उद्देश्य इस एकक के अध्ययन के पश्चात् आप μ ऽ खनिजों, अयस्कों, सांद्रण, सज्जीकरण, निस्तापन, भजर्न, शोध्न आदि पदों की व्याख्या कर सकेंगेऋ ऽ निष्कषर्ण वििायों में प्रयुक्त आॅक्सीकरण व अपचयन के सि(ांतों को समझ सवेंफगे। ऽ ।सए ब्नए र्दए तथा थ्म के निष्कषर्ण में गिब्श ऊजार् तथा एन्ट्राॅपी जैसी ऊष्मागतिकी की धारणाओं को लागू कर सकेंगेऋ ऽ व्याख्या कर सवेंफगे कि वुफछ आॅक्साइडों जैसे ब्नव् का अपचयन थ्मव्की तुलना में2 23 अध्िक आसानी से क्यों होता है? ऽ व्याख्या कर सकेंगे कि क्यों ब्व् वुफछ निश्िचत तापों पर अच्छा अपचायक है जबकि कोक वुफछ अन्य स्िथतियों में श्यादा अच्छा है? ऽ व्याख्या कर सकेंगे कि अपचयन कायोर्ं के लिए वुफछ विश्िाष्ट अपचायक ही काम में क्यों लिए जाते हैं? फ्उष्मागतिकी समझाती है कि एक धतुआॅक्साइड से धतु के निष्कषर्ण में वुफछ ही अपचायक एवं न्यूनतम विश्िाष्ट ताप क्यों उपयुक्त है?य् भूपपर्टी में वुफछ तत्वऋ जैसेμ काबर्न, सल्पफर, सोना तथा उत्कृष्ट गैसें मुक्त अवस्था में पाइर् जाती हैं जबकि अन्य तत्व संयुक्त अवस्था में मिलते हैं। एक तत्व के संयुक्त अवस्था से निष्कषर्ण तथा पृथक्करण में रसायन के कइर् सि(ांत निहित होते हैं। एक विशेष तत्व विविध् यौगिकों के रूप में मिल सकता है। धतुकमर् तथा पृथक्करण का प्रक्रम इस प्रकार का होना चाहिए कि यह रासायनिक रूप से संभव हो तथा आथ्िार्क रूप से लाभदायक हो। पिफर भी धातुओं के सभी निष्कषर्ण प्रक्रमों के वुफछ सामान्य सि(ांत समान हैं। किसी धतु विशेष को प्राप्त करने के लिए हम ऐसे खनिजों के बारे में सोचते हैं जोभूपपर्टी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक पदाथो± के खनन द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। बहुत से खनिजों में से, जिनमें धतु पाइर् जाती है,केवल वुफछ ही धतु प्राप्त करने के ड्डोत के रूप में प्रयुक्त होते हैं। ऐसे खनिजों को अयस्क कहते हैं। मुश्िकल से ही किसी अयस्क में केवल एक ही अभीष्ट पदाथर् होता है। यह सामान्यतया मृदा तथा अवांछित पदाथोर्ं द्वारा संदूष्िात होता है, जिन्हें अपअयस्क ;गैंगद्ध कहा जाता है। अयस्कों से धतु के पृथक्करण तथा निष्कषर्ण के लिए मुख्यतः निम्नलिख्िात पद हैंμ ऽ अयस्क का सांद्रण ऽ सांदि्रत अयस्क से तत्व का पृथक्करण तथा ऽ धातु का शु(ीकरण अयस्कों से धतु पृथक्करण में प्रयुक्त होने वाली संपूणर् वैज्ञानिक व प्रौद्योगिक प्रिया धतुकमर् कहलाती है। 6.1 धातुओं की उपलब्धता इस एकक में हम पहले प्रभावी अयस्क सांद्रण के लिए विभ्िान्न धतुकमर् प्रियाओं के सि(ांतों की विवेचना करेंगे। इन सि(ांतों में सांदि्रत अयस्क के धतु में प्रभावी अपचयन में निहित उष्मागतिकीय तथा विद्युत रासायनिक पक्ष निहित होंगे। भूपपर्टी में तत्वों की बाहुल्यता भ्िान्न - भ्िान्न होती है। धतुओं में ऐलुमिनियम की बाहुल्यता अध्िकतम है। यह भूपपर्टी में सवार्ध्िक पाया जाने वाला तीसरा तत्व है ;लगभग 8.3ः भार मेंद्ध। यह अभ्रक तथा मृिाका सहित अनेक आग्नेय खनिजों का प्रमुख घटक है। बहुत से रत्न प्रस्तर, ।सव्के अशु( रूप हैं एवं ये अशुियाँ ब्त ;रूबी23 मेंद्ध से ब्व ;नीलम मेंद्ध तक होती हैं। भूपपर्टी में सबसे अध्िक पाइर् जाने वाली दूसरी धतु लोहा ;आयरनद्ध है। यह विभ्िान्न प्रकार के यौगिक बनाता है एवं इनके विभ्िान्न उपयोग इसे एक बहुत महत्वपूणर् तत्व बनाते हैं। यह जैविक तंत्रों में भी आवश्यक तत्वों में से एक है। ऐलुमिनियम आयरन, काॅपर तथा िांक के मुख्य अयस्क सारणी 6.1 में दिए गए हैं। सारणी 6ण्1 वुफछ महत्वपूणर् धतुओं के मुख्य अयस्क 6.2 अयस्कों का सांद्रण ऐलुमिनियम के निष्कषर्ण के लिए, बाॅक्साइट का चयन किया जाता है। लोहे के लिए, प्रायः आयरन आॅक्साइड अयस्क लिए जाते हैं, जो कि प्रचुरता से उपलब्ध् हों तथा प्रदूष्िात गैसें न बनाते हों ;जैसे कि आयरन पाइराॅइट द्वारा ैव्बनती हैद्ध। काॅपर तथा िांक के लिए,2 सारणी 6.1 में से अयस्कों की उपलब्ध्ता तथा दूसरे संगत कारकों के आधर पर कोइर् भीअयस्क उपयोग में लिया जा सकता है। सांद्रण की िया करने से पहले अयस्कों को श्रेणीकृत किया जाता हैं और उचित आकार में तोड़ा जाता हैं। अवांछित पदाथो±ऋ जैसेμ रेत, क्ले आदि का अयस्कों से निष्कासन का प्रक्रम अयस्क सांद्रण, प्रसाध्न अथवा सज्जीकरण कहलाता है। इसमें कइर् पद सम्िमलित होते हैं और इन पदों का चयन उपस्िथत धतु के यौगिक एवं अपअयस्क ;गैंगद्ध के भौतिक गुणों में अंतर पर निभर्र करता है। धातु का प्रकार, उपलब्ध सुविधाओं तथा पयार्वरणीय कारकों का भी ध्यान रखा जाता है। वुफछ महत्वपूणर् प्रियाएं आगे वण्िार्त की गइर् हैं। 