क्यूबा का मिसाइल संकट 1961 की अप्रैल में सोवियत संघ के नेताओं को यह चिंता सता रही थी कि अमरीका साम्यवादियों द्वारा शासित क्यूबा पर आक्रमण कर देगा और इस देश के राष्ट्रपति पिफदेल कास्त्रो का तख़्तापलट हो जाएगा। क्यूबा अमरीका के तट से लगा हुआ एक छोटा - सा द्वीपीय देश है। क्यूबा का जुड़ाव सोवियत संघ से था और सोवियत संघ उसे वूफटनयिक तथावित्तीय सहायता देता था। सोवियत संघ के नेता नीकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा को रूस के ‘सैनिक अड्डे’ के रूप में बदलने का पैफसला किया। 1962 में ख्रुश्चेव ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं। इन हथ्िायारों की तैनाती से पहली बार अमरीका नजदीकी निशाने की सीमा में आ गया। हथ्िायारों की इस तैनाती के बाद सोवियत संघ पहले की तुलना में अब अमरीका के मुख्य भू - भाग के लगभग दोगुने ठिकानों या शहरों पर हमला बोल सकता था। क्यूबा में सोवियत संघ द्वारा परमाणु हथ्िायार तैनात करने की भनक अमरीकियों को तीनहफ्रते बाद लगी। अमरीकी राष्ट्रपति जाॅन एपफ वैफनेडी और उनके सलाहकार ऐसा वुफछ भी करने से हिचकिचा रहे थे जिससे दोनों देशों के बीच परमाणु यु( शुरू हो जाए। लेकिन वे इस बात को लेकर दृढ़ थे कि ∫ुश्चेव क्यूबा से मिसाइलों और परमाणु हथ्िायारों को हटा लें। वैफनेडी ने आदेश दिया कि अमरीकी जंगी बेड़ों को आगे करके क्यूबा की तरपफ जाने वाले सोवियत शहाजों को रोका जाए। इस तरह अमरीका सोवियत संघ को मामले के प्रति अपनी गंभीरता की चेतावनी देना चाहता था। ऐसी स्िथति में यह लगा कि यु( होकर रहेगा। इसी को ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ के रूप मंे जाना गया। इस संघषर् की आशंका ने पूरी दुनिया को बेचैन कर दिया। यह टकराव कोइर् आम यु( नहीं होता। अंततः दोनों पक्षों ने यु( टालने का पैफसला किया और दुनिया ने चैन की साँस ली। सोवियत संघ के शहाजों ने या तो अपनी गति ध्ीमी कर ली या वापसी का रुख कर लिया। ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ शीतयु( का चरम बिंदु था। शीतयु( सोवियत संघ और अमरीका तथा इनके साथी देशों के बीच प्रतिद्वंद्विता, तनाव और संघषर् की एक शृंखला के रूप में जारी रहा। सौभाग्य से इन तनावों और संघषोर्ं ने यु( का रूप नहीं लिया यानी इन दो देशों के बीच कोइर् पूणर्व्यापी रक्तरंजित यु( नहीं छिड़ा। विभ्िान्न इलाकों में यु( हुएऋ दोनांे महाशक्ितयाँ और उनके साथी देश इन यु(ों में संलग्न रहेऋ वे क्षेत्रा - विशेष के अपने साथी देश के मददगार बने लेकिन दुनिया तीसरे विश्वयु( से बच गइर्। शीतयु( सिपफर् जोर - आजमाइश, सैनिक गठबंध्न अथवा शक्ित - संतुलन का मामला भर नहीं था बल्िक इसके साथ - साथ विचारधरा के स्तर पर भी एक वास्तविक संघषर् जारी था। विचारधरा की लड़ाइर् इस बात को लेकर थी कि पूरे विश्व में राजनीतिक, आथ्िार्क और सामाजिक जीवन को सूत्राब( करने का सबसे बेहतर सि(ांत कौन - सा है। पश्िचमी गठबंध्न का अगुआ अमरीका था और यह गुट उदारवादी लोकतंत्रा तथा पूँजीवाद का हामी था। पूवीर् गठबंध्न का अगुवा सोवियत संघ था और इस गुट की प्रतिब(ता समाजवाद तथा साम्यवाद के लिए थी। आप इन विचारधराओं के बारे में कक्षा ग्यारह में पढ़ चुके हैं। शीतयु( क्या है? दूसरे विश्वयु( का अंत समकालीनविश्व - राजनीति का एक महत्त्वपूणर् पड़ाव है। सन् 1945 में मित्रा - राष्ट्रों और ध्ुरी - राष्ट्रों के बीच दूसरे विश्व यु( ;1939 - 1945द्ध की समाप्ित हो गइर्। मित्रा - राष्ट्रों की अगुआइर् अमरीका, सोवियत संघ, बि्रटेन और प्रफांस कर रहे थे। ध्ुरी - राष्ट्रों की अगुआइर् जमर्नी, इटली और जापान के हाथ में थी। इस यु( में विश्व के लगभग सभी ताकतवर देश शामिल थे। यह यु( यूरोप से बाहर के इलाके में भी पैफला और इसका विस्तार दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया, चीन, बमार् ;अब म्यांमारद्ध तथा भारत केपूवोर्त्तर के वुफछ हिस्सों तक था। इस यु( में बड़े पैमाने पर जनहानि और ध्नहानि हुइर्। 