था उसी तरह आजादी के बाद वुफछ उपनिवेश्िात मुल्कों को डर था कि उनके यूरोपीय औपनिवेश्िाक शासक कहीं उन पर हमला न बोल दें। ऐसे में इन मुल्कों को एक साम्राज्यवादी यु( से अपनी रक्षा के लिए तैयारी करनी पड़ी। एश्िाया और अप्रफीका के नव स्वतंत्रा देशों के सामने खड़ी सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोपीय देशों के मुकाबले दो मायनों में विश्िाष्ट थीं। एक तो इन देशों को अपने पड़ोसी देश से सैन्य हमले की आशंका थी। दूसरे, इन्हें अंदरूनी सैन्य - संघषर् की भी चिंता करनी थी। इन देशों को सीमापार से खतरा तो था ही, खासकर पड़ोसी देशों सेऋ साथ ही भीतर से भी खतरे की आशंका थी। अनेक नव स्वतंत्रा देश संयुक्त राज्य अमरीका या सोवियत संघ अथवा औपनिवेश्िाक ताकतों से कहीं श्यादा अपने पड़ोसी देशों से आशंकित थे। इनके बीच सीमा रेखा और भूक्षेत्रा अथवा आबादी पर नियंत्राण को लेकर या एक - एक करके सभी सवालों पर झगड़े हुए। अलग राष्ट्र बनाने पर तुले अंदर के अलगाववादी आंदोलनों से भी इन देशों को खतरा था। कोइर् पड़ोसी मुल्क ऐसे अलगाववादी आंदोलन को हवा दे अथवा उसकी सहायता करे तो दो पड़ोसी देशों के बीच तनाव की स्िथति बनती थी ;विश्व के सशस्त्रा संघषोर्ं में 95 प्रतिशत अब आंतरिक यु( के अंतगर्त हैं। सन् 1946 से 1991 के बीच गृह यु(ों की संख्या में दोगुनी वृि हुइर् है जो पिछले 200 वषोर्ं में सबसे लंबी छलांग है।द्ध इस तरह, पड़ोसी देशों से यु( और आंतरिक संघषर् नव - स्वतंत्रा देशों के सामने सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती थे। सुरक्षा के पारंपरिक तरीके सुरक्षा की परंपरागत धरणा में स्वीकार किया जाता है कि हिंसा का इस्तेमाल यथासंभव सीमित होना चाहिए। यु( के लक्ष्य और साधन दोनों से इसका संबंध् है। ‘न्याय - यु(’ की यूरोपीय परंपरा का ही यह परवतीर् विस्तार है कि आज लगभग पूरा विश्व मानता है कि किसी देश को यु( उचित कारणों यानी आत्म - रक्षा अथवा दूसरों को जनसंहार से बचाने के लिए ही करना चाहिए। इस दृष्िटकोण के अनुसार किसी यु( में यु( - साध्नों का सीमित इस्तेमाल होना चाहिए। यु(रत् सेना को चाहिए कि वह संघषर्विमुख शत्राु, निहत्थे व्यक्ित अथवा आत्मसपमर्ण करने वाले शत्राु को न मारे। सेना को उतने ही बल का प्रयोग करना चाहिए जितना आत्मरक्षा के लिए शरूरी हो और उसे एक सीमा तक ही हिंसा का सहारा लेना चाहिए। बल प्रयोग तभी किया जाय जब बाकी उपाय असपफल हो गए हों। सुरक्षा की परंपरागत धरणा इस संभावना से इन्कार नहीं करती कि देशों के बीच एक न एक रूप में सहयोग हो। इनमें सबसेमहत्त्वपूणर् है μ निरस्त्राीकरण, अस्त्रा - नियंत्राण तथा विश्वास की बहाली। निरस्त्राीकरण की माँग होती है कि सभी राज्य चाहे उनका आकार, ताकत और प्रभाव वुफछ भी हो, वुफछ खास किस्म के हथ्िायारों से बाज आयें। उदाहरण के लिए, 1972 की जैविक हथ्िायार संध्ि ;बाॅयोलाॅजिकल वीपन्स वंफवेंशन ठॅब्द्ध तथा 1992 की रासायनिक हथ्िायार संध्ि ;केमिकल वीपन्स कंवेंशन - ब्ॅब्द्ध में ऐसे हथ्िायार को बनाना और रखना प्रतिबंध्ित कर दिया गया है। 155 से श्यादा देशों ने ठॅब् संध्ि पर और 181 देशों ने ब्ॅब् संध्ि पर हस्ताक्षर किए हैं। इन दोनों संध्ियों पर दस्तख़्त करने वालों में सभी महाशक्ितयाँ शामिल हैं। लेकिन महाशक्ितयाँ μ अमरीका तथा सोवियत संघ सामूहिक संहार के अस्त्रा यानी परमाण्िवक हथ्िायार का विकल्प नहीं छोड़ना चाहती थीं इसलिए दोनों ने अस्त्रा - नियंत्राण का सहारा लिया। अस्त्रा नियंत्राण के अंतगर्त हथ्िायारों को विकसित करने अथवा उनको हासिल करने के संबंध् में वुफछ कायदे - कानूनों का पालन करना पड़ता है। सन् 1972 की एंटी बैलेस्िटक इस चित्रा के भीतर लिखा है μ क्या देश पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं? अगर इसमें आप कोइर् पैफसला नहीं कर पा रहे तो गृह रक्षा - विभाग के इस आतंकमापी का इस्तेमाल करें। यह मीटर आपको बताता है कि देश पर आतंक का साया कितना घना है। आतंकसूचक सूइर् को ऊपर दिए गए खानों में से किसी एक पर ले जायें जो आपके जानते मौजूदा खौप़्ाफ की सही तस्वीर पेश करता हो। इससे पता चलेगा कि अमरीकी जनता आतंकी हमले को लेकर कितनी आशंकित है। आतंक हमारे हर तरपफ है और वह कभी भी हम पर झपट सकता है। इस आतंकमापी के बूते आपको पता चल जाएगा कि आपको कितना भयभीत रहना है। सावधनीपूवर्क सूइर् घुमाएँय् मिसाइल संध्ि ;।