सोवियत प्रणाली क्या थी? समाजवादी सोवियत गणराज्य ;यू.एस.एस.आर.द्ध रूस में हुइर् 1917 की समाजवादी क्रांति के बाद अस्ितत्व में आया। यह क्रांति पूँजीवादी व्यवस्था के विरोध् में हुइर् थी और समाजवाद के आदशो± और समतामूलक समाज की शरूरत से प्रेरित थी। यह मानव इतिहास में निजीसंपिा की संस्था को समाप्त करने और समाज को समानता के सि(ांत पर सचेत रूप से रचने की सबसे बड़ी कोश्िाश थी। ऐसा करने में सोवियत प्रणाली के निमार्ताओं ने राज्य और‘पाटीर् की संस्था’ को प्राथमिक महत्त्व दिया। सोवियत राजनीतिक प्रणाली की ध्ुरी कम्युनिस्ट पाटीर् थी। इसमें किसी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष के लिए जगह नहीं थी। अथर्व्यवस्था योजनाब( और राज्य के नियंत्राण में थी। दूसरे विश्वयु( के बाद पूवीर् यूरोप के देश सोवियत संघ के अंवुफश में आ गये। सोवियत सेना ने इन्हें पफासीवादी तावफतों के चंगुल से मुक्त कराया था। इन सभी देशों की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को सोवियत संघ की समाजवादी प्रणाली की तजर् पर ढाला गया। इन्हें ही समाजवादी खेमे के देश या ‘दूसरी दुनिया’ कहा जाता है। इस खेमे का नेता समाजवादी सोवियत गणराज्य था। दूसरे विश्वयु( के बाद सोवियत संघ महाशक्ित के रूप में उभरा। अमरीका को छोड़ दें तो सोवियत संघ की अथर्व्यवस्था शेष विश्व की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित थी। सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नतथी। उसके पास विशाल ऊजार् - संसाध्न था जिसमें खनिज - तेल, लोहा और इस्पात तथा मशीनरी उत्पाद शामिल हैं। सोवियत संघ के दूर - दराज के इलाके भी आवागमन की सुव्यवस्िथत और विशाल प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे। सोवियत संघ का घरेलू उपभोक्ता - उद्योग भी बहुत उन्नत था और पिन से लेकर कार तक सभी चीजों का उत्पादन वहाँ होता था। हालाँकि सोवियत संघ केउपभोक्ता उद्योग में बनने वाली वस्तुएँ गुणवत्ता के लिहाज से पश्िचमी देशों के स्तर की नहीं थीं लेकिन सोवियत संघ की सरकार ने अपने सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्िचत कर दिया था। सरकार बुनियादी शरूरत की चीजें मसलन स्वास्थ्य - सुविध, श्िाक्षा, बच्चों की देखभाल तथा लोक - कल्याण की अन्य चीजें रियायती दर पर मुहैया कराती थी। बेरोेजगारी नहीं थी। मिल्िकयत का प्रमुख रूप राज्य का स्वामित्व था तथा भूमि और अन्य उत्पादक संपदाओं पर स्वामित्व होने के अलावा नियंत्राण भी राज्य का ही था। बहरहाल, सोवियत प्रणाली पर नौकरशाही का श्िाकंजा कसता चला गया। यह प्रणालीसत्तावादी होती गइर् और नागरिकों का जीवन कठिन होता चला गया। लोकतंत्रा और अभ्िाव्यक्ित की आशादी नहीं होने के कारण लोग अपनी असहमति अक्सर चुटवुफलों और काटूर्नों में व्यक्त करते थे। सोवियत संघ की अध्िकांश संस्थाओं में सुधर की शरूरत थी। सोवियत संघ में एक दल यानी कम्युनिस्ट पाटीर् का शासन था और इस दल का सभी संस्थाओं पर गहरा अंवुफश था। यह दल जनता के प्रतिजवाबदेह नहीं था। जनता ने अपनी संस्कृति और बाकी मामलों की साज - संभाल अपने आप करने के लिए 15 गणराज्यों को आपस में मिलाकर सोवियत संघ बनाया था। लेकिन पाटीर् ने जनता की इस इच्छा को पहचानने से इंकार कर दिया। हालाँकि सोवियत संघ के नक्शे में रूस, संघ के पन्द्रह गणराज्यों में से एक था लेकिन वास्तव में रूस का हर मामले में प्रभुत्व था। अन्य क्षेत्रों की जनता अक्सर उपेक्ष्िात और दमित महसूस करती थी। हथ्िायारों की होड़ में सोवियत संघ ने समय - समय पर अमरीका को बराबर की टक्कर दी लेकिन उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। सोवियत संघ प्रौद्योगिकी औरबुनियादी ढाँचे ;मसलन - परिवहन, ऊजार्द्ध के मामले में पश्िचमी देशों की तुलना में पीछे रह गया। लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह थी कि सोवियत संघ अपने नागरिकों की राजनीतिक और आथ्िार्क आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका। सोवियत संघ ने 1979 में अपफगानिस्ताऩमें हस्तक्षेप किया। इससे सोवियत संघ की व्यवस्था और भी कमजोर हुइर्। हालाँकि सोवियत संघ में लोगों का पारिश्रमिक लगातार बढ़ा लेकिन उत्पादकता और प्रौद्योगिकी के मामले में वह पश्िचम के देशोें से बहुत पीछे छूट गया। इससे हर तरह की उपभोक्ता - वस्तु की कमी हो गइर्। खाद्यान्न का आयात साल - दर - साल बढ़ता गया। 