यूरोपीय संघ जब दूसरा विश्व यु( समाप्त हुआ तब यूरोप के अनेक नेता ‘यूरोप के सवालों’ को लेकर परेशान रहे। क्या यूरोप को अपनी पुरानी दुश्मनियों को पिफर से शुरू करना चाहिए या अंतरार्ष्ट्रीय संबंधें में सकारात्मक योगदान करने वाले सि(ांतों और संस्थाओं के आधर पर उसे अपने संबंधें को नए सिरे से बनाना चाहिए? दूसरे विश्वयु( ने उन अनेक मान्यताओं और व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर दिया जिसके आधर पर यूरोपीय देशों के आपसी संबंध् बने थे। 1945 तक यूरोपीय देशों ने अपनी अथर्व्यवस्थाओं की बबार्दी तो झेली ही, उन मान्यताओं और व्यवस्थाओं को ध्वस्त होते भी देख लिया जिन पर यूरोप खड़ा हुआ था। 1945 के बाद यूरोप के देशों में मेल - मिलाप को शीतयु( से भी मदद मिली। अमरीका ने यूरोप की अथर्व्यवस्था के पुनगर्ठन के लिए जबरदस्त मदद की। इसे माशर्ल योजना के नाम से जाना जाता है। अमेरिका ने ‘नाटो’ के तहत एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को जन्म दिया। माशर्ल योजना के तहत ही 1948 में यूरोपीय आथ्िार्क सहयोग संगठन की स्थापना की गइर् जिसके माध्यम से पश्िचमी यूरोप के देशों को आथ्िार्क मदद दी गइर्। यह एक ऐसा यूरोपीय संघ का झंडा सोने के रंग के सितारों का घेरा यूरोप के लोगों की एकता और मेलमिलाप का प्रतीक है। इसमें 12 सितारें हैं क्योंकि बारह की संख्या को वहाँ पारंपरिक रूप से पूणर्ता, समग्रता और एकता का प्रतीक माना जाता है। स्रोतः ीजजचरूध्ध् मनतवचंण्मनध्ंइबध्ेलउइवसेध्मउइसमउध्पदकमगऋमदण्ीजउ मंच बन गया जिसके माध्यम से पश्िचमी यूरोप के देशों ने व्यापार और आथ्िार्क मामलों में एक - दूसरे की मदद शुरू की। 1949 में गठित यूरोपीय परिषद् राजनैतिक सहयोग के मामले में एक अगला कदम साबित हुइर्। यूरोप के पूंजीवादी देशों की अथर्व्यवस्था के आपसी एकीकरण की प्रिया चरणब( ढंग से आगे बढ़ी ;इस एकीकरण का कालक्रम देखेंद्ध और इसके परिणामस्वरूप 1957 में यूरोपीयन इकाॅनामिक कम्युनिटी का गठन हुआ। यूरोपीयन पालिर्यामेंट के गठन के बाद इस प्रिया ने राजनीतिक स्वरूप प्राप्त कर लिया। सोवियत गुट के पतन के बाद इस प्रिया में तेजी आयी और 1992 में इस प्रिया की परिणति यूरोपीय संघ की स्थापना के रूप में हुइर्। यूरोपीय संघ के रूप में समान विदेश और सुरक्षा नीति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और एकसमान मुद्रा के चलन के लिए रास्ता तैयार हो गया। एक लम्बे समय में बना यूरोपीय संघ आथ्िार्क सहयोग वाली व्यवस्था से बदलकर ज्यादा से ज्यादा राजनैतिक रूप लेता गया है। अब यूरोपीय संघ स्वयं कापफी हद तक एक विशाल राष्ट्र - राज्य की तरह ही काम करने लगा है। हाँलाकि यूरोपीय संघ का एक संविधन बनाने की कोश्िाश तो असपफल हो गइर् लेकिन इसका अपना झंडा, गान, स्थापना - दिवस और अपनी मुद्रा है। अन्य देशों से संबंधें के मामले में इसने कापफी हद तक साझी विदेश और सुरक्षा नीति भी बना ली है। नये सदस्यों को शामिल करते हुए यूरोपीय संघ ने सहयोग के दायरे में विस्तार की कोश्िाश की। नये सदस्य मुख्यतः भूतपूवर् सोवियत खेमे के थे। यह प्रिया आसान नहीं रही। अनेक देशों के लोग इस बात को लेकर वुफछ ख़ास उत्साहित नहीं थे कि जो 53 के अस्थायी सदस्यों में शामिल हैं। इसके चलते यूरोपीय संघ अमरीका समेत सभी मुल्कों की नीतियों को प्रभावित करता है। इर्रान के