उद्देश्य इस एकक के अध्ययन के बाद आपकृ ऽ उपसहसंयोजक यौगिकों के वनर्र के सि(ांत की अभ्िाधारणाओं के महत्त्व को समझ सकेंगेऋ ऽ समन्वय सत्ता वेंफद्रीय परमाणु/ आयन, लिगन्ड, समन्वय संख्या, समन्वय मंडल, समन्वय बहुपफलक, आॅक्सीकरण संख्या, होमोलेप्िटक व हेट्रोलेप्िटक जैसे पदों का अथर् जान सकेंगेऋ ऽ उपसहसंयोजन यौगिकों की नाम प(ति के नियम जान सकेंगेऋ ऽ एकवेंफद्रकी उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्रा व नाम लिख सकेंगेऋ ऽ उपसहसंयोजन यौगिकों में विभ्िान्न प्रकार की समावयवताओं को परिभाष्िात कर सकेंगेऋ ऽ संयोजकता आबंध् तथा वि्रफस्टल क्षेत्रा सि(ांतों के आधर पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन की प्रवृफति को समझ सकेंगेऋ ऽ उपसहसंयोजन यौगिकों के स्थायित्व को जान सकेंगेऋ ऽ दैनिक जीवन में उपसहसंयोजन यौगिकों के महत्व व अनुप्रयोगों को समझ सकेंगे। 9.1 उपसहसंयोजन यौगिकों का वनर्र का सिद्धांत फ्उपसहसंयोजन यौगिक आध्ुनिक अकाबर्निक व जैव अकाबर्निक रसायन तथा रासायनिक उद्योगों के आधर स्तंभ हैं।य् इससे पूवर् के एकक में हमने अध्ययन किया कि संव्रफमण धतुएं बड़ी संख्या में संवुफल यौगिक बनाती हैं, जिनमें धतु परमाणु अनेक ट्टणायनों अथवा उदासीन अणुओं से परिब( रहते हैं। आध्ुनिक पारिभाष्िाक शब्दावली में ऐसे यौगिक उपसहसंयोजन यौगिक कहलाते हैं। उपसहसंयोजन यौगिकों का रसायन आध्ुनिक अकाबर्निक रसायन का एक महत्वपूणर् एवं चुनौतीपूणर् क्षेत्रा है। रासायनिक आबंध्न एवं आण्िवक संरचना की नइर् धरणाओं ने जैविक तंत्रों के जीवन घटकों की कायर्प्रणाली की पूरी जानकारी उपलब्ध करवाइर् है। क्लोरोपिफल, हीमोग्लोबिन तथा विटामिन ठ12 व्रफमशः मैग्नीश्िायम, आयरन तथा कोबाल्ट के उपसहसंयोजन यौगिक हैं। विविध् धतुकमर् प्रव्रफमों, औद्योगिक उत्प्रेरकों तथा वैश्लेष्िाक अभ्िाकमर्कों में उपसहसंयोजन यौगिकों का उपयोग होता है। वैद्युतलेपन, वस्त्रा - रँगाइर् तथा औषध् रसायन में भी उपसहसंयोजन यौगिकों के अनेक उपयोग हैं। सवर्प्रथम स्िवस वैज्ञानिक अल्प्रेफड वनर्र ;1866 - 1919द्ध ने उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचनाओं के संबंध् में अपने विचार प्रतिपादित किए। उन्होंने अनेक उपसहसंयोजन यौगिक बनाए तथा उनकी विशेषताएं बताईं एवं उनके भौतिक तथा रासायनिक व्यवहार का सामान्य प्रायोगिक तकनीकों द्वारा अध्ययन किया। वनर्र ने धतु आयन के लिए प्राथमिक संयोजकता ;चतपउंतल अंसमदबमद्ध तथा द्वितीयक संयोजकता ;ेमबवदकंतल अंसमदबमद्ध की धरणा प्रतिपादित की। द्विअंगी यौगिक जैसे ब्तब्स3ए ब्वब्स2 या च्कब्स2 में धतु आयन की प्राथमिक संयोजकता व्रफमशः 3, 2 तथा 2 है। कोबाल्ट ;प्प्प्द्ध क्लोराइड के अमोनिया के साथ बने विभ्िान्न यौगिकों में यह पाया गया कि सामान्य ताप पर इनके विलयन में सिल्वर नाइट्रेट विलयन आध्िक्य में डालने पर वुफछ क्लोराइड आयन ।हब्स के रूप में अवक्षेपित हो जाते हैं तथा वुफछ विलयन में ही रह जाते हैं। 1 मोलब्वब्स3ण्6छभ्3 ;पीलाद्ध 3 मोल ।हब्स देता है। 1 मोलब्वब्स3ण्5छभ्3 ख्नीललोहित ;बैंगनीद्ध, 2 मोल ।हब्स देता है। 1 मोलब्वब्स3ण्4छभ्3 ;हराद्ध 1 मोल ।हब्स देता है। 1 मोलब्वब्स3ण्4छभ्3 ;बैंगनीद्ध 1 मोल ।हब्स देता है। उपरोक्त प्रेक्षणों तथा इन यौगिकों के विलयनों के चालकता मापन के परिणामों को निम्न बिंदुओं के आधर पर समझाया जा सकता है - ;पद्ध अभ्िावि्रफया की अवध्ि में वुफल मिलाकर छः समूह ;क्लोराइड आयन या अमोनिया अणु अथवा दोनोंद्ध कोबाल्ट आयन से जुड़े हुए माने जाएं तथा ;पपद्ध यौगिकों को सारणी 9.1 में दशार्ए अनुसार सूत्रिात किया जाए, जिनमें गुरूकोष्ठक में दशार्ए परमाणुओं की एकल सत्ता है जो अभ्िावि्रफया की परिस्िथतियों में वियोजित नहीं होती। वनर्र ने धतु आयन से सीधे जुड़े समूहों की संख्या को द्वितीयक संयोजकता नाम दियाऋ इन सभी उदाहरणों में धतु की द्वितीयक संयोजकता छः है। सारणी 9ण्1 - कोबाल्ट ;प्प्प्द्ध क्लोराइड - अमोनिया संवुफलों का सूत्राीकरण यह ध्यान देने योग्य है कि सारणी 9.1 में अंतिम दो यौगिकों के मूलानुपाती सूत्रा, ब्वब्स3ण्4छभ्3ए समान हैं, परंतु गुणध्मर् भ्िान्न हैं। ऐसे यौगिक समावयव ;पेवउमतेद्ध कहलाते हैं। वनर्र ने 1898 में उपसहसंयोजन यौगिकों का सि(ांत प्रस्तुत किया। इस सि(ांत की मुख्य अभ्िाधरणाएं निम्नलिख्िात हैं - 1 उपसहसंयोजन यौगिकों में धतुएं दो प्रकार की संयोजकताएं दशार्ती हैं - प्राथमिक तथा द्वितीयक। 2 प्राथमिक संयोजकताएं सामान्य रूप से आयननीय होती हैं तथा ट्टणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं। 3 द्वितीयक संयोजकताएं अन - आयननीय होती हैं। ये उदासीन अणुओं अथवा ट्टणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती हैं। द्वितीयक संयोजकता उपसहसंयोजन संख्या ;ब्ववतकपदंजपवद दनउइमतद्ध के बराबर होती है तथा इसका मान किसी धतु के लिए सामान्यतः निश्िचत होता है। 4 धतु से द्वितीयक संयोजकता से आबंिात आयन समूह विभ्िान्न उपसहसंयोजन संख्या के अनुरूप दिव्फस्थान में विश्िाष्ट रूप से व्यवस्िथत रहते हैं। आध्ुनिक सूत्राीकरण में इस प्रकार की दिव्फस्थान व्यवस्थाओं को समन्वय बहुपफलक ;ब्ववतकपदंजपवद चवसलीमकतंद्ध कहते हैं। गुरूकोष्ठक में लिखी स्िपशीश संवुफल तथा गुरूकोष्ठक के बाहर लिखे आयन, प्रति आयन ;ब्वनदजमत पवदेद्ध कहलाते हैं। उन्होंने यह भी अभ्िाधारणा दी कि संव्रफमण तत्वों के समन्वय यौगिकों में सामान्यतः अष्टपफलकीय, चतुष्पफलकीय व वगर् समतली ज्यामितियाँ पाइर् जाती हैं। इस प्रकार, 3़2़ ़ ख्ब्व;छभ्द्ध, ए ख्ब्वब्स;छभ्द्ध, तथाख्ब्वब्स;छभ्द्ध, की ज्यामितियाँ अष्टपफलकीय3635234हैं, जबकि ख्छप;ब्व्द्ध4, तथा ख्च्जब्स4,2दृ व्रफमशः चतुष्पफलकीय तथा वगर् समतली हैं। द्वि लवण तथा संवुफल में अंतर द्वि लवण तथा संवुफल दोनों ही दो या इससे अध्िक स्थायी यौगिकों के रससमीकरणमितीय अनुपात ;ेजवपबीपवउमजतपब तंजपवद्ध में संगठित होने से बनते हैं। तथापि ये भ्िान्न हैं क्योंकि द्वि लवण जैसे कानेर्लाइट, ज्ञब्सण्डहब्सण्6भ्व्य मोर लवण, थ्मैव्ण्;छभ्द्धैव्ण्6भ्व्य2244242पोटाश, पिफटकरी, ज्ञ।स;ैव्4द्ध2ण्12भ्2व् आदि जल में पूणर्रूप से साधरण आयनों में वियोजित हो जाते हैं, परंतु ज्ञ4ख्थ्म;ब्छद्ध6, में उपस्िथत ख्थ्म;ब्छद्ध6,4दृ संवुफल आयन, थ्म2़ तथा ब्छ दृ आयनों में वियोजित नहीं होता। 9.2 उपसहसंयोजन ;कद्ध उपसहसंयोजन सत्ता या समन्वय सत्ता ;ब्ववतकपदंजपवद म्दजपजलद्ध वेंफद्रीय धतु परमाणु अथवा आयन से किसी एक निश्िचत संख्या में आबंध्ित आयन अथवायौगिकों से अणु मिलकर एक उपसहसंयोजन सत्ता का निमार्ण करते हैं। उदाहरणाथर्, ख्ब्वब्स3;छभ्3द्ध3, संबंिात कुछ एक उपसहसंयोजन सत्ता है जिसमें कोबाल्ट आयन तीन अमोनिया अणुओं तथा तीन क्लोराइड आयनों से घ्िारा है। अन्य उदाहरण हैं, ख्छप;ब्व्द्ध,ए ख्च्जब्स;छभ्द्ध,ए ख्थ्म;ब्छद्ध,4दृए42326प्रमुख ख्ब्व;छभ्3द्ध6,3़ आदि । पारिभाष्िाक शब्द ;खद्ध वेंफद्रीय परमाणु/आयनव उनकी किसी उपसहसंयोजन सत्ता में, परमाणु/आयन जो एक निश्िचत संख्या में अन्य आयनों/ समूहों परिभाषाएं से एक निश्िचत ज्यामिती व्यवस्था में परिब( रहता है, वेंफद्रीय परमाणु अथवा आयन कहलाता 2़ 3दृहै। उदाहरणाथर्, ख्छपब्स;भ्व्द्ध,ए ख्ब्वब्स;छभ्द्ध,ए तथा ख्थ्म;ब्छद्ध, में वेंफद्रीय224356रसायन विज्ञान 248 2़3़3़परमाणु/ आयन व्रफमशः छप ए ब्व तथा थ्म ए हैं। इन वेंफद्रीय परमाणुओं/आयनों को लूइस अम्ल भी कहा जाता है। ;गद्ध लिगन्ड उपसहसंयोजन सत्ता में वेंफद्रीय परमाणु/आयन से परिब( आयन अथवा अणु लिगन्ड कहलाते हैं। ये सामान्य आयन हो सकते हैं जैसे ब्सदृ, छोटे अणु हो सकते हैं जैसे भ्2व् या छभ्3 बड़े अणु हो सकते हैं जैसे भ्छब्भ्ब्भ्छभ् या छ;ब्भ्ब्भ्छभ्द्ध अथवा बृहदणु22222223भी हो सकते हैं जैसे प्रोटीन। जब एक लिगन्ड, धतु आयन से एक दाता परमाणु द्वारा परिब( होता है, जैसे ब्सदृए भ्2व् या छभ्3ए तो लिगन्ड एकदंतुर ;नदपकमदजंजमद्ध कहलाता है। जब लिगन्ड दो दाता परमाणुओं द्वारा परिब( हो सकता है, जैसे भ्2छब्भ्2ब्भ्2छभ्2 ;एथेन - 1, 2 - डाइऐमीनद्ध अथवा ब्2व्42दृ ;आॅक्सैलेटद्ध, तो ऐसा लिगन्ड द्विदंतुर और जब एक लिगन्ड में अनेक दाता परमाणु उपस्िथत हों, जैसा कि छ;ब्भ्2ब्भ्2छभ्2द्ध3 में हैं, तो लिगन्ड बहुदंतुर कहलाता है। एथ्िालीनडाइऐमीनटेट्रा एसीटेट आयन ;म्क्ज्।