मैं खुश हूँ कि मैंने विज्ञान के विषय नहीं लिए वनार् मैं भी अमरीकी वचर्स्व का श्िाकार हो जाता। क्या आप बता सकते हैं क्यों? आयशा, जाबू और आंद्रेइर् बगदाद के छोर पर कायम एक स्वूफल में पढ़ रही आयशा अपनी पढ़ाइर् - लिखाइर् में अव्वल थी। उसने सोचा था कि आगे किसी विश्वविद्यालय में डाॅक्टरी की पढ़ाइर् करूँगी। सन् 2003 में उसकी एक टाँग जाती रही। वह एक ठिकाने में अपने दोस्तों के साथ छुपी हुइर् थी और तभी हवाइर् हमले में दागी हुइर् एक मिसाइल उसके ठिकाने पर आ गिरी। आयशा अब पिफर से चलना - पिफरना सीख रही है। अब भी उसकी योजना डाॅक्टर बनने की ही है, लेकिन तब ही जब विदेशी सेना उसके देश को छोड़कर चली जाए। डरबन ;दक्ष्िाण अप्रफीकाद्ध का रहने वाला जाबू एक प्रतिभाशाली कलाकार है। उसकी चित्राकारी पर पारंपरिक जनजातीय कला का गहरा असर है। उसकी योजना आटर् स्वूफल में पढ़ने और इसके बाद अपना स्टूडियो खोलने की है। लेकिन उसके पिता चाहते हैं कि जाबू एमबीए की पढ़ाइर् करे और परिवार का व्यवसाय संभाले। व्यवसाय पिफलहाल मंदा चल रहा है और जाबू के पिता सोचते हैं कि वह परिवार के व्यवसाय को पफायदेमंद बनाएगा। युवा आंद्रेइर् पथर् ;आस्ट्रेलियाद्ध में रहता है। उसके माँ - बाप बतौर आप्रवासी रूस से आये थे। चचर् जाते वक्त जब वह नीली जीन्स पहन लेता है तो उसकी माँ आपे से बाहर हो जाती हैं। वह चाहती हैं कि आंद्रेइर् चचर् में सभ्य - शालीन दिखाइर् पड़े। आंद्रेइर् अपनी माँ को बताता है कि जीन्स ‘वूफल’ है और जीन्स पहनकर उसे आशादी का अहसास होता है। आंद्रेइर् के पिता उसकी माँ को याद दिलाते हैं कि हम लोग भी लेनिनग्राद में रहते हुए अपने जवानी के दिनों में जीन्स पहनते थे और उसी कारण से जिससे आज आंद्रेइर् पहनता है। आंद्रेइर् की अपनी माँ से बहस हुइर्। हो सकता है जाबू को वह विषय पढ़ना पड़े जिसमें उसकी दिलचस्पी नहीं। इससे अलग, आयशा की एक टाँग जाती रही और उसका सौभाग्य है कि वह जीवित है। हम इन समस्याओं के बारे में एक साथ चचार् वैफसे कर सकते हैं? हम ऐसा कर सकते हैं और हमें ऐसा शरूर करना चाहिए। हम इस अध्याय में देखेंगे कि ये तीनों एक न एक तरीके से अमरीकी वचर्स्व का श्िाकार हैं। आयशा, जाबू और आन्द्रेइर् की चचार् पर हम पिफर लौटेंगे लेकिन पहले इस बात को समझें कि अमरीकी वचर्स्व की शुरुआत वैफसे हुइर् और आज यह विश्व में वैफसे असरमंद है। हम अपनी चचार् में ‘संयुक्त राज्य अमरीका’ की जगह ज्यादा लोकिय शब्द ‘अमरीका’ का इस्तेमाल करेंगे। लेकिन यहाँ यह याद रखनाउपयोगी होगा कि ‘अमरीका’ शब्द से उत्तरी अमरीका और दक्ष्िाणी अमरीका नामक दो महाद्वीपों का अथर् ध्वनित होता है और ‘संयुक्त राज्य अमरीका’ मात्रा के लिए ‘अमरीका’ शब्द का प्रयोग खुद में उस वचर्स्व का प्रतीक है जिसे हम इस अध्याय में समझने की कोश्िाश करेंगे। नयी विश्व - व्यवस्था की शुरुआत सोवियत संघ के अचानक विघटन से हर कोइर् आश्चयर्चकित रह गया। दो महाशक्ितयों में अब एक का वजूद तक न था जबकि दूसरा अपनी पूरी ताकत या कहें कि बढ़ी हुइर् ताकत के साथ कायम था। इस तरह, जान पड़ता है कि अमरीका के वचर्स्व की शुरुआत 1991 में हुइर् जब एक ताकत के रूप में सोवियत संघ अंतरार्ष्ट्रीय परिदृश्य से जले और टूटे हुए वाहनों की यह तस्वीर ‘हाइर्वे आॅव डेथ’ ;मृत्यु का राजपथद्ध से ली गइर् है। वुफवैत और बसरा के बीच की इस सड़क पर पीछे हटती इराकी सेना पर पहले खाड़ी यु( ;पफरवरी, 1991द्ध के दौरान अमरीकी विमानों ने हमला किया था। वुफछ विद्वानों का कहना है कि अमरीकी सेना ने जानबूझ कर सड़क के इस हिस्से पर हमला किया था। मैदान छोड़कर भागते हुए इराकी सैनिक सड़क के इस हिस्से पर अपफरा - तपफरी भरे ट्रैपिफक - जाम में पफँसे थे। अमरीकी विमानों के हमले में उनके साथ - साथ वुफवैती बंदी और पिफलिस्तीनी नागरिक शरणाथीर् भी मारे गये। अनेक विद्वानों और पयर्वेक्षकों ने इसे ‘यु( - अपराध्’ की संज्ञा दी और ‘जेनेवा समझौते’ का उल्लंघन माना। गायब हो गया। एक हद तक यह बात सही है लेकिन हमें इसके साथ - साथ दो और बातों का ध्यान रखना होगा। पहली बात यह कि अमरीकी वचर्स्व के वुफछ पहलुओं का इतिहास 1991 तक सीमित नहीं है बल्िक इससे कहीं पीछे दूसरे विश्वयु( की समाप्ित के समय 1945 तक जाता है। इस पहलू के बारे में हम इसी अध्याय में पढ़ेंगे। दूसरी बात, अमरीका ने 1991 से ही वचर्स्वकारी ताकत की तरह बरताव करना नहीं शुरू किया। दरअसल यह बात ही बहुत बाद में जाकर सापफ हुइर् कि दुनिया वचर्स्व के दौर में जी रही है। आइए, हम उस प्रिया की चचार् करें जिसने अमरीकी वचर्स्व की जड़ों को ज्यादा गहरे तक जमा दिया। 1990 के अगस्त में इराक ने वुफवैत पर हमला किया और बड़ी तेजी से उस पर कब्शा जमा लिया। इराक को समझाने - बुझाने की तमाम राजनयिक कोश्िाशें जब नाकाम रहीं तो संयुक्त राष्ट्रसंघ ने वुफवैत को मुक्त कराने के लिए बल - प्रयोग की अनुमति दे दी। शीतयु( के दौरान ज्यादातर मामलों में चुप्पी साध् लेने वाले संयुक्त राष्ट्रसंघ के लिहाज से यह एक क्या यह बात सही है कि अमरीका ने अपनी जमीन पर कभी कोइर् जंग नहीं लड़ी? कहीं इसी वशह से जंगी कारनामे करना अमरीका के लिए बायें हाथ का खेल तो नहीं? नाटकीय पैफसला था। अमरीकी राष्ट्रपति जाॅजर् बुश ने इसे ‘नइर् विश्व व्यवस्था’ की संज्ञा दी। 