उद्देश्य इस एकक के अध्ययन के पश्चात् आप - ऽ एक वैद्युतरासायनिक सेल का वणर्न कर सकेंगे एवं गैल्वेनी व वैद्युतअपघटनी सेलों के मध्य विभेद कर सकेंगेऋ ऽ गैल्वेनी सेल के मउ ि;वैद्युत वाहक बलद्ध के परिकलन हेतु नेन्र्स्ट समीकरण को अनुप्रयुक्त कर सकेंगे एवं सेल के मानक विभव को परिभाष्िात कर सकेंगेऋ ऽ सेल के मानक विभव, सेल अभ्िािया की गिब्श ऊजार् एवं इसके साम्य स्िथरांक में संबंध स्थापित कर सकेंगेऋ ऽ आयनिक विलयनों की प्रतिरोधकता ;ρद्ध, चालकता ;κद्ध एवं मोलर चालकता ;Λ उद्ध को परिभाष्िात कर सकेंगेऋ ऽ आयनिक ;वैद्युतअपघटनीद्ध एवं इलेक्ट्रॅानिक चालकता में विभेद कर सकेंगेऋ ऽ वैद्युतअपघटनी विलयनों की चालकता मापने की वििायों का वणर्न कर सकेंगे एवं उनकी मोलर चालकताओं को परिकलित कर सवेंफगेऋ ऽ विलयनों की चालकता एवं मोलर चालकता ;ग्राम अणुक चालकताद्ध के सांद्रता के साथ परिवतर्न के औचित्य को बता सवंेफगे एवं Λ 0 ;शून्य सांद्रता या अनंत तनुता पर मोलर चालकता ;ग्राम अणुक चालकताद्ध को परिभाष्िात कर सकेंगेऋ ऽ कोलराऊश नियम को प्रतिपादित कर सकेंगे एवं इसके अनुप्रयोगों को जानेंगेऋ ऽ वैद्युतअपघटन के मात्रात्मक पक्ष को समझ सकेंगेऋ ऽ कुछ प्राथमिक एवं संचायक बैटरियों एवं ईंधन सेलों की संरचना का वणर्न कर सकेंगेऋ ऽ संक्षारण को वैद्युतरासायनिक प्रक्रम के रूप में बता सकेंगे। फ्रासायनिक अभ्िाियाएं विद्युत ऊजार् उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त की जा सकती हैं। विलोमतः विद्युत ऊजार् का प्रयोग उन रासायनिक अभ्िाियाओं को ियान्िवत करने के लिए किया जा सकता है जो स्वतः अग्रसारित नहीं होतीं।य् वैद्युतरसायन स्वतः प्रवतिर्त रासायनिक अभ्िाियाओं में निगर्मित ऊजार् से विद्युत उत्पादन एवं विद्युतीय ऊजार् के स्वतः अप्रवतिर्त रासायनिक परिवतर्नों में उपयोग का अध्ययन है। यह विषय सै(ांतिक एवं प्रायोगिक दोनों ही विचारों से उपयोगी है। बहुत सारी धातुएं, सोडियम हाइड्राॅक्साइड, क्लोरीन, फ्रलुओरीन एवं अन्य बहुत सारे रसायन, वैद्युतरासायनिक वििायों द्वारा बनाए जाते हैं। बैटरियाँ एवं ईंधन सेल रासायनिक ऊजार् को वैद्युत ऊजार् में परिवतिर्त करते हैं एवं विभ्िान्न उपकरणों एवं युक्ितयों में व्यापक रूप से उपयोग में लाए जाते हैं। वैद्युतरासायनिक अभ्िाियाएं ऊजार् प्रगुण ;मपििबमदजद्ध तथा अल्प प्रदूषक होती हैं, अतः वैद्युतरसायन का अध्ययन कइर् नइर् तकनीकों के आविष्कार, जो कि पयार्वरण के लिए सुरक्ष्िात हांे, के लिए महत्वपूणर् है। संवेदी संकेतों का कोश्िाका से मस्ितष्क या इसके विपरीत दिशा में संचरण एवं कोश्िाकाओं के मध्य संचार का मूल आधार वैद्युतरासायनिक ही है, अतः वैद्युतरसायन एक अतिविस्तृत एवं अंतरविषयी विषय है। इस एकक में हम केवल इसके वुफछ महत्वपूणर् प्रारंभ्िाक पहलुओं पर विचार करेंगे। 3.1 वैद्युत रासायनिक सेल चित्रा 3.1 - डेन्यल सेल जिसमें जिंक एवं काॅपर इलैक्ट्रोड अपने - अपने लवणों के विलयनों में निमज्ज हैं। कक्षा ग्प् के एकक 8 में हम डेन्यल सेल की संरचना एवं कायर्वििा के बारे में पढ़ चुके हैं ;चित्रा 3.1द्ध। यह सेल निम्नलिख्िात रेडाॅक्स अभ्िािया में उत्सजिर्त रासायनिक ऊजार् को वैद्युत ऊजार् में परिवतिर्त करती है। र्द;ेद्ध ़ ब्न2़;ंुद्ध → र्द2़;ंुद्ध ़ ब्न;ेद्ध ;3ण्1द्ध जब र्द2़ तथा ब्न2़ आयनों की सांद्रता एक इकाइर् ;1 उवस कउदृ3द्ध’ होती है, तो इसका विद्युतीय विभव 1ण्1 ट होता है। इस प्रकार की युक्ित को गैल्वैनी या वोल्टीय सेल कहते हैं। यदि गैल्वैनी सेल में एक विपरीत बाह्य विभव लगाया जाए ;चित्रा 3ण्2 कद्ध एवं इसे धीरे - धीरे बढ़ाया जाए, तो हम देखते हैं कि अभ्िािया तब तक चलती रहती है जब तक कि बाह्य विभव 1ण्1 ट नहीं हो जाता, इस स्िथति में अभ्िािया पूणर्तः रुक जाती है एवं सेल में विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होती। बाह्य विभव में कोइर् भी अतिरिक्त वृि अभ्िािया को पुनः परंतु विपरीत दिशा में प्रारंभ कर देती है ;चित्रा 3ण्2 गद्ध। अब यह एक वैद्युतअपघटनी सेल के समान कायर् करती है जो कि एक स्वतः अप्रवतिर्त रासायनिक अभ्िािया को विद्युतीय ऊजार् के उपयोग से प्रारंभ करने की युक्ित है। दोनों ही सेल बहुत महत्वपूणर् होते हैं एवं हम इनकी वुफछ प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन आगे के पृष्ठों में करेंगे। ;कद्ध जब म्बाह्य ढ 1ण्1 ट ;खद्ध जब म्बाह्यत्र 1ण्1ट ;गद्ध जब म्बाह्य झ 1ण्1ट ;पद्धइलेक्ट्राॅनों का प्रवाह िांक छड़ से ;पद्ध इलेक्ट्राॅनों अथवा विद्युतधारा ;पद्ध इलेक्ट्राॅनों का प्रवाह काॅपर से काॅपर छड़ की ओर होता है अतः विद्युत का कोइर् प्रवाह नहीं होता। जिंक की ओर तथा विद्युतधारा का धारा काॅपर से जिंक की ओर प्रवाहित प्रवाह िांक से काॅपर की ओर।;पपद्ध कोइर् रासायनिक अभ्िािया होती है। नहीं होती। ;पपद्ध िांक, िांक इलैक्ट्रोड पर ;पपद्धिांक ऐनोड पर से घुलता है तथा निक्षेपित होता है तथा काॅपर, काॅपर काॅपर वैफथोड पर निक्षेपित होता है। इलैक्ट्रोड से घुलता है। चित्रा 3.2 - बाह्य विभव, म्बाह्य, सेल विभव के विपरीत लगाने पर डेन्यल सेल की कायर् प्रणाली। ’ सुनिश्िचत रूप से कहें तो सांद्रता के स्थान पर हमें सियता पद का उपयोग करना चाहिए। यह सांद्रता के अनुक्रमानुपाती होती है। तनु विलयनों में यह सांद्रता के तुल्य होती है। उच्च कक्षाओं में आप इसके बारे में और अध्ययन करेंगे। 3.2 गैल्वैनी सेल जैसा कि पहले बताया जा चुका है ;कक्षा ग्प्, एकक 8द्ध, गैल्वैनी सेल एक वैद्युतरासायनिक सेल है जो कि एक स्वतः रेडाॅक्स अभ्िािया की रासायनिक ऊजार् को विद्युतीय ऊजार् में रूपांतरित करती है। इस युक्ित में स्वतः रेडाॅक्स अभ्िािया की गिब्श ऊजार् वैद्युत कायर् में रूपांतरित होती है, जिसको मोटर या अन्य विद्युतीय जुगतोंऋ जैसे - हीटर, पंखा, गीशर इत्यादि में उपयोग किया जाता है। डेन्यल सेल, जिसका वणर्न पहले किया जा चुका है, एक ऐसी ही सेल है, जिसमें निम्नलिख्िात रेडाॅक्स अभ्िािया होती है। र्द;ेद्ध ़ ब्न2़;ंुद्ध → र्द2़ ;ंुद्ध ़ ब्न;ेद्ध यह अभ्िािया दो अधर् सेल अभ्िाियाओं का संयोजन है जिनका योग समग्र सेल अभ्िािया देता है। ;पद्ध ब्न2़ ़ 2मदृ → ब्न;ेद्ध ;अपचयन अधर् अभ्िाियाद्ध ;3ण्2द्ध ;पपद्ध र्द;ेद्ध → र्द2़ ़ 2मदृ ;आॅक्सीकरण अधर् अभ्िाियाद्ध ;3ण्3द्ध ये अभ्िाियाएं डेन्यल सेल के दो भ्िान्न भागों में होती हैं। अपचयन अधर् अभ्िािया काॅपर इलैक्ट्रोड पर होती है जबकि आॅक्सीकरण अधर् अभ्िािया िांक इलैक्ट्रोड पर होती है। सेल के ये दो भाग, अधर् सेल या रेडाॅक्स युग्म भी कहलाते हैं। काॅपर इलैक्ट्रोड को अपचयन अधर् सेल एवं िांक इलैक्ट्रोड को आॅक्सीकरण अधर् सेल भी कहा जा सकता है। हम विभ्िान्न अधर् सेलों के संयोजन से डेन्यल सेल जैसी असंख्य गैल्वैनी सेलों की रचना कर सकते हैं। प्रत्येक अधर् सेल में धत्िवक इलैक्ट्रोड वैद्युतअपघट्य में निमज्ज ;डूबाद्ध रहता है। दोनों अधर् सेल बाहर से एक वोल्टमीटर एवं एक स्िवच के माध्यम से धत्िवक तार द्वारा जुडे़ रहते हैं। दोनों अधर् सेलों के वैद्युतअपघट्य चित्रा 3.1 में दिखाए गए लवण सेतु द्वारा जुड़े रहते हैं। कभी - कभी दोनों ही इलैक्ट्रोड एक ही वैद्युतअपघट्य में निमज्ज रहते हैं एवं ऐसी स्िथतियों में लवण सेतु की आवश्यकता नहीं होती। प्रत्येक इलैक्ट्रोड - वैद्युतअपघट्य अंतरापृष्ठ पर धात्िवक आयनों की प्रवृिा विलयन से निकलकर धात्िवक इलैक्ट्रोड पर जमा होने की होती है जिससे कि यह धनावेश्िात हो सके। उसी समय इलैक्ट्रोड की धातु के परमाणुओं की विलयन में आयनों के रूप में जाने एवं इलैक्ट्रोड पर इलैक्ट्राॅन छोड़ने की प्रवृिा होती है जिससे कि यह )णावेश्िात हो सके। साम्यावस्था पर आवेशों का पृथक्करण हो जाता है एवं दोनों विपरीत अभ्िाियाओं की प्रकृति के अनुसार इलैक्ट्रोड विलयन के सापेक्ष धनात्मक या )णात्मक आवेश्िात हो जाता है। इलैक्ट्रोड एवं वैद्युतअपघट्य के मध्य विभवांतर उत्पन्न हो जाता है जिसे इलैक्ट्रोड विभव कहते हैं। जब अधर् सेल अभ्िािया में प्रयुक्त सभी स्पीशीश की सांद्रता केवल एक इकाइर् होती है तो इलैक्ट्रोड विभव को मानक इलैक्ट्रोड विभव कहते हैं। प्न्च्।ब् के नियमानुसार मानक अपचयन विभव को अब मानक इलैक्ट्रोड विभव कहा जाता है। गैल्वैनी सेल की वह अधर् सेल, जिसमें आॅक्सीकरण होता है, ऐनोड कहलाती है एवं विलयन के सापेक्ष इसका विभव )णात्मक होता है। दूसरी अधर् सेल जिसमें अपचयन होता है, वैफथोड कहलाती है एवं इसका विभव विलयन के सापेक्ष धनात्मक होता है। इस प्रकार दोनों इलैक्ट्रोडों के मध्य एक विभवांतर होता है एवं जैसे ही स्िवच चालू ;आॅनद्ध स्िथति में होता है, इलेक्ट्राॅन )णात्मक इलैक्ट्रोड से धनात्मक इलैक्ट्रोड की ओर प्रवाहित होने लगते हैं। विद्युतधारा के प्रवाह की दिशा इलेक्ट्राॅनों के प्रवाह की दिशा के विपरीत होती है। 