4.द्धएक महत्वपूणर् षट्दंतुर ;ीमगंकमदजंजमद्ध लिगन्ड है। यह दो नाइट्रोजन तथा चार आॅक्सीजन परमाणुओं द्वारा एक वेंफद्रीय धतु आयन से जुड़ सकता है। जब एक द्विदंतुर अथवा बहुदंतुर लिगन्ड अपने दो या अध्िक दाता परमाणुओं का प्रयोग एक ही धतु आयन से आबंधन के लिए करता है, तो यह कीलेट ;बीमसंजमद्ध लिगन्ड कहलाता है। ऐसे बंध्नकारी समूहों की संख्या लिगेन्ड की दंतुरता या डेन्िटसिटी ;कमदजपबपजलद्ध कहलाती है। ऐसे संवुफल, कीलेट संवुफल ;बीमसंजम बवउचसमगमेद्ध कहलाते हैं तथा ये इसी प्रकार के एकदंतुर लिगन्ड युक्त संवुफलों से अध्िक स्थायी होते हैं। ;कारण के लिए देखें खंड 9.8द्ध। लिगन्ड, जो दो भ्िान्न परमाणुओं द्वारा जुड़ सकता नाइटिªटो - छ नाइटिªटो - व् थायोसायनेटो आइसोथायोसायनेटो है, उसे उभयदंती संलग्नी ;उभदंती लिगन्डद्ध कहते हैं। ऐसे लिगन्ड के उदाहरण हैं दृ- छव्2 तथा ैब्छदृ आयन। छव्2 आयन वेंफद्रीय धतु परमाणु/आयन से या तो नाइट्रोजन द्वारा अथवा आॅक्सीजन द्वारा संयोजित हो सकता है। इसी प्रकार, ैब्छ.आयन सल्पफर अथवा नाइट्रोजन परमाणु द्वारा संयोजित हो सकता है। ;घद्ध उपसहसंयोजन संख्या ;ब्ववतकपदंजपवद छनउइमतद्ध एक संवुफल में धतु आयन की उपसहसंयोजन संख्या ;ब्छद्ध उससे आबंध्ित लिगन्डों के उन दाता परमाणुओं की संख्या के बराबर होती है, जो सीध्े धतु आयन से जुड़े हांे। उदाहरणाथर्, संवुफल आयनों, ख्च्जब्स6,2दृ तथा ख्छप;छभ्3द्ध4,2़ए में च्ज तथा छप की उपसहसंयोजन संख्या व्रफमशः 6 तथा 4 हैं। इसी प्रकार संवुफल आयनों, ख्थ्म;ब्2व्4द्ध3,3दृ और ख्ब्व;मदद्ध,3़ए में थ्म और ब्व दोनों की समन्वय संख्या 6 है क्योंकि ब् व् 2− तथा324 मद, ;एथेन - 1,2 - डाइऐमीनद्ध द्विदंतुर लिगन्ड हैं। यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि वेंफद्रीय परमाणु/आयन की उपसहसंयोजन संख्या वेंफद्रीय परमाणु/आयन तथा लिगन्ड के मध्य बने केवल σ ;सिग्माद्ध आबंधों की संख्या के आधर पर ही निधर्रित की जाती है। यदि लिगन्ड तथा वेंफद्रीय परमाणु/आयन के मध्य π ;पाइर्द्ध आबंध् बने हों तो उन्हें नहीं गिना जाता। ;चद्ध समन्वय मंडल ;ब्ववतकपदंजपवद ैचीमतमद्ध वेंफद्रीय परमाणु/ आयन से जुड़े लिगन्डों को गुरू कोष्ठक में लिखा जाता है तथा ये सभी मिलकर समन्वय मंडल ;बववतकपदंजपवद ेचीमतमद्ध कहलाते हैं। आयननीय समूह गुरू कोष्ठक के बाहर लिखे जाते हैं तथा ये प्रतिआयन कहलाते हैं। उदाहरणाथर्, संवुफल ज्ञ4ख्थ्म;ब्छद्ध6,ए में ख्थ्म;ब्छद्ध6,4दृ समन्वय मंडल है तथा ज्ञ़ प्रति आयन है। ;छद्ध समन्वय बहुपफलक ;ब्ववतकपदंजपवद च्वसलीमकतवदद्ध वेंफद्रीय परमाणु/ आयन से सीध्े जुड़े लिगन्ड परमाणुओं की दिव्फस्थान व्यवस्था ;ेचंबपंस ंततंदहमउमदजद्ध को समन्वय बहुपफलक कहते हैं। इनमें अष्टपफलकीय, वगर् समतलीय तथा चतुष्पफलकीय मुख्य हैं। उदाहरणाथर्, ख्ब्व;छभ्3द्ध6,3़ अष्टपफलकीय है, ख्छप;ब्व्द्ध4, चतुष्पफलकीय है तथा ख्च्जब्स4,2दृ वगर् समतलीय है। चित्रा 9.1 में विभ्िान्न समन्वय बहुपफलकों की आवृफतियाँ दशार्इर् गइर् हैं। अष्टपफलकीय चतुष्पफलकीय वगर् समतली त्रिाकोणीय पिरैमिडी वगर् पिरैमिडी चित्रा 9.1 - विभ्िाÂ समन्वय बहुपफलकों की आवृफतियाँ - ड वेंफद्रीय परमाणु/आयन को तथा स् एकदंतुर लिगन्ड को प्रदश्िार्त करता है। ;जद्ध वेंफद्रीय परमाणु की आॅक्सीकरण संख्या एक संवुफल में वेंफद्रीय परमाणु से जुड़े सभी लिगन्डों को यदि उनके साझे के इलेक्ट्राॅन युगलों सहित हटा लिया जाए तो वेंफद्रीय परमाणु पर उपस्िथत आवेश को उसकी आॅक्सीकरण संख्या कहते हैं। आॅक्सीकरण संख्या को उपसहसंयोजन सत्ता के नाम में वेंफद्रीय परमाणु के संकेत 9.3 उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण 9.3.1 एकवेंफद्रकीय उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्रा नोट - सन् 2004 में प्न्च्।ब् ने अनुशंसा की है कि लिगन्डों को वणर्माला के आधर पर चुनना चाहिए, आवेश के आधार पर नहीं। 9.3.2 एकवेंफद्रकीय उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण के साथ कोष्ठक में रोमन अंक से दशार्या जाता है। उदाहरणाथर्, ख्ब्न;ब्छद्ध4,3दृ में काॅपर का आॅक्सीकरण अंक ़1 है तथा इसे ब्न;प्द्ध लिखा जाता है। ;झद्ध होमोलेप्िटक तथा हेट्रोलेप्िटक संवुफल ;भ्वउवसमचजपब ंदक भ्मजमतवसमचजपब ब्वउचसमगमेद्ध संवुफल जिनमें धतु परमाणु केवल एक प्रकार के दाता समूह से जुड़ा रहता है, उदाहरणाथर् ख्ब्व;छभ्3द्ध6,3़ए होमोलेप्िटक संवुफल कहलाते हैं। संवुफल जिनमें धतु परमाणु एक से अिाक प्रकार के दाता सूमहों से जुड़ा रहता है, उदाहरणाथर् ख्ब्व;छभ्3द्ध4ब्स2,़ए हेट्रोलेप्िटक संवुफल कहलाते हैं। उपसहसंयोजन रसायन में, विशेषतः समावयवों पर विचार करते समय सूत्रों व नामों को असंदिग्ध् तथा सुस्पष्ट तरीके से लिखने के लिए नामकरण का बहुत महत्व है। उपसहसंयोजन सत्ता के सूत्रा तथा जो नाम अपनाए गए हैं वे इंटरनेशनल यूनियन आॅपफ प्योर एंड ऐप्लाइड वैफमिस्ट्री ;प्न्च्।ब्द्ध की अनुशंसाओं पर आधरित हंै। यौगिक का सूत्रा उसके संघटन से संबंध्ित आधरभूत सूचना को संक्ष्िाप्त तथा सुगम रूप से प्रकट करने का एक तरीका है। एकवेंफद्रकीय उपसहसंयोजन सत्ता में एक वेंफद्रीय धतु परमाणु होता है। सूत्रा लिखते समय निम्नलिख्िात नियम प्रयुक्त होते हैंकृ ;पद्ध सवर्प्रथम वेंफद्रीय परमाणु लिखा जाता है। ;पपद्ध तत्पश्चात लिगन्डों को अंग्रेशी वणर्माला के व्रफम में लिखा जाता है। लिगन्ड की स्िथति उसके आवेश पर निभर्र नहीं करती। ;पपपद्ध बहुदंतुर लिगन्ड भी अंग्रेशी वणर्माला के व्रफम में लिखे जाते हैं। संकेताक्षर में लिखे हुए लिगन्ड के प्रथम अक्षर को ध्यान में रखकर वणर्माला के व्रफम में उसकी स्िथति निधर्रित की जाती है। ;पअद्ध संपूणर् उपसहसंयोजन सत्ता, आवेश्िात हो अथवा न हो, उसके सूत्रा को एक गुरूकोष्ठक में लिखा जाता है। यदि लिगन्ड बहुपरमाणुक हांे तो, उनके सूत्रों को कोष्ठक में लिखते हैं। संकेताक्षर में लिखे लिगन्ड को भी कोष्ठक में लिखते हैं। ;अद्ध समन्वय मंडल धतु तथा लिगन्डों के सूत्रों के मध्य स्थान नहीं छोड़ा जाता। ;अपद्ध जब आवेशयुक्त उपसहसंयोजन सत्ता का सूत्रा बिना किसी प्रतिआयन के लिखते हैं तो उपसहसंयोजन सत्ता का आवेश गुरू कोष्ठक के बाहर दाईं ओर मूध±क ;ेनचमतेबतपचजद्ध के रूप में लिखा जाता है जिसमें पहले आवेश की संख्या और पिफर आवेश का चिÉ 3दृ 3़लिखते हैं। उदाहरणाथर्, ख्ब्व;ब्छद्ध6, ए ख्ब्त;भ्2व्द्ध6, ए आदि। ;अपपद्ध ध्नायन के आवेश को ट्टणायन के आवेश से संतुलित किया जाता है। उपसहसंयोजन यौगिकों के नाम योगात्मक नामकरण के सि(ांत के आधर पर लिखे जाते हैं। इस प्रकार धतु के चारों ओर जुड़े समूहों को पहचानकर उनके नाम उपयुक्त गुणक सहित धतु के नाम से पूवर् सूचीब( किए जाते हैं। उपसहसंयोजन यौगिकों के नामकरण में निम्नलिख्िात नियम प्रयुक्त होते हैंकृ ;पद्ध ध्नायन अथवा ट्टणायन दोनों में से कोइर् भी आवेशयुक्त उपसहसंयोजन सत्ता में सवर्प्रथम ध्नायन का नाम लिखा जाता है। नोट - यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सन् 2004 में प्न्च्।ब् द्वारा की गइर् अनुशंसा के अनुसार ट्टणावेश्िात लिगन्डों के नाम के अंत में - इडो ;दृ पकवद्ध जुड़ता है, अतः क्लोरो को क्लोरिडो लिखते हैं। नोट - यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि ध्नायन व ट्टणायन दोनों में एक ही प्रकार के धातु आयन हैं पिफर भी इनमें धातुओं के नाम भ्िान्न हैं। ;पपद्ध वेंफद्रीय परमाणु/ आयन के नाम से पूवर् लिगन्डों के नाम वणर्माला के व्रफम में लिखे जाते हैं। ;यह प्रवि्रफया सूत्रा लिखने के विपरीत है।