6.2.1 द्रवीय धवन 6.2.2 चुंबकीय पृथक्करण यह विध्ि अयस्क तथा गैंग कणों के आपेक्ष्िाक घनत्वों के अंतर पर निभर्र करती है। अतः यह गुरुत्वीय पृथक्करण का एक प्रकार है। इसी प्रकार के प्रक्रम में चू£णत अयस्कको ऊपर की ओर बहती हुइर् जल की तेश धरा से धेया जाता है जिसके कारण हल्के गैंग के कण जल के साथ बहकर निकल जाते हैं तथा भारी अयस्क के कण शेष रह जाते हैं। यह विध्ि अयस्क के घटकों में चुंबकीय गुणों की भ्िान्नता पर आधरित है। यदि अयस्क या गैंग ;दोनों में से एकद्ध चुंबकीय क्षेत्रा की ओर आक£षत हो सकता है तब इस प्रकार से पृथक्करण किया जाता है ;जैसे लौह अयस्कों के उदाहरण मेंद्ध। चूण्िार्त अयस्क को एक घूमते हुए पट्टे पर डाला जाता है जो चुंबकीय रोलर पर लगा होता है ;चित्रा 6.1द्ध। चित्रा 6.1μ चुंबकीय पृथक्करण ;आरेखीयद्ध चित्रा 6.2μ पेफन प्लवन वििा ;आरेखीयद्ध 6.2.3 पेफन प्लवन वििा यह वििा सल्पफाइड अयस्कों को गैंग से मुक्त करने के लिए प्रयुक्त होती रही है। इस विध्ि में चूण्िार्त अयस्क का पानी के साथ निलंबन बना लिया जाता है। इसमें संग्राही तथा पेफन - स्थायीकारी मिला देते हैं। संग्राही ;जैसे चीड़ का तेल, वसा अम्ल, जैंथेट इत्यादिद्ध अयस्क कणों की अक्लेदनीयता ;दवद.ूमजजंइपसपजलद्ध को बढ़ा देते हैं तथा पेफन - स्थायीकारी ;जैसे िसाॅल, ऐनीलिनद्ध पेफन को स्थायित्व प्रदान करते हैं। अयस्क के कण तेल से, जबकि गैंग के कण जल से भीग जाते हैं। घूण्िार्त क्षेपणी मिश्रण को विलोडित करती है एवं इसमें वायु प्रवाहित करती है। परिणामस्वरूप पेफन बनता है जिसमें अयस्क के कण एकत्रा हो जाते हैं। पेफन हल्का होता है जिसे मथकर निकाल लिया जाता है। इसे अयस्क के कणों को अलग करने के लिए सुखा लिया जाता है। कभी - कभी तेल तथा जल के अनुपात को संयोजित करके अथवा अवनमकों का उपयोग करके दो सल्पफाइड अयस्कों को पृथक करना संभव होता है। उदाहरणस्वरूप, एक अयस्क में से िांक सल्पफाइड तथा लेड सल्पफाइड को पृथक करने के लिए सोडियम साइनाइड ;छंब्छद्धका प्रयोग किया जाता है। यह चयनित रूप से र्दै को पेफन में आने से रोकताहै परंतु च्इैको पेफन में आने देता है।6.2.4 निक्षालन यदि अयस्क किसी उपयुक्त विलायक में विलेय हो तोे प्रायः निक्षालन का उपयोग करते हैं। निम्नलिख्िात उदाहरण इस ियावििा को स्पष्ट करते हैं। ;कद्ध बाॅक्साइट से ऐलुमिना का निक्षालन ऐलुमिनियम के मुख्य अयस्क बाॅक्साइट में अिाकांशतः ैपव्ए आयरन आॅक्साइड तथा2टाइटेनियम आॅक्साइड ;ज्पव्द्ध की अशुियाँ होती हैं। 473दृ523 ज्ञ ताप तथा 35दृ36 इंत2दाब पर चूण्िार्त अयस्क को सांद्र सोडियम हाइड्राॅक्साइड विलयन से पाचित्रा ;कपहमेजद्ध कर सांदि्रत किया जाता है। इस प्रकार ।सव्सोडियम ऐलुमिनेट के रूप में एवं ैपव्ए सोडियम23 2सिलीकेट के रूप में निक्षालित हो जाता है तथा अशुियाँ शेष रह जाती हैं। ।सव्;ेद्ध ़ 2छंव्भ्;ंुद्ध ़ 3भ्व्;सद्ध → 2छंख्।स;व्भ्द्ध,;ंुद्ध ;6ण्1द्ध232 4विलयन में काबर्न डाइआॅक्साइड गैस प्रवाहित कर ऐलुमिनेट को उदासीन कर लिया जाता है एवं जलयोजित ।सव् अवक्षेपित हो जाता है। इस अवस्था पर विलयन को ताशा बने23हुए जलयोजित ।सव्के नमूने से बीजारोपित किया जाता है, जो कि अवक्षेपण को प्रेरित23 करता है। 2छंख्।स;व्भ्द्ध,;ंुद्ध ़ ब्व्;हद्ध → ।सव्ण्गभ्व्;ेद्ध ़ 2छंभ्ब्व् ;ंुद्ध ;6ण्2द्ध422323सोडियम सिलिकेट विलयन में शेष रह जाता है तथा जलयोजित ऐलुमिना को छानकर, सुखाकर तथा गरम करके पुनः शु( ।सव्प्राप्त कर लिया जाता है।23 व्;ेद्ध1470 ज्ञ।स2व्3ण्ग भ्2 ।स2व्3;ेद्ध ़ ग भ्2व्;हद्ध ;6ण्3द्ध ;खद्ध अन्य उदाहरण चाँदी तथा सोने के धतुकमर् में धतुओं का निक्षालन वायु की ;व् के लिएद्ध उपस्िथति में2सोडियम साइनाइड अथवा पोटैश्िायम साइनाइड के तनु विलयन द्वारा किया जाता है जिसमें से धतु बाद में प्रतिस्थापन द्वारा प्राप्त कर ली जाती है। 4ड;ेद्ध ़ 8ब्छ दृ;ंुद्ध़ 2भ्2व्;ंुद्ध ़ व्2;हद्ध→ 4ख्ड;ब्छद्ध2,दृ ;ंुद्ध ़ 4व्भ्दृ;ंुद्ध ;डत्र ।ह अथवा ।नद्ध ;6ण्4द्ध − 2−2ड;द्ध ंु ़र्द;द्ध→र्द;द्ध ंु ़2ड;द्ध ;6ण्5द्धख् ब्छ 2 ,; द्ध े ख् ब्छ 4 ,; द्ध े 6.3 सांित अयस्कों से सांदि्रत अयस्कों का ऐसे प्रारूपों में परिवतर्न करना आवश्यक है जो कि अपचयन के लिए उपयुक्त हों। सामान्यतः सल्पफाइड अयस्कों को अपचयन से पहले आॅक्साइड के रूप मेंअशोिात धातुओं परिवतिर्त करते हैं। आॅक्साइड आसानी से अपचित होते हैं ;कारण जानने के लिए बाक्स देखंेद्ध।का निष्कषर्ण अतः सांदि्रत अयस्क से धतुओं का पृथक्करण दो मुख्य पदों में होता है। ;कद्ध आॅक्साइड में परिवतर्न तथा ;खद्ध आॅक्साइड का धतु में अपचयन ;कद्धआॅक्साइड में परिवतर्न ;पद्ध निस्तापनμ निस्तापन में गरम करने की आवश्यकता होती है जिससे वाष्पशील पदाथर् निष्कासित हो जाते हैं तथा धतु आॅक्साइड शेष रह जाता है। थ्म2व्3ण्ग भ्2व्;ेद्ध .थ्म2व्3 ;ेद्ध ़ ग भ्2व्;हद्ध ;6ण्6द्ध र्दब्व्3 ;ेद्ध .र्दव्;ेद्ध ़ ब्व्2;हद्ध ;6ण्7द्ध ब्ंब्व्3ण्डहब्व्3;ेद्ध .ब्ंव्;ेद्ध ़ डहव्;े द्ध ़ 2ब्व्2;हद्ध ;6ण्8द्ध ;पपद्ध भजर्नμ भजर्न में अयस्क ;वतमद्ध को वायु की नियमित आपूतिर् के साथ धतु के गलनांक से नीचे के तापमान पर एक भट्टðी में गरम किया जाता है। सल्पफाइड अयस्क के भजर्न की वुफछ अभ्िाियाएं इस प्रकार हैं μ 2र्दै ़ 3व्2 → 2र्दव् ़ 2ैव्2 ;6ण्9द्ध 2च्इै ़ 3व्2 → 2च्इव् ़ 2ैव्2 ;6ण्10द्ध 2ब्नै ़ 3व्→ 2ब्नव् ़ 2ैव् ;6ण्11द्ध2222 काॅपर के सल्पफाइड अयस्कों को परावतर्नी भट्टðी में गरम करते हैं। यदि अयस्क में लोहा हो तो गरम करने से पहले इसमें सिलिका मिलाते हैं। आयरन आॅक्साइड आयरन सिलिकेट बनाकर धतु मल’ के रूप में, तथा ताँबा काॅपर मेट के रूप में प्राप्त होता है जिसमें ब्नै2तथा थ्मै होता है। थ्मव् ़ ैपव्2 → थ्मैपव्3 ;6ण्12द्ध धतुमल उत्पादित ैव्ए भ्ैव्के उत्पादन के लिए प्रयुक्त की जाती है।