शांतिपूणर् समाधन ढूँढ़ सकते हैं। वस्तुतः अध्िकांश झगड़ों और विभेदों का समाधन बिना यु( के ही किया जाता है, लेकिन यह एक ऐसा तथ्य है जिस पर कम ध्यान जाता है। इस संदभर् में अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों कीभूमिका महत्त्वपूणर् हो जाती है। अंतरार्ष्ट्रीय संगठन कोइर् शक्ितशाली राज्य नहीं होता जिसकी अपने सदस्यों पर धैंस चलती हो। अंतरार्ष्ट्रीय संगठन का निमार्ण विभ्िान्न राज्य ही करते हैं और यह उनके मामलों के लिए जवाबदेह होता है। जब राज्यों में इस बात पर सहमति होती है कि कोइर् अंतरार्ष्ट्रीय संगठन बनना चाहिए, तभी ऐसे संगठन कायम होते हैं। एक बार इनका निमार्ण हो जाए तो ये समस्याओं के शांतिपूणर् समाधन में सदस्य देशों की मदद करते हैं। अंतरार्ष्ट्रीय संगठन एक और तरीके से मददगार होते हैं। राष्ट्रों के सामने अक्सर वुफछ काम ऐसे आ जाते हैं जिन्हें साथ मिलकर ही करना होता है। वुफछ मसले इतने चुनौतीपूणर् होते हैं कि उनसे तभी निपटा जा सकता है जब सभी साथ मिलकर काम करें। इसकी एक मिसाल तो बीमारी ही है। वुफछ रोगों को तब ही खत्म किया जा सकता है जब विश्व का हर देश अपनी आबादी को टीके लगाने में सहयोग करे। हम ‘ग्लोबल वामि±ग’ ;विश्वव्यापी तापवृिद्ध और उसके प्रभावों का ही उदाहरण लें। वातावरण का तापमानक्लोरोफ्रलोरो काबर्न कहलाने वाले वुफछ रसायनों के पैफलाव के कारण बढ़ रहा है।इससे समुद्रतल की ऊँचाइर् बढ़ने का ख़तरा है। अगर ऐसा हुआ तो विश्व के समुद्रतटीय इलाके जिसमें बड़े - बड़े शहर भी शामिल हैं, डूब जाऐंगे। हर देश अपने - अपने तरीके से ‘ग्लोबल वामि±ग’ के दुष्प्रभावों का समाधन ढूँढ़ सकता है। तब भी अंततः सबसे प्रभावकारी बात की चिंता सता रही है कि अमरीका की अगुआइर् में पश्िचमी देश इतने ताकतवर हो जाएँगे कि उनकी इच्छाओं - आकांक्षाओं पर लगाम कसना असंभव होगा। क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीका के साथ संवाद और चचार् में मददगार हो सकता है और क्या यह संगठन अमरीकी सरकार की ताकत पर अंवुफश लगासकता है? हम इन सवालों के उत्तर अध्याय के अंत में खोजेंगे। संयुक्त राष्ट्रसंघ का विकास पहले विश्वयु( ने दुनिया को इस बात के लिए जगाया कि झगड़ों के निपटारे के लिए एक अंतरार्ष्ट्रीय संगठन बनाने का प्रयास शरूर किया जाना चाहिए। इसके परिणामस्वरूप ‘लीग आॅव नेशंस’ का जन्म हुआ। शुरुआती सपफलताओं के बावजूद यह संगठन दूसरा विश्वयु( ;1939 - 45द्ध न रोक सका। पहले 1942 की संयुक्त राष्ट्रसंघ की घोषणा के आधर पर दूसरे विश्वयु( के दौरान ;1943 मेंद्ध अमरीेका के यु( सूचना विभाग ;यूनाइटेड स्टे्टस आॅपिफस आॅव वार इंपफाॅरमेशनद्ध द्वारा तैयार किया गया पोस्टर। इस पोस्टर में उन देशों के झंडों को देखा जा सकता है जिन्हांेने मित्रा राष्ट्रों के यु(क प्रयासों के समथर्न करने का संकल्प किया था। यह पोस्टर एक अथर् में महत्त्वपूणर् है। यह दिखाता है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की जड़ें यु( में थीं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की संरचना प्रमुख अंग सुरक्षा - परिषद्सहायक निकाय15 सदस्य हैं। पाँच स्थायी सदस्योंसैन्य समिति, अंतरार्ष्ट्रीय अपराध्चीन, प्रफांस, रूस, बि्रटेन और अमरीकान्यायाध्िकरण ;पूवर् यूगोस्लाविया,को वीटो ;निषेधध्िकारद्ध का अध्िकार।रवांडाद्ध शांति संस्थापकदस अस्थायी सदस्यों का चुनाव आमअभ्िायान और मिशन सभा द्वारा दो वषोर्ं के लिए। निणर्यसभी सदस्यों पर बाध्यकारी।संब( संगठन अंतरार्ष्ट्रीय आण्िवक ऊजार्शोध् और प्रश्िाक्षण संस्थान;प्।म्।