द्ध ;पपपद्ध ट्टणावेश्िात लिगन्डों के नाम के अंत में दृ व आता है, उदासीन तथा धनावेश्िात लिगन्डों के नाम नहीं बदलते। वुफछ अपवाद हैं, जैसे भ्2व् के लिए एक्वा छभ्3 के लिए ऐम्मीन, ब्व् के लिए काबोर्निल तथा छव् के लिए नाइट्रोसिल। इनको संलग्न चिÉ ;द्ध में लिखा जाता है। ;पअद्ध यदि उपसहसंयोजन सत्ता में एक ही प्रकार के लिगन्ड संख्या में एक से अध्िक हों तो उनकी संख्या दशार्ने के लिए उनके नाम से पूवर् डाइ, ट्राइ आदि शब्द ;पदद्ध प्रयुक्त किए जाते हैं। जब लिगन्ड के नाम में आंकिक पूवर् लग्न हो तब बिस, टिªस, टेट्राकिस आदि शब्द ;पदद्ध प्रयुक्त होते हैं तथा ऐसे लिगन्ड कोष्ठक में लिखे जाते हैं। उदाहरणाथर्, ख्छपब्स2;च्च्ी3द्ध2, का नाम होगा - डाइक्लोरोबिस ;ट्राइप़्ोफनिलपफाॅस्पफीनद्धनिवैफल ;प्प्द्ध ;अद्ध ध्नावेश्िात, ट्टणावेश्िात तथा उदासीन उपसहसंयोजन सत्ता में धतु की आॅक्सीकरण अवस्था को रोमन अंकों में कोष्ठक में दशार्ते हैं। ;अपद्ध यदि संवुफल आयन एक ध्नायन हो तो धतु का नाम वही लिखते हैं जो तत्व का नाम होता है। उदाहरणाथर्, ध्नावेश्िात संवुफल आयन में ब्व को कोबाल्ट तथा च्ज को प्लैटिनम कहते हैं। यदि संवुफल आयन एक ट्टणायन हो तो धातु के नाम के अन्त में अनुलग्न - ऐट ;ंजमद्ध लगाया जाता है। उदाहरणाथर्, संवुफल ट्टणायन ⎡⎣ब्व ;ैब्छ द्ध4 ⎤2− ⎦ में ब्व को कोबाल्टेट कहते हैं। वुफछ धातुओं के लिए उनके संवुफल ट्टणायनों के नाम में धतु के लेटिन नाम प्रयुक्त होते हैं, उदाहरणाथर्, थ्म के लिए पेफरेट। ;अपपद्ध उदासीन संवुफल का नाम भी संवुफल ध्नायन की भांति ही लिखा जाता है। निम्नलिख्िात उदाहरण उपसहसंयोजन यौगिकों की नामकरण प्रणाली स्पष्ट करते हैं - 1.ख्ब्त;छभ् द्ध;भ्व्द्ध,ब्सका नाम निम्नलिख्िात होगाकृ 332 33 ट्राइऐम्मीनट्राइएक्वाव्रफोमियम ;प्प्प्द्ध क्लोराइड स्पष्टीकरणकृ संवुफल आयन गुरू कोष्ठक में है, जो एक ध्नायन है। अंग्रेशी वणर् माला के व्रफमानुसार ऐम्मीन लिगन्ड एक्वा लिगन्ड से पूवर् लिखे जाते हैं। चूँकि इसमें तीन क्लोराइड आयन हैं इसलिए संक्ुफल आयन पर ़3 आवेश होना चाहिए। ;चूँकि यौगिक आवेश की दृष्िट से उदासीन हैद्ध संक्ुफल आयन पर विद्यमान आवेश तथा लिगन्डों पर उपस्िथत आवेश के आधर पर धतु की आॅक्सीकरण संख्या की गणना की जा सकती है। इस उदाहरण में सभी लिगन्ड उदासीन अणु हैं। अतः क्रोमियम का आॅक्सीकरण अंक वही होगा जो संवुफल आयन पर उपस्िथत आवेश है, यहाँ यह ़ 3 है। 2ण् ख्ब्व;भ्छब्भ्ब्भ्छभ्द्ध,;ैव्द्ध का नाम निम्नलिख्िात होगा - 22223243टिªस;एथेन - 1, 2 - डाइऐमीनद्धकोबाल्ट ;प्प्प्द्ध सल्पेफट स्पष्टीकरणकृ इस अणु में सल्पेफट प्रतिआयन है, क्योंकि यहाँ तीन सल्पेफट आयन दो जटिल आयनों से आबंध्ित हैं, अतः प्रत्येक संवुफल ध्नायन पर ़3 आवेश होगा। इसके अतिरिक्त एथेन - 1,2 - डाइऐमीन एक उदासीन अणु है, अतः संवुफल आयन में कोबाल्ट की आॅक्सीकरण संख्या ़3 ही होनी चाहिए। यह स्मरण रहे कि एक आयनिक यौगिक के नाम में कभी भी ध्नायनों और ट्टणायनों की संख्या नहीं दशार्इर् जाती। 3.ख्।ह;छभ्3द्ध2,ख्।ह;ब्छद्ध2, का नाम निम्नलिख्िात होगाकृ डाइऐम्मीनसिल्वर;प्द्धडाइसायनोअजेर्न्टेट;प्द्ध 9.4 उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता 9.4.1 ज्यामितीय समावयवता समपक्ष समावयव ;बपेद्ध विपक्ष समावयव ;जतंदेद्ध चित्रा 9.2 - ख्च्ज;छभ्3द्ध2ब्स2, के ज्यामितीय समावयव ;समपक्ष एवं विपक्षद्ध समावयवी ऐसे दो या इससे अध्िक यौगिक होते हैं जिनके रासायनिक सूत्रा समान होते हैं परंतु परमाणुओं की व्यवस्था भ्िान्न होती है। परमाणुओं की भ्िान्न व्यवस्थाओं के कारण इनके एक या अध्िक भौतिक अथवा रासायनिक गुणों में भ्िान्नता होती है। उपसहसंयोजन यौगिकों में दो प्रमुख प्रकार की समावयवताएं ज्ञात हैं। इनमें से प्रत्येक को पुनः प्रविभाजित किया जा सकता है। 1 त्रिाविम समावयवता ;कद्ध ज्यामितीय समावयवता ;खद्ध ध््रुवण समावयवता 2 संरचनात्मक समावयवता ;कद्ध बंध्नी समावयवता ;गद्ध आयनन समावयवता ;खद्ध उपसहसंयोजन समावयवता ;घद्ध विलायकयोजन समावयवता त्रिाविमीय समावयवों के रासायनिक सूत्रा व रासायनिक आबंध् समान होते हैं परंतु उनकी दिव्फ - स्थान व्यवस्थाएं भ्िान्न होती हैं। संरचनात्मक समावयवों में आबंध् भ्िान्न होते हैं। इन समावयवों का वणर्न विस्तार से नीचे किया जा रहा है। इस प्रकार की समावयवता हेट्रोलेप्िटक संवुफलों में पाइर् जाती है जिनमें लिगन्डों की भ्िान्न ज्यामितीय व्यवस्थाएं संभव हो सकती हैं। इस प्रकार के व्यवहार के प्रमुख उदाहरण 4 व 6 उपसहसंयोजन संख्या वाले संवुफलों में पाए जाते हैं। ख्डग्2स्2, सूत्रा ;ग् तथा स् एकदंतुर लिगन्ड हैंद्ध के वगर् समतली संवुफल में दो ग् लिगन्ड समपक्ष ;बपेद्ध समावयव में पास - पास जुड़े रहते हंै अथवा विपक्ष ;जतंदेद्ध समावयव में एक - दूसरे के विपरीत जैसा चित्रा 9.2 में दशार्या गया है। ड।ठग्स् ;जहाँ ।ए ठए ग्ए स् एकदंतुर लिगन्ड हैंद्ध सूत्रा वाले दूसरी प्रकार के वगर् समतलीय संवुफल के तीन समावयव होंगे - दो समपक्ष तथा एक विपक्ष। आप इनकी संरचनाएं बनाने का प्रयास कर सकते हैं। इस प्रकार की समावयवता चतुष्पफलकीय ज्यामिति में संभव नहीं है परंतु ख्डग्2स्4, सूत्रा वाले अष्टपफलकीय संवुफलों में, जिनमें दो लिगन्ड ग् एक - दूसरे के समपक्ष या विपक्ष होंऋ ऐसा व्यवहार संभव है ;चित्रा 9.3द्ध। समपक्ष समावयव विपक्ष समावयव चित्रा 9.3 - ख्ब्व;छभ्3द्ध4ब्स2,़ के ज्यामितीय समावयव ;समपक्ष एवं विपक्षद्ध इस प्रकार की समावयवता उन संवुफलों में भी पाइर् जाती है जिनका सूत्रा ख्डग्2;स्दृस्द्ध2, होता है तथा जिनमें द्विदंतुर लिगन्ड स्दृस् होते हैं। उदाहरणाथर्, ख्छभ्2ब्भ्2ब्भ्2छभ्2;मदद्ध, में ;चित्रा 9.4द्ध। ख्डंइ , प्रकार के अष्टपफलकीय उपसहसंयोजन सत्ता जैसे ख्ब्व;छभ्3द्ध3;छव्2द्ध3, में 33एक अन्य प्रकार की ज्यामितीय समावयवता पाइर् जाती है। यदि एक ही लिगन्ड के तीन निकटवतीर् दाता परमाणु अष्टपफलकीय पफलक के कोनों पर स्िथत हों तो पफलकीय ख्ंिबपंसए ;ंिबद्ध, समावयवी प्राप्त होते हैं। यदि ये तीन दाता परमाणु अष्टपफलक के ध््रुववृत्त पर स्िथत हों तो रेखांश्िाक ख्उमतपकपवदंस ;उमतद्ध, समावयवी प्राप्त होते हैं। ;चित्रा 9.5द्ध। समपक्ष समावयव विपक्ष समावयव समावयव समावयव चित्रा 9.4 - ख्ब्वब्स2;मदद्ध2, के ज्यामितीय समावयव चित्रा 9.5 - ब्व;छभ्3द्ध3;छव्2द्ध3, के पफलकीय ;ंिबद्ध ;समपक्ष एवं विपक्षद्ध तथा रेखांश्िाक ;उमतद्ध समावयवी 9.4.2 ध््रुवण समावयवता ध््रुवण समावयव एक - दूसरे के दपर्ण प्रति¯बब होते हैं जिन्हें एक - दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। इन्हें प्रतिबिंब रूप या एनैन्िटओमर ;मदंदजपवउमतेद्ध कहते हैं। अणु अथवा आयन जो एक - दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किए जा सकते, काइरल ;बीपतंसद्ध कहलाते हैं। ये दो रूप दक्ष्िाण - ध््रुवण घूणर्क ;कद्ध और वामावतीर् ;सद्ध कहलाते हैं, यह इस बात पर निभर्र करता है कि ये ध्ु्रवणमापी ;चवसंतपउमजमतद्ध में समतल ध््रूवित प्रकाश को किस दिशा में घूण्िार्त करते हैं ;क दाईं तरप़फ घूण्िार्त करता है तथा स बाईं तरप़फद्ध। प्रकाश्िाक समावयवता सामान्य रूप से द्विदंतुर लिगन्ड युक्त अष्टपफलकीय संवुफलों में पाइर् जाती है ;चित्रा 9.6द्ध। ख्च्जब्स2;मदद्ध2,2़ के समान उपसहसंयोजक समूह में केवल समपक्ष रूप प्रकाश्िाक समावयवता दशार्ता है ;चित्रा 9.7द्ध। ,3़चित्रा 9.6 - ख्ब्व;मदद्ध3 के ध््रुवण समावयव ;क तथा सद्ध दक्ष्िाण ध््रुवण घूणर्क दपर्ण वामावतीर् ,2़चित्रा 9.7 - समपक्ष, ख्च्ज ब्स2 ;मदद्ध2 के ध्रुवण समावयव ;क तथा सद्ध 9.4.3 बंधनी समावयवता 9.4.4 उपसहसंयोजन समावयवता 9.4.5 