ठडद्ध ने अमरीका और सोवियत संघ को बैलेस्िटक मिसाइलों को रक्षा - कवच के रूप में इस्तेमाल करने से रोका। ऐसे प्रक्षेपास्त्रों से हमले की शुरुआत की जा सकती थी। संध्ि में दोनों देशों को सीमित संख्या में ऐसी रक्षा - प्रणाली तैनात करने की अनुमति थी लेकिन इस संध्ि ने दोनों देशों को ऐसी रक्षा - प्रणाली के व्यापक उत्पादन से रोक दिया। जैसा कि हमने अध्याय एक में देखा है, अमरीका और सोवियत संघ ने अस्त्रा - नियंत्राण की कइर् अन्य संध्ियों पर हस्ताक्षर किए जिसमें सामरिक अस्त्रा परिसीमन संध्ि - 2 ;स्टैªटजिक आम्सर् लिमिटेशन ट्रªीटी - ै।स्ज् प्प्द्ध और सामरिक अस्त्रा न्यूनीकरण संध्ि ;स्टेªटजिक आम्सर् रिडक्शन ट्रीटी - ;ैज्।त्ज्द्ध शामिल हैं। परमाणु अप्रसार संध्ि ;न्यूक्िलयर नाॅन प्रोलिपफेरेशन ट्रीटी - छच्ज् ;1968द्ध भी एक वाह रे! पहले तो इन लोगों ने ये मारक और महंगे हथ्िायार बनाए, पिफर इन हथ्िायारों से खुद को बचाने के लिए ये जटिल संध्ियाँ कीं। इसे कहते हैं सुरक्षा! जाएँ तो जाएँ कहाँ क्या हमें शांति विभाग के लिए वुफछ लाख डाॅलर मिल सवफते हैं। अथर् में अस्त्रा नियंत्राण संध्ि ही थी क्योंकि इसने परमाण्िवक हथ्िायारों के उपाजर्न को कायदे - कानून के दायरे में ला खड़ा किया। जिन देशों ने सन् 1967 से पहले परमाणु हथ्िायार बना लिये थे या उनका परीक्षण कर लिया था उन्हें इस संध्ि के अंतगर्त इन हथ्िायारों को रखने की अनुमति दी गइर्। जो देश सन् 1967 तक ऐसा नहीं कर पाये थे उन्हें ऐसे हथ्िायारों को हासिल करने के अध्िकार से वंचित किया गया। परमाणु अप्रसार संध्ि ने परमाण्िवक आयुधें को समाप्त तो एंडी सिंगर है। संक्षेप में कहें तो विश्वासी बहाली की प्रिया यह सुनिश्िचत करती है कि प्रतिद्वन्द्वी देश किसी ग़्ालतपफहमी या गपफलत में पड़कर जंग के लिए आमादा न हो जाएँ। वुफल मिलाकर देखें तो सुरक्षा की परंपरागत धरणा मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा सैन्य बल के प्रयोग की आशंका से संब( है। सुरक्षा की पारंपरिक शांति - अहिंसाअहिंसा विभागविध्ेयक पारितकी स्थापनाकरो 300 अरबकरो। डाॅलर इराक यु( नहीं किया लेकिन इन्हें हासिल कर सकने वाले देशों की संख्या शरूर कम की। सुरक्षा की पारंपरिक धरणा में यह बात भी मानी गइर् है कि विश्वास बहाली के उपायों से देशों के बीच हिंसाचार कम किया जा सकता है। विश्वास बहाली की प्रिया में सैन्य टकराव और प्रतिद्वन्िद्वता वाले देश सूचनाओं तथा विचारों के नियमित आदान - प्रदान का पफैसला करते हैं। दो देश एक - दूसरे को अपने पफौजी मकसद तथा एक हद तक अपनी सैन्य योजनाओं के बारे में बताते हैं। ऐसा करके ये देश अपने प्रतिद्वन्द्वी को इस बात का आश्वासन देते हैं कि उनकी तरपफ से औचक हमले की योजना नहीं बनायी जा रही। देश एक - दूसरे को यह भी बताते हैं कि उनके पास किस तरह के सैन्य - बल हैं। वे यह भी बता सकते हैं कि इन बलों को कहाँ तैनात किया जा रहा धरणा में माना जाता है कि सैन्य बल से425 अरब सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बलसालाना रक्षा विभाग से ही सुरक्षा को कायम रखा जा सकता है।एंडी सिंगर, केगल्स काटर्ून100 अरब सुरक्षा की अपारंपरिक धरणाआंतरिक सुरक्षा 2 अपफगान यु( 40 अरब अरब सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा सिपफर् सैन्य खतरों से संब( नहीं। इसमें मानवीय अस्ितत्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों और आशंकाओं को शामिल किया जाता है।