1914 से 1918 के बीच हुए पहले विश्वयु( ने विश्व को दहला दिया था, लेकिन दूसरा विश्वयु( इससे भी ज्यादा भारी पड़ा। दूसरे विश्वयु( की समाप्ित से ही शीतयु( की शुरुआत हुइर्। अगस्त 1945 में अमरीका ने जापान के दो शहर हिरोश्िामा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराये और जापान को घुटने टेकने पड़े। इसके बाद दूसरे विश्वयु( का अंत हुआ। परमाणु बम गिराने के अमरीकी पैफसले के आलोचकों का तवर्फ है कि अमरीका इस बात को जानता था कि जापान आत्मसमपर्ण करने वाला है। ऐसे में बम गिराना गैर - शरूरी था। इन आलोचकों का मानना है कि अमरीका की इस कारर्वाइर् का लक्ष्य सोवियत संघ को एश्िाया तथा अन्य जगहों पर सैन्य और राजनीतिक लाभ उठाने से रोकना था। वह सोवियत संघ के सामने यह भी जाहिर करना चाहता था कि अमरीका ही सबसे बड़ी ताकत है। अमरीका के समथर्कों का तवर्फ था कि यु( को जल्दी से जल्दी समाप्त करने तथा अमरीका और साथी राष्ट्रों की आगे की जनहानि को रोकने के लिए परमाणु बम गिराना शरूरी था। विश्वयु( की समाप्ित के कारण वुफछ भी हों, लेकिन इसका परिणाम बहुत पास पिफर भी बहुत दूर। मैंने नक्शे में देखा और मुझे यवफीन नहीं हुआ कि महाशक्ित के इतने पास होने के बाद भी क्यूबा में सालों - साल से अमरीका विरोध्ी सरकार कायम है। यही हुआ कि वैश्िवक राजनीति के मंच पर दो महाशक्ितयों का उदय हो गया। जमर्नी और जापान हार चुके थे और यूरोप तथा शेष विश्व विध्वंस की मार झेल रहे थे। अब अमरीका और सोवियत संघ विश्व की सबसे बड़ी शक्ित थे। इनके पास इतनी क्षमता थी कि विश्व की किसी भी घटना को प्रभावित कर सवेंफ। अमरीका और सोवियत संघ का महाशक्ित बनने की होड़ में एक - दूसरे के मुकाबले खड़ा होना शीतयु( का कारण बना। शीतयु( शुरू होने के पीछे यह समझ भी काम कर रही थी कि परमाणु बम से होने वाले विध्वंस की मार झेलना किसी भी राष्ट्र के बूते की बात नहीं। यह एक सीध - सादा लेकिन असरदार तवर्फ था। जब दोनों महाशक्ितयों के पास इतनी क्षमता के परमाणु हथ्िायार हों कि वे एक - दूसरे को असहनीय क्षति पहुँचा सवेंफ तो ऐसे में दोनों के बीच रक्तरंजित यु( होने की संभावना कम रह जाती है। उकसावे के बावजूद कोइर् भी पक्ष यु( का जोख्िाम ये तस्वीरें उस विध्वंस को दिखाती हैं जो अमरीका द्वारा हिरोश्िामा और नागासाकी पर गिराये गये परमाणु बमों के कारण हुआ। इन बमों को ‘लिटिल ब्वाॅय’ और ‘पैफटमैन’ के गुप्तनाम दिए गए। महाशक्ितयों के पास आज परमाणु हथ्िायारों का जो शखीरा है उसकी तुलना में ये बम बहुत छोटे थे। ये बम क्रमशः 15 और 21 किलोटन क्षमता के थे। इतनी कम क्षमता के परमाणु बमों ने भी अकल्पनीय विध्वंस किया। 1950 के दशक की शुरुआत में ही संयुक्त राष्ट्र अमरीका और सोवियत संघ ऐसे परमाणु - बमों का परीक्षण कर रहे थे जिनकी क्षमता 10 से 15 हजार किलोटन थी। दूसरे शब्दों मेें ये बम हिरोश्िामा और नागासाकी पर गिराये गये परमाणु बमों की तुलना में हजारों गुना ज्यादा विध्वंसक थे। शीतयु( के दौरान दोनों ही महाशक्ितयों के पास इस तरह के हशारों हथ्िायार थे। जरा कल्पना कीजिए कि ये हथ्िायार दुनिया भर में क्या तबाही मचा सकते थे। मोल लेना नहीं चाहेगा क्योंकि यु( से राजनीतिक पफायदा चाहे किसी को भी हो, लेकिन इससे होने वाले विध्वंस को औचित्यपूणर् नहीं ठहराया जा सकता। परमाणु यु( की सूरत में दोनों पक्षों को इतना नुकसान उठाना पड़ेगा कि उनमें से विजेता कौन है - यह तय करना भी असंभव होगा। अगर कोइर् अपने शत्राु पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथ्िायारों को नाकाम करने की कोश्िाश करता है तब भी दूसरे के पास उसे बबार्द करने लायक हथ्िायार बच जाएंगे। इसे ‘अपरोध्’ ;रोक और संतुलनद्ध का तवर्फ कहा गया। दोनों ही पक्षोें के पास एक - दूसरे के मुकाबले और परस्पर नुकसान पहुँचाने की इतनी क्षमता होती है कि कोइर् भी पक्ष यु( का खतरा नहीं उठाना चाहता। इस तरह, महाशक्ितयों के बीच गहन प्रतिद्वन्िद्वता होने के बावजूद शीतयु( रक्तरंजित यु( का रूप नहीं ले सका। इसकी तासीर ठंडी