Chapter 5 Hindi परिचय आइए, अब हम शीत युद्ध के दौर में विश्व के एक बड़े फ़लक पर हुए बदलावों से नज़र हटा कर अपना ध्यान अपने क्षेत्र यानी दक्षिण एशिया की ओर मोड़ें। बीसवीं सदी के आखिरी सालों में जब भारत और पाकिस्तान ने खुद को परमाणु शक्ति-संपन्न राष्ट्रों की बिरादरी में बैठा लिया तो यह क्षेत्र अचानक पूरे विश्व की नज़र में महत्त्वपूर्ण हो उठा। स्पष्ट ही विश्व का ध्यान इस इलाके में चल रहे कई तरह के संघर्षों पर गया। इस क्षेत्र के देशों के बीच सीमा और नदी जल के बँटवारे को लेकर विवाद कायम है। इसके अतिरिक्त विद्रोह, जातीय संघर्ष और संसाधनों के बँटवारे को लेकर होने वाले झगड़े भी हैं। इन वजहों से दक्षिण एशिया का इलाका बड़ा संवेदनशील है और अनेक विशेषज्ञों का मानना है। कि आज विश्व में यह क्षेत्र सुरक्षा के लिहाज से खतरे की आशंका वाला क्षेत्र है। साथ ही एक बात और है। इस इलाके के बहुत से लोग इस तथ्य की निशानदेही करते हैं कि दक्षिण एशिया के देश अगर आपस में सहयोग करें तो यह क्षेत्र विकास करके समृद्ध बन सकता है। इस अध्याय में हम दक्षिण एशिया के देशों के बीच मौजूद संघर्षों की प्रकृति और इन देशों के आपसी सहयोग को समझने की कोशिश करेंगे। दक्षिण एशिया के देशों की घरेलू राजनीति से इन झगड़ों या सहयोग का मिज़ाज तय होता है अथवा वह इनके मूल में हैं। इस वजह से अध्याय में पहले दक्षिण एशिया का परिचय दिया जाएगा और कुछ देशों की घरेलू राजनीति की चर्चा की जाएगी। 2015-16(21/01/2015) 66 समकालीन विश्व राजनीति दक्षिण एशिया के देशों की कुछ ऐसी । विशेषताओं की पहचान करें जो इस क्षेत्र के । देशों में तो समान रूप । से लागू होती हैं परंतु पश्चिम एशिया अथवा दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर लागू नहीं होतीं। क्या है दक्षिण एशिया? भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच कितना तनावपूर्ण होता है। यह हम बखूबी जानते हैं। हमने यह भी देखा है कि क्रिकेट । मैच देखने के लिए पाकिस्तानी अथवा भारतीय ‘फैन्स' जब एक-दूसरे के देशों में पहुँचते हैं। तो उनका बड़ा आदर-सत्कार होता है; गर्मजोशी से मेजबानी की जाती है। यही हाल दक्षिण एशियाई मामलों का भी है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ सद्भाव और शत्रुता, आशा और निराशा तथा पारस्परिक शंका और विश्वास साथ-साथ बसते हैं। शुरुआत हम एक बुनियादी सवाल से करें कि दक्षिण एशिया है क्या? अमूमन बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका को इंगित करने के लिए 'दक्षिण एशिया' पद का व्यवहार किया जाता है। उत्तर की विशाल हिमालय पर्वत श्रृंखला, दक्षिण का हिंद महासागर, पश्चिम का अरब सागर और पूरब में मौजूद बंगाल की खाड़ी से यह इलाका एक विशिष्ट प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में नज़र आता है। यह भौगोलिक विशिष्टता ही। इस उप-महाद्वीपीय क्षेत्र के भाषाई, सामाजिक । तथा सांस्कृतिक अनूठेपन के लिए जिम्मेदार है। इस क्षेत्र की चर्चा में जब-तब अफ़गानिस्तान और म्यांमार को भी शामिल किया जाता है। चीन इस क्षेत्र का एक प्रमुख देश है लेकिन चीन को दक्षिण एशिया का अंग नहीं माना। जाता। इस अध्याय में हम 'दक्षिण एशिया' पद । का इस्तेमाल उपर्युक्त सात देशों के लिए। करेंगे। इस तरह परिभाषित दक्षिण एशिया हर । अर्थ में विविधताओं से भरा-पूरा इलाका है। फिर भी भू-राजनीतिक धरातल पर यह एक और सीमाओं के बावजूद भारत और श्रीलंका में ब्रिटेन से आज़ाद होने के बाद, लोकतांत्रिक व्यवस्था सफलतापूर्वक कायम है। भारत में लोकतंत्र के विकास के बारे में आप एक और क़िताब में विस्तार से पढ़ेंगे। इस क़िताब में आज़ादी के बाद के दिनों की भारतीय राजनीति की चर्चा की गई है। भारत के लोकतंत्र की बहुत सारी सीमाओं की तरफ इंगित किया जा सकता है लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि एक राष्ट्र के रूप में भारत हमेशा लोकतांत्रिक रहा है। यही बात श्रीलंका पर लागू होती है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोकतांत्रिक और सैनिक दोनों तरह के नेताओं का शासन रहा है। शीतयुद्ध के बाद के सालों में बांग्लादेश में लोकतंत्र कायम रहा। पाकिस्तान में शीतयुद्ध के बाद के सालों में लगातार दो लोकतांत्रिक सरकारें बनीं। पहली सरकार बेनज़ीर भुट्टो और दूसरी नवाज़ शरीफ़ के नेतृत्व में कायम हुई। लेकिन इसके बाद 1999 में पाकिस्तान में सैनिक तख्तापलट हुआ। तब से यहाँ सैनिक शासन है। 2006 तक नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र था और इस बात का खतरा बराबर बना हुआ था कि राजा अपने हाथ में कार्यपालिका की सारी शक्तियाँ ले लेगा। लेकिन, 2006 में एक सफल जन-विद्रोह हुआ और यहाँ लोकतंत्र की बहाली हुई। राजा की हैसियत न के बराबर रह गई। बांग्लादेश और नेपाल के अनुभवों के आधार पर हम कह सकते हैं कि पूरे दक्षिण एशिया में लोकतंत्र एक स्वीकृत मूल्य बन चला है। । दक्षिण एशिया के दो सबसे छोटे देशों में भी ऐसे ही बदलाव की बयार बह रही है। भूटान में अब भी राजतंत्र है लेकिन यहाँ के राजा ने भूटान में बहुदलीय लोकतंत्र स्थापित करने की योजना की शुरुआत कर दी है। दूसरा द्वीपीय देश मालदीव 1968 तक सल्तनत क्षेत्र है। क्या इन देशों की कोई सुनिश्चित परिभाषा है? यह परिभाषा बनाता कौन है? दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में एक-सी । राजनीतिक प्रणाली नहीं है। अनेक समस्याओं । 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया 67 हुआ करता था। 1968 में यह एक गणतंत्र बना और यहाँ शासन की अध्यक्षात्मक प्रणाली अपनायी गयी। 2005 के जून में मालदीव की संसद ने बहुदलीय प्रणाली को अपनाने के पक्ष में एकमत से मतदान किया। मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) का देश के राजनीतिक मामलों में दबदबा है। 