3.2.1 इलैक्ट्रोड विभव का मापन गैल्वैनी सेल के दोनों इलैक्ट्रोडों के बीच विभवांतर सेल विभव कहलाता है एवं इसे वोल्ट में मापते हैं। सेल विभव वैफथोड एवं ऐनोड के इलैक्ट्रोड विभवों ;अपचयन विभवद्ध का अंतर होता है। इसे सेल वैद्युत वाहक बल ;मउद्धि कहा जाता है। इस समय सेल में से कोइर् धारा प्रवाहित नहीं हो रही होती। अब यह स्वीकृत परिपाटी है कि गैल्वैनी सेल को लिखते समय हम ऐनोड को बायीं ओर एवं वैफथोड को दायीं ओर लिखते हैं। गैल्वैनी सेल को लिखने के लिए साधारणतया धातु एवं वैद्युतअपघट्य के मध्य एक ऊध्वार्धर रेखा खींचकर एवं दो वैद्युतअपघट्यों को, यदि वह लवण सेतु द्वारा जुड़े हुए हों तो उनके मध्य दो ऊध्वार्धर रेखाएं खींचकर, लिखा जाता है। इस परिपाटी के अनुसार लिखे सेल का मउ िधनात्मक होता है एवं दायीं ओर के अधर् सेल के विभव से बायीं ओर के अधर् सेल के विभव को घटाकर दिया जाता है जैसे कि - म्सेल त्र म्दायाँ दृ म्बायाँ इसे निम्नलिख्िात उदाहरण द्वारा समझाया गया है - सेल अभ्िािया - ब्न;ेद्ध ़ 2।ह़;ंुद्ध ⎯→ ब्न2़;ंुद्ध ़ 2 ।ह;ेद्ध ;3ण्4द्ध अधर् सेल अभ्िाियाएं - वैफथोड ;अपचयनद्ध 2।ह़;ंुद्ध ़ 2म दृ → 2।ह;ेद्ध ;3ण्5द्ध ऐनोड ;आॅक्सीकरणद्ध ब्न;ेद्ध → ब्न2़;ंुद्ध ़ 2मदृ ;3ण्6द्ध यह देखा जा सकता है कि अभ्िािया समीकरण ;3ण्5द्ध एवं अभ्िािया समीकरण ;3ण्6द्ध का योग समीकरण ;3ण्4द्ध देता है एवं सिल्वर इलैक्ट्रोड वैफथोड की तरह तथा काॅपर इलैक्ट्रोड ऐनोड की तरह कायर् करता है। सेल को निम्न प्रकार से निरूपित किया जा सकता है - ब्न;ेद्धद्यब्न2़;ंुद्धद्यद्य।ह़;ंुद्धद्य।ह;ेद्ध एवं हम पाते हैं कि म्;सेलद्ध त्र म्;दायाँद्ध दृ म्;बायाँद्ध त्र म्।ह़ध्।ह दृ म्ब्न2़;3ण्7द्धध्ब्न अकेले अधर् सेल के विभव का मापन नहीं किया जा सकता। हम केवल दो अधर् सेलों के विभवों में अंतर को माप सकते हैं इससे सेल का मउ िप्राप्त होता है। यदि हम स्वेच्छा से एक इलैक्ट्रोड ;अधर् सेलद्ध का विभव चयनित कर लें तो इसके सापेक्ष दूसरे अधर् सेल का विभव ज्ञात किया जा सकता है। परिपाटी के अनुसार मानक हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड नामक अधर् सेल को ;चित्रा 3.3द्ध च्ज;ेद्ध⎥ भ्2;हद्ध⎥ भ़्;ंुद्ध द्वारा निरूपित किया जाता है, इसका विभव निम्नलिख्िात अभ्िािया के संगत समस्त तापों पर, शून्य निदिर्ष्ट किया गया है - 1 भ़् ;ंुद्ध ़ मदृ → भ्2;हद्ध2 मानक हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड में प्लैटिनम ब्लैक से लेपित प्लैटिनम इलैक्ट्रोड होता है। इलैक्ट्रोड अम्लीय विलयन में निमज्िजत होता है एवं इस पर शु( हाइड्रोजन गैस बुद - बुद की जाती है। हाइड्रोजन की अपचित एवं आक्सीकृत दोनों अवस्थाओं की सांद्रता, इकाइर् मान पर स्िथर रखी जाती है ;चित्रा 3.3द्ध। इसका अथर् है कि विलयन में हाइड्रोजन गैस का दाब 1 इंत एवं हाइड्रोजन आयन की सांद्रता एक मोलर होती है। चित्रा 3.3 - मानक हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड ;ैभ्म्द्ध हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड को ऐनोड ;संदभर् अधर् सेलद्ध तथा किसी दूसरी सेल को वैफथोड के स्थान पर लेकर बनाइर् गइर् एक सेल जिसे - मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड⎜⎜दूसरीअधर् सेल लिखा जा सकता है, का 298ज्ञ पर मउ,ि दूसरी अधर् सेल के अपचयन विभव का मान देता है। यदि दाहिनी ओर वाले अधर् सेल की अपचित एवं आॅक्सीवृफत स्पीशीश की सांद्रताएं इकाइर् हों तो उपरोक्त सेल का विभव, दाहिनी ओर के अधर् सेल के मानक विभव, म्;ट त्द्धए के बराबर होता है। म्ट म्टम्ट दृ ;सले द्ध त्र;त्द्ध;स् द्ध जहाँ म्ट सेल का मानक विभव एवं म्ट तथा म्ट क्रमशः दाहिनी एवं बाईं ओर;सले द्ध;त्द्ध;स् द्ध की अधर् सेलों के मानक इलैक्ट्रोड विभव हैं। चूँकि मानक हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड का विभव म्;टस् द्ध शून्य होता है अतःम्ट म्ट म्ट ;सले द्ध त्र;त्द्धदृ 0 त्र ;त्द्ध निम्नलिख्िात सेल का मापित मउ ि0ण्34 ट है जो कि निम्नलिख्िात अधर् सेल अभ्िािया का मानक इलैक्ट्रोड विभव भी है। सेल - च्ज;ेद्ध ⎥ भ्2;हए 1 इंतद्ध ⎥ भ़् ;ंुए 1 डद्ध ⎜⎜ ब्न2़ ;ंुए 1 डद्ध⎥ ब्न अधर् सेल अभ्िािया - ब्न2़ ;ंुए 1डद्ध ़ 2 मदृ → ब्न;ेद्ध इसी प्रकार, निम्नलिख्िात सेल का मापित मउ िदृ0ण्76 ट है जो कि निम्नलिख्िात अधर् सेल अभ्िािया के मानक इलैक्ट्रोड विभव के संगत हैं। सेल - च्ज;ेद्ध⎥ भ्2;हए 1 इंतद्ध⎥ भ़् ;ंुए 1 डद्ध ⎜⎜ र्द2़ ;ंुए 1डद्ध ⎜ र्द अधर् सेल अभ्िािया - र्द2़ ;ंुए 1 डद्ध ़ 2मदृ→ र्द;ेद्ध प्रथम स्िथति में मानक इलैक्ट्रोड विभव का धनात्मक मान इंगित करता है कि ब्न2़ आयन भ़् आयनों की तुलना में आसानी से अपचित हो जाते हैं। इसका विपरीत प्रक्रम संभव नहीं होता अथार्त् उपरोक्त वण्िार्त मानक परिस्िथतियों में हाइड्रोजन आयन ब्न को आॅक्सीकृत नहीं कर सकते ;अथवा हम यह भी कह सकते हैं कि हाइड्रोजन गैस काॅपर आयनों को अपचित कर सकती हैद्ध इसलिए ब्न;ेद्धए भ्ब्स में नहीं घुलता है। नाइटिªक अम्ल में यह नाइट्रेट आयनों से आॅक्सीकृत होता है न कि हाइड्रोजन आयनों से। दूसरी स्िथति में मानक इलैक्ट्रोड विभव का )णात्मक मान इंगित करता है कि हाइड्रोजन आयन िांक को आॅक्सीकृत कर सकते हैं ;या िांक हाइड्रोजन आयनों को अपचित कर सकता हैद्ध। इस परिपाटी के परिप्रेक्ष्य में चित्रा 3.1 में प्रस्तुत डेन्यल सेल की अधर् अभ्िाियाओं को निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है - बायाँ इलैक्ट्रोड - र्द;ेद्ध → र्द2़ ;ंुए 1 डद्ध ़ 2 मदृ दायाँ इलैक्ट्रोड - ब्न2़ ;ंुए 1 डद्ध ़ 2 मदृ → ब्न;ेद्ध सेल की समग्र अभ्िािया उपरोक्त अभ्िाियाओं का योग होती है। अथार्त् र्द;ेद्ध ़ ब्न2़ ;ंुद्ध → र्द2़ ;ंुद्ध ़ ब्न;ेद्ध सेल का मउ ित्र म्ट े म्;ट दृ म्ट स् द्ध;सलद्ध त्र त्द्ध;म्ट द्ध त्र 0ण्34ट दृ ;दृ 0ण्76द्धट त्र 1ण्10 ट;सले कभी - कभी प्लैटिनम एवं स्वणर् जैसी धातुएं अिय इलैक्ट्रोड के रूप में प्रयुक्त होती हैं। वे अभ्िािया में भाग नहीं लेतीं, परंतु आॅक्सीकरण एवं अपचयन अभ्िाियाओं के लिए एवं इलैक्ट्राॅनों के चालन के लिए अपनी सतह प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिख्िात अधर् सेलों में च्ज का उपयोग होता है - हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड - च्ज;ेद्धद्यभ्2;हद्धद्य भ़्;ंुद्ध भ़्जिसकी अधर् अभ्िािया है - ;ंुद्ध़ मदृ → 1 भ्2;हद्ध2ब्रोमीन इलैक्ट्रोड - च्ज;ेद्धद्यठत2;ंुद्धद्य ठतदृ;ंुद्ध जिसकी अधर् अभ्िािया है - 1 ठत2;ंुद्ध ़ म दृ → ठतदृ;ंुद्ध2मानक इलैक्ट्रोड विभव बहुत महत्वपूणर् है एवं हम इनसे कइर् महत्वपूणर् सूचनाएं प्राप्त कर सकते हैं। वुफछ चयनित अधर् सेल अपचयन अभ्िाियाओं के लिए मानक इलैक्ट्रोड विभव के मान सारणी 3.1 में दिए गए हैं। यदि किसी इलैक्ट्रोड का मानक इलैक्ट्रोड विभव शून्य से अिाक होता है तो इसकी अपचित अवस्था हाइड्रोजन गैस से अिाक स्थायी होती है। इसी प्रकार से, यदि मानक इलैक्ट्रोड विभव )णात्मक होता है तो हाइड्रोजन गैस उस स्पीशीश की अपचित अवस्था से अिाक स्थायी होती है। यह देखा जा सकता है कि सारणी में फ्रलुओरीन का मानक इलैक्ट्रोड विभव उच्चतम है। यह इंगित करता है कि फ्रलुओरीन गैस ;थ्2द्ध की फ्रलुओराइड आयन ;थ्दृद्ध में अपचित होने की प्रवृिा अिाकतम है। अतः फ्रलुओरीन गैस प्रबलतम आॅक्सीकारक है एवं फ्रलुओराइड आयन दुबर्लतम अपचायक है। लीथ्िायम का इलैक्ट्रोड विभव न्यूनतम है, यह इंगित करता है कि लीथ्िायम आयन दुबर्लतम आॅक्सीकारक है जबकि लीथ्िायम धातु जलीय विलयनों में प्रबलतम अपचायक है। यह देखा जा सकता है कि सारणी 3.1 में जब हम ऊपर से नीचे की ओर जाते हैं तो मानक इलैक्ट्रोड विभव कम होता जाता है एवं इसी के साथ अभ्िािया के बायीं ओर की स्पीशीश की आॅक्सीकारक क्षमता बढ़ती है तथा दायीं ओर के स्पीशीश की अपचयन क्षमता बढ़ती है। वैद्युत रासायनिक सेलों का व्यापक उपयोग विलयनों की चभ् ज्ञात करने में, विलेयता गुणनपफल, साम्यावस्था स्िथरांक तथा अन्य ऊष्मागतिकीय गुणों एवं विभवमितीय अनुमापनों में होता है। सारणी 3ण्1 - 298 ज्ञ पर मानक इलैक्ट्रोड विभव आयन जलीय स्पीशीश के रूप में, एवं जल द्रव के रूप में उपस्िथत हैऋ गैस एवं ठोस क्रमशः ह एवं े से दशार्ये गए हैं। 