द्ध आम सभा औरसामाजिक विकास के लिएसुरक्षा - परिषद् दोनों के प्रतिशोध् संस्थान ;न्छत्प्ैक्द्धउत्तरदायी। कायर्क्रम और कोषव्यापार एवं विकासआम सभा सम्मेलन ;न्छब्ज्।क्द्ध 192 सदस्यों के प्रतिनिध्ि। सभी कोपयार्वरण कायर्क्रमएकसमान मत। प्रमुख निणर्यों के लिए दो;न्छम्च्द्ध तिहाइर् और बाकी में सामान्य बहुमत कीविकास कायर्क्रम शरूरत। निणर्य सभी सदस्यों पर बाध्यकारी;न्छक्च्द्ध नहीं। बालकोष ;न्छप्ब्म्थ्द्ध जनसंख्या - कोष;न्छथ्च्।द्ध सहायक निकायशरणाथीर् उच्चायोगसमितियाँ और तदथर् निकाय;न्छभ्ब्त्द्ध विश्व खाद्य कायर्क्रम;ॅथ्च्द्ध संब( संगठन रासायनिक हथ्िायारों पर निषेध्के लिए संगठन ;व्च्ब्ॅद्ध विशेष कायो± के लिएआयोग मानवाध्िकार, मादक द्रव्य,टिकाऊ विकास, महिलाआंेआथ्िार्क और सामाजिक परिषद्की स्िथति सदस्य देशों का चुनाव आम सभा द्वारा तीनवषोर्ं के लिए। सभी भौगोलिक क्षेत्रों कोप्रतिनिध्ित्व देते हुए 54 सदस्य।क्षेत्राीय आयोगआथ्िार्क आयोग;अÚीका, यूरोप, दक्ष्िाणसंब( संगठन अमरीका और वैफरेबियाइर्विश्व व्यापार संगठनदेशद्ध आथ्िार्क और;ॅज्व्द्धसामाजिक आयोग;एश्िाया - प्रशांत औरपश्िचम एश्िायाद्ध ीजजचरूध्ध्ूूूण्दमूपदजण्वतहध्पेेनम375ध्चपबेध्नद.उंच.इपहण्हप िपर आधरित अंतरार्ष्ट्रीयन्यायालयइसमें 15 न्यायध्ीशोंका चुनाव 9 वषोर्±के लिए आम सभाऔर सुरक्षा परिषद्दोनों में पूणर् बहुमतद्वारा होता है।मुख्यालय हेग में। सचिवालयअन्य प्रमुख संगठनों के कायो± केलिए अंतरार्ष्ट्रीय स्टापफ। इसकाप्रधन महासचिव होता है जिसकीनियुक्ित सुरक्षा - परिषद् की सलाहपर आम सभा पाँच सालों केलिए करती है। अन्य इकाइर्याँमानवाध्िकार उच्चायोग का कायार्लय ;व्भ्ब्भ्त्द्ध संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय;न्छन्द्ध एचआइर्वी/एड्स कायर्क्रम;न्छ।प्क्ैद्ध विशेष एजेंसियाँ ;वित्तीय सहायता के बिनाद्धअंतरार्ष्ट्रीय श्रम संगठन ;प्स्व्द्धखाद्य एवं कृष्िा संगठन ;थ्।व्द्ध संयुक्त राष्ट्रसंघ शैक्षण्िाक, वैज्ञानिक एवंसांस्कृतिक संगठन ;न्छम्ैब्व्द्ध विश्व स्वास्थ्य संगठन ;ॅभ्व्द्ध अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा - कोष ;प्डथ्द्ध अंतरार्ष्ट्रीय मौसम - विज्ञान संगठन ;प्डव्द्ध अंतरार्ष्ट्रीय दूरसंचार संघ ;प्ज्न्द्ध न्यासिता परिषद्संयुक्त राष्ट्रसंघ की न्यासिताप्रणाली के अंतगर्त आने वालीअंतिम ‘ट्रस्ट टेरीटरी’ पलाउ केआजाद होने के साथ 1 नवम्बर1994 से यह परिषद् स्थगित। नियुक्त करने वाले के प्रति सीध्ी जवाबदेही दशार्ता है वित्तीय सहायता विहीन संबंध् दशार्ता है। सरक्षा परिषद् की विशेष स्िथति दशार्ता है। यह पाँच स्थायीसदस्यों के निषेधध्िकार ;वीटोद्ध से नियंत्रिात होती है। शीतयु( हो या न हो, एक सुधर तो सबसे पहले शरूरी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ में केवल लोकतांत्रिाक नेताओं को ही अपने देश की नुमाइंदगी करने का हक होना चाहिए। आख्िार किसी तानाशाह को देश की जनता की ओर से बोलने की अनुमति वैफसे दी जा सकती है? की तुलना में इस महायु( में कहीं श्यादा लोग मारे गये और घायल हुए।‘लीग आॅव नेशंस’ के उत्तराध्िकारी के रूप में संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुइर्। दूसरे विश्वयु( की समाप्ित के तुरंत बाद सन् 1945 में इसे स्थापित किया गया। 