1970 के दशक के अंतिम वषो± में यह व्यवस्था लड़खड़ा रही थी और अंततः ठहर सी गयी। गोबार्चेव और सोवियत संघ काविघटन मिख़ाइल गोबार्चेव ने इस व्यवस्था को सुधरना चाहा। वे 1980 के दशक के मध्य में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पाटीर् के महासचिव बने। पश्िचम के देशों में सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रा में क्रांति हो रही थी और सोवियत संघ को इसकी बराबरी में लाने के लिए सुधर शरूरी हो गए थेेेेेे। गोबार्चेव ने पश्िचम के देशों के साथ संबंधें को सामान्य बनाने, सोवियत संघ को लोकतांत्रिाक रूप देने और वहाँ सुधर करने का पैफसला किया। इस़प़ैफसले की वुफछ ऐसी भी परिणतियाँ रहीं जिनका किसी को कोइर् अंदाजा नहीं था। पूवीर् यूरोप के देश सोवियत खेमे के हिस्से थे। इन देशों की जनता ने अपनी सरकारों और सोवियत नियंत्राण का विरोध् करना शुरू कर दिया। गोबार्चेव के शासक रहते सोवियत संघ ने ऐसी गड़बडि़यों में उस तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जैसा अतीत में होता था। पूवीर् यूरोप की साम्यवादी सरकारें एक के बाद एक गिर गईं। सोवियत संघ के बाहर हो रहे इन परिवतर्नों के साथ - साथ अंदर भी संकट गहराता जा रहा था और इससे सोवियत संघ के विघटन की गति और तेज हुइर्। गोबार्चेव ने देश के अंदर आथ्िार्क - राजनीतिक सुधरों और लोकतंत्राीकरण की नीति चलायी। इन सुधर नीतियों का कम्युनिस्ट पाटीर् के नेताओं द्वारा विरोध् किया गया। 1991 में एक तख़्तापलट भी हुआ। कम्युनिस्ट पाटीर् से जुड़े गरमपंथ्िायों ने इसे बढ़ावा दिया था। तब तक जनता को स्वतंत्राता का स्वाद मिल चुका था और वे कम्युनिस्ट पाटीर् के पुरानी रंगत वाले शासन में नहीं जाना चाहते थे। येल्तसिन ने इस तख़्तापलट केविरोध् में महत्त्चपूणर् भूमिका निभाइर् और वे नायक की तरह उभरे। रूसी गणराज्य ने, जहाँ बोरिस येल्तसिन ने आम चुनाव जीता था,केंद्रीकृत नियंत्राण को मानने से इंकार करदिया। सत्ता मास्को से गणराज्यों की तरपफ ख्िासकने लगी। ऐसा ख़ासकर सोवियत संघके उन भागों में हुआ जो ज्यादा यूरोपीकृत थे और अपने को संप्रभु राज्य मानते थे। आश्चयर्जनक तौर पर मध्य - एश्िायाइर् गणराज्यों ने अपने लिए स्वतंत्राता की माँग नहीं की। वे ‘सोवियत संघ’ के साथ ही रहना चाहते थे। सन् 1991 के दिसम्बर में येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ के तीन बडेे़ गणराज्य रूस, यूक्रेन और बेलारूस ने सोवियत संघ की समाप्ित की घोषणा की। कम्युनिस्ट पाटीर् प्रतिबंध्ित हो गइर् और परवतीर् सोवियत गणराज्यों मैं हैरान हूँ! आख्िार दुनियाभर के इतने सारे संजीदा लोगों ने ऐसीे व्यवस्था को क्यों सराहा? ने पूँजीवाद तथा लोकतंत्रा को अपना आधर बनाया। साम्यवादी सोवियत गणराज्य के विघटन की घोषणा और स्वतंत्रा राज्यों के राष्ट्रवुफल ;काॅमनवेल्थ आॅव इंडिपेंडेंट स्टेट्सद्ध का गठन बाकी गणराज्यों, खासकर मध्य एश्िायाइर् गणराज्यों के लिए बहुत आश्चयर्चकित करने वाला था। ये गणराज्य अभी ‘स्वतंत्रा राज्यों के राष्ट्रवुफल’ से बाहर थे। इस मुद्दे को तुरंत हल कर लिया गया। इन्हें ‘राष्ट्रवुफल’ का संस्थापक सदस्य बनाया गया। रूस को सोवियत संघ का उत्तराध्िकारी राज्य स्वीकार किया गया। रूस को सुरक्षा परिषद् में सोवियत संघ की सीट मिली। सोवियत संघ ने जो अंतरार्ष्ट्रीय करार और संध्ियाँ की थीं उन सब को निभाने का जिम्मा अब रूस