रही। पारस्परिक ‘अपरोध्’ की स्िथति ने यु( तो नहीं होने दिया, लेकिन यह स्िथति पारस्परिक प्रतिद्वन्िद्वता को न रोक सकी। शीतयु( की प्रमुख सैन्य विशेषताओं पर ध्यान दें। इसमें दो महाशक्ितयाँ और उनके अपने - अपने गुट थे। इन परस्पर प्रतिद्वंद्वी गुटों में शामिल देशों से अपेक्षा थी कि वे तवर्फसंगत और जिम्मेदारी भरा व्यवहार करेंगे। इन देशों को एक विशेष अथर् में तवर्फसंगत और जिम्मेदारी भरा बरताव करना था। परस्पर विरोध्ी गुटों में शामिल देशों को समझना था कि आपसी यु( में जोख्िाम है क्योंकि संभव है कि इसकी वजह से दो महाशक्ितयों के बीच यु( ठन जाए। जब दो महाशक्ितयों और उनकी अगुआइर् वाले गुटों के बीच ‘पारस्परिक अपरोध्’ का संबंध् हो तो यु( लड़ना दोनों के लिए विध्वंसक साबित होगा। इस संदभर् में जिम्मेदारी का मतलब था संयम से काम लेना और तीसरे विश्वयु( के जोख्िाम से बचना। शीतयु( ने समूची मनुष्य जाति पर मंडराते खतरे को जैसे - तैसे संभाल लिया। दो - ध््रुवीय विश्व का आरंभ दोनों महाशक्ितयाँ विश्व के विभ्िान्न हिस्सों पर अपने प्रभाव का दायरा बढ़ाने के लिए तुली हुइर् थीं। दुनिया दो गुटों के बीच बहुत स्पष्ट रूप से बँट गइर् थी। ऐसे में किसी मुल्क के लिए एक रास्ता यह था कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी एक महाशक्ित के साथ जुड़ा रहे और दूसरी महाशक्ित तथा उसके गुट के देशों के प्रभाव से बच सके।परस्पर विरोध्ी गुटों के अपेक्षाकृत छोटे देशों ने महाशक्ितयों के साथ अपने - अपने शीतयु( के दौरान यूरोप दो प्रतिद्वंद्वी गठबंध्नों में बँट गया था। मानचित्रा में इस तथ्य को दिखाया गया है। जुड़ाव का इस्तेमाल निजी हित में किया। इन देशों को स्थानीय प्रतिद्वंद्वी देश के ख्िालापफ सुरक्षा का वायदा मिला, हथ्िायार और आथ्िार्क मदद मिली। इन देशों की अपने पड़ोसी देशों से होड़ थी। महाशक्ितयों के नेतृत्व में गठबंध्न की व्यवस्था से पूरी दुनिया के दो खेमों में बंट जाने का खतरा पैदा हो गया। यह विभाजन सबसे पहले यूरोप में हुआ। पश्िचमी यूरोप के अध्िकतर देशों ने अमरीका का पक्ष लिया जबकि पूवीर् यूरोप सोवियत खेमे में शामिल हो गया इसीलिए ये खेमे पश्िचमी और पूवीर् गठबंध्न भी कहलाते हैं। पश्िचमी गठबंध्न ने स्वयं को एक संगठनका रूप दिया। अप्रैल 1949 में उत्तर अटलांटिक संध्ि संगठन ;नाटोद्ध की स्थापना हुइर् जिसमें 12 देश शामिल थे। इस संगठन ने घोषणा की 1.प्रत्येक प्रतिस्पध्ीर् गुट से कम से कम तीन देशों की पहचान करें। 2.अध्याय चार में दिएगए यूरोपीय संघ केमानचित्रा को देखें और उन चार देशों कोपहचाने जो पहले ‘वारसा संध्ि’ केसदस्य थे और अबयूरोपीय संघ के सदस्य हैं।3.इस मानचित्रा की तुलना यूरोपीय संघ केमानचित्रा अथवा विश्वके मानचित्रा से करें। इस तुलना के बादक्या आप तीन ऐसे नये देशों की पहचानकर सकते हैं जोशीतयु( के बाद अस्ितत्व में आए? निम्नलिख्िात तालिका में तीन - तीन देशों के नाम उनके गुटों को ध्यान में रखकर लिखें μ पूंजीवादी गुट μμμμμμμμμμμμμ μμμμμμμμμμμμμ μμμμμμμμμμμμμ साम्यवादी गुट μμμμμμμμμμμμμ μμμμμμμμμμμμμ μμμμμμμμμμμμμ गुटनिरपेक्ष आंदोलन μμμμμμμμμμμμμ μμμμμμμμμμμμμ μμμμμμμμμμμμμ कि उत्तरी अमरीका अथवा यूरोप के इन देशों में से किसी एक पर भी हमला होता है तो उसे ‘संगठन’ में शामिल सभी देश अपनेऊपर हमला मानेंगे। ‘नाटो’ में शामिल हर देश एक - दूसरे की मदद करेगा। इसी प्रकार के पूवीर् गठबंध्न को ‘वारसा संध्ि’ के नाम से जाना जाता है। इसकी अगुआइर् सोवियत संघ ने की। इसकी स्थापना सन् 1955 में हुइर् थी और इसका मुख्य काम था ‘नाटो’ में शामिल देशों का यूरोप में मुकाबला करना। शीतयु( के दौरान अंतरार्ष्ट्रीय गठबंध्नों का निधर्रण महाशक्ितयों की शरूरतों और छोटे देशों के लाभ - हानि के गण्िात से होताथा। जैसाकि ऊपर बताया गया है, महाशक्ितयों के बीच तनातनी का मुख्य अखाड़ा यूरोप बना। वुफछेक मामलों में यह भी हुआ कि महाशक्ितयों ने अपने - अपने गुट में शामिल करने के लिए वुफछ देशों पर अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। पूवीर् यूरोप में सोवियत संघ की दखलंदाजी इसका उदाहरण है। सोवियत संघ ने पूवीर् यूरोप में अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया। इस क्षेत्रा के देशों में सोवियत संघ की सेना की व्यापक उपस्िथति ने यह सुनिश्िचत करने के लिए अपना प्रभाव जमाया कि यूरोप का पूरा पूवीर् हिस्सा सोवियत संघ के दबदबे में रहे। पूवीर् और दक्ष्िाण - पूवर् एश्िाया तथा पश्िचम एश्िाया में अमरीका ने गठबंध्न का तरीका अपनाया। इन गठबंध्नों को दक्ष्िाण - पूवर् एश्िायाइर् संध्ि संगठन ;ैम्।ज्व्द्ध और वेंफद्रीय संध्ि संगठन ;ब्म्छज्व्द्ध कहा जाता है। इसके शवाब में सोवियत संघ तथा साम्यवादी चीन ने इस क्षेत्रा के देशों मसलन उत्तरीवियतनाम, उत्तरी कोरिया और इराक के साथ अपने सम्बन्ध् मजबूत किए। शीतयु( के कारण विश्व के सामने दो गुटों के बीच बँट जाने का खतरा पैदा हो गया था। ऐसी स्िथति में औपनिवेश्िाक शासन, मसलन बि्रटेन और प्रफांस के चंगुल से मुक्त हुए नव स्वतंत्रा देशों को चिंता हुइर् कि कहीं वे अपनी इस आशादी को पाने के साथ खो न बैठें। गठबंध्न में भेद पैदा हुए और बड़ी जल्दी उनमें दरार पड़ी। साम्यवादी चीन की 1950 के दशक के उत्तरा(र् में सोवियत संघ से अनबन हो गइर्। सन् 1969 में इन दोनों के बीच एक भू - भाग पर आध्िपत्य को लेकर छोटा - सा यु( भी हुआ। इस दौर की एकमहत्त्वपूणर् घटना ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ का विकास है। इस आंदोलन ने नव - स्वतंत्रा राष्ट्रों को दो - ध््रुवीय विश्व की गुटबाजी से अलग रहने का मौका दिया। आप यह सवाल पूछ सकते हैं कि आख्ि़ार महाशक्ितयों को अपना गुट बनाने की शरूरत क्यों पड़ी। आख्ि़ार अपने परमाणु हथ्िायारों और अपनी स्थायी सेना के बूते महाशक्ितयाँ इतनी ताकतवर थीं कि एश्िाया तथा अप्रफीका और यहाँ तक कि यूरोप के अध्िकांश छोटे देशों की साझी शक्ित का भी उनसे कोइर् मुकाबला नहीं था। लेकिन, हमें यह समझने की शरूरत है कि छोटे देश निम्न कारणों से महाशक्ितयों के बड़े काम के थे μ ;कद्ध महत्त्वपूणर् संसाध्नों ;जैसे तेल और खनिजद्ध, ;खद्ध भू - क्षेत्रा ;ताकि यहाँसकती थीं कि उदारवादी लोकतंत्रा और पूंजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद से कहीं बेहतर है अथवा समाजवाद और साम्यवाद, उदारवादी लोकतंत्रा और पूंजीवाद की अपेक्षा बेहतर है। शीतयु( के दायरे शीतयु( के दौरान अनेक संकट सामने आये। क्यूबा के जिस मिसाइल संकट से हमने इस अध्याय की शुरुआत की, वह इनमें से एक था। शीतयु( के दौरान खूनी लड़ाइयाँ भी हुईं, लेकिन यहाँ ध्यान देने की बात यह भी है कि इन संकटों और लड़ाइयों की परिणति तीसरे विश्वयु( के रूप में नहीं हुइर्। दोनों महाशक्ितयाँ कोरिया ;1950 - 1953द्ध, बलिर्न ;1958 - 1962द्ध, कांगो ;1960 के दशक की शुरुआतद्ध और कइर् अन्य जगहों पर सीध्े - सीध्े मुठभेड़ की स्िथति में आ चुकी थीं। संकट गहराता गया क्योंकि दोनों में से कोइर् भी पक्ष पीछे हटने के लिए तैयार नहीं था। जब हम शीतयु( के दायरों की बात से महाशक्ितयाँ करते हैं तो हमारा आशय ऐसे क्षेत्रों से होता है 7 उत्तरी और दक्ष्िाणी कोरिया अभी तक क्यों विभाजित हैं जबकि शीतयु( के दौर के बाकी विभाजन मिट गए हैं? क्या कोरिया के लोग चाहते हैं कि विभाजन बना रहे? अपने हथ्िायारों और सेना का संचालन कर सवेंफद्ध, ;गद्ध सैनिक ठिकाने ;जहाँ से महाशक्ितयाँ एक - दूसरे की जासूसी कर सवेंफद्ध और ;घद्ध आथ्िार्क मदद ;जिसमें गठबंध्न में शामिल बहुत से छोटे - छोटे देश सैन्य - खचर् वहन करने में मददगार हो सकते थेद्ध। ये ऐसे कारण थे जो छोटे देशों को महाशक्ितयों के लिए शरूरी बना देतेे थे।