51 देशों द्वारा संयुक्त राष्ट्रसंघ के घोषणापत्रा पर दस्तख़त करने के साथ इस संगठन की स्थापना हो गइर्। दो विश्वयु(ों के बीच ‘लीग आॅव नेशंस’ जो नहीं कर पाया था उसे कर दिखाने की कोश्िाश संयुक्त राष्ट्रसंघ ने की। संयुक्त राष्ट्रसंघ का उद्देश्य है अंतरार्ष्ट्रीय झगड़ों को रोकना और राष्ट्रों के बीच सहयोग की राह दिखाना। इसकी स्थापना के पीछे यह आशा काम कर रही थी कि यह संगठन विभ्िान्न देशों के बीच जारी ऐसे झगड़ों को रोकने का काम करेगा जो आगे चलकर यु( का रूप ले सकते हैं और अगर यु( छिड़ ही जाए तो शत्राुता के दायरे को सीमित करने का काम करेगा। इसके अलावा, चूँकि झगड़े अक्सर सामाजिक - आथ्िार्क विकास वेे खड़े होते हैं इसलिए संयुक्तफ अभाव मंराष्ट्रसंघ की एक मंशा पूरे विश्व में सामाजिक - आथ्िार्क विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए विभ्िान्न देशों को एक साथ लाने की है। 2006 तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के सदस्य देशों की संख्या 192 थी। इसमें लगभग सभी स्वतंत्रा देश शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा में हरेक सदस्य को एक वोट हासिल है। इसकी सुरक्षा परिषद् में पाँच स्थायी सदस्य हैं। इनके नाम हैं μ अमरीका, रूस, बि्रटेन, प्रफांस और चीन। दूसरे विश्वयु( के तुरंत बाद के समय में ये देश सबसे श्यादा ताकतवर थे और इस महायु( के विजेता भी रहे, इसलिए इन्हें स्थायी सदस्य के रूप में चुना गया। संयुक्त राष्ट्रसंघ का सबसे अध्िक दिखने वाला सावर्जनिक चेहरा और उसका प्रधन प्रतिनिध्ि महासचिव होता है। वतर्मान महासचिव द. कोरिया के बान की मून हैं। वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के आठवें महासचिव हैं। उन्हांेने महासचिव का पद एक जनवरी 2007 को संभाला। 1971 के बाद, इस पद पर बैठने वाले वे पहले एश्िायाइर् हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की कइर् शाखाएँ और एजेंसियाँ हैं। सदस्य देशों के बीच यु( और शांति तथा वैर - विरोध् पर आम सभा में भी चचार् होती है और सुरक्षा परिषद् में भी। सामाजिक और आथ्िार्क मुद्दों से निबटने के लिए कइर् एजेंसियाँ हैं जिनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन ;वल्डर् हेल्थ आगर्नाइजेशन - ॅभ्व्द्ध, संयुक्त राष्ट्रसंघ विकास कायर्क्रम ;यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम - न्छक्च्द्ध, संयुक्त राष्ट्रसंघ मानवाध्िकार आयोग ;यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स कमिशन - न्छभ्त्ब्द्ध, संयुक्त राष्ट्रसंघ शरणाथीर् उच्चायोग ;यूनाइटेड नेशंसहाइर् कमिशन पफाॅर रिफ्रयूजीज - न्छभ्ब्त्द्ध, संयुक्त राष्ट्रसंघ बाल कोष ;यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रेन्स पफंड - न्छप्ब्म्थ्द्ध और संयुक्तराष्ट्रसंघ शैक्ष्िाक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठन ;यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, सोशल एंड कल्चरल आगर्नाइजेशन - न्छम्ैब्व्द्ध शामिल हैं। शीतयु( के बाद संयुक्त राष्ट्रसंघमें सुधर बदलते परिवेश में शरूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी संगठन में सुधर और विकास करना लािामी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ भी इसका अपवाद नहीं है। हाल के वषोर्ं में इस वैश्िवक संस्था में सुधर की माँग करते हुएआवाजें उठी हैं। बहरहाल, सुधरों की प्रकृति के बारे में कोइर् स्पष्ट राय और सहमति नहीं बन पायी है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने दो तरह के बुनियादी सुधरों का मसला है। एक तो यह कि इस संगठन की बनावट और इसकी प्रियाओं में सुधर किया जाए। दूसरे, इस संगठन के न्यायाध्िकार में आने वाले मुद्दों की समीक्षा की जाए। लगभग सभी देश सहमत हैं कि दोनों ही तरह के ये सुधर शरुरी हैं। देशों के बीच में सहमति इस बात पर नहीं है कि इसके लिए दरअसल ठीक करना क्या है, वैफसे करना है और कब करना