आयनन समावयवता उभयदंती संलग्नी युक्त उपसहसंयोजन यौगिक में बंध्नी समावयवता पाइर् जाती है। इस प्रकार की समावयवता का एक सरल उदाहरण हैकृ थायोसायनेट लिगन्ड, छब्ैदृए युक्त संवुफल यह लिगन्ड नाइट्रोजन द्वारा धतु से बंध्ित हो कर डदृछब्ै तथा सल्पफर द्वारा बंध्ित होकर डदृैब्छ देता है। जाॅरजेनसेन ने ख्ब्व;छभ्3द्ध5;छव्2द्ध,ब्स2ए संवुफल में इस प्रकार के व्यवहार की खोज की। संवुफल, जिसमें नाइट्राइट लिगन्ड आॅक्सीजन के द्वारा ;दृव्छव्द्ध धातु से जुड़ा रहता है, लाल रंग का होता है तथा जिसमें नाइट्राइट लिगन्ड नाइट्रोजन ;दृछव्2द्ध के द्वारा धतु से जुड़ता है, पीले रंग का होता है। किसी संवुफल में उपस्िथत भ्िान्न धतुओं की ध्नायनिक एवं ट्टणायनिक उपसहसंयोजन सत्ता के मध्य लिगन्डों के अंतरपरिवतर्न से इस प्रकार की समावयवता उत्पन्न होती है। संवुफल ख्ब्व;छभ्3द्ध6,ख्ब्त;ब्छद्ध6, इसका एक उदाहरण है, जिसमें छभ्3 लिगन्ड ब्व3़ से बंिात हैं तथा ब्छदृ लिगन्ड ब्त3़ से। इसके उपसहसंयोजन समावयव ख्ब्त;छभ्3द्ध6,ख्ब्व;ब्छद्ध6, 3़ दृ3़में, छभ्3 लिगन्ड ब्त से जुड़े हैं तथा ब्छ लिगन्ड ब्व से। जब किसी संवुफल में उसका प्रतिआयन स्वयं एक संभावित लिगन्ड हो तथा किसी लिगन्ड को प्रतिस्थापित कर सके और विस्थापित लिगन्ड प्रतिआयन बन सके, तो इस प्रकार की समावयवता उत्पन्न होती है। संवुफल ख्ब्व;छभ्द्धैव्,ठत तथा ख्ब्व;छभ्द्धठत,ैव्354 354 आयनन समावयवता के उदाहरण हैं। 9.4.6 विलायकयोजन समावयवता जब जल विलायक के रूप में प्रयुक्त होता है तो इस प्रकार की समावयवता ‘हाइड्रेट समावयवता’ कहलाती है। यह आयनन समावयवता के समान है। विलायकयोजन समावयवों में केवल इतना अंतर होता है कि एक समावयव में विलायक अणु धतु आयन से लिगन्ड के रूप में सीध बंध्ित रहता है तथा दूसरे समावयव में विलायक अणु संवुफल के वि्रफस्टल जालक में मुक्त रूप से विद्यमान रहता है। इस प्रकार का एक उदाहरण हैकृ एक्वासंवुफल ख्ब्त;भ्2व्द्ध6,ब्स3 ;बैंगनीद्ध तथा इसका विलायकयोजन समावयव ख्ब्त;भ्व्द्धब्स,ब्सण्भ्व् ;भूरा - हराद्ध।25229.5 उपसहसंयोजन उपसहसंयोजक यौगिकों में आबंध्न की प्रवृफति का वणर्न सवर्प्रथम वनर्र ने किया था। परंतु यौगिकों में यह सि(ांत निम्न आधरभूत प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सका - ;पद्ध क्यों वुफछ ही तत्वों में उपसहसंयोजन यौगिक बनाने का विश्िाष्ट गुण पाया जाता है? आबंधन ;पपद्ध उपसहसंयोजन यौगिकों के आबंधें में दिशात्मक गुण क्यों पाए जाते हैं? ;पपपद्ध क्यों उपसहसंयोजन यौगिकों में विश्िाष्ट चुंबकीय तथा ध््रुवण घूणर्क गुण पाए जाते हैं? उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंध्न की प्रवृफति को समझने के लिए अनेक प्रस्ताव दिए गए यथा संयोजकता आबंध् सि(ांत ;टठज्द्धए वि्रफस्टल क्षेत्रा सि(ांत ;ब्थ्ज्द्धए लिगन्ड क्षेत्रा सि(ांत ;स्थ्ज्द्धए आण्िवक कक्षक सि(ांत ;डव्ज्द्ध। हम यहाँ केवल टठज् तथा ब्थ्ज् के प्राथमिक विवेचन पर ही अपना ध्यान वेंफदि्रत करेंगे। 9.5.1 संयोजकता आबंध इस सि(ांत के अनुसार, लिगन्डों के प्रभाव में धतु परमाणु/ आयन अपने ;द.1द्धकए देए दच सि(ांत अथवा देए दचए दक कक्षकों का उपयोग संकरण के लिए कर सकता है जिससे विभ्िान्न ज्यामितियों जैसे अष्टपफलकीय, चतुष्पफलकीय, वगर् समतली आदि के समकक्ष कक्षक उपलब्ध् हो सकें ;सारणी 9.2द्ध। ये संकरित कक्षक उन लिगन्ड कक्षकों के साथ अतिव्यापन करते हैं जो अपना इलेक्ट्राॅन युगल आबंध्न के लिए इन्हें दान करते हैं। इसे निम्न उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया गया है। सारणी 9ण्2 - कक्षकों की संख्या तथा संकरणों के प्रकार संयोजकता आबंध् सि(ांत के आधर पर संवुफल के चुंबकीय व्यवहार से सामान्यतः इसकी ज्यामिति का अनुमान लगाया जा सकता है। प्रतिचुंबकीय अष्टपफलकीय संवुफल ख्ब्व;छभ्3द्ध6,3़ में, कोबाल्ट आयन ़3 आॅक्सीकरण अवस्था में है तथा इसका इलेक्ट्राॅनिक विन्यास 3क 6 है। इसकी संकरण योजना निम्न प्रकार से है - छः छभ्3 अणुआंे से प्रत्येक का एक इलेक्टाॅन युगल छः संकरित कक्षकों में स्थान ग्रहण करता है। इस प्रकार संवुफल की ज्यामिति अष्टपफलकीय है तथा अयुगलित इलेक्ट्राॅनों की अनुपस्िथति के कारण यह प्रतिचुंबकीय है। इस संवुफल के निमार्ण के लिए संकरण में आंतरिक क कक्षक ;3कद्ध प्रयुक्त होते हैं, संवुफल, ख्ब्व;छभ्3द्ध6,3़ आंतरिक कक्षक संवुफल ;पददमत वतइपजंस बवउचसमगद्ध या निम्न प्रचव्रफण संवुफल ;सवू ेचपद बवउचसमगद्ध या प्रचव्रफण युग्िमत संवुफल ;ेचपद चंपतमक बवउचसमगद्ध कहलाता है। अनुचुंबकीय 3दृ32अष्टपफलकीय संवुफल, ख्ब्वथ्6, संकरण ;ेच क द्ध के लिए बाह्य कक्षक ;4क द्ध प्रयुक्त करता है। इसीलिए यह बाह्य कक्षक ;वनजमत वतइपजंसद्ध या उच्च प्रचव्रफण ;ीपही ेचपदद्ध या प्रचव्रफण मुक्त संवुफल ;ेचपद तिमम बवउचसमगद्ध कहलाता है। इस प्रकार - चतुष्पफलकीय संवुफलों में एक े तथा तीन च कक्षक के संकरण से चार समतुल्य कक्षक बनते हैं जो चतुष्पफलकीय रूप से अभ्िाविन्यासित होते हैं। यह ख्छपब्स4,2दृ के लिए नीचे दशार्या गया है। यहाँ निवैफल ़2 आॅक्सीकरण अवस्था में है तथा आयन का इलेक्ट्राॅनिक विन्यास 3क 8 है। इसकी संकरण योजना को अगले पृष्ठ पर चित्रा में दशार्या गया है। प्रत्येक ब्सदृ आयन एक इलेक्ट्राॅन युगल दान करता है। दो अयुगलित इलेक्ट्राॅनों की उपस्िथति के कारण यौगिक अनुचुंबकीय है। इसी प्रकार, ख्छप;ब्व्द्ध4, की ज्यामिति चतुष्पफलकीय परंतु प्रतिचुंबकीय है, क्योंकि निवैफल शून्य आॅक्सीकरण अवस्था में है तथा इसमें अयुगलित इलेक्ट्राॅन नहीं हैं। 9.5.2 उपसहसंयोजन यौगिकों के चुंबकीय गुण प्रत्येक संकरित कक्षक एक सायनाइड आयन से एक इलेक्ट्राॅन युगल प्राप्त करता है। अयुगलित इलेक्ट्राॅनों की अनुपस्िथति के कारण संवुफल प्रतिचुंबकीय है। यह मुख्य रूप से ध्यान देने योग्य है कि संकरित कक्षकों का वास्तविक अस्ितत्व नहीं है। वास्तव में, संकरण प्रयुक्त परमाणु कक्षकों के तरंग पफलन का एक गण्िातीय परिचालन है। उपसहसंयोजन यौगिकों के चुंबकीय आघूणर् का मापन चुंबकीय प्रवृिा ;उंहदमजपब ेनेबमचजपइपसपजलद्ध प्रयोगों द्वारा किया जा सकता है। इसके परिणामों का उपयोग संवुफलों की संरचनाओं की जानकारी के लिए किया जा सकता है। प्रथम संव्रफमण श्रेणी के धतुओं के उपसहसंयोजन यौगिकों के चुंबकीय आँकड़ों का विवेचनात्मक अध्ययन वुफछ जटिलता दशार्ता है। धतु आयनों के लिए जिनके क कक्षकों में 3़13़23़3तीन तक इलेक्ट्राॅन होते हैं, जैसे ज्प ;क द्धय ट ;क द्धय ब्त ;क द्धय इनमें 4े तथा 4च के कक्षकों के साथ अष्टपफलकीय संकरण हेतु दो क कक्षक उपलब्ध् हैं। इन मुक्त आयनों तथा इनकी उपसहसंयोजन सत्ता का चुंबकीय व्यवहार समान होता है। जब तीन से अध्िक 3क इलेक्ट्राॅन उपस्िथत हों तो अष्टपफलकीय संकरण हेतु आवश्यक 3क कक्षकों के युगल 4 2़ 3़5सीध्े उपलब्ध् नहीं होते ;हुंड के नियमानुसारद्ध। इस प्रकार, क ;ब्त ए डद द्धए क 2़3़6 2़ 3़;डद ए थ्म द्धए क ;थ्म ए ब्व द्ध के लिए रिक्त क कक्षकों के युगल क्ेफवल 3क इलेक्ट्राॅनों के युगलित होने से उपलब्ध होते हैं, पफलस्वरूप व्रफमशः दो, एक व शून्य अयुगलित इलेक्ट्राॅन बचे रहते हैं। अनेक स्िथतियों, विशेषतौर से क 6 युक्त आयनों के उपसहसंयोजन यौगिकों में, चुंबकीय मान उच्चतम प्रचव्रफण युग्मन से मेल खाते हैं। परंतु, क 4 और क 5 स्पीशीश से युक्त आयनांे के युक्त संवुफलों में जटिलताएं पाइर् जाती हैं। ख्डद;ब्छद्ध6,3दृ का चुंबकीय आघूणर् दो अयुगलित इलेक्ट्राॅनों क्ेफ कारण है जबकि ख्डदब्स6,3दृ का चुंबकीय आघूणर् चार अयुगलित इलेक्ट्राॅनों के कारण हैऋ ख्थ्म;ब्छद्ध6,3दृ का चुंबकीय आघूणर् एक अयुगलित इलेक्ट्रॅान के कारण है जबकि ख्थ्मथ्6,3दृ का अनुचुंबकीय आघूणर् पाँच अयुगलित इलेक्ट्राॅनों के लिए है। ख्ब्वथ्6,3दृ चार अयुगलित इलेक्ट्राॅन युक्त अनुचुंबकीय संवुफल आयन है जबकि ख्ब्व;ब्2व्4द्ध3,3दृ प्रतिचुंबकीय। यह असंगति संयोजकता आबंध् सि(ांत द्वारा आंतरिक कक्षक तथा बाह्य कक्षक संवुफलों के बनने के आधर पर स्पष्ट की जा सकती है। 