उद्देश्य इस एकक के अध्ययन के पश्चात् आप - ऽ ठोस अवस्था के सामान्य अभ्िालक्षणों का वणर्न कर सवेंफगेऋ ऽ अिस्टलीय और िस्टलीय ठोसों के मध्य विभेद कर सवेंफगेऋ ऽ िस्टलीय ठोसों को बंध्न बलों की प्रकृति के आधर पर वगीर्कृत कर सवेंफगेऋ ऽ िस्टल जालक और एकक कोष्िठका को परिभाष्िात कर सवेंफगेऋ ऽ कणों के निविड संवुफलन की व्याख्या कर सवेंफगेऋ ऽ विभ्िान्न प्रकार की रिक्ितयों और निविड संवुफलित संरचनाओं का वणर्न कर सवेंफगेऋ ऽ विभ्िान्न प्रकार की घनीय एकक कोष्िठकाओं की संवुफलन क्षमता का परिकलन कर सवेंफगेऋ ऽ पदाथर् के घनत्व और उसकी एकक कोष्िठका के गुणों में सहसंबंध् स्थापित कर सवेंफगेऋ ऽ ठोसों में अपूणर्ताओं और उनके गुणों पर अपूणर्ताओं के प्रभावों का वणर्न कर सवेंफगेऋ ऽ ठोसों के विद्युतीय व चुंबकीय गुणों और उनकी संरचना में सहसंबंध् स्थापित कर सवेंफगे। फ्ठोस पदाथो± जैसे कि उच्च तापीय अतिचालक, जैव सुसंगत प्लास्िटक, सिलिकाॅन चिप्स आदि की विपुल बहुतायत विज्ञान के भविष्य के विकास में चहुँमुखी भूमिका के निवर्हन के लिए नियत है।य् हम अध्िकतर ठोसों के संपवर्फ में आते हैं और हम उन्हें प्रायः द्रवों और गैसों से अध्िक उपयोग में लेते हैं। विभ्िान्न अनुप्रयोगों के लिए हमें व्यापक रूप से भ्िान्न गुणों वाले ठोसों की आवश्यकता होती है। यह गुण अवययी कणों की प्रकृति और उनके मध्य परिचालित बंधन बलों पर निभर्र करते हैं। अतः ठोसों की संरचना का अध्ययन महत्वपूणर् है। संरचना एवं गुणों के मध्य सहसंबंध् वांछनीय गुणों वाले नये ठोस पदाथो±ऋ जैसे उच्च तापीय अतिचालक, चुंबकीय पदाथर्, पैकेज के लिए जैव निम्नीकरणीय बहुलक, शल्यक रोपण में प्रयुक्त जैवसुनम्य ;ठपवबवउचसपंदजद्ध ठोस आदि की खोज में सहायक हैं। हम अपने पूवर् अध्ययन से जानते हैं कि द्रवों और गैसों को उनकी प्रवाह क्षमता के कारण तरल कहा जाता है। इन दोनों अवस्थाओं में तरलता अणुओं की स्वतंत्रा गति के कारण होती है। इसके विपरीत, ठोसों के अवययी कणों की स्िथतियाँ नियत होती हैं और वे केवल अपनी माध्य स्िथतियों के चारों ओर दोलन करते हैं। इससे ठोसों की कठोरता स्पष्ट होती है। िस्टलीय ठोसों में अवयवी कण नियमित पैटनर् में व्यवस्िथत होते हैं। इस एकक में हम कणों की विभ्िान्न सम्भव व्यवस्थाओं से प्राप्त अनेक प्रकार की संरचनाओं का विवेचन करेंगे। ठोसों के अवयवी कणों की अन्योन्यिया की प्रकृति और विभ्िान्न गुणों के मध्य सहसंबंधें की खोज भी करेंगे। संरचनात्मक अपूणर्ताओं अथवा अपद्रव्यों की अल्प मात्रा में उपस्िथति से ये गुण किस प्रकार से रूपांतरित होते हैं, की भी व्याख्या करेंगे। 1.1 ठोस अवस्था के ेे सामान्य अभ्िालक्षण 1.2 अिस्टलीय एवं िस्टलीय ठोस ;कद्ध ;खद्ध चित्रा 1.1 - ;कद्ध क्वाट्र्श और ;खद्ध क्वाट्र्श काँच की द्विविमीय संरचना कक्षा ग्प् में आप सीख चुके हैं कि पदाथर् तीन अवस्थाओं - ठोस, द्रव और गैस में पाये जाते हैं। ताप और दाब की दी गइर् निश्िचत परिस्िथतियों में, किसी पदाथर् की इनमें से कौन सी अवस्था अध्िक स्थायी होगी, दो विरोध्ी कारकों के सम्िमलित प्रभाव पर निभर्र करती है। अंतराआण्िवक बलों की प्रवृिा अणुओं ;अथवा परमाणुओं अथवा आयनोंद्ध को समीप रखने की होती है, जबकि उष्मीय ऊजार् की प्रवृिा उन्हें तीव्रगामी बनाकर पृथक रखने की होती है। पयार्प्त निम्न तापमान पर उष्मीय ऊजार् निम्न होती है और अंतराआण्िवक बल उन्हें इतना समीप कर देते हैं कि वे एक - दूसरे के साथ अनुलग्िनत हो जाते हैं और निश्िचत स्िथतियाँ अध्यासित कर लेते हैं। यह अब भी अपनी माध्य स्िथतियों के चारों ओर दोलन कर सकते हैं और पदाथर् ठोस अवस्था में रहता है। ठोस अवस्था के अभ्िालक्षण्िाक गुणध्मर् निम्नलिख्िात हैं - ;पद्ध वे निश्िचत द्रव्यमान, आयतन एवं आकार के होते हैं। ;पपद्ध अंतराआण्िवक दूरियाँ लघु होती हैं। ;पपपद्ध अंतराआण्िवक बल प्रबल होते हैं। ;पअद्ध उनके अवयवी कणों ;परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनोंद्ध की स्िथतियाँ निश्िचत होती हैं और यह कण केवल अपनी माध्य स्िथतियों के चारों ओर दोलन कर सकते हैं। ;अद्ध वे असंपीड्य और कठोर होते हैं। ठोसों को उनके अवयवी कणों की व्यवस्था में उपस्िथत क्रम की प्रवृफति के आधर पर िस्टलीय और अिस्टलीय में वगीर्कृत किया जा सकता है। िस्टलीय ठोस साधारणतः लघु िस्टलों की अत्यिाक संख्या से बना होता है, उनमें प्रत्येक का निश्िचत अभ्िालक्षण्िाक ज्यामितीय आकार होता है। िस्टल में अवयवी कणों ;परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनोंद्ध का क्रम सुव्यवस्िथत होता है। इसमें दीघर् परासी व्यवस्था होती है अथार्त् कणों की व्यवस्था का पैटनर् नियमित होता है जिसकी संपूणर् िस्टल में एक से अंतराल पर पुनरावृिा होती है। सोडियम क्लोराइड और क्वाट्र्श िस्टलीय ठोसों के विश्िाष्ट उदाहरण हैं। अिस्टलीय ठोस ;ग्रीक अमोरप़फोस = आकृति नहीं होनाद्ध असमाकृति के कणों से बने होते हैं। इन ठोसों में अवयवी कणों ;परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनोंद्ध की व्यवस्था केवल लघु परासी व्यवस्था होती है। ऐसी व्यवस्था में नियमित और आवतीर् पुनरावृत पैटनर् केवल अल्प दूरियों तक देखा जाता है। ऐसे भाग बिखरे होते हैं और इनके बीच व्यवस्था क्रम अनियमित होते हैं। क्वाटर््श ;िस्टलीयद्ध और क्वाटर््श काँच ;अिस्टलीयद्ध की संरचनाएं क्रमशः चित्रा 1ण्1 ;कद्ध और ;खद्ध में दशार्यी गइर् हैं। यद्यपि दोनों संरचनाएं लगभग समरूप हैं, पिफर भी अिस्टलीय क्वाटर््श कांच में दीघर् परासी व्यवस्था नहीं है। अिस्टलीय ठोसों की संरचना द्रवों के सदृश होती हैं। काँच, रबर और प्लास्िटक अिस्टलीय ठोसों के विश्िाष्ट उदाहरण हैं। अवयवी कणों की व्यवस्था में अंतर के कारण दोनों प्रकार के ठोसों के गुण भ्िान्न होते हैं। िस्टलीय ठोसों का गलनांक निश्िचत होता है। दूसरी ओर अिस्टलीय ठोस ताप के एक निश्िचत परास पर नरम हो जाते हैं और गलाकर साँचे में ढाले जा सकते हैं और इनसे विभ्िान्न आकृतियाँ बनाइर् जा सकती हैं। गमर् करने पर किसी एक तापमान पर वे िस्टलीय बन जाते हैं। िस्टलीकरण के कारण, प्राचीन सभ्यता की काँच की वुफछ वस्तुओं की दृश्यता में दूध्ियापन पाया गया है। द्रवों के सदृश, अिस्टलीय ठोसों में प्रवाह की प्रवृिा होती है, यद्यपि यह बहुत मंद होता है। अतः कभी - कभी इन्हें आभासी ठोस अथवा अतिशीतित द्रव कहा जाता है। पुरानी इमारतों की ख्िाड़कियों और दरवाशों में जड़े शीशे निरअपवाद रूप से चित्रा 1.2 - िस्टलों में विषम दैश्िाकता भ्िान्न - भ्िान्न दिशाओं में कणों की भ्िान्न - भ्िान्न व्यवस्था से प्राप्त होती है। शीषर् की अपेक्षा अधस्तल में ¯कचित् मोटे पाए