है? बनावट और प्रियाओं में सुधर के अंतगर्त सबसे बड़ी बहस सुरक्षा परिषद् के कामकाज को लेकर है। इससे जुड़ी हुइर् एक माँग यह है कि सुरक्षा परिषद् में स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ायी जाए ताकि समकालीन विश्व राजनीति की वास्तविकताओं की इस संगठन में बेहतर नुमाइंदगी हो सके। ख़ास तौर से एश्िाया, अप्रफीका और दक्ष्िाण अमरीका के श्यादा देशों को सुरक्षा - परिषद् में सदस्यता देने की बात उठ रही है। इसके अतिरिक्त, अमरीका और पश्िचमी देश संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट से जुड़ी प्रियाआंे और इसके प्रशासन में सुधर चाहते हैं। जहाँ तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में किन्हीं मुद्दों को श्यादा प्राथमिकता देने अथवा उन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ के न्यायाध्िकार में लाने का सवाल है तो वुफछ देश और विशेषज्ञ चाहते हैं कि यह संगठन शांति और सुरक्षा से जुड़े मिशनों में श्यादा प्रभावकारी अथवा बड़ी भूमिका निभाए जबकि औरों की इच्छा है कि यह संगठन अपने को विकास तथा मानवीय भलाइर् के कामों ;स्वास्थ्य, श्िाक्षा, पयार्वरण, जनसंख्या नियंत्राण, मानवाध्िकार, लिंगगत न्याय और सामाजिक न्यायद्ध तक सीमित रखे। संयुक्त राष्ट्रसंघ के 60 साल μ नवीनीकरण का समय स्रोतः ूूूण्नदण्वतह आइए, हम दोनों ही किस्म के सुधरों पर नशर दौड़ाएँ। इस चचार् में हम श्यादा जोर ढाँचागत और प्रियागत सुधरों पर देंगे। संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना दूसरे विश्वयु( के तत्काल बाद सन् 1945 में हुइर् थी। इस महायु( के बाद विश्व राजनीति की जो सच्चाइयाँ थीं उसी के अनुरूप इसका गठन हुआ और इसके कामकाज से तत्कालीन विश्व राजनीति की वास्तविकताएँ झलकती थीं। शीतयु( के बाद ये सच्चाइयाँ बदल गइर्ं हैं। 1991 से आए बदलावों में से वुफछ निम्नलिख्िात हैं μ ऽ सोवियत संघ बिखर गया। ऽ अमरीका सबसे श्यादा ताकतवर है। ऽ सोवियत संघ के उत्तराध्िकारी राज्य रूस और अमरीका के बीच अब संबंध् कहीं श्यादा सहयोगात्मक हैं। ऽ चीन बड़ी तेजी से एक महाशक्ित के रूप में उभर रहा हैऋ भारत भी तेजी से इस दिशा में अग्रसर है। ऽ एश्िाया की अथर्व्यवस्था अप्रत्याश्िात दर से तरक्की कर रही है। ऽ अनेक नए देश संयुक्त राष्ट्रसंघ में शामिल हुए हैं ;ये देश सोवियत संघ से आशाद हुए देश हैं अथवा पूवीर् यूरोप के भूतपूवर् साम्यवादी देश हैंद्ध। ऽ विश्व के सामने चुनौतियों की एक पूरी नयी कड़ी ;जनसंहार, गृहयु(, जातीय संघषर्, आतंकवाद, परमाण्िवक प्रसार, जलवायु में बदलाव, पयार्वरण की हानि, महामारीद्ध मौजूद है। ऐसी दशा मंे जब शीतयु( का अंत ;1989द्ध हो रहा था तो विश्व के सामने सवाल था कि क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ का होना पयार्प्त है? जो वुफछ करना शरुरी है क्या उसे करने में संयुक्त राष्ट्रसंघ सक्षम है? इसे क्या करना चाहिए और वैफसे करना चाहिए? संयुक्त राष्ट्रसंघ बेहतर ढंग से काम कर सके इसके लिए कौन - से सुधर शरुरी हैं? पिछले पंद्रह सालों से इसके सदस्य देश इन प्रश्नों केव्यावहारिक और संतोषजनक उत्तर ढूँढ़ने की कोश्िाश कर रहे हैं। प्रियाओं और ढाँचे में सुधर सुधर होने चाहिए μ इस सवाल पर व्यापक सहमति है लेकिन सुधर वैफसे किया जाए का मसला कठिन है। इस पर सहमति कायम करना मुश्िकल है। यहाँ हम संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद् में सुधर पर जारी बहस की थोड़ी चचार् करेंगे। सन् 1992 में संयुक्तराष्ट्रसंघ की आम सभा में एक प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। प्रस्ताव