34 देशों की मिलीजुली और 660000 सैनिकों की भारी - भरकम पफौज ने इराक के विरु( मोचार् खोला और उसे परास्त कर दिया। इसे प्रथम खाड़ी यु( कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के इस सैन्य अभ्िायान को ‘आॅपरेशन डेजटर् स्टामर्’ कहा जाता है जो एक हद तक अमरीकी सैन्य अभ्िायान ही था। एक अमरीकी जनरल नामर्न श्वाजर्काॅव इस सैन्य - अभ्िायान के प्रमुख थे और 34 देशों की इस मिली जुली सेना में 75 प्रतिशत सैनिक अमरीका के ही थे। हालाँकि इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का ऐलान था कि यह ‘सौ जंगों की एक जंग’ साबित होगा लेकिन इराकी सेना जल्दी ही हार गइर् और उसे वुफवैत से हटने पर मजबूर होना पड़ा। प्रथम खाड़ी - यु( से यह बात शाहिर हो गइर् कि बाकी देश सैन्य - क्षमता के मामले में अमरीका से बहुत पीछे हैं और इस मामले में प्रौद्योगिकी के ध्रातल पर अमरीका बहुत आगे निकल गया है। बड़े विज्ञापनी अंदाज में अमरीका ने इस यु( में तथाकथ्िात ‘स्माटर् बमों’ का प्रयोग किया। इसके चलते वुफछ पयर्वेक्षकों ने इसे ‘कंप्यूटर यु(’ की संज्ञा दी। इस यु( की टेलीविजन पर व्यापक कवरेज हुइर् और यह एक ‘वीडियो गेम वार’ में तब्दील हो गया। दुनियाभर में अलग - अलग जगहों पर दशर्क अपनी बैठक में बड़े इत्मीनान से देख रहे थे कि इराकी सेना किस तरह ध्राशायी हो रही है। यह बात अविश्वसनीय जान पड़ती है लेकिन अमरीका ने इस यु( में मुनापफा कमाया। कइर् रिपोटो± में कहा गया कि अमरीका ने जितनी रकम इस जंग पर खचर् की उससे कहीं ज्यादा रकम उसे जमर्नी, जापान औरसऊदी अरब जैसे देशों से मिली थी। क्िलंटन का दौर प्रथम खाड़ी यु( जीतने के बावजूद जाजर् बुश 1992 में डेमोक्रेटिक पाटीर् के उम्मीदवार विलियम जेपफसर्न ;बिलद्ध क्िलंटन से राष्ट्रपति - पद का चुनाव हार गए। क्िलंटन ने विदेश - नीति की जगह घरेलू नीति को अपने चुनाव - प्रचार का निशाना बनाया था। बिल क्िलंटन 1996 में दुबारा चुनाव जीते और इस तरह वे आठ सालों तक राष्ट्रपति - पद पर रहे। क्िलंटन के दौर में ऐसा जान पड़ता था कि अमरीका ने अपने को घरेलू मामलों तक सीमित कर लिया है और विश्व के मामलों में उसकी भरपूर संलग्नता नहीं रही। विदेश नीति के मामले में क्िलंटन सरकार ने सैन्य - शक्ित और सुरक्षा जैसी ‘कठोर राजनीति’ की जगह लोकतंत्रा के बढ़ावे, जलवायु - परिवतर्न तथा विश्व व्यापार जैसे ‘नरम मुद्दोें’ पर ध्यान वेंफित किया। बहरहाल, क्िलंटन के दौर में भी अमरीका जब - तब पफौजी ताकत के इस्तेमाल के लिए तैयार दिखा। इस तरह की एक बड़ी घटना 1999 में हुइर्। अपने प्रांत कोसोवो में युगोस्लाविया ने अल्बानियाइर् लोगों के आंदोलन को वुफचलने के लिए सैन्य कारर्वाइर् की। कोसोवो में अल्बानियाइर् लोगों की बहुलता है। इसके जवाब में अमरीकी नेतृत्व में नाटो के देशों ने युगोस्लावियाइर् क्षेत्रों पर दो महीने तक बमबारी की। स्लोबदान मिलोसेविच की सरकार गिर गयी और कोसोवो पर नाटो की सेना काबिज हो गइर्। क्िलंटन के दौर में दूसरी बड़ी सैन्य कारर्वाइर् नैरोबी ;केन्याद्ध और दारे - सलाम ;तंजानियाद्ध के अमरीकी दूतावासों पर बमबारी के शवाब में 1998 हुइर्। अतिवादी इस्लामी यह तो बड़ी बेतुकीबात है! क्याइसका यह मतलबलगाया जाए किलिट्टेआतंकवादियों के छुपे होने का शुबहाहोने पर श्रीलंकापेरिस पर मिसाइलदाग सकता है? विचारों से प्रभावित आतंकवादी संगठन ‘अल - कायदा’ को इस बमबारी का जिम्मेवार ठहराया गया। इस बमबारी के वुफछ दिनों के अंदर राष्ट्रपति क्िलंटन ने ‘आॅपरेशन इनपफाइनाइट रीच’ का आदेश दिया। इस अभ्िायान के अंतगर्त अमरीका ने सूडान और अपफगानिस्ताऩके अल - कायदा के ठिकानों पर कइर् बार क्रूज मिसाइल से हमले किए। अमरीका ने अपनी इस कारर्वाइर् के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ की अनुमति लेने या इस सिलसिले में अंतरार्ष्ट्रीय कानूनों की परवाह नहीं की। अमरीका पर आरोप लगा कि उसने अपने इस अभ्िायान में वुफछ नागरिक ठिकानों पर भी निशाना साध जबकि इनका आतंकवाद से कोइर् लेना - देना नहीं था। पीछे मुड़कर अब देखने पर लगता है कि यह तो एक शुरुआत भर थी। 9/11 और ‘आतंकवाद के विरु( विश्वव्यापी यु(’ 11 सितंबर 2001 के दिन विभ्िान्न अरब देशोंके 19 अपहरणकत्तार्ओं ने उड़ान भरने के चंद मिनटों बाद चार अमरीकी व्यावसायिकविमानों पर कब्शा कर लिया। अपहरणकत्तार्इन विमानों को अमरीका की महत्त्वपूणर् इमारतों की सीध् में उड़ाकर ले गये। दो विमानन्यूयावर्फ स्िथत वल्डर् टेªेड सेंटर के उत्तरी और दक्ष्िाणी टावर से टकराए। तीसरा विमान वजिर्निया के अलि±गटन स्िथत ‘पेंटागन’ से टकराया। ‘पेंटागन’ में अमरीकी रक्षा - विभाग का मुख्यालय है। चैथे विमान को अमरीकी कांग्रेस की मुख्य इमारत से टकराना था लेकिन वह पेन्िसलवेनिया के एक खेत में गिर गया। इस हमले को ‘नाइन एलेवन’ कहा जाता है ;अमरीका में महीने को तारीख से पहले लिखने का चलन है। इसी का संक्ष्िाप्त रूप 9/11 है न कि 11/9 जैसा कि भारत में लिखा जाएगाद्ध। क्या अमरीका में भी राजनीतिक वंश - परंपरा चलती है या यह सिपफर् एक अपवाद है? इस हमले में लगभग तीन हजार व्यक्ित मारे गये। अमरीकियों के लिए यह दिल दहला देने वाला अनुभव था। उन्होंने इस घटना की तुलना 1814 और 1941 की घटनाओं से की। 1814 में बि्रटेन ने वाश्िांग्टन डीसी में आगजनी की थी और 1941 में जापानियों ने पलर् हाबर्र पर हमला किया था। जहाँ तक जान - माल की हानि का सवाल है तो अमरीकी जमीन पर यह अब तक का सबसे गंभीर हमला था। अमरीका 1776 में एक देश बना और तब से उसने इतना बड़ा हमला नहीं झेला था। 