उद्देश्य इस एकक के अध्ययन के पश्चात् आपμ ऽ अंतरापृष्ठीय परिघटना एवं इसके महत्व का वणर्न कर सकेंगेऋ ऽ अध्िशोषण को परिभाष्िात कर सकेंगे एवं इसेभौतिक एवं रासायनिक अध्िशोषण में वगीर्कृत कर सकेंगेऋ ऽ अध्िशोषण की ियाविध्ि की व्याख्या कर सकेंगेऋ ऽ गैसों एवं विलयनों के ठोसों पर अध्िशोषण को नियंत्रिात करने वाले कारकों की व्याख्या कर सकेंगेऋ ऽ प्रफाॅयंडलिक ;थ्तमनदकसपबीद्ध अध्िशोषण समतापी वक्रों के आधर पर अध्िशोषण परिणामों की व्याख्या कर सकेंगेऋ ऽ उद्योगों में उत्प्रेरक की भूमिका का महत्व समझ सकेंगेऋ ऽ कोलाॅइडी अवस्था की प्रकृति का वणर्न कर सकेंगेऋ ऽ कोलाॅइडों का विरचन, गुणों एवं शु(ीकरण का वणर्न कर सकेंगेऋ ऽ इमल्शनों ;पायसद्ध का वगीर्करण एवं उनका विरचन तथा गुणों का वणर्न कर सकेंगेऋ ऽ जेल निमार्ण की परिघटना का वणर्न कर सकेंगेऋ ऽ कोलाॅइडों के उपयोगों को सूचीब( कर सकेंगे। फ्वुफछ अत्यिाक महत्वपूणर् रसायनों का औद्योगिक उत्पादन ठोस उत्प्रेरकों की सतह पर होने वाली अभ्िाियाओं द्वारा किया जाता है।य् पृष्ठ रसायन सतह या अंतरापृष्ठ पर होने वाली परिघटनाओं से संबंिात क्षेत्रा है। अंतरापृष्ठ या सतह को स्थूल प्रावस्थाओं से अलग दशर्ाने के लिए एक हाइपफन ;दृद्ध या स्लैश ;ध्द्ध का उपयोग किया जाता है। उदाहरणाथर्, एक ठोस एवं गैस के बीच अंतरापृष्ठ को, ठोस - गैस या ठोस / गैस द्वारा दशार्या जाता है। पूणर् मिश्रणीयता के कारण गैसों के मध्य कोइर् अंतरापृष्ठ नहीं होता। पृष्ठ रसायन में हम जिन स्थूल प्रावस्थाओं के संपवर्फ में आते हैं वे शु( यौगिक या विलयन हो सकते हैं। अंतरापृष्ठ की मोटाइर् बहुध कुछ अणुओं तक सीमित रहती है, परंतु इसका क्षेत्रापफल स्थूल प्रावस्थाओं के कणों के आकार पर निभर्र करता है। बहुत - सी ध्यान देने योग्य महत्वपूणर् परिघटनाएं जैसे, संक्षारण, इलेक्ट्रोड प्रक्रम, विषमांगी उत्पे्ररण, विलीनीकरण एवं िस्टलीकरण, अंतरापृष्ठ पर परिलक्ष्िात होती हैं। पृष्ठ रसायन का विषय उद्योग, विश्लेषण कायर् एवं दैनिक जीवन की परिस्िथतियों में कइर् अनुप्रयोग पाता है। पृष्ठ अध्ययनों को सतवर्फतापूवर्क निष्पादित करने हेतु पृष्ठ का वस्तुतः स्वच्छ होना अतिआवश्यक है। 10दृ8 से 10दृ9 पास्कल कोटि के अति उच्च निवार्त में आजकल धतुओं के अत्यध्िक स्वच्छ पृष्ठ प्राप्त करना संभव है। ऐसे स्वच्छ सतह वाले ठोस पदाथो± को निवार्त में ही भंडारित करना चाहिए अन्यथा उनका पृष्ठ, वायु के प्रमुख अवयवों अथार्त् डाइनाइट्रोजन एवं डाइआॅक्सीजन के अणुओं से आच्छादित हो जाएगा। इस एकक में आप कोलाॅइड, इमल्शन तथा जेल सहित पृष्ठ रसायन की वुफछ महत्वपूणर् विश्िाष्टताओं, जैसेμ अध्िशोषण, उत्प्रेरण और कोलाॅइडों के बारे में पढ़ेंगे। 5.1 अिाशोषण ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो यह प्रदश्िार्त करते हैं कि किसी ठोस के पृष्ठ की प्रवृिा, संपवर्फ में आने वाली प्रावस्था के अणुओं को आकष्िार्त कर धरित करने की होती है। यह अणु केवल पृष्ठ पर ही रहते हैं एवं स्थूल में गहराइर् पर नहीं जाते। अणुक स्पीशीश का किसी ठोस या द्रव के स्थूल की अपेक्षा पृष्ठ पर संचित होना अध्िशोषण कहलाता है। अणुक 5.1.1 अिाशोषण एवं अवशोषण में विभेद 5.1.2 अिाशोषण की ियावििा स्पीशीश या पदाथर् जो कि पृष्ठ पर सांित या संचित होता है अध्िशोष्य कहलाता है एवं पदाथर् जिसके पृष्ठ पर अध्िशोषण होता है, अध्िशोषक कहलाता है। अध्िशोषण निश्िचत रूप से पृष्ठीय परिघटना है। विशेष रूप से बारीक चूणर् अवस्था में ठोस, जो अध्िक पृष्ठ क्षेत्रापफल के होते हैं, जैसे चारकोल, सिलिका जेल, ऐलुमिना जेल, मिट्टðी, कोलाॅइड सूक्ष्म विभाजित धतुएं इत्यादि अच्छे अवशोषक का कायर् करते हैं। ियाविध्ियों में अध्िशोषण ;पद्ध यदि चूण्िार्त चारकोल वाले बंद पात्रा में व्2ए भ्2ए ब्व्ए ब्स2ए छभ्3 या ैव्2 जैसी गैसें ली जाएं, तो ऐसा देखा जाता है कि पात्रा में गैस का दाब घट जाता है। गैस के अणु चारकोल की सतह पर सांित हो जाते हैं अथार्त् गैसें सतह पर अध्िशोष्िात हो जाती हैं। ;पपद्ध एक काबर्निक रंजक जैसे मेथ्िालीन ब्लू के विलयन में जब जांतव चारकोल मिलाकर विलयन को अच्छी प्रकार हिलाया जाता है, तो निस्यंद ;छनित्राद्ध रंगहीन हो जाता है क्योंकि रंजक के अणु चारकोल की सतह पर एकत्रिात हो जाते हैं अथार्त् अध्िशोष्िात हो जाते हैं। ;पपपद्ध अपरिष्कृत शवर्फरा के जलीय विलयन को जब जांतव चारकोल की परतों पर से प्रवाहित किया जाता है तो यह रंगहीन हो जाता हैऋ क्योंकि रंगीन पदाथर् चारकोल द्वारा अिाशोष्िात कर लिए जाते हैं। ;पअद्ध सिलिका जेल की उपस्िथति में वायु शुष्क हो जाती है, क्योंकि जल के अणु जेल की सतह पर अध्िशोष्िात हो जाते हैं। उपरोक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ठोस पृष्ठ गैस या द्रव के अणुओं को अध्िशोषण के कारण बाँध्े रखती हैं। किसी अध्िशोष्िात पदाथर् को उस पृष्ठ से हटाना जिस पर वह अिाशोष्िात है, विशोषण कहलाता है। अध्िशोषण में पदाथर् केवल पृष्ठ पर सांित होता है एवं अध्िशोषक की सतह से स्थूल में प्रवेश नहीं करता, जबकि अवशोषण में पदाथर्, ठोस के संपूणर् स्थूल में समानरूप से वितरित हो जाता है। उदाहरण के लिए जब एक चाक को स्याही में डुबोया जाता है तो चाक की सतह रंजक अणुओं के अध्िशोषण के कारण स्याही का रंग धरण कर लेती है। केवल स्याही का विलायक अवशोषण के कारण चाक में अंदर तक चला जाता है। चाक को तोड़ने पर यह अंदर से सपेफद निकलती है। जल वाष्प का उदाहरण लेकर अध्िशोषण एवं अवशोषण में विभेद किया जा सकता है। जल वाष्प शुष्क वैफल्िसयम क्लोराइड के द्वारा अवशोष्िात होती है जबकि सिलिका जेल द्वारा अध्िशोष्िात होती है। दूसरे शब्दों में, अध्िशोषण में अध्िशोष्य की सांद्रता केवल अध्िशोषक के पृष्ठ पर बढ़ती है जबकि अवशोषण में सांद्रता ठोस के संपूणर् स्थूल में एक समान रहती है। अध्िशोषण एवं अवशोषण साथ - साथ भी हो सकते हैं। दोनों प्रक्रमों को समझाने के लिए शोषण शब्द ;पदद्ध का प्रयोग किया जाता है। अध्िशोषण की उत्पिा इस तथ्य से होती है कि अध्िशोषक के पृष्ठीय कण वैसे वातावरण में नहीं होते जिसमें स्थूल के अंदर के कण होते हैं। अध्िशोषक के अंदर के कणों पर लगने वाले सभी बल आपस में संतुलित होते हैं परंतु पृष्ठीय कण सभी दिशाओं में अपनी प्रकार के परमाणुओं या अणुओं से घ्िारे नहीं होते, अतः उन पर असंतुलित या अध्िशेष आकषर्णबल होते हैं। अध्िशोषक के ये बल ही अध्िशोष्य कणों को आकष्िार्त करने के लिए उत्तरदायी होते हैं। एक दिए गए ताप एवं दाब पर अध्िशोषण की सीमा अध्िशोषक के प्रति इकाइर् द्रव्यमान का क्षेत्रापफल बढ़ने के साथ बढ़ती है। 123 पृष्ठ रसायन 5.1.3 अिाशोषण के प्रकार दूसरा महत्वपूणर् कारक जो अध्िशोषण की विशेषता चित्रिात करता है, वह है अध्िशोषणऊष्मा। अध्िशोषण होने पर पृष्ठ के अवश्िाष्ट बलों में सदैव कमी आती है अथार्त् पृष्ठ ऊजार्में कमी आती है जो कि ऊष्मा के रूप में प्रकट होती है। अतः अिाशोषण सदा एकऊष्माक्षेपी प्रक्रम होता है। दूसरे शब्दों में, अध्िशोषण का Δभ् हमेशा )णात्मक होता है। जब एक गैस अध्िशोष्िात होती है, तो इसके अणुओं का संचलन ;उवअमउमदजद्ध सीमित हो जाता है। इससे अध्िशोषण के पश्चात् गैस की ऐन्ट्राॅपी घट जाती है। अथार्त् Δै )णात्मक होता है। इस प्रकार अध्िशोषण होने पर निकाय की एन्थैल्पी एवं एन्ट्राॅपी घटती हंै। किसीप्रक्रम के स्वतः प्रवतिर्त होने के लिए, ऊष्मागतिकीय आवश्यकता यह है कि स्िथर ताप एवं दाब पर Δळ )णात्मक होना चाहिए अथार्त् गिब्श ऊजार् में कमी होनी चाहिए। समीकरण Δळ त्र Δभ्दृ ज्Δै के आधर पर Δळ तभी )णात्मक हो सकता है जब Δभ् का मान पयार्प्त )णात्मक हो, क्योंकि दृज्Δै का मान ध्नात्मक है। अतः अध्िशोषण प्रक्रम में, जो कि स्वतः प्रवतिर्त होता है, इन दोनों गुणकों का संयोजन Δळ को )णात्मक बनाता है। जैसे - जैसे अध्िशोषण बढ़ता है Δभ् कम )णात्मक होता जाता है एवं अंत में Δभ्ए ज्Δै के तुल्य हो जाता है एवं Δळ का मान शून्य हो जाता है। इस अवस्था पर साम्य स्थापित हो जाता है। ठोसों पर गैसों के अध्िशोषण दो प्रकार के होते हैं। यदि किसी ठोस के पृष्ठ पर गैस का संचयन दुबर्ल वान्डरवालस बलों के कारण होता है तो अध्िशोषण को भौतिक अध्िशोषण ;च्ीलेपबंस ंकेवतचजपवद वत च्ीलेपवतचजपवदद्ध कहते हैं। जब गैस के अणु या परमाणु ठोस पृष्ठ पर रासायनिक बंधें से जुड़ते हैं तो अध्िशोषण, रासायनिक अध्िशोषण या रसोवशोषण ;ब्ीमउपबंस।