का था। सोवियत संघ के विघटन के बाद के समय में पूवर्वतीर् गणराज्यों के बीच एकमात्रा परमाणु शक्ित संपन्न देश का दशार् रूस को मिला। उसने अमरीका के साथ परमाणु निरस्त्राीकरण की दिशा में वुफछ कदम भी उठाए। सोवियत संघ अब नहीं रहाऋ वह दप़्ाफन हो चुका था। सोवियत संघ का विघटन क्यांे हुआ? विश्व की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ित अचानक वै़र्फ सोवियत फसे बिखर गइर्? सिपसंघ और साम्यवाद के अंत को समझने के लिए ही यह सवाल पूछना शरूरी नहीं। यह सवाल किसी भी राजनीतिक व्यवस्था के पतन को समझने के लिए शरूरी है क्योंकि सोवियत संघ के रूप में न तो कोइर् राज - व्यवस्था पहली बार टूटी है और न ही आख्िारी बार। सोवियत संघ के विघटन के वुफछ विशेष कारण शरूर हो सकते हैं लेकिन इस मामले से हम एक सवर् - सामान्य सबक सीख सकते हैं। इसमें कोइर् संदेह नहीं है कि सोवियत संघ की राजनीतिक - आथ्िार्क संस्थाएँ अंदरुनी कमजोरी के कारण लोगों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकीं। यही सोवियत संघ के पतन का कारण रहा। कइर् सालों तक अथर्व्यवस्था गतिरु( रही। इससे उपभोक्ता - वस्तुओं की बड़ी कमी हो गइर् और सोवियत संघ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी राजव्यवस्था को शक की नशर से देखने लगाऋ उस पर खुलेआम सवाल खड़े करने शुरू किए। यह व्यवस्था इतनी कमशोर वैफसे हुइर् और अथर्व्यवस्था में गतिरोध् क्यों आया?इसका उत्तर कापफी हद तक सापफ है। इस सिलसिले में एक बात एकदम स्पष्ट है कि सोवियत संघ ने अपने संसाध्नों का अध्िकांश परमाणु हथ्िायार और सैन्य साजो - सामान पर लगाया। उसने अपने संसाध्न पूवीर् यूरोप के अपने पिछलग्गू देशों के विकास पर भी खचर् किए ताकि वे सोवियत नियंत्राण में बने रहें। इससे सोवियत संघ पर गहरा आथ्िार्क दबाब बना और सोवियत व्यवस्था इसका सामना नहीं कर सकी। इसी के साथ एक और बात हुइर्। पश्िचमी मुल्कों की तरक्की के बारे में सोवियत संघ के आम नागरिकों की जानकारी बढ़ी। वे अपनी राजव्यवस्था और पश्िचमी देशों की राजव्यवस्था के बीच मौजूद अंंतर भांप सकते थे। सालों से इन लोगों को बताया जा रहा था कि सोवियत राजव्यवस्था पश्िचम के पूँजीवाद से बेहतर है लेकिन सच्चाइर् यह थी कि सोवियत संघ पिछड़ चुका था और अपने पिछड़ेपन की पहचान से लोगों को राजनीतिक - मनोवैज्ञानिक रूप से ध्क्का लगा। सोवियत संघ प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से गतिरु( हो चुका था। सोवियत संघ पर कम्युनिस्ट पाटीर् ने 70 सालों तक शासन किया और यह पाटीर् अब जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रह गइर् थी। गतिरु( प्रशासन, भारी भ्रष्टाचार और अपनी ग़्ालतियों को सुधरने में व्यवस्था की अक्षमता, शासन में ज्यादा खुलापन लाने के प्रति अनिच्छा और देश की विशालताके बावजूद सत्ता का केंद्रीकृत होना - इन सारी बातों के कारण आम जनता अलग - थलग पड़ गइर्। इससे भी बुरी बात यह थी कि ‘पाटीर्’ के अध्िकारियों को आम नागरिक से ज्यादा विशेषाध्िकार मिले हुए थे। लोग अपने को राजव्यवस्था और शासकों से जोड़कर नहीं देख पा रहे थे और सरकार का जनाधर ख्िासकता चला गया। मिख़ाइल गोबार्चेव के सुधरों में इन दोनों समस्याओं के समाधन का वायदा था। गोबार्चेव ने अथर्व्यवस्था को सुधरने, पश्िचम की बराबरी पर लाने और प्रशासनिक ढाँचे में ढील देने का वायदा किया। गोबार्चेव तो रोग का ठीक - ठीक निदान कर रहे थे और सुधरों को लागू करने का उनका प्रयास भी ठीक था - ऐसे में आपको आश्चयर् हो सकता है कि पिफर सोवियत संघ टूटा क्यों? इस बिंदु पर आकर उत्तर ज्यादा विवादित हो जाते हैं। इस स्िथति को हमें आगे के इतिहासकार शायद ज्यादा बेहतर ढंग से समझा पाएं।