9/11 के शवाब में अमरीका ने पफौरी कदम उठाये और भयंकर कारर्वाइर् की। अब क्िलंटन की जगह रिपब्िलकन पाटीर् के जाजर् डब्ल्यू. बुश राष्ट्रपति थे। ये पूवर्वतीर् राष्ट्रपति एच. डब्ल्यू. बुश के पुत्रा हैं। क्िलंटन के विपरीत बुश ने अमरीकी हितों को लेकर कठोर रवैया अपनाया और इन हितों को बढ़ावा देने के लिए कड़े कदम उठाये। ‘आतंकवाद के विरु( विश्वव्यापी यु(’ के अंग के रूप में अमरीका ने ‘आॅपरेशन एन्डयूरिंग प्रफीडम’ चलाया। यह अभ्िायान उन सभी के ख्िालापफ चला जिन पर ़9/11 का शक था। इस अभ्िायान में मुख्य निशाना अल - कायदा और अपफगानिस्तान के तालिबान - शासन को बनाया गया। तालिबान के शासन के पाँव जल्दी ही उखड़ गए लेकिन तालिबान और अल - कायदा के अवशेष अब भी सिय हैं। 9/11 की घटना के बाद से अब तक इनकी तरपफ से पश्िचमी मुल्कों में कइर् जगहों पर हमले हुए हैं। इससे इनकी सियता की बात स्पष्ट हो जाती है।अमरीकी सेना ने पूरे विश्व में गिरफ्रतारियाँकीं। अक्सर गिरफ्रतार लोगों के बारे में उनकीसरकार को जानकारी नहीं दी गइर्। गिरफ्रतार लोगों को अलग - अलग देशों में भेजा गया और उन्हें खुपिफया जेलखानांे में बंदी बनाकर रखा गया। क्यूबा के निकट अमरीकी नौसेना का एक ठिकाना ग्वांतानामो बे में है। वुफछ बंदियों को वहाँ रखा गया। इस जगह रखे गए बंदियों को न तो अंतरार्ष्ट्रीय कानूनों की सुरक्षा प्राप्त है और न ही अपने देश या अमरीका के कानूनों की। संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रतिनिध्ियों तक को इन बंदियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गइर्। इराक पर आक्रमण 2003 के 19 माचर् को अमरीका ने ‘आॅपरेशन इराकी प्रफीडम’ के वूफटनाम से इराक पर सैन्य - हमला किया। अमरीकी अगुआइर् वाले ‘काॅअलिशन आॅव वीलिंग्स ;आकांक्ष्िायों के महाजोटद्ध’ में 40 से ज्यादा देश शामिल हुए। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने इराक पर इस हमले की अनुमति नहीं दी थी। दिखावे के लिए कहा गया कि सामूहिक संहार के हथ्िायार ;वीपंस आॅव मास डेस्ट्रक्शनद्ध बनाने से रोकने के लिए इराक पर हमला किया गया है। इराक में सामूहिक संहार के हथ्िायारों की मौजूदगी के कोइर् प्रमाण नहीं मिले। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हमले के मकसद वुफछ और ही थे, जैसे इराक के तेल - भंडार पर नियंत्राण और इराक में अमरीका की मनपसंद सरकार कायम करना। शीतयु( के बाद हुए उन संघषो±/यु(ों की सूची बनाएं जिसमें अमरीका ने निणार्यक भूमिका निभाइर्। पफौजी की वदीर् और दुनिया का नक्शा !़यह काटूर्न क्या बताता है? सद्दाम हुसैन की सरकार तो चंद रोश में एरेस, केगल्स काटर्ूनही जाती रही, लेकिन इराक को ‘शांत’ कर पाने में अमरीका सपफल नहीं हो सका है। इराक में अमरीका के ख्िालापफ एक पूणर्व्यापी विद्रोह भड़क उठा। अमरीका के 3000 सैनिक इस यु( में खेत रहे जबकि इराक के सैनिक कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में मारे गये। एक अनुमान के अनुसार अमरीकी हमले के बाद से लगभग 50000 नागरिक मारे गये हैं। अब यह बात बड़े व्यापक रूप में मानी जा रही हैकि एक महत्त्वपूणर् अथर् में इराक पर अमरीकी हमला सैन्य और राजनीतिक ध्रातल पर असपफल सि( हुआ है। एंजेल बोलिगन, केगल्स काटर्ून क्या होता है वचर्स्व का अथर्? राजनीति एक ऐसी कहानी है जो शक्ित के इदर् - गिदर् घूमती है। किसी भी आम आदमी की तरह हर समूह भी ताकत पाना और कायम रखना चाहता है। हम रोजाना बात करते हैं कि पफलां आदमी ताकतवर होता जा रहा है या ताकतवर बनने पर तुला हुआ है।‘वचर्स्व’ जैसे भारी - भरकम शब्द का विश्व राजनीति में भी विभ्िान्न देश या देशों इस्तेमाल क्यों करें? हमारे के समूह ताकत पाने और कायम रखने की शहर में इसके लिए लगातार कोश्िाश करते हैं। यह ताकत सैन्य‘दादागिरी’ शब्द चलता प्रभुत्व, आथ्िार्क - शक्ित, राजनीतिक रुतबे औरहै। क्या यह शब्द ज्यादा सांस्कृतिक बढ़त के रूप में होती है।अच्छा नहीं रहेगा? इसी कारण, अगर हम विश्व - राजनीति को समझना चाहें तो हमंें विश्व के विभ्िान्न देशों के बीच शक्ित के बँटवारे को समझना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, शीतयु( वेफ समय ;1945 - 1991द्ध दो अलग - अलग गुटों में शामिल देशों के बीच ताकत का बँटवारा था। शीतयु( के समय अमरीका और सोवियत संघ इन दो अलग - अलग शक्ित - वेंफद्रों के अगुआ थे। सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया में एकमात्रा महाशक्ित अमरीका बचा। जब अंतरार्ष्ट्रीय व्यवस्था किसी एक महाशक्ित या कहें कि उ(त महाशक्ित के दबदबे में हो तो बहुध इसे ‘एकध््रुवीय’ व्यवस्था भी कहा जाता है। भौतिकी के शब्द ‘ध्ु्रव’ का यह एक तरह से भ्रामक प्रयोग है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवस्था में ताकत का एक ही वेंफद्र हो तो इसे ‘वचर्स्व’ ;भ्महमउवदलद्ध शब्द के इस्तेमाल से वण्िार्त करना ज्यादा उचित होगा। वचर्स्व μ सैन्य शक्ित के अथर् में ‘हेगेमनी’ शब्द की जड़ें प्राचीन यूनान में हैं। इस शब्द से किसी एक राज्य के नेतृत्व या प्रभुत्व का बोध् होता है। मूलतः इस शब्द का प्रयोग प्राचीन यूनान के अन्य नगर - राज्यों की तुलना में एथेंस की प्रबलता को इंगित करने के लिए किया जाता था। इस प्रकार ‘हेगेमनी’ के पहले अथर् का संबंध् राज्यों के बीच सैन्य - क्षमता की बुनावट और तौल से है। ‘हेगेमनी’ से ध्वनित सैन्य - प्राबल्य का यही अथर् आज विश्व - राजनीति में अमरीका की हैसियत को बताने में इस्तेमाल होता है। क्या आपको आयशा की याद है जिसकी एक टाँग अमरीकी हमले में जाती रही? यही है वह सैन्य वचर्स्व जिसने उसकी आत्मा को तो नहीं लेकिन