केवतचजपवद वत ब्ीमउपेवतचजपवदद्ध कहलाता है। रासायनिकबंध् प्रकृति में सहसंयोजक या आयनिक हो सकते हैं। रसोवशोषण में उच्च सियण ऊजार् सम्िमलित होती है, अतः इसे सामान्यतया सियत अध्िशोषण संद£भत किया जाता है। कभी - कभी ये दोनों प्रक्रम साथ - साथ होते हैं एवं अध्िशोषण का प्रकार निश्िचत करना आसान नहीं होता। निम्न ताप पर होने वाला भौतिक अध्िशोषण ताप बढ़ाने पर रसोवशोषण में बदल जाता है। उदाहरण के लिए, डाइहाइड्रोजन पहले निवैफल की सतह पर वान्डरवालस बलों के द्वारा अध्िशोष्िात होती है। तत्पश्चात् हाइड्रोजन के अणु, परमाणुओं में वियोजित होते हैं, जो कि रसोवशोषण द्वारा निवैफल की सतह पर बंध्े रहते हैं। दोनों प्रकार के अिाशोषणों के कुछ प्रमुख अभ्िालक्षण नीचे वण्िार्त किए गए हैं। भौतिक अध्िशोषण के अभ्िालक्षण ;पद्धविश्िाष्टता की कमी μ एक अध्िशोषक की दी गइर् सतह किसी विश्िाष्ट गैस के लिए कोइर् प्राथमिकता नहीं दशार्ती क्योंकि वान्डरवाल्स बल व्यापक होते हैं। ;पपद्धअध्िशोष्य की प्रकृति μ किसी ठोस द्वारा अध्िशोष्िात गैस की मात्रा गैस की प्रकृति पर निभर्र करती है। सामान्यतया, सरलतापूवर्क द्रवणीय गैसें ;यानि उच्च क्रंातिक तापों वालीद्ध आसानी से अध्िशोष्िात हो जाती हैं, क्योंकि वान्डरवाल्स बल क्रांतिक तापों के निकट अिाक प्रबल होते हैं। इसीलिए 1ह सियत चारकोल, मेथेन ;क्रंातिक ताप 190 ज्ञद्ध की अपेक्षा अध्िक सल्पफर डाइआॅक्साइड ;क्रंातिक ताप 630ज्ञद्ध को अिाशोष्िात करता है जो कि 4ण्5 उस् डाइहाइड्रोजन ;क्रांतिक ताप 33ज्ञद्ध से भी अिाक है। ;पपपद्धउत्क्रमणीय प्रकृति μ गैस का ठोस पर अध्िशोषण सामान्यतया उत्क्रमणीय होता है। अतः ठोस $ गैस स गैस/ठोस $ ऊजार् दाब बढ़ाने पर अध्िक गैस अध्िशोष्िात होती है क्योंकि इससे गैस का आयतन कम होता है ;ले - शातैलिए का सि(ांतद्ध और दाब घटाकर गैस को निकाला जा सकता है। अिाशोषण रसायन विज्ञान 124 प्रक्रम ऊष्माक्षेपी होने के कारण, भौतिक अध्िशोषण निम्न ताप पर सहजता से होता है और ताप बढ़ने पर घटता है ;ले - शातैलिए का सि(ांतद्ध। ;पअद्ध अध्िशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रापफलμ अध्िशोषण का परिमाण अध्िशोषक के पृष्ठीय क्षेत्रापफल के बढ़ने के साथ बढ़ता है। अतः महीन चूण्िार्त धतुएं एवं सरंध््र पदाथर् जिनका पृष्ठीय क्षेत्रापफल अध्िक होता है, अच्छे अध्िशोषक होते हैं। ;अद्ध अध्िशोषण की एन्थैल्पीμ निसंदेह, भौतिक अध्िशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है परंतु अध्िशोषण की एन्थैल्पी, अत्यिाक कम ;20 दृ 40 ाश्र उवसदृ1द्ध होती है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि गैसीय अणुओं एवं ठोस सतह के मध्य आकषर्ण केवल दुबर्ल वान्डरवाल्स बलों के कारण होता है। रसोवशोषण के अभ्िालक्षण ;पद्ध उच्च विश्िाष्टताμ रसोवशोषण अतिविश्िाष्ट होता है एवं यह केवल तभी होता है जब अध्िशोषक एवं अध्िशोष्य के मध्य रासायनिक बंध् बनने की कोइर् संभावना हो। उदाहरणाथर्, आॅक्सीजन धतुओं पर आॅक्साइड बनने के कारण अिाशोष्िात होती है एवं हाइड्रोजन का संक्रमण धतुओं द्वारा अवशोषण हाइड्राइड बनने के कारण होता है। ;पपद्ध अनुत्क्रमणीयताμ रसोवशोषण में यौगिक बनने के कारण इसकी प्रकृति अनुत्क्रमणीयहोती है। रसोवशोषण भी एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है परंतु उच्च सियण ऊजार् के कारण निम्न तापों पर यह बहुत ध्ीमा होता है। अध्िकांश रासायनिक परिवतर्नों के समान अिाशोषण ताप बढ़ने पर प्रायः बढ़ता है। निम्नताप पर गैस का भौतिक अध्िशोषण, उच्च ताप पर रसोवशोषण में बदल सकता है। साधरणतया उच्च दाब भी रसोवशोषण के लिए सहायक होता है। ;पपपद्ध पृष्ठीय क्षेत्रापफलμ भौतिक अध्िशोषण के समान, रसोवशोषण भी अध्िशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रापफल बढ़ने पर बढ़ता है। ;पअद्ध अध्िशोषण की एन्थैल्पीμ रसोवशोषण की एन्थैल्पी उच्च ;80.240 ाश्र उवसदृ1द्ध होती है क्योंकि इसमें रासायनिक बंध् का निमार्ण होता है। सारणी 5ण्1μ भौतिक अध्िशोषण एवं रासायनिक अध्िशोषण की तुलना 5.1.4 अिाशोषण समतापी चित्रा 5.2μप्रफाॅयन्डलिक समतापी 5.1.5 विलयन प्रावस्था से अिाशोषण अध्िशोषक द्वारा अध्िशोष्िात गैस की मात्रा में स्िथर ताप पर दाब के साथ परिवतर्न एक वक्र के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है, जिसे अध्िशोषण समतापी कहते हैं। प्रफाॅयन्डलिक समतापीवक्रμ प्रफाॅयन्डलिक ने 1909 में ठोस अध्िशोषक के इकाइर् द्रव्यमान द्वारा एक निश्िचत ताप पर अिाशोष्िात गैस की मात्रा एवं दाब के मध्य एक प्रयोगाश्रित संबंध् दिया। संबंध् को निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है μ ग त्र ाण्च1ध् द ;द झ 1द्ध;5ण्1द्धउ जहाँ ग अध्िशोषक के उ द्रव्यमान द्वारा च दाब पर अध्िशोष्िात गैस का द्रव्यमान है। ा एवं द स्िथरांक हैं जो कि किसी निश्िचत ताप पर अध्िशोषक एवंगैस की प्रकृति पर निभर्र करते हैं। संबंध् को सामान्यतया एक वक्र के रूप में निरूपित किया जाता है जिसमें अध्िशोषक के प्रति ग्राम द्वारा अध्िशोष्िात गैस का द्रव्यमान दाब के विपरीत आलेख्िात किया जाता है ;चित्रा 5.1द्ध। ये वक्र इंगित करते हैं कि एक निश्िचत दाब पर, ताप बढ़ाने से भौतिक अिाशोषण घटता है। ये वक्र उच्च दाब पर हमेशा संतृप्ता की ओर बढ़ते प्रतीत होते हैं। समीकरण 5.1 का लघुगणक लेने परμ 1सवह ग त्र सवह ा ़ सवह च ;5ण्2द्धउदप्रफाॅयन्डलिक समतापी वक्र की वैध्ता, आलेख में सवह ग को ल.अक्षउ;कोटिद्ध एवं सवह च को ग.अक्ष ;भुजद्ध पर लेकर प्रमाण्िात की जा सकती है। यदि यह एक सीध्ी रेखा आती है तो प्रफाॅयन्डलिक समतापी वक्र प्रमाण्िात है, अन्यथा नहीं ;चित्रा 5.2द्ध। सीध्ी रेखा के ढाल 1 का मान देता है। ल.अक्ष पर अंतःखंडद सवह ा का मान देता है। प्रफाॅयन्डलिक समतापी अध्िशोषण के व्यवहार की सन्िनकट व्याख्या करता है। गुणक 1 का मान 0 एवं 1 के मध्य हो सकता है ;अनुमानित सीमा 0.1 से 0.5द्ध। दअतः समीकरण 5.2 दाब के सीमित विस्तार तक ही लागू होती है। क्योंकि 1 त्र 0ए ग त्र स्िथरांक, अतः अध्िशोषण दाब से स्वतंत्रा है।दउ1 गजब त्र 1ए ग त्र ा च अथार्त ∝ चए अतः अध्िशोषण में परिवतर्न दाबदउ उ के अनुक्रमानुपाती है। दोनों ही प्रतिबंधें का प्रायोगिक परिणामों से समथर्न होता है। प्रायोगिक समतापी सदैव उच्च दाब पर संतृप्ता की ओर अभ्िागमन करते प्रतीत होते हैं। इसे प्रफाॅयन्डलिक समतापी से नहीं समझाया जा सकता। इस प्रकार यह उच्च दाब पर असपफल हो जाता है। ठोस, विलयनों से भी घुले हुए पदाथो± का अध्िशोषण कर सकते हैं। जब ऐसीटिक अम्ल के जलीय विलयन को चारकोल के साथ हिलाया जाता है तो अम्ल का एक अंश चारकोल के द्वारा अध्िशोष्िात हो जाता है एवं विलयन में अम्ल की सांद्रता घट जाती है। इसी प्रकार से लिटमस का विलयन चारकोल के साथ हिलाने पर रंगहीन हो जाता है। जब डह;व्भ्द्ध2 को मैग्नेसाॅन अभ्िाकमर्क की उपस्िथति में अवक्षेपित किया जाता है तो यह नीला रंग ग्रहण कर लेता है। रसायन विज्ञान 5.1.6 अिाशोषण के अनुप्रयोग यह रंग मैग्नेसाॅन के अध्िशोषण के कारण होता है। विलयन प्रावस्था से अध्िशोषण में निम्नलिख्िात प्रेक्षण प्राप्त किए गए हैं। ;पद्ध अध्िशोषण की सीमा ताप के बढ़ने पर घटती है। ;पपद्ध अध्िशोषण की सीमा, अध्िशोषक का पृष्ठीय क्षेत्रापफल बढ़ने पर बढ़ती है। ;पपपद्ध अध्िशोषण की सीमा, विलयन में विलेय की सांद्रता पर निभर्र करती है। ;पअद्ध अध्िशोषण की सीमा अध्िशोषण एवं अध्िशोष्य की प्रकृति पर निभर्र करती है। विलयनों से अध्िशोषण की परिशु( ियाविध्ि ज्ञात नहीं है। प्रफाॅयन्डलिक समीकरण विलयनों से अध्िशोषण के व्यवहार का इस अंतर के साथ सन्िनकट वणर्न करती है कि दाब के स्थान पर विलयन की सांद्रता पर विचार किया जाता है। अथार्त्, गा ब्1ध्दत्र ;5ण्3द्धउ;यहाँ ब् साम्यसांद्रता है, अथार्त् अध्िशोषण पूणर् होने पर सांद्रताद्ध उपरोक्त समीकरण का लघुगणक लेने पर हम पाते हैं,1सवह ग त्र सवहा ़ सवहब् ;5ण्4द्धउद सवह ग को सवहब् के विपरीत आलेख्िात करने पर एक सीध्ी रेखा प्राप्त होती है जोउ कि प्रफाॅयन्डलिक समतापी के सत्यापन को दशार्ती है। इसको प्रायोगिक तौर पर ऐसीटिक अम्ल की विभ्िान्न सांद्रताओं के विलयन लेकर परखा जा सकता है। विलयनों के समान आयतन,चारकोल की समान मात्राओं में अलग - अलग फ्रलास्कों में मिलाये जाते हैं। अध्िशोषण केपश्चात् प्रत्येक फ्रलास्क में ऐसीटिक अम्ल की अंतिम सांद्रता ज्ञात की जाती है। प्रारंभ्िाक एवं अंतिम संाद्रताओं में अंतर, श्गश् का मान देता है। उपरोक्त समीकरण का उपयोग करते हुए प्रफाॅयन्डलिक समतापी की सत्यता स्थापित की जा सकती है। अध्िशोषण की परिघटना के अनेक अनुप्रयोग हैं। कुछ महत्वपूणर् अनुप्रयोग यहाँ सूचीब( किए गए हैंμ ;पद्ध उच्च निवार्त उत्पन्न करने में अत्यध्िक उच्च निवार्त उत्पन्न करने के लिए, निवार्त पंप द्वारा निवार्तित पात्रा से लेशमात्रा वायु, चारकोल पर अध्िशोष्िात करके निकाली जा सकती है। ;पपद्ध गैस मास्क गैस मास्क ;एक युक्ित, जिसमें साियित चारकोल या अध्िशोषकों का मिश्रण होता हैद्ध का उपयोग कोयले की खानों में साँस लेते समय, विषैली गैसों को अध्िशोष्िात करने के लिए किया जाता है। ;पपपद्ध आद्रता पर नियंत्राण सिलिका जेल एवं ऐलुमिनियम जेल का उपयोग नमी को दूर करने एवं आद्रता को नियंत्रिात करने के लिए किया जाता है। ;पअद्ध विलयनों से रंगीन पदाथो± को हटाना जांतव चारवफोल विलयनों की रंगीन अशुियों को अध्िशोष्िात कर रंग हटा देता है। ;अद्ध विषमांगी उत्प्रेरण उत्प्रेरक की ठोस सतह पर अभ्िाियकों का अध्िशोषण अभ्िािया की दर बढ़ा देता है। औद्योगिक महत्व की ऐसी कइर् गैसीय अभ्िाियाएं हैं, जिनमें ठोस उत्प्रेरकों का होना आवश्यक है। अमोनिया के उत्पादन में लोहे का उत्प्रेरक की तरह उपयोग, 127 पृष्ठ रसायन 5.2 उत्प्रेरण भ्ैव्का संपवर्फ प्रक्रम से उत्पादन, एवं तेलों के हाइड्रोजनीकरण में सूक्ष्मविभाजित24 निवैफल का उपयोग, विषमांगी उत्प्रेरण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ;अपद्ध अिय गैसों का पृथक्करण गैसों के चारकोल द्वारा अध्िशोषण की मात्रा में भ्िान्नता होने के कारण मिश्रण में से अिय गैसों को नारियल चारकोल पर, विभ्िान्न तापों पर अध्िशोष्िात करके पृथक किया जा सकता है। ;अपपद्ध व्याध्ियों के उपचार में अनेक औषध् कीटाणुओं को अध्िशोषण द्वारा मारने में प्रयुक्त होते हैं। ;अपपपद्ध झाग प्लवन प्रक्रम चीड़ के तेल एवं झाग कारक का उपयोग करके एक निम्न श्रेणी के सल्पफाइड अयस्क को सिलिका जेल एवं अन्य मृदा पदाथो± से पृथक कर सांदि्रत किया जा सकता है। ;एकक 1 देखेंद्ध ;पगद्ध अध्िशोषण सूचककुछ अवक्षेपों की सतहें, जैसेμ सिल्वर हैलाइड, इओसिन, फ्रलुओरेसाइन आदि जैसे वुफछ रंजकों को अवशोष्िात कर सकती हैं एवं इस प्रकार अंतिम ¯बदु पर अभ्िालक्षण्िाक रंग प्रदान करती हैं। ;गद्ध वणर्लेख्िाकीय विश्लेषण अध्िशोषण की परिघटना पर आधरित वणर्लेख्िाकीय विश्लेषण के विश्लेष्िाक एवं औद्योगिक क्षेत्रों में अनेक उपयोग हैं। पोटैश्िायम क्लोरेट को तीव्र गमर् करने पर यह डाइआॅक्सीजन देते हुए ध्ीरे - ध्ीरे विघटित हो जाता है। विघटन 653 से 873 ताप परास पर होता है। 