जाते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि काँच अत्यध्िक मंदता से नीचे प्रवाहित होकर अध्स्तल भाग को ¯कचित् मोटा कर देता है। िस्टलीय ठोस विषमदैश्िाक प्रकृति के होते हैं अथार्त् उनके वुफछ भौतिक गुण जैसे विद्युतीय प्रतिरोध्कता और अपवतर्नांक एक ही िस्टल में भ्िान्न - भ्िान्न दिशाओं में मापने पर भ्िान्न - भ्िान्न मान प्रदश्िार्त करते हैं। यह अलग - अलग दिशाओं में कणों की भ्िान्न व्यवस्था से उत्पन्न होता है। यह चित्रा 1ण्2 से स्पष्ट होता है। चूँकि भ्िान्न - भ्िान्न दिशाओं में कणों की व्यवस्था अलग है, अतः एक ही भौतिक गुण का मान प्रत्येक दिशा में भ्िान्न पाया जाता है। दूसरी ओर अिस्टलीय ठोसों की प्रकृति समदैश्िाक होती है। इसका कारण यह है कि उनमें दीघर् परासी व्यवस्था नहीं होती और सभी दिशाओं में अनियमित विन्यास होता है। अतः किसी भी भौतिक गुण का मान हर दिशा में समान होगा। यह भ्िान्नताएं संक्षेप में सारणी 1ण्1 में दी गइर् हैं। अिस्टलीय ठोस उपयोगी पदाथर् हैं। काँच, रबर और प्लास्िटक के हमारे दैनिक जीवन में अनेक अनुप्रयोग हैं। अिस्टलीय सिलिकन सूयर् के प्रकाश का विद्युत में रूपांतरण करने के लिए उपलब्ध श्रेष्ठतम प्रकाश - वोल्टीय ;चीवजवअवसजंपबद्ध पदाथर् है। सारणी 1ण्1 - िस्टलीय और अिस्टलीय ठोसों के मध्य विभेद 1.3 िस्टलीय ठोसों का वगीर्करण 1.3.1 आण्िवक ठोस 1.3.2 आयनिक ठोस 1.3.3 धत्िवक ठोस खंड 1ण्2 में हमने अिस्टलीय पदाथो± के बारे में जाना और यह भी जाना कि उनमें लघु परासी व्यवस्था होती है। तथापि, अध्िकतर ठोस पदाथर् िस्टलीय प्रकृति के होते हैं। उदाहरण के लिए सभी धत्िवक तत्वऋ जैसे - लोहा, ताँबा और चाँदीऋ अधात्िवक तत्वऋ जैसे - सल्पफर, प़फाॅसप़फोरस और आयोडीन एवं यौगिक जैसे सोडियम क्लोराइड, िांक सल्पफाइड और नैफ्ऱथैलीन िस्टलीय ठोस हैं। िस्टलीय ठोसों को उनमें परिचालित अंतराआण्िवक बलों की प्रकृति के आधार पर चार संवगोर्ं में वगीर्कृत किया जा सकता है। ये हैं, आण्िवक, आयनिक, धात्िवक और सहसंयोजक ठोस। आइए, अब हम इन संवगो± के बारे में जानें। आण्िवक ठोसों के अवयवी कण अणु होते हैं। इन्हें निम्नलिख्िात संवगो± में और अध्िक प्रविभाजित किया गया है - ;पद्ध अध््रुवी आण्िवक ठोस इनके अंतगर्त वे ठोस आते हैं जो या तो परमाणुओंऋ उदाहरणाथर्, निम्न ताप पर आॅगर्न और हीलियम अथवा अध््रुवी सहसंयोजक बंधें से बने अणुओं, उदाहरणाथर्, निम्न ताप पर भ्2ए ब्स2 और प्2 द्वारा बने होते हैं। इन ठोसों में परमाणु अथवा अणु दुबर्ल परिक्षेपण बलों अथवा लंडन बलों द्वारा बँध्े रहते हैं जिनके बारे में आप कक्षा ग्प् में सीख चुके हैं। यह ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। यह निम्न गलनांकी होते हैं और सामान्यतः कमरे के ताप और दाब पर द्रव अथवा गैसीय अवस्था में होते हैं। ;पपद्ध ध््रुवीय - आण्िवक ठोस भ्ब्सए ैव्2 आदि पदाथो± के अणु ध््रुवीय सहसंयोजक बंधें से बने होते हैं। ऐसे ठोसों में अणु अपेक्षाकृत प्रबल द्विध््रुव - द्विध््रुव अन्योन्यियाओं से एक दूसरे के साथ बँधे रहते हैं। यह ठोस मुलायम और विद्युत के अचालक होते हैं। इनके गलनांक अध्रुवी आण्िवक ठोसों से अिाक होते हैं प्िाफर भी इनमें से अध्िकतर कमरे के ताप और दाब पर गैस अथवा द्रव हैं। ठोस ैव्2 और ठोस छभ्3 ऐसे ठोसों के वुफछ उदाहरण हैं। ;पपपद्ध हाइड्रोजन आबंध्ित आण्िवक ठोस ऐसे ठोसों के अणुओं में भ्ए और थ्एव् अथवा छ परमाणुओं के मध्य ध््रुवीय - सहसंयोजक बंध् होते हैं। प्रबल हाइड्रोजन आबंध्न ऐसे ठोसों के अणुओं, जैसे भ्2व् ;बपर्फद्ध, को बंध्ित करते हैं। यह विद्युत के अचालक हैं। सामान्यतः यह कमरे के ताप और दाब पर वाष्पशील द्रव अथवा मुलायम ठोस होते हैं। आयनिक ठोसों के अवयवी कण आयन होते हैं। ऐसे ठोसों का निमार्ण ध्नायनों और ट्टणायनों के त्रिाविमीय विन्यासों में प्रबल वूफलाॅमी ;स्िथर वैद्युतद्ध बलों से बँध्ने पर होता है। यह ठोस कठोर और भंगुर प्रकृति के होते हैं। इनके गलनांक और क्वथनांक उच्च होते हैं। चूँकि इसमें आयन गमन के लिए स्वतंत्रा नहीं होते, अतः ये ठोस अवस्था में विद्युतरोध्ी होते हैं। तथापि गलित अवस्था में अथवा जल में घोलने पर, आयन गमन के लिए मुक्त हो जाते हैं और वे विद्युत का संचालन करते हैं। धतुएं, मुक्त इलेक्ट्राॅनों के समुद्र से घ्िारे और उनके द्वारा संलग्िनत ध्नायनों का व्यवस्िथत संग्रह हैं। ये इलेक्ट्राॅन गतिशील होते हैं और िस्टल में सवर्त्रा समरूप से विस्तारित होते हैं। 1.3.4 सहसंयोजक अथवा नेटववर्फ ठोस प्रत्येक धत्िवक परमाणु इस गतिशील इलेक्ट्राॅनों के समुद्र में एक अथवा अध्िक इलेक्ट्राॅनों का योगदान देता है। ये मुक्त और गतिशील इलेक्ट्राॅन, धतुओं की उच्च वैद्युत और ऊष्मीय चालकता के लिए उत्तरदायी होते हैं। विद्युत क्षेत्रा प्रयुक्त करने पर, ये इलेक्ट्राॅन ध्नायनों के नेटववर्फ में सतत प्रवाह करते हैं। इसी प्रकार जब धातु के एक भाग में ऊष्मा संभरित की जाती है तो ऊष्मीय ऊजार्, मुक्त इलेक्ट्राॅनों द्वारा, सवर्त्रा एक समान रूप से विस्तारित हो जाती है। धतुओं की दूसरी महत्वपूणर् विशेषताएं वुफछ स्िथतियों में उनकी चमक और रंग हैं। यह भी उनमें उपस्िथत मुक्त इलेक्ट्राॅनों के कारण होती हैं। धतुएं अत्यध्िक आघातवध्र्नीय और तन्य होती हैं। अधत्िवक िस्टलीय ठोसों की विस्तृत अनेकरूपता संपूणर् िस्टल में निकटवतीर् परमाणुओं के मध्य सहसंयोजक बंधें के बनने के कारण होती हैं। इन्हें विशाल अणु भी कहा जाता है। सहसंयोजक बंध् प्रबल और दिशात्मक प्रकृति के होते हैंऋ इसलिए परमाणु अपनी स्िथतियों पर अति प्रबलता से संलग्न रहते हैं। ऐसे ठोस अति कठोर और भंगुर होते हैं। इनका गलनांक अत्यन्त उच्च होता है और गलन से पूवर् विघटित भी हो सकते हैं। ये विद्युत का संचालन नहीं करते, अतः ये विद्युतरोध्ी होते हैं। हीरा ;चित्रा 1ण्3द्ध और सिलिकाॅन काबार्इड ऐसे ठोसों के विश्िाष्ट उदाहरण हैं। ग्रैपफाइट मुलायम और विद्युत चालक है। उसके अपवादात्मक गुण उसकी विश्िाष्ट संरचना ;चित्रा 1ण्4द्ध के कारण होते हैं। इसमें काबर्न परमाणु विभ्िान्न परतों में व्यवस्िथत होते हैं और प्रत्येक परमाणु उसी परत के तीन निकटवतीर् परमाणुओं से सहसंयोजक बंध्न में होता है। प्रत्येक परमाणु का चैथा संयोजकता इलेक्ट्राॅन अलग परतों के मध्य उपस्िथत होता है और यह गमन के लिए मुक्त होता है। यही मुक्त इलेक्ट्राॅन ग्रैपफाइट को विद्युत का उत्तम चालक बनाते हैं। विभ्िान्न परतें एक - दूसरे पर सरक सकती हैं। यह ग्रैपफाइट को मुलायम ठोस और उत्तम ठोस - चिकनाइर् बनाते हैं। चित्रा 1.3 - हीरे की नेटववर्फ संरचना चारों प्रकार के ठोसों के विभ्िान्न गुणों को सारणी 1ण्2 में सूचीब( किया गया है। सारणी 1ण्2 - विभ्िान्न प्रकार के ठोस 1.4 िस्टल जालक और एकक कोष्िठका िस्टलीय ठोसों का मुख्य अभ्िालक्षण अवयवी कणों का नियमित और पुनरावृत्त पैटनर् है। यदि िस्टल में अवयवी कणों की त्रिाविमीय व्यवस्था को आरेख के रूप में निरूपित किया जाए, जिसमें प्रत्येक कण को बिंदु द्वारा चित्रिात किया गया हो तो, इस व्यवस्था को िस्टल जालक कहते हैं। इस प्रकार दिव्फस्थान ;स्पेसद्ध में बिंदुओं की नियमित त्रिाविमीय व्यवस्था को िस्टल जालक कहते हैं। िस्टल जालक के एक भाग को चित्रा 1ण्5 में दिखाया गया है। चित्रा 1.5 - त्रिाविमीय घनीय जालक का एक भाग और उसकी एकक कोष्िठका। चित्रा 1.6 - एकक कोष्िठका के पैरामीटरों का निदशर् - चित्रा। 