में तीन मुख्य श्िाकायतों का जिक्र था μ ऽ सुरक्षा परिषद् अब राजनीतिक वास्तविकताओं की नुमाइंदगी नहीं करती। ऽ इसके पैफसलों पर पश्िचमी मूल्यों औऱहितों की छाप होती है और इन पैफसलों़पर चंद देशों का दबदबा होता है। ऽ सुरक्षा परिषद् में बराबर का प्रतिनिध्ित्व नहीं है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे में बदलाव की इन बढ़ती हुइर् माँगों के मद्देनशर एक जनवरी 1997 को संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव कोपफी अन्नान ने जाँच शुरू करवाइर् कि सुधर वैफसे कराए जाएँ। मिसाल के तौर पर यही कि क्या सुरक्षा परिषद् के नए सदस्य चुने जाने चाहिए? इसके बाद के सालों में सुरक्षा परिषद् की स्थायी और अस्थायी सदस्यता के लिए मानदंड सुझाए गए। इनमें से वुफछ निम्नलिख्िात हैं। सुझाव आए कि एक नए सदस्य को - ऽ बड़ी आथ्िार्क ताकत होना चाहिए। ऽ बड़ी सैन्य ताकत होना चाहिए। ऽ संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में ऐसे देश का योगदान श्यादा हो। ऽ आबादी के लिहाज से बड़ा राष्ट्र हो। ऽ ऐसा देश जो लोकतंत्रा और मानवाध्िकारों का सम्मान करता हो। ऽ यह देश ऐसा हो कि अपने भूगोल,अथर्व्यवस्था और संस्कृति के लिहाज से विश्व की विविध्ता की नुमाइंदगी करता हो। संयुक्त राष्ट्रसंघ के सालाना बजट में सवार्ध्िक योगदान करने वाले दस देश स्रोतः ूूूण्नदण्वतह चरण स् कक्षा को छः समूहों में बांटे। हर समूह संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए यहाँ सुझाए गए किसी एक मानदंड का पालन करेगा। स् हर समूह अपने मानदंड के आधर पर स्थायी सदस्यों की एक सूची बनाएगा। ;मसलन जनसंख्या के मानदंड को अपनाने वाला समूह पाँच सवार्ध्िक जनसंख्या वाले देशों की सूची बनाएगा।द्ध स् हर समूह अपनी सुझाइर् हुइर् सूची पर एक प्रस्तुति करेगा और बताएगा कि यह मानदंड क्यों अपनाया जाना चाहिए। अध्यापकों के लिए .छात्रों को समूह के लिए वह मानदंड अपनाने दें जिसकी वे स्वयं तरपफदारी कर रहे हों। .सभी सूचियों की तुलना करें और देखें कि कितने नाम इन सूचियों में साझे हैं। यह भी देखें कि कितनी बार भारत का नाम आ रहा है। . वुफछ समय एक खुली चचार् करें कि हमें कौन - सा मानदंड अपनाना चाहिए। जाए? क्या भौगोलिक दृष्िट से बराबरी के प्रतिनिध्ित्व का यह अथर् है कि एश्िाया, अप्रफीका, लातिनी अमरीका और वैफरेबियाइर् क्षेत्रा की एक - एक सीट सुरक्षा परिषद् में होनी चाहिए? एक प्रश्न यह भी है कि क्या महादेशों के बजाए क्षेत्रा और उपक्षेत्रा को प्रतिनिध्ित्व का आधर बनाया जाए। प्रतिनिध्ित्व का मसला भूगोल के आधर पर क्यों हल किया जाए? आथ्िार्क विकास को आधर मानकर यह मसला क्यों नहीं हल किया जाए? अगर आथ्िार्क विकास को आधर मानें तब भी कठिनाइर् है। विकासशील देश विकास की अलग - अलग सीढि़यों परखड़े हैं। पिफर संस्कृति का क्या करें? क्याविभ्िान्न संस्कृतियों या ‘सभ्यताओं’ को श्यादा संतुलित ढंग से प्रतिनिध्ित्व दिया जाए? कोइर् विश्व को सभ्यता या संस्कृति के आधर पर बाँटकर वैफसे देख सकता है जब कि किसी एक ही राष्ट्र के भीतर विभ्िान्नसंस्कृति - धराएँ उपस्िथत होती हैं? इसी से जुड़ा एक मसला सदस्यता कीप्रकृति को बदलने का था। मिसाल के तौर पर, वुफछ का जोर था कि पाँच स्थायी सदस्यों को दिया गया निषेधध्िकार ;वीटो पावरद्ध खत्म होना चाहिए। अनेक का मानना था कि निषेधध्िकार लोकतंत्रा और संप्रभु राष्ट्रों के बीच बराबरी की धरणा से मेल नहीं खाता अतः यह संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिए उचित या प्रासंगिक नहीं है। सुरक्षा परिषद् में पाँच