2ज्ञब्सव्3 → 2ज्ञब्स ़ 3व्2 तथापि, जब उक्त अभ्िािया में थोड़ा - सा मैंगनीज डाइआॅक्साइड मिला दिया जाता है तो विघटन उल्लेखनीय निम्न ताप परास, अथार्त् 473 - 633ज्ञए पर हो जाता है एवं अभ्िािया दर भी पयार्प्त रूप से बढ़ जाती है। मिलाए गए मैंगनीज डाइआॅक्साइड का द्रव्यमान एवं संघटन अपरिवतिर्त रहता है। इसी प्रकार से बाहरी पदाथो± की उपस्िथति मात्रा से कइर् रासायनिक अभ्िाियाओं की दरें परिवतिर्त की जा सकती हैं। विभ्िान्न बाहरी पदाथो± के विभ्िान्न रासायनिक अभ्िाियाओं पर प्रभाव का व्यवस्िथत अध्ययन सवर्प्रथम 1835 में बजीर्लियस ने किया। उसने ऐसे पदाथो± के लिए उत्प्रेरक पद का सुझाव दिया। वे पदाथर् जो रासायनिक अभ्िािया के पश्चात् रासायनिक एवं मात्रात्मक रूप से अपरिवतिर्त रहते हुए, रासायनिक अभ्िािया की दर में वृि कर देते हैं, उत्प्रेरक कहलाते रसायन विज्ञान 5.2.1 समांगी एवं विषमांगी उत्प्रेरण हैं एवं इस परिघटना को उत्प्रेरण कहते हैं। आप खंड 4.5 में उत्प्रेरकों एवं इनकी कायर्प्रणाली के बारे में पढ़ चुके हैं। वध्र्क एवं विषकारक वध्र्क वे पदाथर् होते हैं जो उत्प्रेरक की सियता बढ़ा देते हैं जबकि विष, उत्प्रेरक की सियता घटा देते हैं। उदाहरण के लिए अमोनिया के हाबर प्रक्रम द्वारा उत्पादन में, माॅलिब्डेनम लोहे के लिए वध्र्क का कायर् करता है, जो कि उत्प्रेरक की तरह प्रयुक्त होता है। ;हद्ध थ्म;ेद्ध ⎯⎯⎯छ2 ़ 3भ्2डव;ेद्ध→ 2छभ्3;हद्ध उत्प्रेरण मुख्यतः दो समूहों में विभाजित किया जा सकता हैμ ;कद्ध समांगी उत्प्रेरण जब अभ्िाियक एवं उत्प्रेरक समान प्रावस्था ;अथार्त् द्रव या गैसद्ध में हों तो प्रक्रम समांगी उत्प्रेरण कहलाता है। समांगी उत्प्रेरण के कुछ उदाहरण निम्नलिख्िात हैंμ ;पद्ध सीसा कक्ष वििा ;लेड चेंबर प्रक्रमद्ध में नाइट्रोजन के आॅक्साइडों की उत्प्रेरक की तरह उपस्िथति में, सल्पफर डाइआॅक्साइड का डाइआॅक्सीजन के साथ अभ्िािया द्वारा सल्पफर डाइआॅक्साइड में आॅक्सीकरणμ छव्;हद्ध2ैव्2;हद्ध ़ व्2;हद्ध ⎯⎯⎯;हद्ध→ 2ैव्3अभ्िाियक, सल्पफर डाइआॅक्साइड तथा आॅक्सीजन एवं उत्प्रेरक नाइटिªक आॅक्साइड सभी समान प्रावस्था में हैं। ;पपद्ध हाइड्रोक्लोरिक अम्ल द्वारा प्रदत्त भ़् आयनों से मेथ्िाल ऐसीटेट का जल अपघटन उत्प्रेरित होता है। भ्ब्प्;ंुद्धब्भ्ब्व्व्ब्भ्;सद्ध़ भ्व्;सद्ध ⎯⎯⎯→ ब्भ्ब्व्व्भ्;ंुद्ध ़ ब्भ्व्भ्;ंुद्ध33233अभ्िाियक एवं उत्प्रेरक दोनों ही समान प्रावस्था में हैं। ;पपपद्ध शवर्फरा का जल अपघटन, सल्यूरिक अम्ल द्वारा प्रदत्त भ़् आयनों से उत्प्रेरित होता है। भ्ैव् ;प्द्ध 24ब् भ् व् ;ंुद्ध ़ भ् व्;सद्ध ⎯⎯⎯⎯ब् भ् व् ;ंुद्ध ़ ब्भ् → व् ;ंुद्ध 12 22 11 विलयन 2 6 12 ग्लक 6 ूोस 6 12 6 पफ्र क्टासे अभ्िाियक एवं उत्प्रेरक;खद्ध विषमांगी उत्प्रेरण दोनों समा न प्रावस्था में हैं। उत्प्रेरकी प्रक्रम जिसमें अभ्िाियक एवं उत्प्रेरक भ्िान्न प्रावस्थाओं में होते हैं, विषमांगी उत्प्रेरण कहलाता है। विषमांगी उत्प्रेरण के वुफछ उदाहरण निम्नलिख्िात हैंμ ;पद्ध च्ज की उपस्िथति में सल्पफर डाइआॅक्साइड का सल्पफर ट्राइआॅक्साइड में आॅक्सीकरणμ च्ज;ेद्ध2ैव् ;हद्ध2ैव् ;हद्ध2 3 अभ्िाियक गैसीय प्रावस्था में हैं जबकि उत्प्रेरक ठोस अवस्था में हैं। ;पपद्ध हाबर प्रक्रम में सूक्ष्म विभाजित लोहे की उपस्िथति में अमोनिया बनने में डाइनाइट्रोजन एवं डाइहाइड्रोजन के मध्य संयोजनμ 129 पृष्ठ रसायन 5.2.2 विषमांगी उत्प्रेरण का अध्िशोषण सि(ांत चित्रा 5.3μअभ्िाकारी अणुओं का अिाशोषण, मध्यवतीर् का बनना एवं उत्पादों का विशोषण। रसायन विज्ञान थ्म;ेद्धछ ;हद्ध ़ 3भ् ;हद्ध2छभ् ;हद्ध22 3 अभ्िाियक गैसीय प्रावस्था में हैं जबकि उत्प्रेरक ठोस प्रावस्था में हैं। ;पपपद्धओस्टवाल्ड प्रक्रम में, प्लेटिनम गेज की उपस्िथति में, अमोनिया का नाइटिªक आॅक्साइड में आॅक्सीकरणμ च्ज;ेद्ध4छभ् ;हद्ध ़ 5व् ;हद्ध4छव्;हद्ध ़ 6भ् व्;हद्ध32 2 अभ्िाियक गैसीय प्रावस्था में हैं जबकि उत्प्रेरक ठोस प्रावस्था में हैं। ;पअद्ध सूक्ष्म विभाजित निवैफल उत्प्रेरक की उपस्िथति में वनस्पति तेलों का हाइड्रोजननμ छप;ेद्धवनस्पति तेल े;सद्ध ़ भ् ;हद्धवनस्पति घी ;ेद्ध अभ्िाियकों में से एक द्रव प्रावस्था में है जबकि दूसरा गैसीय प्रावस्था में है और उत्प्रेरक ठोस प्रावस्था में है। 2 यह सि(ांत विषमांगी उत्प्रेरण की ियाविध्ि को स्पष्ट करता है। प्राचीन सि(ांत जो कि उत्प्रेरण का अध्िशोषण सि(ांत कहलाता था, के अनुसार गैसीय प्रावस्था या विलयन में अभ्िाियक, ठोस उत्प्रेरक के पृष्ठ पर अध्िशोष्िात हो जाते हैं। पृष्ठ पर अभ्िाियकों कीसांद्रता में वृि अभ्िािया की दर को बढ़ा देती है। अध्िशोषण एक ऊष्माक्षेपी अभ्िािया हैअतः अध्िशोषण की ऊष्मा, अभ्िािया की दर बढ़ाने में प्रयुक्त हो जाती है। उत्प्रेरण िया को मध्यवतीर् यौगिक के बनने के पदों में वण्िार्त किया जा सकता है, जिसका सि(ांत आप पूवर् में ही खंड 4.5.1 में पढ़ चुके हैं। आध्ुनिक अध्िशोषण सि(ांत मध्यवतीर् यौगिक निमार्ण सि(ांत एवं प्राचीन अध्िशोषण सि(ांत का संयोजन है। उत्प्रेरण िया उत्प्रेरक की सतह पर वेंफदि्रत होती है। ियाविध्ि में पाँच पद सम्िमलित होते हैंμ ;पद्धउत्प्रेरक की सतह पर अभ्िाियकों का विसरण ;पपद्धउत्प्रेरक की सतह पर अभ्िाियक अणुओं का अध्िशोषण, ;पपपद्धएक मध्यवतीर् निमार्ण द्वारा उत्प्रेरक की सतह पर रासायनिक अभ्िािया का होना ;चित्रा 5.3द्ध। ;पअद्ध उत्प्रेरक सतह से अभ्िािया उत्पादों का विशोषण होने के बाद सतह का दोबारा अिाक अभ्िािया होने के लिए उपलब्ध् कराना। ;अद्ध अभ्िािया उत्पादों का उत्प्रेरक की सतह से दूर विसरण। अभ्िाकारी अणुओं का अध्िशोषण मुक्त संयोजकता युक्त उत्पे्ररक पृष्ठ अभ्िाकारी अणु अभ्िाकारी अणुओं का अध्िशोषण उत्पाद अणुओं का विशोषण उत्पाद उत्प्रेरक मध्यवतीर् 5.2.3 िाओलाइटों का आकार वरणात्मक उत्प्रेरण उत्प्रेरक की सतह पर मुक्त संयोजकताएं होती हंै, जैसा स्थूल के आंतरिक भाग में नहीं है। यह संयोजकताएं रासायनिक आकषर्ण बलों के लिए स्थान उपलब्ध् करवाती हैं। जब कोइर् गैस एक ऐसी सतह के संपवर्फ में आती है तो इसके अणु श्िाथ्िाल रासायनिक संयोजन के कारण वहाँ बँध् जाते हैं। यदि अलग प्रकार के अणु पास - पास अध्िशोष्िात हो जाएं तो एक दूसरे से अभ्िािया कर सकते हैं जिससे नए अणु बन जाते हैं। इस प्रकार बने अणु सतह कोनए अभ्िाियक अणुओं के लिए छोड़ते हुए वाष्पीकृत हो जाते हैं। यह सि(ांत समझाता है कि अभ्िािया के अंत में उत्प्रेरक का द्रव्यमान एवं रासायनिक संघटन क्यों अपरिवतिर्त रहता है तथा यह कम मात्रा में भी वैफसे प्रभावी होता है। तथापि, यह उत्प्रेरक वध्र्क एवं उत्प्रेरक विष की िया को स्पष्ट नहीं करता। ठोस उत्प्रेरकों की महत्वपूणर् विशेषताएं ;कद्ध सियताμ बहुत सीमा तक का उत्प्रेरक की सियता रसोवशोषण की प्रबलता पर निभर्र करती है। सिय होने के लिए अभ्िाियक, उत्प्रेरक पर पयार्प्त प्रबलता से अिाशोष्िात होने चाहिए। तथापि वे इतनी प्रबलता से अध्िशोष्िात नहीं होने चाहिए कि वे गतिहीन हो जाएं एवं अन्य अभ्िाियकों के लिए उत्प्रेरक की सतह पर कोइर् स्थान रिक्त न रहे। हाइड्रोजनन अभ्िाियाओं के लिए यह पाया गया है कि उत्प्रेरकी सियता आवतर्सारणी में वगर् 5 से वगर् 11 के तत्वों तक बढ़ती है, जिनमें वगर् 7 से 9 के तत्व अध्िकतम सियता दशार्ते हैं ;कक्षा 11, एकक 3द्ध। 2भ्;हद्ध ़ व्;हद्धच्ज 2भ् व्;सद्ध2 2 2 ;खद्ध वरणात्मकता ;चयनात्मकताद्धμ किसी उत्प्रेरक की वरणात्मकता उसकी किसी अभ्िािया को दिशा देकर एक विशेष उत्पाद बनाने की क्षमता है। उदाहरणाथर् भ्2 एवं ब्व् से प्रारंभ करके एवं भ्िान्न उत्प्रेरकों के प्रयोग से हम भ्िान्न - भ्िान्न उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं। अतः यह निष्कषर् निकाला जा सकता है कि, उत्प्रेरक के कायर् की प्रकृति अत्यध्िक विश्िाष्ट होती है, अथार्त् कोइर् पदाथर् एक विशेष अभ्िािया के लिए ही उत्प्रेरक हो सकता है, सभी अभ्िाियाओं के लिए नहीं। इसका अथर् यह है कि एक पदाथर् जो एक अभ्िािया में उत्प्रेरक का कायर् करता है अन्य अभ्िाियाओं को उत्प्रेरित करने में असमथर् हो सकता है। वह उत्प्रेरकी अभ्िािया जो उत्प्रेरक की रंध््र संरचना एवं अभ्िाियक एवं उत्पाद अणुओं के साइज ;आकारद्ध पर निभर्र करती है, आकार वरणात्मक उत्प्रेरण कहलाती है। मध्ु - छत्ते जैसी संरचना के कारण िाओलाइट अच्छे आकार - वरणात्मक उत्प्रेरक हैं। यह सिलिकेटस के त्रिाविमीय नेटववर्फ वाले सूक्ष्मरंध््री ऐलुमिनो सिलीकेट होते हैं, जिनमें कुछ सिलिकन परमाणु ऐलुमिनियम के परमाणुओं द्वारा प्रतिस्थापित होकर ।