सबसे सटीक उत्तर तो यह जान पड़ता है कि जब गोबार्चेव ने सुधरों को लागू किया और व्यवस्था में ढील दी तो लोगों की आकांक्षाओं - अपेक्षाओं का ऐसा ज्वार उमड़ा जिसका अनुमान शायद ही कोइर् लगा सकता था। इस पर काबू पाना एक अथर् में असंभव हो गया। सोवियत संघ में जनता के एक तबके की सोच यह थी कि गोबार्चेव को ज्यादा तेज गति से कदम उठाने चाहिए। ये लोग उनकी कायर्प(ति से ध्ीरज खो बैठे और निराश हो गए। इन लोगों ने जैसा सोचा था वैसा पफायदा उन्हें नहीं हुआ या संभव है उन्हें बहुत ध्ीमी गति से पफायदा हो रहा हो। जनता के एक हिस्से ख़ासकर, कम्युनिस्ट पाटीर् के सदस्य और वे लोग जो सोवियत व्यवस्था से पफायदे में थे, के विचार ठीक इसके विपरीत थे।इनका कहना था कि हमारी सत्ता और विशेषाध्िकार अब कम हो रहे हैं और गोबार्चेव बहुत जल्दबाजी दिखा रहे हैं। इस खींचतान में गोबार्चेव का समथर्न हर तरपफ से जाता रहा और जनमत आपस में बँट गया। जो लोग उनके साथ थे उनका भी मोहभंग हुआ। ऐसे लोगों ने सोचा कि गोबार्चेव खुद अपनी ही नीतियों का ठीक तरह से बचाव नहीं कर पा रहे हैं। इन सारी बातों के बावजूद संभवतः सोवियत संघ का विघटन न होता। लेकिन, एक घटना ने अध्िकांश पयर्वेक्षकों को चैंकाया और सोवियत व्यवस्था के अंदर के लोग भी इससे दंग रह गए। यह घटना थी राष्ट्रवादी भावनाओं और संप्रभुता की इच्छा के उभार की। रूस और बाल्िटक गणराज्य ;एस्टोनिया, लताविया और लिथुआनियाद्ध, उक्रेन तथा जाजिर्या जैसे सोवियत संघ के विभ्िान्न गणराज्य इस उभार में शामिल थे। राष्ट्रीयता और संप्रभुता के भावों का उभार सोवियत संघ के विघटन का अंतिम और सवार्ध्िक तात्कालिक कारण सि( हुआ। इस मसले पर भी अलग - अलग राय मिलती है। एक विचार तो यह है कि राष्ट्रीयता की भावना और तड़प सोवियत संघ के समूचे इतिहास में कहीं - न - कहीं जारी थी और चाहे सुधर होते या न होते, सोवियत संघ में अंदरूनी संघषर् होना ही था। खैर! यह तो इतिहास की अनिवायर्ता के बारे में अनुमान लगाना हुआ लेकिन सोवियत संघ के आकार, विविध्ता तथा इसकी बढ़ती हुइर् आंतरिक समस्याओं को देखते हुए ऐसा सोचना असंगत भी नहीं है। वुफछ अन्य लोग सोचते हैं कि गोबार्चेव के सुधरों ने राष्ट्रवादियों के असंतोष को इस सीमा तक भड़काया कि उस पर शासकों का नियंत्राण नहीं रहा। विडंबना यह है कि शीतयु( के दौरान बहुत - से लोग सोचते थे कि सोवियत संघ के मध्य - एश्िायाइर् गणराज्यों में राष्ट्रवादी आकांक्षाओं का उभार सबसे दमदार होगा क्योंकि ये गणराज्य रूस से धमिर्क और नस्ली लिहाज से अलग और आथ्िार्क रूप से पिछड़े हुए थे। लेकिन हुआ यह कि सोवियत संघ के प्रति राष्ट्रवादी असंतोषयूरोपीय और अपेक्षाकृत समृ( गणराज्यों - रूस, उवे्रफन, जाजिर्या और बाल्िटक क्षेत्रा में सबसे प्रबल नशर आया। यहाँ के आम लोग अपने को मध्य एश्िायाइर् गणराज्यों के लोगों से अलग - थलग महसूस कर रहे थे। इनका आपस में भी अलगाव था। इन गणराज्यों के लोगों में यह भाव घर कर गया कि ज्यादा पिछड़े इलाकों को सोवियत संघ में शामिल रखने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। विघटन की परिणतियाँ सोवियत संघ की ‘दूसरी दुनिया’ और पूवीर् यूरोप की समाजवादी व्यवस्था के पतन के परिणाम विश्व राजनीति के लिहाज से गंभीर रहे। इससे मोटे तौर पर तीन प्रकार के दूरगामी परिवतर्न हुए। हर परिवतर्न के बहुत सारे प्रभाव हुए। उन सभी प्रभावों को यहाँ सूचीब( करना उचित नहीं होगा। अव्वल तो ‘दूसरी दुनिया’ के पतन का एक परिणाम शीतयु( के दौर के संघषर् की समाप्ित में हुआ। समाजवादी प्रणाली पूँजीवादी प्रणाली को पछाड़ पाएगी या नहीं - यह विचारधरात्मक विवाद अब कोइर् मुद्दा नहीं रहा। शीतयु( के इस विवाद ने दोनों गुटोेें की सेनाओं को उलझाया था, हथ्िायारों की तेज होड़ शुरू की थी, परमाणु हथ्िायारों के संचय को बढ़ावा दिया था तथा विश्व को सैन्य गुटों में बाँटा था। शीतयु( के समाप्त होने से हथ्िायारों की होड़ भी समाप्त हो गइर् और एक नइर् शांति की संभावना का जन्म हुआ। दूसरा यह कि विश्व राजनीति में शक्ित - संबंध् बदल गए और इस कारण विचारों और संस्थाओं के