परमाणु कायर्क्रम से संबंध्ित अमरीकी नीतियों को हाल के दिनों में प्रभावित करना इसका एक उदाहरण है। चीन के साथ मानवािाकारों के उल्लंघन और पयार्वरण विनाश के मामलों पर ध्मकी या सैनिक शक्ित का उपयोग करने की जगह वूफटनीति, आथ्िार्क निवेश और बातचीत की इसकी नीति ज्यादा प्रभावी साबित हुइर् है। सैनिक ताकत के हिसाब से यूरोपीय संघ के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। इसका वुफल रक्षा बजट अमरीका के बाद सबसे अध्िक है। यूरोपीय संघ केदो देशों μ बि्रटेन और Úांस के पास परमाणु हथ्िायार हैं और अनुमान है कि इनके शखीरे में करीब 550 परमाणु हथ्िायार हैं। अंतरिक्ष विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी के मामले में भी यूरोपीय संघ का दुनिया में दूसरा स्थान है। अध्िराष्ट्रीय संगठन के तौर पर यूरोेपीय संघ आथ्िार्क, राजनैतिक और सामाजिक मामलों में दखल देने में सक्षम है। लेकिन अनेक मामलों में इसके सदस्य देशों की अपनी विदेश और रक्षा नीति है जो कइर् बार एक - दूसरे के ख्िालापफ भी होती है। यही कारण है कि इराक पर अमरीकी हमले में बि्रटेन के प्रधानमंत्राी टोनी ब्लेयर तो उसके साथ थेलेकिन जमर्नी और Úांस इस हमले के ख्िालापफ थे। यूरोपीय संघ के कइर् नए सदस्य देश भी अमरीकी गठबंध्न में थे। यूरोप के वुफछ हिस्सों में यूरो को लागू करने के कायर्क्रम को लेकर कापफी नाराजगी है। यही कारण है कि बि्रटेन की पूवर् प्रधनमंत्राी मागर्रेट थैचर ने बि्रटेन को यूरोपीय बाशार से अलग रखा। डेनमावर्फ और स्वीडन ने मास्िट्रस्ट संध्ि और साझी यूरोपीय मुद्रा यूरो को मानने का प्रतिरोध् किया। इससे विदेशी और रक्षा मामलों में काम करने की यूरोपीय संघ की क्षमता सीमित होती है। 55 दक्ष्िाण पूवर् एश्िायाइर् राष्ट्रों का संगठन;आसियानद्ध ़ख़्याल से कौन - से देश एश्िाया के दक्ष्िाणी क्षेत्रा में आने चाहिए? दूसरे विश्व यु( से पहले और उसके दौरान, एश्िाया का यह हिस्सा बार - बार यूरोपीय और जापानी उपनिवेशवाद का श्िाकार हुआ तथा भारी राजनैतिक और आथ्िार्क कीमत चुकाइर्। यु( समाप्त होने पर इसे राष्ट्र - निमार्ण, आथ्िार्क पिछड़ेपन और गरीबी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसे शीतयु( के दौर में किसी एक महाशक्ित के साथ जाने के दबावों को भी झेलना पड़ा। टकरावों और भागमभाग की ऐसी स्िथति को दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया संभालने की स्िथति में दुनिया के नक्शे पर एक नशर डालंे। आपके नहीं था। बांडंुग सम्मेलन और गुटनिरपेक्ष आंदोलन वगैरह के माध्यम से एश्िाया और तीसरी दुनिया के देशों में एकता कायम करने के प्रयास अनौपचारिक स्तर पर सहयोग और मेलजोल कराने के मामले में कारगर नहीं हो रहे थे। इसी के चलते दक्ष्िाण - पूवर् एश्िायाइर् देशों ने दक्ष्िाण - पूवर् एश्िायाइर् संगठन ;आसियानद्ध बनाकर एक वैकल्िपक पहल की। 1967 में इस क्षेत्रा के पाँच देशों ने बैंकाॅक घोषणा पर हस्ताक्षर करके ‘आसियान’ की स्थापना की। ये देश थे इंडोनेश्िाया, मलेश्िाया, पिफलिपींस, सिंगापुर और थाइर्लैंड। ‘आसियान’ का उद्देश्य मुख्य रूप से आथ्िार्क विकास को तेज करना और उसके माध्यम से सामाजिकऔर सांस्कृतिक विकास हासिल करना था। कानून के शासन और संयुक्त राष्ट्र के कायदों कल्पना कीजिए, क्या होता अगर पूरे यूरोपीय संघ की एक पुफटबाल टीम होती? 