1.4.1 आद्य एवं वेंफदि्रत एकक कोष्िठका केवल 14 त्रिाविमीय जालक संभव हैं। प्रफांसीसी गण्िातज्ञ के नाम पर, जिसने सवर्प्रथम इनका वणर्न किया, इन्हें ब्रेवे जालक कहा जाता है। एक िस्टल जालक के अभ्िालक्षण निम्नलिख्िात हैं - ;कद्ध जालक में प्रत्येक ¯बदु जालक ¯बदु अथवा जालक स्थल कहलाता है। ;खद्ध िस्टल जालक का प्रत्येक बिंदु एक अवयवी कण को निरूपित करता है जो एक परमाणु, एक अणु ;परमाणुओं का समूहद्ध अथवा एक आयन हो सकता है। ;गद्ध जालक बिंदुओं को सीध्ी रेखाओं से जोड़ा जाता है जिससे जालक की ज्यामिति व्यक्त की जा सके। एकक कोष्िठका िस्टल जालक का लघुतम भाग है, इसे जब विभ्िान्न दिशाओं में पुनरावृत्त किया जाता है तो पूणर् जालक की उत्पिा होती है। एकक कोष्िठका के अभ्िालक्षण्िाक गुण निम्न हैं - ;पद्ध उसके तीनों किनारों की विमाओं ंए इ और ब के द्वारा, जो कि परस्पर लंबवत् हो भी सकते हैं अथवा नहीं भी। ;पपद्ध किनारों ;कोरोंद्ध के मध्य कोण α ;इ और ब के मध्यद्ध, β ;ं और ब के मध्यद्ध और γ ;ं और इ के मध्यद्ध के द्वारा। इस प्रकार एकक कोष्िठका छः पैरामीटरों - ंए इए बए α ए βऔर γद्वारा अभ्िालक्षण्िात होती है। प्रतिरूपी एकक कोष्िठका के इन पैरामीटरों को चित्रा 1.6 में दिखाया गया है। एकक कोष्िठका को विस्तृत रूप से दो संवगो± में बाँटा जा सकता है, आद्य एवं वेंफदि्रत एकक कोष्िठका। ;कद्धआद्य एकक कोष्िठका जब अवयवी कण एकक कोष्िठका के केवल कोनों पर उपस्िथत हों, तो उसे आद्य एकक कोष्िठका कहा जाता है। ;खद्ध वेंफदि्रत एकक कोष्िठका जब एकक कोष्िठका में एक अथवा अध्िक अवयवी कण, कोनों के अतिरिक्त अन्य स्िथतियों पर भी उपस्िथत होते हैं, तो उसे वेंफदि्रत एकक कोष्िठका कहते हैं। वेंफदि्रत एकक कोष्िठकाएं तीन प्रकार की होती हैं - ;पद्ध अंतःवेंफित एकक कोष्िठका - ऐसी एकक कोष्िठका में एक अवयवी कण ;परमाणु, अणु अथवा आयनद्ध कोनों में उपस्िथत कणों के अतिरिक्त उसके अंतः वेंफद्र में होता है। ;पपद्धपफलक - वेंफित एकक कोष्िठका - ऐसी एकक कोष्िठका में कोनों पर उपस्िथत अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण प्रत्येक पफलक के वेंफद्र पर भी होता है। ;पपपद्धअंत्य - वेंफित एकक कोष्िठका - ऐसी एकक कोष्िठका में कोनों पर उपस्िथत अवयवी कणों के अतिरिक्त एक अवयवी कण किन्हीं दो विपरीत पफलकों के वेंफद्र में पाया जाता है। वुफल सात प्रकार की आद्य एकक कोष्िठकाएं होती हैं ;चित्रा 1ण्7द्ध आद्य एकक कोष्िठकाएं तथा उनसे बनने वाली वेंफदि्रत एकक कोष्िठकाओं के अभ्िालक्षण सारणी 1ण्3 में सूचीब( हैं। चित्रा 1.7 - िस्टलों में सात प्रकार की आद्य एकक कोष्िठकाएं सारणी 1ण्3 - सात आद्य एकक कोष्िठकाएं और वेंफदि्रत सेलों के रूप में उनकी संभव विविध्ताएं िस्टल तंत्रा संभव अक्षीय दूरियाँ अक्षीय कोण उदाहरण विविध्ताएं अथवा कोर लंबाइर् घनीय आद्य, अंतःवेंफदि्रत ं त्र इ त्र ब छंब्सए यशद - ब्लैंड, ब्न पफलक वेंफदि्रत द्विसमलंबाक्ष आद्य अंतःवेंफदि्रत श्वेत - टिन, ैदव्2ए ज्पव्2ए ब्ंैव्4α त्रβ त्र γ त्र 90 ° ं त्र इ ≠ ब विषमलंबाक्ष आद्य, अंतःवेंफदि्रत, विषमलंबाक्ष गंध्क, ज्ञछव्3ए ठंैव्4 पफलक - वेंफदि्रत, अंत्य - वेंफदि्रत α त्रβ त्र γ त्र 90 ° ं ≠ इ ≠ ब α त्रβ त्र 90 °षट्कोणीय आद्यग्रैपफाइटए र्दव्एब्कै γत्र 120 ° ं त्र इ ≠ ब त्रिासमनताक्ष अथवा आद्य ं त्र इ त्र ब वैफलसाइट ;ब्ंब्व्3द्धए सिनबार ;भ्है द्ध ;त्रिाकोणीद्ध α त्रβ त्र γ ≠ 90 ° αत्रγत्र 90 °एकनताक्ष आद्य, अंत्य वेंफदि्रत एकनताक्ष गंध्क, छं2ैव्4ण्10भ्2व् β≠ 90 ° ं ≠ इ ≠ ब त्रिानताक्ष आद्य ज्ञ2ब्त2व्7ए ब्नैव्4ण् 5भ्2व्एα≠β≠γ≠ 90° ं ≠ इ ≠ ब भ्3ठव्3 14 प्रकार के ब्रेवे जालकों की एकक कोष्िठकाएं तीन घनीय जालक - सभी भुजाएं समान एवं सभी पफलकों के मध्य 90व कोण आद्य ;अथवा सरलद्ध अंतःवेंफदि्रत पफलक - वेंफदि्रत दो द्विसमलंबाक्ष जालक - लंबाइर् में एक भुजा अन्य दो से भ्िान्न एवं सभी पफलकों के मध्य 90व कोण आद्य अंतःवेंफदि्रत चार विषमलंबाक्ष जालक - असमान भुजाएंऋ सभी पफलकों के मध्य 90व कोण आद्य अंत्य - वेंफदि्रत अंतःवेंफदि्रत पफलक - वेंफदि्रत दो एकनताक्ष जालक - 90व से अध्िकअसमान भुजाएं दो पफलकों के मध्य कोण 90व से भ्िान्न है। 90व से कम आद्य अंत्य - वेंफदि्रत षट्कोणीय जालक - एक भुजा त्रिासमनताक्ष जालक - सभी त्रिानताक्ष जालक - असमान लंबाइर् में अन्य दो से भ्िान्न, दो भुजाएं समान लंबाइर्, दो पफलकों भुजाएं ंए इए बय ।ए ठए ब् पफलकों पर चिित कोण 60व है। पर कोण 90व से कम है। असमान कोण हैं जिनमें से कोइर् भी 90व का नहीं है। 1.5 एक एकक कोष्िठका में अवयवी कणों की संख्या 1.5.1 आद्य घनीय एकक कोष्िठका चित्रा 1.8 - एक सरल एकक कोष्िठका में प्रत्येक कोने का परमाणु 8 एकक कोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित हैं। हम जानते हैं कि कोइर् भी िस्टल जालक, एकक कोष्िठकाओं की अत्यिाक संख्या से बना होता है और प्रत्येक जालक बिंदु पर एक अवयवी कण ;परमाणु, अणु अथवा आयनद्ध रहता है। अब हम देखेंगे कि प्रत्येक अवयवी कण का कौन सा भाग एक विश्िाष्ट एकक कोष्िठका से संबंित है। हम तीन प्रकार के घनीय एकक कोष्िठकाओं पर विचार करेंगे और सरलता के लिए परमाणु को अवयवी कण मानेंगे। आद्य घनीय एकक कोष्िठका में परमाणु ;अथवा अवयवी कणद्ध केवल कोनों पर होते हैं। कोने का प्रत्येक परमाणु आठ निकटवतीर् एकक कोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित होता है जैसा चित्रा 1ण्8 में दिखाया गया है। चार एकक कोष्िठकाएं समान परत में और चार एकक कोष्िठकाएं ऊपरी ;अथवा निचलीद्ध परत की होती हैं, अतः वास्तव में एक परमाणु 1;अथवा अणु अथवा आयनद्ध का वाँ भाग एक विश्िाष्ट एकक कोष्िठका से संबंध्ित8 रहता है। चित्रा 1ण्9 में एक आद्य घनीय एकक कोष्िठका को तीन भ्िान्न प्रकारों से चित्रिात किया गया है। चित्रा 1ण्9 ;कद्ध में प्रत्येक छोटा गोला, उस स्िथति पर उपस्िथत कण के केवल केंद्र को निरूपित करता है, उसके वास्तविक आकार को नहीं। ऐसी संरचनाओं को विवृत संरचनाएं कहा जाता है। विवृत संरचनाओं में कणों की व्यवस्था को समझना आसान है। चित्रा 1ण्9 ;खद्ध एकक कोष्िठका के दिव्फस्थान - भराव निरूपण को कणों के वास्तविक आकार के साथ चित्रिात करता है तथा चित्रा 1ण्9 ;गद्ध एक घनीय एकक कोष्िठका में उपस्िथत विभ्िान्न परमाणुओं के वास्तविक भागों को दशार्ता है। चूँकि वुफल मिलाकर प्रत्येक घनीय एकक कोष्िठका में उसके कोनों पर 8 परमाणु 1हैं, अतः एक एकक कोष्िठका में परमाणुओं की वुफल संख्या 8 ×त्र1 परमाणु होगी।