स्थायी और दस अस्थायी सदस्य हैं। दूसरे विश्वयु( के बाद दुनिया में स्िथरता कायम करने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के घोषणापत्रा में पाँच स्थायी सदस्यों को विशेष हैसियत दी गइर्। पाँच स्थायी सदस्यों को मुख्य पफायदा था कि सुरक्षा - परिषद् में उनकी सदस्यता स्थायी होगी और उन्हें ‘वीटो’ का अध्िकार होगा। अस्थायी सदस्य दो वषो± के लिए चुने जाते हैं और इस अवध्ि के बाद उनकी जगह नए सदस्यों का चयन होता है। दो साल की अवध्ि तक अस्थायी सदस्य रहने के तत्काल बाद किसी देश को पिफर से इस पद के लिए नहीं चुना जा सकता। अस्थायी सदस्यों का निवार्चन इस तरह से होता है कि विश्व के सभी महादेशों का प्रतिनिध्ित्व हो सके।सबसे महत्त्वपूणर् बात यह है कि अस्थायी सदस्यों को वीटो का अध्िकार नहीं है। सुरक्षा - परिषद् में पैफसला मतदान के जरिए होता है। हर सदस्य को एक वोट का अध्िकार होता है। बहरहाल, स्थायी सदस्यों में से कोइर् एक अपने निषेधध्िकार ;वीटोद्ध का प्रयोग कर सकता है और इस तरह वह किसी पैफसले इकट्ठे हुए। इस अवसर पर मौजूदा स्िथतियों की समीक्षा हुइर्। इस बैठक में शामिल नेताओं ने बदलते हुए परिवेश में संयुक्त राष्ट्रसंघ को श्यादा प्रासंगिक बनाने के लिए निम्नलिख्िात कदम उठाने का पैफसला किया μ ़ऽ शांति संस्थापक आयोग का गठन ऽ यदि कोइर् राष्ट्र अपने नागरिकों को अत्याचारों से बचाने में असपफल होजाए तो विश्व - बिरादरी इसका उत्तरदायित्वले μ इस बात की स्वीकृति। ऽ मानवाध्िकार परिषद् की स्थापना ;2006 के 19 जून से सियद्ध। ऽ सहस्राब्िद विकास लक्ष्य ;मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्सद्ध को प्राप्त करने पर सहमति। ऽ हर रूप - रीति के आतंकवाद की निंदा ऽ एक लोकतंत्रा - कोष का गठन ऽ ट्रस्टीश्िाप काउंसिल ;न्यासिता परिषद्द्ध को समाप्त करने पर सहमति। यह समझना कठिन नहीं कि ये मुद्दे भी संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिए बड़े पेंचदार हैं। शांति संस्थापक आयोग को क्या करना चाहिए? दुनिया में बहुत - से झगड़े चल रहे हैं। यह आयोग किसमें दखल दे? हर झगड़े में दखल देना क्या इस आयोग के लिए उचित अथवा संभव होगा? ठीक इसी तरह यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि अत्याचारों से निपटने में विश्व - बिरादरी की जिम्मेदारी क्या होगी? मानवाध्िकार क्या है और इस बात को कौन तय करेगा कि किस स्तर का मानवाध्िकार - उल्लंघन हो रहा है? मानवाध्िकार - उल्लंघन की दशा में क्या कारर्वाइर् की जाए - इसे कौन तय करेगा? बहुत से देश अब भी विकासशील जगत का हिस्सा हैं। ऐसे में ‘सहस्राब्िद विकास लक्ष्य’ में निधर्रित विकास संबंध्ी महत्वाकांक्षी लक्ष्यों यह बात बिलवुफल ग़्ालत है। असल में वीटो की शरूरत तो कमजोर देशों को है, उनको नहीं जिनके पास पहले से बहुत ताकत है। को मानक बनाना कहाँ तक व्यावहारिक है? क्या आतंकवाद की कोइर् सवर्मान्य परिभाषा हो सकती है? संयुक्त राष्ट्रसंघ लोकतंत्रा को बढ़ावा देने में ध्न का इस्तेमाल वैफसे करेगा? ऐसे ही डारपफर की हालत की एक बानगी। आपका क्या मानना है, संयुक्त राष्ट्रसंघ इस तरह की स्िथतियों में किस प्रकार हस्तक्षेप कर सकता है? क्या इसके लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ के न्यायाध्िकार में बदलाव की शरूरत हैै? पेट बेगली, केगल्स काटर्ून और भी सवाल किए जा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सुधर और भारत भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे में बदलाव के मसले को कइर् आधरों पर समथर्न दिया है। भारत का मानना है कि