अमरीका में सुरक्षा पर तो भारी - भरकम खचर् होता है जबकि शांति से जुड़े इसकी शुरुआत होती है पारंपरिक सुरक्षा कीमामलों पर बहुत कम ही खचर् किया जाता है। यह काटूर्न इस स्िथति पर एक टिप्पणी करता है। क्या हमारे देश में हालत इससे वुफछ अलग है? धरणा के भीतर स्वीकार किए गए संदभीर् ;सुरक्षा किसकी?द्ध पर सवाल उठाकर। ऐसाकरते हुए सुरक्षा के तीन और तत्त्वों μ किन चीजों की सुरक्षा, किन खतरों से सुरक्षा और सुरक्षा के तरीके पर भी प्रश्नचिह्न लगाया जाता है। जब हम संदभीर् की बात करते हैं तो हमारा आशय होता है μ ‘सुरक्षा किसको चाहिए? सुरक्षा की पारंपरिक धरणा में भूक्षेत्रा और संस्थाओं सहित राज्य को संदभीर् माना जाता है। सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा में संदभीर् का दायरा बड़ा होता है। जब हम पूछते हैं कि ‘सुरक्षा किसको’? तो सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा के प्रतिपादकों का जवाब होता है μ ‘‘सिपफर् राज्य ही नहीं व्यक्ितयों और समुदायों या कहें कि समूची मानवता को सुरक्षा की शरूरत है।’’ इसी कारण सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा को ‘मानवता की सुरक्षा’ अथवा ‘विश्व - रक्षा’ कहा जाता है। मानवता की रक्षा का विचार जनता - जनादर्न की सुरक्षा को राज्यों की सुरक्षा से बढ़कर मानता है। मानवता की सुरक्षा और राज्य की सुरक्षा एक - दूसरे के पूरक होने चाहिए और अक्सर होते भी हैं। लेकिन सुरक्ष्िात राज्य का मतलब हमेशा सुरक्ष्िात जनता नहीं होता। नागरिकों को विदेशी हमले से बचाना भले ही उनकी सुरक्षा की शरूरीशत्तर् हो लेकिन इतने भर को पयार्प्त नहीं माना जा सकता। सच्चाइर् यह है कि पिछले 100 वषोर्ं में जितने लोग विदेशी सेना के हाथों मारे गए उससे कहीं श्यादा लोग खुद अपनी ही सरकारों के हाथों खेत रहे। मानवता की सुरक्षा के सभी पैरोकार मानते हैं कि इसका प्राथमिक लक्ष्य व्यक्ितयों की संरक्षा है। बहरहाल, इस बात पर मतभेद है कि ठीक - ठीक ऐसे कौन - से खतरे हैं जिनसे व्यक्ितयों को बचाया जाना चाहिए। मानवता की सुरक्षा का संकीणर् अथर् लेने वाले पैरोकारों का जोर व्यक्ितयों को हिंसक खतरों यानी खून - खराबे से बचाने पर होता है या संयुक्त राष्ट्रसंघ के भूतपूवर् महासचिव कोप़्ाफी अÂान के शब्दों में कहें तो ऐसे पैरोकारों का आशय होता है ‘व्यक्ितयों और समुदायों को अंदरूनी खून - खराबा से बचाना।’ मानवता की सुरक्षा का व्यापक अथर् लेने वाले पैरोकारों का तवर्फ है कि खतरों की सूची में अकाल, महामारी और आपदाओं को भी शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि यु(, जन - संहार और आतंकवाद साथ मिलकर जितने लोगों को मारते हैं उससे कहीं श्यादा लोग अकाल, महामारी औरप्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ जाते हैं। मानवता की सुरक्षा के व्यापकतम अथर् में आथ्िार्क सुरक्षा और मानवीय गरिमा की सुरक्षा को भी शामिल किया जाता है। तनिक अलग अंदाज में कहें तो मानवता की रक्षा के व्यापकतम नशरिए में जोर ‘अभाव से मुक्ित’ और ‘भय से मुक्ित’ पर दिया जाता है। विश्वव्यापी खतरे जैसे वैश्िवक तापवृि ;ग्लोबल वामिर्ंगद्ध, अंतरार्ष्ट्रीय आतंकवाद तथाएड्स और बडर् फ्रलू जैसी महामारियों के अब लग रहा है कि बात हो रही है! इसे ही मैं सचमुच के आदमी के लिए सचमुच की सुरक्षा कहता हूँ। मानवाध्िकारों के उल्लंघन की बात हो तो हम हमेशा बाहर क्यों देखते हैं? क्या हमारे अपने देश में इसके उदाहरण नहीं मिलते? मद्देनशर 1990 के दशक में विश्व - सुरक्षा की धरणा उभरी। कोइर् भी देश इन समस्याओं का समाधन अकेले नहीं कर सकता। ऐसा भी हो सकता है कि किन्हीं स्िथतियों में किसी एक देश को इन समस्याओं की मार बाकियों की अपेक्षा श्यादा झेलनी पड़े। उदाहरण के लिए, वैश्िवक तापवृि से अगर समुद्रतल दो मीटरऊँचा उठता है तो बांग्लादेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगाऋ कमोबेश पूरा मालदीव सागर में समा जाएगा और थाइलैंड की 50 पफीसदी आबादी