3दृ3दृ 3दृख्डद;ब्छद्ध, ए ख्थ्म;ब्छद्ध, तथा ख्ब्व;ब्व्द्ध, आंतरिक कक्षक संवुफल हैं तथा66243प्रत्येक में धतु की संकरण अवस्था क 2 ेच 3 है। इनमें पहले दो संवुफल अनुचुंबकीय तथा 3दृ3दृ3दृतीसरा प्रतिचुंबकीय है। दूसरी ओर ख्डदब्स6, ए ख्थ्मथ्6, तथा ख्ब्वथ्6, बाह्य कक्षक संवुफल हैं जिनमें धतु की संकरण अवस्था ेच 3 क 2 है और इनकी अनुचुंबकीय प्रवृफति व्रफमशः चार, पाँच और चार अयुगलित इलेक्ट्राॅनों की उपस्िथति के कारण है। 9.5.3 संयोजकता आबंध सि(ांत की सीमाएं 9.5.4 िस्टल क्षेत्रा सि(ांत यद्यपि संयोजकता आबंध् सि(ांत ;टठज्द्धए उपसहसंयोजन यौगिकों के बनने तथा उनकी संरचनाओं एवं चुंबकीय व्यवहार का व्यापक स्तर पर स्पष्टीकरण देता है, पिफर भी इसमें निम्नलिख्िात कमियाँ हैं - ;पद्ध इसमें अनेक प्रकार के पूवार्नुमान हैं। ;पपद्ध यह चुंबकीय आँकड़ों की कोइर् मात्रात्मक व्याख्या नहीं देता। ;पपपद्ध यह उपसहसंयोजन यौगिकों द्वारा दशार्ए गए रंगों का स्पष्टीकरण नहीं देता। ;पअद्ध यह उपसहसंयोजन यौगिकों के उफष्मागतिकीय और गतिक स्थायित्व की कोइर् भी मात्रात्मक व्याख्या नहीं करता। ;अद्ध यह 4 समन्वयी संवुफलों के लिए चतुष्पफलकीय तथा वगर्समतल संरचनाओं का सही अनुमान नहीं लगा पाता। ;अपद्ध यह दुबर्ल तथा प्रबल लिगन्डों के मध्य विभेद नहीं करता। वि्रफस्टल क्षेत्रा सि(ांत ;ब्थ्ज्द्ध एक स्िथर वैद्युत माॅडल है जिसके अनुसार धतु - लिगन्ड आबंध् आयनिक होते हैं जो केवल धतु आयन तथा लिगन्ड के मध्य स्िथरवैद्युत अन्योन्य वि्रफयाओं द्वारा उत्पन्न होते हैं। ट्टणावेश्िात लिगन्डों को एक बिंदु आवेश के रूप में एवं उदासीन लिगन्डों को द्विध््रुवों के रूप में माना जाता है। किसी विलगित गैसीय धतु परमाणु/ आयन के पाँचों क.कक्षकों की उफजार् का मान बराबर होता है अथार्त ये अपभ्रष्ट ;कमहमदमतंजमद्ध अवस्था में होते हैं। यह अपभ्रष्ट अवस्था तब तक बनी रहती है जब तक कि धतु परमाणु/ आयन के चारों ओर ट्टणावेशों का एक गोलीयतः सममित क्षेत्रा रहता है। परंतु किसी संवुफल में जब यह ट्टणावेश्िात क्षेत्रा लिगन्डों के कारण ;या तो ट्टणायन या किसी द्विध््रुवीय अणु के ट्टणात्मक भाग जैसे छभ्3 या भ्2व्द्ध होता है तो असममित हो जाता है और ककक्षकों की समभ्रंश अवस्था ;कमहमदमतंबलद्ध समाप्त हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप ककक्षकों का विपाटन हो जाता है। यह विपाटन ;ेचसपजजपदहद्ध वि्रफस्टल क्षेत्रा की प्रवृफति पर निभर्र करता है। हम यहाँ विभ्िान्न वि्रफस्टल क्षेत्रों में विपाटन को स्पष्ट करेंगे। ;कद्ध अष्टपफलकीय उपसहसंयोजन समूहों में वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन एक अष्टपफलकीय उपसहसंयोजन सत्ता, जिसमें धतु परमाणु/आयन छः लिगन्डों द्वारा घ्िारा रहता है, में धतु के ककक्षकों के इलेक्ट्राॅनों तथा लिगन्डों के इलेक्ट्राॅनों ;या ट्टणावेशद्ध के मध्य प्रतिकषर्ण होता है। जब धतु का ककक्षक लिगन्ड से दूर न होकर सीध निदिर्ष्ट होता है तो प्रतिकषर्ण अध्िक होता है। इस प्रकारक2 − तथा क्र2 कक्षक, जो लिगन्ड की दिशा2 गल वाले अक्षों पर हैं, अध्िक प्रतिकषर्ण अनुभव करते हैं तथा उनकी उफजार् में वृि हो जाती है एवं क ए क और क कक्षक, जो अक्षों के मध्य निदिर्ष्ट होते हैं, की उफजार् गोलीयगलल्रग्रवि्रफस्टल क्षेत्रा की औसत उफजार् की तुलना में घट जाती है। इस प्रकार अष्टपफलकीय संवुफल में लिगन्ड इलेक्ट्राॅन - धतु इलेक्ट्राॅन प्रतिवफषर्णों के कारण ककक्षकों की अपभ्रष्टता ;कमहमदमतंबलद्ध हट जाती है तथा तीन निम्न उफजार् वाले, ज2ह कक्षकों तथा दो उच्च उफजार् वाले, म ह कक्षकों के दो समुच्चय बनते हैं। इस प्रकार समान उफजार् वाले कक्षकों का, लिगन्डों की निश्िचत ज्यामिति में उपस्िथति से दो समुच्चयों में विपाटन वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन ;बतलेजंस पिमसक ेचसपजजपदहद्ध कहलाता है तथा समुच्चयों की उफजार् के अंतर को Δ व ;यहाँ व अधेलिख्िात अष्टपफलक ;वबजंीमकतंसद्ध के लिए हैद्ध से दशार्ते हैं ;चित्रा 9.8द्ध। इस प्रकार दो म ह कक्षकों की उफजार् में ;3ध्5द्धΔ व के बराबर वृि होती है तथा तीन ज2ह कक्षकों की उफजार् में ;2ध्5द्धΔ व के बराबर कमी आती है। वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन, Δ वलिगन्ड तथा धतु आयन पर विद्यमान आवेश से उत्पÂ क्षेत्रा पर निभर्र करता है। वुफछ लिगन्ड प्रबल क्षेत्रा उत्पन्न कर सकते हैं तथा ऐसी स्िथति में विपाटन अध्िक होता है जबकि अन्य, दुबर्ल क्षेत्रा उत्पÂ करते हैं जिसके पफलस्वरूप ककक्षकों का विपाटन कम होता है। सामान्यतः लिगन्डों को उनके बढ़ती हुइर् क्षेत्रा प्रबलता के व्रफम में एक श्रेणी में निम्नानुसार व्यवस्िथत किया जा सकता हैकृ दृदृ दृदृ2दृदृदृ 2दृ दृ 4दृ प्ढ ठतढ ैब्छढ ब्सढ ै ढ थ्ढ व्भ्ढ ब्2व्4 ढ भ्2व्ढ छब्ैढ मकजं ढ छभ्3ढ मदढ ब्छदृढ ब्व् चित्रा 9.8 - अष्टपफलकीय वि्रफस्टल क्षेत्रा में ककक्षकों का विपाटन इस प्रकार की श्रेणी स्पेक्ट्रमी रासायनिक श्रेणी ;ेचमबजतवबीमउपबंस ेमतपमेद्ध कहलाती है। यह विभ्िान्न लिगन्डों के साथ बने संवुफलों द्वारा प्रकाश के अवशोषण पर आधारित प्रायोगिक तथ्यों द्वारा निधर्रित श्रेणी है। आइए, हम अष्टपफलकीय उपसहसंयोजन सत्ता में उपस्िथत धतु आयन के क कक्षकों में इलेक्ट्राॅनों के वितरण को समझें। स्पष्टतः, क इलेक्ट्राॅन निम्न उफजार् वाले किसी एक ज2ह कक्षक में जाएगा। क2 तथा क3 उपसहसंयोजन सत्ता में, हुंड के नियमानुसार क इलेक्ट्राॅन ज2ह कक्षकों में अयुगलित रहते हैं। क4 आयनों के लिए, इलेक्ट्राॅनिक विन्यास के प्रारूप की दो संभावनाएं हैं - ;पद्ध चतुथर् इलेक्ट्राॅन ज2ह कक्षकों में पहले से विद्यमान इलेक्ट्राॅन के साथ युगलित हो सकता है या ;पपद्ध यह म ह स्तर में स्थान ग्रहण कर, युग्मन ऊजार् के व्यय से बचता है। इनमें से कौन सी संभावना बनती है यह वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन, Δ व तथा युग्मन उफजार् च्;च् एक कक्षक में इलेक्ट्राॅन युग्मन के लिए आवश्यक उफजार् है।द्ध के तुलनात्मक परिमाण पर निभर्र करता है। निम्नलिख्िात दो विकल्प हैं - ;पद्ध यदि Δ व ढ च्ए हो तो चैथा इलेक्ट्राॅन किसी एक म ह कक्षक में जायेगा तथा अभ्िाविन्यास ज3 म1 प्राप्त होगा। लिगन्ड जिनके लिए Δ ढ च् होता है, दुबर्ल क्षेत्रा2ह ह वलिगन्ड कहलाते हैं और ये उच्च प्रव्रफण ;ीपही ेचपदद्ध संवुफल बनाते हैं। ;पपद्ध यदि Δ व झ च् हो तो, यह उफजार् की दृष्िट से अध्िक अनुवूफल होता है, अतः चैथा इलेक्ट्राॅन किसी एक ज कक्षक में जाएगा जिससे इलेक्ट्राॅनिक विन्यास ज 4 म0 प्राप्त होगा। लिगन्ड जो इस प्रकार का प्रभाव उत्पन्न करते हैं प्रबल क्षेत्रा लिगन्ड ;ेजतवदह पिमसक सपहंदकेद्ध कहलाते हैं तथा ये निम्न प्रचव्रफण संवुफल बनाते हैं। गणनाएं दशार्ती हैं कि क 4 से क 7 वाली उपसहसंयोजन सत्ता दुबर्ल क्षेत्रा संवुफलों की अपेक्षा प्रबल क्षेत्रा में अध्िक स्थायी होते हैं। 