2005 के चुनावों के बाद मालदीव में लोकतंत्र मजबूत हुआ है क्योंकि इस चुनाव में विपक्षी दलों को कानूनी मान्यता दे दी गई। दक्षिण एशिया में लोकतंत्र का रिकार्ड मिला-जुला रहा है। इसके बावजूद दक्षिण एशियाई देशों की जनता लोकतंत्र की आकांक्षाओं में सहभागी है। इस क्षेत्र के पाँच बड़े देशों में हाल ही में एक सर्वेक्षण किया गया था। सर्वेक्षण से यह बात ज़ाहिर हुई कि इन पाँचों देशों में लोकतंत्र को व्यापक जन-समर्थन हासिल है। इन देशों में हर वर्ग और धर्म के आम नागरिक – लोकतंत्र को अच्छा मानते हैं और प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र की संस्थाओं का समर्थन करते हैं। इन देशों के लोग शासन की किसी और प्रणाली की अपेक्षा लोकतंत्र को वरीयता देते हैं और मानते हैं कि उनके देश के लिए लोकतंत्र ही ठीक है। ये निष्कर्ष बड़े महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि पहले से माना जाता रहा है कि लोकतंत्र सिर्फ विश्व के धनी देशों में फल-फूल सकता है। इस लिहाज से देखें तो दक्षिण एशिया के लोकतंत्र के अनुभवों से लोकतंत्र की वैश्विक कल्पना का दायरा बढ़ा है। आइए, हम देखें कि भारत को छोड़कर दक्षिण एशिया के अन्य चार बड़े देशों में लोकतंत्र का अनुभव कैसा रहा? ये दोनों आरेख दक्षिण एशिया के पाँच बड़े देशों के 19 हजार से अधिक नागरिकों से लिए गए साक्षात्कार पर आधारित हैं। स्रोत – एस डी एस ए टीम - स्टेट ऑव डेमोक्रेसी इन साऊथ एशिया, नयी दिल्ली, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2007 बांग्लादेश भारत नेपाल पाकिस्तान । श्रीलंका ।।। ।।।। स्रोतः मानव विकास रिपोर्ट, 2006 2015-16(21/01/2015) समकालीन विश्व राजनीति ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३६ 1947 : ब्रिटिश-राज की समाप्ति के बाद भारत और पाकिस्तान का स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उद्य। 1948 : श्रीलंका (तत्कालीन सिलोन) को आजादी मिली; कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई। 1954-55 : पाकिस्तान शीतयुद्धकालीन सैन्य गुट सिएटो' और 'सेंटो में शामिल हुआ। सितंबर 1960 : भारत और पाकिस्तान ने सिंधु नदी जल समझौते पर हस्ताक्षर किए। 1962 । भारत और चीन के बीच सीमा-विवाद। 1965 : भारत-पाक युद्ध; संयुक्त राष्ट्रसंघ का भारत-पाक पर्यवेक्षण मिशन। 1966 । भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता। शेख मुजीबुर्रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को ज्यादा स्वायत्तता देने के लिए छः सूत्री प्रस्ताव रखा। मार्च 1971 । बांग्लादेश के नेताओं द्वारा आजादी की उद्घोषणा। अगस्त 1971 : भारत और सोवियत संघ ने 20 सालों के लिए मैत्री संधि पर दस्तखत किए। दिसंबर 1971 : भारत-पाक युद्ध; बांग्लादेश की मुक्ति। जुलाई 1972 : भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला-समझौता। मई 1974 : भारत ने परमाणु-परीक्षण किए। 1976 : पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच कूटनयिक संबंध बहाल हुए। दिसंबर 1985 : ‘दक्षेस' के पहले सम्मेलन (ढाका) में दक्षिण एशिया के देशों ने ‘दक्षेस' के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। |1987 : भारत-श्रीलंका समझौता; भारतीय शांति सेना का श्रीलंका में अभियान (1987-90)। 1988 : मालदीव में भाड़े के सैनिकों द्वारा किए गए षड्यंत्र को नाकाम करने के लिए भारत ने वहाँ सेना भेजी। भारत और पाकिस्तान के बीच एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों और सुविधाओं पर हमला न करने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए। 1988-91 : पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में लोकतंत्र की बहाली। 1993 ; 'दक्षेस' के सातवें सम्मेलन (ढाका) में आपसी व्यापार में दक्षेस के देशों को वरीयता देने की संधि (SAPTA) पर हस्ताक्षर। दिसंबर 1996 : गंगा नदी के पानी में हिस्सेदारी के मसले पर भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का संधि पर हस्ताक्षर हुए। मई 1998 : भारत और पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किए। दिसंबर 1998 : भारत और श्रीलंका ने मुक्त व्यापार संधि पर हस्ताक्षर किए। फरवरी 1999 : भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस-यात्रा कर लाहौर गए। तथा शांति के एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। जून-जुलाई 1999: भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल-युद्ध। जुलाई 2001 : वाजपेयी-मुशर्रफ के बीच आगरा-बैठक असफल। फरवरी 2004 : 12वें दक्षेस सम्मेलन में ‘मुक्त व्यापार संधि (SAFTA)' पर हस्ताक्षर हुए। पाकिस्तान में सेना और लोकतंत्र पाकिस्तान में पहले संविधान के बनने के बाद देश के शासन की बागडोर जनरल अयूब खान ने अपने हाथों में ले ली और जल्दी ही अपना निर्वाचन भी करा लिया। उनके शासन के खिलाफ़ जनता का गुस्सा भड़का और ऐसे में उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। इससे एक बार फिर सैनिक शासन का रास्ता साफ हुआ और जनरल याहिया खान ने शासन की बागडोर संभाली। याहिया खान के सैनिक शासन के दौरान पाकिस्तान को बांग्लादेश-संकट का सामना करना पड़ा और 1971 में भारत के साथ पाकिस्तान का युद्ध हुआ। युद्ध के परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान टूटकर एक स्वतंत्र देश बना और बांग्लादेश कहलाया। इसके बाद पाकिस्तान में जुल्फ़िकार अली भुट्टो के नेतृत्व में एक निर्वाचित सरकार बनी जो 1971 से 1977 तक कायम रही। 1977 में जेनरल जियाउल-हक ने इस सरकार को गिरा दिया। 1982 के बाद जेनरल जियाउल-हक को लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन का सामना करना पड़ा और 1988 में एक बार फिर बेनज़ीर भुट्टो के नेतृत्व में लोकतांत्रिक सरकार बनी। पाकिस्तान में इसके बाद की राजनीति बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग के आपसी होड़ के इर्द-गिर्द घूमती रही। निर्वाचित लोकतंत्र की यह अवस्था 1999 तक कायम रही। 