को खतरा पहुँचेगा। चूँकि इनसमस्याओं की प्रकृति वैश्िवक है इसलिएअंतरार्ष्ट्रीय सहयोग अत्यंत महत्त्वपूणर् हो जाता है, भले ही इसे हासिल करना मुश्िकल हो। खतरे के नये स्रोत सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा के दो पक्ष हैंμ मानवता की सुरक्षा और विश्व सुरक्षा। ये दोनोंसुरक्षा के संदभर् में खतरों की बदलती प्रकृति पर जोर देते हैं। हम नीचे के खंड में ऐसे वुफछ खतरों की चचार् करेंगे। आतंकवाद का आशय राजनीतिक खून - खराबे से है जो जान - बूझकर और बिना किसी मुरौव्वत के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। अंतरार्ष्ट्रीय आतंकवाद एक से श्यादा देशों में व्याप्त है और उसके निशाने पर कइर् देशों के नागरिक हैं। कोइर् राजनीतिक संदभर् या स्िथति नापसंद हो तो आतंकवादी समूह उसे बल - प्रयोग अथवा बल - प्रयोग की ध्मकी देकर बदलना चाहते हैं। जनमानस को आतंकित करने के लिए नागरिकों को निशाना बनाया जाता है और आतंकवाद नागरिकों के असंतोष का इस्तेमाल राष्ट्रीय सरकारों अथवा संघषो± में शामिल अन्य पक्ष के ख्ि़ालापफ करता है। आतंकवाद के चिर - परिचित उदाहरण हैं विमान - अपहरण अथवा भीड़ भरी जगहों जैसे रेलगाड़ी, होटल, बाशार या ऐसी ही अन्य जगहों पर बम लगाना। सन् 2001 के 11 सितंबर को आतंकवादियों ने अमरीका के वल्डर् ट्रेड सेंटर पर हमला बोला। इस घटना के बाद से दूसरे मुल्क और वहाँ की सरकारें आतंकवाद पर श्यादा ध्यान देने लगी हैं। बहरहाल, आतंकवाद कोइर् नयी परिघटना नहीं है। गुजरे वक्त में आतंकवाद की अध्िकांश घटनाएँ मध्यपूवर्, यूरोप, लातिनी अमरीका और दक्ष्िाण एश्िाया में हुईं। मानवाध्िकार μ मानवाध्िकार को तीन कोटियों में रखा गया है। हो सकता है आपको लगे कि मानवाध्िकारों की इससे कहीं श्यादा कोटियाँ हो सकती हैं लेकिन इन तीनों कोटियों से मानवाध्िकार विषयक चचार् की शुरुआत की जा सकती है। पहली कोटि राजनीतिक अध्िकारों की है जैसे अभ्िाव्यक्ित और सभा करने की आशादी। दूसरी कोटिटेब, केगल्स काटर्ून आथ्िार्क और सामाजिक अध्िकारों की है।अध्िकारों की तीसरी कोटि में उपनिवेशीकृत जनता अथवा जातीय और मूलवासी अल्पसंख्यकों के अध्िकार आते हैं। इस वगीर्करण को लेकर व्यापक सहमति है लेकिन इस बात पर सहमति नहीं बन पायी है कि इनमें से किस कोटि के अध्िकारों को सावर्भौम मानवाध्िकारों की संज्ञा दी जाए या इन अध्िकारों के उल्लंघन की स्िथति में अंतरार्ष्ट्रीय बिरादरी को क्या करना चाहिए? 1990 के दशक से वुफछ घटनाओं मसलन रवांडा में जनसंहार, वुफवैत पर इराक का हमला और पूवीर् तिमूर में इंडोनेश्िायाइर् सेना के रक्तपात के कारण बहस चल पड़ी है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ को मानवाध्िकारों के हनन की स्िथति में हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं। वुफछ का तवर्फ है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का घोषणापत्रा अंतरार्ष्ट्रीय बिरादरी को अध्िकार देता है कि वह मानवाध्िकारों की रक्षा के लिए हथ्िायार उठाये। दूसरी तरपफ वुफछ ऐसे भी हैं जिनका तवर्फ है कि संभव है, ताकतवर देशों के हितों से यह निधर्रित हातेा हो कि संयुक्त राष्ट्रसंघ मानवाध्िकार - उल्लंघन के किस मामले में कारर्वाइर् करेगा और किसमें नहीं। खतरे का एक और स्रोत वैश्िवक निध्र्नता है। विश्व की जनसंख्या पिफलहाल 6 अरब 20 करोड़ है और अगले 25 वषो± में यह 7 से 8 अरब तक हो जाएगी। संभव है यह आँकड़ा 9 - 10 अरब तक पहँुच जाए। पिफलहाल विश्व की वुफल आबादी - वृि का 50 पफीसदी सिपफर् 6 देशों - भारत, चीन, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश और इंडोनेश्िाया में घटित हो रहा है। अनुमान है कि अगले 50 सालों में दुनिया के सबसे गरीब देशों में जनसंख्या तीन गुनी बढ़ेगी जबकि इसी अवध्ि में अनेक धनी देशों की जनसंख्या घटेगी। प्रति व्यक्ित उच्च खुशहाली और बदहाली का करीबी रिश्ता क्या गैर - बराबरी के बढ़ने का सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर वुफछ असर पड़ता है? आय और जनसंख्या की कम वृि के कारण ध्नी देश अथवा सामाजिक समूहों को और ध्नी बनने में मदद मिलती है जबकि प्रति व्यक्ित निम्न आय और जनसंख्या की तीव्र वृि एक साथ मिलकर गरीब देशों और सामाजिक समूहों को और ग़्ारीब बनाते हैं।