56 पूवर् और दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया का मानचित्रा अन्य व्यवस्थाओं को अपने हाथ में रूस लेने का लक्ष्य नहीं रखा। अनौपचारिक, टकरावरहित और सहयोगात्मक मेल - मिलाप का नया मंगोलिया उदाहरण पेश करके आसियान ने उत्तर कापफी यश कमाया है और इसको कोरिया ‘आसियान शैली’ ;।ैम्।छ ूंलद्ध चीन दक्ष्िाणकोरिया जापान ही कहा जाने लगा है। आसियान के कामकाज में राष्ट्रीय सावर्भौमिकता नेपाल भारत भूटान उत्तरप्रशांत महासागर का सम्मान करना बहुत ही महत्त्वपूणर् रहा है। बंाग्लादेश म्यांमार दुनिया में सबसे तेज रफ्रतार से बंगाल कीखाड़ी लाओस थाइलैंड ;बमार्द्ध हाँगकाँग कंबोडिया वियतनाम पिफलिपींस आथ्िार्क तरक्की करने वाले सदस्य देशों के समूह आसियान ने अब अपने उद्देश्यों को आथ्िार्क और सामाजिक दायरे से ज्यादा व्यापक बनाया है। 2003 में आसियान ने सिंगापुर मलेश्िाया मलेश्िायाब्रुनेइर् आसियान सुरक्षा समुदाय, आसियान आथ्िार्क समुदाय और आसियान हिंद महासागर इंडोनेश्िाया पूवीर् तिमोर पपुआन्यू गिनी सामाजिक - सांस्कृतिक समुदाय नामक तीन स्तम्भों के आधार पर आसियान समुदाय बनाने की दिशा में कदम उठाए जो वुफछ हद तक यूरोपीय संघ से मिलता - जुलता है। आसियान सुरक्षा समुदाय क्षेत्राीय आस्टेªलिया विवादों को सैनिक टकराव तक न ले जाने की सहमति पर आधरित है। 2003 तक आसियान के सदस्य देशों ने कइर् समझौते किए जिनके द्वारा हर सदस्य देश ने शांति, निष्पक्षता, सहयोग, अहस्तक्षेप को बढ़ावा देने और राष्ट्रों के आपसी अंतर तथा संप्रभुता के अध्िकारों का सम्मान करने पर अपनी वचनब(ता जाहिर की। आसियान के देशों की सुरक्षा और विदेश नीतियों में तालमेल बनाने के लिए 1994 में आसियान क्षेत्राीय मंच की स्थापना की गइर्। बुनियादी रूप से आसियान एक आथ्िार्क संगठन था और वह ऐसा ही बना रहा। आसियान क्षेत्रा की वुफल अथर्व्यवस्था अमरीका, यूरोपीय संघ और जापान की तुलना में कापफी छोटी है पर इसका विकास इन सबसे अध्िक तेजी से हो रहा है। इसके चलते इस क्षेत्रा में और इससे बाहर इसके प्रभाव में तेजी से वृि हो रही है। आसियान आथ्िार्क समुदाय का उद्देश्य आसियान देशों का साझा बाशार और उत्पादन आधर तैयार करना तथा इस इलाके के सामाजिक और आथ्िार्क विकास में मदद करना है। यह संगठन इस क्षेत्रा के देशों के आथ्िार्क विवादों को निपटाने के लिए बनी मौजूदा व्यवस्था को भी सुधरना चाहेगा। आसियान ने निवेश, श्रम और सेवाओं के मामले में मुक्त व्यापार क्षेत्रा बनाने पर भी ध्यान दिया है। इस प्रस्ताव पर आसियान के साथ बातचीत करने की पहल अमरीका और चीन ने कर भी दी है। आसियान तेजी से बढ़ता हुआ एकमहत्त्वपूणर् क्षेत्राीय संगठन है। इसके विजन दस्तावेश 2020 में अंतरार्ष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक बहिमर्ुखी भूमिका को प्रमुखता दी गइर् है। आसियान द्वारा अभी टकराव की जगह बातचीत को बढ़ावा देने की नीति से ही यह बात निकली है। इसी तरव़्फीब से आसियान ने वफबोडिया के टकराव ांको समाप्त किया, पूवीर् तिमोर के संकट को सम्भाला है और पूवर् - एश्िायाइर् सहयोग पर बातचीत के लिए 1999 से नियमित रूप से वाष्िार्क बैठक आयोजित की है। आसियान की मौजूदा आथ्िार्क शक्ित, खास तौर से भारत और चीन जैसे तेजी से विकसित होने वाले एश्िायाइर् देशों के साथ व्यापार और निवेश के मामले में उसकी