1999 में एक बार फिर सेना ने दखल दी और जेनरल परवेज़ मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को हटा दिया। 2001 में परवेज़ मुशर्रफ ने अपना निर्वाचन राष्ट्रपति के रूप में कराया। पाकिस्तान पर अब भी सेना की हुकूमत है हालाँकि सैनिक शासकों ने अपने शासन को लोकतांत्रिक जताने के लिए चुनाव कराए हैं। 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया सुरेंदर, द हिंदू पाकिस्तान में लोकतंत्र के स्थायी न बन पाने के कई कारण हैं। यहाँ सेना, धर्मगुरु और भूस्वामी अभिजनों का सामाजिक जोड़ घटाव में दबदबा है। इसकी वज़ह से कई बार निर्वाचित मैं हमेशा । सरकारों को गिराकर सैनिक शासन कायम अच्छा रहा हूँ। हुआ। पाकिस्तान की भारत के साथ तनातनी रहती है। इस वजह से सेना-समर्थक समूह ज्यादा मजबूत हैं और अक्सर ये समूह दलील देते हैं कि पाकिस्तान के राजनीतिक दलों और लोकतंत्र में खोट है। राजनीतिक दलों के स्वार्थ साधन तथा लोकतंत्र की धमाचौकड़ी से पाकिस्तान की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी। इस तरह ये ताकतें सैनिक शासन को जायज़ ठहराती हैं। लोकतंत्र तो खैर सेना के जेनरल और पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में पाकिस्तान के शासक पाकिस्तान में पूरी तरह सफल नहीं हो परवेज़ मुशर्रफ़ की दोहरी भूमिका की ओर यह कार्टून संकेत करता है। कार्टून में सका है लेकिन इस देश में लोकतंत्र का दिए गए समीकरण को ध्यान से पढ़े और कार्टून के संदेश को लिखें। जज्बा बहुत मज़बूती के साथ कायम रहा है। पाकिस्तान में अपेक्षाकृत स्वतंत्र और बांग्लादेश में लोकतंत्र साहसी प्रेस मौजूद है और वहाँ मानवाधिकार आंदोलन भी काफी मजबूत है। 1947 से 1971 तक बांग्लादेश पाकिस्तान का पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शासन चले- अंग था। अंग्रेजी राज के समय के बंगाल और इसके लिए कोई खास अंतर्राष्ट्रीय समर्थन । असम के विभाजित हिस्सों से पूर्वी पाकिस्तान नहीं मिलता। इस वजह से भी सेना को । | का यह क्षेत्र बना था। इस क्षेत्र के लोग अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए बढ़ावा । पश्चिमी पाकिस्तान के दबदबे और अपने मिला है। अमरीका तथा अन्य पश्चिमी देशों ऊपर उर्दू भाषा को लादने के ख़िलाफ़ थे। ने अपने-अपने स्वार्थों से गुज़रे वक्त में पाकिस्तान के निर्माण के तुरंत बाद ही यहाँ के पाकिस्तान में सैनिक शासन को बढ़ावा दिया। लोगों ने बंगाली संस्कृति और भाषा के साथ इन देशों को उस आतंकवाद से डर लगता है। किए जा रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ़ विरोध जिसे ये देश 'विश्वव्यापी इस्लामी आतंकवाद जताना शुरू कर दिया। इस क्षेत्र की जनता ने कहते हैं। इन देशों को यह भी डर सताता है। प्रशासन में अपने न्यायोचित प्रतिनिधित्व तथा एक ओर पूर्वी और कि पाकिस्तान के परमाण्विक हथियार कहीं राजनीतिक सत्ता में समुचित हिस्सेदारी की पश्चिमी जर्मनी थे जो इन आतंकवादी समूहों के हाथ न लग जाएँ। माँग भी उठायी। पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व मिलकर एक हो गए; इन बातों के मद्देनज़र पाकिस्तान को ये देश । के खिलाफ़ जन-संघर्ष का नेतृत्व शेख दूसरी ओर भारत और 'पश्चिम' तथा दक्षिण एशिया में पश्चिमी मुजीबुर्रहमान ने किया। उन्होंने पूर्वी क्षेत्र के पाकिस्तान हैं, जहाँ लोगों का एक-दूसरे देश में हितों का रखवाला मानते हैं। लिए स्वायत्तता की माँग की। शेख मुजीबुर्रहमान । जाना भी आसान नहीं है। 2015-16(21/01/2015) समकालीन विश्व राजनीति के नेतृत्व वाली अवामी लीग को 1970 के खड़ी हुई। भारत की सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान चुनावों में पूर्वी पाकिस्तान की सारी सीटों पर । के लोगों की आज़ादी की माँग का समर्थन विजय मिली। अवामी लीग को संपूर्ण पाकिस्तान । किया और उन्हें वित्तीय और सैन्य सहायता के लिए प्रस्तावित संविधान सभा में बहुमत । दी। इसके परिणामस्वरूप 1971 में भारत और हासिल हो गया। लेकिन सरकार पर पश्चिमी पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। युद्ध की पाकिस्तान के नेताओं का दबदबा था और समाप्ति पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना सरकार ने इस सभा को आहूत करने से इंकार के आत्मसमर्पण तथा एक स्वतंत्र राष्ट्र कर दिया। शेख मुजीब को गिरफ्तार कर लिया। ‘बांग्लादेश' के निर्माण के साथ हुई।। गया। जेनरल याहिया खान के सैनिक शासन में | बांग्लादेश ने अपना संविधान बनाकर उसमें पाकिस्तानी सेना ने बंगाली जनता के आंदोलन । अपने को एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक तथा को कुचलने की कोशिश की। हज़ारों लोग समाजवादी देश घोषित किया। बहरहाल, 1975 पाकिस्तानी सेना के हाथो मारे गए। इस वज़ह । में शेख मुजीबुर्रहमान ने संविधान में संशोधन से पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में लोग कराया और संसदीय प्रणाली की जगह भारत पलायन कर गए। भारत के सामने इन । अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को मान्यता मिली। शरणार्थियों को संभालने की समस्या आन शेख मुजीब ने अपनी पार्टी अवामी लीग को 1987 में जेनरल इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा मारे गए नूर हुसैन की याद में ढाका विश्वविद्यालय में दीवार पर बनी एक चित्रमाला। उसकी पीठ पर अंकित है - गणतंत्र मुक्त पाक। दीवार पर ‘जय बांग्ला’, ‘जय बंगबंधु', ‘विप्लववीर ही सच्चे इंसान हैं’ और ‘क्रांति ही मुक्ति का इकलौता रास्ता है जैसे नारे लिखे हैं। शाहिदुल आलम, ड्रिक से साभार 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया 71 छोड़कर अन्य सभी पार्टियों को समाप्त कर में लोकतांत्रिक सरकारों का कार्यकाल बहुत बांग्लादेश के ग्रामीण दिया। इससे तनाव और संघर्ष की स्थिति पैदा छोटा और समस्याओं से भरा रहा। 