8 चित्रा 1.9 - एक आद्य घनीय एकक कोष्िठका ;कद्धविवृत संरचना, ;खद्ध दिव्फस्थान - भराव संरचना, ;गद्धएक एकक कोष्िठका से संबंध्ित परमाणुओं के वास्तविक भाग 1.5.2 अंतःवेंफदि्रत घनीय एकक कोष्िठका ;कद्ध ;खद्ध ;गद्ध एक अंतःवेंफदि्रत घनीय ;इबबद्ध एकक कोष्िठका में एक परमाणु उसके प्रत्येक कोने पर और इसके अतिरिक्त एक परमाणु उसके अंतः वेंफद्र में भी होता है। चित्रा 1ण्10 अंतःवेंफदि्रत घनीय एकक कोष्िठका की - ;कद्ध विवृत संरचना, ;खद्ध दिकस्थान - भराव माॅडल और ;गद्ध एक एकक कोष्िठका को वास्तविक रूप से संबंध्ित परमाणुओं के भागों के साथ दशार्ता है। यहाँ यह देखा जा सकता है कि अंतःवेंफद्र का परमाणु पूणर्तया उस एकक कोष्िठका से संबंध्ित होता है जिसमें वह उपस्िथत होता है। इस प्रकार से एक अंतःवेंफदि्रत एकक कोष्िठका में - चित्रा 1.10 - एक अंतः वेंफदि्रत घनीय एकक कोष्िठका ;कद्धविवृत संरचना, ;खद्ध दिव्फस्थान - भराव संरचना, ;गद्धएक एकक कोष्िठका से संबंध्ित परमाणुओं के वास्तविक भाग ;कद्ध ;खद्ध ;गद्ध 1 1;पद्ध 8 कोने प्रति कोना परमाणु त्र 8 × त्र 1 परमाणु × 88 1.5.3 पफलक - वंेफदि्रत घनीय एकक कोष्िठका 1 8चित्रा 1.11 - एकक कोष्िठका के ;पपद्ध 1 अंतः केंद्र परमाणु त्र 1 ×1 त्र 1 परमाणु ∴ प्रति एकक कोष्िठका में परमाणुओं की वुफल संख्या त्र 2 परमाणु पफलक - वेंफदि्रत घनीय ;बिबद्ध एकक कोष्िठका में परमाणु सभी कोनों पर और घन के सभी पफलकों के वेंफद्रों पर पाए जाते हैं। चित्रा 1ण्11 में देखा जा सकता है कि पफलक वेंफद्र पर उपस्िथत प्रत्येक परमाणु दो निकटवतीर् एकक कोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित होता है। प्रत्येक पफलक के वेंफद्र पर उपस्िथत परमाणु दो सन्िनकट कोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित होता है तथा प्रत्येक परमाणु का केवल ) भाग एक एकक कोष्िठका में सम्िमलित होता है। चित्रा 1ण्12 में पफलक - वेंफदि्रत एकक कोष्िठका की - ;कद्ध विवृत संरचना, ;खद्ध दिव्फस्थान - भराव माॅडल और ;गद्ध एक एकक कोष्िठका को वास्तविक रूप से संबंध्ित परमाणुओं के भागों के साथ दशार्या गया है। 1परमाणु प्रति एकक कोष्िठका त्र8 ×पफलक वेंफद्र पर एक× द्ध 8 कोने के परमाणुप; 8परमाणु दो एकक त्र 1 परमाणुकोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित है। 11 ;पपद्ध 6 पफलक - वेंफदि्रत परमाणु×परमाणु प्रति एकक कोष्िठका त्र 6 × 22 त्र 3 परमाणु ∴ प्रति एकक कोष्िठका परमाणुओं की वुफल संख्या त्र 1़3त्र4 परमाणु चित्रा 1.12 - एक पफलक - वेंफदि्रत घनीय एकक कोष्िठका ;कद्ध विवृत संरचना, ;खद्ध दिव्फस्थान - भराव संरचना, ;गद्धएक एकक कोष्िठका से संबंध्ित अणुओं के वास्तविक भाग। ;कद्ध ;खद्ध ;गद्ध पाठ्यनिहित प्रश्न 1ण्10 ‘जालक बिंदु’ से आप क्या समझते हैं? 1ण्11 एकक कोष्िठका को अभ्िालक्षण्िात करने वाले पैरामीटरों के नाम बताइए। 1ण्12 निम्नलिख्िात में विभेद कीजिए। ;पद्धषट्कोणीय और एकनताक्ष एकक कोष्िठका ;पपद्धपफलक वेंफदि्रत और अंत्य - वेंफदि्रत एकक कोष्िठका। 1ण्13 स्पष्ट कीजिए कि एक घनीय एकक कोष्िठका के - ;पद्ध कोने और ;पपद्ध अंतःवेंफद्र पर उपस्िथत परमाणु का कितना भाग सन्िनकट कोष्िठका से सहभाजित होता है। 1.6 निविड संकुुु ठोसों में, अवयवी कण निविड संवुफलित होते हैं तथा उनके मध्य न्यूनतम रिक्त स्थान होतालित है। आइए, हम अवयवी कणों को समरूप कठोर गोले मानते हुए तीन पदों में त्रिाविमीय संरचनासंरचनाएं को निमिर्त करें। ;कद्ध एक विमा में निविड संवुफलन एकविमीय निविड संवुफलित संरचना में गोलों को व्यवस्िथत करने की केवल एक विध्ि है, चित्रा 1.13 - एक विमा में गोलों का चित्रा 1.14 - द्विविम में निविड संवुफलन जिसमें उन्हें एक पंक्ित में एक - दूसरे को स्पशर् करते हुए व्यवस्िथत किया जाता है ;चित्रा 1ण्13द्ध। इस व्यवस्था में, प्रत्येक गोला दो निकटवतीर् गोलों के संपवर्फ में होता है। एक कण के निकटतम गोलों की संख्या को उसकी उपसहसंयोजन संख्या कहा जाता है। इस प्रकार एकविमीय निविड संवुफलित व्यवस्था में उपसहसंयोजन संख्या दो हैं। । । ;खद्ध द्विविमा में निविड संवुफलन । द्विविमीय निविड संवुफलित संरचना, निविड संवुफलित गोलों की पंक्ितयों को एक साथ । व्यवस्िथत करके ;रखकरद्ध जनित की जा सकती है। इसे दो भ्िान्न प्रकार से किया जा सकता ;कद्ध है। ;पद्ध द्वितीय पंक्ित को प्रथम के संपवर्फ में इस प्रकार रखा जा सकता है कि द्वितीय पंक्ित ठ । ठ के गोले प्रथम पंक्ित के गोलों के ठीक ऊपर हों एवं दोनों पंक्ितयों के गोले क्षैतिजीय तथा साथ ही ऊध्वार्ध्र रूप से संरेख्िात हों। यदि प्रथम पंक्ित को हम श्।श् प्रकार की । पंक्ित कहते हैं तो द्वितीय पंक्ित प्रथम पंक्ित के ठीक समान होने से, वह भी श्।श् प्रकार ;खद्ध की होगी। इसी प्रकार से अध्िक पंक्ितयों को रखकर ।।। प्रकार की व्यवस्था प्राप्त की जा सकती है जैसा कि चित्रा 1ण्14;कद्ध में दिखाया गया है। ;कद्ध वगर् निविड संवुफलन इस व्यवस्था में, प्रत्येक गोला चार निकटवतीर् गोलों के संपवर्फ में रहता है। इस प्रकार ;खद्ध गोलों का षट्कोणीय द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या चार है। साथ ही यदि इन सन्िनकट चार गोलों के केंद्रों निविड संवुफलन को जोड़ा जाए तो एक वगर् प्राप्त होता है। अतः इस संवुफलन को द्विविम में वगर् निविड संवुफलन कहा जाता है। ;पपद्ध द्वितीय पंक्ित को प्रथम के ऊपर सांतरित रूप से इस प्रकार रखा जा सकता है कि उसके गोले प्रथम पंक्ित के अवनमनों में ठीक आ जाएं। यदि प्रथम पंक्ित के गोलों । । । । चित्रा 1.15 - ।।।ण्ण्ण्व्यवस्था से बनने वाला सरल घनीय जालक की व्यवस्था को श्।श् प्रकार कहा जाए तो द्वितीय पंक्ित जो कि भ्िान्न है, उसे श्ठश् प्रकार कहा जा सकता है। जब तृतीय पंक्ित को द्वितीय के निकट सांतरित रूप से रखा जाता है तो उसके गोले प्रथम तल के गोलों से संरेख्िात होते हैं। अतः यह तल भी श्।श् प्रकार का है। इसी प्रकार से रखे गए चैथी पंक्ित के गोले द्वितीय पंक्ित ;श्ठश् प्रकारद्ध से संरेख्िात होते हैं। अतः यह व्यवस्था ।