सदृव्दृैप ढाँचा बनाते हैं। िाओलाइटों मेंहोने वाली अभ्िाियाएं अभ्िाियक तथा उत्पाद अणुओं के आकार एवं आकृति के साथ - साथ िाओलाइटों के सरंध््रों एवं कोटरों ;ब्ंअपजपमेद्ध पर निभर्र करती हैं। िाओलाइट प्रकृति में पाए जाते हैं तथा उत्प्रेरक वरणात्मकता के लिए संश्लेष्िात भी किए जाते हैं। 5.2.4 एन्जाइम उत्प्रेरण िाओलाइट पेट्रोरसायन उद्योग में हाइड्रोकाबर्नों के भंजन एवं समावयवन में उत्प्रेरक के रूप में व्यापक रूप से प्रयुक्त किए जा रहे हैं। र्ैड.5 पेट्रोलियम उद्योग में प्रयुक्त होने वाला एक महत्वपूणर् िाओलाइट उत्प्रेरक है। यह ऐल्कोहाॅल का निजर्लीकरण करके हाइड्रोकाबर्नों का मिश्रण बनता है और उन्हें सीध्े ही गैसोलीन ;पेट्रोलद्ध में परिवतिर्त कर देता है। एन्जाइम जटिल नाइट्रोजनी काबर्निक यौगिक हैं जो कि जीवित पौधें एवं जन्तुओं द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। वास्तविक रूप में ये उच्च अणु द्रव्यमान वाले प्रोटीन अणु हैं जो जल में कोलाॅइडी विलयन बनाते हैं। ये बहुत प्रभावी उत्प्रेरक होते हैं जो अनेक, विशेष रूप सेप्राकृतिक प्रक्रमों से संबंध्ित अभ्िाियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। जंतुओं एवं पौधों में जीवन प्रक्रम के अनुरक्षण के लिए होने वाली अनेक शारीरिक अभ्िाियाएं, एन्जाइमों द्वारा उत्प्रेरित होती हैं। अतः एन्जाइमों के लिए जैवरासायनिक उत्प्रेरक शब्द का प्रयोग होता है एवं उत्प्रेरण की परिघटना जैवरासायनिक उत्प्रेरण कहलाती है। कइर् एन्जाइम जीवित कोश्िाकाओं से परिशु( िस्टलीय अवस्था में प्राप्त किए गए हैं परंतु प्रयोगशाला में पहला एन्जाइम 1969 में संश्लेष्िात किया गया था। एन्जाइम उत्प्रेरित अभ्िाियाओं के कुछ उदाहरण निम्नलिख्िात हैंμ ;पद्ध इक्षु - शवर्फरा ;सूक्रोसद्ध का प्रतिलोमनμ इन्वटेर्ज एन्जाइम इक्षु - शवर्फरा ;सूक्रोसद्ध को ग्लूकोस एवं प्रफक्टोश में परिवतिर्त कर देता है। इन्वटसेर्ब्12भ्22व्11;ंुद्ध ़ भ्2व्;सद्ध ⎯⎯⎯→ ब्6भ्12व्6 ;ंुद्ध ़ ब्6भ्2च्6 ;ंुद्ध इक्षु - शवर्फरा ;सूक्रोसद्ध ग्लूकोस प्रफक्टोश ;पपद्ध ग्लूकोस का ऐथ्िाल ऐल्कोहाॅल में परिवतर्नμ शाइमेज एन्जाइम ग्लूकोस को एथ्िाल ऐल्कोहाॅल एवं काबर्न डाइआॅक्साइड में परिवतिर्त कर देता है। ज.ाइमेज ब्6भ्12व्6 ;ंुद्ध ⎯⎯ ⎯→2ब्2भ्5व्भ्;ंुद्ध़ 2ब्व्2 ;हद्ध ग्लूकोस एथ्िाल ऐल्कोहाॅल ;पपपद्ध स्टाचर् का माल्टोस में परिवतर्नμ डायस्टेज एन्जाइम स्टाचर् को माल्टोस में परिवतिर्त कर देता है। डायस्ट ेज→2;ब्6भ्10व्5द्धद ;ंुद्ध ़ दभ्2व् ;सद्ध ⎯⎯⎯⎯दब्12भ्22व्11 ;ंुद्ध स्टाचर् माल्टोस ;पअद्ध माल्टोस का ग्लूकोस में परिवतर्नμ माल्टेज एन्जाइम माल्टोस को ग्लूकोस में परिवतिर्त कर देता है। माल्टेज→ब्12भ्22व्11 ;ंुद्ध ़ भ्2व् ;सद्ध ⎯⎯⎯2ब्6भ्12व्6 ;ंुद्ध माल्टोस ग्लूकोस ;अद्ध यूरिया का अमोनिया एवं काबर्न डाइआॅक्साइड में अपघटनμ यूरिएज एन्जाइम इस अपघटन को उत्प्रेरित करता है। यूिरएज छभ्2ब्व्छभ्2;ंुद्ध ़ भ्2व् ;सद्ध ⎯⎯⎯→2छभ्3;हद्ध ़ ब्व्2 ;प्द्ध ;अपद्ध आमाशय में पेप्िसन एन्जाइम प्रोटीनों को पेप्टाइडों में परिवतिर्त करता है जबकि आँत में अग्नाशय टिªप्िसन प्रोटीनों को जल अपघटन द्वारा एमीनो अम्लों में परिवतिर्त करता है। ;अपपद्ध दुग्ध् का दही में परिवतर्नμ यह एक एन्जाइमिक अभ्िािया है जो कि दही में उपस्िथत लेक्टोबैसिलस एन्जाइम द्वारा होती है। रसायन विज्ञान इन्वटेर्ज शाइमेज डायस्टेज माल्टेज यूरिएज पेप्िसन यीस्ट यीस्ट माल्ट यीस्ट सोयाबीन आमाशय सुक्रोस ग्लूकोस स्टाचर् माल्टोस यूरिया प्रोटीन → ग्लूकोस तथा प्रफक्टोश → एथ्िाल ऐल्कोहाॅल तथा काबर्न डाइआॅक्साइड → माल्टोस → ग्लूकोस → अमोनिया तथा काबर्न डाइआॅक्साइड → ऐमीनो अम्ल सारणी 5.2 में कुछ प्रमुख एन्जाइमी अभ्िाियाओं का सारांश दिया गया है। सारणी 5ण्2μकुछ एन्जाइमी अभ्िाियाएं एन्जाइम ड्डोत एन्जाइमी अभ्िाियाएं एन्जाइम उत्प्रेरण के अभ्िालक्षणμ एन्जाइम उत्प्रेरण दक्षता एवं उच्च कोटि की विश्िाष्टता में अनूठा है। एन्जाइम उत्प्रेरण के द्वारा निम्न अभ्िालक्षण दशार्ए जाते हैंः ;पद्ध सवोर्त्तम दक्षता μ एन्जाइम का एक अणु अभ्िाियक के दस लाख अणुओं को प्रति मिनट परिवतिर्त कर सकता है। ;पपद्ध उच्च विश्िाष्ट प्रकृतिμ प्रत्येक एन्जाइम की विश्िाष्टता किसी एक अभ्िािया के लिए होती है अथार्त् एक उत्प्रेरक एक से अध्िक अभ्िाियाओं को उत्प्रेरित नहीं कर सकता। उदाहरणाथर् एन्जाइम यूरिएज, केवल यूरिया के जल अपघटन को उत्प्रेरित करता है। यह किसी अन्य एमाइड के जल अपघटन को उत्प्रेरित नहीं करता। ;पपपद्ध इष्टतम ताप ;व्चजपउनउ जमउचमतंजनतमद्ध पर सवार्िाक सिय μ एन्जाइम उत्पे्ररित अभ्िािया की दर एक निश्िचत ताप पर जिसे इष्टतम ताप कहते हैं, अिाकतम हो जाती हैं। अनुकूल इष्टतम ताप के किसी भी ओर एन्जाइम की सियता घट जाती है। एन्जाइम सियता का इष्टतम ताप परास 298 - 210ज्ञ है। मानव शरीर का ताप 310ज्ञ होने के कारण यह एन्जाइम - उत्प्रेरित अभ्िाियाओं के लिए उपयुक्त होता है। ;पअद्ध इष्टतम चभ् पर सवार्िाक सियμ एन्जाइम उत्प्रेरित अभ्िािया की दर एक निश्िचत चभ् पर जिसे इष्टतम चभ् कहते हैं, अध्िकतम होती है इसका मान 5 - 7 के मध्य होता है। ;अद्ध सियक एवं सहएन्जाइमों की उपस्िथति में वध्र्मान सियता μ एन्जाइम की सियता वुफछ पदाथो± की उपस्िथति में, जिन्हें सहएन्जाइम कहते हैं, बढ़ जाती है। यह देखा गया है कि जब थोड़ा सा अप्रोटीन ;जैसे विटामीनद्ध, एन्जाइम के साथ उपस्िथत होता है तो, एन्जाइमी की उत्प्रेरकी महत्वपूणर् रूप से बढ़ जाती है। सियक साधारणतया धात्िवक आयन जैसे छं़ डद2़ ब्व2़ए ब्न2़़ आदि होते हैं। ये धात्िवक आयन एन्जाइम अणुओं से दुबर्ल रुप से आबंध्ित होने पर उत्पे्ररकी सियता बढ़ा देते हैं। एमिलेज सोडियम क्लोराइड की उपस्िथति में अथार्त् छं़ आयनों की उपस्िथति उत्प्रेरकीय रुप में बहुत सिय होता है। ;अपद्ध संदमक एवं विष का प्रभावμ सामान्य उत्प्रेरकों के समान एन्जाइम भी कुछ पदाथो± की उपस्िथति में संदमित एवं विषाक्त हो जाते हैं। संदमक अथवा विष, एन्जाइम की सतह पर उपस्िथत सिय ियात्मक समूहों से अन्योन्यिया करके एन्जाइमों की 133 पृष्ठ रसायन उत्प्रेरकी सियता को प्रायः कम या पूरी तरह समाप्त कर देते हैं। शरीर में कइर् औषधों का प्रयोग उनके एन्जाइम को संदमित करने के गुण से संबंिात होता है। शरीर में कइर् औषधों की िया एन्जाइम संदमक से संबंध्ित होती है। एन्जाइम उत्प्रेरण की ियाविध्िμ एन्जाइम के कोलाॅइडी कणों की सतहों पर बहुत सारे कोटर होते हैं। ये कोटर अभ्िालक्षण्िाक आकृति के होते हैं एवं इनमें सिय समूह जैसेμ .छभ्ए .ब्व्व्भ्ए .ैभ्ए .व्भ्ए आदि2होते हैं। वास्तव में यह सतह पर उपस्िथत सिय वेंफद्र होते हैं। अभ्िाियक के अणु जिनकीपरिपूरक आकृति होती है, इन कोटरों में एक ताले में चाबी के समान पिफट हो जाते हैं। सिय समूहों की उपस्िथति के कारण एक सियत संकुल बनता है जो विघटित होकर उत्पाद देता है। इस प्रकार, एन्जाइम उत्प्रेरित अभ्िाियाओं का दो पदों में सम्पन्न होना माना जा सकता है। पद 1 - सियत संकुल बनाने के लिए एन्जाइम का सबस्ट्रेट से आबंधन म् ़ ै → म्ै पद 2 - उत्पाद बनाने के लिए सियत संकुल का विघटन म्ै → म् ़ च् उद्योगों में उत्प्रेरण की उपयोगिता का बोध् कराने के लिए सारणी 5.3 में कुछ महत्वपूणर् तकनीकी उत्प्रेरक प्रक्रम दिए गए हैं। सारणी 5ण्3μ कुछ औद्योगिक उत्प्रेरकी प्रक्रम 5.3 कोलाॅइड 5.4 कोलाॅइडों का वगीर्करण 5.4.1 परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्था के आधार पर वगीर्करण हम एकक - 2 में सीख चुके हैं कि विलयन समांगी निकाय होते हैं। हम यह भी जानते हैं कि रेत को जल में हिलाने पर यह निलंबन देती है जो कि समय के साथ ध्ीरे - ध्ीरे नीचे बैठ जाता है। निलंबन एवं विलयन की पराकाष्ठाओं के बीच हम निकायों का एक वृहद् समूह पाते हैं जिसे कोलाॅइडी परिक्षेपण या सामान्यतया कोलाॅइड कहते हैं। कोलाॅइड एक विषमांगी तंत्रा होता है जिसमें एक पदाथर् बहुत बारीक कणों के रूप में ;परिक्ष्िाप्त प्रावस्थाद्ध एक दूसरे पदाथर् में परिक्षेपित रहता है जिसे परिक्षेपित माध्यम कहते हैं। विलयन एवं कोलाॅइड में अनिवायर् अंतर कण के माप में होता है। विलयन में अवयव कण, आयन या छोटे अणु होते हैं जबकि कोलाॅइड में परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एक वृहदणु ;जैसे प्रोटीन या संष्लेष्िात बहुलकद्ध या कइर् परमाणुओं, आयनों या अणुओं का संकलन होता है। कोलाॅइड कण सामान्य अणुओं से बड़े परंतु निलंबन में रहने योग्य छोटे होते हैं। उनके व्यास की सीमा 1 और 1000 दउ ;10दृ9 से 10दृ6 उद्ध के बीच होती है। कम माप के कारण कोलाॅइडी कणों का प्रतिग्राम पृष्ठ क्षेत्रापफल बहुत अध्िक होता है। 