प्रासंगिकता ने इसे और भी आकषर्क बना दिया है। शुरुआती वषो± में भारतीय विदेश नीति ने आसियान पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन हाल के वषो± में भारत ने अपनी नीति सुधारने की कोश्िाश की है। भारत ने दो आसियान सदस्यों, सिंगापुर और थाइर्लैंड के साथ मुक्त व्यापार का समझौता किया है। भारत आसियान के साथ ही मुक्त व्यापार संध्ि करने का प्रयास कर रहा है। आसियान की असली ताकत अपने सदस्य देशों, सहभागी सदस्यों और बाकी गैर - क्षेत्राीय संगठनों के बीच निरंतर संवाद और परामशर् करने की नीति में है। यह एश्िाया का एकमात्रा ऐसा क्षेत्राीय संगठन है जो एश्िायाइर् देशों और विश्व शक्ितयों को राजनैतिक और सुरक्षा मामलों पर चचार् के लिए राजनैतिक मंच उपलब्ध् कराता है। प्रतिस्पधर्पूवीर् एश्िाया के देश हमें इसकी आदत डालनी होगी 57 आसियान का झंडा आसियान के प्रतीक - चिÉ में धन की दस बालियाँ दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया के दस देशों को इंगित करती हैं जो आपस में मित्राता और एकता के धगे से बंध्े हैं। वृत्त आसियान की एकता का प्रतीक है। स्रोतः ूूूण्ंेमंदेमबण्वतह केशव, द हिन्दू भारत ने 1991 से ‘पूरब की ओर चलो’ की नीति अपनायी। इससे पूवीर् एश्िाया के देशों ;आसियान, चीन, जापान और दक्ष्िाण कोरियाद्ध से उसके आथ्िार्क संबंधें में बढ़ोत्तरी हुइर् है। आसियान क्यों सपफल रहा और दक्षेस ;सावर्फद्ध क्यों नहीं? क्या इसलिए कि उस क्षेत्रा में कोइर् बहुत बड़ा देश नहीं है? चीनी अथर्व्यवस्था का उत्थान आइए, अब हम अपने बिल्वुफल नशदीक के पड़ोसी और शक्ित के तीसरे बड़े वेंफद्र चीन की ओर रुख़ करें। आथ्िार्क शक्ित के रूप में चीन के उदय को पूरे विश्व में जिस तरह देखा जा रहा है उसे अगले पन्ने पर अंकित काटूर्न एकदम ठीक - ठीक बता रहा है। 1978 के बाद से जारी चीन की आथ्िार्क सपफलता को एक महाशक्ित के रूप में इसके उभरने के साथ जोड़कर देखा जाता है। आथ्िार्क ़सदस्य देेशों को पहचानिए। नक़्शे में आसियान के सचिवालय को दिखाएँ। नक्शे में आसियान के सुधरों की शुरुआत करने के बाद से चीन सबसे ज्यादा तेजी से आथ्िार्क वृि कर रहा हैऔर माना जाता है कि इस रफ्रतार से चलते हुए 2040 तक वह दुनिया की सबसे बड़ी आथ्िार्क शक्ित, अमरीका से भी आगे निकल जाएगा। आथ्िार्क स्तर पर अपने पड़ोसी मुल्कों से जुड़ाव के चलते चीन पूवर् एश्िाया के विकास का इंजन - जैसा बना हुआ है और इस कारण क्षेत्राीय मामलों में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया है। इसकी विशाल आबादी, बड़ा भू - भाग, संसाध्न, क्षेत्राीय अवस्िथति और राजनैतिक प्रभाव इस तेज आथ्िार्क वृि के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को कइर् गुना बढ़ा देते हैं। 1949 में माओ के नेतृत्व में हुइर् साम्यवादी क्रांति के बाद चीनी जनवादी गणराज्य की स्थापना के समय यहाँ की आथ्िार्की सोवियत माॅडल पर आधरित थी। आथ्िार्क रूप से पिछड़े साम्यवादी चीन ने पूँजीवादी दुनिया से अपने रिश्ते तोड़ लिए। ऐसे में इसके पास अपने ही संसाध्नों से गुजारा करने के अलावा कोइर् चारा न था। हाँ, थोड़े समय तक इसे सोवियत मदद और सलाह भी मिली थी। इसने विकास का जो मॅाडल अपनाया उसमें खेती से पूँजी निकाल कर सरकारी नियंत्राण में बड़े उद्योग खड़े करने पर जोर था। चूंकि इसके पास विदेशी बाशारों