1.ट्टणात्मक म्ट का अथर् है कि रेडाॅक्स युग्म भ़्ध्भ्2 युग्म की तुलना में प्रबल अपचायक है। 2.ध्नात्मक म्ट का अथर् है कि रेडाॅक्स युग्म भ़्ध्भ्2 युग्म की तुलना में दुबर्ल अपचायक है। 3.3 नेन्र्स्ट समीकरण पूवर् खंड में हमने माना है कि इलैक्ट्रोड अभ्िािया में प्रयुक्त समस्त स्पीशीश की मोलर सांद्रता एक इकाइर् है। आवश्यक नहीं कि यह हमेशा सत्य हो। नेनर््स्ट ने दशार्या कि इलैक्ट्रोड अभ्िािया - डद़;ंुद्ध ़ दमदृ→ ड;ेद्ध के लिए किसी भी सांद्रता पर मानक हाइड्रोजन इलैक्ट्रोड के सापेक्ष मापा गया इलैक्ट्रोड विभव निम्न प्रकार निरूपित किया जा सकता है - त्ज् ख्ड;ेद्ध,म् त्रम्ट द़ द़ दृ सद;ड ध्डद्ध;ड ध्डद्ध द़ दथ् ख्ड ;ंुद्ध, चूँकि ड;ेद्ध की सांद्रता, इकाइर् मानी जाती है, इसलिए - त्ज् 1 म् त्रम्ट द़ द़ दृ सद द़ ;3ण्8द्ध;ड ध्डद्ध;ड ध्डद्ध दथ् ख्ड ;ंुद्ध, ट को पहले ही परिभाष्िात किया जा चुका है, त् गैस स्िथरांकद़म्;ड ध्डद्ध ;8ण्314 श्रज्ञदृ1 उवसदृ1द्ध है, थ् पैफराडे स्िथरांक ;96487 ब् उवसदृ1द्ध है, ज् केल्िवन में ताप क्रम है एवं ख्डद;ंुद्ध,ए ख्डद़;ंुद्ध़, स्पीसीश की मोलर सांद्रता है - डेन्यल सेल में ब्न2़ एवं र्द2़ आयनों की किसी भी सांद्रता के लिए हम लिखते हैं - वैफथोड के लिए - त्ज् 1म्म्ट2़त्र 2़ दृ सद ;3ण्9द्ध;ब्न ध्ब्नद्ध;ब्न ध्ब्नद्ध 2़2थ् ⎡ब्न ;ंुद्ध⎤⎣⎦ ऐनोड के लिए - त्ज् 1म्म्ट2़ त्र 2़ दृ सद ;3ण्10द्ध;र्द ध्र्दद्ध;र्द ध्र्दद्ध 2़2थ् ⎣⎡र्द ;ंुद्ध⎦⎤ सेल विभव - 2़ दृ 2़म्;सेलद्ध त्रम्;ब्न ध्ब्नद्ध म्;र्द ध्र्दद्ध 1 1त्ज् त्ज्म्ट.म्ट त्र 2़ दृ सद 2़ 2़ ़ सद 2़;ब्न ध्ब्नद्ध ⎡ब्न ;ंुद्ध⎤ ;र्द ध्र्दद्ध ⎡र्द ;ंुद्ध⎤2थ्⎣⎦ 2थ्⎣⎦ त्ज् 11 त्रम्ट दृम्ट 2़दृ सद दृसद 2़ ;र्द द्ध 2़ 2़;ब्न ध्ब्नद्ध ध्र्द 2थ् ⎡ब्न ;ंुद्ध⎤⎡र्द ;ंुद्ध⎤⎣ ⎦⎣⎦ ट त्ज् ख्र्द2़ ,म्;सेलद्ध त्र म्;सले द्ध दृ सद 2़ ;3ण्11द्ध 2थ् ख्ब्न , यह देखा जा सकता है कि म्;सेलद्ध दोनों आयनों, ब्न2़ एवं र्द2़ की सांद्रता पर निभर्र करता है। यह ब्न2़ आयनों की सांद्रता बढ़ाने पर बढ़ता है एवं र्द2़ आयनों की सांद्रता बढ़ाने पर घटता है। समीकरण 3.11 में प्राकृतिक लघुगणक के आधार को 10 में रूपांतरित करने पर एवं त्ए थ् के मान रखने पर, एवं ज् त्र 298 ज्ञ पर यह निम्न प्रकार से बदल जाती है - ट 0ण्059 ख्र्द 2़ ,म्;सेलद्ध त्र म् दृ सवह ;3ण्12द्ध;सले द्ध 2़ 2 ख्ब्न , दोनों इलैक्ट्रोडों के लिए इलैक्ट्राॅनों की संख्या ;दद्ध समान होनी चाहिए, अतः निम्नलिख्िात सेल - छप;ेद्ध⎥ छप2़;ंुद्ध ⎥⎥ ।ह़;ंुद्ध⎥ ।ह के लिए नेन्र्स्ट समीकरण निम्न प्रकार से लिखी जा सकती है - ट त्ज् ख्छप 2़ ,म् दृ सदम्;सेलद्ध त्र ;सले द्ध़22थ्ख्।ह , एवं एक सामान्य वैद्युतरासायनिक अभ्िािया - −दमं । ़ इठ ⎯⎯⎯→ बब् ़ कक् के लिए नेन्र्स्ट समीकरण निम्न प्रकार से लिखी जा सकती है - ट त्ज् म्;सेलद्ध त्र म् द्ध दृ 1दफ ;सले दथ् बक ट त्ज् ख्ब्, ख्क्, त्र म् दृ सद ं इ ;3ण्13द्ध;सले द्धदथ् ख्।, ख्ठ, 3.3.1 नेनर््स्ट समीकरण यदि डेन्यल सेल ;चित्रा 3.1द्ध में परिपथ को बंद कर दिया जाए तो निम्न अभ्िािया होती है - से साम्य स्िथरांक र्द;ेद्ध ़ ब्न2़;ंुद्ध → र्द2़;ंुद्ध ़ ब्न;ेद्ध ;3ण्1द्ध जैसे - जैसे समय गुजरता है र्द2़ आयनों की सांद्रता बढ़ती जाती है जबकि ब्न2़ आयनों की सांद्रता घटती जाती है। इसी समय सेल की वोल्टता, जिसे वोल्टमीटर द्वारा पढ़ा जा सकता है, घटती जाती है। वुफछ समय पश्चात् ब्न2़ एवं र्द2़ आयनों की सांद्रता स्िथर हो जाती है एवं वोल्टमीटर शून्य पठनांक दशार्ता है। यह इंगित करता है कि अभ्िािया में साम्य स्थापित हो चुका है। इस अवस्था में नेनर््स्ट समीकरण को निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है - ट 2ण्303 त्ज् ख्र्द 2़ ,म्;सेलद्ध त्र 0 त्र म् दृ सवह ;सले द्ध 2़2थ् ख्ब्न , ट 2ण्303 त्ज् ख्र्द 2़ ,या म् त्र सवह ;सले द्ध 2़2थ् ख्ब्न , परंतु साम्यावस्था पर, ख्र्द 2़ , त्र ज्ञब अभ्िािया ;3.1द्ध के लिएख्ब्न 2़, अतः ज् त्र 298ज्ञ पर उपरोक्त समीकरण को निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है - ट 0 059 टण् ट म् त्र सवह ज्ञब् त्र 1ण्1 ट ; म् द्ध त्र 1ण्1टद्ध;सले द्ध ;सले2 ;1ण्1ट × 2द्ध सवह ज्ञब् त्र त्र 37ण्288 0ण्059 ट ज्ञब् त्र 2 × 1037 ;298ज्ञ परद्ध सामान्य रूप में, ट 2ण्303त्ज् म् द्ध त्र सवह ज्ञब् ;3ण्14द्ध;सले दथ्समीकरण, ;3.14द्ध सेल के मानक विभव एवं साम्य स्िथरांक के बीच संबंध दशार्ती है। इस प्रकार अभ्िािया के लिए साम्य स्िथरांक, जिसे अन्य प्रकार मापना संभव नहीं है, सेल के संगत म्0 मान से परिकलित किया जा सकता है। 3.3.2 वैद्युतरासायनिक सेल एक सेवंफड में किया गया विद्युतीय कायर् वुफल प्रवाहित आवेश एवं विद्युतीय विभव के गुणनपफल के बराबर होता है। यदि हम गैल्वैनी सेल से अिाकतम कायर् लेना चाहते हैं तोअभ्िािया की गिब्श आवेश का प्रवाह उत्क्रमणीय करना होगा। गैल्वैनी सेल के द्वारा किया गया उत्क्रमणीय कायर्उफजार् गिब्श ऊजार् में कमी के बराबर होता है। अतः यदि सेल का मउएि म् प्रवाहित आवेश दथ् 71 वैद्युतरसायन एवं अभ्िािया की गिब्श ऊजार्, Δ तळ हो, तब Δ तळ त्र दृ दथ्म्;सेलद्ध ;3ण्15द्ध यह स्मरण रहे कि म्;सेलद्ध एक स्वतंत्रा प्राचल है, लेकिन Δतळ एक मात्रात्मक ऊष्मागतिकीय गुणध्मर् है जिसका मान श्दश् पर निभर्र करता है। इस प्रकार निम्नलिख्िात अभ्िािया - र्द;ेद्ध ़ ब्न2़;ंुद्ध ⎯→ र्द2़;ंुद्ध ़ ब्न;ेद्ध के लिए ;3ण्1द्ध Δळ त्र .2थ्म्;सेलद्धततथा अभ्िािया 2 र्द ;ेद्ध ़ 2 ब्न2़;ंुद्ध ⎯→2 र्द2़;ंुद्ध़2ब्न;ेद्ध के लिए, Δतळ त्र दृ 4थ्म्;सेलद्ध यदि समस्त अभ्िाियाकारी स्पीशीश की सांद्रता एक इकाइर् हो, तब ट म्;सेलद्ध त्र म्;सले द्ध अतः ळट टΔतत्र दृदथ् म् ;3ण्16द्ध;सले द्ध इस प्रकार म् ट के मापन से हम एक महत्वपूणर् ऊष्मागतिकीय राश्िा, अभ्िािया की;सले द्धमानक गिब्श ऊजार् Δतळट, प्राप्त कर सकते हैं। Δतळट से हम निम्न समीकरण द्वारा साम्य स्िथरांक का परिकलन कर सकते हैं। Δतळट त्र दृत्ज् सद ज्ञ 3.4 वैद्युतअपघटनी विलयनों का चालकत्व विद्युत के वैद्युतअपघटनी विलयनों में चालकत्व पर विचार करने से पूवर् वुफछ पदों को परिभाष्िात करना आवश्यक है। विद्युतीय प्रतिरोध को प्रतीक श्त्श् से निरूपित किया जाता है एवं इसे ओम ख्वीउ ;Ωद्ध, में मापा जाता है जो कि ैप् इकाइयों में ;ाह उ2द्धध्;ै3 ।2द्ध के तुल्य है। इसे ह्नीटस्टोन सेतु की सहायता से मापा जा सकता है जिससे आप भौतिक विज्ञान के अध्ययन में परिचित हो चुके हैं। किसी भी वस्तु का विद्युतीय प्रतिरोध उसकी लंबाइर् स के अनुक्रमानुपाती एवं अनुप्रस्थ काट क्षेत्रापफल । के प्रतिलोमानुपाती होता है। अथार्त् स स त् ∝ । वत त् त्र ρ । ;3ण्17द्ध समानुपाती स्िथरांक ρ ;ग्रीक, रो, तीवद्ध को प्रतिरोधकता ;विश्िाष्ट प्रतिरोधद्ध कहते हैं। इसकी ैप् इकाइर् ओम मीटर ;Ωउद्ध है तथा अिाकांशतः इसका अपवतर्क ओम सेंटीमीटर ;Ω बउद्ध भी उपयोग में लिया जाता है। चूँकि प्न्च्।ब् ने विश्िाष्ट प्रतिरोध के स्थान पर प्रतिरोधकता पद की अनुशंसा की है, अतः पुस्तक के आगे के पृष्ठों में हम प्रतिरोधकता पद का ही उपयोग करेंगे। भौतिक रूप में किसी पदाथर् की प्रतिरोधकता उसका वह प्रतिरोध है जब यह एक मीटर लंबा हो एवं इसका अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रापफल 1 उ2 हो। यह देखा जा सकता है कि - 1 Ω उ त्र 100 Ω बउ या 1 Ω बउ त्र 0ण्01 Ω उ प्रतिरोध त् का व्युत्क्रम, चालकत्व ;बवदकनबजंदबमद्धए ळ कहलाता है एवं हम निम्न संबंध प्राप्त करते हैं - 1 ।। ळ त्र त्र त्रκ ;3ण्18द्धत् ρस स चालकत्व का ैप् मात्राक सीमेन्श है जिसे प्रतीक श्ैश् से निरूपित किया जाता है एवं यह वीउ.1 ;या उीवद्ध या Ωदृ1 के तुल्य है। प्रतिरोधकता का प्रतिलोम, चालकता ;विश्िाष्ट चालकत्वद्ध कहलाता है जिसे प्रतीक κ ;ग्रीक शब्द काॅपाद्ध से प्रद£शत करते हैं। प्न्च्।