224 ;खद्ध आॅक्साइड का धतु में अपचयन धतु आॅक्साइड के अपचयन में प्रायः इसे किसी दूसरे पदाथर् के साथ गरम किया जाता है ;ब् या ब्व् या अन्य धतुद्ध जो अपचायक का कायर् करता है। अपचायक ;जैसे काबर्नद्ध धातु आॅक्साइड की आॅक्सीजन के साथ संयोग करते हैं। ’ धातु कमिर्की में ‘फ्रलक्स’ ;गालकद्ध मिलाते हैं जो ‘गैंग’ ;अपअयस्कद्ध के साथ मिलकर ‘धतुमल’ बनता है। अयस्कों से गैंग की अपेक्षा धातुमल अिाक आसानी से पृथक हो सकता है। इस प्रकार गैंग ;अपअयस्कद्ध का पृथक्करण आसान हो जाता है। 6.4 धातुकमिर्की केेे उष्मागतिकी सिद्धांत ड ग व् ल ़ ल ब् → ग ड ़ ल ब्व् ;6ण्13द्ध वुफछ धतु आॅक्साइड आसानी से अपचित होते हैं। जबकि दूसरों को अपचित करना कठिन होता है। ;अपचयन का अथर् इलेक्ट्राॅन प्राप्ित या इलेक्ट्राॅनीकरण होता हैद्ध। किसी भी स्िथति में, इन्हें गरम करने की आवश्यकता होती है। तापीय अपचयन ;पायरोधातुकमर्द्ध में आवश्यक तापक्रम परिवतर्न को समझने, तथा इस प्रागुक्ित के लिए, कि कौन सा तत्व दिए गए धतु आॅक्साइड ;डग व् लद्ध के अपचयन के लिए अपचायी कमर्क के रूप में उपयुक्त होगा, गिब्श ऊजार् से अथर् - निणर्य किए जाते हैं। उष्मागतिकी की वुफछ मूल धरणाएं हमें धतुकमीर्य परिवतर्नों के सि(ंात को समझने मेंसहायता करती हैं। यहाँ गिब्श ऊजार् सबसे अिाक साथर्क पद है। किसी प्रक्रम के लिए किसीविश्िाष्ट तापक्रम पर गिब्श ऊजार् में परिवतर्न, Δळए को निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा बताया जाता है। Δळ त्र Δभ् दृ ज्Δै ;6ण्14द्ध जहाँ किसी प्रक्रम के लिए Δभ् एन्थैल्पी में परिवतर्न तथा Δै एन्ट्राॅपी में परिवतर्न है। किसी अभ्िािया के लिए इस परिवतर्न को निम्नलिख्िात समीकरण के द्वारा भी समझाया जा सकता है। Δळटत्र दृ त्ज् सदज्ञ ;6ण्15द्ध जहाँ ज्ञए ‘अभ्िाकारक - उत्पाद’ तंत्रा के लिए, ज् ताप पर, एक साम्य स्िथरांक है। समीकरण 6.15 में ट्टणात्मक Δळ धनात्मक ज्ञ को प्रदश्िार्त करता है और यह तभी संभव है जब अभ्िािया उत्पादों की ओर अग्रसर हो। उपरोक्त तथ्यों से हम निम्नलिख्िात निष्कषर् निकालते हैं μ 1.जब समीकरण 6.14 में Δळ का मान )णात्मक होगा, केवल तभी अभ्िािया अग्रसर होगी। यदि Δै धनात्मक हो जाएगा तो तापक्रम, ज् बढ़ाने से ज्Δै का मान बढ़ जाएगा ;Δभ् ढ ज्Δैद्ध तथा तब Δळ )णात्मक हो जाएगा। 2.यदि किसी निकाय में दो अभ्िाियाओं के अभ्िाकारकों तथा उत्पादों को एक साथ रखा जाए और दोनों संभव अभ्िाियाओं का परिणामी Δळ )णात्मक हो, तो समग्र अभ्िािया संपन्न होगी। अतः प्रक्रम की व्याख्या में दो अभ्िाियाओं का युग्मन, इनके Δळ का योग प्राप्त करना तथा इसकापरिमाण और चिÉ देखना सम्िमलित होता है। आॅक्साइडों के विरचन के लिए इसप्रकार के युग्मन को गिब्ज ऊजार् ;Δळटद्ध तथा ज् के मध्य खींचे गए वक्रों से आसानी से समझा जा सकता है ;चित्रा 6.4द्ध।जब धतु आॅक्साइड अपचित होता है तो अपचायक अपना आॅक्साइड विरचित करता है। अपचायक की भूमिका Δळट का इतना अिाक )णात्मक मान देने में है, जिससे दो अभ्िाियाओं ;अपचायक का आॅक्सीकरण और धतु आॅक्साइड का अपचयनद्ध के Δळट का योग )णात्मक हो जाए। जैसा कि हम जानते हैं धतु का आॅक्साइड अपचयन के दौरान विघटित होता है। ड गव्;ेद्ध → ग ड ;ठोस या द्रवद्ध ़ 12 व्2 ;हद्ध ;6ण्16द्ध अपचायक इस आॅक्सीजन को प्राप्त कर लेता है। समीकरण 6.16 को धतु के आॅक्सीकरण की प्रतिलोम अभ्िािया के रूप में देखा जा सकता है और तब Δळट का मानिसामान्य प्रकार से लिखा जा सकता है μ ग ड;े अथवा सद्ध ़ 1व्;हद्ध → ड व्;ेद्ध ख्Δळट, ;6ण्17द्ध2ग ;डएडव्द्ध2 ग यदि आॅक्साइड का अपचयन उपरोक्त समीकरण 6.16 के अनुसार होता है तो अपचायक का ;उदाहरणाथर् ब् या ब्व्द्ध आॅक्सीकरण भी होगा μ 1ब्;ेद्ध ़ व्;हद्ध → ब्व्;हद्ध ख्Δळ, ;6ण्18द्ध;ब्ए ब्व्द्ध221ब्व्;हद्ध ़ व्;हद्ध → ब्व्;हद्ध ख्Δळ, ;6ण्19द्ध22;ब्व्ए ब्व्2द्ध2 यदि अपचयन के लिए काबर्न लिया जाता है तो इस तत्व का ब्व् में पूणर् आॅक्सीकरण2भी हो सकता है μ 11 1ब्;ेद्ध ़ व्;हद्ध → 1 ब्व्;हद्ध ख् Δळ, ;6ण्20द्ध;ब्ए ब्व्2द्ध2 222 22 उपरोक्त तीनों समीकरणों ;6.18, 6.19 एवं 6.20द्ध में से समीकरण 6.17 घटाने पर ;इसका अथर् यह है, कि इस समीकरण के )णात्मक या प्रतिलोम को, जो कि समीकरण 6.16 है, जोड़ने परद्ध हम पाते हैं μ ड गव्;ेद्ध ़ ब्;ेद्ध → गड;े अथवा सद्ध ़ ब्व्;हद्ध ;6ण्21द्ध ड गव्;ेद्ध ़ ब्व्;हद्ध → गड;े अथवा सद्ध ़ ब्व्2;हद्ध ;6ण्22द्ध ड गव्;ेद्ध ़ 1 ब्;ेद्ध → गड;े अथवा सद्ध ़ 12 ब्व्2;हद्ध ;6ण्23द्ध2 ये अभ्िाियाएं धतु आॅक्साइड, डव् के वास्तविक अपचयन को दशार्ती हंै जिसे हमग निष्पादित करना चाहते हैं। सामान्यतः इन अभ्िाियाओं Δ ळ0 के मान, इसी प्रकार संगतत Δळ0 का मान घटाकर प्राप्त कर सकते हैं।