से तकनीक और सामानों की खरीद के लिए विदेशी मुद्रा की कमी थी इसलिए चीन ने आयातित सामानों को धीरे - धीरे घरेलू स्तर पर ही तैयार करवाना शुरू किया। इस माॅडल में चीन ने अभूतपूवर् स्तर पर औद्योगिक अथर्व्यवस्था खड़ा करने का आधर बनाने के लिए सारे संसाध्नों का इस्तेमाल किया। सभी नागरिकों को रोजगार और सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ देने के दायरे में लाया गया और अपने नागरिकों को श्िाक्ष्िात करने और उन्हें स्वास्थ्य सुविधएँ उपलब्ध् कराने के मामले में चीन सबसे विकसित देशों से भी आगे निकल गया। अथर्व्यवस्था का विकास भी 5 से 6 पफीसदी की दर से हुआ। लेकिन जनसंख्या में 2 - 3 पफीसदी की वाष्िार्क वृि इस विकास दर पर पानी पेफर रही थी और बढ़ती आबादी विकास के लाभ से वंचित रह जा रही थी। खेती की पैदावार उद्योगों की पूरी शरूरत लायक अध्िशेष नहीं दे पाती थी। अध्याय दो में हम सोवियत संघ की राज्य - नियंत्रिात आथ्िार्की के संकट की चचार् कर चुके हैं। ऐसे ही संकट का सामना चीन को भी करना पड़ा। इसका औद्योगिक उत्पादन पयार्प्त तेजी से नहीं बढ़ रहा था। विदेशी व्यापार न के बराबर था और प्रति व्यक्ित आय बहुत कम थी। चीनी नेतृत्व ने 1970 के दशक में वुफछ बड़े नीतिगत निणर्य लिए। चीन ने 1972 में अमरीका से संबंध् बनाकर अपने राजनैतिक और आथ्िार्क एकांतवास को खत्म किया।1973 में प्रधनमंत्राी चाऊ एनलाइर् ने कृष्िा, उद्योग, सेना और विज्ञान - प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में आध्ुनिकीकरण के चार प्रस्ताव रखे। 1978 में तत्कालीन नेता देंग श्याओपेंग ने चीन में आथ्िार्क सुधरों और ‘खुले द्वार की नीति’ की घोषणा की। अब नीति यह हो गयी कि विदेश पूंजी और प्रौद्योगिकी के निवेश से उच्चतर उत्पादकता को प्राप्त किया जाए। बाशारमूलक अथर्व्यवस्था को अपनाने के लिए चीन ने अपना तरीका आजमाया। चीन ने ‘शाॅक थेरेपी’ पर अमल करने के बशाय अपनी अथर्व्यवस्था को चरणब( ढंग से खोला। 1982 में खेती का निजीकरण किया गया और उसके बाद 1998 में उद्योगों का। व्यापार संबंध्ी अवरोधें को सिपर्फ ‘विशेष आथ्िार्क क्षेत्रों’ के लिए ही हटाया गया है जहाँ विदेशी निवेशक अपने उद्यम लगा सकते हैं। नयी आथ्िार्क नीतियों के कारण चीन की अथर्व्यवस्था को अपनी जड़ता से उबरने मेंमदद मिली। कृष्िा के निजीकरण के कारणकृष्िा - उत्पादों तथा ग्रामीण आय में उल्लेखनीयबढ़ोत्तरी हुइर्। ग्रामीण अथर्व्यवस्था में निजी बचत का परिमाण बढ़ा और इससे ग्रामीण उद्योगों की तादाद बड़ी तेजी से बढ़ी। उद्योगऔर कृष्िा दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अथर्व्यवस्था की वृि - दर तेज रही। व्यापार के नये कानून तथा विशेष आथ्िार्क क्षेत्रों ;स्पेशल इकाॅनामिक शोन - ैम्र्द्ध के निमार्ण से विदेश - व्यापार में उल्लेखनीय वृि हुइर्। चीन पूरे विश्व में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे आकषर्क देश बनकर उभरा। चीन के पास विदेशी मुद्रा का अब विशाल भंडार है और इसके दम पर चीन दूसरे देशों में निवेश कर रहा है। चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हो 59 हो सकता है? क्या वह ड्रैगन को रोक सकता है? गया। इस तरह दूसरे देशों के लिए अपनी अथर्व्यवस्था खोलने की दिशा में चीन ने एक क़दम और बढ़ाया। अब चीन की योजना विश्व आथ्िार्की से अपने