2ह2ह ह ;खद्ध चतुष्पफलकीय उपसहसंयोजन समूहों में वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन चतुष्पफलकीय सहसंयोजन सत्ता के विरचन में, क कक्षकों का विपाटन अष्टपफलकीय से उलटा ;चित्रा 9.9द्ध तथा कम होता है। समान धतु, समान लिगन्डों तथा समान धतु - लिगन्ड दूरी के लिए, यह दिखाया जा सकता है कि Δ ज त्र 4ध्9 Δ0, अतः कक्षकों की विपाटन उफजार् इतनी अध्िक नहीं होती जो इलेक्ट्राॅनों को युग्मन के लिए बाध्य करे। इसीलिए, निम्न प्रचव्रफण ;सवू ेचपदद्ध विन्यास विरले ही देखा जाता है। कगल कग्र कल्र ख्ज2 म ख् 2 5 ज क्षेत्रा में क कक्षकों की औसत ऊजार् 2ख् 22कक गदृ ल गख् मुक्त आयन के क कक्षक चतुष्पफलकीय िस्टल क्षेत्रा में क कक्षकों का विपाटन 9.5.5 उपसहसंयोजन इससे पहले के एकक में हमने पढ़ा कि संव्रफमण धतुओं के संवुफलों की एक विशेषता उनके रंगों का विस्तृत परास है। इसका अथर् है कि जब श्वेत प्रकाश प्रतिदशर् ;ैंउचसमद्ध में से यौगिकों में रंग होकर बाहर निकलता है तो ये उसका वुफछ भाग अवशोष्िात कर लेते हैं अतः बाहर निकलने वाला प्रकाश अब श्वेत नहीं रहता। संवुफल का रंग वह दिखाइर् देता है जो उसके द्वारा अवशोष्िात रंग का पूरक होता है। पूरक रंग अवशेष तरंग दैघ्यर् द्वारा उत्पन्न होता है। यदि संवुफल हरा रंग अवशोष्िात करता है, तो यह लाल दिखाइर् पड़ता है। सारणी 9.3 में विभ्िान्न अवशोष्िात तरंगदैघ्यर् ;वेवलेंथद्ध तथा प्रेक्ष्िात रंग के मध्य संबंध् दशार्या गया है। सारणी 9ण्3 - वुफछ उपसहसंयोजन सत्ताओं के प्रेक्ष्िात रंग तथा अवशोष्िात प्रकाश तरंगदैघ्यर् के बीच संबंध् उपसहसंयोजन यौगिकों में रंगों की व्याख्या वि्रफस्टल क्षेत्रा सि(ांत के आधर पर सहज ही की जा सकती है। संवुफल ख्ज्प;भ्2व्द्ध6,3़ का उदाहरण लें जो बैंगनी रंग का है। यह एक अष्टपफलकीय संवुफल है जिसमें धतु के क कक्षक का एक इलेक्ट्राॅन ;ज्प3़ एक 3क 1 निकाय खाली हैद्ध संवुफल की निम्नतम उफजार् अवस्था में ज 2ह कक्षक में है। इस इलेक्ट्राॅन के लिए उपलब्ध् इससे अगली उच्च अवस्था रिक्त म ह कक्षक है। यदि संवुफल पीले - हरे क्षेत्रा की उफजार् के संगत प्रकाश का अवशोषण करे तो इलेक्ट्राॅन ज2ह स्तर से म ह स्तर पर उत्तेजित हो 10 01जाता है ;ज म → जम द्ध । इसके पफलस्वरूप संवुफल बैंगनी दिखाइर् देता है ;चित्रा 9.10द्ध।2ह ह 2ह ह वि्रफस्टल क्षेत्रा सि(ांत यह मानता है कि उपसहसंयोजन यौगिकों का रंग इलेक्ट्राॅन के क.क संव्रफमण ;ज्तंदेपजपवदद्ध के कारण होता है। चित्रा 9.10 - ख्ज्प;भ्2व्द्ध6,3़ में एक इलेक्ट्राॅन का संव्रफमण ;ज्तंदेपजपवदद्ध मूल अवस्था उत्तेजित अवस्था यह ध्यान देना महत्वपूणर् है कि लिगन्ड की अनुपस्िथति में, वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन नहीं होता, अतः पदाथर् रंगहीन होता है। उदाहरणाथर्, ख्ज्प;भ्2व्द्ध6,ब्स3 को गरम करने पर इसमें से जल निकल जाने के कारण यह रंगहीन हो जाता है। इसी प्रकार अजलीय ब्नैव्4 श्वेत होता है परंतु ब्नैव्4 ण्5भ्2व् नीले रंग का होता है। संवुफल के रंग पर लिगन्ड के प्रभाव को ख्छप;भ्2व्द्ध6,2़ के उदाहरण द्वारा दशार्या जा सकता है। जो निवैफल ;प्प्द्ध क्लोराइड को जल में विलेय करने पर बनता है। यदि इसमें ध्ीरे - ध्ीरे द्विदंतुर लिगन्ड, एथेन - 1, 2 - डाइऐमीन ;मदद्धको आणविक अनुपातों, मदरूछपए 1रू1ए 2रू1ए 3रू1ए में मिलाया जाए तो निम्नलिख्िात अभ्िावि्रफयाएं तथा उनसे संब¯ध्त रंग परिवतर्न होते हैं। इस शंृखला को चित्रा 9.11 में दशार्या गया है - 2़ ख्छप;भ्2व्द्ध6,2़;ंुद्ध ़ मद ;ंुद्ध → ख्छप;भ्2व्द्ध4;मदद्ध, ;ंुद्ध ़ 2भ्2व्हरा हल्का नीला 2़ ख्छप;भ्व्द्ध ;मदद्ध,2़ ;ंुद्ध ़ मद ;ंुद्ध → ख्छप;भ्व्द्ध;मदद्ध, ;ंुद्ध ़ 2भ् व्24 2222 नीला/नीललोहित 2़ ख्छप;भ्2व्द्ध2;मदद्ध22़;ंुद्ध़ मद ;ंुद्ध → ख्छप;मदद्ध3, ;ंुद्ध ़ 2भ् व्, 2 बैंगनी चित्रा 9.11 - निवैफल ;प्प्द्धसंवुफलों के जलीय विलयन जिनमें एथेन - 1,2 - डाइऐमीन लिगन्ड बढ़ते हुए अनुपात में है। वुफछ रत्नों के रंग संव्रफमण धतु आयन के ककक्षकों के बीच इलेक्ट्राॅनों के संव्रफमण से रंग का उत्पन्न होना हमारे दैनिक जीवन में अक्सर दिखाइर् पड़ता है। माण्िाक्य ;त्नइलद्ध ;चित्रा 9.12 कद्ध, लगभग 0ण्5.1ः ब्त3़ आयन ;क3द्ध युक्त एलुमिनियम आॅक्साइड ;।प्2व्3द्ध है जिसमें ।स3़ के स्थान पर ब्त3़ आयन कहीं - कहीं बेतरतीब स्िथत रहते हैं। हम इन्हें ऐलुमिना के जालक में समावेष्िटत अष्टपफलकीय व्रफोमियम ;प्प्प्द्ध संवुफल के रूप में देख सकते हैं। इन वेंफद्रों पर क.क संव्रफमण के कारण माण्िाक्य में रंग उत्पन्न होता है। पन्ना ;मउमतंसकद्ध ;चित्रा 9.12 खद्ध में, ब्त3़आयन खनिज बैरिल ;ठम ।स ैप व् द्ध32 186 ;कद्ध ;खद्धमें अष्टपफलकीय स्थानों पर स्िथत रहते हैं। चित्रा 9.12 - ;कद्ध माण्िाक्य - यह रत्न मोगोक ;म्याँमारद्ध से प्राप्तमाण्िाक्य का पीला - लाल तथा नीला संगमरमर में पाया गयाऋ ;खद्ध पन्ना - यह रत्नअवशोषण - बैंड। उच्चतर तरंगदैघ्यर् की ओर कोलंबिया के म्यूशो ;डन्रवद्ध में पाया गया।विस्थापित हो जाता है। इसके कारण पन्ने से हरे रंग के क्षेत्रा वाला प्रकाश प्रसारित होता है। 9.5.6 िस्टल क्षेत्रा वि्रफस्टल क्षेत्रा माॅडल के द्वारा उपसहसंयोजन यौगिकों के बनने, उनकी संरचना, रंग तथा सि(ांत की चुंबकीय गुणों को काप़्ाफी हद तक सपफलतापूवर्क समझाया जा सकता है, परंतु इन अवधारणाओं से कि लिगन्ड बिंदु आवेश हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि ट्टणायन लिगन्ड द्वारा क कक्षकों कासीमाएं विपाटन सवार्ध्िक होना चाहिए। जबकि )णायन लिगन्ड वास्तव में स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी के निचले सिरे पर आते हैं। इसके अतिरिक्त यह सि(ांत लिगन्ड तथा वेंफद्रीय परमाणु के मध्य आबंध् की सहसंयोजक प्रवृिा का संज्ञान नहीं लेता। ये ब्थ्ज् की वुफछ कमशोरियाँ हैं जिन्हें लिगन्ड क्षेत्रा सि(ांत ;स्थ्ज्द्ध तथा आण्िवक कक्षक सि(ांत ;डव्ज्द्ध द्वारा समझाया जा सकता है। परंतु यह इस पुस्तक की सीमा के बाहर है। 9.6 धातु काबोर्निलो होमोलेप्िटक काबोर्निल ;यौगिक जिनमें केवल काबोर्निल लिगन्ड होंद्ध अिाकतर संव्रफमण धातुओं द्वारा निमिर्त होते हैं। इन काबोर्निलों की संरचनाएं सरल तथा सुस्पष्ट होती हैं।में आबंधन टेट्राकाबोर्निलनिवैफल ;0द्ध चतुष्पफलकीय है, पेन्टाकाबोर्निल आयरन ;0द्ध त्रिाकोणीय द्विपिरैमिडी है, जबकि हेक्साकाबोर्निलव्रफोमियम ;0द्ध अष्टपफलकीय है। डेकाकाबोर्निलडाइमैंगनीज ;0द्ध दो वगर् पिरैमिडी डद;ब्व्द्ध5 इकाइयों से बना है जो डद दृ डद आबंध् से जुड़ी रहती हैं। आॅक्टाकाबोर्निलडाइकोबाल्ट ;0द्ध में दो ब्व दृ ब्व आबंधें में प्रत्येक के मध्य एक ब्व् समूह सेतु के रूप में रहता है। ;चित्रा 9.13द्ध। ब्व्ब्व्ब्व् ब्व् ब्व्व्ब् ब्तछप थ्मब्व् व्ब् ब्व्व्ब् ब्व्ब्व् ब्व् ब्व्ब्व् ख्छप;ब्व्द्ध ,ख्थ्म;ब्व्द्ध ,ख्ब्त;ब्व्द्ध ,4 5 6 चतुष्पफलकीय त्रिाकोणीय द्विपिरैमिडी अष्टपफलकीय ब्व्ब्व् व् ब्व् ब्व् ब् व्ब् ब्व्व्ब् डद डदब्व्चित्रा 9.13 - वुफछ प्रतिनििाक होमोलेप्िटक व्ब्ब्व ब्वब्व् ब्व्धतु काबोर्निलों की संरचनाएं। ब्व् व्ब् ब्व्ब्व् ब्व् ब् ख्डद ;ब्व्द्ध ,2 10 व् ख्ब्व2;ब्व्द्ध8, 265 उपसहसंयोजन यौगिक धतु काबोर्निलों के धतु - काबर्न आबंध् में σ तथा π दोनों के गुण पाए जाते हैं। डदृब् σ आबंध् काबोर्निल समूह के काबर्न पर उपस्िथत इलेक्ट्राॅन युगल को धतु के रिक्त कक्षक में दान करने से बनता है। डदृब् π आबंध् धतु के पूरित क कक्षकों में से एक इलेक्ट्राॅन युगल को काबर्न मोनोक्साइड के रिक्त प्रतिआबंधन π ’ कक्षक में दान करने चित्रा 9.14 - काबोर्निल संवुफल में सहवि्रफयाशीलता से बनता है। धतु से लिगन्ड का आबंध् एक सहवि्रफयाशीलता आबंध्न अन्योन्यवि्रफया का उदाहरण। का प्रभाव उत्पन्न करता है जो ब्व् व धतु के मध्य आबंध् को मशबूत बनाता है ;चित्रा 9.14द्ध। 