उसके शरीर को शरूर पंगु बना दिया। एरेस, केगल्स काटर्ून 455.9 ;अरब डालर मेंद्ध संयुक्त राज्य अमरीका का सैन्य व्यय अमरीका के नीचे के 12 ताकतवर देश एक साथ मिलकर जितना अपनी सैन्य सुरक्षा पर खचर् करते हैं उससे कहीं ज्यादा खचर् अकेले अमरीका करता है। यहोँ आप देख सकते हैं कि सैन्य मद में ज्यादा खचर् करने वाले अध्िकांश देश अमरीका के मित्रा और सहयोगी हैं। इस कारण, अमरीका की शक्ित से बराबरी कर पाने की रणनीति कारगर नहीं होगी। स्रोतः इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट पफाॅर स्ट्रेटजिक स्टडीज, लंदन पूरी तरह से समझने के लिए हमें इसे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इतिहास इस बात का गवाह है कि साम्राज्यवादी शक्ितयों ने सैन्य बल का प्रयोग महज चार लक्ष्यों - जीतने, अपरोध् करने, दंड देने और कानून व्यवस्था बहाल रखने के लिए किया है। इराक के उदाहरण से प्रकट है कि अमरीका की विजय - क्षमता विकट है। इसी तरह अपरु( करने और दंड देने की भी उसकी क्षमता स्वतःसि( है। अमरीकी सैन्य क्षमता की कमजोरी सिपफर् एक बात में जाहिर हुइर् है। वहअपने अध्िकृत भू - भाग में कानून व्यवस्था नहीं बहाल कर पाया है। 449.4 ;अरब डालर मेंद्ध स्पेन 12.6 आॅस्ट्रेलियाद. कोरियाभारतसउदी अरब 14.3 16.4 19.8 20.9 इटली 33.9 जमर्नी 37.8 जापान 45.2 बि्रटेन 50.1 Úांस 52.7 अमरीका से नीचे के 12 देशों का सैन्य व्यय वचर्स्व μ ढाँचागत ताकत के अथर् में वचर्स्व का दूसरा अथर् पहले अथर् से बहुत अलग है। इसका रिश्ता वैश्िवक अथर्व्यवस्था की एक खास समझ से है। इस समझ की बुनियादी धरणा है कि वैश्िवक अथर्व्यवस्था में अपनी मजीर् चलाने वाला एक ऐसा देश शरूरी होता है जो अपने मतलब की चीजों को बनाए और बरकरार रखे। ऐसे देश के लिए शरूरी है कि उसके पास व्यवस्था कायम करने के लिए कायदों को लागू करने की क्षमता और इच्छा हो। साथ ही शरूरी है कि वह वैश्िवक व्यवस्था को हर हालत में बनाए रखे। दबदबे वाला देश ऐसा अपने पफायदे के लिए करता है लेकिन अक्सर इसमें उसे वुफछ आपेक्ष्िाक हानि उठानी पड़ती है। दूसरे प्रतियोगी देश वैश्िवक अथर्व्यवस्था के खुलेपन का पफायदा उठाते हैं जबकि इस खुलेपन को कायम रखने के लिए उन्हें कोइर् खचर् भी नहीं करना पड़ता। वचर्स्व के इस दूसरे अथर् को ग्रहण करें तो इसकी झलक हमें विश्वव्यापी ‘सावर्जनिक वस्तुओं’ को मुहैया कराने की अमरीकी भूमिका में मिलती है। ‘सावर्जनिक वस्तुआंे’ से आशय ऐसी चीजों से है जिसका उपभोग कोइर् एक व्यक्ित करे तो दूसरे को उपलब्ध् इसी वस्तु की मात्रा में कोइर् कमी नहीं आए। स्वच्छ वायु और सड़क सावर्जनिक वस्तु के उदाहरण हैं। वैश्िवक अथर्व्यवस्था के संदभर् में सावर्जनिक वस्तु का सबसे बढि़या उदाहरण समुद्री व्यापार - मागर् ;सी लेन आॅव कम्युनिकेशन्स - ैस्व्ब्ेद्ध हैं जिनका इस्तेमाल व्यापारिक जहाज करते हैं। खुली वैश्िवक अथर्व्यवस्था में मुक्त - व्यापार समुद्री व्यापार - मागो± के खुलेपन के बिना संभव नहीं। दबदबे वाला देश अपनी नौसेना की ताकत से समुद्री व्यापार - मागो± पर आवाजाही के नियम तय करता है और अंतरार्ष्ट्रीय समुद्र में अबाध् आवाजाही को सुनिश्िचत करता है। दूसरे विश्वयु( के बाद बि्रटिश नौसेना का जोर घट गया। अब यह भूमिका अमरीकी नौसेना निभाती है जिसकी उपस्िथति दुनिया के लगभग सभी महासागरों में है। सकल घरेलू उत्पाद 2005 अन्य अमरीका ः में: में यूरोपीय क्षेत्राचीन जापानभारत रूस अमरीका की अथर्व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अथर्व्यवस्था है। लेकिन सैन्य शक्ित के दायरे के उलट विश्व की अथर्व्यवस्था में अमरीका के कइर् तगड़े प्रतिद्वंद्वी हैं। यदि हम तुलनात्मक क्रयशक्ित के हिसाब से देखें तो यह बात और स्पष्ट हो जाती है। दाएं आरेख से इस बात को अच्छी तरह समझा जा सकता है। तुलनात्मक क्रयशक्ित ;च्च्च् - पचेर्¯जग पावर पैरेटीद्ध से आशय किसी राष्ट्र की मुद्रा में वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक खरीददारी से लिया गया है। स्रोतः ीजजचरूध्ध्ेपसमतमेवनतबमेण्ूवतसकइंदाण्वतहध्क्।ज्।ैज्।ज्प्ैज्प्ब्ैध्त्मेवनतबमेध्ळक्च्ण्चक िवैश्िवक सावर्जनिक वस्तु का एक और उदाहरण है - इंटरनेट। हालाँकि आज इंटरनेट के जरिए वल्डर् वाइड वेव ;जगत - जोड़ता - जालद्ध का आभासी संसार साकार हो गया दीखता है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंटरनेट अमरीकी सैन्य अनुसंधन परियोजना का परिणाम है। यह परियोजना 1950 में शुरू हुइर् थी। आज भी इंटरनेट उपग्रहों के एक वैश्िवक तंत्रा पर निभर्र है और इनमें से अध्िकांश उपग्रह अमरीका के हैं। हम जानते हैं कि अमरीका दुनिया केिब्रटेन हर हिस्से, वैश्िवक अथर्व्यवस्था के हर क्षेत्रा तथा प्रौद्योगिकी के हर हलके में मौजूद है। विश्व की अथर्व्यवस्था में अमरीका की 28 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। यदि विश्व के व्यापार में यूरोपीय संघ के अंदरूनी व्यापार को भी शामिल कर लें तो विश्व के वुफल व्यापार में अमरीका की 15 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। विश्व की अथर्व्यवस्था का सकल घरेलू उत्पाद 2005 ;तुलनात्मक व्रफयशक्ित के आधर परद्ध अमरीकाअन्य यूरोपीय क्षेत्रा भारत जापान चीनरूस यह देश इतना ध्नी वैफसे हो सकता है? मुझे तो यहाँ बहुत - से ग़रीब लोग दीख रहे हैं! इनमें अध्िकांश अश्वेत हैं। बे्रटनवुड प्रणाली के अंतगर्त वैश्िवक व्यापार के नियम तय किए गए थे। क्या ये नियम अमरीकी हितों के अनुवूफल