1990 के । । हुई। 1975 के अगस्त में सेना ने उनके खिलाफ दशक में नेपाल के माओवादी नेपाल के ज्यादा जानकारी बग़ावत कर दी और इस नाटकीय तथा त्रासद अनेक हिस्सों में अपना प्रभाव जमाने में जुटायें। क्या भारत में घटनाक्रम में शेख मुजीब सेना के हाथो मारे गए। कामयाब हुए। माओवादी, राजा और सत्ताधारी गरीबी कम करने के नये सैनिक-शासक जियाउर्रहमान ने अपनी अभिजन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह करना लिए ऐसा हो जुगत लगा सकते हैं? बांग्लादेश नेशनल पार्टी बनायी और 1979 के चाहते थे। इस वजह से राजा की सेना और चुनाव में विजयी रहे। जियाउर्रहमान की हत्या माओवादी गुरिल्लों के बीच हिंसक लड़ाई हुई और लेफ्टिनेंट जेनरल एच एम इरशाद के छिड़ गई। कुछ समय तक राजा की सेना, नेतृत्व में बांग्लादेश में एक और सैनिक-शासन लोकतंत्र-समर्थकों और माओवादियों के बीच ने बागडोर संभाली। लेकिन, बांग्लादेश की त्रिकोणीय संघर्ष हुआ। 2002 में राजा ने संसद जनता जल्दी ही लोकतंत्र के समर्थन में उठ को भंग कर दिया और सरकार को गिरा दिया। खड़ी हुई। आंदोलन में छात्र आगे-आगे चल रहे। इस तरह नेपाल में जो भी थोड़ा-बहुत लोकतंत्र थे। बाध्य होकर जेनरल इरशाद ने एक हद तक था उसे राजा ने खत्म कर दिया। राजनीतिक गतिविधियों की छूट दी। इसके बाद | अप्रैल 2006 में यहाँ देशव्यापी लोकतंत्र- के समय में जेनरल इरशाद पाँच सालों के लिए। समर्थक प्रदर्शन हुए। संघर्षरत लोकतंत्र-समर्थक राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। जनता के व्यापक । शक्तियों ने अपनी पहली बड़ी जीत हासिल विरोध के आगे झुकते हुए लेफ्टिनेंट जेनरल की जब राजा ज्ञानेन्द्र ने बाध्य होकर संसद को इरशाद को राष्ट्रपति का पद 1990 में छोड़ना बहाल किया। इसे अप्रैल 2002 में भंग कर पड़ा। 1991 में चुनाव हुए। इसके बाद से दिया गया था। मोटे तौर पर अहिंसक रहे इस बांग्लादेश में बहुदलीय चुनावों पर आधारित प्रतिरोध का नेतृत्व सात दलों के गठबंधन प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र कायम है। (सेवेन पार्टी अलाएंस), माओवादी तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने किया। नेपाल में राजतंत्र और लोकतंत्र । नेपाल में लोकतंत्र की आमद अभी नेपाल अतीत में एक हिन्दू-राज्य था फिर मुकम्मल नहीं हुई है। फिलहाल, नेपाल अपने आधुनिक काल में कई सालों तक यहाँ इतिहास के एक अद्वितीय दौर से गुज़र रहा है। संवैधानिक राजतंत्र रहा। संवैधानिक राजतंत्र क्योंकि वहाँ संविधान सभा के गठन की दिशा के दौर में नेपाल की राजनीतिक पार्टियाँ और में कदम उठाए जा रहे हैं। यह संविधानसभा आम जनता ज्यादा खुले और उत्तरदायी शासन नेपाल का संविधान लिखेगी। नेपाल में कुछ की आवाज़ उठाते रहे। लेकिन राजा ने सेना । लोग अब भी मानते हैं कि अलंकारिक अर्थों की सहायता से शासन पर पूरा नियंत्रण कर में राजा का पद कायम रखना ज़रूरी है ताकि लिया और नेपाल में लोकतंत्र की राह अवरुद्ध नेपाल अपने अतीत से जुड़ा रहे। माओवादी हो गई। समूहों ने सशस्त्र संघर्ष की राह छोड़ देने की एक मजबूत लोकतंत्र-समर्थक आंदोलन बात मान ली है। माओवादी चाहते हैं कि की चपेट में आकर राजा ने 1990 में नए संविधान में मूलगामी सामाजिक आर्थिक लोकतांत्रिक संविधान की माँग मान ली। नेपाल पुनर्रचना के कार्यक्रमों को शामिल किया 2015-16(21/01/2015) 72 समकालीन विश्व राजनीति नेपाल तो सचमुच बड़ा रोमांचक जान पड़ता है। काश! मैं नेपाल में होती। जाय। सात दलों के गठबंधन में शामिल हरेक है। ये लोग भारत छोड़कर श्रीलंका आ बसी दल को यह बात स्वीकार हो - ऐसा नहीं एक बड़ी तमिल आबादी के खिलाफ़ हैं। लगता। माओवादी और कुछ अन्य राजनीतिक तमिलों का बसना श्रीलंका के आज़ाद होने के समूह भारत की सरकार और नेपाल के भविष्य बाद भी जारी रहा। सिंहली राष्ट्रवादियों का में भारतीय सरकार की भूमिका को लेकर बहुत मानना था कि श्रीलंका में तमिलों के साथ कोई शंकित हैं। ‘रियायत' नहीं बरती जानी चाहिए क्योंकि श्रीलंका सिर्फ सिंहली लोगों का है। तमिलों श्रीलंका में जातीय संघर्ष और के प्रति उपेक्षा भरे बरताव से एक उग्र तमिल लोकतंत्र राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद हुई। 1983 के बाद हम देख चुके हैं कि आज़ादी (1948) के से उग्र तमिल संगठन 'लिबरेशन टाइगर्स ऑव बाद से लेकर अब तक श्रीलंका में लोकतंत्र तमिल ईलम' (लिट्टे) श्रीलंकाई सेना के कायम है। लेकिन, श्रीलंका को एक कठिन साथ सशस्त्र संघर्ष कर रहा है। इसने 'तमिल चुनौती का सामना करना पड़ा। यह चुनौती न । ईलम' यानी श्रीलंका के तमिलों के लिए एक तो सेना की थी और न ही राजतंत्र की। अलग देश की माँग की है। श्रीलंका के उत्तर श्रीलंका को जातीय संघर्ष का सामना करना । पूर्वी हिस्से पर लिट्टे का नियंत्रण है। पड़ा जिसकी माँग है कि श्रीलंका के एक क्षेत्र श्रीलंका की समस्या भारतवंशी लोगों से को अलग राष्ट्र बनाया जाय। जुड़ी है। भारत की तमिल जनता का भारतीय आज़ादी के बाद से (श्रीलंका को उन । सरकार पर भारी दबाव है कि वह श्रीलंकाई दिनों सिलोन कहा जाता था) श्रीलंका की । तमिलों के हितों की रक्षा करे। भारतीय सरकार राजनीति पर बहुसंख्यक सिंहली समुदाय के ने समय-समय पर तमिलों के सवाल पर हितों की नुमाइंदगी करने वालों का दबदबा रहा श्रीलंका की सरकार से बातचीत की कोशिश यहाँ दो चित्र दिए गए हैं। पहले चित्र में लोकतंत्र समर्थक दुर्गा थापा को लोकतंत्र-बहाली की एक रैली (काठमांडू, 1990) में भाग लेते हुए दिखाया गया है। दूसरी तस्वीर 2006 की है। इसमें भी दुर्गा थापा को दिखाया गया है लेकिन इस बार वे लोकतंत्र बहाली के दूसरे आंदोलन की सफलता का उत्सव मना रही हैं। चित्र - मिन बजराचार्य से साभार 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया 73 केशव, द हिंदू की है। लेकिन 1987 में भारतीय सरकार श्रीलंका के तमिल मसले में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुई। भारत की सरकार ने श्रीलंका से एक समझौता किया तथा श्रीलंका सरकार और तमिलों के बीच रिश्ते सामान्य करने के लिए भारतीय सेना को भेजा। आखिर में भारतीय सेना लिट्टे के साथ संघर्ष में फंस गई। भारतीय सेना की उपस्थिति को श्रीलंका की जनता ने भी कुछ ख़ास पसंद नहीं किया। श्रीलंकाई जनता ने समझा कि भारत श्रीलंका के अंदरूनी मामलों में दखलंदाजी कर रहा है। 