आपेक्ष्िाक प्रभाव में भी बदलाव आया। शीतयु( के अंत के समय केवल दो संभावनाएँ थीं - या तो बची हुइर् महाशक्ित का दबदबा रहेगा और एकध््रुवीय विश्व बनेगा या पिफर कइर् देश अथवा देशों के अलग - अलग समूह अंतरार्ष्ट्रीय व्यवस्था मेंमहत्त्वपूणर् मोहरे बनकर उभरेंगे और इस तरह बहुध््रुवीय विश्व बनेगा जहाँ किसी एक देश का बोलबाला नहीं होगा। हुआ यह कि अमरीका अकेली महाशक्ित बन बैठा। अमरीका की ताकत और प्रतिष्ठा की शह पाने से अब पूँजीवादी अथर्व्यवस्था अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर प्रभुत्वशाली अथर्व्यवस्था है। विश्व बैंक और अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाएँ विभ्िान्न कष्टप्रद संक्रमण से होकर गुजरे। रूस, मध्य एश्िाया के गणराज्य और पूवीर् यूरोप के देशों में पूँजीवाद की ओर संक्रमण का एक खास माॅडल अपनाया गया। विश्व बैंक और अंतरार्ष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा निदेर्श्िात इस माॅडल को ‘शाॅक थेरेपी’ ;आघात पहुँचाकर उपचार करनाद्ध कहा गया। भूतपूवर् ‘दूसरी दुनिया’ के देशों में शाॅक थेरेपी की गति और गहनता अलग - अलग रही लेकिन इसकी दिशा और चरित्रा बड़ी सीमा तक एक जैसे थे। हर देश को पूँजीवादी अथर्व्यवस्था की ओर पूरी तरह मुड़ना था। इसका मतलब था सोवियत संघ के दौर की हर संरचना से पूरी तरह निजात पाना। ‘शाॅक थेरेपी’ की सवार्ेपरि मान्यता थी कि मिल्िकयत का सबसे प्रभावी रूप निजी स्वामित्व होगा। इसके अंतगर्त राज्य की संपदा के निजीकरण और व्यावसायिक स्वामित्व के ढाँचे को तुरंत अपनाने की बात शामिल थी। सामूहिक ‘पफामर्’ को निजी ‘पफामर्’ में बदला गया और पूँजीवादी प(ति से खेती शुरू हुइर्। इस संक्रमण में राज्य नियंत्रिात समाजवाद या पूँजीवाद के अतिरिक्त किसी भी वैकल्िपक व्यवस्था या ‘तीसरे रुख़’ को मंजूर नहीं किया गया। ‘शाॅक थेरेपी’ से इन अथर्व्यवस्थाओं के बाहरी व्यवस्थाओं के प्रति रुझान बुनियादी तौर पर बदल गए। अब माना जाने लगा कि ज्यादा से ज्यादा व्यापार करके ही विकास किया जा सकता है। इस कारण ‘मुक्त व्यापार’ को पूणर् रूप से अपनाना शरूरी माना गया। पूँजीवादी व्यवस्था को अपनानेके लिए वित्तीय खुलापन, मुद्राओं की आपसी परिवतर्नीयता और मुक्त व्यापार की नीतिमहत्त्वपूणर् मानी गइर्। अंततः इस संक्रमण में सोवियत खेमे के देशों वेेफ बीच मौजूद व्यापारिक गठबंध्नां को समाप्त कर दिया गया। खेमे के प्रत्येक देश को एक - दूसरे से जोड़ने की जगह सीध्े पश्िचमी मुल्कों से जोड़ा गया। इस तरह ध्ीरे - ध्ीरे इन देशों को पश्िचमी अथर्तंत्रा में समाहित किया गया। पश्िचमी दुनिया के पूँजीवादी देश अब नेता की भूमिका निभाते हुए अपनी विभ्िान्न एजेंसियों और संगठनों के सहारे इस खेमे के देशों के विकास का मागर्दशर्न और नियंत्राण करेंगे। ‘शाॅक थेरेपी’ के परिणाम 1990 में अपनायी गइर् ‘शाॅक थेरेपी’ जनता को उपभोग के उस ‘आनंदलोक’ तक नहीं ले गइर् जिसका उसने वादा किया था। अमूमन ‘शाॅक थेरेपी’ से पूरे क्षेत्रा की अथर्व्यवस्था तहस - नहस हो गइर् और इस क्षेत्रा की जनता को बबार्दी की मार झेलनी पड़ी। रूस में, पूरा का पूरा राज्य - नियंत्रिात औद्योगिक ढाँचा चरमरा उठा। लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों या कंपनियों को बेचा गया। आथ्िार्क ढाँचे का यह पुननिर्मार्ण चूँकि सरकार द्वारा निदेर्श्िात औद्योगिक नीति के बशाय बाशार की ताकतें कर रही थीं, इसलिए यह कदम सभी उद्योगों को मटियामेट करने वाला साबित हुआ। इसे ‘इतिहास की सबसे बड़ी गराज - सेल’के नाम से जाना जाता है क्योंकि महत्त्वपूणर् उद्योगों की कीमत कम से कम करके आंकी गइर् और उन्हें औने - पौने दामों में बेच दिया गया। हालाँकि इस महा - बिक्री में भाग लेने के लिए सभी नागरिकों को अध्िकार - पत्रा दिए गए थे, लेकिन अध्िकांश नागरिकों ने अपने अध्िकार - पत्रा कालाबाजारियों के हाथों बेच दिये क्योंकि