ब् ने विश्िाष्ट चालकत्व के स्थान पर चालकता शब्द की अनुशंसा की है, अतः आगे पुस्तक में हम चालकता शब्द का ही उपयोग करेंगे। चालकता के ैप् मात्राक ै उदृ1 है परंतु प्रायः κए को ै बउदृ1 में व्यक्त किया जाता है। किसी पदाथर् की ै उदृ1 में चालकता इसका वह चालकत्व है, जब यह 1उ लंबा हो एवं इसका अनुप्रस्थ काट क्षेत्रापफल 1उ2 हो। यह ध्यान रहे कि 1 ै बउदृ1 त्र 100 ै उदृ1। सारणी 3.2 से यह देखा जा सकता है कि चालकता के मान में कापफी भ्िान्नता होती है एवं यह पदाथर् की प्रकृति पर निभर्र करती है। यह उस ताप व दाब पर भी निभर्र करती है जिस पर इसका मापन किया जाता है। चालकता के आधार पर पदाथो± को चालकों, विद्युतरोिायों एवं अधर्चालकों में वगीर्कृत किया गया है। धातुओं एवं मिश्रधातुओं की चालकता बहुत अिाक होने के कारण इन्हें चालक कहा जाता है। वुफछ अधातुएं जैसे काबर्न - ब्लैक सारणी 3ण्2 - वुफछ चयनित पदाथो± के 298ण्15 ज्ञ पर चालकता के मान ;काबर्न - कज्जलद्ध, ग्रैपफाइट एवं वुफछ काबर्निक बहुलक ’ भी इलेक्ट्राॅनिक चालक होते हैं। काँच, चीनी मिट्टी ;सिरेमिक्सद्ध आदि जैसे पदाथर् जिनकी चालकता बहुत कम होती है, विद्युतरोधी कहलाते हैं। वुफछ पदाथर् जैसे सिलिकन, डोपित सिलिकन, गैलियम आसेर्नाइड जिनकी चालकता, चालकों एवं विद्युतरोिायों के मध्य होती है, अधर्चालक कहलाते हैं एवं ये महत्वपूणर् इलेक्ट्राॅनिक पदाथर् हैं। वुफछ पदाथर्, जिन्हें पारिभाष्िाक रूप से अतिचालक कहते हैं, शून्य प्रतिरोधकता या अनंत चालकता वाले होते हैं। पहले समझा जाता था कि केवल धातुएं एवं मिश्रधातुएं ही बहुत कम तापों ;0 जव 15 ज्ञद्ध पर अतिचालक होती हैं, परंतु आजकल बहुत से सिरेमिक पदाथर् एवं मिश्रित आॅक्साइड भी ज्ञात हैं जो 150 ज्ञ जैसे उच्च तापों पर भी अतिचालकता दशार्ते हैं। धातुओं में विद्युतीय चालकत्व को धत्िवक या इलैक्ट्राॅनिक चालकत्व कहते हैं तथा यह इलेक्ट्राॅनों की गति के कारण होता है इलेक्ट्राॅनिक चालकत्व निम्न पर निभर्र करता है - ;पद्ध धातु की प्रकृति एवं संरचना ;पपद्ध प्रति परमाणु संयोजी इलेक्ट्राॅनों की संख्या ;पपपद्ध ताप ;यह ताप बढ़ाने पर कम होता हैद्ध इलेक्ट्राॅन एक सिरे से प्रवेश करते हैं एवं दूसरे सिरे से निकल जाते हैं, इसलिए धात्िवक चालक का संघटन अपरिवतिर्त रहता है। अधर्चालकों के चालकत्व की ियावििा अिाक जटिल है। ’ इलेक्ट्रोनिक चालक बहुलक - 1977 में मैक - डिरमिड, हीगर तथा शीराकावा ने खोज की कि ऐसिटिलीन गैस के बहुलकीकरण से पाॅलीऐसिटिलीन बहुलक प्राप्त किया जा सकता है जो आयोडिन वाष्प के संपकर् में आने पर धत्िवक चमक एवं चालकता प्राप्त कर लेता है। उसके बाद बहुत से काबर्नीय बहुलक - चालक बनाए गए हैं, जैसे पाॅलीऐनिलीन, पाॅलीपिरोल तथा पाॅलीथायोपफीन। यह धत्िवक गुणों वाले काबर्नीय बहुलक पूणर्तः काबर्न, हाइड्रोजन तथा कभी - कभी नाइट्रोजन, आॅक्सीजन एवं सल्पफर द्वारा बने होने के कारण सामान्य धतुओं की तुलना में अत्यध्िक हल्के होते हैं इसलिए, इनसे हल्की बैटरियाँ बनाइर् जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त इनमें लचीलेपन जैसे यांत्रिाक गुण भी होते हैं, अतः इनसे ट्रांजिस्टर जैसी इलेक्ट्राॅनिक युक्ितयाँ तथा मुड़ सकने वाली प्लास्िटक शीट बना सकते हैं। चालक बहुलकों की खोज के लिए मैक - डिरमिड, हीगर तथा शीराकावा को वषर् 2000 के रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था। 3.4.1 आयनिक विलयनों की चालकता का मापन संबंधक तार प्लैटिनीवृफत च्ज इलैक्ट्रोड संबंधक तार प्लैटिनीवृफत च्ज इलैक्ट्रोड चित्रा 3.4 - दो अलग - अलग प्रकार के चालकता सेल हम पहले से ही जानते हैं ;कक्षा ग्प्ए एकक 7द्ध कि अत्यिाक शु( जल में भी थोड़ी मात्रा में हाइड्रोजन एवं हाइड्राॅक्िसल आयन ;्10दृ7डद्ध होते हैं जो कि इसे बहुत अल्प चालकता ;3ण्5 × 10दृ5 ै उदृ1द्ध प्रदान करते हैं। वैद्युतअपघट्य जल में घोले जाने पर अपने आयन विलयन को प्रदान करते हैं जिससे विलयन की चालकता बढ़ जाती है। विलयन में उपस्िथत आयनों के कारण विद्युत के चालकत्व को वैद्युतअपघटनी या आयनिक चालकत्व कहते हैं। वैद्युतअपघटनी ;आयनिकद्ध विलयनों की चालकता निम्नलिख्िात पर निभर्र करती है - ;पद्ध मिलाए गए वैद्युतअपघट्य की प्रकृति ;पपद्ध उत्पन्न आयनों का आमाप एवं उनका विलायक योजन ;पपपद्ध विलायक की प्रकृति एवं इसकी श्यानता ;पअद्ध वैद्युतअपघट्य की सांद्रता ;अद्ध ताप ;ताप बढ़ाने पर यह बढ़ती हैद्ध लंबे समय तक आयनिक विलयन में दिष्ट धारा ;क्ब्द्ध प्रवाहित करने पर वैद्युतरासायनिक अभ्िाियाओं के कारण इसका संघटन परिव£तत हो सकता है ;खंड 3ण्4ण्1द्ध। हम जानते हैं कि एक ह्नीटस्टोन बि्रज ;सेतुद्ध के द्वारा किसी अज्ञात प्रतिरोध का सही मापन किया जा सकता है। किंतु किसी आयनिक विलयन के प्रतिरोध मापन में हमें दो समस्यायों का सामना करना पड़ता है। प्रथम यह कि दिष्ट धारा ;क्ब्द्ध प्रवाहित करने पर विलयन का संघटन बदल जाता है। दूसरा यह कि विलयन को धत्िवक तार या अन्य ठोस चालक की तरह बि्रज से जोड़ा नहीं जा सकता। पहली समस्या का समाधन प्रत्यावतीर् धारा ;।ब्द्ध का प्रयोग करके हल किया जाता है। दूसरी समस्या एक विशेष प्रकार के डिशाइन किए हुए पात्रा का उपयोग करके हल की जाती है। इस पात्रा को चालकता सेल कहते हैं। चालकता सेल कइर् डिशाइनों में उपलब्ध हैं एवं दो सरल डिशाइन चित्रा 3.4 में दशार्ए गए हैं। मूलतः इसमें प्लैटिनम ब्लैक ;प्लैटिनम कज्जलद्ध से विलेपित ;सूक्ष्म विभाजित धात्िवक च्ज को वैद्युतरासायनिक वििा द्वारा इलैक्ट्रोडों पर निक्षेपित किया जाता हैद्ध दो इलैक्ट्रोड होते हैं। इनके अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रापफल श्।श् होता है और ये श्स श् दूरी से पृथक होते हैं। इस प्रकार इनके बीच का विलयन श्सश् लंबाइर् एवं श्।श् अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रापफल का काॅलम होता है। विलयन के इस काॅलम का प्रतिरोध निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा दिया जाता है - सस त् त्र ρ त्र ;3ण्17द्ध। κ । राश्िा सध्। को सेल स्िथरांक कहा जाता है जिसे प्रतीक ळ’ से व्यक्त किया जाता है। यह इलैक्ट्रोड के बीच की दूरी एवं उनके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रापफल पर निभर्र करता है एवं इसकी विमा लंबाइर्दृ1 होती है। इसे स तथा । का मान ज्ञात होने पर परिकलित किया जा सकता है। स एवं । का मापन न सिपर्फ असुविधाजनक हैऋ बल्िक प्राप्त मान अविश्वसनीय भी होता है। सेल स्िथरांक को साधारणतया पहले से ज्ञात चालकता वाले विलयन को चालकता सेल में लेकर व उसका प्रतिरोध माप कर ज्ञात किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए हम सामान्यतः ज्ञब्स विलयन का उपयोग करते हैं जिसकी चालकता विभ्िान्न सांद्रताओं एवं ताप पर परिशु(ता से ज्ञात होती है ;सारणी 3.3द्ध। सेल स्िथरांक ळ’ को तब निम्नलिख्िात समीकरण से दशार्या जा सकता है। 75 वैद्युतरसायन स ळ’ त्र त्र त् κ ;3ण्18द्ध। एक बार सेल स्िथरांक का मान ज्ञात हो जाने पर हम इसका उपयोग किसी भी विलयन का प्रतिरोध या चालकता मापने में कर सकते हैं। प्रतिरोध मापन की व्यवस्था चित्रा 3.5 में दशार्इर् गइर् है। इसमें दो प्रतिरोध त्3 एवं त्4, एक परिवतर्नीय प्रतिरोध त्1 एवं अज्ञात प्रतिरोध त्2 वाली चालकता सेल होती है। ह्नीटस्टोन बि्रज एक दोलित्रा, व् ;वेबपससंजवतद्धए ;श्रव्य आवृिा सीमा 550 से 5000 चक्रण प्रति सैकण्ड वाली प्रत्यावतीर् धारा ;।ब्द्ध का स्रोतद्ध से जुड़ा रहता है। च् एक उपयुक्त संसूचक है ;एक हेडपफोन या अन्य विद्युत युक्ितद्ध तथा जब संसूचक में कोइर् विद्युत धारा प्रवाहित नहीं होती तो बि्रज संतुलित होता है। इन परिस्िथतियों में - चित्रा 3.5 - वैद्युतअपघट्य के विलयन के प्रतिरोध अज्ञात प्रतिरोध, त्2 त्र 1त् 4त् ;3ण्19द्ध मापन की व्यवस्था 3त् सारणी 3ण्3 - 298ण्15 ज्ञ पर ज्ञब्स की चालकता एवं मोलर चालकता आजकल सस्ते चालकता मीटर उपलब्ध हैं जिनसे चालकता सेल में उपस्िथत विलयन का चालकत्व या प्रतिरोध सीधे ही पढ़ा जा सकता है। एक बार सेल में उपस्िथत विलयन का सेल स्िथरांक एवं प्रतिरोध ज्ञात होने पर विलयन की चालकता निम्नलिख्िात समीकरण से दी जा सकती है - सले स्िथराकंळ’ κत्र त्र ;3ण्20द्धत्त् एक ही विलायक में और समान ताप पर, विभ्िान्न वैद्युतअपघट्यों के विलयनों की चालकता में अंतर विघटन के पफलस्वरूप बनने वाले आयनों के आवेश एवं आमाप तथा उनकी सांद्रता या विभव प्रवणता ;च्वजमदजपंस हतंकपमदजद्ध के अंतगर्त आयन के संचलन की सुविधा में भ्िान्नता के कारण होता है। अतः भौतिक रूप से एक अिाक अथर्पूणर् राश्िा को परिभाष्िात करना आवश्यक है, जिसे मोलर चालकता ;ग्राम अणुक चालकताद्ध कहा जाता है। इसे Λउ ;ग्रीक शब्द लैम्डाद्ध से निरूपित करते हैं। यह विलयन की चालकता से निम्नलिख्िात समीकरण के द्वारा संब( है - κ मोलर चालकता त्र Λउ त्र ;3ण्21द्ध ब उपरोक्त समीकरण में यदि κ को ै उदृ1 में एवं सांद्रता, ब, को उवस उदृ3 में व्यक्त किया जाए तो Λउ का मात्राक ै उ2 उवसदृ1 होगा। यह ध्यान देने योग्य है