1 बउ भुजा वाले एक घन पर विचार कीजिए। इसका कुल पृष्ठ क्षेत्रापफल 6 बउ2 होगा। यदि इसे 1012 बराबर घनों में बाँटा जाये तो इन घनों का माप बड़े कोलाॅइडी कण के माप के बराबर होगा तथा इनका कुल पृष्ठ क्षेत्रापफल 60,000 बउ2 या 6 उ2 होगा। इस विशाल पृष्ठ क्षेत्रापफल के कारण कोलाॅइड के कुछ विशेष गुण होते हैं, जिनकी चचार् हम इस एकक में आगे करेंगे। कोलाॅइडों को निम्न मापदंडों के आधर पर वगीर्कृत किया गया हैμ ;पद्ध परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्था। ;पपद्ध परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यिया की प्रकृति। ;पपपद्ध परिक्ष्िाप्त प्रावस्था के कणों का प्रकार। इस आधर पर कि परिक्ष्िाप्त प्रावस्था तथा परिक्षेपण माध्यम ठोस, द्रव अथवा गैस हैं, आठ प्रकार के कोलाॅइडी तंत्रा संभव हैं। एक गैस का दूसरी गैस के साथ मिश्रण समांगी होता है, अतः यह कोलाॅइडी तंत्रा नहीं होता। विभ्िान्न प्रकार के कोलाॅइडों के उदाहरण उनके विश्िाष्ट नामों सहित सारणी 5.4 में दिए गए हैं।अनेक परिचित व्यावसायिक उत्पाद एवं प्राकृतिक वस्तुएं कोलाॅइड हैं उदाहरण के लिए, पेफटी हुइर् क्रीम झाग है जिसमें गैस, द्रव में परिक्ष्िाप्त है। हवाइर् जहाजों के आपात्कालीन अवतारण ;स्ंदकपदहद्ध के समय उपयोग किए जाने वाले अग्िनशामक पफोम भी कोलाॅइडी तंत्रा होते हैं। अध्िकांश जैविक तरल, जलीय साॅल ;जल में परिक्ष्िाप्त ठोसद्ध होते हैं। एक प्रारूपी कोश्िाका में उपस्िथत प्रोटीन एवं न्यूक्लीक अम्ल कोलाॅइड के आकार के कण होते हैं जो आयनों एवं लघुअणुओं के जलीय विलयन में परिक्ष्िाप्त होते हैं। 135 पृष्ठ रसायन सारणी 5ण्4μ कोलाॅइडी तंत्रों के प्रकार 5.4.2 परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यिया की प्रकृति के आधार पर वगीर्करण सारणी 5.4 में दिए गए विभ्िान्न प्रकार के कोलाॅइडों में से सबसे अध्िक प्रचलित साॅल ;द्रवों में ठोसद्ध, जेल ;ठोसों में द्रवद्ध तथा इमल्शन ;द्रव में द्रवद्ध हैं। ¯कतु, इस अध्याय में हम केवल साॅल एवं इमल्शनों के बारे में अध्ययन करेंगे। आगे यह भी कहा जा सकता है कि यदि परिक्षेपण माध्यम जल हो तो साॅल को जलविलय ;एक्वासाॅलद्ध या हाइड्रोसाॅल एवं यदि परिक्षेपण माध्यम ऐल्कोहाॅल हो तो उसे ऐल्कोसाॅल कहते हैं। परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यिया के आधर पर कोलाॅइडी साॅल को दो वगो± में विभाजित किया जा सकता है, यानि द्रवरागी ;विलायक को आकष्िार्त करने वालेद्ध एवं द्रवविरागी ;विलायक को प्रतिकष्िार्त करने वालेद्ध। यदि परिक्षेपण माध्यम जल हो तो जलरागी एवं जलविरागी नामों का प्रयोग किया जाता है। ;पद्ध द्रवरागी कोलाॅइड द्रवरागी शब्द का अथर् है द्रव को स्नेह करने वाला। गोंद, जिलेटिन स्टाचर्, रबर आदि जैसे पदाथोर्ं को उचित द्रव ;परिक्षेपण माध्यमद्ध में मिलाने पर सीध्े ही प्राप्त होने वाले कोलाॅइडी साॅल द्रवरागी कोलाॅइड कहलाते हैं। साॅल की एक महत्वपूणर् विशेषता यह होती है कि यदि परिक्षेपण माध्यम को परिक्ष्िाप्त प्रावस्था से अलग कर दिया जाये ;मान लीजिए वाष्पीकरण द्वाराद्ध तो साॅल को केवल परिक्षेपण माध्यम के साथ मिश्रित करके पुनः प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे साॅल उत्क्रमणीय साॅल भी कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त, ये साॅल पयार्प्त स्थायी होते हैं एवं इन्हें आसानी से स्वंफदित नहीं किया जा सकता जिसकी विवेचना आगे की जाएगी। ;पपद्ध द्रवविरागी कोलाॅइड द्रवविरागी शब्द का अथर् है द्रव से घृणा करने वाला। धतुएं एवं उनके सल्पफाइड आदि जैसे पदाथर्, केवल परिक्षेपण माध्यम में मिश्रित करने से कोलाॅइडी साॅल नहीं बनाते। इनके कोलाॅइडी साॅल केवल विशेष विध्ियों ;जिनकी चचार् हम आगे करेंगेद्ध द्वारा ही बनाए जा सकते हैं। ऐसे साॅल द्रवविरागी साॅल कहलाते हैं। ऐसे साॅल को वैद्युत अपघट्य की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर, गमर् करके या हिलाकर आसानी से अवक्षेपित ;या स्वंफदितद्ध किया जा सकता है इसीलिए ये स्थायी नहीं होते। इसके अतिरिक्त रसायन विज्ञान 136 5.4.3 परिक्ष्िाप्त प्रावस्था के कणों के प्रकार पर आधारित वगीर्करणμ बहुआण्िवक, बृहदाण्िवक तथा सहचारी कोलाॅइड एक बार अवक्षेपित होने के बाद ये केवल परिक्षेपण माध्यम के मिलाने मात्रा से पुनः कोलाॅइडी साॅल नहीं देते। अतः इनको अनुत्क्रमणीय साॅल भी कहते हैं। द्रवविरागी साॅल के परीक्षण के लिए स्थायी कारकों की आवश्यकता होती है। परिक्ष्िाप्त प्रावस्था के कणों के प्रकार के आधर पर कोलाॅइडों को बहुआणविक, बृहदाण्िवकतथा सहचारी कोलाॅइडों में वगीर्कृत किया जाता है। ;पद्ध बहुआण्िवक कोलाॅइडμ विलीन करने पर किसी पदाथर् के बहुत से परमाणु या लघु अणु एकत्रिात होकर पुंज जैसी ऐसी स्पीशीज बनाते हैं जिनका आकार ;साइजद्ध कोलाॅइडी सीमा ;व्यास ढ1दउद्ध में होता है। इस प्रकार प्राप्त स्पीशीश बहुआण्िवक कोलाॅइड कहलाती है। उदाहरण के लिए एक गोल्ड साॅल में अनेक परमाणु युक्त भ्िान्न - भ्िान्न आकारों के कण हो सकते हैं। सल्पफर साॅल में एक हज़ार या उससे भी अध्िक ै सल्पफर अणु वाले कण उपस्िथत रहते हैं।;पपद्ध वृहदाण्िवक कोलाॅइडμ वृहदाणु ;एकक 15द्ध उचित विलायकों में ऐसे विलयन बनाते हैं जिनमें वृहदाणुओं का आकार कोलाॅइडी सीमा में होता है ऐसे निकाय वृहदाण्िवक कोलाॅइड कहलाते हैं। ये कोलाॅइड बहुत स्थायी होते हैं और अनेक अथो±में यथाथर् विलयनों के समान होते हैं। प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले वृहदाण्िवक कोलाॅइडों के उदाहरण हैंμ स्टाचर्, सेलुलोज प्रोटीन और एन्जाइम एवं मानव निमिर्त वृहदाणु हैंμ पाॅलीथीन, नायलोन, पाॅली स्टायरीन, संश्लेष्िात रबर आदि। 8;पपपद्ध सहचारी कोलाॅइड ;मिसेलद्धμ कुछ पदाथर् ऐसे हैं जो कम सांद्रताओं पर सामान्य प्रबल वैद्युतअपघट्य के समान व्यवहार करते हैं परन्तु उच्च सांद्रताओं पर कणों का पुंज बनने के कारण कोलाॅइड के समान व्यवहार करते हैं। इस प्रकार पुंजित कण मिसेल कहलाते हैं। ये सहचारी कोलाॅइड भी कहलाते हैं। मिसेल केवल एक निश्िचत ताप से अिाक ताप पर बनते हैं जिसे क्राफ्रट ताप कहते हैं, एवं सांद्रता एक निश्िचत सांद्रता से अिाक होती है, जिसे क्रांतिक मिसेल सांद्रता ;ब्डब्द्ध कहते हैं। तनु करने पर ये कोलाॅइड पुनः अलग - अलग आयनों में टूट जाते हैं। पृष्ठ सिय अभ्िाकमर्क जैसे साबुन एवं संश्लेष्िात परिमाजर्क इसी वगर् में आते हैं। साबुनों के लिए ब्डब् का मान 10दृ4 से 10दृ3 उवस स्दृ1 होता है। इन कोलाॅइडों में द्रवविरागी एवं द्रवरागी दोनों ही भाग होते हैं। मिसेल में 100 या उससे अध्िक अणु हो सकते है। मिसेल निमार्ण की ियाविध्ि आइए, हम साबुन के विलयन का उदाहरण लेते हैं। पानी में घुलनशील साबुन उच्च वसा अम्लों के सोडियम अथवा पोटैश्िायम लवण होते हैं जिन्हें त्ब्व्व्दृ ड़ द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरणाथर्, सोडियम स्िटऐरेट ;जो कि अनेक बट्टðी वाले साबुनों का प्रमुख घटक है।द्ध जल में विलीन करने पर त्ब्व्व्दृ एवं छं़ आयनों में विघटित हो जाता है। ¯कतु दृत्ब्व्व् आयन के दो भाग होते हैंμ एक लंबी हाइड्रोकाबर्न शंृखला ;जिसे ‘अध््रुवीय पुच्छ’ भी कहते हैंद्ध, जो जलविरागी ;जल प्रतिकषीर्द्ध होती है तथा ध््रुवीय समूह ब्व्व्दृ ;जिसे ‘ध््रुवीय आयनिक शीषर्’ भी कहते हैं।द्ध जो जलरागी ;जल को स्नेह करने वालाद्ध होता है। त्ब्व्व्दृ आयन पृष्ठ पर इस प्रकार उपस्िथत रहते हैं कि उनका ब्व्व्दृ समूह जल में तथा हाइड्रोकाबर्न शंृखला त्ए पृष्ठ से दूर रहती है। परंतु क्रांतिक मिसेल सांद्रता पर )णायन विलयन के स्थूल में ¯खच आते हैं एवं गोलीय आकार में इस प्रकार एकत्रिात हो जाते हैं कि इनकी हाइड्रोकाबर्न शंृखलाएं गोले के वेंफद्र की ओर इंगित होती है तथा ब्व्व्दृ भाग गोले 137 पृष्ठ रसायन स्िटऐरेट आयन जल ;ंद्ध चित्रा 5.6μ;कद्ध साबुन की निम्नसांद्रता पर, जल के पृष्ठ पर स्िटऐरेट आयनों कीव्यवस्था ;खद्ध साबुन कीक्रांतिक मिसेल सांद्रता परजल के आंतरिक स्थूल मेंस्िटऐरेट आयनों की व्यवस्था ;आयनिक मिसेलद्ध 5.4.4 कोलाॅइड बनाना रसायन विज्ञान 138 जलविरागी पुच्छ के पृष्ठ पर रहता है। इस प्रकार बना पुंज आयनिक मिसेल कहलाता है। इन मिसेलों में इस प्रकार के 100 तक आयन हो सकते हैं। इसी प्रकार अपमाजर्कों जैसे सोडियम लाॅरिल सल्पेफट, ब्भ्;ब्भ्द्ध छं़ में3211ैव्−4लंबी हाइड्रोकाबर्न शंृखला सहित दृ ैव्4− ध््रुवीय समूह है, अतः मिसेल बनने की ियाविध्ि साबुनों के समान ही है। साबुनों की शोध्न - ियाμ यह पहले बताया जा चुका है कि मिसेल में एक जल विरोध्ी हाइड्रोकाबर्न का वेंफद्रीय क्रोड होता है। साबुन की शोध्न - िया इस यथाथर् के कारण है कि साबुन के अणु तेल की बूँदों के चारों ओर इस प्रकार से मिसेल बनाते हैं कि स्िटऐरेट आयन का जलविरागी भाग बूूँदों के अंदर होता है एवं जलरागी भाग चिकनाइर् की बूँदों के बाहर ;चित्रा 5.7द्ध काँटों की तरह निकला रहता है। चूँकि ध््रुवीय समूह जल से अन्योन्यिया कर सकते हैं, अतः स्िटऐरेट आयनों से घ्िारी हुइर् तेल की बूँदें जल में ¯खच जाती हैं एवं गंदी सतह से हट जाती है। इस प्रकार साबुन तेलों तथा वसाओं का पायसीकरण ;म्उनसेपपिबंजपवदद्धकरके ध्ुलाइर् में सहायता करता है। छोटी गोलियों के चारों ओर का ट्टण आवेश्िात आवरण उन्हें एक साथ आकर पुंज बनाने से रोकता है। ;कद्ध ;खद्ध ;गद्ध चित्रा 5.7μ ;कद्ध कपड़े पर ग्रीस ;खद्ध ग्रीस बूंदों के चारों ओर व्यवस्िथत स्िटऐरेट आयन;गद्ध स्िटऐरेट आयनों द्वारा घ्िारी ग्रीस की बूंदे ;बनी हुइर् मिसेलद्ध। कोलाॅइड बनाने की कुछ महत्वपूणर् विध्ियाँ निम्नलिख्िात हैंμ ;कद्ध रासायनिक विध्ियाँμ कोलाॅइडी विलयन द्विक अपघटन, आॅक्सीकरण, अपचयन अथवा जल अपघटन जैसी रासायनिक अभ्िाियाओं द्वारा, जिनमें अणु निमिर्त होते हैं, बनाए जा सकते हैं। ये अणु पंुजित होकर साॅल का निमार्ण करते हैं। इलैक्ट्रोड परिक्षेपणमाध्यम बपर्फअवगाह चित्रा 5.8μ ब्रेडिग आवर्फ वििा 5.4.5 कोलाॅइडी विलयनों का शुिकरण अपोहक झिल्ली जल $कोलाॅइड जांतव झिल्ली ;ब्लैडरद्ध, पाचर्मेन्ट पत्रा या सेलोपेफन शीट में से निकल सकते हैं परंतु जल साॅल कण कोलाॅइडी कण नहीं, अतः झिल्ली को अपोहन में प्रयुक्त किया जा सकता है। इस कोलाॅइड चित्रा 5.9μ अपोहन द्विक् अपघटन ।