विश्वस्तर पर यह असमानता उत्तरी गोला(र् के देशों को दक्ष्िाणी गोला(र् के देशों से अलग करती है। दक्ष्िाण गोला(र् के देशों में असमानता अच्छी - खासी बढ़ी है। यहाँ वुफछ देशों नेआबादी की रफ्रतार को काबू में किया है और आय को बढ़ाने में सपफल रहे हैं जबकि बाकी देश ऐसा नहीं कर पाये हैं। उदाहरण के लिए दुनिया में सबसे श्यादा सशस्त्रा संघषर् अप्रफीका के सहारा मरुस्थल के दक्ष्िाणवतीर् देशों में होते हैं। यह इलाका दुनिया का सबसे गरीब इलाका है। 21वीं सदी के शुरुआती समय में इस इलाके के यु(ों मेें शेष दुनिया की तुलना में कहीं श्यादा लोग मारे गए। दक्ष्िाणी गोला(र् के देशों में मौजूद गरीबी के कारण अध्िकाध्िक लोग बेहतर जीवन खासकर आथ्िार्क अवसरों की तलाश में स्वास्थ्य की दशा पर पड़ता है। अप्रफीका का एक मानचित्रा लीजिए और जनता की सुरक्षा पर मंडराते विभ्िान्न खतरों को इस मानचित्रा पर चिित कीजिए। लगभग उन सभी समाजों में जहाँ औसत आयु - प्रत्याशा 70 वषर् से श्यादा है - निजी आय 1000 डाॅलर से अध्िक है। पिफर भी..सन 1975 में इन देशों में आयु - प्रत्याशा और आमदनी का एक ब्यौरा ब्राजील μ 61 वषर् और 750 डाॅलर लीबिया μ 53 वषर् और 3000 डाॅलर ाकडये अ़ँे बँटवारा जिस ढंग से होता है उसका गहरा असर समाज के सहारा मरुस्थल के दक्ष्िाणवतीर् देश μ 40 वषर् स्वीडन μ 1000 से 3 विकसित देश ;औसतद्ध μ 100 में 1 भारतीय उपमहाद्वीप μ 7 में 1 अÚीका के वुफछ हिस्सों में μ 5 से 1 भोजन के अभाव, सापफ - सपफाइर् की कमी और अपयार्प्त चिकित्सीय देखभाल की वजहों से बच्चे और श्िाशु श्यादा चपेट में आते हैं। दिखाते हैं कि किसी देश में आय और सेवाओं का उत्तरी गोला(र् के देशों में प्रवास कर रहे हैं। इससे अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद उठ खड़ा हुआ है। अंतरार्ष्ट्रीय कायदे कानून आप्रवासी ;जो अपनी मजीर् से स्वदेश छोड़तेहैंद्ध और शरणाथीर् ;जो यु(, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण स्वदेश छोड़ने पर मशबूर होते हैंद्ध में भेद करते हैं। सामान्यतया उम्मीद की जाती है कि कोइर् राज्य शरणाथ्िार्यों को स्वीकार करेगा लेकिन उन्हें आप्रवासियों को स्वीकारने की बाध्यता नहीं होती। शरणाथीर् अपनी जन्मभूमि को छोड़ते हैं जबकि जो लोग अपना घर - बार छोड़ चुके हैं परंतु राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं उन्हें फ्आंतरिक रूप से विस्थापित जनय् कहा जाता है। 1990 के दशक के शुरुआती सालों में हिंसा से बचने के लिए कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडित वुफल 60 जगहों से शरणाथीर् प्रवास करने को मजबूर हुए और इसमें तीन को छोड़कर शेष सभी के मूल में सशस्त्रा संघषर् था।एचआइर्वी - एड्स, बडर् फ्रलू और सासर् ;सिवियर एक्यूट रेसपिरेटॅरी सिंड्रोम - ै।त्ैद्ध जैसी महामारियाँ आप्रवास, व्यवसाय, पयर्टन और सैन्य - अभ्िायानों के जरिए बड़ी तेजी से विभ्िान्न देशों में पफैली हैं। इन बीमारियों के पफैलाव को रोकने में किसी एक देश की सपफलता अथवा असपफलता का प्रभाव दूसरे देशों में होने वाले संक्रमण पर पड़ता है। अनुमान है कि 2003 तक पूरी दुनिया में 4 करोड़ लोग एचआइर्वी - एड्स से संक्रमित हो चुके थे। इसमें दो - तिहाइर् लोग अप्रफीका में रहते हैं जबकि शेष के 50 पफीसदीदक्ष्िाण एश्िाया में। उत्तरी अमरीका तथा दूसरे औद्योगिक देशों में उपचार की नयी विध्ियोंके कारण 1990 के दशक के उत्तरा(र् के वषोर्ं में एचआइर्वी एड्स से होने वाली मृत्यु की दर में तेजी से कमी आयी है। लेकिन अप्रफीका जैसे गरीब इलाके के लिए ये़उपचार कीमत को देखते हुए आकाश - वुफसुम कहे जाएँगे जबकि अप्रफीका को श्यादागरीब बनाने में एचआइर्वी - एड्स महत्त्वपूणर् घटक साबित हुआ है। एबोला वायरस, हैन्टावायरस और हेपेटाइटिस - सी जैसी वुफछ नयी महामारियाँ उभरी हैं जिनके बारे में जानकारी भी वुफछ खास नहीं है। टीबी, मलेरिया, डेंगी बुखार और हैजा जैसी पुरानी महामारियों ने औषध्ि - प्रतिरोध्क रूप धरण कर लिया है और इससे इनका उपचार कठिन हो गया है। जानवरों में महामारी पफैलने के भारी आथ्िार्कदुष्प्रभाव होते हैं। 