िजैसा कि हम देख चुके हैं, तापन ;अथार्त् बढ़ता ज्द्ध Δ ळ0 के )णात्मक मान के लिएत सहायक होता है, अतः इस प्रकार का तापमान चुना जाता है जिस पर दो संयुक्त रेडाॅक्स प्रक्रमों के Δ ळ0 के मानों का योग )णात्मक हो। Δ ळ0 तथा ज् के मध्य वक्रों में यह दोनों वक्रोंतत के प्रतिच्छेदन बिंदु द्वारा प्रदश्िार्त होता है ;डव् का वक्र तथा अपचायक पदाथर् केग आॅक्सीकरण का वक्रद्ध। इस बिंदु के बाद संयुक्त प्रक्रमों का, जिनमें डव्का अपचयन भीग सम्िमलित है, Δ ळ0 का मान अध्िक )णात्मक हो जाता है। उस बिंदु के बाद दोनों Δ ळ0 तत मानों में अंतर यह निधर्रित करता है कि ऊपरी रेखा के आॅक्साइड का अपचयन नीचे की रेखा द्वारा प्रदश्िार्त तत्व द्वारा संभव है या नहीं। यदि अंतर अध्िक है तो अपचयन आसानी से होगा। 6.4.1 अनुप्रयोग ;कद्ध आयरन का इसके आॅक्साइड से निष्कषर्ण आयरन के आॅक्साइड अयस्कों को निस्तापन/भजर्न ;जल को हटाने के लिए, काबोर्नेटों काअपघटन करने के लिए तथा सल्पफाइड को आॅक्सीकृत करने के लिएद्ध के द्वारा सांद्रण के उपरांत चूना पत्थर तथा कोक के साथ वात्या भट्टððी ;धमन भट्टीद्ध में ऊपर से डाल देते हैं।यहाँ आॅक्साइड धतु में अपचित हो जाता है। ऊष्मागतिकी हमें यह समझने में सहायता करती है कि कोक, आॅक्साइड को क्यों अपचित करता है तथा इस भट्टðी का चयन क्यों किया जाता है। इस प्रक्रम में एक महत्वपूणर् चरण अपचयन है μ थ्मव्;ेद्ध ़ ब्;ेद्ध → थ्म;ेध्सद्ध ़ ब्व् ;हद्ध ;6ण्24द्ध इसे दो सामान्य अभ्िाियाओं के युग्म के रूप में देखा जा सकता है। इनमें से एक में थ्मव् का अपचयन हो रहा है तथा दूसरे में ब्ए ब्व् में आॅक्सीकृत हो रहा है μ थ्मव्;ेद्ध → थ्म;ेद्ध ़ 1व्;हद्ध ख्Δळ, ;6ण्25द्ध2;थ्मव्ए थ्मद्ध2 1ब्;ेद्ध ़ व् ;हद्ध → ब्व् ;हद्ध ख्Δळ, ;6ण्26द्ध2 ;ब्ए ब्व्द्ध2 दोनों अभ्िाियाओं के साथ होने पर समीकरण 6.23 प्राप्त होती हैं, जिसमें सकल गिब्शऊजार् में परिवतर्न निम्नलिख्िात प्रकार से होता है μ Δऴ Δळ त्र Δ ळ ;6ण्27द्ध;ब्ए ब्व्द्ध ;थ्मव्ए थ्मद्धत स्वाभाविक है कि परिणामी अभ्िािया तभी संपन्न होगी जब समीकरण 6.27 में दायाँ पक्ष )णात्मक होगा। Δळ0 तथा ज् के मध्य जो वक्र अभ्िािया 6.25 को निरूपित करता है, ऊपर की ओर जाता है तथा जो ब्→ब्व् ;ब्ए ब्व् रेखाद्ध परिवतर्न को निरूपित करता है, वह नीचे की ओर जाता है। लगभग 1073 ज्ञ से अिाक ताप पर ब्ए ब्व् रेखा थ्मए थ्मव् रेखा के नीचे आ जाती है ख्Δळढ Δळ,, अतः इस;ब्ए ब्व्द्ध ;थ्मए थ्मव्द्धपरिसर में कोक, थ्मव् को अपचित करेगा और स्वयं ब्व् में आॅक्सीकृत होगा। इसी प्रकार से थ्म3व्4 एवं थ्म2व्3 का ब्व् द्वारा अपेक्षाकृत कम ताप पर अपचयन, चित्रा 6.4 में ब्व् तथा ब्व्के वक्रों के2 प्रतिच्छेदन बिंदुओं के नीचे होने के आधार पर समझाया जा सकता है। वात्या भट्टðी ;चित्रा 6.5द्ध में आयरन आॅक्साइडों का अपचयन विभ्िान्न ताप परिसरों में होता है। भट्टðी में गरम हवा निचले पेंदे से प्रवाहित की जाती है एवं कोयले ;कोकद्ध के द्वारा निचले भाग का ताप लगभग 2200 ज्ञ तक पहुँचा दिया जाता है। इस प्रकार कोयले का दहन इस प्रिया के लिए आवश्यक अिाकतरऊष्मा की पूतिर् कर देता है। ब्व् व ऊष्मा, भट्टðी के ऊपरी भाग की ओर बढ़ती है। भट्टðी के ऊपरी भाग मेंताप कम होता है तथा ऊपर से आने वाले आयरन के आॅक्साइड ;थ्म2व्तथा थ्म3व्द्ध विभ्िान्न पदों में34थ्मव् में अपचित हो जाते हैं। अतः अपचयन अभ्िाियाएं निम्न ताप परिसरों व उच्च ताप परिसरों में संपन्न होती हैं, जो Δ तळ0 तथा ज् के मध्य वक्रों के संगत प्रतिच्छेदन बिंदुओं पर निभर्र करती हैं। इन अभ्िाियाओं को संक्षेप में निम्नानुसार लिखा जा सकता हैμ 500 - 800ज्ञ पर ;वात्या भट्टðी में निम्न ताप परिसर मेंद्ध μ 3 थ्म2व्3 ़ ब्व् → 2 थ्म3व्4 ़ ब्व्2 ;6ण्28द्ध थ्म3व्4 ़ 4 ब्व् → 3थ्म ़ 4 ब्व्2 ;6ण्29द्ध थ्म2व्3 ़ ब्व् → 2थ्मव् ़ ब्व्2 ;6ण्30द्ध 900 - 1500ज्ञ पर ;वात्या भट्टðी में उच्च ताप परिसर मेंद्ध μ ब् ़ ब्व्2 → 2 ब्व् ;6ण्31द्ध थ्मव् ़ ब्व् → थ्म ़ ब्व्2 ;6ण्32द्ध चूना पत्थर भी ब्ंव् में अपघटित हो जाता है। सिलिकेट, अयस्क से अशुियों को धातुमल के रूप में निकाल लेता है। धतुमल गलित अवस्था में लोहे से अलग हो जाता है। वात्या भट्टðी से प्राप्त लोहे में लगभग 4ः काबर्न तथा अन्य अशुियाँ, जैसे ैए च्ए ैप डदए सूक्ष्म मात्रा में उपस्िथत रहती हैं। यह कच्चे लोहे ;पिग लोहाद्ध के नाम से जाना जाताहै तथा विभ्िान्न आकृतियों में ढाला जा सकता है। ढलवाँ लोहा, कच्चे लोहे से भ्िान्न होता है तथा इसे कच्चे लोहे को, रद्दी लोहे एवं कोक के साथ गरम हवा के झोंकों द्वारा पिघलाकर बनाया जाता है। इसमें थोड़ा कम काबर्न ;लगभग 3ःद्ध होता है तथा यह अति कठोर और भंगुर होता है। अन्य अपचयन μ पिटवाँ लोहा या आघातवध्यर् लोहा वाण्िाज्ियक लोहे का शु(तम रूप है और इसे