उन्हें ध्न की शरूरत थी। रूसी मुद्रा रूबल के मूल्य में नाटकीय ढंग से गिरावट आइर्। मुद्रास्पफीति इतनी ज्यादा बढ़ी कि लोगों की जमापूँजी जाती रही। मुझे ‘आघात’ तो दीख रहा है लेकिन ‘उपचार’ कहाँ है? हम इतने बड़े - बड़े जुमलों में क्यों बोलते हैं? रूस में वुफल डेढ़ हशार बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान थे जिनमें से लगभग आध्े ‘शाॅक थेरेपी’ के परिणामस्वरूप दिवालिया हो गए। यह चित्रा ऐसे ही एक बैंक इंकाॅम का है। रूस के इस दूसरे सबसे बड़े बैंक इंकाॅम के दिवालिया होने से ग्राहकों के अलावा दस हशार कंपनियों और भी डूब गइर्। आख्िार राष्ट्रवाद औरअलगाववाद में अंतर क्याहै? अगर आप कामयाब होजाते हैं तो राष्ट्रीय नायककहलाते हैं और अगरनाकामयाब रह जाते हैं तोअलगाववाद पैफलाने केअपराध्ी ठहराए जाते हैं। सामूहिक खेती की प्रणाली समाप्त हो चुकी थी और लोगों को अब खाद्यान्न की सुरक्षा मौजूद नहीं रही। रूस ने खाद्यान्न का आयात करना शुरू किया। सन् 1999 में वास्तविक ‘सकल घरेलू उत्पाद’ 1989 की तुलना में कहीं नीचे था। पुराना व्यापारिक ढाँचा तो टूट चुका था लेकिन इसकी जगह कोइर् वैकल्िपक व्यवस्था नहीं हो पायी थी। समाज कल्याण की पुरानी व्यवस्था को क्रम से नष्ट किया गया। सरकारी रियायतों के खात्मे के कारण ज्यादातर लोग ग़्ारीबी में पड़ गए। मध्य वगर् समाज के हाश्िाए पर आ गया और अकादमिक - बौिक कामों से जुड़े लोग या तो बिखर गए या बाहर चले गए। कइर् देशों में एक ‘मापिफया वगर्’ के तौर पर तुवर्फमेनिस्तान और उश्बेकिस्तान के राष्ट्रपतियों ने पहले 10 वषो± के लिए अपने को इस पद पर बहाल किया और इसके बाद समय - सीमा को अगले 10 सालों के लिए बढ़ा दिया। इन राष्ट्रपतियों ने अपने पैफसलों से असहमति या विरोध् की अनुमति नहीं दी।अध्िकतर देशों में न्यायिक संस्कृति और न्यायपालिका की स्वतंत्राता को स्थापित करने का काम करना अभी भी बाकी है। रूस सहित अध्िकांश देशों कीे अथर्व्यवस्था ने सन् 2000 में यानी अपनी आशादी के 10 साल बाद खड़ा होना शुरू किया। इन अध्िकांश देशों की अथर्व्यवस्था के पुनजीर्वन का कारणथा खनिज - तेल, प्राकृतिक गैस और धतुजैसे प्राकृतिक संसाध्नों का नियार्त। रूस, ;जरायमपेशा लोगद्ध उभरा और उसने अिाकतर कशाकिस्तान, तुवर्फमेनिस्तान, उश्बेकिस्तान औरशेयरधरकों की जमापजी ूँआथ्िार्क गतिविध्ियों को अपने नियंत्राण में ले लिया। निजीकरण ने नइर् विषमताओं को जन्म दिया। पूवर् सोवियत संघ में शामिल रहे गणराज्यों और खासकर रूस में अमीर और गरीब लोगों के बीच तीखा विभाजन हो गया। पहले की व्यवस्था के विपरीत, अब ध्नी और निध्र्न लोगों के बीच बहुत गहरी आथ्िार्क असमानता थी। आथ्िार्क बदलाव को बड़ी प्राथमिकता दी गइर् और उस पर पयार्प्त ध्यान भी दिया गया लेकिन लोकतांत्रिाक संस्थाओं के निमार्ण का कायर् ऐसी प्राथमिकता के साथ नहीं हो सका। इन सभी देशों के संविधन हड़बड़ी में तैयार किए गए। रूस सहित अध्िकांश देशों में राष्ट्रपति को कायर्पालिका प्रमुख बनाया गया और उसके हाथ में लगभग हरसंभव शक्ितथमा दी गइर्। पफलस्वरूप संसद अपेक्षाकृत कमजोर संस्था रह गइर्। मध्य एश्िाया के देशों में राष्ट्रपति को बहुत अध्िक शक्ितयाँ प्राप्त थींऔर इनमें से वुफछ सत्तावादी हो गए। मिसाल अशरबैजान तेल और गैस के बड़े उत्पादक देश हैं। बाकी देशों को अपने क्षेत्रा से तेल की पाइर्प - लाइन गुजरने के कारण पफायदा हुआ। इस एवज में इन्हें किराया मिलता है। एक हद तक विनिमार्ण का काम भी पिफर शुरू हुआ। संघषर् और तनाव पूवर् सोवियत संघ के अध्िकांश गणराज्य संघषर् की आशंका वाले क्षेत्रा हैं। अनेक गणराज्यों ने गृहयु( और बग़्ाावत को झेला है। इसके साथ - साथ इन देशों में बाहरी ताकतों की दखल भी बढ़ी है। इससे स्िथति और भी जटिल हुइर् है। रूस के दो गणराज्यों चेचन्या और दाग्ि़ास्तान में हिंसक अलगाववादी आंदोलन चले। मास्को ने चेचन विद्रोहियों से