कि 1 उवस उदृ3 त्र 1000;स्ध्उ3द्ध × मोलरता ;उवसध्स्द्ध अतः κ ;ै उ −1द्धΛउ;ै उ2 उवस दृ1द्ध त्र −3 −11000;स्उ द्ध× माले रता ;उवसस् द्ध यदि हम κ का मात्राक ै बउदृ1 एवं सांद्रता का मात्राक उवस बउदृ3 लें तब ध्उ का मात्राक ै बउ2 उवसदृ1 होगा। इसे निम्नलिख्िात समीकरण का उपयोग कर परिकलित किया जा सकता है - −13 2 −1 κ ;ैबउ द्ध×1000 ;बउ ध्स्द्ध Λ उ ;ैबउ उवस द्ध त्र माले रता ;उवसध्स्द्ध सामान्यतः दोनों प्रकार के मात्राक प्रयुक्त किए जाते हैं। जो परस्पर निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा संब( हैं - 1 ै उ2 उवसदृ1 त्र 104 ै बउ2 उवस दृ1 या 1 ै बउ2 उवसदृ1 त्र10दृ4 ै उ2 उवस दृ1ण् 3.4.2 सांद्रता के साथ वैद्युतअपघट्य की सांद्रता में परिवतर्न के साथ - साथ चालकता एवं मोलर चालकता दोनों में परिवतर्न होता है। दुबर्ल एवं प्रबल दोनों प्रकार के वैद्युतअपघट्यों की सांद्रता घटाने परचालकता एवं चालकता हमेशा घटती है। इसकी इस तथ्य से व्याख्या की जा सकती है कि तनुकरण करनेमोलर चालकता मंे पर प्रति इकाइर् आयतन में विद्युतधारा ले जाने वाले आयनों की संख्या घट जाती है। किसीपरिवतर्न रसायन विज्ञान 78 चित्रा 3.6 - जलीय विलयन में ऐसीटिक अम्ल ;दुबर्ल वैद्युतअपघट्यद्ध एवं पोटैश्िायम क्लोराइड ;प्रबल वैद्युतअपघट्यद्ध के लिए मोलर चालकता के विपरीत ब) का आलेख भी सांद्रता पर विलयन की चालकता उस विलयन के इकाइर् आयतन का चालकत्व होता है, जिसे परस्पर इकाइर् दूरी पर स्िथत एवं इकाइर् अनुप्रस्थ काट क्षेत्रापफल वाले दो प्लेटिनम इलेक्ट्रोडों के मध्य रखा गया हो। यह निम्नलिख्िात समीकरण से स्पष्ट है - ळ त्र κ । त्र κ ;। एवं स दोनों ही उपयुक्त इकाइयों उ या बउ में हैंद्ध।स किसी दी गइर् सांद्रता पर एक विलयन की मोलर चालकता उस विलयन के ट आयतन का चालकत्व है, जिसमें वैद्युतअपघट्य का एक मोल घुला हो तथा जो एक - दूसरे से इकाइर् दूरी पर स्िथत, । अनुप्रस्थ काट क्षेत्रापफल वाले दो इलेक्ट्रोडों के मध्य रखा गया हो। अतः κ।Λ उ त्रत्रκ स चूँकि स त्र 1 एवं । त्र ट ;आयतन, जिसमें वैद्युतअपघट्य का एक मोल घुला है।द्ध Λ उ त्र κ ट ;3ण्22द्ध सांद्रता घटने के साथ मोलर चालकता बढ़ती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह वुफल आयतन ;टद्ध भी बढ़ जाता है जिसमें एक मोल वैद्युतअपघट्य उपस्िथत हो। यह पाया गया है कि विलयन के तनुकरण पर आयतन में वृि κ में होने वाली कमी की तुलना में कहीं अिाक होती है। भौतिक रूप से इसका अथर् यह है कि दी हुइर् सांद्रता पर, Λउ को इस प्रकार परिभाष्िात किया जा सकता है कि यह वैद्युतअपघट्य के उस विलयन के उस आयतन का चालकत्व है जिसे चालकता सेल के परस्पर इकाइर् दूरी पर स्िथत इलैक्ट्रोडों के मध्य रखा गया है एवं जिनका अनुप्रस्थ काट क्षेत्रापफल इतना बड़ा है कि वह विलयन के उस पयार्प्त आयतन को समायोजित कर सवेंफ जिसमें वैद्युतअपघट्य का एक मोल घुला हो। जब सांद्रता शून्य की ओर पहुँचने लगती है तब मोलर चालकता सीमांत मोलर चालकता कहलाती है एवं इसे प्रतीक म्उ टसे निरूपित किया जाता है। सांद्रता के साथ Λउ में परिवतर्न प्रबल एवं दुबर्ल वैद्युतअपघट्यों में अलग - अलग होता है ;चित्रा 3.6द्ध। प्रबल वैद्युतअपघट्य प्रबल वैद्युतअपघट्यों के लिए, Λ उ का मान तनुता के साथ धीरे - धीरे बढ़ता है एवं इसे निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा निरूपित किया जा सकता है - Λ उ त्र ध् उ ° दृ । ब ) ;3ण्23द्ध यह देखा जा सकता है कि यदि Λउ को ब1ध्2 के विपरीत आरेख्िात किया जाए ;चित्रा 3.6द्ध तो हमें, एक सीधी रेखा प्राप्त होती है जिसका अंतः खंड ध्उ ° एवं ढाल .श्।श् के बराबर है। दिए गए विलायक एवं ताप पर स्िथरांक श्।श् का मान वैद्युतअपघट्य के प्रकार, अथार्त् विलयन में वैद्युतअपघट्य के वियोजन से उत्पन्न ध्नायन एवं )णायन के आवेशों पर निभर्र करता है। अतः, छंब्सए ब्ंब्स2ए डहैव्4 क्रमशः 1.1ए 2.1 एवं 2.2 वैद्युतअपघट्य के रूप में जाने जाते हैं। एक प्रकार के सभी वैद्युतअपघट्यों के लिए ष्।ष् का मान समान होता है। उदाहरण 3ण्6 298 ज्ञ पर विभ्िान्न सांद्रताओं के ज्ञब्स विलयनों की मोलर चालकताएं निम्नलिख्िात हैं। बध्उवस स्दृ1 Λ उध्ै बउ2 उवसदृ1 0ण्000198 148ण्61 0ण्000309 148ण्29 0ण्000521 147ण्81 0ण्000989 147ण्09 दशार्इए कि ध्उ एवं ब1ध्2 के मध्य आलेख एक सीधी रेखा है। ज्ञब्स के लिए ध्उ° एवं । के मान ज्ञात कीजिए। हल दी गइर् सांद्रताओं का वगर्मूल लेने पर हम पाते हैं 1ध्2 द्ध1ध्2बध् ;उवस स्दृ1Λ उध्ै बउ2उवसदृ1 0ण्01407 148ण्61 0ण्01758 148ण्29 0ण्02283 147ण्81 0ण्03145 147ण्09 Λउ ;ल.अक्षद्धएवं ब1ध्2 ;ग.अक्षद्ध का आलेख चित्रा 3.7 में दशार्या गया है। यह देखा जा सकता है कि यह लगभग एक सीधी रेखा है। अंतःखंड ;ब त्र 0द्ध से हम पाते हैं कि ध् ° त्र 150ण्0 ै बउ21ध्2उ उवसदृ1 एवं द्ध1ध्2। त्र दृ ढाल त्र 87ण्46 ै बउ2 उवसदृ1ध्;उवसध्स्दृ1ण् चित्रा 3.7 - ब) के विरु( ध्उ में परिवतर्न °कोलराउश ;ज्ञवीसतंनेीद्ध ने कइर् प्रबल वैद्युतअपघट्यों के लिए ध्उ के मान के परीक्षण किए एवं वुफछ नियमितताओं का अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि वैद्युतअपघट्यों °छंग् एवं ज्ञग् के ध्उ के मानों का अंतर किसी भी श्ग्श् के लिए लगभग स्िथर रहता है। उदाहरण के लिए 298 ज्ञ पर - °° °°ध् दृ ध् त्र ध् दृ ध् उ ;ज्ञब्सद्ध उ ;छंब्सद्ध उ ;ज्ञठतद्ध उ ;छंठतद्ध °° त्र ध् दृ ध् 23ण्4 ै बउ2 उवसदृ1 उ ;ज्ञप्द्ध उ ;छंप्द्ध तथा इसी प्रकार पाया गया कि - ° ° °°ध् दृ ध् त्र ध् दृ ध् 1ण्8 ै बउ2 उवसदृ1 उ ;छंठतद्ध उ ;छंब्सद्ध उ ;ज्ञठतद्ध उ ;ज्ञब्सद्ध उपरोक्त प्रेक्षणों के आधार पर उन्होंने आयनों के स्वतंत्रा अभ्िागमन का कोलराउश नियम दिया। कोलराउश के इस नियम के अनुसार एक वैद्युतअपघट्य की सीमांत मोलर चालकता को उसके धनायन एवं )णायन के अलग - अलग योगदान के योग दृके बराबर निरूपित किया जा सकता है। इस प्रकार, यदि λ°छं़ एवं λ°ब्स क्रमशः सोडियम एवं क्लोराइड आयनों की सीमांत मोलर चालकताएं हों तो सोडियम क्लोराइड की सीमांत मोलर चालकता निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा दी जा सकती है - °ध् त्र λ0छं़ ़ λ0 दृ ;3ण्24द्धउ ;छंब्सद्धब्स व्यापक रूप में यदि एक वैद्युतअपघट्य वियोजन पर ν़ ध्नायन एवं νदृ )णायन देता है तब इसकी सीमान्त मोलर चालकता को निम्नलिख्िात समीकरण द्वारा दिया जा सकता है - ध् ° त्र νλ0़ νλ0 ;3ण्25द्धउ ़़ दृदृ यहाँ λ0 ़ एवं λ0− क्रमशः ध्नायन एवं )णायन की सीमान्त मोलर चालकताएं हैं। 298 ज्ञ पर वुफछ ध्नायनों एवं )णायनों के λ0 के मान सारणी 3.4 में दिए गए हैं। सारणी 3ण्4 - 298 ज्ञ पर वुफछ आयनों की जल में सीमान्त मोलर चालकताएं दुबर्ल वैद्युतअपघट्य ऐसीटिक अम्ल जैसे दुबर्ल वैद्युतअपघट्य उच्च सांद्रता पर अल्प वियोजित होते हैं, अतः ऐसे वैद्युतअपघट्यों के Λउ में तनुता के साथ परिवतर्न, वियोजन मात्रा में वृि के कारण होता है परिणामस्वरूप एक मोल वैद्युतअपघट्य वाले विलयन के वुफल आयतन में आयनों की संख्या बढ़ती है। इन प्रकरणों में, विशेषतया अल्प सांद्रता के समीप तनुकरण पर ध्उ तेशी से बढ़ता है ;चित्रा 3.6द्ध। अतः ध्उ ° का मान Λउ के शून्य सांद्रता तक बहिवर्ेशन ;मगजतंचवसंजपवदद्ध द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। अनंत तनुता पर ;अथार्त् सांद्रता ब → 0द्ध वैद्युतअपघट्य पूणर्तया वियोजित हो जाता है ;α त्र1द्ध परंतु इतनी कम सांद्रता पर विलयन की चालकता इतनी कम हो जाती है कि इसके वास्तविक मान को नहीं मापा जा सकता। अतः दुबर्ल °वैद्युतअपघट्यों के लिए ध्उ कोलराउश का आयनों के लिए स्वतंत्रा अभ्िागमन नियम का उपयोग कर प्राप्त किया जा सकता है ;उदाहरण 3.8द्ध। किसी भी सांद्रता ब पर यदि वियोजन की मात्रा α हो तो इसे सांद्रता ब पर मोलर चालकता ध्उ एवं सीमांत मोलर चालकता °ध्उ के अनुपात के सन्िनकट माना जा सकता है। इस प्रकार - Λ उαत्र ° ;3ण्26द्धΛ उ परंतु हम जानते हैं कि ऐसीटिक अम्ल जैसे दुबर्ल वैद्युतअपघट्य के लिए ;कक्षा ग्प् एकक 7द्ध - 22 2 बα बΛ बΛ ज्ञ त्रत्र उ त्र उ ं ;1 −α द्ध ο2 ⎛ Λ ⎞ Λο;Λο−Λ द्धउ उउउ ;3ण्27द्धΛ 1 − उ ⎜ ο ⎟⎝ Λ उ ⎠ कोलराउश नियम के अनुप्रयोग आयनों के स्वतंत्रा अभ्िागमन के कोलराउश नियम का उपयोग कर, किसी भी वैद्युतअपघट्य °के आयनों के λव मानों से ध्उ का परिकलन करना संभव है। इसके अतिरिक्त यदि हमे दी °गइर् सांद्रता ब पर ध्उ एवं ध्उ के मान ज्ञात हों तो ऐसीटिक अम्ल जैसे दुबर्ल वैद्युतअपघट्यों के लिए इसका वियोजन स्िथरांक ज्ञात करना भी संभव है। उदाहरण 3ण्7 हल उदाहरण 3ण्8 हल सारणी 3.4 में दिए गए आँकड़ों की सहायता से ब्ंब्स2 एवं डहैव्4 के ध्उ ° का परिकलन कीजिए। कोलराउश नियम से हम जानते हैं कि - ; द्ध 2 2 ़ दृब्ंब्स ब्ं ब्स 2ο ο οत्र λ ़ λΛ उ त्र 119ण्0 ै बउ2 उवस दृ1 ़ 2;76ण्3द्ध ै बउ2 उवसदृ1 त्र ;119ण्0 ़ 152ण्6द्ध ै बउ2 उवसदृ1 त्र 271ण्6 ै बउ2 उवसदृ1 ; द्ध 22 4 4 दृ ़डहैव् डह ैव् ο ο οत्र λ ़ λΛ उ त्र 106ण्0 ै बउ2 उवसदृ1 ़ 160ण्0 ै बउ2 उवसदृ1 त्र 266ण्0 ै बउ2 उवसदृ1 छंब्सए भ्ब्स एवं छं।