ठ।ठ प्रकार की है। इस व्यवस्था में मुक्त स्थान कम होता है और इसमें संवुफलन, वगर् निविड संवुफलन से अध्िक दक्ष है। प्रत्येक गोला छः निकटवतीर् गोलों के संपवर्फ में रहता है और द्विविमीय उपसहसंयोजन संख्या छः है। इन छः गोलों के वेंफद्र सम - षट्कोण के कोनों पर हैं ;चित्रा 1ण्14 खद्ध। इस प्रकार इस संवुफलन को द्विविम षट्कोणीय निविड संवुफलन कहा जाता है। चित्रा 1ण्14 ;खद्ध में यह देखा जा सकता है कि इस तल में वुफछ रिक्ितयाँ ;रिक्त स्थानद्ध हैं। यह त्रिाकोणीय आकृति की हैं। त्रिाकोणीय रिक्ितयाँ दो प्रकार की हैं। एक पंक्ित में त्रिाकोण का शीषर् ऊध्वर्मुखी और अगली पंक्ित में अधेमुखी है। ;गद्ध त्रिाविमा में निविड संवुफलन सभी वास्तविक संरचनाएं त्रिाविम संरचनाएं होती हैं। यह द्विविमीय परतों को एक - दूसरे के ऊपर रखने से प्राप्त की जा सकती हैं। पिछले खंड में हमने द्विविम में निविड संवुफलन की विवेचना की जो कि दो प्रकार की हो सकती हैऋ वगर् निविड संवुफलित और षट्कोणीय निविड संवुफलित। आइए, हम देखते हैं कि इनसे कितने प्रकार के त्रिाविमीय निविड संवुफलन प्राप्त किए जा सकते हैं। ;पद्ध द्विविम वगर् निविड संवुफलित परतों से त्रिाविम निविड संवुफलन - जब द्वितीय वगर् निविड संवुफलित परत को प्रथम के ऊपर रखा जाता है तब हम उसी नियम का अनुपालन करते हैं जिसका पालन हमने एक पंक्ित को दूसरी के निकट रखने में किया था। द्वितीय परत को प्रथम परत के ऊपर इस प्रकार रखा जाता है कि ऊपरी परत के गोले प्रथम परत के गोलों के ठीक ऊपर रहें। इस व्यवस्था में दोनों परतों के गोले पूणर्तया क्षैतिज तथा साथ ही ऊध्वार्ध्र रूप से सीध् में होते हैं जैसा चित्रा 1ण्15 में दिखाया गया है। इसी प्रकार से हम और परतों को एक - दूसरे के ऊपर रख सकते हैं। यदि प्रथम परत के गोलों की व्यवस्था को श्।श् प्रकार कहा जाए तो सभी परतों में समान व्यवस्था होती है। इस प्रकार इस जालक में ।।। प्रकार का पैटनर् है। इस प्रकार जनित होने वाला जालक सामान्य घनीय जालक और उसकी एकक कोष्िठका आद्य - घनीय एकक कोष्िठका है ;चित्रा 1ण्9द्ध। ;पपद्धद्विविम - षट्कोणीय निविड संवुफलित परतों से त्रिाविम निविड संवुफलन - इसमें परतों को एक - दूसरे पर रखकर त्रिाविमीय निविड संवुफलित संरचना निम्न प्रकार से जनित की जा सकती है। ;कद्ध द्वितीय परत को प्रथम के ऊपर रखना - आइए, हम एक द्विविम - षट्कोणीय निविड संवुफलित परत श्।श् लेते हैं और एक वैसी ही परत उसके ऊपर इस प्रकार रखते हैं कि द्वितीय परत के गोले प्रथम परत के अवनमनों में आ जाते हैं। चूँकि दो परतों के गोले भ्िान्न प्रकार से संरेख्िात हैं, अतः द्वितीय परत को हम ठ परत कहते हैं। यह चित्रा 1ण्16 में देखा जा सकता है कि प्रथम परत की सभी त्रिाकोणीय रिक्ितयाँ द्वितीय परत के गोलों से आवृत नहीं हैं। इससे अलग - अलग व्यवस्थाओं की उत्पिा होती है। जब भी द्वितीय परत का एक गोला प्रथम परत की रिक्ित के ऊपर होता है ;अथवा विलोमतःद्ध तब एक चतुष्पफलकीय रिक्ित बनती है। इन रिक्ितयों को चतुष्पफलकीय रिक्ितयाँ कहते हैं क्योंकि जब इन चार गोलों के वेंफद्रों को मिलाया जाता है तब एक चतुष्पफलक बनता है। इन्हें चित्रा 1ण्16 में श्ज्श् से अंकित किया गया है। ऐसी एक रिक्ित को अलग से चित्रा 1ण्17 में दिखाया गया है। चित्रा 1.16 - निविड संवुफलित गोलों की दो परतों का एक स्तंभ और उनमें जनित चतुष्पफलकीयचतुष्पफलकीयहोने वाली रिक्ितयाँ। रिक्ितरिक्ित ज् त्र चतुष्पफलकीय रिक्ित व्त्र अष्टपफलकीय रिक्ित चतुष्पफलक अष्टपफलकीयचित्रा 1.17 - चतुष्पफलकीय और अष्टपफलकीय रिक्ितयाँ रिक्ित;कद्ध ऊपरी दृश्य अष्टपफलकीय रिक्ित;खद्ध खंडित पाश्वर् दृश्य ;गद्ध रिक्ित का ज्यामितीय आकार अष्टपफलक ;कद्ध ;खद्ध ;गद्ध अन्य स्थानों पर, द्वितीय परत की त्रिाकोणीय रिक्ितयाँ, प्रथम परत की त्रिाकोणीय रिक्ितयों के ऊपर हैं और इनकी त्रिाकोणीय आकृतियाँ अतिव्यापित नहीं होतीं। उनमें से एक में त्रिाकोण का शीषर् ऊध्वर्मुखी और दूसरे में अधोमुखी होता है। इन रिक्ितयों को चित्रा 1ण्16 में श्व्श् से अंकित किया गया है। ऐसी रिक्ितयाँ छः गोलों से घ्िारी होती हैं और इन्हें अष्टपफलकीय रिक्ितयाँ कहा जाता है। ऐसी एक रिक्ित को अलग से चित्रा 1ण्17 में दिखाया गया है। इन दोनों प्रकार की रिक्ितयों की संख्या निविड संवुफलित गोलों की संख्या पर निभर्र करती है। माना कि निविड संवुफलित गोलों की संख्या छ है, तब - जनित अष्टपफलकीय रिक्ितयों की संख्या त्र छ जनित चतुष्पफलकीय रिक्ितयों की संख्या त्र 2छ ;खद्ध तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखना - जब तृतीय परत को द्वितीय परत पर रखा जाता है, तब दो संभावनाएं होती हैं। ;पद्ध चतुष्पफलकीय रिक्ितयों का आच्छादन - द्वितीय परत की चतुष्पफलकीय रिक्ितयों को तृतीय परत के गोलों द्वारा आच्छादित किया जा सकता है। इस स्िथति में तृतीय परत के गोले प्रथम परत के गोलों के साथ पूणर्तः संरेख्िात होते हैं। इस प्रकार गोलों का पैटनर् एकांतर परतों में पुनरावृत्त होता है। इस पैटनर् को प्रायः ।ठ।ठण्ण्ण् पैटनर् लिखा जाता है। इस संरचना को षट्कोणीय निविड संवुफलित ;ीबचद्ध संरचना कहते हैं ;चित्रा 1ण्18द्ध। इस प्रकार की परमाणुओं की व्यवस्था कइर् धतुओं जैसे मैग्नीश्िायम और िांक में पाइर् जाती है। ठ । ठ । । ब् ठ ठ । ब् । । चित्रा 1.18 - ;कद्ध षट्कोणीय घनीय निविड संवुफलन का खंडित दृश्य गोलों ठ ठ षट्कोणीय ;खद्ध घनीय की परतों का संवुफलन दशार्ते हुए। । । ;खद्ध प्रत्येक स्िथति में चार परतें स्तंभ के रूप में ;गद्ध संवुफलन की ज्यामिति षट्कोणीय संवुफलन घनीय निविड संवुफलन षट्कोणीय निविड संवुफलित पफलक - वेंफदि्रत घनीय ;बिबद्ध ;ीबचद्ध ;कद्ध ;गद्ध ;पपद्ध अष्टपफलकीय रिक्ितयों का आच्छादन - तीसरी परत दूसरी परत के ऊपर इस प्रकार रख सकते हैं कि उसके गोले अष्टपफलकीय रिक्ितयों को आच्छादित करते हों। इस प्रकार से रखने पर तीसरी परत के गोले प्रथम अथवा द्वितीय किसी भी परत के साथ संरेख्िात नहीं होते। इस व्यवस्था को श्ब्श् प्रकार कहा जाता है। केवल चैथी परत रखने पर, उसके गोले प्रथम परत के गोलों के साथ संरेख्िात होते हैं जैसा चित्रा 1ण्18 और 1ण्19 में दिखाया गया है। । ब् चित्रा 1.19 - ;कद्ध परतों की ।ठब्।ठब्ण्ण्ण् व्यवस्था जब अष्टपफलकीय रिक्ितयाँ आच्छादित होती हैं। ;खद्ध इस व्यवस्था द्वारा निमिर्त होने वाली संरचना ठ का अंश जिसके परिणामस्वरूप घनीय निविड संवुफलित ;बबचद्ध अथवा पफलक - वेंफदि्रत घनीय ;बिबद्ध संरचना बनती है। । ;कद्ध ;खद्ध इस प्रकार के पैटनर् को प्रायः ।ठब्।