विचारधरा के कारण भी ये देश महत्त्वपूणर् थे। गुटों में शामिल देशों की निष्ठा से यह संकेत मिलता था कि महाशक्ितयाँ विचारों का पारस्परिक यु( भी जीत रही हैं। गुट में शामिल हो रहेे देशों के आधर पर वे सोच जहाँ विरोध्ी खेमों में बँटे देशों के बीच संकट के अवसर आये, यु( हुए या इनके होने की संभावना बनी, लेकिन बातें एक हद से ज्यादा नहीं बढ़ीं। कोरिया, वियतनाम और अपफगानिस्ताऩजैसे वुफछ क्षेत्रों में व्यापक जनहानि हुइर्, लेकिन विश्व परमाणु यु( से बचा रहा और वैमनस्य विश्वव्यापी नहीं हो पाया। कइर् बार ऐसे अवसर आए जब दोनों महाशक्ितयों के बीच राजनयिक संवाद जारी नहीं रह पाया और इससे दोनों के बीच ग़्ालतपफहमियाँ बढ़ीं। ऐसे कइर् मौके आए जब शीतयु( के संघषो± और वुफछ गहन संकटों को टालने में दोनों गुटों से बाहर के देशों ने कारगर भूमिका निभायी। इस संदभर् में गुटनिरपेक्ष देशों की भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख नेताओं में एक जवाहरलालनेहरू थे। नेहरू ने उत्तरी और दक्ष्िाणी कोरियाके बीच मध्यस्थता में महत्त्वपूणर् भूमिका निभाइर्। कांगो संकट में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ने प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभाइर्। अंततः यह बात उभरकर सामने आती है कि महाशक्ितयों ने समझ लिया था कि यु( को हर हालत में टालना शरूरी है। इसी समझ के कारण दोनों महाशक्ितयों ने संयम बरता और अंतरार्ष्ट्रीय मामलों में जिम्मेवारी भरा बरताव किया। शीतयु( एक क्षेत्रा से दूसरे क्षेत्रा की तरपफ सरकता गया और इसमें संयम का तवर्फ ही काम कर रहा था। हालाँकि शीतयु( के दौरान दोनों ही गठबंध्नों के बीच प्रतिद्वंदिता समाप्त नहीं हुइर् थी। इसी कारण एक - दूसरे के प्रति शंका की हालत में दोनों गुटों ने भरपूर हथ्िायार जमा किए और लगातार यु( के लिए तैयारी करते रहे। हथ्िायारों के बड़े शखीरे को यु( से बचे रहने के लिए शरूरी माना गया। दोनों देश लगातार इस बात को समझ रहे थे कि संयम के बावजूद यु( हो सकता है। दोनों पक्षों में से कोइर् भी दूसरे के हथ्िायारों की संख्या को लेकर ग़्ालत अनुमान लगा सकता था। दोनों गुट एक - दूसरे की मंशा को समझने में भूल कर सकते थे। इसके अतिरिक्त सवाल यह भी था कि कोइर् परमाणु दुघर्टना हो गइर् तो क्या होगा? अगर ग़्ालती से कोइर् परमाणु हथ्िायार चल जाए या कोइर् सैनिक शरारतन यु( शुरू करने के इरादे से कोइर् हथ्िायार चला दे तो क्या होगा? अगर परमाणु हथ्िायार के कारण कोइर् दुघर्टना हो जाए तो क्या होगा? ऐसी दुघर्टना का श्िाकार हुए देश के नेताओं को वैफसे पता चलेगा कि यह शत्राु का षड़यंत्रा नहीं अथवा दूसरी तरपफ से कोइर् मिसाइल नहीं दागी गइर् है, बल्िक यह महज एक दुघर्टना है? इस कारण, समय रहते अमरीका और सोवियत संघ ने वुफछेक परमाण्िवक और अन्य हथ्िायारों को सीमित या समाप्त करने के लिए आपस में सहयोग करने का पैफसला किया। दोनों महाशक्ितयों ने पैफसला किया कि ‘अस्त्रा - नियंत्राण’ द्वारा हथ्िायारों की होड़ पर लगाम कसी जा सकती है और उसमें स्थायी संतुलन लाया जा सकता है। ऐसे प्रयास कीशुरुआत सन् 1960 के दशक के उत्तरा(र् में हुइर् और एक दशक के भीतर दोनों पक्षों ने तीन अहम समझौतों पर दस्तख़त किए। ये संध्ियाँ थीं परमाणु परीक्षण प्रतिबंध् संध्ि, परमाणु अप्रसार संध्ि और परमाणु प्रक्षेपास्त्रा परिसीमन संध्ि ;एंटी बैलेस्िटक मिसाइल ट्रीटीद्ध। इसके बाद महाशक्ितयों ने ‘अस्त्रा - परिसीमन’ के लिए वातार्ओं के कइर् दौर किए और हथ्िायारों पर अंवुफश रखने के लिए अनेेक संध्ियाँ कीं। दो - ध््रुवीयता को चुनौती μ गुटनिरपेक्षता हम देख चुके हैं कि किस तरह शीतयु( की वशह से विश्व दो प्रतिद्वंद्वी गुटों में बँट रहा था। इसी संदभर् में गुटनिरपेक्षता ने एश्िाया, अप्रफीका और लातिनी अमरीका के नव - स्वतंत्रा देशों को एक तीसरा विकल्प दिया। यह विकल्प था दोनों महाशक्ितयों के गुटों से अलग रहने का। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जड़ में युगोस्लाविया के जोसेपफ ब्राॅश टीटो, भारत के जवाहरलाल नेहरू और मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर की दोस्ती थी। इन तीनों ने सन् 1956 में एक सपफल बैठक की। इंडोनेश्िाया के सुकणो± और घाना के वामे एनक्रूमा ने इनका जोरदार समथर्न किया। ये पाँच नेता गुटनिरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक कहलाए। पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन सन् 1961 में बेलग्रेड में हुआ। यह सम्मेलन कम से कम तीन बातों की परिणति था μ ;कद्ध इन पाँच देशों के बीच सहयोग, ;खद्ध शीतयु( का प्रसार और इसके बढ़ते हुए दायरे, और ;गद्ध अंतरार्ष्ट्रीय पफलक पर बहुत से नव - स्वतंत्रा अप्रफीकी देशों का नाटकीय उदय। 1960 तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में 16 नये अप्रफीकी देश बतौर सदस्य शामिल हो चुके थे। पहले गुटननिरपेक्ष - सम्मेलन में 25 सदस्य - देश शामिल हुए। समय गुजरने के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सदस्य संख्या बढ़ती गइर्। 2006 में हवाना ;क्यूबाद्ध में हुए 14वें सम्मेलन में 116 सदस्य - देश और 15 पयर्वेक्षक देश शामिल हुए। जैसे - जैसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक लोकिय अंतरार्ष्ट्रीय आंदोलन के रूप में बढ़ता गया वैसे - वैसे इसमें विभ्िान्न राजनीतिक प्रणाली और अलग - अलग हितों के देश शामिल होते गए। इससे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मूल स्वरूप में बदलाव आया। इसी कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन की सटीक परिभाषा कर पाना वुफछ मुश्िकल है। वास्तव में यह आंदोलन है क्या? दरअसल यह आंदोलन क्या नहीं है - यह बताकर इसकी परिभाषा करना ज्यादा सरल है। यह महाशक्ितयों के गुटों मेें शामिल न होने का आंदोलन है। महाशक्ितयों के गुटों से अलग रहने की इस नीति का मतलब यह नहीं है कि इस आंदोलन से जुड़े देश अपने को अंतरार्ष्ट्रीय मामलों से अलग - थलग रखते हैं या तटस्थता का पालन करते हैं। गुटनिरपेक्षता का मतलब पृथकतावाद नहीं। पृथकतावाद का अथर् होता है अपने को अंतरार्ष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना। 1787 में अमरीका में स्वतंत्राता की लड़ाइर् हुइर् थी। इसके बाद से पहले विश्वयु( की शुरुआत तक अमरीका ने अपने को अंतरार्ष्ट्रीय मामलों से अलग रखा। उसने पृथकतावाद की विदेश - नीति अपनाइर् थी। इसके विपरीत गुटनिरपेक्ष देशों ने, जिसमें भारत भी शामिल है, शांति और स्िथरता बनाए रखने के लिए प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच मध्यस्थता में सिय भूमिका निभाइर्। गुटनिरपेक्ष देशों की ताकत की जड़ उनकी आपसी एकता और महाशक्ितयों द्वारा अपने - अपने खेमे में शामिल करने की पुरजोर कोश्िाशों के बावजूद ऐसे किसी खेमे में शामिल न होने के उनके संकल्प में है। गुटनिरपेक्षता का अथर् तटस्थता का ध्मर् निभाना भी नहीं है। तटस्थता का अथर् होता है मुख्यतः यु( में शामिल न होने की नीति का पालन करना। तटस्थता की नीति का पालन करने वाले देश के लिए यह शरूरी नहीं कि वह यु( को समाप्त करने में मदद करे। ऐसे देश यु( में संलग्न नहीं होते और न ही यु( के सही - गलत होने के बारे में उनका कोइऱ्पक्ष होता है। दरअसल कइर् कारणों से गुटनिरपेक्ष देश, जिसमें भारत भी शामिल है, यु( में शामिल हुए हैं। इन देशों ने दूसरे देशों के बीच यु( को होने से टालने के लिए काम किया है और हो रहे यु( के अंत के लिए प्रयास किए हैं। नव अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क व्यवस्था गुटनिरपेक्ष देश शीतयु( के दौरान महज मध्यस्थता करने वाले देश भर नहीं थे। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अध्िकांश देशों को ‘अल्प विकसित देश’ का दजार् मिला था। इन देशों के सामने मुख्य चुनौती आथ्िार्क रूप से और ज्यादा विकास करने तथा अपनी जनता को गरीबी से उबारने की ़थी। नव - स्वतंत्रा देशों की आशादी के लिहाशसे भी आथ्िार्क विकास महत्त्वपूणर् था। बग़्ौर टिकाऊ विकास के कोइर् देश सही मायनों में आशाद नहीं रह सकता। उसे ध्नी देशों पर निभर्र रहना पड़ता। इसमें वह उपनिवेशक देश भी हो सकता था जिससे राजनीतिक आशादी हासिल की गइर्। इसी समझ से नव अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क व्यवस्था की धरणा का जन्म हुआ। 