ब के लिए ध्उ ° क्रमशः 126.4, 425.9 एवं 91ण्0 ै बउ2 उवसदृ1 हैं। भ्।ब के लिए Λव का परिकलन कीजिए। ; द्ध ़ दृ भ्।ब भ् ।ब ο ο οत्र λ ़ λΛ उ ़ दृ दृ ़ दृ ़भ् ब्स ।ब छं ब्स छं ο ο ο ο ο οत्र λ ़ λ ़ λ ़ λ − λ − λ ; द्ध ; द्ध ; द्धभ्ब्स छं।ब छंब्स ο ο οत्र ़ − उ उ उ Λ Λ Λ त्र ;425ण्9 ़ 91ण्0 दृ 126ण्4 द्ध ै बउ2 उवस दृ1 त्र 390ण्5 ै बउ2 उवसदृ1 ण् 3.5 वैद्युतअपघटनी सेल एवं वैद्युतअपघटन वैद्युतअपघटनी सेल में रासायनिक अभ्िािया करने के लिए विभव का बाह्य स्रोत प्रयुक्त किया जाता है। वैद्युतरासायनिक प्रक्रम प्रयोगशालाओं एवं रासायनिक उद्योगों में बहुत महत्वपूणर् होते हैं। सरलतम वैद्युतअपघटनी सेलों में से एक में काॅपर सल्पेफट के जलीय विलयन में दो काॅपर इलैक्ट्रोड निमज्िजत होते हैं। यदि दोनों इलैक्ट्रोडों पर क्ब् विभव लगाया जाए, तो ब्न2़ आयन वैफथोड ;)ण आवेश्िातद्ध पर विसजिर्त होते हैं एवं निम्नलिख्िात अभ्िािया घटित होती है - ब्न2़;ंुद्ध ़ 2मदृ → ब्न ;ेद्ध ;3ण्28द्ध काॅपर धातु वैफथोड पर निक्षेपित होती है। ऐनोड पर काॅपर ब्न2़ आयनों में, निम्नलिख्िात अभ्िािया द्वारा परिव£तत होता है - ब्न;ेद्ध → ब्न2़;ेद्ध ़ 2मदृ ;3ण्29द्ध इस प्रकार काॅपर ;ताँबाद्ध ऐनोड से विलीन ;आॅक्सीकृतद्ध होता है एवं वैफथोड पर निक्षेपित ;अपचितद्ध होता है। यह उस औद्योगिक प्रक्रम का आधार है जिसमें अशु( काॅपर को उच्च शु(ता के काॅपर में बदला जाता है। अशु( काॅपर को ऐनोड बनाया जाता है जो कि 83 वैद्युतरसायन धारा प्रवाहित करने पर विलीन होता है एवं शु( काॅपर वैफथोड पर निक्षेपित होता है। बहुत - सी धातुएं जैसे छंए डहए ।स आदि जिनके लिए उपयुक्त रासायनिक अपचायक उपलब्ध नहीं होता, वृहद स्तर पर संगत धनायनों के वैद्युतरासायनिक अपचयन द्वारा उत्पादित की जाती हैं। सोडियम एवं मैग्नीश्िायम धतुओं को उनके संगलित क्लोराइडों के वैद्युतअपघटन द्वारा उत्पादित किया जाता है एवं एलुमिनियम को क्रायोलाइट की उपस्िथति में ऐलुमिनियम आॅक्साइड के वैद्युतअपघटन द्वारा उत्पादित किया जाता है ;कक्षा ग्प्प्ए एकक 6द्ध वैद्युतअपघटन के मात्रात्मक पक्ष माइकल पैफराडे प्रथम वैज्ञानिक थे जिन्होंने वैद्युतअपघटन के मात्रात्मक पक्षों का वणर्न किया। इन्हें अब उपरोक्त चचार् के आधार पर भी समझा जा सकता है। पैफराडे के वैद्युतअपघटन के नियम - विलयनों एवं वैद्युतअपघट्यों के गलितों के वैद्युतअपघटन पर विस्तीणर् अन्वेषणों के पश्चात् पैफराडे ने 1833 - 34 में अपने परिणामों को निम्नलिख्िात, सवर्ज्ञात पैफराडे के वैद्युतअपघटन के दो नियमों के रूप में प्रकाश्िात किया। ;पद्ध प्रथम नियम - विद्युत धारा द्वारा वैद्युतअपघटन में रासायनिक विघटन की मात्रा वैद्युतअपघट्य ;विलयन या गलितद्ध में प्रवाहित विद्युत धारा की मात्रा के समानुपाती होती है। ;पपद्धद्वितीय नियम - विभ्िान्न वैद्युतअपघटनी विलयनों में विद्युत की समान मात्रा प्रवाहित करने पर मुक्त विभ्िान्न पदाथो± की मात्राएं उनके रासायनिक तुल्यांकी द्रव्यमान ;धातु का परमाण्िवक द्रव्यमान झ् ध्नायन को अपचयित करने में प्रयुक्त इलेक्ट्राॅनों की संख्याद्ध के समानुपाती होती है। पैफराडे के समय में स्िथर वैद्युत धारा के स्रोत उपलब्ध नहीं थे। एक सामान्य प्रचलित प(ति यह थी कि एक वूफलाॅममापी ;एक मानक वैद्युतअपघटती सेलद्ध का प्रयोग कर निक्षेपित या उपमुक्त धातु ;सामान्यतः सिल्वर या काॅपरद्ध की मात्रा से विद्युत की मात्रा पता लगाइर् जाती थी परंतु वूफलाॅममापी आजकल अप्रचलित हो गये हैं तथा हमारे पास अब स्िथर धारा ;प्द्ध के स्रोत उपलब्ध हैं, एवं प्रवाहित विद्युत् की मात्रा की गणना निम्नलिख्िात संबंध से की जा सकती है - फ त्र प्ज जहाँ फ वूफलाॅम में है, जबकि प् ऐम्िपयर में एवं ज सेकंड में है। आॅक्सीकरण या अपचयन के लिए आवश्यक विद्युत ;या आवेशद्ध की मात्रा इलैक्ट्रोड अभ्िािया की स्टाॅइकियोमीट्री पर निभर्र करती है। उदाहरणाथर् निम्न अभ्िािया में - ।ह ़;ंुद्ध ़ मदृ → ।ह;ेद्ध ;3ण्30द्ध सिल्वर आयनों के एक मोल के अपचयन के लिए एक मोल इलेक्ट्राॅनों की आवश्यकता होती है। हम जानते हैं कि एक इलेक्ट्राॅन पर आवेश 1ण्6021× 10दृ19ब् के बराबर होता है। अतः एक मोल इलेक्ट्राॅनों पर आवेश होगा - छ। × 1ण्6021 × 10दृ19 ब् त्र 6ण्02 × 1023 उवसदृ1 × 1ण्6021 × 10दृ19 ब् त्र 96487 ब् उवसदृ1 3.5.1 वैद्युतअपघटन के उत्पाद विद्युत की इस मात्रा को पैफराडे कहते हैं एवं इसे प्रतीक थ् से निरूपित करते हैं। सन्िनकट गणना के लिए हम 1थ् को 96500ब्उवसदृ1 के बराबर लेते हैं। निम्नलिख्िात इलैक्ट्रोड अभ्िाियाओं - डह2़;सद्ध ़ 2मदृ ⎯→ डह;ेद्ध ;3ण्31द्ध ।स3़;सद्ध ़ 3मदृ ⎯→ ।स;ेद्ध ;3ण्32द्ध के लिए यह स्पष्ट है कि एक मोल डह2़ एवं ।स3़ के लिए हमें क्रमशः 2 मोल इलेक्ट्राॅन ;2थ्द्ध व 3 मोल इलेक्ट्राॅन ;3थ्द्ध की आवश्यकता होगी। वैद्युतअपघटनी सेल में प्रवाहित आवेश विद्युत धारा ;ऐम्िपयरद्ध एवं समय ;सेकंडद्ध के गुणनपफल के बराबर होता है। धातुओं के व्यावसायिक उत्पादन में लगभग 50,000 ऐम्िपयर तक की उच्च धारा प्रयोग में लाइर् जाती है जो लगभग 0ण्518थ् प्रति सेकंड के बराबर होती है। वैद्युतअपघटन के उत्पाद अपघटित होने वाले पदाथो± की अवस्था तथा प्रयुक्त इलैक्ट्रोडों के प्रकार पर निभर्र करते हैं। यदि इलैक्ट्रोड अिय हो ;उदाहरण के लिए च्ज अथवा ।नद्ध तो यह अभ्िािया में हिस्सा नहीं लेता एवं यह केवल इलेक्ट्राॅनों के स्रोत अथवा सिंक का कायर् करता है। दूसरी ओर यदि इलैक्ट्रोड अभ्िाियाशील हो तो यह इलैक्ट्रोड अभ्िािया में हिस्सा लेता है। इस प्रकार अभ्िाियाशील एवं अिय इलैक्ट्रोडों के लिए वैद्युतअपघटन के उत्पाद अलग - अलग हो सकते हैं। वैद्युतअपघटन के उत्पाद वैद्युतअपघटनी सेल में उपस्िथत विभ्िान्न आॅक्सीकारक एवं अपचायक स्पीशीश एवं उनके मानक इलैक्ट्रोड विभवों पर निभर्र करते हैं। इसके अतिरिक्त वुफछ वैद्युत रासायनिक प्रक्रम यद्यपि संभव होते हैं, परंतु गतिकीय रूप में इतने धीमे होते हैं कि ये निम्न विभव पर घटित होते प्रतीत नहीं होते एवं ऐसी परिस्िथति में अतिरिक्त विभव ;जिसे अिाविभव कहते हैंद्ध लगाना पड़ता हैऋ जो कि इन प्रक्रमों को और कठिन बना देता है। उदाहरणाथर् यदि हम गलित छंब्स का प्रयोग करें तो वैद्युतअपघटन के उत्पाद सोडियम धातु एवं क्लोरीन गैस होंगे। यहाँ हमारे पास केवल एक ध्नायन ;छं़द्ध है जो वैफथोड पर दृदृअपचित ;छं़ ़ म → छंद्ध होता है एवं एक )णायन ;ब्स द्ध है जो ऐनोड पर आॅक्सीकृत दृ ;ब्स दृ→ )ब्स2़म द्ध होता है। सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन के वैद्युतअपघटन के दृदौरान छंव्भ्ए ब्स2 एवं भ्2 उत्पाद बनते हैं। इसमें छं़ एवं ब्स के अतिरिक्त भ़् एवं दृव्भ् आयन एवं विलायक अणु भ्2व् भी उपस्िथत होते हैं। वैफथोड पर निम्नलिख्िात अभ्िाियाओं के मध्य अपचयन के लिए स्पधार् होती है - ट छं़ ;ंुद्ध ़ मदृ → छं ;ेद्ध म्;सले द्ध त्र दृ 2ण्71 ट 1 ट भ़् ;ंुद्ध ़ मदृ → भ्2 ;हद्ध म्;सले द्ध त्र 0ण्00 ट2कैथोड पर अिाक म् ट मान वाली अभ्िािया को वरीयता प्राप्त होती है, अतः वैफथोड पर निम्नलिख्िात अभ्िािया होती है - 1 भ़् ;ंुद्ध ़ मदृ → भ्2 ;हद्ध ;3ण्33द्ध2परंतु भ्2व् के वियोजन द्वारा भ़्;ंुद्ध उत्पन्न होता है, यानि कि - दृभ्2व् ;स द्ध → भ़् ;ंुद्ध ़ व्भ् ;ंुद्ध ;3ण्34द्ध अतः वैफथोड पर नेट अभ्िािया ;3.33द्ध एवं ;3.34द्ध के योग के रूप में लिखी जा सकती है। इसलिए - 1 दृ भ्व् ;स द्ध ़ मदृ → भ्;हद्ध ़ व्भ् ;3ण्35द्ध22 2ऐनोड पर निम्नलिख्िात आॅक्सीकरण अभ्िाियाएं संभव हैं - 1 ट दृदृ म्ब्स ;ंुद्ध → ब्स2 ;हद्ध ़ म ;सले द्ध त्र 1ण्36 ट ;3ण्36द्ध2ट 2भ्2व् ;स द्ध → व्2 ;हद्ध ़ 4भ़्;ंुद्ध ़ 4मदृ म्;सले द्ध त्र 1ण्23 ट ;3ण्37द्ध ऐनोड पर कम म्ट वाली अभ्िािया को वरीयता प्राप्त होती है इसलिए जल के दृआॅक्सीकरण को ब्स ;ंुद्ध के आॅक्सीकरण की तुलना में वरीयता मिलनी चाहिए। परंतु आॅक्सीजन की अिाविभव के कारण अभ्िािया ;3.36द्ध को वरीयता प्राप्त होती है। अतः समग्र अभ्िािया निम्न प्रकार से संक्षेपित की जा सकती है - भ्व्2छंब्स ;ंुद्ध ⎯⎯⎯⎯ छं़ ;ंुद्ध ़ ब्सदृ→ ;ंुद्ध 1 वैफथोड पर - भ्2व्;स द्ध ़ मदृ → भ्2;हद्ध ़ व्भ्दृ ;ंुद्ध21 ऐनोड पर - ब्सदृ ;ंुद्ध → ब्स;हद्ध ़ मदृ 22समग्र अभ्िािया - 11 छंब्स;ंुद्ध ़ भ्2व्;सद्ध → छं़;ंुद्ध ़ व्भ्दृ;ंुद्ध ़ भ्2;हद्ध ़ ब्स2;हद्ध22 सांद्रता प्रभावों को समाहित करने के लिए मानक इलैक्ट्रोड विभवों के स्थान पर नेन्र्स्ट समीकरण ;समीकरण 3.8द्ध में दिए गए इलैक्ट्रोड विभव प्रतिस्थापित किए जाते हैं। सल्फ्रयूरिक अम्ल के वैद्युतअपघटन में ऐनोड पर निम्नलिख्िात अभ्िाियाएं संभावित हैं। 