जुड़ाव को और गहरा करके भविष्य की विश्व व्यवस्था को एक मनचाहा रूप देने की है। चीन की आथ्िार्की में तो नाटकीय सुधर हुआ है लेकिन वहाँ हर किसी को सुधरों का लाभ नहीं मिला है। चीन में बेरोजगारी बढ़ी है और 10 करोड़ लोग रोजगार की तलाश में है। वहाँ महिलाओं के रोजगार और काम करने के हालात उतने ही खराब हैं जितने यूरोप में 18वीं और 19वीं सदी में थे। इसके अलावा पयार्वरण के नुकसान और भ्रष्टाचार के बढ़ने जैसे परिणाम भी सामने आए। गाँव और शहर के तथा तटीय चीन में सिपर्फ छह ही विशेष आथ्िार्क क्षेत्रा हैं और भारत में ऐसे 200 से ज्यादा क्षेत्रों को मंजूरी! क्या यह भारत वेफ लिए अच्छा है? एरेस, केगल्स काटर्ून माइक लेन, केगल्स काटर्ूनचीनी साइकिल अध्याय की शुरुआत में दिए गए चित्रा की भांति उपयुर्क्त काटूर्नों में से पहला चीन के रुख़ में बदलाव को इंगित करता है। दूसरे काटूर्न में साइकिल का प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। विश्व में सबसे ज्यादा साइकिलें चीन में इस्तेमाल की जाती हैं। काटर्ून में साइकिल का इस्तेमाल आज के चीन के दोहरेपन को इंगित करने के लिए किया गया है। यह दोहरापन क्या है? क्या हम इसे अंतविर्रोध् कह सकते हैं? और मुख्यभूमि पर रहने वाले लोगों के बीच आथ्िार्क पफासला बढ़ता जा रहा है। हालाँकि क्षेत्राीय और वैश्िवक स्तर पर चीन एक ऐसी जबरदस्त आथ्िार्क शक्ित बनकर उभरा है कि सभी उसका लोहा मानने लगे हैं। चीन की अथर्व्यवस्था का बाहरी दुनिया से जुड़ाव और पारस्परिक निभर्रता ने अब यह स्िथति बना दी है कि अपने व्यावसायिक साझीदारों पर चीन का जबरदस्त प्रभाव बन चुका है और यही कारण है कि जापान, अमरीका, आसियान और रूस - सभी व्यापार के आगे चीन से बाकी विवादों को भुला चुके हंै। उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही चीन और ताइवान के मतभेद भी खत्म हो जाएँगे और ताइवान इसकी अथर्व्यवस्था के साथ ज्यादा घनिष्ठ रूप से जुड़ जायेगा। 1997 केवित्तीय संकट के बाद आसियान देशों की अथर्व्यवस्था को टिकाए रखने में चीन के आथ्िार्क उभार ने कापफी मदद की है। लातिनीअमरीका और अÚीका में निवेश और मदद की इसकी नीतियाँ बताती हैं कि विकासशील देशों के मामले में चीन एक नइर् विश्व शक्ित के रूप में उभरता जा रहा है। चीन के साथ भारत के संबंध् पश्िचमी साम्राज्यवाद के उदय से पहले भारत और चीन एश्िाया की महाशक्ित थे। चीन का अपने आसपास के इलाकों पर भी कापफी प्रभाव था और आसपास के छोटे देश इसके प्रभुत्व को मानकर और वुफछ नशराना देकर चैन से रहा करते थे। चीनी राजवंशों के लम्बे शासन में मंगोलिया, कोरिया, हिन्द - चीन के वुफछ इलाके और तिब्बत इसकी अध्ीनता मानते रहे थे। भारत के भी अनेक राजवंशों और साम्राज्यों का प्रभाव उनके अपने राज्य से बाहर भी रहा था। भारत हो या चीन, इनका 61 प्रभाव सिपर्फ राजनैतिक नहीं था μ यह आथ्िार्क,धमिर्क और सांस्कृतिक भी था। पर चीन और भारत अपने प्रभाव क्षेत्रों के मामले में कभी नहीं टकराए थे। इसी कारण दोनों के बीचराजनैतिक और सांस्कृतिक प्रत्यक्ष संबंध् सीमित ही थे। परिणाम यह हुआ कि दोनों देश एक दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह से नहीं जान सके और जब बीसवीं सदी में दोनों देश एक दूसरे से टकराए तो दोनों को ही एक - दूसरे के प्रति विदेश नीति विकसित करने में मुश्िकलें