9.7 उपसहसंयोजन विलयन में संवुफल के स्थायित्व का अथर् है - साम्य अवस्था पर भाग ले रही दो स्पीशीश के मध्य संगुणन की मात्रा का मान। संगुणन के लिए साम्य स्िथरांक ;स्थायित्व या विरचनद्धयौगिकों का का परिमाण गुणात्मक रूप से स्थायित्व को प्रकट करता है। इस प्रकार, यदि हम निम्न प्रकारस्थायित्व की अभ्िावि्रफया को लें - ड ़4स् डस्4 तो साम्यस्िथरांक का मान जितना अध्िक होगा, डस्4 की विलयन में मात्रा उतनी ही अध्िक होगी। विलयन में मुक्त धतु आयनों का अस्ितत्व विरले ही होता है। अतः ड सामान्यतः विलायक अणुओं से घ्िारा होगा जो लिगन्ड अणुओं, स्, से प्रतिस्प(ार् करेंगे तथा ध्ीरे - ध्ीरे उनसे प्रतिस्थापित हो जाएंगे। आसानी के लिए हम सामान्यतः विलायक अणुओं की उपेक्षा कर देते हैं तथा चार स्थायित्व स्िथरांकों को निम्न प्रकार से लिखते हैं - ड ़स् डस् ज्ञ 1 त्र ख्डस्,ध्ख्ड,ख्स्, डस् ़ स् डस्2 ज्ञ 2 त्र ख्डस्2,ध्ख्डस्,ख्स्, डस् ़ स् डस् ज्ञ त्र ख्डस्,ध्ख्डस्,ख्स्,2 3332डस् ़ स् डस् ज्ञ त्र ख्डस्,ध्ख्डस्,ख्स्,3 4443यहाँ ज्ञ1ए ज्ञ2 आदि को पदशः स्थायित्व स्िथरांक ;ेजमचूपेम ेजंइपसपजल बवदेजंदजेद्ध कहते हैं। दूसरे रूप में, समग्र स्थायित्व स्िथरांक ;वअमतंसस ेजंइपसपजल बवदेजंदजद्ध को हम इस प्रकार लिख सकते हैं - 4 ड ़4स् डस्4 β 4 त्र ख्डस्4,ध्ख्ड,ख्स्, पदशः एवं समग्र स्थायित्व स्िथरांक के मध्य निम्न संबंध् होगा - βत्र ज्ञ× ज्ञ× ज्ञ× ज्ञ4या अध्िक सामान्य रूप में - 4 123 β त्र ज्ञ× ज्ञ× ज्ञ× ज्ञ ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ज्ञ द 1234द यदि हम क्यूप्रामोनियम आयन के विरचन के पदों का उदाहरण लेते हैं तो हमें निम्नलिख्िात पद प्राप्त होते हैं - 2़ 2़2़ ब्न2़ ़ छभ् ख्ब्न;छभ् द्ध, ज्ञ त्र ख्ब्न;छभ् द्ध, ध्ख्ब्न , ख्छभ्,3 31332़ 2़ द्ध2़ ख्ब्न;छभ् द्ध,2़ ़ छभ् ख्ब्न;छभ् द्ध, ज्ञ त्र ख्ब्न;छभ् द्ध, ध्ख्ब्न;छभ् ,ख्छभ्, इत्यादि।33 322 3233यहाँ ज्ञ 1ए ज्ञ 2 पदशः स्थायित्व स्िथरांक ;ेजमचूपेम ेजंइपसपजल बवदेजंदजद्ध तथा समग्र स्थायित्व स्िथरांक ;वअमतंसस ेजंइपसपजल बवदेजंदजद्ध हैं तथा - 2़2़ 4 βत्र ख्ब्न;छभ्द्ध, ध्ख्ब्न ,ख्छभ्, है।4 343काॅपर में चार ऐमीन समूहों का जुड़ना अिाकतर विरचन स्िथरांकों के इस पैटनर् ;च्ंजजमतदद्ध को दशार्ता है कि इनमें व्रफमिक स्थायित्व स्िथरांकों के मान घटते हैं। इस उदाहरण में चार स्िथरांकों के मान निम्न हैंकृ सवहज्ञ त्र 4ण्0य सवहज्ञ त्र 3ण्2य सवहज्ञ त्र 2ण्7य सवहज्ञत्र 2ण्0 या सवह β त्र 11ण्9 1234 4उपसहसंयोजन यौगिकों के अस्थायित्व स्िथरांक ;पदेजंइपसपजल बवदेजंदजद्ध अथवा वियोजन स्िथरांक ;कपेेवबपंजपवद बवदेजंदजद्ध विचरन स्िथरांक के व्युत्व्रफम होते हैं। 9.8 उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व तथा अनुप्रयोग उपसहसंयोजन यौगिक बहुत महत्व के हैं। ये यौगिक खनिजों, पेड़ - पौधें व जीव जगत में व्यापक रूप से पाए जाते हैं तथा विश्लेषणात्मक रसायन, धतुकमर्, जैविक प्रणालियों, उद्योगों तथा औषध् के क्षेत्रा में इनकी महत्वपूणर् भूमिकाएं हैं। इनका वणर्न नीचे किया गया है - ऽ गुणात्मक ;ुनंसपजंजपअमद्ध तथा मात्रात्मक ;ुनंदजंजपअमद्ध रासायनिक विश्लेषणों में उपसहसंयोजन यौगिकों के अनेक उपयोग हैं। अनेक परिचित रंगीन अभ्िावि्रफयाएं जिनमें धातु आयनों के साथ अनेक लिगन्डों ;विशेष रूप से कीलेट लिगन्डद्ध की उपसहसंयोजन सत्ता बनने के कारण रंग उत्पन्न होता है। चिरसम्मत ;बसंेेपबंसद्ध तथा यांत्रिाक ;पदेजतनउमदजंसद्ध विध्ियों द्वारा धतु आयनों की पहचान व उनके मात्रात्मक आकलन का आधर हैं। ऐसे अभ्िाकमर्कों के उदाहरण हैंकृ म्क्ज्।ए क्डळ ;डाइमेथ्िाल ग्लाइर्आॅक्सीमद्ध, α.नाइट्रोसो - β.नेफ्रथाॅल, क्यूपपेफराॅन आदि।़ ऽ जल की कठोरता का आकलन छं2म्क्ज्। के साथ अनुमापन द्वारा किया जाता है। ब्ं2़ व डह2़ आयन म्क्ज्। के साथ स्थायी संवुफल बनाते हैं। इन आयनों का चयनात्मक आकलन किया जा सकता है क्योंकि कैल्िसयम तथा मैग्नीश्िायम के संवुफलों के स्थायित्व स्िथरांक में अंतर होता है। ऽ धतुओं की वुफछ प्रमुख निष्कषर्ण विध्ियों में जैसे सिल्वर तथा गोल्ड के लिए संवुफल विरचन का उपयोग होता है। उदाहरणाथर्, आॅक्सीजन तथा जल की उपस्िथति में गोल्ड, दृसायनाइड आयन से संयोजित होकर जलीय विलयन में सहसंयोजन सत्ता, ख्।न;ब्छद्ध2, बनाता है। इस विलयन में जिंक मिलाकर गोल्ड को पृथक किया जा सकता है ;एकक 6द्ध। ऽ इसी प्रकार से धतुओं का शुिकरण उनके संवुफल बनाकर तथा उसे पुनः विघटित करके किया जा सकता है। उदाहरणाथर्, अशु( निवैफल को ख्छप;ब्व्द्ध4, में परिवतिर्त किया जाता है तथा इसे अपघटित कर शु( निकैल प्राप्त कर लेते हैं। ऽ उपसहसंयोजन यौगिक जैव तंत्रा में बहुत ही महत्वपूणर् हैं। प्रकाश संश्लेषण के लिए उत्तरदायी वणर्क, क्लोरोपिफल, मैग्नीश्िायम का उपसहसंयोजन यौगिक है। रक्त का लाल वणर्क हीमोग्लोबीन, जो कि आॅक्सीजन का वाहक है, आयरन का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। विटामिन ठ12 सायनाकोबालऐमीन, प्रतिप्रणाली अरक्तता कारक ;ंदजपचमतदपबपवने ंदंमउपं ंिबजवतद्ध, कोबाल्ट का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। जैविक महत्व के अन्य धतु आयन युक्त उपसहसंयोजन यौगिक जैसेकृ काबोर्क्सीपेप्िटडेज - । ;बंतइवगलचमचजपकंेम ।द्ध तथा काबोर्निक एनहाइड्रेज ;बंतइवदपब ंदीलकतंेमद्ध ;जैव प्रणाली के उत्प्रेरकद्ध एन्जाइम हैं। ऽ अनेक औद्योगिक प्रव्रफमों में उपसहसंयोजन यौगिकों का उपयोग उत्प्रेरकों के रूप में किया जाता है। उदाहरणाथर्, रोडियम संवुफल, ख्;च्ी3च्द्ध3त्ीब्स,ए एक विल्िकन्सन उत्प्रेरक है, जो एल्कीनों के हाइड्रोजनीकरण में उपयोग में आता है। ऽ वस्तुओं पर सिल्वर और गोल्ड का वैद्युत लेपन धतु आयनों के विलयन से करने की अपेक्षा उनके संवुफल आयनों ख्।ह;ब्छद्ध2,दृ तथा ख्।न;ब्छद्ध2,दृ के विलयन से करने पर लेपन कहीं अध्िक एकसार व चिकना होता है। ऽ श्याम - श्वेत प़फोटोग्रापफी में, विकसित की हुइर् पि़फल्म का स्थायीकरण ;पिगंजपवदद्ध हाइपो विलयन में धेकर किया जाता है, जो अनअपघटित ।हठत से संवुफल आयन, ख्।ह;ै2व्3द्ध2,3दृ बनाकर जल में घोल लेता है। ऽ औषध् रसायन में कीलेट चिकित्सा के उपयोग में अभ्िारुचि बढ़ रही है। इसका एक उदाहरण है - पौध्े/जीव जंतु निकायों में विषैले अनुपात में विद्यमान धतुओं के द्वारा उत्पन्न समस्याओं का उपचार। इस प्रकार काॅपर तथा आयरन की अिाकता को क्.पेनिसिलऐमीन तथा डेसपेफरीआॅक्िसम ठ लीगन्डों के साथ उपसहसंयोजन यौगिक बनाकर दूर किया जाता है। म्क्ज्। को लेड की विषाक्ता के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है। प्लेटिनम के वुफछ उपसहसंयोजन यौगिक ट्यूमर वृि को प्रभावी रूप से रोकते हैं। उदाहरण हैं - समपक्ष - प्लेटिन ;बपे.चसंजपदद्ध तथा संबंिात यौगिक। अभ्यास 9ण्1 वनर्र की अभ्िाधरणाओं के आधर पर उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंध्न को समझाइए। 9ण्2 थ्मैव् विलयन तथा ;छभ् द्धैव् विलयन का 1ः 1 मोलर अनुपात में मिश्रण थ्म2़ आयन का परीक्षण देता है परंतु4424ब्नैव्4 व जलीय अमोनिया का 1ः 4 मोलर अनुपात में मिश्रण ब्न2़ आयनो का परीक्षण नहीं देता। समझाइए क्यों? 9ण्3 प्रत्येक के दो उदाहरण देते हुए निम्नलिख्िात को समझाइए - समन्वय समूह, लिगन्ड, उपसहसंयोजन संख्या, उपसहसंयोजन बहुपफलक, होमोलेप्िटक तथा हेट्रोरोलेप्िटक। 9ण्4 एकदंतुर, द्विदंतुर तथा उभयदंतुर लिगन्ड से क्या तात्पयर् है? प्रत्येक के दो उदाहरण दीजिए। 9ण्5 निम्नलिख्िात उपसहसंयोजन सत्ता में धतुओं के आॅक्सीकरण अंक का उल्लेख कीजिए - 2़ 2दृ;पद्ध ख्ब्व;भ्व्द्ध;ब्छद्ध;मदद्ध, ;पपपद्ध ख्च्जब्स, ;अद्ध ख्ब्त;छभ् द्धब्स ,224 333;पपद्ध ख्ब्वठत2;मदद्ध2,़ ;पअद्ध ज्ञ3ख्थ्म;ब्छद्ध6, 9ण्6 प्न्च्।ब् नियमों के आधर पर निम्नलिख्िात के लिये सूत्रा लिख्िाए - ;पद्ध टेट्राहाइड्रोआॅक्सोजिंकेट;प्प्द्ध ;अपद्ध हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट;प्प्प्द्धसल्पेफट ;पपद्ध पोटैश्िायम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट;प्प्द्ध ;अपपद्ध पोटैश्िायम ट्राइ;आक्सैलेटोद्धक्रोमेट;प्प्प्द्ध ;पपपद्ध डाइऐम्मीनडाइक्लोरिडो प्लेटिनम;प्प्द्ध ;अपपपद्ध हेक्साऐम्मीनप्लैटिनम;प्टद्ध ;पअद्ध पोटैश्िायम टेट्रासायनिडोनिवैफलेट;प्प्द्ध ;पगद्ध टेट्राब्रोमिडो क्यूप्रेट;प्प्द्ध ;अद्ध पेन्टाऐम्मीननाइटिªटो.व्.कोबाल्ट;प्प्प्द्ध ;गद्ध पेन्टाऐम्मीननाइटिªटो.छ.कोबाल्ट;प्प्प्द्ध 9ण्7 प्न्च्।