ठब्ण्ण्ण् लिखा जाता है। इस संरचना को घनीय निविड संवुफलित संरचना ;बबचद्ध अथवा पफलक वेंफदि्रत घनीय ;बिबद्ध संरचना कहा जाता है। धतु, जैसे - ताँबा तथा चाँदी इस संरचना में िस्टलित होते हैं। 1.6.1 यौगिक का सूत्रा और संपूरित रिक्ितयों की संख्या ये दोनों प्रकार के निविड संवुफलन अति उच्च क्षमता वाले होते हैं और िस्टल का 74ः स्थान संपूरित रहता है। इन दोनों में, प्रत्येक गोला बारह गोलों के संपवर्फ में रहता है। इस प्रकार इन दोनों संरचनाओं में उपसहसंयोजन संख्या 12 है। हमने इससे पहले के खंड में सीखा कि जब कणों के निविड संवुफलन से बबच अथवा ीबच संरचना बनती है तो दो प्रकार की रिक्ितयाँ जनित होती हैं तथा जालक में उपस्िथत अष्टपफलकीय रिक्ितयों की संख्या निविड संवुफलित कणों की संख्या के बराबर होती है, जबकि जनित चतुष्पफलकीय रिक्ितयों की संख्या इस संख्या की द्विगुनी होती है। आयनी ठोसों में बृहत आयन ;साधरणतः ट्टणायनद्ध निविड संवुफलित संरचना बनाते हैं और लघुतर आयन ;साधरणतः ध्नायनद्ध रिक्ितयों में भरते हैं। यदि धनायन पयार्प्त लघु हों तब चतुष्पफलकीय रिक्ितयाँ और यदि वृहत हों तो अष्टपफलकीय रिक्ितयाँ अध्यासित होती हैं। सभी चतुष्पफलकीय अथवा अष्टपफलकीय रिक्ितयाँ अध्यासित नहीं होती। किसी दिए गए यौगिक में अष्टपफलकीय अथवा चतुष्पफलकीय रिक्ितयों का अध्यासित होने वाला अंश यौगिक के रासायनिक सूत्रा पर निभर्र करता है, जिसे निम्नलिख्िात उदाहरणों में देखा जा सकता है। 1.7 संकुलन क्षमता 1.7.1 ीबच और बबच संरचनाओं में संवुफलन क्षमता अवयवी कणों ;परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनोंद्ध के किसी भी प्रकार से संवुफलित होने पर, रिक्ितयों के रूप में वुफछ मुक्त स्थान सवर्दा रहता है। संवुफलन क्षमता वुफल उपलब्ध स्थान का वह प्रतिशत है जो कणों द्वारा संपूरित होता है। आइए, हम विभ्िान्न प्रकार की संरचनाओं में संवुफलन क्षमता का परिकलन करें। दोनांे प्रकार के निविड संवुफलन ;ीबच और बबचद्ध समान क्षमता वाले हैं। आइए, बबच संरचना में संवुफलन क्षमता का परिकलन करें। चित्रा 1ण्20 में, यदि एकक कोष्िठका के कोर ;म्कहम या किनाराद्ध की लंबाइर् श्ंश् हो तथा पफलक विकणर् ।ब् त्र इ हो, तो चतुष्फलकीय और अष्टफलकीय रिक्ितयों का स्थान निधर्ारित करना हम जानते हैं कि निविड संवुफलित संरचनाओं में चतुष्पफलकीय और अष्टपफलकीय, दोनों प्रकार की रिक्ितयाँ होती हैं। आइए, हम बबच ;अथवा बिबद्ध संरचना लेकर उसमें इन रिक्ितयों का स्थान निधर्रित करते हैं। ;कद्ध चतुष्पफलकीय रिक्ितयों का स्थान निधर्रित करना आइए, हम बबच अथवा बिब जालक की एकक कोष्िठका पर विचार करते हैं ;चित्रा 1 कद्ध।एकक कोष्िठका को आठ लघु घनों में विभाजित करते हैं। प्रत्येक लघु घन में परमाणु एकांतर कोनों पर हैं ;चित्रा 1 कद्ध। वुफल ;कद्ध ;खद्ध मिलाकर, प्रत्येक लघु घन में 4 परमाणु हैं। एक - दूसरे से जोड़ने पर यह एक समचतुष्पफलक बनाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक लघु घन में एक चतुष्पफलकीय चित्रा 1 - ;कद्ध बबच संरचना के रिक्ित है और वुफल आठ चतुष्पफलकीय रिक्ितयाँ हैं। बबच संरचना के एक प्रति एकक कोष्िठका में एकक कोष्िठका के आठों लघु घनों में से प्रत्येक में एक रिक्ित है। हम8 चतुष्पफलकीय रिक्ितयाँ जानते हैं कि बबच संरचना में प्रति एकक कोष्िठका में 4 परमाणु होते हैं। ;खद्ध एक चतुष्पफलकीय इस प्रकार चतुष्पफलकीय रिक्ितयों की संख्या परमाणुओं की संख्या से दोगुनी रिक्ित ज्यामिती प्रद£शत होती है।करते हुए। ;खद्ध अष्टपफलकीय रिक्ितयों का स्थान निधर्रित करना अब हम पुनः बबच अथवा बिब जालक की एकक कोष्िठका पर विचार करते हैं ;चित्रा 2 कद्ध। घन का अंतःवेंफद्र अध्यासित नहीं है लेकिन यह पफलक वेंफद्रों पर स्िथत छः परमाणुओं से घ्िारा है। यदि इन पफलक वेंफद्रों को ∴जोड़ा जाए तो एक अष्टपफलक जनित होता है। अतः इस एकक कोष्िठका में एक अष्टपफलकीय रिक्ित घन के अंतः वेंफद्र पर है। ;कद्ध अंतः वेंफद्र के अतिरिक्त, 12 किनारों में से प्रत्येक के वेंफद्र में एक अष्टपफलकीय रिक्ित है ;चित्रा 2 खद्ध। यह छः परमाणुओं से घ्िारा रहता है, जिनमें चार उसी एकक कोष्िठका से ;2 कोनों पर और 2 पफलक वेंफद्र परद्ध और दो निकटवतीर् एकक कोष्िठकाओं से संबंध्ित होते हैं। चूँकि घन का प्रत्येक किनारा चार निकटवतीर् एकक कोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित होता है, इसी प्रकार उस पर स्िथत अष्टपफलकीय रिक्ित भी सहभाजित होती है। प्रत्येक रिक्ित का केवल 1ध्4 भाग ही एक विश्िाष्ट एकक कोष्िठका से ;खद्ध संबंध्ित होता है। इस प्रकार घनीय सुसंवुफलित संरचना में घन के अंतः वेंफद्र पर अष्टपफलकीय रिक्ित त्र 1 चित्रा 2 - बबच अथवा बिब जालक में प्रति 12 अष्टपफलकीय रिक्ितयाँ प्रत्येक किनारे पर स्िथत हैं और चार एककएकक कोष्िठका में अष्टपफलकीय रिक्ितयों की स्िथति का निधर्रण 1कोष्िठकाओं के मध्य सहभाजित हैं त्र 12 ×त्र 3 ;कद्ध घन के अंतःवेंफद्र पर 4 ;खद्ध प्रत्येक कोर ;मकहमद्ध के वुफल अष्टपफलकीय रिक्ितयों की संख्या त्र4 वेंफद्र पर ;केवल एक ऐसी रिक्ित हम जानते हैं कि बबच संरचना में प्रत्येक एकक कोष्िठका में 4 परमाणु होतेको प्रद£शत किया गया हैद्ध हैं। इस प्रकार अष्टपफलकीय रिक्ितयों की संख्या इस संख्या के बराबर है। चित्रा 1.20 - घनीय निविड संवुफलित संरचना स्पष्ट करने हेतु दूसरे कोरों में गोलकों को नहीं रखा गया है। 1.7.2 अंतःवेंफदि्रत ध्नीय संरचनाओं में संवुफलन क्षमता चित्रा 1.21 - अंत्य - वेंफदि्रत घनीय एकक कोष्िठका ;काय विकणर् पर उपस्िथत गोलों को ठोस परिसीमा द्वारा दशार्या गया हैद्ध। रसायन विज्ञान 18 Δ ।ठब् में, ।ब्2 त्र इ2 त्र ठब्2 ़ ।ठ2 त्र ं2़ं2 त्र 2ं2 या इ त्र यदि गोले का अध्र्व्यास त हो, तो इ त्र4त त्र 2 ं या ं त्र 4त त्र 2 2 त 2 ं;हम ऐसे भी लिख सकते हैं, त त्र द्ध22 हम जानते हैं कि बबच संरचना में प्रभावी रूप से, प्रति एकक कोष्िठका 4 गोले होते हैं। चार गोलों का वुफल आयतन 4 ×;4ध्3 द्धπत3 के बराबर होता है और 3घन का आयतन ं3 या ;2 2तद्ध होता है। अतः एकक कोि ष्ठका मेंचारांेगालोंद्वारा अध्यासित आयतन ×100 सवंफलन क्षमता ुत्र ः एकक कोुष्िठका का वफल आयतन 4 ×;4ध्3 द्धπत3 ×100 त्र: ;2 2त द्ध3 ;16ध्3 द्धπत3 ×100 त्र ः त्र 74ः 16 2त 3 चित्रा 1ण्21 से यह स्पष्ट है कि केंद्र पर स्िथत परमाणु विकणर् पर व्यवस्िथत अन्य दो परमाणुओं के संपवर्फ में हैं। Δ म्थ्क् म,ें222 2इ त्र ं ़ ं त्र 2ं इ त्र 2ं अब Δ ।थ्क् म,ें 22222 2 ब त्र ं ़ इ त्र ं ़ 2ं त्र 3ं ब त्र 3ं काय विकणर् श्बश् की लंबाइर् 4त के बराबर है, जहाँ त गोले ;परमाणुद्ध का अधर्व्यास है, क्योंकि विकणर् पर उपस्िथत तीनों गोले एक - दूसरे के संपवर्फ में हैं। अतः अतः यह भी लिख सकते हैं कि, त त्र 3ं 4 1.7.3 सरल घनीय जालक में संवुफलन क्षमता 4 π 3 त 3 ×100 8त 3 चित्रा 1.22 - सरल घनीय एकक कोष्िठका। घन के कोर की दिशा में गोले एक - दूसरे के संपवर्फ में हैं। 