आईं। अंग्रेजी राज से भारत के आशाद होने और चीन द्वारा विदेशी शक्ितयों को निकाल बाहर करने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि ये दोनों मुल्क साथ आकर विकासशील दुनिया और खास तौर से एश्िाया के भविष्य को तयकरने में महत्त्वपूणर् भूमिका निभाएंगे। वुफछ समय के लिए ‘हिंदी - चीनी भाइर् - भाइर्’ का नारा भी लोकिय हुआ। सीमा विवाद पर चले सैन्य संघषर् ने इस उम्मीद को समाप्त कर दिया। आशादी के तत्काल बाद 1950 में चीन द्वारा तिब्बत को हड़पने तथा भारत - चीन सीमा पर बस्ितयाँ बनाने के पैफसले से दोनों देशों के बीच संबंध् एकदम गड़बड़ हो गए। भारत और चीन दोनों देश अरुणाचल प्रदेश के वुफछ इलाकों और लद्दाख के अक्साइर् - चिन क्षेत्रा पर प्रतिस्पध्ीर् दावों के चलते 1962 में लड़ पड़े। 1962 के यु( में भारत को सैनिक पराजय झेलनी पड़ी और भारत - चीन सम्बन्धें पर इसका दीघर्कालिक असर हुआ। 1976 तक दोनों देशों के बीच वूफटनैतिक संबंध् समाप्त ही रहे। इसके बाद ध्ीरे - ध्ीरे दोनों के बीच सम्बन्धों में सुधर शुरू हुआ। 1970 केदशक के उत्तरा(र् में चीन का राजनीतिक नेतृत्व बदला। चीन की नीति में भी अब वैचारिक मुद्दों की जगह व्यावहारिक मुद्दे प्रमुख होते गए इसलिए चीन भारत के साथ संबंध् सुधरने के लिए विवादास्पद मामलों को छोड़ने को तैयार हो गया। 1981 में सीमा विवादों को दूर करने के लिए वातार्ओं की शृंखला भी शुरू की गइर्। शीतयु( की समाप्ित के बाद से भारत - चीनसंबंधें में महत्त्वपूणर् बदलाव आया है। अब इनके संबंधें का रणनीतिक ही नहीं, आथ्िार्क पहलू भी है। दोनों ही खुद को विश्व - राजनीति की उभरती शक्ित मानते हैं और दोनों ही एश्िाया की अथर्व्यवस्था और राजनीति मेंमहत्त्वपूणर् भूमिका निभाना चाहेंगे। दिसम्बर 1988 में राजीव गांध्ी द्वारा चीन का दौरा करने से भारत - चीन सम्बन्धों कोुसधारने के प्रयासों को बढ़ावा मिला। इसके बाद से दोनों देशों ने टकराव टालने और सीमा पर शांति और यथास्िथति बनाए रखने के उपायों की शुरुआत की है। दोनोंदेशों ने सांस्कृतिक आदान - प्रदान, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रा में परस्पर सहयोग और व्यापार के लिए सीमा पर चार पोस्ट खोलने के समझौते भी किए हैं। 1999 से भारत और चीन के बीच व्यापार 30 पफीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है। इससे चीन के साथ संबंधें में नयी गमर्जोशी आयी है। चीन और भारत के बीच 1992 में 33 करोड़ 80 लाख डाॅलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था जो 2006 में बढ़कर 18 अरब डाॅलर का हो चुका है। हाल में, दोनों देश ऐसे मसलों पर भी सहयोग करने के लिए राजी हुए हैं जिनसे दोनों के बीच विभेद पैदा हो सकते थे,चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ नेजैसे - विदेशों में ऊजार् सौदा नवंबर 2006 में भारत का दौराहासिल करने का मसला। किया। इसे दौरे में जिनवैश्िवक ध्रातल पर भारत और समझौतों पर हस्ताक्षर हुए उनके चीन ने विश्व व्यापार संगठन बारे में पता करें। जैसे अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क संगठनों वुफछ लोग कहते हैं कि चीनी माल हमारे बाशार में भर जाएँगे? पर वे हैं कहाँ? के संबंध् में एक जैसी नीतियाँ अपनायी हैं। 