हेमाटाइट की परत चढ़ी हुइर् परावतर्नी भट्टðी में ढलवाँ लोहे की अशुियों कोआॅक्सीकृत करके बनाया जाता है। हेमाटाइट काबर्न को काबर्न मोनो आॅक्साइड में आॅक्सीकृत कर देता हैμ थ्म2व्3 ़ 3 ब् → 2 थ्म ़ 3 ब्व् ;6ण्33द्ध चूने के पत्थर को गालक के रूप में मिलाया जाता है जिससे सल्पफर, सिलिकन तथा़पफाॅस्प़्ाफोरस आॅक्सीकृत होकर धतुमल में चले जाते हैं। धातु को निकाल लिया जाता है औररोलरों पर से गुशार कर धातुमल से मुक्त कर लिया जाता है। ;खद्ध क्यूप्रस आॅक्साइड ;काॅपर ;प्द्ध आॅक्साइडद्ध से ताँबे ;काॅपरद्ध का निष्कषर्ण आॅक्साइडों के विरचन के लिए Δ तळ0 तथा ज् के मध्य आलेख में ¹चित्रा ;6.4द्धह् ब्न2व् की रेखा लगभग श्िाखर पर है अतः काॅपर के आॅक्साइड अयस्कों को कोक के साथ गरम करके सीध्े धतु में अपचयित करना अत्यिाक आसान होता है। ;विशेषकर 500 - 600 ज्ञ के बाद ब्ए ब्व् तथा ब्ए ब्व्दोनों ही रेखाएं आलेख में स्िथति में बहुत नीचे हैंद्ध तथापि बहुत2 से अयस्क सल्पफाइड होते हैं तथा वुफछ में लोहा भी हो सकता है। सल्पफाइड अयस्कांे काभजर्न/गलन करने पर आॅक्साइड प्राप्त होते हैं। 2ब्न2ै ़ 3व्2 → 2ब्न2व् ़ 2ैव्2 ;6ण्34द्ध आॅक्साइड को कोक के द्वारा आसानी से धात्िवक काॅपर में अपचित किया जा सकता है। ब्न2व् ़ ब् → 2 ब्न ़ ब्व् ;6ण्35द्ध वास्तविक प्रक्रम में, अयस्क को सिलिका मिलाने के बाद परावतर्नी भट्टðी में गरम किया जाता है। भट्टðी में आयरन आॅक्साइड, आयरन सिलिकेट के रूप में धतुमल बनाता है तथा काॅपर, काॅपर मेट के रूप में प्राप्त होता है। इसमें ब्नै तथा थ्मै होते हैं।2थ्मव् ़ ैपव्2 → थ्मैपव्3 ;6ण्36द्धधतुमल इसके बाद काॅपर मेट को सिलिका परत चढ़े परिवतिर्त्रा ;परिवतर्कद्धमें भर दिया जाता है। वुफछ सिलिका भी मिलाते हैं तथा बचे हुए थ्मैए थ्मव् तथा ब्नैध्ब्नव् को धात्िवक काॅपर22में परिवतिर्त करने के लिए गरम वायु के झोंके प्रवाहित करते हैं। निम्नलिख्िात अभ्िाियाएं संपन्न होती हैं μ 2थ्मै ़ 3व्2 → 2थ्मव् ़ 2ैव्2 ;6ण्37द्ध थ्मव् ़ ैपव्2 → थ्मैपव्3 ;6ण्38द्ध 2ब्न2ै ़ 3व्2 → 2ब्न2व् ़ 2ैव्2 ;6ण्39द्ध 2ब्न2व् ़ ब्न2ै → 6ब्न ़ ैव्2 ;6ण्40द्ध प्राप्त ठोस काॅपर ;ताँबाद्ध, ैव्के निकलने के कारण पफपफोलेदार दिखाइर् देता है,2 इसलिए यह पफपफोलेदार ताँबा ;ब्िलस्टडर् काॅपरद्ध कहलाता है। ;गद्ध िांक आॅक्साइड से िांक का निष्कषर्ण िांक आॅक्साइड का अपचयन कोक द्वारा किया जाता है। इसमें काॅपर की स्िथति की अपेक्षा ताप अध्िक रखा जाता है। तापन के लिए आॅक्साइड की कोक तथा मृदा के साथ छोटी - छोटी ईंटें बनाइर् जाती हैं। कोक1673ज्ञ र्दव् ़ ब् ⎯⎯⎯⎯⎯→र्द ़ ब्व् ;6ण्41द्ध धतु को आसवित कर तथा तीव्र शीतलन द्वारा एकत्रा कर लेते हैं। 6.5 धातुकमर् का वैद्युतरसायन सिद्धांत हमने देखा कि किस प्रकार ऊष्मागतिकी के सि(ांत उत्तापधातुकमिर्की में प्रयुक्त होते हैं। धातु आयनों के विलयन में अथवा गलित अवस्था में अपचयन में समान सि(ांत प्रभावी होते हैं। धातु के गलित लवण का अपचयन वैद्युतअपघटन द्वारा किया जाता है। ये विध्ियाँ वैद्युतरसायन सि(ंात पर आधरित हैं, जिसे निम्नलिख्िात समीकरण के द्वारा समझा जा सकता हैμ Δळ0 त्र दृ दम्0थ् ;6ण्42द्ध यहाँ द इलेक्ट्राॅनों की संख्या तथा म्0 निकाय के रेडाॅक्स युग्म का इलेक्ट्रोड विभव है। अध्िक ियाशील धतुओं के लिए इलेक्ट्रोड विभव का मान अध्िक )णात्मक होता है इसलिए उनका अपचयन कठिन होता है। यदि समीकरण 6.42 में दो म्0 मानों में अंतर धनात्मक म्0 के, एवं परिणामतः ट्टणात्मक Δळ0 के संगत हो, तो कम ियाशील धातु विलयन से बाहर तथा अिाक ियाशील धतु विलयन में चली जाती है। उदाहरणाथर् μ ब्न2़ ;ंुद्ध ़ थ्म;ेद्ध → ब्न;ेद्ध ़ थ्म2़ ;ंुद्ध ;6ण्43द्ध सामान्य वैद्युतअपघटन में डद़ आयन )णात्मक इलेक्ट्रोड ;वैफथोडद्ध पर विसर्जित होते हंै और वहाँ निक्षेपित हो जाते हैं। उत्पादित धातु की ियाशीलता को ध्यान में रखते हुए सावधानियाँ रखी जाती हैं एवं उपयुक्त पदाथोर्± के इलेक्ट्रोड का उपयोग किया जाता है। कभी - कभी गलित पदाथर् को अिाक सुचालक बनाने के लिए गालक मिला दिया जाता है। ऐलुमिनियम इसके धतुकमर् में, शु( ।सव्में छं।सथ्या ब्ंथ्मिलाया जाता है, जिससे मिश्रण का2336 2 गलनांक कम हो जाता है और इसमें चालकता आ जाती है। गलित आधात्राी ;मैटिªक्सद्ध का वैद्युतअपघटन किया जाता है। काबर्न की परत युक्त स्टील का पात्रा वैफथोड का कायर् करता है तथा ग्रैपफाइट के ऐनोड उपयोग में लेते हैं। संपूणर् अभ्िािया को इस प्रकार लिखा जा सकता है μ 2।स2व्3 ़ 3ब् → 4।स ़ 3ब्व्2 ;6ण्44द्ध वैद्युतअपघटन की यह विध्ि हाॅल - हेराॅल्ट प्रक्रम के नाम से सुप्रसि( है। गलित द्रव्य का वैद्युतअपघटन एक वैद्युतअपघटनी सेल में, काबर्न इलेक्ट्राॅड का प्रयोग करके किया जाता है। ऐनोड पर उत्सजिर्त आॅक्सीजन ऐनोड के काबर्न से अभ्िािया करके ब्व् एवं ब्व्बनाती है। इस प्रकार ऐलुमिनियम के प्रत्येक किलोग्राम के उत्पादन के लिए काबर्न ऐनोड का लगभग 0ण्5 किलोग्राम काबर्न जल जाता है। वैद्युतअपघटनी अभ्िाियाएं इस प्रकार हैं μ वैफथोड - ।स3़ ;गलितद्ध ़ 3मदृ → ।स;सद्ध ;6ण्45द्ध ऐनोड - ब्;ेद्ध ़ व्2दृ ;गलितद्ध → ब्व्;हद्ध ़ 2मदृ ;6ण्46द्ध ब्;ेद्ध ़ 2व्2दृ ;गलितद्ध → ब्व्2 ;हद्ध ़ 4मदृ ;6ण्47द्ध चित्रा 6.6μ ऐलुमिनियम के निष्कषर्ण के लिए वैद्युतअपघटनी सेल निम्नकोटि ;अपकृष्टद्ध अयस्कों तथा रद्दी धातु से काॅपर निम्नकोटि ;अपकृष्टद्ध अयस्कों से काॅपर का निष्कषर्ण हाइड्रोधतुकमर् द्वारा करते हैं। इसे अम्ल या जीवाणु के उपयोग से निक्षालित करते हैं तथा ब्न2़ आयन युक्त विलयन की रद्दी लोहे या भ्से िया करते हैं ¹समीकरण ;6ण्42द्धए ;6ण्48द्धह्।2 ब्न2़;ंुद्ध ़ भ्2;हद्ध → ब्न;ेद्ध ़ 2भ़् ;ंुद्ध ;6ण्48द्ध 2ब्सदृ;ंुद्ध ़ 2भ्2व्;सद्ध → 2व्भ्दृ;ंुद्ध ़ भ्2;हद्ध ़ ब्स2;हद्ध ;6ण्49द्ध इस अभ्िािया के लिए Δळ0ए़422ाश्र है। जब इसे म्0 में परिवतिर्त करते हैं ;Δळ0 त्र दृ दम्0थ् का उपयोग करते हुएद्ध तब हम म्0 त्र 2ण्2 टप्राप्त करते हैं। स्वाभाविक रूप से इसके लिए 2.2 ट से अध्िक बा“य विद्युत वाहक बल ;मउद्धि की आवश्यकता होगी। लेकिन वैद्युतअपघटन में वुफछ अन्य बाधक अभ्िाियाओं पर नियंत्राण के लिए अतिरिक्त विभव की आवश्यकता होती है, अतः ब्स वैद्युतअपघटन से प्राप्त होती है जिसमें भ् तथा22जलीय छंव्भ् सहउत्पाद होते हैं। गलित छंब्सका भी वैद्युतअपघटन किया जाता है, परंतु इस स्िथति में छं धतु प्राप्त होती है तथा छंव्भ् नहीं। 6.7 शोधन जैसा कि पहले अध्ययन कर चुके हैं, सोने और चाँदी के निष्कषर्ण में धातुओं का निक्षालन ब्छदृ के साथ किया जाता है। यह एक आॅक्सीकरण अभ्िािया है ;।ह → ।ह़ या ।न → ।ऩद्ध। धतु को बाद में विस्थापन विध्ि द्वारा पुनः प्राप्त किया जाता है। इस अभ्िािया में िांक अपचायक की तरह व्यवहार करता हैμ 4।न;ेद्ध ़ 8ब्छदृ;ंुद्ध ़ 2भ्2व्;ंुद्ध ़ व्2;हद्ध → 4ख्।न;ब्छद्ध2,दृ;ंुद्ध ़ 4व्भ्दृ;ंुद्ध ;6ण्50द्ध 2ख्।न;ब्छद्ध2,दृ;ंुद्ध ़ र्द;ेद्ध → 2।न;ेद्ध ़ ख्र्द;ब्छद्ध4,2दृ ;ंुद्ध ;6ण्51द्ध किसी भी वििा द्वारा निष्कषर्ण से प्राप्त धतुओं में सामान्य रूप से वुफछ अशुियाँ मिली रहती हैं। उच्च शु(ता की धतु प्राप्त करने के लिए अनेक विध्ियाँ प्रयोग में लाइर् जाती हैं। ये वििायाँ धतु एवं उसमें उपस्िथत अशुियों के गुणों में अंतर पर निभर्र करती हैं जिनमें से वुफछ नीचे दी गइर् हैंμ ;कद्ध आसवन ;घद्ध मंडल परिष्करण ;खद्ध द्रावगलन परिष्करण ;चद्ध वाष्प प्रावस्था परिष्करण ;गद्ध वैद्युतअपघटन ;छद्ध वणर्लेख्िाकी ;क्रोमैटोग्रैपफीद्ध वििा यहाँ इनका वणर्न संक्षेप में किया गया है। ;कद्ध आसवन यह विध्ि कम क्वथनांक वाली धतुओं जैसे िांक तथा पारद के लिए बहुत उपयोगी हैं।अशु( धतु को वाष्पीकृत करके शु( धातु को आसुत के रूप में प्राप्त कर लिया जाता है। ;खद्ध द्रावगलन परिष्करण इस वििा में कम गलनांक वाली धतु जैसे टिन को पिघलाकर ढालू सतह पर बहने दिया जाता है, जिससे अध्िक गलनांक वाली अशुियाँ अलग हो जाती हैं। ;गद्ध वैद्युतअपघटनी शोध्न इस विध्ि में अशु( धतु को ऐनोड बनाते हैं। उसी धातु की शु( धातु - पट्टðी को वैफथोड की तरह प्रयुक्त करते हैं। इन्हें एक उपयुक्त वैद्युतअपघटनी विश्लेष्िात्रा में रखते हैं जिसमें उसी धातु का लवण घुला रहता है। अध्िक क्षारकीय धतु विलयन में रहती है तथा कम क्षारकीय धातुएं ऐनोड पंक में चली जाती हैं। इस प्रक्रम की व्याख्या, वैद्युत विभव की धरणा, अध्िविभवतथा गिब्श ऊजार् के द्वारा ;उपयोगद्ध भी की जाती है, जिसको आपने पहले खंडों में देखा है। ये अभ्िाियाएं इस प्रकार हैं μ ऐनोड μ ड → डद़ ़ द मदृ वैफथोड μ डद़ ़ द मदृ → ड ;6ण्52द्ध ताँबे का शोधन वैद्युतअपघटनी विध्ि के द्वारा किया जाता है। अशु( काॅपर ऐनोड के रूप में तथा शु( काॅपर पत्राी वैफथोड के रूप में लेते हैं। काॅपर सल्पेफट का अम्लीय विलयन वैद्युतअपघटनी होता है तथा वैद्युतअपघटन के वास्तविक परिणामस्वरूप, शु( काॅपर ऐनोड से वैफथोड की तरपफ स्थानांतरित हो जाता है।़ऐनोड μब्न → ब्न2़ ़ 2 मदृ वैफथोड μ ब्न2़ ़ 2मदृ → ब्न ;6ण्53द्ध चित्रा 6.7μ मंडल परिष्करण प्रक्रम पफपफोलेदार काॅपर से अशुियाँ ऐनोड पंक के रूप में जमा होती हैं जिसमें एन्टीमनी सिलीनियम टेल्यूरियम, चाँदी, सोना तथा प्लैटिनम मुख्य होती हैं। इन तत्वों की पुनः प्राप्ित से शोधन की लागत की क्षतिपूतिर् हो सकती है। िांक का शोध्न भी इसी प्रकार से किया जा सकता है। ;घद्ध मंडल परिष्करण यह विध्ि इस सि(ांत पर आधरित है कि अशुियों की विलेयता धतु की ठोस अवस्था की अपेक्षा गलित अवस्था में अिाक होती है। अशु( धतु की छड़ के एक किनारे परएक वृत्ताकार गतिशील तापक लगा रहता है ;चित्रा 6.7द्ध। तापक जैसे ही आगे की ओर बढ़ता है, गलित से शु( धतु िस्टलित हो जाती है तथा अशुियाँ संलग्न गलित मंडल में चली जाती हैं। इस िया को कइर् बार दोहराया जाता है तथा तापक को एक ही दिशा में बार - बार चलाते हैं। अशुियाँ छड़ के एक किनारे पर एकत्रिात हो जाती हैं। इसे काटकर अलग कर लिया जाता है। यह विध्ि मुख्य रूप से