ेव् ़ 3भ्ै ⎯⎯⎯⎯⎯→ ।ेै ;साॅलद्ध ़ 3भ्व्232 232आॅक्सीकरण ैव्2 ़ 2भ्2ै ⎯⎯⎯⎯→3ै ;साॅलद्ध ़ 2भ्2व् अपयचयन→2।नब्स ़ 3भ्ब्भ्व् ़ 3भ्व् ⎯⎯⎯⎯2।न ;साॅलद्ध ़ 3भ्ब्व्व्भ् ़ 6भ्ब्स3 2जल अपघटन→थ्मब्स ़ 3भ्व् ⎯⎯⎯⎯⎯थ्म ;व्भ्द्ध ;साॅलद्ध ़ 3भ्ब्स32 3;खद्ध विद्युतीय विघटन या ब्रेडिग आवर्फ विध्िμ इस प्रक्रम में परिक्षेपण एवं संघनन दोनों ही सम्िमलित हैं। गोल्ड, सिल्वर, प्लेटिनम इत्यादि धतुओं के कोलाॅइडी साॅल इस विध्ि द्वारा बनाये जा सकते हैं। इस विध्ि में परिक्षेपण माध्यम में डूबे धतु के इलैक्ट्रोडों के बीच एकविद्युत आवर्फ उत्पन्न किया जाता है ;चित्रा 5.8द्ध। इससे उत्पन्न अत्यध्िक ऊष्मा धतु वफो वाष्िपत कर देती है जो पिफर संघनित होकर कोलाॅइडी आकार के कण बनाती है। ;गद्ध पेप्टनμ पेप्टन को इस प्रकार परिभाष्िात किया जा सकता है कि किसी अवक्षेप को वैद्युतअपघट्य की थोड़ी सी मात्रा की उपस्िथति में परिक्षेपण माध्यम के साथ हिलाकर कोलाॅइडी साॅल में परिवतिर्त करने वाला प्रक्रम पेप्टन कहलाता है। इस प्रक्रम में प्रयुक्त वैद्युतअपघट्य पेप्टीकमर्क कहलाता है। यह विध्ि सामान्यतः ताशे बने अवक्षेप को कोलाॅइडी साॅल में परिवतिर्त करने में प्रयुक्त की जाती है। पेप्टन के दौरान अवक्षेप, वैद्युत अपघट्य के किसी एक प्रकार के आयनों को अपनी सतह पर अवशोष्िात कर लेता है जिससे अवक्षेप परट्टणात्मक अथवा ध्नात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है जो अंततः कोलाॅइडी आकार के छोटे कणों में विभक्त हो जाता है। कोलाॅइडी विलयन बनाते समय उनमें वैद्युतअपघट्य की अतिरिक्त मात्रा एवं कुछ अन्य विलेय अशुियाँ होती हंै। विद्युत अपघट्य की आंश्िाक मात्रा में उपस्िथति, कोलाॅइडी विलयन के स्थायित्व के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी अध्िक मात्रा कोलाॅइड को स्कंदित कर देती है, अतः यह आवश्यक है कि इन विलेय अशुिओं की सांद्रता को आपेक्ष्िात सीमा तक कम कर दिया जाए। अशुियों को आवश्यक सीमा तक कम करने के लिए प्रयुक्त प्रक्रम को कोलाॅइडी विलियनों का शुिकरण कहते हैं। कोलाॅइडी विलयनों का शुिकरण निम्नलिख्िात वििायों द्वारा किया जाता है। ;पद्ध अपोहन ;क्पंसलेपेद्ध यह एक उपयुक्त झिल्ली द्वारा अपोहन करके कोलाॅइडी विलयन में से घुले हुए पदाथो± को निकालने का प्रक्रम है। चूँकि वास्तविक विलयन के कण ;आयन या छोटे अणुद्ध उद्देश्य के लिए प्रयुक्त उपकरण अपोहक कहलाता है। कोलाॅइडी विलयन से भरा एक उपयुक्त झिल्ली का बैग एक पात्रा में लटकाया जाता है जिसमें से होकर जल निरंतर बहता रहता है ;चित्रा 5.9द्ध। अणु एवं आयन झिल्ली में से विसरित होकर बाहरी जल में आ जाते हैं एवं शु( कोलाॅइडी विलयन शेष रह जाता है। ;पपद्ध वैद्युत् अपोहन साधरणतया अपोहन का प्रक्रम बहुत मन्द होता है। यदि अशु( कोलाॅइडी विलयन में विलेय पदाथर् केवल वैद्युत अपघट्य हो तो इसे विद्युत - क्षेत्रा लगाकर तेज किया जा सकता है। तब इस प्रक्रम को वैद्युत् अपोहन नाम दिया जाता है। कोलाॅइडी विलयन 139 पृष्ठ रसायन अपोहक झिल्ली को एक उपयुक्त झिल्ली के बैग में रखा जाता है तथा शु( जल को बाहर लिया जाता है। चित्रा 5.10 में दशार्ये अनुसार कक्ष में इलैक्ट्रोड लगाये जाते हैं। कोलाॅइडी विलयन में उपस्िथत आयन विपरीत आवेश वाले इलेक्ट्रोडों की ओर झिल्ली से बाहर गमन कर जाते हैं। ;पपपद्ध अतिसूक्ष्म निस्यंदन अतिसूक्ष्म निस्यंदन वह प्रक्रम है जिसमें विशेष रूप से निमिर्त निस्यंदक ;पिफल्टरद्धसाॅलकण कोलाॅइड द्वारा, जो कि कोलाॅइडी कणों के अलावा अन्य सभी पदाथो± के लिए पारगम्य होताचित्रा 5.10μ वैद्युत्अपोहन है, कोलाॅइडी विलयन में उपस्िथत विलायकों एवं घुलनशील विलेयों को पृथक किया जाता है। कोलाॅइडी कण सामान्य निस्यंदक पत्रा में से गुशर सकते हैं क्योंकि इनके रंध््र बहुत बड़े होते हैं, ¯कतु कोलाॅइडी कणों को निकलने से रोकने के लिए निस्यंदक को कोलोडियन में संसेचित कर इसके रंध््रों का आकार छोटा किया जा सकता है। सामान्य कोलोडियन ऐल्कोहाॅल एवं इर्थर के मिश्रण में नाइट्रोसेलुलोस का 4ः विलयन होता है। एक अतिसूक्ष्म निस्यंदक पत्रा को एक कोलोडियन विलयन में भ्िागोकर, पफमेर्ल्िडहाइड में कठोर बनाकर एवं अंत में सुखाकर बनाया जा सकता है। इस प्रकार के अतिसूक्ष्म निस्यंदक पत्रा का प्रयोग कर कोलाॅइडी कणों को अन्य पदाथो± से पृथक किया जा सकता है। अतिसूक्ष्म निस्यंदन एक ध्ीमा प्रक्रम है। प्रक्रम की गति बढ़ाने के लिए दाब या चूषण का प्रयोग किया जाता है। शु( कोलाॅइडी विलयन प्राप्त करने के लिए निस्यंदक पत्रा पर शेष बचे कोलाॅइडी कणों को ताशे परिक्षेपण माध्यम ;विलायकद्ध के साथ हिलाया जाता है। 5.4.6 कोलाॅइडी विलयनों कोलाॅइडी विलयनों द्वारा दशार्ये जाने वाले विभ्िान्न गुण नीचे वण्िार्त किए गए हैं - के गुण ;पद्ध अणुसंख्यक गुण कोलाॅइडी कण बड़े पुंज होने के कारण एक कोलाॅइडी विलयन में, वास्तविक विलयन की तुलना में कणों की संख्या कम होती है। अतः समान सांद्रताओं पर अणुसंख्यक गुणों ;परासरण दाब, वाष्पदाब में अवनमन, द्रवणांक में अवनमन एवं क्वथनांक में उन्नयनद्ध के मान उसी सांद्रता के वास्तविक विलयनों द्वारा दशार्ये गये मानों से कम कोटि के होते हैं। ;पपद्ध टिन्डल प्रभाव यदि अंध्ेरे में रखा एक समांगी विलयन, प्रकाश की दिशा से देखा जाए, तो यह स्वच्छ दिखाइर् देता है एवं यदि इसे प्रकाश किरण पुंज की दिशा के लंबवत दिशा से देखा जाए तो यह पूणर्तया अदीप्त दिखाइर् देता है। कोलाॅइडी विलयन को भी इसी आँख प्रकार से पारगमन प्रकाश द्वारा देखने पर पयार्प्त स्वच्छ या पारदशीर् ;जिसके आरपार देखा जा सकेद्ध दिखाइर् देते हैं परंतु उन्हें प्रकाश के पथ की दिशा से समकोण दिशा में देखने पर वे मंद से प्रबल दूध्ियापन दशार्ते हैं। अथार्त् प्रकाश किरण पुंज का पारगमन पथ नीले प्रकाश से प्रदीप्त हो जाता है। यह प्रभाव सवर्प्रथम पैफराडे ने प्रेक्ष्िात किया एवं बाद में टिन्डल ने इसका विस्तृत रूप में अध्ययन किया, अतः इसे टिन्डल प्रभाव कहा जाता है। प्रकाश का चमकीला कोन, टिन्डल शंवुफ कहलाता है ;चित्रा 5.11द्ध। टिन्डल प्रभाव वास्तव में इस कारण से होता है कि कोलाॅइडी कण, प्रकाश को दिव्फ - स्थान कोलाॅइडी विलयन में सभी दिशाओं में प्रकीण्िार्त करते हैं। प्रकाश का यह प्रकीर्णन कोलाॅइडी परिक्षेपण में किरण के पथ को प्रदीप्त करता है।चित्रा 5.11μ टिन्डल प्रभाव रसायन विज्ञान 140 चित्रा 5.12μ ब्राउनी गति टिन्डल प्रभाव सिनेमा हाॅल में पिक्चर के प्रोजेक्शन के समय हाल में उपस्िथत ध्ूल एवं ध्ुएं के कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीणर्न द्वारा देखा जा सकता है। टिन्डल प्रभाव तभी देखा जा सकता है जब निम्नलिख्िात दो शते± पूरी होती हैंμ ;पद्ध परिक्ष्िाप्त कणों का व्यास प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैघ्यर् से बहुत कम नहीं होना चाहिए। ;पपद्ध परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के अपवतर्नांक परिमाप में बहुत अंतर होना चाहिए। टिन्डल प्रभाव का उपयोग कोलाॅइडी एवं वास्तविक विलयन में विभेद करने में किया जाता है। जिगमोन्डी ने 1903 में एक उपकरण, जिसे अतिसूक्ष्मदशीर् कहा जाता है, को बनाने में टिन्डल प्रभाव का उपयोग किया। एक काँच के पात्रा में उपस्िथत कोलाॅइडी विलयन पर तीव्र प्रकाश किरण पुंज संवेंफदि्रत ;थ्वबनेद्ध किया जाता है। पिफर इस संवेंफदि्रत प्रकाश के किरण पुंज को लंबवत दिशा में अतिसूक्ष्मदशीर् द्वारा देखा जाता है। पृथक - पृथक कोलाॅइडी कण अंध्ेरी पृष्ठभूमि में चमकदार तारों के समान प्रतीत होते हैं। अतिसूक्ष्मदशीर् वास्तविक कोलाॅइडी कणों को प्रद£शत नहीं करता, बल्िक उनके द्वारा प्रकीण्िार्त प्रकाश का अवलोकन कराता है। अतः अतिसूक्ष्मदशीर्कोलाॅइडी कणों के आकार एवं आकृति के बारे में कोइर् सूचना नहीं देता। ;पपपद्ध रंगμ कोलाॅइडी विलयन का रंग परिक्ष्िाप्त कणों के द्वारा प्रकीण्िार्त प्रकाश के तरंगदैघ्यर् परनिभर्र करता है। इसके अतिरिक्त, प्रकाश का तरंगदैघ्यर् कणों के आकार एवं प्रकृति पर निभर्र करता है। कोलाॅइडी विलियनों का रंग प्रेक्षक द्वारा प्रकाश को ग्रहण करने के तरीके पर भी निभर्र करता है। उदाहरण के लिए दूध् एवं पानी का मिश्रण पराव£तत प्रकाश में देखने पर नीला एवं संचरित प्रकाश में देखने पर लाल दिखाइर् देता है सूक्ष्मतम कणों वाले गोल्ड साॅल का रंग लाल होता है, जैसे - जैसे कणों का आकार बढ़ता जाता है यह बैंगनी, पिफर नीला और अंत में स्वण्िार्म हो जाता है। ;पअद्ध ब्राउनी गतिμ जब कोलाॅइडी विलयनों को शक्ितशाली अतिसूक्ष्मदशीर् में देखा जाता है तो कोलाॅइडी कण पूरे प्रेक्ष्िात क्षेत्रा में लगातार टेढ़ी - मेढ़ी गति की अवस्था में दिखाइर् देते हैं। यह गति सवर्प्रथम बि्रटिश वनस्पति वैज्ञानिक राॅबटर् ब्राउन ने प्रेक्ष्िात की, इसीलिए इसेब्राउनी गति कहते हैं ;चित्रा 5.12द्ध । यह गति कोलाॅइड की प्रकृति से स्वतंत्रा होती है परन्तु कणों के आकार एवं विलयन की श्यानता ;विस्काॅसिटीद्ध पर निभर्र करती है। जितना छोटा आकार होगा एवं श्यानता जितनी कम होगी, गति उतनी ही तीव्र होगी। ब्राउनी गति को परिक्षेपण माध्यम के अणुओं द्वारा कोलाॅइडी कणों से असमान टक्कर के द्वारा समझाया गया है। ब्राउनी गति बिलोडन प्रभाव डालती है जो कणों को स्िथर नहीं होने देता तथा इस प्रकार कोलाॅइडी साॅल के स्थायित्व के लिएउत्तरदायी होता है। ;अद्ध कोलाॅइडी कणों पर आवेशμ कोलाॅइडी कणों पर हमेशा विद्युत आवेश रहता है। विलयन के सभी कोलाॅइडी कणोंपर आवेश की प्रकृति समान होती है जो कि धनात्मक या )णात्मक हो सकती है।