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार और विकास से संबंध्ित सम्मेलन ;यूनाइटेड नेशंस काॅनप्रेंफस आॅन ट्रेड एंड डेवलपमेंट - अंकटाडद्ध में ‘टुवाडर््स अ न्यू ट्रेड पाॅलिसी पफाॅर डेवलपमेंट’ शीषर्क से एक रिपोटर् प्रस्तुत की गइर्। इस रिपोटर् में वैश्िवक व्यापार - प्रणाली में सुधर का प्रस्ताव किया गया था। इस रिपोटर् में कहा गया था कि सुधरों से μ ;कद्ध अल्प विकसित देशों को अपने उन प्राकृतिक संसाध्नों पर नियंत्राण प्राप्त होगा जिनका दोहन पश्िचम के विकसित देश करते हैंऋ ;खद्ध अल्प विकसित देशों की पहुँच पश्िचमी देशों के बाशार तक होगीऋ वे अपना सामान बेच सवेंफगे और इस तरह ग़्ारीब देशों के लिए यह व्यापार पफायदेमंद होगाऋ ;गद्ध पश्िचमी देशों से मंगायी जा रही प्रौद्योगिकी की लागत कम होगी और ;घद्ध अल्प विकसित देशों की अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क संस्थानों में भूमिका बढ़ेगी। तो इसका मतलब यहकि नव अंतरार्ष्ट्रीयआथ्िार्क व्यवस्था बस विचार ही रहा - कभीसाकार नहीं हुआ! गुटनिरपेक्षता की प्रकृति ध्ीरे - ध्ीरे बदलीऔर इसमें आथ्िार्क मुद्दांे को अध्िक महत्त्व दिया जाने लगा। बेलग्रेड में हुए पहले सम्मेलन ;1961द्ध में आथ्िार्क मुद्दे ज्यादामहत्त्वपूणर् नहीं थे। सन् 1970 के दशक के मध्य तक आथ्िार्क मुद्दे प्रमुख हो उठे। इसके परिणामस्वरूप गुटनिरपेक्ष आंदोलन आथ्िार्क दबाव - समूह बन गया। सन् 1980 के दशकके उत्तरा(र् तक नव अंतरार्ष्ट्रीय आथ्िार्क व्यवस्था को बनाये - चलाये रखने के प्रयास मंद पड़ गए। इसका मुख्य कारण था विकसित देशों द्वारा किया जा रहा तेज विरोध्। विकसित देश एक सुर में विरोध् कर रहे थे जबकि गुटनिरपेक्ष देशों को इस विरोध् के बीच अपनी एकता बनाए रखने के लिए जी - तोड़ मेहनत करनी पड़ रही थी। भारत और शीतयु( गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में शीतयु( के दौर में भारत ने दो स्तरों पर अपनी भूमिका निभाइर्। एक स्तर पर भारत ने सजग और सचेत रूप से अपने को दोनों महाशक्ितयों की खेमेबंदी से अलग रखा। दूसरे, भारत ने उपनिवेशों के चुंगल से मुक्त हुए नव - स्वतंत्रा देशों के महाशक्ितयों के खेमे में जाने का पुरजोर विरोध् किया। भारत की नीति न तो नकारात्मक थी और न ही निष्िक्रयता की। नेहरू ने विश्व को याद दिलाया कि गुटनिरपेक्षता कोइर् ‘पलायन’ की नीति नहीं है। इसके विपरीत, भारत शीतयु(कालीन प्रतिद्वंदिता की जकड़ ढीली करने के लिए अंतरार्ष्ट्रीय मामलों में सिय रूप से हस्तक्षेप करने के पक्ष में था। भारत ने दोनों गुटों के बीच मौजूद मतभेदों को कम करने की कोश्िाश की और इस तरह उसने इन मतभेदों को पूणर्व्यापी यु( का रूप लेने से रोका। भारत के राजनयिकों और नेताओं का उपयोग अक्सर शीतयु( के दौर के प्रतिद्वंद्वियों के बीच संवाद कायम करने तथा मध्यस्थता करने के लिए हुआऋ मिसाल के तौर पर 1950 के दशक के शुरुआती सालों मेें कोरियाइर् यु( के दौरान। यहाँ यह याद रखना भी शरूरी है कि भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अन्य सदस्यों को भी ऐसे कामों में संलग्न रखा। शीतयु( के दौरान भारत ने लगातार उन क्षेत्राीय और अंतरार्ष्ट्रीय संगठनों को सिय बनाये रखने की कोश्िाश की जो अमरीका अथवा सोवियत संघ के खेमे से नहीं जुड़े थे। नेहरू ने ‘स्वतंत्रा और परस्पर सहयोगी राष्ट्रों के एकसच्चे राष्ट्रवुफल’ के ऊपर गहरा विश्वास जताया जो शीतयु( को खत्म करने में न सही, पर उसकी जकड़ ढीली करने में ही सकारात्मक भूमिका निभाये। वुफछ लोगों ने माना कि गुटनिरपेक्षता अंतरार्ष्ट्रीयता का एक उदार आदशर् है लेकिन यह आदशर् भारत के वास्तविक हितों से मेल नहीं खाता। यह बात ठीक नहीं है। गुटनिरपेक्षता की नीति ने कम से कम दो तरह से भारत का प्रत्यक्ष रूप से हितसाध्न किया μ पहली बात तो यह कि गुटनिरपेक्षता के कारण भारत ऐसे अंतरार्ष्ट्रीय पैफसले औऱपक्ष ले सका जिससे उसका हित सध्ता होता हो न कि महाशक्ितयों और उनके खेमे के देशों का। दूसरे, भारत