बनाए गए थे? ब्रेटनवुड प्रणाली के बारे में और जानकारी जुटायें। यदि मैंने विज्ञान लिया होता तो मुझे मेडिकल या इंजीनियरिंग काॅलेज की प्रवेश - परीक्षा में बैठना पड़ता। इसका मतलब होता बहुत - से उन लोगों से मुकाबला करना जो डाॅक्टर या इंजीनियर बन कर अमरीका जाना चाहते हैं। एक भी क्षेत्रा ऐसा नहीं है जिसमें कोइर् अमरीकी कंपनी अग्रणी तीन कंपनियों में से एक नहीं हो। ध्यान रहे कि अमरीका की आथ्िार्क प्रबलता उसकी ढाँचागत ताकत यानी वैश्िवक अथर्व्यवस्था को एक खास शक्ल में ढालने की ताकत से जुड़ी हुइर् है। दूसरे विश्वयु( के बाद ब्रेटनवुड प्रणाली कायम हुइर् थी। अमरीका द्वारा कायम यह प्रणाली आज भी विश्व की अथर्व्यवस्था की बुनियादी संरचना का काम कर रही है। इस तरह हम विश्व बैंक, अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन को अमरीकी वचर्स्व का परिणाम मान सकते हैं। अमरीका की ढाँचागत ताकत का एक मानक उदाहरण एमबीए ;मास्टर आॅव बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशनद्ध की अकादमिक डिग्री है। यह विशु( रूप से अमरीकी धरणा है कि व्यवसाय अपने आप में एक पेशा है जो कौशल पर निभर्र करता है और इस कौशल को विश्वविद्यालय में अजिर्त किया जा सकता है। यूनिवसिर्टी आॅव पेन्िसलवेनिया में वाह्टर्न स्वूफल के नाम से विश्व का पहला ‘बिजनेस स्वूफल’ खुला। इसकी स्थापना सन् 1881 में हुइर्। एमबीए के शुरूआती पाठ्यक्रम 1900 से आरंभ हुए। अमरीका से बाहर एमबीए के किसी पाठ्यक्रम की शुरुआत सन् 1950 में ही जाकर हो सकी। आज दुनिया में कोइर् देश ऐसा नहीं जिसमें एमबीए को एक प्रतिष्िठत अकादमिक डिग्री का दजार् हासिल न हो। इस बात से हमें अपने दक्ष्िाण अप्रफीकी दोस्त जाबू की याद आती है। ढाँचागत वचर्स्व को ध्यान में रखें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जाबू के पिता क्यों जोर दे रहे थे कि वह पेंटिंग की पढ़ाइर् छोड़कर एमबीए की डिग्री ले। वचर्स्व μ सांस्कृतिक अथर् में अमरीकी वचर्स्व को शु( रूप से सैन्य और आथ्िार्क संदभर् में देखना भूल होगी। हमेंअमरीकी वचर्स्व पर विचारधरा या संस्कृति के संदभर् में भी विचार करना चाहिए। वचर्स्व के इस तीसरे अथर् का रिश्ता ‘सहमति गढ़ने’ की ताकत से है। यहाँ वचर्स्व का आशय है सामाजिक, राजनीतिक और ख़ासकर विचारधारा के ध्रातल पर किसी वगर् की बढ़त या दबदबा। कोइर् प्रभुत्वशाली वगर् या देश अपने असर में रहने वालों को इस तरह सहमत कर सकता है कि वे भी दुनिया को उसी नशरिए से देखने लगें जिसमें प्रभुत्वशाली वगर् या देश देखता है। इससे प्रभुत्वशाली की बढ़त और वचर्स्व कायम होता है। विश्व राजनीति के दायरे में वचर्स्व के इस अथर् को लागू करें तो स्पष्ट होगा कि प्रभुत्वशाली देश सिपफर् सैन्य शक्ित से काम नहीं लेताऋ वह अपने प्रतिद्वंद्वी और अपने से कमजोर देशों के व्यवहार - बरताव को अपने मनमापिफक बनाने के लिए विचारधरा से जुड़े साध्नों का भी इस्तेमाल करता है। कमजोर देशों के व्यवहार - बरताव को इस तरह से प्रभावित किया जाता है कि उससे सबसे ताकतवर देश का हितसाध्न होऋ उसका प्राबल्य बना रहे। इस तरह, प्रभुत्वशाली देश शोर - जबदर्स्ती और रजामंदी दोनों ही तरीकों से काम लेता है। अक्सर रजामंदी का तरीका शोर - जबदर्स्ती से कहीं ज्यादा कारगर साबित होता है। आज विश्व में अमरीका का दबदबा सिपफर् सैन्य शक्ित और आथ्िार्क बढ़त के बूते ही नहीं बल्िक अमरीका कीसांस्कृतिक मौजूदगी भी इसका एक कारण है। चाहे हम इस बात को मानें या न मानें लेकिन यह सच है कि आज अच्छे जीवन और व्यक्ितगत सपफलता के बारे में जो धरणाएँ पूरे विश्व में प्रचलित हैंऋ दुनिया के अध्िकांश लोगों और समाजों के जो सपने हैं - वे सब बीसवीं सदी के अमरीका में प्रचलित व्यवहार - बरताव के ही प्रतिबिंब हैं। अमरीकीसंस्कृति बड़ी लुभावनी है और इसी कारण सबसे ज्यादा ताकतवर है। वचर्स्व का यहसांस्कृतिक पहलू है जहाँ शोर - जबदर्स्ती से नहीं बल्िक रजामंदी से बात मनवायी जाती है। समय गुशरने के साथ हम उसके इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि अब हम इसे इतना ही सहज मानते हैं जितना अपने आस - पास के पेड़ - पक्षी या नदी को। आपको आन्द्रेइर् और उसकी ‘वूफल’ जीन्स की याद होगी। आन्द्रेइर् के माता - पिता जब सोवियत संघ में युवा थे तो उनकी पीढ़ी के लिए नीली जीन्स ‘आजादी’ का परम प्रतीक हुआ करती थी। युवक - युवती अक्सर अपनी साल - साल भर की तनख्वाह किसी ‘चोरबाशार’ में विदेशी पयर्टकों से नीली जीन्स खरीदने पर खचर् कर देते थे। ऐसा चाहे जैसे भी हुआ हो बड़ी विचित्रा बात है! अपने लिए जीन्स खरीदते समय तो मुझे अमरीका का ख्याल तक नहीं आता! पिफर मैं अमरीकी वचर्स्व के चपेट में वैफसे आ सकती हूँ? ये सारी तस्वीरें जकातार् ;इंडोनेश्िायाद्ध की हैं। हर तस्वीर में अमरीकी वचर्स्व के तत्त्वों को ढूँढें। स्वूफल से घर लौटते समय क्या आप रास्ते में ऐसी चीजों की पहचान कर सकते हैं? लेकिन सोवियत संघ की एक पूरी पीढ़ी के लिए नीली जीन्स ‘अच्छे जीवन’ की आकांक्षाओं का प्रतीक बन गइर् थी - एक ऐसा ‘अच्छा जीवन’ जो सोवियत संघ में उपलब्ध् नहीं था। शीतयु( के दौरान अमरीका को लगा कि सैन्य शक्ित के दायरे में सोवियत संघ को मात दे पाना मुश्िकल है। अमरीका ने ढाँचागतताकत और सांस्कृतिक प्रभुत्व के दायरे में सोवियत संघ से बाजी मारी। सोवियत संघ कीवेंफद्रीकृत और नियोजित अथर्व्यवस्था उसके लिए अंदरूनी आथ्िार्क संगठन का एक वैकल्िपक माॅडल तो थी लेकिन पूरे शीतयु( के दौरान विश्व की अथर्व्यवस्था पूँजीवादी तशर् पर चली। अमरीका ने सबसे बड़ी जीतसांस्कृतिक प्रभुत्व के दायरे में हासिल की। सोवियत संघ में नीली जीन्स के लिए दीवानगी इस बात को सापफ - सापफ शाहिर करती है किअमरीका एक सांस्कृतिक उत्पाद के दम पर सोवियत संघ में दो पीढि़यों के बीच दूरियाँ पैदा करने में कामयाब रहा। अमरीकी शक्ित के रास्ते में अवरोध् इतिहास बताता है कि साम्राज्यों का पतन उनकी अंदरूनी कमजोरियों के कारण होता है। ठीक इसी तरह अमरीकी वचर्स्व की सबसे बड़ी बाध खुद उसके वचर्स्व के भीतर मौजूद है। अमरीकी शक्ित की राह में तीन अवरोध् हैं। 