2भ्व्;सद्ध→ व्;हद्ध ़ 4भ़्;ंुद्ध ़ 4मदृ म् ट द्धत्र ़1ण्23 टए ;3ण्38द्ध22;सले 2 दृ2 दृ2ैव् ;ंुद्ध → ैव् ;ंुद्ध ़ 2मदृ म् ट द्ध त्र 1ण्96 ट ;3ण्39द्ध4 28 ;सले 3.6 बैटरियाँ 3.6.1 प्राथमिक बैटरियाँ चित्रा 3.8 - एक व्यावसायिक शुष्क सेल िांक के पात्रा में ग्रैपफाइट वैफथोड के साथ, जिसमें िांक पात्रा ऐनोड का कायर् करता है। तनु सल्फ्रयूरिक अम्ल में अभ्िािया ;3.38द्ध को वरीयता प्राप्त होती है परंतु भ्2ैव्4 की उच्च सांद्रता पर अभ्िािया ;3.39द्ध को वरीयता प्राप्त होती है। कोइर् भी बैटरी ;वास्तव में इसमें एक या एक से अिाक सेल श्रेणीब( रहते हैंद्ध या सेल जिसे हम विद्युत के स्रोत के रूप में प्रयोग में लाते हैं, मूलतः एक गैल्वेनी सेल है जो रेडाॅक्स अभ्िािया की रासायनिक ऊजार् को विद्युत ऊजार् में बदल देती है। विंफतु बैटरी के प्रायोगिक उपयोग के लिए इसे हल्की तथा सुसंब( होना चाहिए एवं प्रयोग में लाते समय इसकी वोल्टता में अिाक परिवतर्न नहीं होना चाहिए। बैटरियाँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं - प्राथमिक बैटरियाँ एवं संचायक बैटरियाँ। प्राथमिक बैटरियों में अभ्िािया केवल एक बार होती है तथा वुफछ समय तक प्रयोग के बाद बैटरी निष्िक्रय हो जाती है एवं पुनः प्रयोग में नहीं लाइर् जा सकती। इसका सबसे चिर - परिचित उदाहरण शुष्क सेल है जिसे इसके आविष्कारक के नाम पर लैक्लांशे सेल के नाम से जाना जाता है। ये सामान्य रूप में ट्रांजिस्टरों एवं घडि़यों में प्रयोग में लाइर् जाती हैं। इस सेल में िांक का एक पात्रा होता है जो ऐनोड का कायर् भी करता है तथा काबर्न ;ग्रैपफाइटद्ध की छड़ जो चारों ओर से चूण्िार्त मैंगनीजडाइर्आॅक्साइड तथा काबर्न से घ्िारी रहती है, वैफथोड का कायर् करती है ;चित्रा 3.8द्ध। इलैक्ट्रोडों के बीच का स्थान अमोनियम क्लोराइड ;छभ्4ब्सद्ध एवं िांक क्लोराइड ;र्दब्स2द्ध के नम पेस्ट से भरा रहता है। इलैक्ट्रोड अभ्िाियाएं जटिल हैं परंतु इन्हें सन्िनकट रूप से निम्न प्रकार से लिखा जा सकता है - ऐनोड - र्द;ेद्ध ⎯→ र्द2़ ़ 2मदृ वैफथोड - डदव्2़ छभ्4़़ मदृ⎯→ डदव्;व्भ्द्ध ़ छभ्3 वैफथोड की अभ्िािया में मैंगनीज ़ 4 से ़ 3 आॅक्सीकरण अवस्था में अपचित हो जाता है। अभ्िािया में उत्पन्न अमोनिया र्द2़ के साथ संवुफल ख्र्द;छभ्3द्ध4,2़ बनाती है। सेल का विभव लगभग 1ण्5 ट होता है। मक्यर्ूरी सेल श्रवण यंत्रा, घडि़यों आदि जैसी विद्युत् की कम मात्रा की आवश्यकता वाली युक्ितयों के लिए उपयुक्त होती है ;चित्रा 3.9द्ध। इसमें जिंक - मक्यूर्री अमलगम ऐनोड का तथा एनोड एनोड टोपी गैस्केट चित्रा 3.9 - सामान्यतः प्रयुक्त मक्यूर्री सेल, जिंक अपचायक तथा मक्यूर्री ;प्प्द्ध आॅक्साइड आॅक्सीकारक हैं। 3.6.2 संचायक बैटरियाँ ;ैमबवदकंतल ठंजजमतपमेद्ध वैफथोड सेल वैफनपृथक्कारी ;डिब्बाद्ध भ्हव् एवं काबर्न का पेस्ट वैफथोड का कायर् करता है। ज्ञव्भ् एवं र्दव् का पेस्ट वैद्युतअपघट्य होता है। सेल की इलैक्ट्रोड अभ्िाियाएं नीचे दी गइर् हैं - दृऐनोड - र्द;भ्हद्ध ़ 2व्भ् ⎯→ र्दव्;ेद्ध ़ भ्2व् ़ 2मदृ दृवैफथोड - भ्हव् ़ भ्2व् ़ 2मदृ ⎯→ भ्ह;सद्ध ़ 2व्भ् समग्र सेल अभ्िािया निम्न प्रकार से निरूपित की जाती है - र्द;भ्हद्ध ़ भ्हव्;ेद्ध ⎯→ र्दव्;ेद्ध ़ भ्ह;सद्ध सेल विभव लगभग 1ण्35 ट होता है तथा संपूणर् कायर् अविा में स्िथर रहता हैऋ क्योंकि समग्र सेल अभ्िािया में कोइर् भी ऐसा आयन नहीं है जिसकी सांद्रता विलयन में होने के कारण, सेल की संपूणर् कायर् अविा में बदल सकती हो। एक संचायक सेल को उपयोग के बाद विपरीत दिशा में विद्युत धारा के प्रवाह द्वारा पुनः आवेश्िात कर पिफर से प्रयोग में लाया जा सकता है। एक अच्छी संचायक सेल अनेक बार डिस्चाजर् एवं चाजर् के चक्रण से गुजर सकती है। सबसे महत्वपूणर् संचायक सेल लेड संचायक बैटरी है ;चित्रा 3.10द्ध, जिसे सामान्यतः वाहनों एवं इन्वटर्रों में प्रयोग किया जाता है। इसमें ऐनोड लेड का बना होता है तथा वैफथोड लेड डाइआॅक्साइड ;च्इव्2 द्ध से भरे हुए लेड का गि्रड होता है। 38ः सल्फ्रयूरिक अम्ल का विलयन वैद्युतअपघट्य का कायर् करता है। जब बैटरी उपयोग में होती है तो निम्नलिख्िात सेल अभ्िाियाएं होती हैं - ऐनोड - च्इ;ेद्ध ़ ैव्42दृ;ंुद्ध → च्इैव्4;ेद्ध ़ 2मदृ वैफथोड - च्इव्2;ेद्ध ़ ैव्42दृ;ंुद्ध ़ 4भ़्;ंुद्ध ़ 2मदृ → च्इैव्4 ;ेद्ध ़ 2भ्2व् ;स द्ध इस प्रकार वैफथोड एवं ऐनोड अभ्िाियाओं को मिलाकर समग्र सेल अभ्िािया निम्नलिख्िात है - 2ैव्4;ंुद्ध→ 2च्इैव्4;ेद्ध ़ 2भ्2व्;सद्ध बैटरी को आवेश्िात करने पर अभ्िािया उत्क्रमित हो जाती है तथा ऐनोड एवं वैफथोड भी क्रमशः च्इैव्4;ेद्ध च्इ एवं च्इव्2 में बदल जाते हैं। दूसरा महत्वपूणर् संचायक सेल निवैफल वैफडमियम सेल ;चित्रा 3.11द्ध है जिसकी कायर् अविा लेड संचायक बैटरी से अिाक है विंफतु इसकी निमार्ण लागत अिाक है। हम इस सेल की ियावििा तथा चाजर् एवं डिस्चाजर् की प्रिया में होने वाली इलैक्ट्रोड अभ्िाियाओं का विस्तृत वणर्न नहीं करेंगे। डिस्चाजर् की प्रिया में होने वाली समग्र अभ्िािया निम्नलिख्िात है - ब्क ;ेद्ध़2छप;व्भ्द्ध3 ;ेद्ध → ब्कव् ;ेद्ध ़2छप;व्भ्द्ध2 ;ेद्ध ़भ्2व्;स द्ध चित्रा 3.11 - एक पुनः आवेशन योग्य बेलनाकार जेली व्यवस्था में, नम सोडियम या पोटैश्िायम हाइड्राॅक्साइड से निमज्िजत परत से पृथक्कृत निवैफल वैफडमियम सेल। 3.7 ईंधन सेल ऊष्मीय संयंत्रों से विद्युत उत्पादन बहुत अिाक उपयोगी वििा नहीं है तथा यह प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है। ऐसे संयंत्रों में जीवाश्मी ईंधनों ;कोयला, गैस या तेलद्ध की रासायनिक ऊजार् ;दहन ऊष्माद्ध का उपयोग पहले जल को उच्च दाब की वाष्प में बदलने में किया जाता है जिसका उपयोग टरबाइन को चलाकर विद्युत उत्पादन में किया जाता है। हम जानते हैं कि गैल्वैनी सेल रासायनिक ऊजार् को सीधे ही विद्युत ऊजार् में बदल देती है एवं इसकी दक्षता भी अिाक है। अब ऐसे सेलों का निमार्ण संभव है जिनमें अभ्िाकमर्कों को लगातार इलैक्ट्रोडों पर उपलब्ध कराया जा सकता है तथा उत्पादों को वैद्युतअपघट्य कक्ष से लगातार हटाया जा सकता है। ऐसी गैल्वैनी सेलों को जिनमें हाइड्रोजन, मेथेन एवं मेथेनाॅल आदि जैसे इर्ंधनों की दहन ऊजार् को सीधे ही विद्युत ऊजार् में परिवतिर्त किया जाता है, ईंधन सेल कहते हैं। सबसे अिाक सपफल ईंधन सेल में हाइड्रोजन एवं आॅक्सीजन के संयोग से जल बनने की अभ्िािया का उपयोग किया जाता है ;चित्रा 3.12द्ध। इस सेल को अपोलो अंतरिक्ष कायर्क्रम में विद्युत उफजार् प्रदान करने के लिए प्रयोग में लाया गया था। इस अभ्िािया से प्राप्त जल वाष्प को संघनित कर उसका उपयोग अंतरिक्ष यात्रिायों के लिए पेयजल के रूप में किया गया था। सेल में हाइड्रोजन एवं आॅक्सीजन गैसों के बुलबुलों को सरंध्र काबर्न इलैक्ट्रोडों के माध्यम से सांद्र जलीय सोडियम हाइड्राॅक्साइड विलयन में प्रवाहित किया जाता है। इलैक्ट्रोड अभ्िािया की दर बढ़ाने के लिए सूक्ष्म विभाजित प्लैटिनम यावैफथोडऐनोड पैलेडियम धातु, जैसे उत्प्रेरकों को इलैक्ट्रोडों में समावेश्िात किया जाता है। इलैक्ट्रोड जलीय अभ्िाियाएं नीचे दी गइर् हैं - वैद्युतअपघट्य वैफथोड - व्2;हद्ध ़ 2भ्2व्;सद्ध ़ 4म दृ⎯→ 4व्भ्दृ;ंुद्ध ऐनोड - 2भ्2 ;हद्ध ़ 4व्भ्दृ ;ंुद्ध ⎯→ 4भ्2व्;सद्ध ़ 4मदृ समग्र अभ्िािया इस प्रकार है - 2भ्2;हद्ध ़ व्2;हद्ध ⎯→ 2 भ्2व्;स द्ध चित्रा 3.12 - ईंधन सेल जो भ्2 और जब तक अभ्िाियकों की आपूतिर् होती है, सेल लगातार कायर् करती है। ऊष्मीय व्2 का उपयोग कर संयंत्रों की तुलना में जिनकी दक्षता 40ः होती है, ईंधन सेल 70ः दक्षता के साथ विद्युत उत्पादन करती है। विद्युत उत्पादित करती हैं। ईंधन सेलों की दक्षता बढ़ाने के लिए नए इलैक्ट्रोड पदाथर् उन्नत 3.8 संक्षारण उत्प्रेरक एवं वैद्युतअपघट्यों के विकास में बहुत