1990 के दशक के उत्तरा(र्के सालों से बि्रटेन ने ‘मैड - काऊ’ महामारी के भड़क उठने के कारण अरबों डाॅलर का नुकसान उठाया है और बडर् फ्रलू के कारण कइर् दक्ष्िाण एश्िायाइर् देशों को मुगर् - नियार्त बंद करना पड़ा। ऐसी महामारियाँ बताती हैं कि देशों के बीच पारस्पारिक निभर्रता बढ़ रही है और राष्ट्रीय सीमाएँ अब पहले की तुलना में कम साथर्क रह गइर् हैं। इन महामारियों का संकेत है कि अंतरार्ष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाने की शरूरत है। सुरक्षा की धरणा में विस्तार करने का यह मतलब नहीं है कि हम हर तरह के कष्ट या बीमारी को सुरक्षा विषयक चचार् के दायरे में शामिल कर सकते हैं। अगर हम ऐसा करते हैं तो सुरक्षा की धरणा में संगति नहीं रह जाती। ऐसे में हर चीज सुरक्षा का मसला हो सकती है। इसी कारण किसी मसले को सुरक्षा कामसला कहलाने के लिए एक सवर् स्वीकृत न्यूनतम मानक पर खरा उतरना शरूरी है। मिसाल के लिए, अगर किसी मसले से संदभीर् ;राज्य अथवा जनसमूहद्ध के अस्ितत्व को खतरा हो रहा हो तो उसे सुरक्षा का मसलाकहा जा सकता है चाहे इस खतरे की प्रकृति वुफछ भी हो। उदाहरण के लिए मालदीव को ूूूण्नदीमतण्वतह से साभार अंध विश्व वैश्िवक तापवृि से खतरा हो सकता हैक्योंकि समुद्र तल के ऊँचा उठने से इसका श्यादातर हिस्सा डूब जाएगा जबकि दक्ष्िाणी अप्रफीकी देशों में एचआइर्वी - एड्स से गंभीर खतरा है क्योंकि यहाँ हर 6 वयस्क व्यक्ित में एक इस रोग ;बोस्तवाना की हालत सबसे बदतर है। वहाँ 3 में से एक व्यक्ित एचआइर् - एड्स पीडि़त हैद्ध से पीडि़त है। 1994 में रवांडा की तुत्सी जनजाति के अस्ितत्व पर खतरा मंडराया क्योंकि प्रतिद्वन्द्वी हुतु जनजाति ने वुफछ ही हफ्रतों में लगभग 5 लाख तुत्सी लोगों को मार डाला। इससे पता चलता है कि सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा भी सुरक्षा की पारंपरिक धरणा के समान स्थानीय संदभोर्ं के अनुवूफल परिवतर्नशील है। सहयोगमूलक सुरक्षा हमने देखा कि सुरक्षा पर मंडराते इन अनेक अपारंपरिक ख़तरों से निपटने के लिए सैन्य - संघषर् की नहीं बल्िक आपसी सहयोग की शरूरत है। आतंकवाद से लड़ने अथवा मानवाध्िकारों को बहाल करने में भले ही सैन्य - बल की कोइर् भूमिका हो ;और यहाँ भी सैन्य - बल एक सीमा तक ही कारगर हो सकता हैद्ध लेकिन गरीबी मिटाने, तेल तथा बहुमूल्य धतुओं की आपूतिर् बढ़ाने, आप्रवासियों और शरणाथ्िार्यों की आवाजाही के प्रबंध्न तथा महामारी के नियंत्राण में सैन्य - बल से क्या मदद मिलेगी यह कहना मुश्िकल है। वस्तुतः ऐसे अध्िकांश मसलों में सैन्य - बल के प्रयोग से मामला और बिगड़ेगा। श्यादा प्रभावी यही होगा कि अंतरार्ष्ट्रीय सहयोग से रणनीतियाँ तैयार की जायँ। सहयोग द्विपक्षीय ;दो देशों के बीचद्ध, क्षेत्राीय, महादेशीय अथवा वैश्िवक स्तर का हो सकता है। यहइस बात पर निभर्र करेगा कि खतरे की प्रकृति क्या है और विभ्िान्न देश इससे निबटने के लिए कितने इच्छुक तथा सक्षम हैं। सहयोगमूलक सुरक्षा में विभ्िान्न देशों के अतिरिक्त अंतरार्ष्ट्रीय - राष्ट्रीय स्तर की अन्य संस्थाएँ जैसे अंतरार्ष्ट्रीय संगठन ;संयुक्त राष्ट्रसंघ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष आदिद्ध स्वयंसेवी संगठन ;एमनेस्टी इंटरनेशनल, रेड क्राॅस, निजी संगठन तथा दानदाता संस्थाएँ, चचर् और धमिर्क संगठन, मशदूर संगठन, सामाजिक और विकास संगठनद्ध व्यवसायिक संगठन और निगम तथा जानी - मानी हस्ितयाँ ;जैसे