1989 में भारत ने अपनी ‘शांति सेना' लक्ष्य हासिल किए बिना वापस बुला ली। श्रीलंका के इस संकट का हिंसक चरित्र बरकरार है। बहरहाल, अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थ के रूप में नार्वे और आइसलैंड जैसे स्कैंडिनेवियाई देश युद्धरत दोनों पक्षों को फिर से आपस में बातचीत करने के लिए राजी कर रहे हैं। श्रीलंका का भविष्य इन्हीं वार्ताओं पर निर्भर है। संघर्षों की चपेट में होने के बाद भी श्रीलंका ने अच्छी आर्थिक वृद्धि और विकास के उच्च स्तर को हासिल किया है। जनसंख्या की वृद्धि-दर पर सफलतापूर्वक नियंत्रण करने वाले विकासशील देशों में श्रीलंका प्रथम है। दक्षिण एशिया के देशों में सबसे पहले श्रीलंका ने ही अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया। गृहयुद्ध से गुजरने के बावजूद कई सालों से इस देश का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद दक्षिण एशिया में सबसे ज्यादा है। अंदरूनी संघर्ष के झंझावातों को झेलकर भी श्रीलंका ने लोकतांत्रिक राजव्यवस्था कायम रखी है। यह कार्टून शांति वार्ताओं में श्रीलंका के नेतृत्व के आगे मौजूद दुविधा को दिखाता है। एक ओर शेर के रूप में सिंहली कट्टरपंथी हैं और दूसरी ओर बाघ के रूप में तमिल उग्रवादी। संबंधों के ऐसे दायरों पर नज़र डालें जहाँ संघर्ष हुए हैं। शीतयुद्ध की समाप्ति का यह अर्थ नहीं कि इस इलाके में भी संघर्ष और तनाव समाप्त हो गए। हम आंतरिक लोकतंत्र या जातीय संघर्ष के मसलों पर हुए टकरावों को देख चुके हैं। लेकिन, कुछ महत्त्वपूर्ण संघर्ष अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति के भी हैं। दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति केंद्रीय है और इस वज़ह से इनमें से अधिकांश संघर्षों का रिश्ता भारत से है। इन संघर्षों में सबसे प्रमुख और सर्वग्रासी संघर्ष भारत और पाकिस्तान के बीच का संघर्ष है। विभाजन के तुरंत बाद दोनों देश कश्मीर के मसले पर लड़ पड़े। पाकिस्तान की सरकार का दावा था कि कश्मीर पाकिस्तान का है। भारत और पाकिस्तान के बीच 1947-48 तथा 1965 के युद्ध से इस मसले का समाधान नहीं हुआ। 1948 के युद्ध के फलस्वरूप कश्मीर के दो हिस्से हो गए। एक हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहलाया जबकि दूसरा हिस्सा भारत का जम्मू-कश्मीर प्रान्त बना। दोनों के भारत-पाकिस्तान संघर्ष आइए, अब हम घरेलू राजनीति के दायरे से बाहर निकलें और इस क्षेत्र के अंतर्राष्ट्रीय 2015-16(21/01/2015) 74 समकालीन विश्व राजनीति केशव, द हिंदू लेकिन, दोनों देशों की सरकारें लगातार भारत-पाक रिश्ते एक दूसरे को संदेह की नज़र से देखती हैं। बंकों की भूल-भुलैया से कुर्सी-मेजों की भूल-भुलैया तेके भारत सरकार का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार ने लुके-छुपे ढंग से हिंसा की रणनीति जारी रखी है। आरोप है कि वह कश्मीरी उग्रवादियों को हथियार, प्रशिक्षण और धन देता है तथा भारत पर आतंकवादी हमले के लिए उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। भारत सरकार का यह भी मानना है कि पाकिस्तान ने 1985-1995 की अवधि में खालिस्तान-समर्थक उग्रवादियों को हथियार तथा गोले-बारुद दिए थे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (आईएसआई) पर बांग्लादेश और नेपाल के गुप्त ठिकानों से पूर्वोत्तर भारत में भारत-विरोधी भारत-पाक वार्ताओं के चालू दौर पर एक नजरिया अभियानों में संलग्न होने का आरोप है। इसके जवाब में पाकिस्तान की सरकार भारतीय सरकार बीच एक नियंत्रण-सीमा रेखा है। 1971 में और उसकी खुफिया एजेंसियों पर सिंध और भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ एक निर्णायक बलूचिस्तान में समस्या को भड़काने का आरोप युद्ध जीता लेकिन कश्मीर मसला अनसुलझा । लगाती है। ही रहा। भारत और पाकिस्तान के बीच नदी- सामरिक मसलों जैसे सियाचिन ग्लेशियर जल के बँटवारे के सवाल पर भी तनातनी हुई पर नियंत्रण तथा हथियारों की होड़ को लेकर है। 1960 तक दोनों के बीच सिन्धु नदी के भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनातनी। इस्तेमाल को लेकर तीखे विवाद हुए। संयोग रहती है। 1990 के दशक में दोनों देशों ने । से, 1960 में विश्व बैंक की मदद से भारत परमाणु हथियार और ऐसे हथियारों को एक-दूसरे और पाकिस्तान ने ‘सिंधु-जल संधि पर दस्तखत पर दागने की क्षमता वाले मिसाइल हासिल कर । किए और यह संधि भारत-पाक के बीच कई लिए। इससे दोनों देशों के बीच हथियारों की सैन्य संघर्षों के बावजूद अब भी कायम है। होड़ ने एक नया चरित्र ग्रहण किया है। 1998 हालाँकि सिंधु जल-संधि की व्याख्या और में भारत ने पोखरण में और इसके कुछ दिनों नदी-जल के इस्तेमाल को लेकर अभी भी के अंदर ही पाकिस्तान ने चगाई पहाड़ी पर । कुछ छोटे-मोटे विवाद हैं। कच्छ के रन में कश्मीर मसले पर होने वाली परमाणु परीक्षण किए। इसके बाद से ऐसा सरक्रिक की सीमारेखा को लेकर दोनों देशों बातचीत ऐसी जान पड़ती है। मानो भारत और पाकिस्तान के लगता है कि भारत और पाकिस्तान एक के बीच मतभेद हैं। यह विवाद छोटा जान शासक अपनी जायदाद का सैन्य-संबंध में बंध चुके हैं और इनके बीच । पड़ता है लेकिन इसके साथ एक चिन्ता झगड़ा निपटा रहे हों। सीधे और सर्वव्यापी युद्ध छिड़ने की आशंका जुड़ी हुई है। इस विवाद का समाधान जिस कश्मीरियों को इसमें कैसा । कम हो गई है। ढंग से किया जाएगा उसका असर सरक्रिक लगता होगा? 