ब् नियमों के आधर पर निम्नलिख्िात के सुव्यवस्िथत नाम लिख्िाए - ;पद्ध ख्ब्व;छभ् द्ध,ब्स;पअद्ध ख्ब्व;छभ् द्धब्स;छव् द्ध,ब्स ;अपपद्ध ख्छप;छभ् द्ध,ब्स363 342362 2़ 3़;पपद्ध ख्च्ज;छभ् द्धब्स;छभ् ब्भ् द्ध,ब्स ;अद्ध ख्डद;भ्व्द्ध, ;अपपपद्ध ख्ब्व;मदद्ध,32232633़ 2दृ;पपपद्ध ख्ज्प;भ्व्द्ध, ;अपद्ध ख्छपब्स, ;पगद्ध ख्छप;ब्व्द्ध,264 49ण्8 उपसहसंयोजन यौगिकों के लिए संभावित विभ्िान्न प्रकार की समावयवताओं को सूचीब( कीजिए तथा प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए। 9ण्9 निम्नलिख्िात उपसहसंयोजन सत्ता में कितने ज्यामितीय समावयव संभव हैं? 3दृ;कद्ध ख्ब्त;ब्2व्4द्ध3, ;खद्ध ख्ब्व;छभ्3द्ध3ब्स3, 9ण्10 निम्न के प्रकाश्िात समावयवों की संरचनाएं बनाइए - 3दृ2़ ़;पद्ध ख्ब्त;ब्व्द्ध, ;पपद्ध ख्च्जब्स;मदद्ध, ;पपपद्ध ख्ब्त;छभ्द्धब्स;मदद्ध,24322 3229ण्11निम्नलिख्िात के सभी समायवों ;ज्यामितीय व ध््रुवणद्ध की संरचनाएं बनाइए - ़ 2़़;पद्ध ख्ब्वब्स;मदद्ध, ;पपद्ध ख्ब्व;छभ्द्धब्स;मदद्ध, ;पपपद्ध ख्ब्व;छभ्द्धब्स;मदद्ध,2 2323229ण्12 ख्च्ज;छभ्3द्ध;ठतद्ध;ब्सद्ध;चलद्ध, के सभी ज्यामितीय समावयव लिख्िाए। इनमें से कितने ध््रुवण समावयवता दशार्एंगे? 9ण्13 जलीय काॅपर सल्पेफट विलयन ;नीले रंग काद्ध, निम्नलिख्िात प्रेक्षण दशार्ता है - ;पद्ध जलीय पोटैश्िायम फ्रलुओराइड के साथ हरा रंग ;पपद्ध जलीय पोटैश्िायम क्लोराइड के साथ चमकीला हरा रंग उपरोक्त प्रायोगिक परिणामों को समझाइए। 9ण्14 काॅपर सल्पेफट के जलीय विलयन में जलीय ज्ञब्छ को आध्िक्य में मिलाने पर बनने वाली उपसहसंयोजन सत्ता क्या होगी? इस विलयन में जब भ्2ै गैस प्रवाहित की जाती है तो काॅपर सल्पफाइड का अवक्षेप क्यों नहीं प्राप्त होता? 9ण्15 संयोजकता आबंध् सि(ांत के आधर पर निम्नलिख्िात उपसहसंयोजन सत्ता में आबंध् की प्रवृफति की विवेचना कीजिए - 4दृ 3दृ 3दृ3दृ;कद्ध ख्थ्म;ब्छद्ध, ;खद्ध ख्थ्मथ्, ;गद्ध ख्ब्व;ब्व्द्ध, ;घद्ध ख्ब्वथ्,66 24369ण्16 अष्टपफलकीय वि्रफस्टल क्षेत्रा में क कक्षकों के विपाटन को दशार्ने के लिए चित्रा बनाइए। 9ण्17 स्पेक्ट्रमीरासायनिक श्रेणी क्या है? दुबर्ल क्षेत्रा लिगन्ड तथा प्रबल क्षेत्रा लिगन्ड में अंतर स्पष्ट कीजिए। 9ण्18 वि्रफस्टल क्षेत्रा विपाटन उफजार् क्या है? उपसहसंयोजन सत्ता में क कक्षकों का वास्तविक विन्यास Δ व के मान के आधार पर कैसे निधर्रित किया जाता है? 9ण्19 ख्ब्त;छभ्3द्ध6,3़ अनुचुंबकीय है जबकि ख्छप;ब्छद्ध4,2दृ प्रतिचुंबकीय, समझाइए क्यों? 9ण्20 ख्छप;भ्2व्द्ध6,2़ का विलयन हरा है परंतु ख्छप;ब्छद्ध4,2दृ का विलयन रंगहीन है। समझाइए। 9ण्21 ख्थ्म;ब्छद्ध6,4दृ तथा ख्थ्म;भ्2व्द्ध6,2़ के तनु विलयनों के रंग भ्िान्न होते हैं। क्यों? 9ण्22 धतु काबोर्निलों में आबंध् की प्रवृफति की विवेचना कीजिए। 9ण्23 निम्न संवुफलों में वेंफद्रीय धतु आयन की आॅक्सीकरण अवस्था, क कक्षकों का अध्िग्रहण एवं उपसहसंयोजन संख्या बतलाइए - ;पद्ध ज्ञख्ब्व;ब्व्द्ध, ;पपपद्ध;छभ्द्धख्ब्वथ्,;पपद्ध बपे.ख्ब्त;मदद्धब्स,ब्स ;पअद्ध ख्डद;भ्व्द्ध,ैव्3 24342422 264 9ण्24 निम्न संवुफलों के प्न्च्।ब् नाम लिख्िाए तथा आॅक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्राॅनिक विन्यास और उपसहसंयोजन संख्या दशार्इए। संवुफल का त्रिाविम रसायन तथा चुंबकीय आघूणर् भी बतलाइएः ;पद्ध ज्ञख्ब्त;भ्व्द्ध;ब्व्द्ध,ण्3भ्व् ;पपपद्ध ख्ब्व;छभ्द्धब्स ,ब्स;अद्ध ज्ञख्डद;ब्छद्ध,222422 35.2 46;पपद्ध ख्ब्तब्स;चलद्ध, ;पअद्ध ब्ेख्थ्मब्स,3 349ण्25 उपसहसंयोजन यौगिक के विलयन में स्थायित्व से आप क्या समझते हैं? संवुफलों के स्थायित्व को प्रभावित करने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए। 9ण्26 वफीलेट प्रभाव से क्या तात्पयर् है? एक उदाहरण दीजिए। 9ण्27 प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिख्िात में उपसहसंयोजन यौगिकों की भूमिका की संक्ष्िाप्त विवेचना कीजिए - ;पद्ध जैव प्रणालियाँ ;पपपद्ध विश्लेषणात्मक रसायन ;पपद्धऔषध् रसायन ;पअद्ध धतुओं का निष्कषर्ण/धतु कमर्। 9ण्28 संवुफल ख्ब्व;छभ्3द्ध6,ब्स2 से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे - ;पद्ध 6 ;पपद्ध 4 ;पपपद्ध 3 ;पअद्ध 2 9ण्29 निम्नलिख्िात आयनों में से किसके चुंबकीय आघूणर् का मान सवार्ध्िक होगा? 3़ 2़2़;पद्ध ख्ब्त;भ्व्द्ध, ;पपद्ध ख्थ्म;भ्व्द्ध, ;पपपद्ध ख्र्द;भ्व्द्ध,26 26269ण्30 ज्ञख्ब्व;ब्व्द्ध4, में कोबाल्ट की आॅक्सीकरण संख्या हैकृ ;पद्ध ़1 ;पपद्ध ़3 ;पपपद्ध दृ1 ;पअद्ध दृ3 9ण्31 निम्न में सवार्ध्िक स्थायी संवुफल है - 3़ 3़ 3दृ3दृ;पद्ध ख्थ्म;भ्व्द्ध, ;पपद्ध ख्थ्म;छभ्द्ध, ;पपपद्ध ख्थ्म;ब्व्द्ध, ;पअद्ध ख्थ्मब्स,26 3624369ण्32 निम्नलिख्िात के लिए दृश्य प्रकाश में अवशोषण की तरंगदैध्यर् का सही व्रफम क्या होगा? 4दृ2़ 2़ ख्छप;छव्द्ध, ए ख्छप;छभ्द्ध, ए ख्छप;भ्व्द्ध,263626पाठ्यनिहित प्रश्नों केेे उत्तर दृ 9ण्1 ;पद्ध ख्ब्व;छभ् द्ध;भ्व्द्ध,ब्स;पअद्ध ख्च्ज;छभ् द्धठतब्स;छव् द्ध,34 223 32;पपद्ध ज्ञ ख्छप;ब्छद्ध, ;अद्ध ख्च्जब्स;मदद्ध,;छव् द्ध24 2232 ;पपपद्ध ख्ब्त;मदद्ध,ब्स;अपद्ध थ्म ख्थ्म;ब्छद्ध,33 463 9ण्2 ;पद्ध हेक्साऐम्मीनकोबाल्ट;प्प्प्द्धक्लोराइड ;पअद्ध पोटैश्िायम ट्राइआक्सैलेटोपेफरेट ;प्प्प्द्ध ;पपद्ध पेन्टाऐम्मीनक्लोरिडोकोबाल्ट;प्प्प्द्धक्लोराइड ;अद्ध पोटैश्िायम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट;प्प्द्ध ;पपपद्ध पोटैश्िायम हेक्सासायोनोपेफरेट;प्प्प्द्ध ;अपद्ध डाइएम्मीनक्लोरिडो;मेथेनेमीनद्धप्लैटिनम;प्प्द्धक्लोराइड 9ण्3 ;पद्ध समपक्ष तथा विपक्ष दोनों ज्यामितीय समावयव एवं समपक्ष समावयव का ध्रुवण समावय अस्ितत्व में होंगे। ;पपद्ध दो ध््रुवण समावयव विद्यमान होंगे। ;पपपद्ध ज्यामितीय ;समपक्ष - , विपक्ष - द्ध समावयव संभव है। ;पअद्ध दस संभावित समावयव संभव हैं। ;संकेत - ज्यामितीय, आयनन एवं आबंध् समावयवद्ध 9ण्4 आयनन समावयव जल में विलेय होकर भ्िान्न आयन देते हैं तथा इस प्रकार विभ्िान्न अभ्िाकमर्कों से भ्िान्न रूप से अभ्िावि्रफया करते हैं - ख्ब्व;छभ् द्धठत,ैव़् ठं2़ → ठंैव् ;ेद्ध354 4 ख्ब्व;छभ्3द्ध5ैव्4,ठत ़ ठं2़ → कोइर् अभ्िािया नहीं ख्ब्व;छभ्3द्ध5ठत,ैव्4 ़ ।ह़ → कोइर् अभ्िािया नहीं ख्ब्व;छभ्3द्ध5ैव्4,ठत ़ ।ह़ → ।हठत ;ेद्ध 9ण्6 ख्छप;ब्व्द्ध4,ए में, छप की आॅक्सीकरण अवस्था शून्य है जबकि ख्छपब्स4 , 2− ए में ़2 है। ब्व् लिगन्ड की उपस्िथति में, छप के अयुगलित क इलेक्ट्राॅन युगलित हो जाते हैं परंतु ब्सदृ एक दुबर्ल लिगन्ड है। इसलिए अयुगलित इलेक्ट्राॅनों को युगलित नहीं कर पाता। 9ण्7 ब्छदृ ;प्रबल लिगन्डद्ध की उपस्िथति में, 3क इलेक्ट्राॅन युगलित हो जाते हैं तथा केवल एक अयुगलित इलेक्ट्राॅन बचा रहता है। संकरण अवस्था क 2 ेच 3 है व आंतरिक कक्षक संवुफल बनता है। भ्2व् ;दुबर्ल लिगन्डद्ध की उपस्िथति में, 3क इलेक्ट्राॅन युगलित नहीं होते। इसमें संकरण ेच 3 क 2 है तथा बाह्य - कक्षक संवुफल बनता है जिसमें पाँच अयुगलित इलेक्ट्राॅन हैं तथा यह प्रबल अनुचुंबकीय है। 9ण्8 छभ्3 की उपस्िथति में, 3क इलेक्ट्राॅन युगलित होते हैं तथा शेष बचे दो रिक्त क.कक्षक क 2 ेच 3 संकर में भाग लेकर ख्ब्व;छभ्3द्ध6,3़ के उदाहरण में आंतरिक कक्षक ;पददमतवतइपजंस बवउचसमगद्ध बनाते हैं। 2़ 832 ख्छप;छभ्3द्ध6, में, छप की आॅक्सीकरण अवस्था ़2 है तथा इसका इलेक्ट्राॅनिक विन्यास क है तथा संकरण ेच क है व बाह्य - कक्षक संवुफल बनता है। 9ण्9 वगर्समतली आवृफति के लिए संकरण केच 2 है। अतः 5क कक्षक में उपस्िथत अयुगलित इलेक्ट्राॅन युगलित होकर एक रिक्त क कक्षक केच 2 संकरण के लिए रिक्त कर देते हैं। इस प्रकार इसमें अयुगलित इलेक्ट्राॅन नहीं हैं। 9ण्11 समग्र वियोजन स्िथरांक का मान समग्र स्थायित्व स्िथरांक के व्युत्व्रफमानुपाती है अथार्त् - 1ध्β 4 त्र 4ण्7 × 10दृ14

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