निपटने के जो तरीके अपनाये और जिस गैर - जिम्मेदार तरीके से़सैन्य बमबारी की उसमें मानवाध्िकार का व्यापक उल्लंघन हुआ लेकिन इससे आशादी की आवाज दबायी नहीं जा सकी। मध्य एश्िाया में, तिाकिस्तान दस वषो± यानी 2001 तक गृहयु( की चपेट में रहा। इस पूरे क्षेत्रा में कइर् सांप्रदायिक संघषर् चल रहे हैं। अशरबैशान का एक प्रांत नगरनों कराबाख है। यहाँ के वुफछ स्थानीय अमेर्नियाइर् अलग होकर अमेर्निया से मिलना चाहते हैं। जाजिर्या में दो प्रांत स्वतंत्राता चाहते हैं और गृहयु( लड़ रहे हैं। यूक्रेन, किरगिझस्तान तथा जाजिर्या में मौजूदा शासन को उखाड़ पेफकने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। कइर् देश और प्रांत नदी - जल के सवाल पर आपस में भ्िाड़े हुए हैं। इन सारी बातों की वशह से अस्िथरता का माहौल है और आम नागरिक का जीवन दूभर है। मध्य एश्िायाइर् गणराज्यों में हाइड्रोकाबर्निक ;पेट्रोलियमद्ध संसाध्नों का विशाल भंडार है। इससे इन गणराज्यों को आथ्िार्क लाभ हुआ है लेकिन इसी कारण से यह क्षेत्रा बाहरी ताकतों और तेल कंपनियों की आपसी प्रतिस्पधर् का अखाड़ा भी बन चला है। यह क्षेत्रा रूस, चीन और अपफगानिस्तान से सटा ़है तथा पश्िचम एश्िाया से नजदीक है। 11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अमरीका इस क्षेत्रा में सैनिक ठिकाना बनाना चाहता था। उसने किराए पर ठिकाने हासिल करने के लिए मध्य एश्िाया के सभी राज्यों को भुगतान किया और अप़्ाफगानिस्तान तथा इराक में यु( के दौरान इन क्षेत्रों से अपने विमानों को उड़ाने की अनुमति ली। रूस इन राज्यों को अपना निकटवतीर् ‘विदेश’ मानता है और उसका मानना है कि इन राज्यों को रूस के प्रभाव में रहना चाहिए। खनिज - तेैसेलजसंसाध्न की मौजूदगी के कारण चीन के हित भी इस क्षेत्रा से जुड़े हैं और चीनियों ने सीमावतीर् क्षेत्रों में आकर व्यापार करना शुरू कर दिया है। पूवीर् यूरोप में चेकोस्लोवाकिया शांतिपूवर्क दो भागों में बँट गया। चेक तथा स्लोवाकिया नाम के दो देश बने। लेकिन सबसे गहन संघषर् बाल्कन क्षेत्रा के गणराज्य युगोस्लाविया में हुआ। सन् 1991 में बाद युगोस्लाविया कइर् प्रांतों में टूट गया और इसमें शामिल बोस्िनया - हजेर्गोविना, स्लोवेनिया तथा क्रोएश्िाया ने अपने को स्वतंत्रा घोष्िात कर दिया। यहाँ ‘नाटो’ को हस्तक्षेप करना पड़ाऋ युगोस्लाविया पर बमबारी हुइर् और जातीय संघषर् ने गृहयु( का रूप लिया। पूवर् - साम्यवादी देश और भारत भारत ने साम्यवादी रह चुके सभी देशों के साथ अच्छे संबंध् कायम किए हैं लेकिन भारत के संबंध् रूस के साथ सबसे ज्यादा गहरे हैं। भारत कीविदेश नीति का एक महत्त्वपूणर् पहलू भारत का रूस के साथ संबंध् है। भारत - रूस संबंधें का इतिहास आपसी विश्वास और साझे हितों का इतिहास है। भारत - रूस के आपसी संबंध् इन देशों की जनता की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं। भारतीय हिन्दी पिफल्मों के नायकों में राजकपूर से लेकर अमिताभ बच्चन तक रूस और पूवर् सोवियत संघ के बाकी गणराज्यों में घर - घर जाने जाते हैं। आप इस क्षेत्रा में हिंदी पिफल्मी गीत बजते सुन सकते हैं और भारत यहाँ के जनमानस का एक अंग है। चरण ऽ सोवियत और अमरीकी दोनों खेमों के शीतयु( के दौर के पाँच - पाँच देशों को चुनें। ऽ इसी के अनुरूप कक्षा मंे समूह बनायें। हर समूह को एक देश का जिम्मा सौंपें। प्रत्येक समूह अपने - अपने हिस्से के देश के बारे में यह जानकारी जुटाए कि शीतयु( के दौर में वहाँ के राजनीतिक, सामाजिक और आथ्िार्क हालात कैसे थे? ऽ हर समूह यह जानकारी भी जुटाए की साम्यवाद के पतन के बाद उस देश की राजनीतिक, सामाजिक और आथ्िार्क स्िथति क्या हुइर्। संभव हो तो हर समूह यह भी बताए कि दूसरी दुनिया के विघटन का प्रभाव उस देश पर क्या हुआ? ऽ हर समूह अपने निष्कषर् कक्षा के सामने रखे। इन देशों के लोग बतौर नागरिक अपने बारे में क्या महसूस कर रहे थे - इस