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया 75 ऐसा क्यों है कि हर पड़ोसी देश को भारत से । कुछ-न-कुछ परेशानी है? क्या हमारी विदेश नीति में कुछ गड़बड़ी है? या यह केवल हमारे बड़े होने के कारण है? इलाके से सटे समुद्री-संसाधन के नियंत्रण पर ज़रूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता बरतकर भी पड़ेगा। भारत और पाकिस्तान के बीच इन । सहयोग के दायरे को बढ़ाया जाए। सभी मामलों के बारे में वार्ताओं के दौर चल । भारत और नेपाल के बीच मधुर संबंध हैं। रहे हैं। और दोनों देशों के बीच एक संधि हुई है। इस संधि के तहत दोनों देशों के नागरिक एक-दूसरे भारत और उसके अन्य पड़ोसी देश के देश में बिना पासपोर्ट (पारपत्र) और वीज़ा बांग्लादेश और भारत के बीच गंगा और । के आ-जा सकते हैं और काम कर सकते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के जल में हिस्सेदारी सहित कई खास संबंधों के बावजूद दोनों देश के बीच । मुद्दों पर मतभेद हैं। भारतीय सरकारों के बांग्लादेश अतीत में व्यापार से संबंधित मनमुटाव पैदा हुए से नाखुश होने के कारणों में भारत में अवैध हैं। नेपाल की चीन के साथ दोस्ती को लेकर आप्रवास पर ढाका के खंडन, भारत-विरोधी भारत सरकार ने अक्सर अपनी अप्रसन्नता जतायी इस्लामी कट्टरपंथी जमातों को समर्थन, भारतीय है। नेपाल सरकार भारत-विरोधी तत्त्वों के खिलाफ सेना को पूर्वोत्तर भारत में जाने के लिए अपने कदम नहीं उठाती। इससे भी भारत नाखुश है। इलाके से रास्ता देने से बांग्लादेश के इंकार, भारत की सुरक्षा एजेंसियाँ नेपाल में चल रहे ढाका के भारत को प्राकृतिक गैस निर्यात न माओवादी आंदोलन को अपनी सुरक्षा के लिए करने के फैसले तथा म्यांमार को बांग्लादेशी खतरा मानती हैं क्योंकि भारत में बिहार से लेकर इलाके से होकर भारत को प्राकृतिक गैस आन्ध्र प्रदेश तक विभिन्न प्रांतों में नक्सलवादी निर्यात न करने देने जैसे मसले शामिल हैं। समूहों का उभार हुआ है। नेपाल में बहुत से बांग्लादेश की सरकार का मानना है कि भारतीय लोग यह सोचते हैं कि भारत की सरकार नेपाल सरकार नदी-जल में हिस्सेदारी के सवाल पर के अंदरूनी मामलों में दखल दे रही है और इलाके के दादा की तरह बरताव करती है। उसके नदी जल तथा पनबिजली पर आँख इसके अलावा भारत की सरकार पर चटगाँव । गड़ाए हुए है। चारों तरफ से जमीन से घिरे पर्वतीय क्षेत्र में विद्रोह को हवा देने; बांग्लादेश नेपाल को लगता है कि भारत उसको अपने के प्राकृतिक गैस में सेंधमारी करने और भूक्षेत्र से होकर समुद्र तक पहुँचने से रोकता है। व्यापार में बेईमानी बरतने के भी आरोप हैं। बहरहाल भारत-नेपाल के संबंध एकदम मज़बूत विभेदों के बावजूद भारत और बांग्लादेश और शांतिपूर्ण है। विभेदों के बावजूद दोनों देश कई मसलों पर सहयोग करते हैं। पिछले दस व्यापार, वैज्ञानिक सहयोग, साझे प्राकृतिक संसाध वर्षों के दौरान दोनों के बीच आर्थिक संबंध न, बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन ग्रिड के ज्यादा बेहतर हुए हैं। बांग्लादेश भारत के मसले पर एक साथ हैं। नेपाल में लोकतन्त्र की ‘पूरब चलो' की नीति का हिस्सा है। इस नीति । बहाली से दोनों देशों के बीच संबंधों के और के अन्तर्गत म्यांमार के ज़रिए दक्षिण-पूर्व मजबूत होने की उम्मीद बंधी है। एशिया से संपर्क साधने की बात है। श्रीलंका और भारत की सरकारों के संबंधों आपदा प्रबंधन और पर्यावरण के मसले पर में तनाव इस द्वीप में जारी जातीय संघर्ष को भी दोनों देशों ने निरंतर सहयोग किया है। इस लेकर है। जब तमिल आबादी राजनीतिक रूप बात के भी प्रयास किए जा रहे हैं कि साझे से नाखुश हो और उसे मारा जा रहा हो तो ऐसे खतरों को पहचान कर तथा एक दूसरे की में भारतीय नेताओं और जनता का तटस्थ बने 2015-16(21/01/2015) समकालीन विश्व राजनीति चरण | कक्षा में सात समूह बनाएँ यानी दक्षिण एशिया में जितने देश हैं उतने समूह। हर समूह में आप छात्रों को अलग-अलग संख्या में रख सकते हैं ताकि दक्षिण एशिया के देशों के आकार को इंगित किया जा सके। E| प्रत्येक समूह को एक देश का नाम दें। समूह का नाम जिस देश के नाम पर रखें उस समूह को उक्त देश के कुछ तथ्यों की जानकारी दें। इसमें कुछ बुनियादी सूचनाएँ हों और दक्षिण एशिया के शेष देशों के साथ इस देश के मतभेद वाले मुद्दों/विवादों की संक्षिप्त चर्चा हो। इस अध्याय में जो मुद्दे बताये गए हैं उन्हें भी रखा जा सकता है। आप चाहें तो कोई और प्रासंगिक मुद्दा ले सकते हैं। जिसकी चर्चा इस अध्याय में नहीं की गई है। | छात्रों से कहें कि वे अपनी पसंद का कोई मुद्दा चुन लें। विवाद का यह मुद्दा द्विपक्षीय भी हो सकता है और बहुपक्षीय भी (मुद्दा भारत केंद्रित होगा। इसके कारण स्पष्ट हैं)। | प्रत्येक समूह से कहें कि उनके देश की सरकार ने अतीत में विवादों के समाधान के लिए जो कदम उठाए हैं उसकी खोजबीन करें। छात्र यह भी बताएं कि विवाद के समाधान के प्रयास क्यों असफल हुए? | प्रत्येक समूह के छात्र अपने देश की नुमाइंदगी करें और दूसरे समूह के साथ अपने निष्कर्षों को मिलायें। अध्यापकों के लिए समान मसलों/विवादों वाले देशों को एक साथ रखें। मामला द्विपक्षीय हो तो दो समूह होंगे। अगर मामले बहुपक्षीय हैं तो ज्यादा समूह बनेंगे। (द्विपक्षीय मामलों के उदाहरण हैं - भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर का मामला या भारत और बांग्लादेश के बीच आप्रवासियों का मामला। बहुपक्षीय मामले का उदाहरण है आतंकवाद या मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने से जुड़े मुद्दे)। । समूहों को एक तय समय सीमा में समाधान के प्रस्तावों पर बातचीत करनी है। अध्यापक इस बातचीत के परिणाम को लिख लें। ध्यान इस बात पर रहे कि सहमति किस बिंदु पर बनी और असहमति किस बिंदु पर।। दक्षिण एशिया के देशों में मौजूद स्थिति से बातचीत के इन परिणामों का मिलान करें। प्रदत्त तथ्यों के आधार पर किसी राजनीतिक मुद्दे पर बातचीत में जो कठिनाई आई हो उसकी चर्चा करें। शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए एक-दूसरे के हितों से तालमेल बैठाना ज़रूरी है - इस मसले पर चर्चा करके इस अभ्यास को समाप्त करें। रहना असंभव लगता है। 