1.8 एकक कोष्िठका विमा संबंधी गणनाएं इस प्रकार की संरचना में परमाणु की वुफल संख्या 2 है तथा उनका आयतन 2 ×;4ध्3द्धπत3 है ⎛ 4 ⎞33 ⎛ 4 ⎞3 त ं तघन का आयतन ं3ए ⎜⎟ के बराबर होगा अथवा त्र ⎜⎟ अतः ⎝ 3 ⎠ ⎝ 3 ⎠एकक कोेदो गोेद्वारा अध्यासित आयतन × 100ष्िठका मं लांसवं फलन क्षमताुत्र ः एकक कोुष्िठका का वफल आयतन 32 ×;4ध्3द्धπत × 100 त्र ः3;4ध् 3द्धत 3;8ध्3द्धπत × 100 त्र ः त्र 68ः 364ध् 3; 3द्ध त एक सरल घनीय जालक में परमाणु केवल घन के कोनों पर उपस्िथत होते हैं। घन के किनारों ;कोरोंद्ध पर कण एक - दूसरे के सम्पवर्फ में होते हैं। ;चित्रा 1ण्22द्ध। इसलिए घन के कोर अथवा भुजा की लंबाइर् श्ंश् और प्रत्येक कण का अधर्व्यास, त निम्न प्रकार से संबंध्ित है - ं त्र 2त घनीय एकक कोष्िठका का आयतन त्र ं3 त्र ;2तद्ध3 त्र 8त3 चूँकि सरल घनीय एकक कोष्िठका में केवल 1 परमाणु होता है। अतः 43अध्यासित दिव्फस्थान का आयतन त्र πत 3 एक परमाणु का आयतन ∴ संवुफलन क्षमता त्र ×100: घनीय एकक कोष्िठका का आयतन त्र π त्र × 100 6 त्र 52ण्36ः त्र 52ण्4: इस प्रकार हम निष्कषर् निकाल सकते हैं कि बबच और ीबच संरचनाओं में अिाकतम संवुफलन क्षमता है। एकक कोष्िठका विमाओं की सहायता से एकक कोष्िठका के आयतन की गणना करना संभव है। धतु का घनत्व ज्ञात होने पर हम एकक कोष्िठका के परमाणुओं के द्रव्यमान की गणना कर सकते हैं। एक परमाणु का द्रव्यमान ज्ञात होने पर आवोगाद्रो स्िथरांक का मान प्राप्त करने की परिशु( वििा मिल जाती है। माना कि एक्स - किरण विवतर्न से ज्ञात घनीय िस्टल की एकक कोष्िठका के कोर की लंबाइर् ं, ठोस पदाथर् का घनत्व क तथा मोलर द्रव्यमान ड है। तब घनीय िस्टल में - एकक कोष्िठका का आयतन त्र ं3 एकक कोष्िठका एकक कोष्िठका में एक परमाणु का त्र ×त्र ्र × उका द्रव्यमान परमाणु की संख्या द्रव्यमान ;यहाँ ्र एक एकक कोष्िठका में उपस्िथत परमाणुओं की संख्या है तथा उ एक परमाणु का द्रव्यमान है।द्ध एकक कोष्िठका में उपस्िथत एक परमाणु का द्रव्यमान - उ त्रड ;ड मोलर द्रव्यमान हैद्ध छ। एकक कोि ष्ठका का दव्यमान ्रअतः एकक कोकत्र ष्िठका का घनत्व, एकक कोष्िठका का आयतन ्रण्उ त्र 3 ं ्रण्ड त्र ं 3ण्छ । या कत्र ्रड 3छ।ं याद रहे कि एकक कोष्िठका एवं पदाथर् का घनत्व बराबर होता है। ठोस पदाथर् का घनत्व अन्य विध्ियों से भी निकाला जा सकता है। पाँच पैरामीटरों ;कए ्रए डए ंए तथा छ।द्ध में से यदि कोइर् भी चार ज्ञात हों, तो पाँचवें को ज्ञात किया जा सकता है। 1.9 ठोसों में अपूणर्ताएं 1.9.1 बिंदु दोषों के प्रकार चित्रा 1.23 - रिक्ितका दोष चित्रा 1.24 - अंतराकाशी दोष चित्रा 1.25 - प्रेंफकेल दोष यद्यपि िस्टलीय ठोसों के अवयवी कणों की व्यवस्था में लघु परास के साथ - साथ दीघर् परास क्रम भी होता है, पिफर भी िस्टल परिपूणर् नहीं होते। साधरणतः ठोस अत्यध्िक संख्या में लघु िस्टलों का पुंज होता है। इन लघु िस्टलों में दोष होते हैं। यह तब होता है जब िस्टलीकरण की प्रिया तीव्र अथवा साधरण गति से होती है। जब िस्टलीकरण की प्रिया अत्यंत मंद गति से होती है तब एकल िस्टल बनता है। ये िस्टल भी दोषमुक्त नहीं होते। ये दोष मूलतः अवयवी कणों की व्यवस्था में अनियमितताएं हैं। व्यापक रूप से ये दोष दो प्रकार के होते हैं यानी बिंदु दोष और रेखीय दोष । एक िस्टलीय पदाथर् में एक बिंदु अथवा एक परमाणु के चारों ओर की आदशर् व्यवस्था में अनियमितताएं अथवा विचलन, बिंदु दोष होते हंै, जबकि जालक बिंदुओं की पूणर् पंक्ितयों की आदशर् व्यवस्था में अनियमितताएं अथवा विचलन रेखीय दोष होते हैं। इन अनियमितताओं को िस्टल दोष कहते हैं। हम अपना विवेचन केवल बिंदु दोष तक ही सीमित रखेंगे। बिंदु दोषों को तीन प्रकारों में वगीर्कृत किया जा सकता है - ;कद्धस्टाॅइकियोमीट्री दोष ;खद्ध अशु(ता दोष और ;गद्ध नानस्टाॅइकियोमीट्री दोष। ;कद्धस्टाॅइकियोमीट्री दोष ये वे बिंदु दोष हैं जो ठोस की स्टाॅइकियोमीट्री को विक्षुब्ध् नहीं करते। इन्हें आंतर अथवा ऊष्मागतिकी दोष भी कहा जाता है। आधरभूत रूप से यह दो प्रकार के होते हैं। रिक्ितका दोष और अंतराकाशी दोष। ;पद्धरिक्ितका दोष - जब वुफछ जालक स्थल रिक्त हों, तब कहा जाता है कि िस्टल में रिक्ितका दोष है ;चित्रा 1ण्23द्ध। यह पदाथर् के घनत्व को कम कर देता है। पदाथर् को गरम करने पर भी इस प्रकार का दोष उत्पन्न हो सकता है। ;पपद्धअंतराकाशी दोष - जब वुफछ अवयवी कण ;परमाणु अथवा अणुद्ध अंतराकाशी स्थल पर पाए जाते हैं, तब कहा जाता है कि िस्टल में अंतराकाशी दोष है ;चित्रा 1ण्24द्ध यह दोष पदाथर् के घनत्व को बढ़ाता है। ऊपर समझाए गए रिक्ितका और अंतराकाशी दोष अनआयनिक ;दवद.पवदपबद्ध ठोसों में दिखाइर् पड़ते हैं। आयनिक ठोसों में सदैव विद्युत उदासीनता बनी रहनी चाहिए। यह इन दोषों को सरल रिक्ितका अथवा अंतराकाशी दोषों की बजाय, प्रेफंकेल और शाॅट्की दोषों की तरह दिखाते हैं। ;पपपद्ध प्रेंफकेल दोष - यह दोष आयनिक ठोसों द्वारा दिखाया जाता है। लघुतर आयन ;साधारणतः ध्नायनद्ध अपने वास्तविक स्थान से विस्थापित होकर अन्तराकाश स्थान में चला जाता है ;चित्रा 1ण्25द्ध। यह वास्तविक स्थान पर रिक्ितका दोष और नए स्थान पर अंतराकाशी दोष उत्पन्न करता है। प्रेंफकेल दोष को विस्थापन दोष भी कहते हैं। यह ठोस के घनत्व को परिवतिर्त नहीं करता। प्रेंफकेल दोष उन आयनिक पदाथर् द्वारा दिखाया जाता है जिनमें आयनों के आकार में अध्िक अंतर होता है, उदाहरण के लिए र्दैए ।हब्सए ।हठत और ।हप् में यह दोष र्द2़ और ।ह़ आयन के लघु आकार के कारण होता है। ;पअद्ध शाॅट्की दोष - यह आधरभूत रूप से आयनिक ठोसों का रिक्ितका दोष है। विद्युत उदासीनता को बनाए रखने के लिए लुप्त होने वाले ध्नायनों और ट्टणायनों की संख्या बराबर होती है ;चित्रा 1ण्26द्ध। चित्रा 1.26 - शाॅट्की दोष चित्रा 1.27 - छंब्स में छं़ के ैत2़ द्वारा प्रतिस्थापन से ध्नायन रिक्ितका उत्पन्न होना चित्रा 1.28 - िस्टल में एक थ्.वेंफद्र सरल रिक्ितका दोष की भाँति, शाॅट्की दोष भी पदाथर् के घनत्व को घटाता है। आयनिक ठोसों में ऐसे दोषों की संख्या निश्िचत रूप से महत्वपूणर् है। उदाहरण के लिए छंब्स में कमरे के 6 3322ताप पर लगभग 10 शाॅट्की युगल प्रति बउ होते हैं। एक बउ में करीब 10आयन होते हैं। इस प्रकार प्रति 1016 आयनों में एक शाॅट्की दोष होता है। शाॅट्की दोष उन आयनिक पदाथो± द्वारा दिखाया जाता है जिनमें ध्नायन और ट्टणायन लगभग समान आकार के होते हैं। उदाहरण के लिए छंब्सए ज्ञब्सए ब्ेब्स और ।