कुछ सामान्य साॅल की सूची उनके कणों पर आवेश की प्रकृति के साथ नीचे दी गइर् हैμ 141 पृष्ठ रसायन साॅल कणों पर आवेश एक या अध्िक कारणों से होता है यथा धतुओं के वैद्युतपरिक्षेपण के समय साॅल कणों के द्वारा इलैक्ट्राॅन प्रग्रहण ;ब्ंचजनतमद्ध, विलयन से आयनों का अिामान्य अध्िशोषण एवं/या विद्युतीय दोहरी परत बनने के कारण। आयनों का अध्िमान्य अध्िशोषण सवार्ध्िक मान्य कारण है। साॅल कण ध्नात्मक या )णात्मक आयनों के अध्िमान्य अिाशोषण द्वारा ध्नात्मक या )णात्मक आवेश ग्रहण कर लेते हैं। परिक्षेपण माध्यम में दो या अध्िक आयन उपस्िथत होने पर कोलाॅइडी कणों द्वारा उस आयन का अिामान्य अध्िशोषण होता है जो कोलाॅइड में भी उपस्िथत होता है। इसे निम्नलिख्िात उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। ;कद्ध जब सिल्वर नाइट्रेट विलयन को पोटैश्िायम आयोडाइड विलयन में मिलाया जाता है, तब अवक्षेपित सिल्वर आयोडाइड परिक्षेपण माध्यम में से आयोडाइड आयनों कोअिाशोष्िात करके ट्टण - आवेश्िात कोलाॅइडी विलयन देता है। ¯कतु जब ज्ञप् विलयन को ।हछव्3 विलयन में मिलाया जाता है तो परिक्षेपण माध्यम से ।ह़ आयनों के अध्िशोषण के कारण ध्न - आवेश्िात साॅल बनता है। ।हप्ध्प्दृ ।हप्ध्।ह़ ट्टण - आवेश्िात धन - आवेश्िात ;खद्ध यदि गमर् जल के आध्िक्य में थ्मब्स3 मिलाया जाये तो थ्म3़ आयनों के अध्िशोषण से ध्न आवेश्िात जलयोजित पेफरिक आॅक्साइड का साॅल बनता है। ¯कतु यदि पेफरिक क्लोराइड को छंव्भ् में मिलाया जाये तो व्भ्दृ आयनों के अिाशोषण के साथ एक )ण - आवेश्िात साॅल प्राप्त होता है। दृ थ्मव्ण्गण्भ्व्ध्थ्म3़ थ्मव्ण्गभ्व्ध्व्भ्232232धन - आवेश्िात ट्टण - आवेश्िात उपरोक्त अिामान्य अिाशोषण द्वारा पृष्ठ पर ध्न या )ण आवेश ग्रहण कर लेने के पश्चात् कोलाॅइडी कणों की सतह माध्यम में से प्रतिआयनों को आकष्िार्त करती है जिससे आयनों की दूसरी परत बनती है जैसा कि नीचे दशार्या गया है। दृ ़ ़ दृ ।हप्ध्प् ज्ञ ।हप्ध्।ह प् ट्टण - आवेश्िात धन - आवेश्िात कोलाॅइडी कणों के चारों ओर विपरीत आवेशों की दो परतों का संयोजन हेल्महोल्त्स विद्युतीय दोहरी परत कहलाता है। आध्ुनिक विचारों के अनुसार आयनों की प्रथम परत दृढ़तापूवर्क बँधी रहती है, जिसे स्िथर परत कहते हैं, जबकि दूसरी परत गतिशील होती है रसायन विज्ञान एनोड वैफथोड ;प्रारम्िभक स्तरद्ध जल कोलाॅइडी;परिक्षेपण विलयनमाध्यमद्ध चित्रा 5.13μ वैद्युत कण संचलन जिसे विसरित परत कहते हैं। आवेशों का पृथक्करण विभव का आधार होता है, अतः स्िथरएवं विसरित भागों पर विपरीत चिÉक के आवेशों के कारण दोनों परतों के मध्य विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है। विपरीत आवेशों वाली स्िथर एवं विसरित परतों के मध्य यह विभवान्तर वैद्युत गतिक विभव या जीटा विभव कहलाता है। कोलाॅइडी कणों पर बराबर एवं एक जैसे आवेशों की उपस्िथति कोलाॅइडी विलयनों कोस्थायित्व देने के लिए मुख्य रुप से उत्तरदायी होती है क्योंकि समान आवेशों के मध्य प्रतिकषर्ण बल उन्हें पास - पास आकर सहमिलन या पुंजित होने से रोकते हैं। ;अपद्ध वैद्युत कण संचलन ;म्समजतवचीवतमेपेद्ध - कोलाॅइडी कणों पर आवेश की उपस्िथति वैद्युत कण संचलन प्रयोग से संपुष्ट होती है। जब एक कोलाॅइडी विलयन में डूबे हुये दो प्लैटिनम इलैक्ट्रोडों पर विद्युत विभव लगाया जाता है तो कोलाॅइडी कण एक अथवा दूसरे इलैक्ट्रोड की ओर गमन करते हैं। विद्युत विभव के प्रभाव में कोलाॅइडी कणों का संचलन वैद्युत कण संचलन कहलाता है। ध्नात्मक आवेश्िात कण वैफथोड की ओर जबकि )णात्मक आवेश्िात कण ऐनोड की ओर गति करते हैं। यह निम्नलिख्िात प्रायोगिक व्यवस्था से प्रदश्िार्त किया जा सकता है ;चित्रा 5.13द्ध। जब किसी उपयुक्त प्रकार से वैद्युत कण संचलन अथार्त् कणों की गति रोकी जाती है तो यह देखा जाता है कि परिक्षेपण माध्यम विद्युत क्षेत्रा में गति करना प्रारंभ कर देता है। यह परिघटना वैद्युत परासरण कहलाती है। ;अपपद्ध स्कंदन या अवक्षेपण द्रवविरागी साॅल का स्थायित्व कोलाॅइडी कणों पर आवेश के कारण होता है। यदि किसी प्रकार आवेश हटा दिया जाये तो कण एक - दूसरे के समीप आकर पुंजित ;या स्वंफदितद्ध हो जायंेगे एवं गुरूत्व बल के कारण नीचे बैठ जाएंगे। कोलाॅइडी कणों के नीचे बैठ जाने का प्रक्रम साॅल का स्कंदन या अवक्षेपण कहलाता है। द्रवस्नेही साॅल का स्कंदन निम्नलिख्िात विध्ियों से किया जा सकता हैμ ;कद्ध वैद्युत कण संचलन द्वाराμ कोलाॅइडी कण विपरीत आवेश्िात इलैक्ट्रोड की ओर गति करते हैं एवं इलैक्ट्रोड पर आवेश विसजिर्त करके अवक्षेपित हो जाते हैं। ;खद्ध दो विपरीत आवेश्िात साॅल को मिश्रित करकेμ जब दो विपरीत आवेश्िात साॅल लगभग समान अनुपात में मिश्रित किए जाते हैं, तो वे एक - दूसरे के आवेश को उदासीन करके आंश्िाक या पूणर्तया अवक्षेपित हो जाते हैं। जलयोजित पेफरिकआॅक्साइड ;धन - आवेश्िात साॅलद्ध एवं आसेर्नियस सल्पफाइड ;ट्टण - आवेश्िात साॅलद्ध को मिश्रित करने पर ये अवक्षेपित हो जाते हैं। इस प्रकार का स्कंदन पारस्परिक स्कंदन कहलाता है। ;गद्ध क्वथन द्वाराμ जब एक साॅल को उबाला जाता है तो परिक्षेपण माध्यम के अणुओं के साथ संघट्ट ;ब्वससपेपवदद्ध बढ़ने से अध्िशोष्िात परत विक्षुब्ध् हो जाती है। इससे कणों पर उपस्िथत आवेश कम हो जाता है और अंततः इसके कारण वे अवक्षेप के रूप में नीचे बैठे जाते हैं। ;घद्ध वैद्युतअपघट्य मिलाकरμ जब एक वैद्युतअपघट्य प्रचुर मात्रा में मिलाया जाता है तो कोलाॅइडी कण अवक्षेपित हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि कोलाॅइडी कण अपने से विपरीत आवेश वाले आयनों से अन्योन्यिया करते हैं। इससे उदासीनीकरण होता है जिससे स्कंदन हो जाता है। कणों पर आवेश के उदासीनीकरण के लिए 143 पृष्ठ रसायन 5.5 इमल्शन (पायस) जल में तेल तेल तेल में जल चित्रा 5.14μ इमल्शनों के प्रकार रसायन विज्ञान 144 उत्तरदायी आयन स्कंदक आयन कहलाते हैं। एक )ण आयन ध्नात्मक आवेश्िात साॅल का स्कंदन करता है और इसके विलोमतः भी होता है। यह देखा गया है किसाधारणतः ऊणीर् कमर्क आयन की संयोजकता जितनी अिाक होती है उतनी ही अिाक उसकी अवक्षेपण की क्षमता होती है। इसे हाडीर् - शुल्से नियम कहते हैं। )णसाॅल के स्कंदन में ऊणर्न क्षमता का क्रम ।स3़झठं2़झछं़ होता है।इसी प्रकार ध्न साॅल के स्कंदन में ऊणर्न क्षमता का क्रमμ ख्थ्म;ब्छद्ध6,4दृ झ च्व्43दृ झ ैव्42दृ झ ब्सदृ होता है। किसी विद्युत अपघट्य की मिली मोल प्रति लीटर में न्यूनतम सांद्रता जो किसी साॅल को दो घंटों में स्कंदित करने के लिए आवश्यक हो, स्कंदन मान कहलाती है। जितनी कम मात्रा की आवश्यकता होगी उतनी ही अिाक उस आयन की स्कंदन शक्ित होगी। द्रवरागी साॅल का स्कंदनद्रवरागी साॅल के स्थायित्व के लिए दो कारक उत्तरदायी होते हैं। ये दो कारक हैं, कोलाॅइडी कणों पर आवेश एवं उनका विलायकयोजन। जब ये दोनों कारक हटा दिए जाते हैं, तो द्रवरागी साॅल को स्वंफदित किया जा सकता है। यह ;पद्ध वैद्युतअपघट्य मिलाकर एवं ;पपद्ध उपयुक्त विलायक मिलाकर किया जा सकता है। जब द्रवरागी साॅल में एल्कोहाॅल एवं ऐसीटोन जैसे विलायक मिलाए जाते हैं तो परिक्ष्िाप्त प्रावस्था का निजर्लीकरण हो जाता है। इस परिस्िथति में वैद्युतअपघट्य की कम मात्रा से भी स्कंदन हो सकता है। कोलाॅइडों का रक्षण द्रवरागी साॅल, द्रवविरागी साॅल की तुलना में अध्िक स्थायी होते हैं। इसका कारण यह है कि द्रवरागी कोलाॅइड व्यापक रूप से विलायकयोजित होते हैं अथार्त् कोलाॅइड कण जिस द्रव में परिक्ष्िाप्त होते हैं, उससे आच्छादित हो जाते हैं। द्रवरागी कोलाॅइडों में द्रवविरागी कोलाॅइडों के रक्षण का अद्वितीय गुण होता है। जब द्रवरागी साॅल को द्रवविरागी साॅल में मिलाया जाता है तो द्रवरागी कण, द्रवविरागी कणों के चारों ओर एक परत बना लेते हैं एवं इस प्रकार वे उसकी वैद्युत अपघट्य से रक्षा करते हैं। इस उद्देश्य के लिए प्रयुक्त द्रवरागी कोलाॅइड रक्षी कोलाॅइड कहलाते हैं। ये द्रव, द्रव कोलाॅइडी निकाय हैं अथार्त् उनमें सूक्ष्म विभाजित द्रव की बूँदों का दूसरे द्रव में परिक्षेपण होता है। जब दो अमिश्रणीय या आंश्िाक मिश्रणीय द्रवों के मिश्रण को हिलायाजाता है, तो एक द्रव में दूसरे द्रव का अपरिष्कृत परिक्षेपण प्राप्त होता है जिसे इमल्शन ;पायसद्ध कहते हैं। सामान्यतया दो द्रवों में से एक जल होता है। इमल्शन दो प्रकार के होते हैं। ;पद्ध तेल का जल में परिक्षेपण ;वध्ू प्रकारद्ध एवं ;पपद्ध जल का तेल में परिक्षेपण ;ूध्व प्रकारद्ध प्रथम निकाय में जल परिक्षेपण माध्यम की तरह कायर् करता है। इस प्रकार के इमल्शन के उदाहरण हैंμ दूध् एवं वेनीश्िांग क्रीम। दूध् में, द्रव वसा जल में परिक्ष्िाप्त होती है। दूसरे निकाय में, तेल परिक्षेपण माध्यम का कायर् करता है। इस प्रकार के सामान्य उदाहरण हैंμ मक्खन एवं क्रीम। 