नेल्सन मंडेला, मदर टेरेसाद्ध शामिल हो सकती हैं। सहयोग मूलक सुरक्षा में भी अंतिम उपाय के रूप में बल - प्रयोग किया जा सकता है। अंतरार्ष्ट्रीय बिरादरी उन सरकारों से निबटने के लिए बल - प्रयोग की अनुमति दे सकती है जो अपनी ही जनता को मार रही हों अथवा गरीबी, महामारी और प्रलयंकारी घटनाओं की मार झेल रही जनता के दुख - ददर् की उपेक्षा कर रही हो। ऐसी स्िथति में सुरक्षा की अपारंपरिक धरणा का जोर होगा कि बल - प्रयोगसामूहिक स्वीकृति से और सामूहिक रूप में किया जाए न कि कोइर् एक देश अंतरार्ष्ट्रीय बिरादरी और स्वयंसेवी संगठनों समेत अन्यों की मजीर् पर कान दिए बगैर बल प्रयोग का रास्ता अख्ितयार करे। भारत μ सुरक्षा की रणनीतियाँ भारत को पारंपरिक ;सैन्यद्ध और अपारंपरिक खतरों का सामना करना पड़ा है। ये खतरे सीमा के अंदर से भी उभरे और बाहर से भी। भारत की सुरक्षा - नीति के चार बड़े घटक हैं और अलग - अलग वक्त में इन्हीं घटकों के हेर - पफेर से सुरक्षा की रणनीति बनायी गइर् है। सुरक्षा - नीति का पहला घटक रहा सैन्य - क्षमता को मशबूत करना क्योंकि भारत पर पड़ोसी देशों से हमले होते रहे हैं। पाकिस्तान ने 1947 - 48, 1965, 1971 तथा 1999 में और चीन ने सन् 1962 में भारत पर हमला किया। दक्ष्िाण एश्िायाइर् इलाके में भारत के चारों तरपफ परमाणु हथ्िायारों से लैस देश हैं। ऐसे में भारत के परमाणु परीक्षण करने के प़ैफसले ;1998द्ध को उचित ठहराते हुए भारतीय सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का तवर्फ दिया था। भारत ने सन् 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया था। भारत की सुरक्षा नीति का दूसरा घटक है अपने सुरक्षा हितों को बचाने के लिए अंतरार्ष्ट्रीय कायदों और संस्थाओं को मशबूत करना। भारत के पहले प्रधनमंत्राी जवाहरलाल नेहरू ने एश्िायाइर् एकता, अनौपनिवेशीकरण ;क्मबवसवदपेंजपवदद्ध और निरस्त्राीकरण के प्रयासों की हिमायत की। उन्होंने अंतरार्ष्ट्रीय संघषोर्ं में संयुक्त राष्ट्रसंघ को अंतिम पंच मानने पर जोर दिया। भारत ने हथ्िायारों के अप्रसार के संबंध् में एक सावर्भौम और बिना भेदभाव वाली नीति चलाने की पहलकदमी की जिसमें हर देश को सामूहिक संहार के हथ्िायारों ;परमाणु, जैविक, रासायनिकद्ध से संब( बराबर के अध्िकार और दायित्व हों। भारत ने नव - अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क व्यवस्था की माँग उठायी और सबसे बड़ी बात यह कि दो महाशक्ितयों की खेमेबाजी से अलग उसने गुटनिरपेक्षता के रूप में विश्व - शांति का तीसरा विकल्प सामने रखा। भारत उन 160 देशों में शामिल है जिन्होंने 1997 के क्योटो प्रोटोकाॅल पर हस्ताक्षर किए हैं। क्योटो प्रोटोकाॅल में वैश्िवक तापवृि पर काबू रखने के लिएग्रीनहाऊस गैसों के उत्सजर्न को कम करने के संबंध् में दिशा निदेर्श बताए गए हैं। सहयोगमूलक सुरक्षा की पहलकदमियों के समथर्न में भारत ने अपनी सेना संयुक्त राष्ट्रसंघ के शांतिबहाली के मिशनों में भेजी है। भारत की सुरक्षा रणनीति का तीसरा घटक है देश की अंदरूनी सुरक्षा - समस्याओं से निबटने की तैयारी। नगालैंड, मिजोरम, पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों से कइर् उग्रवादी समूहों ने समय - समय पर इन प्रांतों को भारत से अलगाने की कोश्िाश की। भारत ने राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिाक राजनीतिक व्यवस्था का पालन किया है। यह व्यवस्था विभ्िान्न समुदाय और जन - समूहों को मुझे यह सुनकर अच्छा लगता है कि मेरे देश के पास परमाण्िवक हथ्िायार हैं लेकिन कोइर् मुझे यह समझाए कि क्या इससे मैं श्यादा सुरक्ष्िात हो गया हूँ - क्या मेरा परिवार श्यादा सुरक्ष्िात हो गया है? चरण ऽ नदी के किनारे बसे इन चार गाँवों की एक काल्पनिक स्िथति का वणर्न करें। नदी के किनारे चार गाँव कोटाबाग, गेवली, वंफडली और गोप्पा आसपास बसे हैं। कोटाबाग गाँव के लोग नदी के किनारे सबसे पहले आकर बसे। इलाके के प्रचुर प्राकृतिक