1987 के सैन्य हस्तक्षेप के बाद से भारतीय सरकार श्रीलंका के अंदरूनी मामलों में असलंग्नता की नीति पर अमल कर रही है। भारत सरकार ने श्रीलंका के साथ एक मुक्त व्यापार समझौते पर दस्तखत किए हैं। इससे दोनों देशों के संबंध मज़बूत हुए हैं। श्रीलंका में ‘सुनामी' से हुई तबाही के बाद के पुनर्निर्माण कार्यों में भारतीय मदद से भी दोनों देश एक दूसरे के करीब आए हैं। भारत के भूटान के साथ भी बहुत अच्छे रिश्ते हैं और भूटानी सरकार के साथ कोई बड़ा झगड़ा नहीं है। भूटान से अपने काम का संचालन कर रहे पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादियों और गुरिल्लों को भूटान ने अपने क्षेत्र से खदेड़ भगाया। भूटान के इस कदम से भारत को बड़ी मदद मिली है। भारत भूटान में पनबिजली की बड़ी परियोजनाओं में हाथ बँटा रहा है। इस हिमालयी देश के विकास कार्यों के लिए सबसे ज्यादा अनुदान भारत से हासिल होता है। मालदीव के साथ भारत के संबंध सौहार्दपूर्ण तथा गर्मजोशी से भरे हैं। 1988 में श्रीलंका से आए कुछ भाड़े के तमिल सैनिकों ने मालदीव पर हमला किया। मालदीव ने जब आक्रमण रोकने के लिए भारत से मदद माँगी तो भारतीय वायुसेना और नौसेना ने तुरंत कार्रवाई की। भारत ने मालदीव के आर्थिक विकास, पर्यटन और मत्स्य उद्योग में भी मदद की है। आपने ध्यान दिया होगा कि दक्षिण एशिया के छोटे-छोटे पड़ोसियों के साथ भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भारत का आकार बड़ा है और वह शक्तिशाली है। इसकी वजह से अपेक्षाकृत छोटे देशों का भारत के इरादों को लेकर शक करना लाजिमी है। दूसरी तरफ, भारत सरकार को अक्सर महसूस होता है कि उसके पड़ोसी देश उसका 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया 77 बेज़ा फायदा उठा रहे हैं। भारत नहीं चाहता 2002 में ‘दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार-क्षेत्र कि इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो। समझौते' (SAFTA) पर दस्तखत किये। उसे भय लगता है कि ऐसी स्थिति में बाहरी । इसमें पूरे दक्षिण एशिया के लिए मुक्त व्यापार ताकतों को इस क्षेत्र में प्रभाव जमाने में मदद । क्षेत्र बनाने का वायदा है। मिलेगी। छोटे देशों को लगता है कि भारत । । यदि दक्षिण एशिया के सभी देश अपनी दक्षिण एशिया में अपना दबदबा कायम करना सीमारेखा के आर-पार मुक्त-व्यापार पर सहमत चाहता है। हो जाएँ तो इस क्षेत्र में शांति और सहयोग के दक्षिण एशिया के सारे झगड़े सिर्फ भारत । एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है। और उसके पड़ोसी देशों के बीच ही नहीं है। दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौते नेपाल-भूटान तथा बांग्लादेश-म्यांमार के बीच (SAFTA) के पीछे यही भावना काम कर जातीय मूल के नेपालियों के भूटान आप्रवास । रही है। इस समझौते पर 2004 में हस्ताक्षर हुए तथा रोहिंग्या लोगों के म्यांमार में आप्रवास के और यह समझौता 1 जनवरी 2006 से प्रभावी मसले पर मतभेद रहे हैं। बांग्लादेश और नेपाल हो गया। इस समझौते का लक्ष्य है कि इन के बीच हिमालयी नदियों के जल की हिस्सेदारी देशों के बीच आपसी व्यापार में लगने वाले को लेकर खटपट है। यह बात सही है कि इस सीमा शुल्क को 2007 तक बीस प्रतिशत तक इलाके के सभी बड़े झगड़े भारत और उसके कम कर दिया जाए। कुछ छोटे देश मानते हैं कि पड़ोसी देशों के बीच हैं। इसका एक कारण ‘साफ्टा' की ओट लेकर भारत उनके बाज़ार में दक्षिण एशिया का भूगोल भी है जहाँ भारत बीच में स्थित है और बाकी देश भारत की सीमा के इर्द-गिर्द पड़ते हैं। अगर अमरीका के बारे में लिखे गए अध्याय को * अमरीकी वर्चस्व का शीर्षक दिया गया तो इस अध्याय को भारतीय वर्चस्व क्यों नहीं कहा गया? शांति और सहयोग क्या दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे का सहयोग करते हैं या ये देश एक-दूसरे से सिर्फ़ लड़ते रहते हैं? अनेक संघर्षों के बावजूद दक्षिण एशिया के देश आपस में दोस्ताना रिश्ते तथा सहयोग के महत्त्व को पहचानते हैं। शांति के प्रयास द्विपक्षीय भी हुए हैं और क्षेत्रीय स्तर पर भी। दक्षेस (साउथ एशियन एसोशियन फॉर रिजनल कोऑपरेशन (SAARC) दक्षिण एशियाई देशों द्वारा बहुस्तरीय साधनों से आपस में सहयोग करने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है। इसकी शुरुआत 1985 में हुई। दुर्भाग्य से विभेदों की मौजूदगी के कारण दक्षेस को ज्यादा सफलता नहीं मिली है। दक्षेस के सदस्य देशों ने सन् । सुरेंदर, द हिंदू यह कार्टून क्षेत्रीय सहयोग की प्रगति में भारत और पाकिस्तान की भूमिका के बारे में क्या बताता है? 2015-16(21/01/2015) समकालीन विश्व राजनीति जनाब हू। कारोबार, कामर्स, इकोनोमी! आप भारत के साथ केवल बुनियादी मुद्दों की बातें क्यों नहीं करते? केशव, द हिंदू ऑनलाइन पाकिस्तान ट्रिब्यून अंपायर को तय करना है। कि गेंद भारत के पाले में है या पाकिस्तान के। सेंध मारना चाहता है और व्यावसायिक उद्यम तथा व्यावसायिक मौजूदगी के जरिये उनके समाज और राजनीति पर असर डालना चाहता है। भारत सोचता है कि 'साफ्टा' से इस क्षेत्र के हर देश को फायदा होगा और क्षेत्र में मुक्त व्यापार बढ़ने से राजनीतिक मसलों पर सहयोग ज्यादा बेहतर होगा। भारत में कुछ लोगों का मानना है। कि ‘साफ्टा' के लिए परेशान होने की ज़रूरत नहीं क्योंकि भारत भूटान, नेपाल और श्रीलंका से पहले ही द्विपक्षीय व्यापार समझौता कर चुका है। हालाँकि भारत और पाकिस्तान के संबंध कभी खत्म न होने वाले झगड़ों और हिंसा की एक कहानी जान पड़ते हैं फिर भी तनाव को कम करने और शांति बहाल करने के लिए इन देशों के बीच लगातार प्रयास हुए हैं। दोनों देश युद्ध के