विषय पर छात्रों की बातचीत को सुनिश्िचत करें। अध्यापकों के लिए ऽ आप छात्रों के निष्कषर् को लोकतांत्रिाक और साम्यवादी व्यवस्था के सि(ांत और व्यवहार से जोड़ सकते हैं और प्रत्येक के गुण - दोष को रेखांकित कर सकते हैं। ऽ क्या साम्यवाद और पूँजीवाद का कोइर् विकल्प हो सकता है - छात्रों को इस विषय पर चचार् करने के लिए बढ़ावा दें। रूस और भारत दोनों का सपना बहध््रुवीय विश्व का है। बहुध््रुवीय विश्व से इन दोनों देशों का आशय यह है कि अंतरार्ष्ट्रीय पफलक पर कइर् शक्ितयाँ मौजूद होंऋ सुरक्षा की सामूहिक जिम्मेदारी हो ;यानी किसी भी देश पर हमला हो तो सभी देश उसे अपने लिए खतरा मानें और साथ मिलकर कारर्वाइर् करेंद्धऋ क्षेत्राीयताओं को ज्यादा जगह मिलेऋ अंतरार्ष्ट्रीय संघषो± का समाधन बातचीत के द्वारा होऋ हर देश की स्वतंत्रा विदेश नीति हो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा पैफसले किए जाएँ तथा इन संस्थाओं को मजबूत, लोकतांत्रिाक और शक्ितसंपन्न बनाया जाय। 2001 के भारत - रूस सामरिक समझौते के अंग के रूप में भारत और रूस के बीच 80 द्विपक्षीय दस्तावेशों पर हस्ताक्षर हुए हैं। भारत को रूस के साथ अपने संबधें केकारण कश्मीर, ऊजार् - आपूतिर्, अंतरार्ष्ट्रीय आतंकवाद से संबंध्ित सूचनाओं के आदान - प्रदान, पश्िचम एश्िाया में पहुँच बनाने तथा चीन के साथ अपने संबंधें में संतुलन लाने जैसे मसलों में पफायदे हुए हैं। रूस को इस संबंध् से सबसे बड़ा पफायदा यह है कि भारत रूस के लिए हथ्िायारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीददार देश है। भारतीय सेना को अध्िकांश सैनिक साजो - सामान रूस से प्राप्त होते हैं। चूँकि भारत तेल के आयातक देशों में से एक है इसलिए भी भारतरूस के लिए महत्त्वपूणर् है। उसने तेल के संकट की घड़ी में हमेशा भारत की मदद कीहै। भारत रूस से अपने ऊजार् - आयात को भी बढ़ाने की कोश्िाश कर रहा है। ऐसी कोश्िाश कशाकिस्तान और तुवर्फमेनिस्तान के साथ भी चल रही है। इन गणराज्यों के साथ सहयोग के अंतगर्त तेल वाले इलाकों में साझेदारी और निवेश करना भी शामिल है। रूस भारत कीपरमाण्िवक योजना के लिए भी महत्त्वपूणर् है। रूस ने भारत के अंतरिक्ष उद्योग में भी शरूरत के वक्त क्रायोजेनिक राॅकेट देकर मदद की है। भारत और रूस विभ्िान्न वैज्ञानिक परियोजनाओं में साझीदार हैं। प्रश्नावली;गद्ध विश्व - व्यवस्था के शक्ित - संतुलन में बदलाव ;घद्ध मध्यपूवर् में संकट 4.निम्नलिख्िात में मेल बैठाएं μ ;1द्ध मिख़ाइल गोबार्चेव ;कद्ध सोवियत संघ का उत्तराध्िकारी ;2द्धशाॅक थेरेपी ;खद्ध सैन्य समझौता ;3द्ध रूस ;गद्ध सुधरों की शुरुआत ;4द्धबोरिस येल्तसिन ;घद्ध आथ्िार्क माॅडल ;5द्ध वारसाॅ ;घद्ध रूस के राष्ट्रपति 5.रिक्त स्थानों की पूतिर् करें। ;कद्ध सोवियत राजनीतिक प्रणाली ......................की विचारधरा पर आधरित थी। ;खद्ध सोवियत संघ द्वारा बनाया गया सैन्य गठबंध्न था। ;गद्ध पाटीर् का सोवियत राजनीतिक व्यवस्था पर दबदबा था। ;घद्ध ने 1985 में सोवियत संघ में सुधरों की शुरुआत की।;घद्ध का गिरना शीतयु( के अंत का प्रतीक था। 6.सोवियत अथर्व्यवस्था को किसी पूँजीवादी देश जैसे संयुक्त राज्य अमरीका की अथर्व्यवस्था से अलग करने वाली किन्हीं तीन विशेषताओं का जिक्र करें। 7.किन बातों के कारण गोबार्चेव सोवियत संघ में सुधर के लिए बाध्य हुए? 8.भारत जैसे देशों के लिए सोवियत संघ के विघटन के क्या परिणाम हुए? 9.शाॅक थेरेपी क्या थी? क्या साम्यवाद से पूँजीवाद की तरपफ संक्रमण का यह सबसे बेहतर तरीका था? 10.निम्नलिख्िात कथन के पक्ष या विपक्ष में एक लेख लिखें μ ‘‘दूसरी दुनिया के विघटन के बाद भारत को अपनी विदेश - नीति बदलनी चाहिए और रूस जैसे परंपरागत मित्रा की जगह संयुक्त राज्य अमरीका से दोस्ती करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।’’

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