5.6 हमारे चारों ओर कोलाॅइड तेल एवं जल के इमल्शन अस्थायी होते हैं और कभी - कभी रख देने पर दो परतों में अलग हो जाते हैं। इमल्शन के स्थायित्व के लिए सामान्यतया एक तीसरा घटक जिसे पायसीकमर्क कहते हैं, मिलाया जाता है। पायसीकमर्क, माध्यम एवं निलंबित कणों के मध्य एक अंतरापृष्ठीय पिफल्म बनाता है। तेल/जल ;वध्ूद्ध इमल्शन के लिए प्रमुख पायसीकमर्क,प्रोटीन, गोंद, प्राकृतिक एवं संश्लेष्िात साबुन आदि हैं एवं जल/तेल ;ूध्वद्ध के लिए वसीय अम्लों के भारी धतुओं के लवण, लंबी शंृखला के एल्कोहाॅल, काजल ;स्ंउच ठसंबाद्ध आदि हैं। इमल्शन को परिक्षेपण माध्यम की किसी भी मात्रा से तनु किया जा सकता है। दूसरी ओर जब परिक्ष्िाप्त द्रव को मिश्रित किया जाता है तो यह एक पृथक परत बना लेता है। इमल्शन में बिंदुक ;कतवचसमजेद्ध बहुध )णात्मक आवेश्िात होते हैं तथा वैद्युतअपघट्य के द्वारा अवक्षेपित किए जा सकते हैं। ये ब्राउनी गति तथा टिन्डल प्रभाव भी दशार्ते हैं। इमल्शनों को गमर्, ठंडा या अपकेंद्रण करके अवयवी द्रवों में तोड़ा जा सकता है। दैनिक जीवन में हमारे संपवर्फ में आने वाले अिाकतर पदाथर् कोलाॅइड होते हैं। हमारा भोजन, पहनने वाले वस्त्रा, हमारे इस्तेमाल में आने वाला लकड़ी का पफनीर्चर, हमारा घर, पढ़ने वाले समाचार पत्रा मुख्यतः कोलाॅइड से नि£मत होते हैं। वुफछ रोचक एवं उल्लेखनीय कोलाॅइडों के उदाहरण निम्नलिख्िात हैंμ ;पद्ध आकाश का नीला रंगμ हवा में जल के साथ निलंबित ध्ूल के कण हमारी आँखों तक पहुँचने वाले प्रकाश को प्रकीण्िार्त करते हैं एवं हमें आकाश नीला दिखाइर् देता है। ;पपद्ध कोहरा, ध्ुंध् एवं बरसातμ जब हवा की बहुत बड़ी मात्रा जिसमें ध्ूल के कण होते हैं, अपने ओसांक से नीेचे ठंडी हो जाती है तो हवा की नमी इन कणों पर संघनित हो जाती है और बिंदुक ;कतवचसमजेद्ध बना लेती है। ये बिंदुक कोलाॅइडी प्रकृति के होने के कारण हवा में ध्ुंध् या कोहरे के रूप में तैरते रहते हैं। बादल हवा मेंनिलंबित जल के बिंदुकों से बने ऐरोसाॅल होते हैं। ऊपरी वायुमंडल में संघनन के कारण जल के कोलाॅइडी बिंदुक और बड़े होते जाते हैं जब तक कि वे बरसात के रूप में नीेचे न आ जाएँ। कभी - कभी दो विपरीत आवेश्िात बादलों के मिलने से भी बरसात होती है।विद्युतीकृत ध्ूल को पेंफककर या बादलों के विपरीत आवेश वाले साॅल कोवायुयान की सहायता से स्प्रे करके कृत्रिाम बरसात करवाना भी संभव है। ;पपपद्ध खाद्य सामग्रीμ दूध्, मक्खन, हलवा, आइर्सक्रीम, पफलों का रस आदि ये सभी किसी न किसी रूप में कोलाॅइड होते हैं। ;पअद्ध रुध्िरμ रुध्िर ऐल्बूमिनाॅइड पदाथर् का कोलाॅइडी विलयन है। पिफटकरी एवं पेफरिकक्लोराइड के विलयन का रक्तड्डाव को रोकने का कायर् रुध्िर के स्कंदन से बनने वाला थक्के के कारण होता है जो खून को बहने से रोकता है। ;अद्ध मृदाएंμ ऊवर्रा मृदाएं कोलाॅइडी प्रकृति की होती हैं जिनमें “यूमस, रक्षक कोलाॅइडकी तरह कायर् करता है। कोलाॅइड प्रकृति के कारण मृदाएं नमी एवं पोषक पदाथो± को अध्िशोष्िात करती हैं। ;अपद्ध डेल्टा बननाμ नदी का जल मृदा का कोलाॅइडी विलयन बन जाता है। समुद्र के जल में बहुत सारे वैद्युतअपघट्य होते हैं। जब नदी का जल समुद्र के जल से मिलता है 145 पृष्ठ रसायन तो समुद्र के जल में उपस्िथत विद्युतअपघट्य मिट्टðी के कोलाॅइडी विलयन को स्कंदित कर देता है जिससे यह जम जाती है तथा डेल्टा बन जाता है। कोलाॅइडों के अनुप्रयोग कोलाॅइड उद्योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं। कुछ उदाहरण निम्नलिख्िात हैंμ उच्च वोल्टता के;पद्ध ध्ूम्र का विद्युतीय अवक्षेपणμ ध्ूम्र, काबर्न, आसेर्निक यौगिकों, ध्ूल आदि ठोस कणों का वायु में कोलाॅइडी विलयन है। चिमनी के बाहर आने से पहलेकाबर्न से मुक्त गैसें धुएँ को इसके कणों के आवेश से विपरीत आवेश वाले इलैक्ट्रोडों के कक्ष में से गुजारा जाता है। कण इन प्लेटों के संपवर्फ में आने पर अपना आवेश खो देते हैं एवं अवक्षेपित हो जाते हैं। इस प्रकार कण कक्ष के पफशर् पर बैठ जाते हैं। इस अवक्षेपक को कॅाट्रेल अवक्षेपक कहा जाता है ;चित्रा 5.15द्ध। ध्ुआँ ;ध्ूम्रद्ध ;पपद्ध पेयजल का शुिकरणμ प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त जल में प्रायः अशुियाँ निलंबित होती हैं। ऐसे जल से निलंबित अशुियों को स्वंफदित करने के लिएअवक्षेपित राख पिफटकरी मिलाइर् जाती है जिससे जल पीने योग्य बन जाता है।चित्रा 5.15μ काॅटेªल ध्ूम्र अवक्षेपक ;पपपद्ध औषध्μ अध्िकांश औषध् कोलाॅइडी प्रकृति की होती हैं। उदाहरणाथर्, आँख का लोशन आजिर्राॅल एक सिल्वर साॅल है। कोलाॅइडी एन्िटमनी का उपयोग कालाजार के इलाज में होता है। कोलाॅइडी गोल्ड का उपयोग अंतःपेशी इंजेक्शन में किया जाता है। दूिाया मैग्नीश्िाया जो कि एक इमल्शन है, का उपयोग पेट की गड़बड़ी दूर करने में किया जाता है। कोलाॅइडी औषध् अध्ि क प्रभावशाली होती हैं क्योंकि बड़े पृष्ठ क्षेत्रा के कारण ये आसानी सेस्वांगीकृत हो जाती हैं। ;पअद्ध चमर्शोध्नμ पशुओं की खाल कोलाॅइडी प्रकृति की होती है। जब खाल पर धनात्मक आवेश्िात कण होते हैं और इसे टेनिन में भ्िागोया जाता है, जिस पर )णात्मक आवेश वाले कोलाॅइडी कण होते हैं, तो पारस्परिक स्कंदन होता है। इससे चमर् कठोर हो जाता है। इस प्रक्रम को चमर्शोधन कहते हैं। टेनिन के स्थान पर क्रोमियम लवणों का उपयोग भी किया जाता है। ;अद्ध साबुन एवं अपमाजर्कों की शोध्न ियाμइसका वणर्न पहले ही खंड 5.4.3 में किया जा चुका है। ;अपद्ध पफोटोग्रापफी प्लेटें एवं पिफल्मेंμ जिलेटिन में प्रकाश संवेदी सिल्वर ब्रोमाइड के इमल्शन का ग्लास प्लेटों या सेलुलाॅइड पिफल्मों पर विलेपन कर पफोटोग्रापफी की प्लेटें या पिफल्म बनायी जाती हैं। ;अपपद्ध रबर उद्योगμ लेटेक्स रबर के ट्टणात्मक आवेश्िात कणों का कोलाॅइडी विलयन है। रबर को लेटेक्स के स्कंदन से प्राप्त किया जाता है। ;अपपपद्ध औद्योगिक उत्पादμ पेंट, स्याही, संश्लेष्िात प्लास्िटक, रबर, ग्रैपफाइट, चिकनाइर् ;स्नेहकद्ध ;स्नइतपबंदजद्ध, सीमेंट आदि सभी कोलाॅइडी विलयन हैं। रसायन विज्ञान अभ्यास 5ण्1 अध्िशोषण एवं अवशोषण शब्दों ;पदोंद्ध के तात्पयर् में विभेद कीजिए। प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए। 5ण्2 भौतिक अध्िशोषण एवं रासायनिक अध्िशोषण में क्या अंतर है? 5ण्3 कारण बताइए कि सूक्ष्म विभाजित पदाथर् अध्िक प्रभावी अध्िशोषक क्यों होता है? 5ण्4 किसी ठोस पर गैस के अध्िशोषण को प्रभावित करने वाले कारक वफौन से हैं? 5ण्5 अध्िशोषण समतापी वव्रफ क्या है? प्रफाॅयन्डलिक अध्िशोषण समतापी वव्रफ का वणर्न कीजिए। 5ण्6 अध्िशोषक के सियण से आप क्या समझते हैं? यह वैफसे प्राप्त किया जाता है? 5ण्7 विषमांगी उत्प्रेरण में अध्िशोषण की क्या भूमिका है? 5ण्8 अध्िशोषण हमेशा ऊष्माक्षेपी क्यों होता है? 5ण्9 कोलाॅइडी विलयनों को परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्थाओं के आधर पर वैफसे वगीर्कृत किया जाता है? 5ण्10 ठोसों द्वारा गैसों के अध्िशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना कीजिए। 147 पृष्ठ रसायन 5ण्11 द्रवरागी एवं द्रवविरागी साॅल क्या होते हैं? प्रत्येक का एक - एक उदाहरण दीजिए। द्रवविरोध्ी साॅल आसानी से स्कंदित क्यों हो जाते हैं? 5ण्12 बहुअणुक एवं वृहदाणुक कोलाॅइड में क्या अंतर है? प्रत्येक का एक - एक उदाहरण दीजिए। सहचारी कोलाॅइड इन दोनों प्रकार के कोलाॅइडों से वैफसे भ्िान्न हैं? 5ण्13 एन्जाइम क्या होते हैं? एन्जाइम उत्प्रेरण की िया विध्ि को संक्षेप में लिख्िाए। 5ण्14 कोलाॅइडों को निम्न आधर पर वैफसे वगीर्कृत किया गया है? ;कद्ध घटकों की भौतिक अवस्था ;खद्ध परिक्ष्िाप्त प्रावस्था की प्रकृति ;गद्ध परिक्ष्िाप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यिया। 5ण्15 निम्नलिख्िात परिस्िथतियों में क्या प्रेक्षण होंगे? ;पद्ध जब प्रकाश किरण पुंज कोलाॅइडी साॅल में से गमन करता है। ;पपद्ध जलयोजित पेफरिक आॅक्साइड साॅल में छंब्स वैद्युतअपघट्य मिलाया जाता है। ;पपपद्ध कोलाॅइडी साॅल में से विद्युतधरा प्रवाहित की जाती है। 5ण्16 इमल्शन क्या हैं? इनके विभ्िान्न प्रकार क्या हैं? प्रत्येक प्रकार का उदाहरण दीजिए। 5ण्17 पायसीकमर्क पायस को स्थायित्व वैफसे देते हैं? दो पायसीकमर्कों के नाम लिख्िाए। 5ण्18 ‘‘साबुन की िया पायसीकरण एवं मिसेल बनने के कारण होती है,’’ इस पर टिप्पणी कीजिए। 5ण्19 विषमांगी उत्प्रेरण के चार उदाहरण दीजिए। 5ण्20 उत्प्रेरक की सियता एवं वरणक्षमता का क्या अथर् है? 5ण्21 िाओलाइटों द्वारा उत्प्रेरण के कुछ लक्षणों का वणर्न कीजिए। 5ण्22 आकृति वरणात्मक उत्प्रेरण क्या है? 5ण्23 निम्न पदों ;शब्दोंद्ध को समझाइए ;पद्ध वैद्युत कण संचलन, ;पपद्ध स्कंदन, ;पपपद्ध अपोहन, ;पअद्ध टिन्डल प्रभाव, 5ण्24 इमल्शनों ;पायसद्ध के चार उपयोग लिख्िाये। 5ण्25 मिसेल क्या हैं? मिसेल निकाय का एक उदाहरण दीजिए। 5ण्26 निम्न पदों को उचित उदाहरण सहित समझाइए। ;पद्ध एल्कोसाॅल, ;पपद्ध एरोसाॅल, ;पपपद्ध हाइड्रोसाॅल, 5ण्27 फ्कोलाॅइड एक पदाथर् नहीं पदाथर् की एक अवस्था हैय् इस कथन, पर टिप्पणी कीजिए। रसायन विज्ञान 148

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