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद के सालों में ये व्यवधन एक तरह से निष्िक्रय जान पड़ने लगे थे लेकिन ध्ीरे - ध्ीरे पिफर प्रकट होने लगे हैं। पहला व्यवधन स्वयं अमरीका की संस्थागत बुनावट है। यहाँ शासन के तीन अंगों के बीच शक्ित का बँटवारा है और यही बुनावट कायर्पालिका द्वारा सैन्य शक्ित के बेलगाम इस्तेमाल पर अंवुफश लगाने का काम करती है। अमरीका की ताकत के आड़े आने वाली दूसरी अड़चन भी अंदरूनी है। इस अड़चन केमूल में है अमरीकी समाज जो अपनी प्रकृति में उन्मुक्त है। अमरीका में जन - संचार के साध्न समय - समय पर वहाँ के जनमत को एक खास दिशा में मोड़ने की भले कोश्िाश करें लेकिनअमरीकी राजनीतिक संस्कृति में शासन के उद्देश्य और तरीके को लेकर गहरे संदेह का भाव भरा है। अमरीका के विदेशी सैन्य - अभ्िायानों पर अंवुफश रखने में यह बात बड़ी कारगर भूमिका निभाती है। बहरहाल, अमरीकी ताकत की राह मेंमौजूद तीसरा व्यवधन सबसे ज्यादा महत्त्वपूणर् है। अंतरार्ष्ट्रीय व्यवस्था में आज सिपफर् एक संगठन है जो संभवतया अमरीकी ताकत पर लगाम कस सकता है और इस संगठन कानाम है ‘नाटो’ अथार्त् उत्तर अटलांटिक ट्रीटी आगर्नाइजेशन। स्पष्ट ही अमरीका का बहुत बड़ा हित लोकतांत्रिाक देशों के इस संगठन को कायम रखने से जुड़ा है क्योंकि इन देशों में बाशारमूलक अथर्व्यवस्था चलती है। इसी कारण इस बात की संभावना बनती है कि ‘नाटो’ में शामिल अमरीका के साथी देश उसके वचर्स्व पर वुफछ अंवुफश लगा सवेंफ। अमरीका से भारत के संबंध् शीतयु( के वषो± में भारत अमरीकी गुट के विरु( खड़ा था। इन सालों में भारत की करीबी दोस्ती सोवियत संघ से थी। सोवियत संघ के बिखरने के बाद भारत ने पाया कि लगातार कटुतापूणर् होते अंतरार्ष्ट्रीय माहौल में वह मित्राविहीन हो गया है। इसी अवध्ि में भारत ने अपनी अथर्व्यवस्था का उदारीकरण करने तथा उसे वैश्िवक अथर्व्यवस्था से जोड़ने का भी पैफसला किया। इस नीति और हाल के सालों में प्रभावशाली आथ्िार्क वृि - दर के कारण भारत अब अमरीका समेत कइर् देशों के लिए आकषर्क आथ्िार्क सहयोगी बन गया है। हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि हाल के सालों में भारत - अमरीकी संबधें के बीच दो नइर् बातें उभरी हैं। इन बातों का संबंध् प्रौद्योगिकी और अमरीका मंेबसे अनिवासी भारतीयों से है। दरअसल, ये दोनों बातें आपस में जुड़ी हुइर् हैं। निम्नलिख्िात तथ्यों पर विचार कीजिए μ ऽ साॅफ्रटवेयर के क्षेत्रा में भारत के वुफल नियार्त का 65 प्रतिशत अमरीका को जाता है। ऽ बोईंग के 35 प्रतिशत तकनीकी कमर्चारी भारतीय मूल के हैं। ऽ 3 लाख भारतीय ‘सिलिकन वैली’ में काम करते हैं। ऽ उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा की 15 प्रतिशत कंपनियों की शुरुआत अमरीका में बसे भारतीयों ने की है। यह अमरीका के विश्वव्यापी वचर्स्व का दौर है और बाकी देशों की तरह भारत को भी पैफसला करना है कि अमरीका के साथ वह किस तरह के संबंध् रखना चाहता है। यह तय कर पाना कोइर् आसान काम नहीं। भारत में तीन संभावित रणनीतियों पर बहस चल रही है - ऽ भारत के जो विद्वान अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति को सैन्य शक्ित के संदभर् में देखते - समझते हैं, वे भारत और अमरीका की बढ़ती हुइर् नशदीकी से भयभीत हैं। ऐसे विद्वान यही चाहेंगे कि भारत वाश्िांग्टन से अपना अलगाव बनाए रखे और अपना ध्यान अपनी राष्ट्रीय शक्ित को बढ़ाने पर लगाये। ऽ वुफछ विद्वान मानते हैं कि भारत और अमरीका के हितों में हेलमेल लगातार बढ़ रहा है और यह भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है। ये विद्वान एक ऐसी रणनीति अपनाने की तरपफदारी करते हैं जिससे भारत अमरीकी वचर्स्व का पफायदा उठाए। वे चाहते हैं कि दोनों जैसे ही मैं कहता हूँ कि मैं भारत से आया हूँ, ये लोग मुझसे पूछते हैं कि ‘क्या तुम वंफप्यूटर इंजीनियर हो?’ यह सुनकर अच्छा लगता है। के आपसी हितों का मेल हो और भारत अपने लिए सबसे बढि़या विकल्प ढूँढ़ सके। इन विद्वानों की राय है कि अमरीका के विरोध् की रणनीति व्यथर् साबित होगी और आगे चलकर इससे भारत को नुकसान होगा। ऽ वुफछ विद्वानों की राय है कि भारत अपनी अगुआइर् में विकासशील देशों का गठबंध्न बनाए। वुफछ सालों में यह गठबंध्न ज्यादा ताकतवर हो जाएगा और अमरीकी वचर्स्व के प्रतिकार में सक्षम हो जाएगा। शायद भारत और अमरीका के बीच संबंध् इतने जटिल हैं कि किसी एक रणनीति पर निभर्र नहीं रहा जा सकता। अमरीका से निवार्ह करने के लिए भारत को विदेश नीति की कइर् रणनीतियों का एक समुचित मेल तैयार करना होगा। वचर्स्व से वैफसे निपटें? कब तक चलेगा अमरीकी वचर्स्व? इस वचर्स्व से वैफसे बचा जा सकता है? शाहिरा तौर पर ये सवाल हमारे वक्त के सबसे झंझावाती सवाल हैं। इतिहास से हमें इन सवालों के जवाब के वुफछ सुराग मिलते हैं। लेकिन बात यहाँ इतिहास की नहीं वतर्मान और भविष्य की हो रही है। अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति में ऐसी चीशें गिनी - चुनी ही हैं जो किसी देश की सैन्यशक्ित पर लगाम कस सवेंफ। हर देश में सरकार होती है लेकिन विश्व - सरकार जैसी कोइर् चीज नहीं होती। अध्याय - 6 में यह बात स्पष्ट होगी कि अंतरार्ष्ट्रीय संगठन विश्व - सरकार नहीं हंै। अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति दरअसल ‘सरकार विहीन राजनीति’ है। वुफछ कायदे - कानून शरूर हैं जो यु( पर वुफछ अंवुफश रखतेंै किन य कायदे - कानून यु( को रोकह लेेनहीं सकते। पिफर, शायद ही कोइर् देश होगा जो अपनी सुरक्षा को अंतरार्ष्ट्रीय कानूनों के हवाले कर दे। तो क्या इन बातों से यह समझा जाए कि न तो वचर्स्व से कोइर् छुटकारा है और न ही यु( से? पिफलहाल हमें यह बात मान लेनी चाहिए कि कोइर् भी देश अमरीकी सैन्यशक्ित के जोड़ का मौजूद नहीं है। भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों में अमरीकी वचर्स्व को चुनौती दे पाने की संभावना है लेकिन इन देशों के बीच आपसी विभेद हैं और इन विभेदों के रहते अमरीका के विरु( इनका कोइर् गठबंध्न नहीं हो सकता। वुफछ लोगों का तवर्फ है कि वचर्स्वजनित अवसरों के लाभ उठाने की रणनीति ज्यादा संगत है। उदाहरण के लिए, आथ्िार्क वृि - दरको ऊँचा करने के लिए व्यापार को बढ़ावा, प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण और निवेश शरूरी है और अमरीका के साथ मिलकर काम करने से इसमें आसानी होगी न कि उसका विरोध् करने से। ऐसे में सुझाव दिया जाता है कि सबसे ताकतवर देश के विरु( जाने के बजाय उसके वचर्स्व - तंत्रा में रहते हुए अवसरों का पफायदा उठाना कहीं उचित रणनीति है। इसे ‘बैंडवैगन’ अथवा ‘जैसी बहे बयार पीठ तैसी कीजै’ की रणनीति कहते हैं। देशों के सामने एक विकल्प यह है कि वे अपने को ‘छुपा’ लें। इसका अथर् होता है दबदबे वाले देश से यथासंभव दूर - दूर रहना। इस व्यवहार के कइर् उदाहरण हैं। चीन, रूस और यूरोपीय संघ सभी एक न एक तरीके से अपने को अमरीकी निगाह में चढ़ने से बचा रहे हैं। इस तरह से अमरीका के किसी बेवजह या बेपनाह क्रोध् की चपेट में आने से ये देश अपने को बचाते हैं। बहरहाल, बड़े या मँझले दजेर् के ताकतवर देशों के लिए यह रणनीति ज्यादा दिनों तक काम नहीं आने वाली। छोटे देशों के लिए यह संगत और आकषर्क रणनीति हो सकती है, लेकिन यह कल्पना से परे है कि चीन, भारत और रूस जैसे बड़े देश अथवा यूरोपीय संघ जैसा विशाल जमावड़ा अपने को बहुत दिनों तक अमरीकी निगाह में चढ़ने से बचाकर रख सके। वुफछ लोग मानते हैं कि अमरीकी वचर्स्व का प्रतिकार कोइर् देश अथवा देशों का समूह नहीं कर पाएगा क्योंकि आज सभी देश अमरीकी ताकत के आगे बेबस हैं। ये लोग मानते हैं कि राज्येतर संस्थाएँ अमरीकी वचर्स्व के प्रतिकार के लिए आगे आएंगी। अमरीकी वचर्स्व कोआथ्िार्क और सांस्कृतिक ध्रातल पर चुनौती मिलेगी। यह चुनौती स्वयंसेवी संगठन, सामाजिक आंदोलन और जनमत के आपसी मेल से प्रस्तुत होगीऋ मीडिया का एक तबका, बुिजीवी, कलाकार और लेखक आदि अमरीकी वचर्स्व के प्रतिराध् के लिए आगे आएंगे। ये राज्येतर ेसंस्थाएँ विश्वव्यापी नेटववर्फ बना सकती हैं जिसमें अमरीकी नागरिक भी शामिल होंगे और चरण ऽ अमरीका को प्रमाण मानकर विश्व के बड़े भू - राजनीतिक क्षेत्रा ;मध्य अमरीका, दक्ष्िाण अमरीका, अप्रफीका, यूरोप, भूतपूवर् सोवियत संघ, दक्ष्िाण एश्िाया, पूवीर् एश्िाया और आस्टेªेलियाद्ध छात्रों को सौंपे। आप छात्रों को ऐसे क्षेत्रा भी सौंप सकते हैं जो शीतयु( के बाद के सालों में यु( के क्षेत्रा रहे और जहाँ अमरीका शामिल रहा ;जैसे - अपफगानिस्तान, इराक, इशरायल - पिफलीस्तीन या कोसोवो अथवा इस पाठ को पढ़ाते समय जिस क्षेत्रा में संघषर् चल रहा है।द्ध ऽ हर क्षेत्रा के लिए छात्रों का समूह बनाएँ। प्रत्येक समूह में छात्रों की समान संख्या हो। प्रत्येक समूह अपने हिस्से के यु(क्षेत्रा में अमरीका द्वारा निभाइर् गइर् भूमिका से जुड़े तथ्यों को संकलित करें। संकलन में जोर इस बात पर रहे कि इस क्षेत्रा में अमरीका के हित क्या थे, उसने क्या कदम उठाए और क्षेत्रा में अमरीका को लेकर वैफसा जनमत बना। छात्रा उपलब्ध् ड्डोतों से चित्रा/काटूर्न भी जुटाकर प्रस्तुत कर सकते हैं। ऽ प्रत्येक समूह अपना संकलन कक्षा के सामने प्रस्तुत करे। अध्यापकों के लिए ऽ तथ्यों के संकलन का इस्तेमाल बुनियादी जानकारी के रूप में करते हुए अध्यापक छात्रों का ध्यान अमरीका द्वारा किए गए हस्तक्षेप पर वेंफित करें और बताएँ कि अमरीका जिन सि(ांतों की पैरोकारी करता है उनसे ये हस्तक्षेप मेल खाते हैं या नहीं। ऽ किसी यु(क्षेत्रा या इलाके का भविष्य अब से 20 साल बाद वैफसा होगा? अमरीकी वचर्स्व कितने दिनों तक कायम रहेगा? उस क्षेत्रा में अमरीकी वचर्स्व को कौन - से देश चुनौती दे सकते हैं? इन सवालों पर छात्रों को सोचने के लिए उत्साहित करें। साथ मिलकर अमरीकी नीतियों की आलोचना तथा प्रतिरोध् किया जा सकेगा। आपने यह जुमला सुना होगा कि अब हम ‘विश्वग्राम’ में रहते हैं। इस विश्वग्राम में एक चैध्री है और हम सभी उसके पड़ोसी। यदि चैध्री का बरताव असहनीय हो जाय तो भी विश्वग्राम से चले जाने का विकल्प हमारे पास मौजूद नहीं क्योंकि यही एकमात्रा गाँव है जिसे हम जानते हैं और रहने के लिए हमारे पास यही एक गाँव है। ऐसे में प्रतिरोध् ही एकमात्रा विकल्प बचता है। ये सारी बातें इर्ष्यार् से भरी हुइर् हैं। अमरीकी वचर्स्व से हमें परेशानी