बदले हुए विश्व में संयुक्त राष्ट्रसंघ की मशबूती और दृढ़ता शरुरी है। भारत इस बात का भी समथर्न करता है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ विभ्िान्न देशों के बीच सहयोग बढ़ाने और विकास को बढ़ावा देने में श्यादा बड़ी भूमिका निभाए। भारत का विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के अजेंडे में विकास का मामला प्रमुख होना चाहिए क्योंकि अंतरार्ष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए यह शरुरी पूवर् शतर् है। भारत की एक बड़ी चिंता सुरक्षा परिषद् की संरचना को लेकर है। सुरक्षा - परिषद् की सदस्य संख्या स्िथर रही है जबकि संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा में सदस्यों की संख्या खूब बढ़ी है। भारत का मानना है कि इससे सुरक्षा परिषद् के प्रतिनिध्ित्वमूलक चरित्रा की हानि हुइर् है। भारत का तवर्फ है कि परिषद् का विस्तार करने पर वह श्यादा प्रतिनिध्िमूलक होगी और उसे विश्व - बिरादरी का श्यादा समथर्न मिलेगा। हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्य संख्या सन् 1965 में 11 से बढ़ाकर 15 कर दी गइर् थी लेकिन स्थायी सदस्यों की संख्या स्िथर रही। इसके बाद से परिषद् का आकार जस का तस बना हुआ है। यह भी एक तथ्य है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की आम सभा में श्यादातर विकासशील सदस्य - देश हैं। इस कारण, सुरक्षा परिषद् के प़्ैाफसलों में उनकी भी सुनी जानी चाहिए क्योंकि इन प़फसलों काैउन पर प्रभाव पड़ता है। भारत सुरक्षा परिषद् के अस्थायी और स्थायी, दोनों ही तरह के सदस्यों की संख्यामें बढ़ोत्तरी का समथर्क है। भारत के प्रतिनिध्ियों का तवर्फ है कि पिछले वुफछ वषोर्ं में सुरक्षा - परिषद् की गतिविध्ियों का दायरा बढ़ा है। सुरक्षा - परिषद् के कामकाज की सपफलता विश्व - बिरादरी के समथर्न पर निभर्र है। इस कारण सुरक्षा परिषद् के पुनगर्ठन की कोइर् योजना व्यापक ध्रातल पर बननी चाहिए। मिसाल के लिए, उसमें अभी की अपेक्षा श्यादा विकासशील देश होने चाहिए। सुरक्षा परिषद् में इन्हीं महादेशों की नुमाइंदगी नहीं है। इन सरोकारों को देखते हुए भारत या किसी और देश के लिए निकट भविष्य में संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बन पाना मुश्िकल लगता है। एक - ध््रुवीय विश्व में संयुक्त राष्ट्रसंघ संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे और प्रियाओं में सुधर से वुफछ देशों की यह आशा भी बँध्ी रही है कि इन बदलावों से संयुक्त राष्ट्रसंघ एक - ध््रुवीय विश्व में जहाँ अमरीका सबसे ताकतवर देश है और उसका कोइर् गंभीर प्रतिद्वन्द्वी भी नहीं μ कारगर ढंग से काम कर पाएगा। क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीकी प्रभुत्व के विरु( संतुलनकारी भूमिका निभा सकता है? क्या यह संगठन शेष विश्व और अमरीका के बीच संवाद कायम करके अमरीका को अपनी मनमानी करने से रोक सकता है? अमरीका की ताकत पर आसानी से अंवुफश नहीं लगाया जा सकता। पहली बात तो यह कि सोवियत संघ की गैर मौजूदगी में अब अमरीका एकमात्रा महाशक्ित है। अपनी सैन्य और आथ्िार्क ताकत के बूते वह संयुक्त राष्ट्रसंघ या किसी अन्य अंतरार्ष्ट्रीय संगठन की अनदेखी कर सकता है। दूसरे, संयुक्त राष्ट्रसंघ के भीतर अमरीका का खास प्रभाव है। वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में सबसे श्यादा योगदान करने वाला देशहै। अमरीका की वित्तीय ताकत बेजोड़ है। यह भी एक तथ्य है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीकी भू - क्षेत्रा में स्िथत है और इस कारण भी अमरीका का