हमेशा इस स्िथति में रहा कि एक महाशक्ित उसके ख्िालापफ जाए तो वह दूसरी महाशक्ित के करीब आने की कोश्िाश करे। अगर भारत को महसूस हो कि महाशक्ितयों में से कोइर् उसकी अनदेखी कर रहा है या अनुचित दबाव डाल रहा है तो वह दूसरी महाशक्ित की तरपफ अपना रुख कर सकता था। दोनों गुटों में से कोइर् भी भारत को लेकर न तो बेप्ि़ाफक्र हो सकता था और न ही धैंस जमा सकता था। भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की कइर् कारणों से आलोचना की गइर्। हम यहाँ ऐसी दो आलोचनाओं की चचार् करेंगे μ आलोचकों का एक तवर्फ यह है कि भारत की गुटनिरपेक्षता ‘सि(ांतविहीन’ है। कहा जाता है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को साध्ने के नाम पर अक्सरमहत्त्वपूणर् अंतरार्ष्ट्रीय मामलों पर कोइर् सुनिश्िचत पक्ष लेने से बचता रहा। आलोचकों का दूसरा तवर्फ है कि भारत के व्यवहार में स्िथरता नहीं रही और कइर् बार भारत की स्िथति विरोधभासी रही। महाशक्ितयों के खेमों में शामिल होने पर दूसरे देशों की आलोचना करने वाले भारत ने स्वयं सन् 1971 के अगस्त में सोवियत संघ के साथ आपसी मित्राता की संध्ि पर हस्ताक्षर किए। विदेशी पयर्वेक्षकों ने इसे भारत का सोवियत खेमे में शामिल होना माना। भारत की सरकार का दृष्िटकोण यह था कि बांग्लादेश - संकट के समय उसे राजनयिक और सैनिक सहायता की शरूरत थी और यह संध्ि उसे संयुक्त राज्य अमरीका सहित अन्य देशों से अच्छे संबंध् बनाने से नहीं रोकती। गुटनिरपेक्षता की नीति शीतयु( के संदभर् में पनपी थी। दूसरे अध्याय में हम पढ़ेंगे कि सन् 1990 के दशक के शुरुआती वषो± मेें शीतयु( का अंत और सोवियत संघ का विघटन हुआ। इसके साथ ही एक अंतरार्ष्ट्रीय आंदोलन और भारत की विदेश नीति की मूल भावना के रूप में गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता तथा प्रभावकारिता में थोड़ी कमी आयी। बहरहाल, गुटनिरपेक्षता में वुफछ आधरभूत मूल्य और विचार शामिल हैं। गुटनिरपेक्षता इस बात की पहचान पर टिकी है कि उपनिवेश की स्िथति से आशाद हुए देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव हैं और यदि ये देश साथ आ जायें तो एक सशक्त चरण ऽ कक्षा को बराबर संख्या वाले तीन समूहों में बाँटे। प्रत्येक समूह दुनिया के इन तीन खेमों में से किसी एक की नुमाइंदगी करेगा - पूँजीवादी दुनिया, साम्यवादी दुनिया या तीसरी दुनिया। ऽ अध्यापक ऐसे दो संवेदनशील मुद्दों को चुनेंगे जो शीतयु( के दौरान विश्व शांति और सुरक्षा को ख़तरा उत्पन्न कर चुके हों ;कोरिया और वियतनाम संकट अच्छे उदाहरण हो सकते हैंद्ध। ऽ प्रत्येक समूह को संबंध्ित मुद्दे पर ‘घटना - चक्र’ बनाने को कहें। उनको अपने समूह के दृष्िटकोण से एक प्रस्तुति करनी होगी। इस प्रस्तुति में घटना का कालक्रम, उसके कारण और समस्या के समाधन के लिए उनका कायर्क्रम शामिल होगा। ऽ प्रत्येक समूह को कक्षा के सामने ‘घटना - चक्र’ प्रस्तुत करने को कहें। अध्यापकों के लिए ऽ छात्रों को ध्यान दिलाएँ कि किस प्रकार इन संकटों ने संबंध्ित देशों और शेष विश्व को प्रभावित किया। इन देशों की वतर्मान स्िथति से भी जोड़कर चचार् करें। ऽ इन क्षेत्रों में शांति स्थापित करने में संयुक्त राष्ट्र और तीसरी दुनिया के नेताओं की भूमिका को रेखांकित करें ;कोरिया और वियतनाम संकट में भारत की भूमिका को संदभर् के लिए लिया जा सकता हैद्ध। ऽ ‘शीतयु( के बाद वाले दौर में हम इस प्रकार के संकटों को वैफसे टाल सकते हैं’ इस विषय पर वाद - विवाद शुरू करें। ताकत बन सकते हैं। गुटनिरपेक्षता का आशय है कि गरीब और विश्व के बहुत छोटे देशों को भी किसी महाशक्ित का पिछलग्गू बनने की शरूरत नहीं है। ये देश अपनी स्वतंत्रा विदेश नीति अपना सकते हैं। यह के लिए एक वैकल्िपक विश्व - व्यवस्था बनाने और अंतरार्ष्ट्रीय व्यवस्था को लोकतंत्राध्मीर् बनाने के संकल्प पर भी टिका है। अपनेआप में ये विचार बुनियादी महत्त्व के हैं और शीतयु( की समाप्ित के बाद भी

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