क्या है? क्या यही कि हम अमरीका में नहीं जन्मे? या कोइर् और बात है? शक्ित - संतुलन के तवर्फ को देखते हुए वचर्स्व की स्िथति अंतरार्ष्ट्रीय मामलों में एक असामान्य परिघटना है। इसका कारण बड़ा सीध - सादा है। विश्व - सरकार जैसी कोइर् चीज नहीं होती और ऐसे में हर देश को अपनी सुरक्षा सुनिश्िचत करनी होती है। कभी - कभी अत्यंत विपरीत परिस्िथतियों में उसे यह भी सुनिश्िचत करना होता है कि कम से कम उसका वजूद बचा रहे। इस कारण, अंतरार्ष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में विभ्िान्न देश शक्ित - संतुलन को लेकर बड़े सतवर्फ होते हैं और आम तौर पर वे किसी एक देश को इतना ताकतवर नहीं बनने देते कि वह बाकी देशों के लिए भयंकर खतरा बन जाय। ऊपर जिस शक्ित - संतुलन की बात कही गइर् है उसे इतिहास से भी पुष्ट किया जा सकता है। चलन के मुताबिक हम 1648 को वह साल स्वीकार करते हैं जब संप्रभु राज्य विश्व - राजनीति के प्रमुख किरदार बने। इसके बाद से साढ़े तीन सौ साल गुजर चुके हैं। इस दौरान सिपफर् दो अवसर आए जब किसी एक देश ने अंतरार्ष्ट्रीय पफलक पर वही प्रबलता प्राप्त की जो आज अमरीका को हासिल है। यूरोप की राजनीति के संदभर् में 1660 से 1713 तक प्रफांस का दबदबा था और यह वचर्स्व का पहला उदाहरण है। बि्रटेन का वचर्स्व और समुद्री व्यापार के बूते कायम हुआ उसका साम्राज्य 1860 से 1910 तक बना रहा। यह वचर्स्व का दूसरा उदाहरण है। इतिहास यह भी बताता है कि वचर्स्व अपने चरमोत्कषर् के समय अजेय जान पड़ता है लेकिन यह हमेशा के लिए कायम नहीं रहता। इसके ठीक विपरीत शक्ित - संतुलन की राजनीति वचर्स्वशील देश की ताकत को आने वाले समय में कम कर देती है। 1660 में लुइर् 14वें के शासनकाल में प्रफांस अपराजेय था लेकिन 1713 तक इंग्लैंड, हैबस्बगर्, आस्िट्रया और रूस प्रफांस की ताकत को चुनौती देने लगे। 1860 में विक्टोरियाइर् शासन का सूयर् अपने पूरे उत्कषर् पर था और बि्रटिश साम्राज्य हमेशा के लिए सुरक्ष्िात लगता था। 1910 तक यह स्पष्ट हो गया कि जमर्नी, जापान और अमरीका बि्रटेन की ताकत को ललकारने के लिए उठ खड़े हुए हैं। इसी तरह, अब से 20 साल बाद एक और महाशक्ित या कहें कि शक्ितशाली देशों का गठबंध्न उठ खड़ा हो सकता है क्योंकि तुलनात्मक रूप से देखें तो अमरीका की ताकत कमजोर पड़ रही है। िस्टोपफर लेयने के लेख ‘द यूनिपोलर इल्लुजन: व्हाइर् न्यू ग्रेट पावसर् विल राइज’ पर आधरित 1.वचर्स्व के बारे में निम्नलिख्िात में से कौन - सा कथन ग़्ालत है? ;कद्ध इसका अथर् किसी एक देश की अगुआइर् या प्राबल्य है। ;खद्ध इस शब्द का इस्तेमाल प्राचीन यूनान में एथेंस की प्रधनता को चिित करने के लिए किया जाता था। ;गद्ध वचर्स्वशील देश की सैन्यशक्ित अजेय होती है। ;घद्ध वचर्स्व की स्िथति नियत होती है। जिसने एक बार वचर्स्व कायम कर लिया उसने हमेशा के लिए वचर्स्व कायम कर लिया। 2.समकालीन विश्व - व्यवस्था के बारे में निम्नलिख्िात में से कौन - सा कथन ग़्ालत है? ;कद्धऐसी कोइर् विश्व - सरकार मौजूद नहीं जो देशों के व्यवहार पर अंवुफश रख सके। ;खद्ध अंतरार्ष्ट्रीय मामलों में अमरीका की चलती है। ;गद्ध विभ्िान्न देश एक - दूसरे पर बल - प्रयोग कर रहे हैं। ;घद्ध जो देश अंतरार्ष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं उन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ कठोर दंड देता है। प्रश्नावली3.‘आॅपरेशन इराकी प्रफीडम’ ;इराकी मुक्ित अभ्िायानद्ध के बारे में निम्नलिख्िात में से कौन - सा कथन ग़्ालत है? ;कद्ध इराक पर हमला करने के इच्छुक अमरीकी अगुआइर् वाले गठबंध्न में 40 से ज्यादा देश शामिल हुए। ;खद्ध इराक पर हमले का कारण बताते हुए कहा गया कि यह हमला इराक को सामूहिक संहार के हथ्िायार बनाने से रोकने के लिए किया जा रहा है। ;गद्ध इस कारर्वाइर् से पहले संयुक्त राष्ट्रसंघ की अनुमति ले ली गइर् थी। ;घद्ध अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंध्न को इराकी सेना से तगड़ी चुनौती नहीं मिली। 4. इस अध्याय में वचर्स्व के तीन अथर् बताए गए हैं। प्रत्येक का एक - एक उदाहरण बतायें। ये उदाहरण इस अध्याय में बताए गए उदाहरणों से अलग होने चाहिए। 5.उन तीन बातों का जिक्र करें जिनसे साबित होता है कि शीतयु( की समाप्ित के बाद अमरीकी प्रभुत्व का स्वभाव बदला है और शीतयु( के वषो± के अमरीकी प्रभुत्व की तुलना में यह अलग है। 6.निम्नलिख्िात में मेल बैठायें μ ;1द्ध आॅपरेशन इनपफाइनाइट रीच ;2द्ध आॅपरेशन इंड्यूरिंग प्रफीडम ;3द्ध आॅपरेशन डेजटर् स्टामर् ;4द्ध आॅपरेशन इराकी प्रफीडम ;कद्ध तालिबान और अल - कायदा के ख्िालापफ जंग ;खद्ध इराक पर हमले के इच्छुक देशों का गठबंध्न ;गद्ध सूडान पर मिसाइल से हमला ;घद्ध प्रथम खाड़ी यु(। 7.अमरीकी वचर्स्व की राह में कौन - से व्यवधन हैं। आपके जानते इनमें से कौन - सा व्यवधन आगामीदिनों में सबसे महत्त्वपूणर् साबित होगा? 8.भारत - अमरीका समझौते से संबंध्ित बहस के तीन अंश इस अध्याय में दिए गए हैं। इन्हें पढ़ें और किसी एक अंश को आधर मानकर पूरा भाषण तैयार करें जिसमें भारत - अमरीकी संबंध् के बारे में किसी एक रुख का समथर्न किया गया हो। 9. फ्यदि बड़े और संसाध्न संपन्न देश अमरीकी वचर्स्व का प्रतिकार नहीं कर सकते तो यह माननाअव्यावहारिक है कि अपेक्षाकृत छोटी और कमजोर राज्येतर संस्थाएँ अमरीकी वचर्स्व का कोइर् प्रतिरोध् कर पाएंगी।य् इस कथन की जाँच करें और अपनी राय बताएँ।

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