संसाध्नों तक उनकी अबाध् पहुँच थी। ध्ीरे - ध्ीरे विभ्िान्न क्षेत्रों के लोग इस इलाके में आने लगे क्योंकि यहाँ पानी और प्राकृतिक संसाध्न बहुतायत में उपलब्ध् थे। अब यहाँ चार गाँव हैं। समय गुजरने के साथ इन गाँवों की आबादी भी बढ़ी लेकिन संसाध्न नहीं बढ़े। हर गाँव ने अपनी सीमा रेखा और उपलब्ध् प्राकृतिक संसाध्नों पर दावेदारी जतानी शुरू की। कोटाबाग गाँव के लोग इस इलाके में सबसे पहले आकर बसे थे इसलिए वे संसाध्नों में श्यादा हिस्सा चाहते थे। वंफडली और गेवली गाँव के लोगों का कहना था कि हमारे गाँव की आबादी बाकियों की तुलना में श्यादा है इसलिए हमें श्यादा हिस्सा चाहिए। गोप्पा गाँव के लोगों का कहना था कि हम लोग रइर्सी की िांदगी जीते हैं इसलिए हमें श्यादा बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए भले ही हमारे गाँव की जनसंख्या कम हो। चारों गाँव के लोग एक - दूसरे की माँग से असहमत थे और संसाध्नों का इस्तेमाल अपनी मनमजीर् से कर रहे थे। इस वजह से गाँववालों के बीच बराबर झगड़े होने लगे। ध्ीरे - ध्ीरे लोग इस स्िथति से तंग आ गए और उनका चैन जाता रहा। अब इन चारों गाँव के लोग उसी तरह जीना चाहते हैं जैसे बरसों पहले वे जी रहे थे लेकिन उन्हें नहीं पता कि इस स्वणर्युग में कैसे लौटा जाए। प्रत्येक गाँव की विशेषता का वणर्न करते हुए एक संक्ष्िाप्त नोट तैयार करें। यह वणर्न ऐसा हो कि उससे आज के राष्ट्रों की वास्तविक प्रकृति की झलक मिलती हो। ऽ कक्षा को चार समूह में बाँटें। हर समूह एक गाँव का प्रतिनिध्ित्व करे। गाँवों की विशेषता का वणर्न करने वाला एक - एक संक्ष्िाप्त नोट हर समूह को दें। जिस समूह को जो नोट मिले वह उसी गाँव की विशेषता को धरण करे। ऽ पुराने दिनों की तरह किस प्रकार रहा जाए μ इस विषय पर चचार् के लिए अध्यापक प्रत्येक समूह को वुफछ समय ;15 मिनटद्ध दे। प्रत्येक समूह अपनी रणनीति तय करे। ऽ गाँवों के नुमाइंदों के रूप में सभी समूह किसी समाधन तक पहुँचने के लिए आपस में मुक्त भाव से चचार् करें ;20 मिनटद्ध। प्रत्येक समूह अपने तवर्फ रखे और दूसरे के तकोर्ं का प्रत्युत्तर दे। परिणाम वुफछ इस प्रकार का होगाऋ एक मैत्राीपूणर् समझौता जिसमें सबकी माँगों का ध्यान रखा गया हो। ऐसा शायद ही कभी होता है। या, पूरी बहस बगैर किसी मकसद को साध्े खत्म हो जाएगी। अध्यापकों के लिए ऽ गाँवों को राष्ट्र के रूप में वण्िार्त करें और सुरक्षा/खतरे की समस्याओं को भौगोलिक क्षेत्रा/अखंडता, प्राकृतिक संसाध्नों तक पहुँच/विद्रोह आदि से जोड़ें। ऽ समूहों के बीच जब बातचीत हो रही थी तो आपने जो वुफछ देखा उसके बारे में बात कीजिए और समझाइए कि विभ्िान्न राष्ट्र भी ऐसे मसलों पर इसी तरह बातचीत करते हैं। ऽ विभ्िान्न राष्ट्रों के भीतर और विभ्िान्न राष्ट्रों के बीच अभी जो सुरक्षा के मसले मौजूद हैं उनमें वुफछ का हवाला देते हुए इस अभ्यास को समाप्त किया जा सकता है। अपनी श्िाकायतों को खुलकर रखने और सत्ता में भागीदारी करने का मौका देती है। आख्िार में एक बात यह कि भारत में अथर्व्यवस्था को इस तरह विकसित करने के प्रयास किए गए हैं कि बहुसंख्यक नागरिकों को गरीबी और अभाव से निशात मिले तथा नागरिकों के बीच आथ्िार्क असमानता श्यादा न हो। ये प्रयास श्यादा सपफल नहीं हुए हैं। हमारा देश अब भी गरीब है और असमानताएँ मौजूद हैं। पिफर भी, लोकतांत्रिाक राजनीति से ऐसे अवसर उपलब्ध् हैं कि गरीब और वंचित नागरिक अपनी आवाश उठा सवेंफ। लोकतांत्रिाकरीति से निवार्चित सरकार के ऊपर दबाव होता है कि वह आथ्िार्क संवृि को मानवीय विकास का सहगामी बनाए। इस प्रकार, लोकतंत्रा सिप़्ार्फ राजनीतिक आदशर् नहीं हैऋ लोकतांत्रिाक शासन जनता को श्यादा सुरक्षा मुहैया कराने का साध्न भी है। इस संदभर् में भारतीय लोकतंत्रा की सपफलता और असपफलताओं के बारे में आप एक और किताब में विस्तार सेपढ़ेंगे। यह किताब स्वातंत्रयोत्तर भारत की राजनीति पर वेंफित है।

RELOAD if chapter isn't visible.