अतिउच्च शु(ता वाले अध्र्चालकों तथा अन्य अतिशु( धातुओंऋ जैसे μ जमेर्नियम, सिलिकाॅन, बोराॅन, गैलियम तथा इंडियम को प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी हैμ ;चद्ध वाष्प प्रावस्था परिष्करण इस विध्ि में, धतु को वाष्पशील यौगिक में परिवतिर्त किया जाता है तथा दूसरी जगह एकत्रा कर लेते हैं। इसके बाद इसे विघटित करके शु( धतु प्राप्त कर लेते हैं। इसके लिए दो आवश्यकताएं होती हैंμ ;पद्ध उपलब्ध् अभ्िाकमर्क के साथ धतु वाष्पशील यौगिक बनाती हो तथा ;पपद्ध वाष्पशील पदाथर् आसानी से विघटित हो सकता हो, जिससे धतु आसानी से पुनः प्राप्त की जा सके। निम्नलिख्िात उदाहरण इस तकनीक को स्पष्ट करेंगेμ निवैफल शोध्न का माॅन्ड प्रक्रम μ इस प्रक्रम में निवैफल को काबर्न मोनोक्साइड के प्रवाह में गरम करने से वाष्पशील निवैफल टेट्राकाबोर्निल संवुफल बन जाता है μ 330−350ज्ञ छप ़ 4ब्व् ⎯⎯⎯⎯⎯4,→ ख्छप;ब्व्द्ध;6ण्54द्ध इस काबोर्निल को और अिाक ताप पर गरम करते हैं, जिससे यह विघटित होकर शु( धातु दे देता है। 450−470ज्ञ ख्छप;ब्व्द्ध4, → छप ़ 4ब्व्⎯⎯⎯⎯⎯;6ण्55द्ध जकार्ेनियम या टाइटेनियम शोध्न के लिए वाॅन - आरवैफल विध्ि μ यह वििा र्त तथा ज्प जैसी वुफछ धातुओं से अशुियों की तरह उपस्िथत संपूणर् आॅक्सीजन तथा नाइट्रोजन कोहटाने में बहुत उपयोगी है। परिष्कृत धतु को निवार्तित पात्रा में आयोडीन के साथ गरम करतेहैं। धातु आयोडाइड अध्िक सहसंयोजी होने के कारण वाष्पीकृत हो जाता है। र्त ़ 2प्2 → र्तप्4 ;6ण्56द्ध धतु आयोडाइड को विद्युतधारा द्वारा 1800 ज्ञ ताप पर गरम किए गए टंगस्टन तंतु पर विघटित किया जाता है। इस प्रकार से शु( धातु तंतु पर जमा हो जाती है। → र्त ़ 2प्;6ण्57द्धर्तप्4 2 ;छद्ध वणर्लेख्िाकी ;क्रोमैटोग्रैपफीद्ध विध्ियाँ यह वििा इस सि(ांत पर आधरित है कि अध्िशोषक पर मिश्रण के विभ्िान्न घटकों का अिाशोषण अलग - अलग होता है। मिश्रण को द्रव या गैसीय माध्यम में रखा जाता है जो कि अध्िशोषक में से गुशरता है। स्तंभ में विभ्िान्न घटक भ्िान्न - भ्िान्न स्तरों पर अिाशोष्िात हो जाते हैं। बाद में अिाशोष्िात घटक उपयुक्त विलायकों ;निक्षालकद्ध द्वारा निक्षालित कर लिए जाते हैं। गतिशील माध्यम की भौतिक अवस्था, अिाशोषक पदाथर् की प्रकृति एवं गतिशील माध्यम के गमन के प्रक्रम पर भी निभर्र होने के कारण इसे वणर्लेख्िाकी’ नाम दिया जाता है। इस प्रकार की एक विध्ि में काँच की नली में ।सव्23 का एक स्तंभ बनाया जाता है तथा गतिशील माध्यम जिसमें अवयवों का विलयन उपस्िथत होता है, द्रव प्रावस्था में होता है। यह स्तंभ - वणर्लेख्िाकी ;काॅलम क्रोमैटोग्रैपफीद्ध का एक उदाहरण है। यह सूक्ष्म मात्रा में पाए जाने वाले तत्वों के शुिकरण और शु( किए जाने वाले तत्व तथा अशुियों के रासायनिक गुणों में अिाक भ्िान्नता न होने की स्िथति में, शुिकरण के लिए अत्यिाक उपयोगी होती है। अनेक वणर्लेख्िाकी तकनीक हैं, जैसे कि पेपर वणर्लेख्िाकी, स्तंभ वणर्लेख्िाकी, गैस वणर्लेख्िाकी आदि। स्तंभ वणर्लेख्िाकी में प्रयुक्त प्रक्रम को चित्रा ’ अन्य रूप में, सामान्यतया वणर्लेख्िाकी में एक गतिशील प्रावस्था और एक स्िथर प्रावस्था होती है। नमूना या नमूना - सत्व एक गतिशील प्रावस्था में घुला रहता है। गतिशील प्रावस्था कोइर् गैस, द्रव अथवा अतिक्रांतिक तरल हो सकती है। स्िथर प्रावस्था अगतिशील तथा अमिश्रणनीय होती है। जैसे उपरोक्त स्तंभ वणर् लेखन में ।सव्स्तंभ। गतिशील प्रावस्था को स्िथर प्रावस्था में से प्रवाहित किया जाता है। गतिशील प्रावस्था और2 3 स्िथर प्रावस्था का चयन इस प्रकार किया जाता है कि नमूने के अवयवों की विलेयता दोनों प्रावस्थाओं में भ्िान्न - भ्िान्न हो। स्िथर प्रावस्था मेंपयार्प्त घुलनशीलता वाला घटक, इस प्रावस्था से गुशरने में, उस अवयव की अपेक्षाकृत अिाक समय लेता है, जो स्िथर प्रावस्था में अिाक घुलनशील नहीं है, परंतु गतिशील प्रावस्था में अत्यिाक घुलनशील है। इस प्रकार नमूने के घटक जैसे - जैसे स्िथर प्रावस्था में से गमन करते हैं, एक दूसरे से पृथक होते जाते हैं। दोनों प्रावस्थाओं तथा नमूने को प्रवेश्िात कराने के तरीके के आधर पर वणर्लेखन की तकनीकी विध्ि का नाम दिया जाता है। यह वििायाँ कक्षा ग्प् की पाठ्यपुस्तक के एकक 12 ;12.8.5द्ध में विस्तार से वण्िार्त की गइर् हैं। 