1998 में भारत के परमाणु हथ्िायार परीक्षण को वुफछ लोगों ने चीन से खतरे के मद्देनशर उचित ठहराया था। लेकिन इससे भी दोनों के बीच संपवर्फ कम नहीं हुआ। यह सच है कि पाकिस्तान के परमाणु हथ्िायार कायर्क्रम में भी चीन को मददगार माना जाता है। बांग्लादेश और म्यांमार से चीन के सैनिक संबंधंे को भी दक्ष्िाण एश्िाया में भारतीय हितों के ख्िालापफ माना जाता है। पर इसमें से कोइर् भी मुद्दा दोनों मुल्कों में टकराव करवा देने लायक नहीं माना जाता। इस बात का एक प्रमाण यह है कि इन चीजों के बने रहने के बावजूद सीमा विवाद सुलझाने की बातचीत और सैन्य स्तर पर सहयोग का कायर्क्रम जारी है। चीन और भारत के नेता तथा अध्िकारी अब अक्सर नयी दिल्ली और बीजिंग का दौरा करते हैं। इससे दोनों देश एक - दूसरे को ज्यादा करीब से समझने लगे हैं। परिवहन और संचार मागो± कीबढ़ोत्तरी, समान आथ्िार्क हित तथा एक जैसे वैश्िवक सरोकारों के कारण भारत और चीन के बीच संबंधें को ज्यादा सकारात्मक तथा मजबूत बनाने में मदद मिली है। 63 जापान सोनी, पैनासोनिक, वैफनन, सुजुकी, होंडा, ट्योटा और माज़्दा जैसे प्रसि( जापानी ब्रांडों के नाम आपने शरूर सुनें होंगे। उच्च प्रौद्योगिकी के उत्पाद बनाने के लिए इनके नाम मशहूर हैं। जापान के पास प्राकृतिक संसाध्न कम हैं और वह ज्यादातर कच्चे माल का आयात करता है। इसके बावजूद दूसरे विश्वयु( के बाद जापान ने बड़ी तेजी से प्रगति की। जापान की अथर्व्यवस्था विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अथर्व्यवस्था है। एश्िाया के देशों में अकेला जापान ही समूह - 8 के देशों में शामिल है। आबादी के लिहाज से विश्व में जापान का स्थान दसवाँ है। परमाणु बम की विभीष्िाका झेलने वाला एकमात्रा देश जापान है। जापान संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में 20 प्रतिशत का योगदान करता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के बजट में अंशदान करने के लिहाज से जापान दूसरा सबसे बड़ा देश है। 1951 से जापान का अमरीका के साथ सुरक्षा - गठबंधन है। जापान के संविधन के अनुच्छेद 9 के अनुसार - ‘‘राष्ट्र के संप्रभु अिाकार के रूप में यु( को तथा अंतरार्ष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में बल - प्रयोग अथवा ध्मकी से काम लेने के तरीके का जापान के लोग हमेशा के लिए त्याग करते हैं।’’ जापान का सैन्य व्यय उसके सकल घरेलू उत्पाद का केवल 1 प्रतिशत है पिफर भी सैन्य व्यय के लिहाज से विश्व में जापान का स्थान चैथा है। इन तथ्यों को ध्यान में रखकर अनुमान लगाइए कि वैकल्िपक शक्ित - वेंफद्र के रूप में जापान कितना प्रभावकारी होगा? 1.तिथ्िा के हिसाब से इन सबको क्रम दें - ;कद्ध विश्व व्यापार संगठन में चीन का प्रवेश ;खद्ध यूरोपीय आथ्िार्क समुदाय की स्थापना ;गद्ध यूरोपीय संघ की स्थापना ;घद्ध आसियान क्षेत्राीय मंच की स्थापना 2.‘।ैम्।छ ूंल’ या आसियान शैली क्या है? ;कद्ध आसियान के सदस्य देशों की जीवन शैली है ;खद्ध आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूणर् कामकाज की शैली को कहा जाता है। ;गद्ध आसियान सदस्यों की रक्षानीति है। ;घद्ध सभी आसियान सदस्य देशों को जोड़ने वाली सड़क है। प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह ने 2006 के दिसंबर में जापान का दौरा किया और वुफछ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनके बारे में जानकारी जुटाएँ।

RELOAD if chapter isn't visible.