जोखिम कम करने के लिए विश्वास बहाली के उपाय करने पर सहमत हो गये हैं। सामाजिक कार्यकर्ता और महत्त्वपूर्ण हस्तियाँ दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती का माहौल बनाने के लिए एकजुट हुई हैं। दोनों देशों के नेता एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझने और दोनों देशों के बीच मौजूद बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए सम्मेलनों में भेंट करते हैं। पिछले पाँच वर्षों के दौरान दोनों देशों के पंजाब वाले हिस्से के बीच कई बस-मार्ग खुले हैं। अब वीज़ा आसानी से मिल जाते हैं। कोई भी क्षेत्र हवा में नहीं होता। चाहे कोई क्षेत्र अपने को गैर इलाकाई ताकतों से अलग रखने की जितनी भी कोशिश करे उस पर बाहरी ताकतों और घटनाओं का असर पड़ता ही है। चीन और संयुक्त राज्य अमरीका दक्षिण एशिया की राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले दस वर्षों में भारत और चीन के संबंध बेहतर हुए हैं। चीन की रणनीतिक साझेदारी पाकिस्तान के साथ है और यह भारत-चीन संबंधों में एक बड़ी कठिनाई है। विकास की ज़रूरत और वैश्वीकरण के कारण एशिया महादेश के ये दो बड़े देश ज्यादा नजदीक आये हैं। सन् 1991 के बाद से इनके आर्थिक संबंध ज्यादा मज़बूत हुए हैं। शीतयुद्ध के बाद दक्षिण एशिया में अमरीकी प्रभाव तेजी से बढ़ा है। अमरीका ने शीतयुद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों से अपने संबंध बेहतर किए हैं। वह भारत-पाक के बीच लगातार मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। दोनों देशों में आर्थिक सुधार हुए हैं और उदार नीतियाँ अपनाई गई हैं। इससे दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान से लिए गए दो कार्टून इस क्षेत्र में दिलचस्पी रखने वाले दो बाहरी खिलाड़ियों की भूमिका की व्याख्या करते हैं। ये बाहरी खिलाड़ी कौन हैं? क्या आपको इन दोनों के दृष्टिकोण में कुछ समानता । दिखाई देती है? लगता है हर संगठन व्यापार के लिए ही बनता है? क्या व्यापार लोगों के आपसी मेलजोल से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? 2015-16(21/01/2015) समकालीन दक्षिण एशिया 79 अमरीकी भागीदारी ज्यादा गहरी हुई है। अमरीका बहरहाल, दक्षिण एशिया को संघर्षों की में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों की संख्या आशंका वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता रहेगा अच्छी-खासी है। फिर, इस क्षेत्र की जनसंख्या अथवा यह एक ऐसे क्षेत्रीय गुट के रूप में और बाजार का आकार भी भारी भरकम है। उभरेगा जिसके सांस्कृतिक गुण-धर्म तथा व्यापारिक इस कारण इस क्षेत्र की सुरक्षा और शांति के । हित एक हैं - यह बात किसी बाहरी शक्ति से भविष्य से अमरीका के हित भी बंधे हुए हैं। ज्यादा यहाँ के लोगों और सरकारों पर निर्भर है। प्रश्नावली 1. देशों की पहचान करें - (क) राजतंत्र, लोकतंत्र-समर्थक समूहों और अतिवादियों के बीच संघर्ष के कारण राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना। (ख) चारों तरफ भूमि से घिरा देश। (ग) दक्षिण एशिया का वह देश जिसने सबसे पहले अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया। (घ) सेना और लोकतंत्र-समर्थक समूहों के बीच संघर्ष में सेना ने लोकतंत्र के ऊपर बाजी मारी। दक्षिण एशिया के केंद्र में अवस्थित। इस देश की सीमाएँ दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों से मिलती हैं। पहले इस द्वीप में शासन की बागडोर सुल्तान के हाथ में थी। अब यह एक गणतंत्र है। (छ) ग्रामीण क्षेत्र में छोटी बचत और सहकारी ऋण की व्यवस्था के कारण इस देश को ग़रीबी कम करने में मदद मिली है। (ज) एक हिमालयी देश जहाँ संवैधानिक राजतंत्र है। यह देश भी हर तरफ से भूमि से घिरा है। 2. दक्षिण एशिया के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गलत है? (क) दक्षिण एशिया में सिर्फ एक तरह की राजनीतिक प्रणाली चलती है। (ख) बांग्लादेश और भारत ने नदी-जल की हिस्सेदारी के बारे में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। (ग) साफ्टा' पर हस्ताक्षर इस्लामाबाद के 12वें सार्क-सम्मेलन में हुए। (घ) दक्षिण एशिया की राजनीति में चीन और संयुक्त राज्य अमरीका महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। (च) । 3. पाकिस्तान के लोकतंत्रीकरण में कौन-कौन सी कठिनाइयाँ हैं? 4. नेपाल के लोग अपने देश में लोकतंत्र को बहाल करने में कैसे सफल हुए? 5. श्रीलंका के जातीय-संघर्ष में किनकी भूमिका प्रमुख है? 6. भारत और पाकिस्तान के बीच हाल में क्या समझौते हुए? । 7. ऐसे दो मसलों के नाम बताएँ जिन पर भारत-बांग्लादेश के बीच आपसी सहयोग है और इसी तरह दो ऐसे मसलों के नाम बताएँ जिन पर असहमति है। 8. दक्षिण एशिया में द्विपक्षीय संबंधों को बाहरी शक्तियाँ कैसे प्रभावित करती हैं? 2015-16(21/01/2015) समकालीन विश्व राजनीति प्रश्नावली 9. दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक सहयोग की राह तैयार करने में दक्षेस (सार्क) की भूमिका और सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें। दक्षिण एशिया की बेहतरी में ‘दक्षेस' (सार्क) ज्यादा बड़ी भूमिका निभा सके, इसके लिए आप क्या सुझाव देंगे? 10. दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे पर अविश्वास करते हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह क्षेत्र एकजुट होकर अपना प्रभाव नहीं जमा पाता। इस कथन की पुष्टि में कोई भी दो उदाहरण दें और दक्षिण एशिया को मजबूत बनाने के लिए उपाय सुझाएँ। 11. दक्षिण एशिया के देश भारत को एक बाहुबली समझते हैं जो इस क्षेत्र के छोटे देशों पर अपना दबदबा जमाना चाहता है और उनके अंदरूनी मामलों में दखल देता है। इन देशों की ऐसी सोच के लिए कौन-कौन सी बातें जिम्मेदार हैं? 2015-16(21/01/2015)

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