6.8 ऐलुमिनियम, ऐलुमिनियम पन्नी का उपयोग चाॅकलेट के लिए आवरण - पत्रा ;रैपरद्ध के रूप में होता है। ़़काॅपर, िज़ क, धतु की सूक्ष्म ध्ूलि का उपयोग प्रलेपों ;पेंटद्ध व प्रलाक्षों ;रोगनद्ध में किया जाता है। अत्यिाक ियाशील होने के कारण ऐलुमिनियम का उपयोग क्रोमियम तथा मैंगनीज के आॅक्साइडोंतथा लोहे केेे उपयोग से, उनके निष्कषर्ण में किया जाता है। ऐलुमिनियम के तारों का उपयोग विद्युत चालकों के रूप में किया जाता है। ऐलुमिनियम युक्त मिश्रातु हल्की होने के कारण बहुत उपयोगी होती हैं। ताँबे का उपयोग विद्युत उद्योग में तार बनाने तथा जल और भाप के लिए पाइप बनाने में होता है। इसका उपयोग कइर् प्रकार की मिश्रधतुओं में भी किया जाता है, जो धतु से अिाक कठोर होती हैं। जैसे पीतल ;िांक के साथद्ध, काँसा ;टिन के साथद्ध तथा मुद्रा मिश्रधतु ;निवैफल के साथद्ध। िांक का उपयोग जस्तेदार लोहा बनाने में किया जाता है। व्यापक मात्रा में इसका उपयोग बैटरियों में, कइर् मिश्रधतु घटकों में, जैसे μ पीतल ;ब्नए 60ःय र्दए 40ःद्ध तथा जमर्न सिल्वर ;ब्नए 25.30ःय र्दए 25.30ःय छपए 40.50ःद्ध में होता है। यशद रज का उपयोग रंजक सामग्री, प्रलेप आदि के उत्पादन में अपचायक के रूप में किया जाता है। ढलवाँ लोहा, जो कि लोहे का सबसे महत्वपूणर् प्रकार है, इसका उपयोग स्टोवों, रेलवे स्लीपरों, गटर पाइपों तथा ख्िालौने आदि को ढालने में होता है। इसका उपयोग पिटवाँ लोहे तथा इस्पात कोबनाने में किया जाता है। पिटवाँ लोहे का उपयोग लंगरों, तारों, बोल्टों, चेनों तथा कृष्िा उपयोगी उपकरणों के बनाने में किया जाता है। स्टील ;इस्पातद्ध के अनेक उपयोग हैं। जब इसमें दूसरी धतुएं मिलाइर् जाती हैं तो मिश्रातु इस्पात प्राप्त होता है। निवैफल इस्पात का उपयोग रस्से बनाने, स्वचालित वाहनों तथा हवाइर् जहाशों के हिस्से, लोलक, मापक प़फीतों, कटाइर् के औशारों तथा संदलन मशीनों के बनाने में और स्टेनलेस स्टील का उपयोग साइकिलों, स्वचालित वाहनों, बरतनों तथा पेनों इत्यादि में किया जाता है। अभ्यास 6ण्1 काॅपर का निष्कषर्ण हाइड्रोधतुकमर् द्वारा किया जाता है, परंतु िांक का नहीं। व्याख्या कीजिए। 6ण्2 पेफन प्लवन विध्ि में अवनमक की क्या भूमिका है? 6ण्3 अपचयन द्वारा आॅक्साइड अयस्कों की अपेक्षा पाइराइट से ताँबे का निष्कषर्ण अिाक कठिन क्यों है? 6ण्4 व्याख्या कीजिए μ ;1द्ध मंडल परिष्करण ;2द्ध स्तंभ वणर्लेख्िाकी 6ण्5 673 ज्ञ ताप पर ब् तथा ब्व् में से कौन सा अच्छा अपचायक है? 6ण्6 काॅपर के वैद्युतअपघटन शोध्न में ऐनोड पंक में उपस्िथत सामान्य तत्वों के नाम दीजिए। वे वहाँ वैफसे उपस्िथत होते हैं? 6ण्7 आयरन ;लोहेद्ध के निष्कषर्ण के दौरान वात्या भट्टी के विभ्िान्न क्षेत्रों में होने वाली अभ्िाियाओं को लिख्िाए।ð6ण्8 िांक ब्लेंड से िांक के निष्कषर्ण में होने वाली रासायनिक अभ्िाियाओं को लिख्िाए। 6ण्9 काॅपर के धतुकमर् में सिलिका की भूमिका समझाइए। 6ण्10 ‘वणर्लेख्िाकी’ पद का क्या अथर् है? 6ण्11 वणर्लेख्िाकी में स्िथर प्रावस्था के चयन में क्या मापदंड अपनाए जाते हैं? 6ण्12 निवैफल - शोध्न की विध्ि समझाइए। 6ण्13 सिलिका युक्त बाॅक्साइट अयस्क में से सिलिका को ऐलुमिना से वैफसे अलग करते हैं? यदि कोइर् समीकरण हो तो दीजिए। 6ण्14 उदाहरण देते हुए भजर्न व निस्तापन में अंतर बताइए। 6ण्15 ढलवाँ लोहा कच्चे लोहे से किस प्रकार भ्िान्न होता है? 6ण्16 अयस्कों तथा खनिजों में अंतर स्पष्ट कीजिए। 6ण्17 काॅपर मेट को सिलिका की परत चढ़े हुए परिवतर्क में क्यों रखा जाता है? 6ण्18 ऐलुमिनियम के धतुकमर् में क्रायोलाइट की क्या भूमिका है? 6ण्19 निम्न कोटि के काॅपर अयस्कों के लिए निक्षालन िया को वैफसे किया जाता है? 6ण्20 ब्व् का उपयोग करते हुए अपचयन द्वारा िांक आॅक्साइड से िांक का निष्कषर्ण क्यों नहीं किया जाता? 6ण्21 ब्तव्के विरचन के लिए Δळ0 का मान दृ 540 ाश्रउवसदृ1 है तथा ।सव्के लिए दृ827 ाश्र उवसदृ1 है क्या ब्तव्23 ि 23 23 का अपचयन ।स से संभव है? 6ण्22 ब् व ब्व् में से र्दव् के लिए कौन - सा अपचायक अच्छा है? 6ण्23 किसी विशेष स्िथति में अपचायक का चयन ऊष्मागतिकी कारकों पर आधरित है। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? अपने मत के समथर्न में दो उदाहरण दीजिए। 6ण्24 उस विध्ि का नाम लिख्िाए जिसमें क्लोरीन सहउत्पाद के रूप में प्राप्त होती है। क्या होगा यदि छंब्स के जलीय विलयन का वैद्युतअपघटन किया जाए? 6ण्25 ऐलुमिनियम के वैद्युत - धतुकमर् में ग्रैपफाइट छड़ की क्या भूमिका है? 6ण्26 निम्नलिख्िात विध्ियों द्वारा धतुओं के शोध्न के सि(ांतों की रूपरेखा दीजिए। ;पद्ध मंडल परिष्करण ;पपद्ध वैद्युतअपघटन परिष्करण ;पपपद्ध वाष्प प्रावस्था परिष्करण 6ण्27 उन परिस्िथतियों का अनुमान लगाइए जिनमें ।सए डहव् को अपचयित कर सकता है। ;संकेत - पाठ्यनिहित प्रश्न 6.4 देख्िाएद्ध पाठ्यनिहित प्रश्नों केेे उत्तर 6ण्1 उन अयस्कों को जिनमें एक घटक चुंबकीय ;या तो अशु(ता या वास्तविक अयस्कद्ध होता है, इस प्रकार से संादि्रत किया जा सकता है। जैसे लोह युक्त अयस्क ;हेमेटाइट, मैग्नेटाइट, सिडेराइट तथा आयरन पाइराइटद्ध 6ण्2 निक्षालन का महत्व बाक्साइट अयस्क से ैपव्ए थ्मव्आदि अशुियों के निष्कासन में सहायक होने के कारण है।223 6ण्3 उष्मागतिकी रूप से सुसंगत वुफछ अभ्िाियाओं के लिए भी निश्िचत मात्रा में सियण उजार् की आवश्यकता होती है। अतः तापन आवश्यक है। 6ण्4 हाँ, 1350°ब् से कम ताप पर डहए ।सव्को अपचित कर सकता है तथा 1350°ब् से अिाक ताप पर ।सए डहव्23 का अपचयन कर सकता है। यह अनुमान Δळट तथा ज् के मध्य आलेख से लगाया जा सकता है ;चित्रा 6.4द्ध।

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