प्रभाव इसमें बढ़ जाता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के कइर् नौकरशाह इसके नागरिक हैं। इसके अतिरिक्त, अगर अमरीका को लगे कि कोइर् प्रस्ताव उसके अथवा उसके साथी राष्ट्रों के हितों के अनुवूफल नहीं है अथवा अमरीका को यह प्रस्ताव न जँचे तो अपने ‘वीटो’ से वह उसे रोक सकता है। अपनी ताकत और निषेधध्िकार के कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव के चयन में भी अमरीका की बात बहुत वशन रखती है। अमरीका अपनी इस ताकत के बूते शेष विश्व में पूफट डाल सकता है और डालता है, ताकि उसकी नीतियों का विरोध् मंद पड़ जाए। इस तरह संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीका की ताकत पर अंवुफश लगाने में ख़ास सक्षम नहीं। पिफर भी, एकध््रुुवीय विश्व में जहाँ अमरीकी ताकत का बोलबाला है μ संयुक्त राष्ट्रसंघ अमरीका और शेष विश्व के बीच विभ्िान्न मसलों पर बातचीत कायम कर सकता है और इस संगठन ने ऐसा किया भी है। अमरीकी नेता अक्सर संयुक्त राष्ट्रसंघ की आलोचना करते हैं लेकिन वे इस बात को समझते हैं कि झगड़ों और सामाजिक - आथ्िार्क विकास के मसले पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के जरिए 190 राष्ट्रों को एक साथ किया जा सकता है। जहाँ तक शेष विश्व की बात है तो उसके लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ ऐसा मंच है जहाँ अमरीकी रवैये और नीतियों पर वुफछ अंवुफश लगाया जा सकता है। यह बात ठीक है कि वाश्िांग्टन के विरु( शेष विश्व शायद ही कभी एकजुट हो पाता है और अमरीका की ताकत पर अंवुफश लगाना एक हद तक असंभव है, लेकिन इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्रसंघ ही वह जगह है जहाँ अमरीका के किसी खास रवैये और नीति की आलोचना की सुनवाइर् हो और कोइर् बीच का रास्ता निकालने तथा रियायत देने की बात कही - सोची जा सके। संयुक्त राष्ट्रसंघ में थोड़ी कमियाँ हैं लेकिन इसके बिना दुनिया और बदहाल होगी। आज विभ्िान्न समाजों और मसलों के बीच आपसी तार जुड़ते जा रहे हैं। इसे ‘पारस्परिक निभर्रता’ का नाम दिया जाता है। इसे देखते हुए यह कल्पना करना कठिन है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसे संगठन के बिना विश्व के सात अरब से भी श्यादा लोग वैफसे रहेंगे। प्रौद्योगिकी यह सि( कर रही है कि आने वाले दिनों में विश्व में पारस्परिक निभर्रता बढ़ती जाएगी। इसलिए,संयुक्त राष्ट्रसंघ का महत्त्व भी निरंतर बढ़ेगा। लोगों को और सरकारों को संयुक्त राष्ट्रसंघ तथा दूसरे अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों के समथर्न और उपयोग के तरीके तलाशने होंगे - ऐसे तरीके जो उनके हितों और विश्व बिरादरी के हितों से व्यापक ध्रातल पर मेल खाते हों। प्रश्नावली8.सुरक्षा - परिषद् के कायर् क्या हैं? 9.भारत के नागरिक के रूप में सुरक्षा - परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष का समथर्न आप वैफसे करेंगे? अपने प्रस्ताव का औचित्य सि( करें। 10.संयुक्त राष्ट्रसंघ के ढाँचे को बदलने के लिए सुझाए गए उपायों के ियान्वयन में आ रही कठिनाइयों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें? 11.हालाँकि संयुक्त राष्ट्रसंघ यु( और इससे उत्पन्न विपदा को रोकने में नाकामयाब रहा है लेकिन विभ्िान्न देश अभी भी इसे बनाए रखना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक अपरिहायर् संगठन मानने के क्या कारण हैं। 12.संयुक्त राष्ट्रसंघ में सुधर का अथर् है सुरक्षा परिषद् के ढाँचे में बदलाव। इस कथन का सत्यापन करें।

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