अिाक उन्नति हुइर् है। इनका उपयोग वाहनों में प्रयोग के तौर पर किया गया है। ईंधन सेल प्रदूषण मुक्त होते हैं एवं भविष्य में इनके महत्व को देखते हुए अनेक प्रकार के ईंधन सेलों को नि£मत कर उनका परीक्षण किया गया है। संक्षारण धातुओं की सतह को आॅक्साइड या धातु के अन्य लवणों से मंद गति से आव्रण्िात कर देता है। लोहे में जंग लगना, चाँदी का बदरंग होना, काॅपर एवं पीतल पर हरे रंग का लेप होना, संक्षारण के वुफछ उदाहरण हैं। यह भवनों, पुलों, जहाशों तथा धातुओं से बनी सभी वस्तुओं, विशेषकर लोहे से बनी वस्तुओं को अत्यध्िक क्षति पहँुचाता है। संक्षारण के कारण हमें प्रतिवषर् करोड़ों रुपयों की हानि होती है। संक्षारण में, धातु आॅक्सीजन को इलेक्ट्राॅन देकर आॅक्सीकृत हो जाती है एवं उसका आॅक्साइड बन जाता है। लोहे का संक्षारण ;सामान्यतः जिसे जंग लगना कहते हैंद्ध जल एवं वायु की उपस्िथति में होता है। संक्षारण का रसायन बहुत जटिल है परंतु इसे मुख्यतः वैद्युतरासायनिक परिघटना माना जा सकता है। लोहे से बनी किसी वस्तु के विशेष स्थल पर जब आॅक्सीकरण होता है तो वह स्थान ऐनोड का कायर् करता है ;चित्रा 3.13द्ध तथा इसे हम निम्नलिख्िात अभ्िािया से व्यक्त कर सकते हैं - 2़ दृ टऐनोड - 2 थ्म ;ेद्ध ⎯→ 2 थ्म ़ 4 म म् त्र दृ 0ण्44 ट;थ्म 2़ध्थ्मद्ध ऐनोडी स्थल पर मुक्त इलेक्ट्राॅन, धातु के माध्यम से संचालन कर धातु के दूसरे स्थल पर पहँुचते हैं तथा वहाँ भ़् आयन की उपस्िथति में आॅक्सीजन का अपचयन करते हैं। ;समझा जाता है कि भ़् आयन ब्व्2 के जल में घुलने से बने भ्2ब्व्3 से प्राप्त होते हैं। हाइड्रोजन आयन वायुमंडल में उपस्िथत अन्य अम्लीय आॅक्साइडों के जल में घुलने से भी उपलब्ध हो सकते हैंद्ध। यह स्थल निम्नलिख्िात अभ्िािया के कारण वैफथोेड की तरह व्यवहार करता है - म्ट ़वैफथोड - व्2;हद्ध ़ 4 भ़्;ंुद्ध ़ 4 मदृ ⎯→ 2 भ्2व् ;सद्धय भ् द्यव् द्य भ् व् त्र 1ण्23ट22 ़ 2 ़ टसमग्र अभ्िािया - 2थ्म;ेद्ध़व्2;हद्ध ़ 4भ् ;ंुद्ध ⎯→ 2थ्म ;ंुद्ध़ 2 भ्2व् ;सद्धय म्;सले द्धत्र1ण्67 ट चित्रा 3.13 - लोहे का वायुमंडल में संक्षारणइसके उपरांत वायुमंडलीय आॅक्सीजन द्वारा पेफरस आयन और अध्िक आक्सीवृफत होकर पेफरिक आयनों में बदल जाते हैं जो जलयोजित पेफरिक आॅक्साइड ;थ्म2व्3 ग भ्2व्द्ध बनाकर जंग के रूप में दिखाइर् देते हंै एवं इसके साथ ही हाइड्रोजन आयन पुनः उत्पन्न हो जाते हैं। संक्षारण की रोकथाम अत्यिाक महत्वपूणर् है। इससे न केवल धन की बचत होती है अपितु पुलों के टूटने या संक्षारण के कारण किसी महत्वपूणर् घटक के निष्िक्रय होने जैसी दुघर्टनाओं को रोकने में मदद मिलती है। संक्षारक निरोध की सबसे सरल वििा है, धात्िवक सतह को वायुमंडल के संपवर्फ में न आने देना। यह सतह को पेंट या अन्य रसायनों ;उदाहरण, बिसपफीनाॅलद्ध से लेपित करके किया जा सकता है। एक अन्य सरल वििा है, सतह को किसी अन्य ऐसी धातु ;ैदए र्द आदिद्ध से आच्छादित करना जो अिय हो या वस्तु की रक्षा के लिए िया में भाग ले। एक वैद्युतरासायनिक वििा है, किसी अन्य ऐसी धातु ;जैसे - डहए र्द आदिद्ध का उत्सगर् इलैक्ट्रोड उपलब्ध कराना, जो स्वयं संक्षारित होकर वस्तु की रक्षा करती है। आॅक्सीकरण - थ्म ;ेद्ध → थ्म2़;ंुद्ध ़ 2मदृ अपचयन - व्2 ;हद्ध ़ 4भ़्;ंुद्ध ़4मदृ → 2भ्2व्;सद्ध वायुमंडलीय आॅक्सीकरण - 2़1 ़2थ्म;ंुद्ध ़ 2भ्2व्;सद्ध ़ व्2;हद्ध → थ्म2व्3;ेद्ध ़ 4भ्;ंुद्ध2 अभ्यास 3ण्1 3ण्2 3ण्3 3ण्4 3ण्5 3ण्6 3ण्7 3ण्8 3ण्9 3ण्10 निम्नलिख्िात धातुओं को उस क्रम में व्यवस्िथत कीजिए जिसमें वे एक दूसरे को उनके लवणों के विलयनों में से प्रतिस्थापित करती हैं। ।सए ब्नए थ्मए डह एवं र्दण् नीचे दिए गए मानक इलैक्ट्रोड विभवों के आधर पर धातुओं को उनकी बढ़ती हुइर् अपचायक क्षमता के क्रम में व्यवस्िथत कीजिए। ज्ञ़ध्ज्ञ त्र दृ2ण्93टए ।ह़ध्।ह त्र 0ण्80टए 2़ भ्ह ध्भ्ह त्र 0ण्79ट 2़ 3़ डह ध्डह त्र दृ2ण्37 टए ब्त ध्ब्त त्र दृ 0ण्74ट उस गैल्वैनी सेल को दशार्इए जिसमें निम्नलिख्िात अभ्िािया होती है - र्द;ेद्ध़2।ह़;ंुद्ध →र्द2़;ंुद्ध़2।ह;ेद्धए अब बताइए - ;पद्ध कौन - सा इलैक्ट्रोड )णात्मक आवेश्िात है? ;पपद्ध सेल में विद्युत - धारा के वाहक कौन से हैं? ;पपपद्ध प्रत्येक इलैक्ट्रोड पर होने वाली अभ्िािया क्या है? निम्नलिख्िात अभ्िाियाओं वाले गैल्वैनी सेल का मानक सेल - विभव परिकलित कीजिए। 2़ 3़;पद्ध 2ब्त;ेद्ध ़ 3ब्क ;ंुद्ध → 2ब्त ;ंुद्ध ़ 3ब्क 2़़ 3़;पपद्ध थ्म ;ंुद्ध ़ ।ह ;ंुद्ध → थ्म ;ंुद्ध ़ ।ह;ेद्ध उपरोक्त अभ्िाियाओं के लिए Δ तळ ट एवं साम्य स्िथरांकों की भी गणना कीजिए। निम्नलिख्िात सेलों की 298 ज्ञ पर नेन्र्स्ट समीकरण एवं मउ िलिख्िाए। 2़ 2़;पद्ध डह;ेद्धद्यडह ;0ण्001डद्धद्यद्यब्न ;0ण्0001 डद्धद्यब्न;ेद्ध ;पपद्ध थ्म;ेद्धद्यथ्म2़;0ण्001डद्धद्यद्यभ् ़;1डद्धद्यभ्2;हद्ध;1इंतद्धद्य च्ज;ेद्ध ;पपपद्ध ैद;ेद्धद्यैद2़;0ण्050 डद्धद्यद्यभ़्;0ण्020 डद्धद्यभ्2;हद्ध ;1 इंतद्धद्यच्ज;ेद्ध ;पअद्ध च्ज;ेद्धद्यठत2;स द्धद्यठतदृ;0ण्010 डद्धद्यद्यभ् ़;0ण्030 डद्धद्य भ्2;हद्ध ;1 इंतद्धद्यच्ज;ेद्धण् घडि़यों एवं अन्य युक्ितयों में अत्यिाक उपयोग में आने वाली बटन सेलों में निम्नलिख्िात अभ्िािया होती है - र्द;ेद्ध ़ ।ह2व्;ेद्ध ़ भ्2व्;स द्ध → र्द2़;ंुद्ध ़ 2।ह;ेद्ध ़ 2व्भ्दृ;ंुद्ध अभ्िािया के लिए Δतळ ट एवं म् ट ज्ञात कीजिए। किसी वैद्युतअपघट्य के विलयन की चालकता एवं मोलर चालकता की परिभाषा दीजिये। सांद्रता के साथ इनके परिवतर्न की विवेचना कीजिए। 298 ज्ञ पर 0ण्20ड ज्ञब्स विलयन की चालकता 0ण्0248 ै बउदृ1 है। इसकी मोलर चालकता का परिकलन कीजिए। 298 ज्ञ पर एक चालकता सेल जिसमें 0ण्001 ड ज्ञब्स विलयन है, का प्रतिरोध 1500 Ω है। यदि 0ण्001ड ज्ञब्स दृ3 दृ1विलयन की चालकता 298 ज्ञ पर 0ण्146 × 10 ै बउ हो तो सेल स्िथरांक क्या है? 298 ज्ञ पर सोडियम क्लोराइड की विभ्िान्न सांद्रताओं पर चालकता का मापन किया गया जिसके आँकड़े निम्नलिख्िात हैं - सांद्रता/ड 0ण्001 0ण्010 0ण्020 0ण्050 0ण्100 10 2 × κध्ै उ दृ1 1ण्237 11ण्85 23ण्15 55ण्53 106ण्74 Λ ° सभी सांद्रताओं के लिए Λउ का परिकलन कीजिए एवं Λउ तथा ब) के मध्य एक आलेख खींचिए। उ का मान ज्ञात कीजिए। 3ण्11 0ण्00241 ड ऐसीटिक अम्ल की चालकता 7ण्896 × 10दृ5 ै बउदृ1 है। इसकी मोलर चालकता को परिकलित कीजिए। यदि ऐसीटिक अम्ल के लिए Λउ 0 का मान 390ण्5 ै बउ2 उवसदृ1 हो तो इसका वियोजन स्िथरांक क्या है? 3ण्12 निम्नलिख्िात के अपचयन के लिए कितने आवेश की आवश्यकता होगी? ;पद्ध 1 मोल ।स3़ को ।स में ;पपद्ध 1 मोल ब्न2़ को ब्न में ;पपपद्ध 1 मोल डदव्4दृ को डद2़ में 3ण्13 निम्नलिख्िात को प्राप्त करने में कितने पैफराडे विद्युत की आवश्यकता होगी? ;पद्ध गलित ब्ंब्स2 से 20ण्0 ह ब्ं ;पपद्ध गलित ।स2व्3 से 40ण्0 ह ।स 3ण्14 निम्नलिख्िात को आॅक्सीकृत करने के लिए कितने वूफलाॅम विद्युत आवश्यक है? ;पद्ध 1 मोल भ्2व् को व्2 में। ;पपद्ध 1 मोल थ्मव् को थ्म2व्3 में। 3ण्15 छप;छव्3द्ध2 के एक विलयन का प्लैटिनम इलैक्ट्रोडों के बीच 5 ऐम्िपयर की धारा प्रवाहित करते हुए 20 मिनट तक विद्युत अपघटन किया गया। छप की कितनी मात्रा वैफथोड पर निक्षेपित होगी? 3ण्16 र्दैव्4ए ।हछव्3 एवं ब्नैव्4 विलयन वाले तीन वैद्युतअपघटनी सेलों ।एठएब् को श्रेणीब( किया गया एवं 1.5 ऐम्िपयर की विद्युतधारा, सेल ठ के वैफथोड पर 1ण्45 ह सिल्वर निक्षेपित होने तक लगातार प्रवाहित की गइर्। विद्युतधारा कितने समय तक प्रवाहित हुइर्? निक्षेपित काॅपर एवं जिंक का द्रव्यमान क्या होगा? 3ण्17 तालिका 3.1 में दिए गए मानक इलैक्ट्रोड विभवों की सहायता से अनुमान लगाइए कि क्या निम्नलिख्िात अभ्िाकमर्कों के बीच अभ्िािया संभव है? ;पद्ध थ्म3़;ंुद्ध और प्दृ;ंुद्ध ;पपद्ध ।ह़ ;ंुद्ध और ब्न;ेद्ध ;पपपद्ध थ्म3़ ;ंुद्ध और ठतदृ;ंुद्ध ;पअद्ध ।ह;ेद्ध और थ्म3़;ंुद्ध ;अद्ध ठत2 ;ंुद्ध और थ्म2़;ंुद्धण् 3ण्18 निम्नलिख्िात में से प्रत्येक के लिए वैद्युतअपघटन से प्राप्त उत्पाद बताइए। ;पद्ध सिल्वर इलैक्ट्रोडों के साथ ।हछव्3 का जलीय विलयन ;पपद्ध प्लैटिनम इलैक्ट्रोडों के साथ ।हछव्3 का जलीय विलयन ;पपपद्ध प्लैटिनम इलैक्ट्रोडों के साथ भ्2ैव्4 का तनु विलयन ;पअद्ध प्लैटिनम इलैक्ट्रोडों के साथ ब्नब्स2 का जलीय विलयन कुुु छ पाठ्यनिहित प्रश्नों केेे उत्तर 3ण्5 म्;सेलद्ध त्र 0ण्91ट ट दृ1 7 3ण्6 Δतळ त्र दृ45ण्54 ाश्र उवस ए ज्ञब त्र 9ण्62 × 10 दृ4दृ1 3ण्7 0ण्114ए 3ण्67 × 10 उवस स्

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