हठतण् यह ध्यान देने योग्य है कि ।हठत प्रेंफकेल तथा शाॅट्की दोनों ही दोष दिखाता है। ;खद्ध अशु(ता दोष ़यदि अल्प मात्रा में ैतब्स2 युक्त गलित छंब्स को िस्टलीकृत किया जाए, तो छं के 2़ 2़़वुफछ स्थान ैत द्वारा घेर लिए जाते हैं ;चित्रा 1ण्27द्ध। प्रत्येक ैत दो छं आयनों को प्रतिस्थापित करता है। यह एक आयन का स्थान ग्रहण करता है और दूसरा स्थान रिक्त रहता है। इस प्रकार उत्पन्न ध्नायन रिक्ितकाओं की संख्या ैत2़ आयनों की संख्या के बराबर होती है। दूसरा इसी प्रकार का उदाहरण ब्कब्स2तथा ।हब्स का ठोस विलयन है। ;गद्ध नानस्टाॅइकियोमीट्री दोष अब तक व£णत दोष िस्टलीय पदाथर् की स्टाॅइकियोमीट्री को विक्षुब्ध् नहीं करते पिफर भी अत्यिाक संख्या में नानस्टाॅइकियोमीट्री अकाबर्निक ठोस ज्ञात हैं, जिनमें िस्टल संरचनाओं में दोष के कारण अवयवी तत्व नानस्टाॅइकियोमीट्री अनुपात में पाए जाते हैं। ये दोष दो प्रकार के होते हैं - ;पद्धधतु आध्िक्य दोष एवं ;पपद्ध धतु न्यूनता दोष ;पद्ध धतु आध्िक्य दोष ट्टणायनिक रिक्ितका के कारण धतु आध्िक्य दोष - क्षारकीय हैलाइड, जैसे छंब्स और ज्ञब्स, इस प्रकार का दोष दशार्ते हैं। जब छंब्स के िस्टल को सोडियम वाष्प के वातावरण में गरम किया जाता है, तो सोडियम परमाणु िस्टल की सतह पर जम जाते हैं। ब्स ऋआयन िस्टल की सतह में विसरित हो जाते हैं और छं परमाणुओं के साथ जुड़कर छंब्स देते हैं। ऐसा छं़ आयन बनाने के लिए छं परमाणु से एक इलेक्ट्राॅन के निकल जाने से होता है। निमुर्क्त इलेक्ट्राॅन विसरित होकर िस्टल के ट्टणायनिक स्थान को अध्यासित करते हैं ;चित्रा 1ण्28द्ध। परिणामस्वरूप अब िस्टल में सोडियम का आध्िक्य होता है। अयुग्िमत इलेक्ट्राॅनों द्वारा भरी ट्टणायनिक रिक्ितकाओं को थ्.वेंफद्र कहते हैं ;रंग वेंफद्र के लिए जमर्न शब्द पफारबेनशेनटर सेद्ध। ये छंब्स के िस्टलों को पीला रंग प्रदान करते हैं। यह रंग, इन इलेक्ट्राॅनों द्वारा िस्टल पर पड़ने वाले प्रकाश से ऊजार् अवशोष्िात करके उत्तेजित होने के परिणामस्वरूप दिखता है। इसी प्रकार लीथ्िायम का आिाक्य स्पब्स िस्टल को गुलाबी बनाता है और पोटैश्िायम का आध्िक्य ज्ञब्स िस्टल को बैंगनी ;अथवा लाइलैकद्ध बनाता है। अतिरिक्त ध्नायनों की अंतराकाशी स्थलों पर उपस्िथति से धतु आध्िक्य दोष - कमरे के ताप पर िंाक आॅक्साइड सप़्ोफद रंग का होता है। गरम करने पर इसमें से आॅक्सीजन निकलती है तथा यह पीले रंग का हो जाता है। 1तापन 2़−र्दव् ⎯⎯⎯→ र्द ़ व्2 ़ 2म 2 1.10 विद्युतीय गुण 1.10.1 धतुओं में विद्युत चालन 1.10.2 अध्र्चालकों में विद्युत चालन अब िस्टल में िंाक का आध्िक्य होता है तथा इसका सूत्रा र्द1़गव् बन जाता है। आिाक्य में उपस्िथत र्द2़ आयन अंतराकाशी स्थलों में, और इलेक्ट्राॅन निकटवतीर् अंतराकाशी स्थलों में चले जाते हैं। ;पपद्ध धतु न्यूनता दोष - कइर् ऐसे भी ठोस हैं जिन्हें स्टाॅइकियोमीट्री संघटन में बनाना कठिन होता है एवं इनमें स्टाॅइकियोमीट्री अनुपात की तुलना में धातु की मात्रा कम होती है। इस प्रकार का एक विश्िाष्ट उदाहरण थ्मव् है यह अध्िकतर थ्म0ण्95व् संघटन में पाया जाता है। यह वास्तव में थ्म0ण्93व् से थ्म0ण्96व् की परास में हो सकता है। थ्मव् के िस्टल में से वुफछ थ्म2़ धनायन लुप्त हो जाते हैं और ध्नावेश की क्षतिपूतिर् थ्म3़ आयनों की आवश्यक संख्या से हो जाती है। ठोस विद्युत चालकता में अद्भुत विविध्ता दशार्ते हैं जिनके परिमाणों का परास दृ207−1−110 से लेकर 10 वीउ उ तक लगभग 27 कोटियों में पैफला होता है। चालकता के आधर पर ठोसों को तीन वगो± में वगीर्कृत किया जा सकता है। ;पद्ध चालक 47−1 −1वे ठोस जिनकी चालकता का परास 10 से 10 वीउउ के मध्य हो चालक कहलाते 7−1 −1हैं। धतुओं की चालकता की कोटि 10वीउउ होती है और ये उत्तम चालक होते हैं। ;पपद्ध विद्युतरोध्ी −20−10 −1 −1ये वे ठोस हैं जिनकी चालकता बहुत कम, 10 से 10वीउउ के परास के मध्य होती है। ;पपपद्ध अध्र्चालक −64−1 −1ये वे ठोस होते हैं जिनकी चालकता 10 से 10 वीउउ तक के मध्यवतीर् परास में होती है। चालकों में विद्युत का चालन इलेक्ट्राॅनों अथवा आयनों के गमन द्वारा होता है। धात्िवक चालक पहले संवगर् में ;इलेक्ट्रॅानों द्वारा चालनद्ध और विद्युतअघट्य पिछले संवगर् ;आयनों द्वारा चालनद्ध में आते हैं। धतु ठोस एवं गलित दोनों अवस्थाओं में विद्युत का चालन करती हैं। धतुओं की चालकता प्रति परमाणु संयोजी इलेक्ट्राॅनों की संख्या पर निभर्र करती है। धतु परमाणुओं के परमाण्िवक कक्षकों से आण्िवक कक्षक बनते हैं जिनकी ऊजार् इतनी पास - पास होती है कि वे बैंड बना लेते हैं। यदि यह बैंड आंश्िाक रूप से भरा हो अथवा यह एक उच्च ऊजार् वाले रिक्त चालकता बैंड के साथ अतिव्यापन करता हो तो विद्युत क्षेत्रा में इलेक्ट्राॅन आसानी से प्रवाहित हो सकते हैं जिससे धतु चालकता दशार्ती है ;चित्रा 1ण्29 कद्ध। यदि पूरित संयोजक बैंड एवं आगामी उच्च रिक्त बैंड ;चालकता बैंडद्ध के मध्य अंतराल अध्िक होता है तो इलेक्ट्राॅन उसमें नहीं लाँघ सकते और ऐसे पदाथो± की चालकता बहुत कम होती है तथा यह एक विद्युतरोध्ी के समान व्यवहार करते हैं ;चित्रा 1ण्29 खद्ध। अध्र्चालकों में संयोजक बैंड एवं चालक बैंड के मध्य अंतराल कम होता है ;चित्रा 1ण्29 गद्ध। अतः वुफछ इलेक्ट्राॅन चालक बैंड में लाँघ सकते हैं और अल्प चालकता दिखा सकते हैं। ताप बढ़ने के साथ अध्र्चालकों में विद्युत् चालकता बढ़ती है, क्योंकि अध्िक संख्या में इलेक्ट्राॅन चालक बैंड में जा सकते हैं। सिलिकन एवं जमैनियम जैसे पदाथर् इस प्रकार का व्यवहार प्रदश्िार्त करते हैं तथा इन्हें नैज - अधर्चालक ;प्दजतपदेपब.ेमउपबवदकनबजवतेद्ध कहते हैं। चित्रा 1.29 - ;कद्धधतुओं, ;खद्धचालकता रोध्ियों एवं ;गद्ध अध्र्चालकों में विभेद, प्रत्येक श्रेणी में रंगरहित ;अनशेडेडद्ध क्षेत्रा चालकता बैंड को दशार्ता है। इन नैज - अध्र्चालकों की चालकता व्यवहारिक उपयोग के लिए बहुत ही कम होती है। उचित अशुि को उपयुक्त मात्रा में मिलाने से इनकी चालकता बढ़ जाती है। इस विध्ि को अपमिश्रण कहते हैं। अपमिश्रण उस अशुि द्वारा किया जा सकता है जो नैज - अध्र्चालक सिलिकन अथवा जमैनियम की तुलना में इलेक्ट्राॅन ध्नी या इलेक्ट्राॅन न्यून हो। ऐसी अशुियों से उनमें इलेक्ट्राॅनीय दोष उत्पन्न हो जाता है। ;कद्ध इलेक्ट्राॅन - ध्नी अशुियाँ सिलिकन और जमैनियम आवतर्सारणी के चैदहवें वगर् से संबंिात हैं और प्रत्येक में चार संयोजक इलेक्ट्राॅन हैं। िस्टलों में इनका प्रत्येक परमाणु अपने निकटस्थ परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बंध् बनाता है ;चित्रा 1ण्30 कद्ध। जब पंद्रहवें वगर् के तत्व जैसे च् अथवा ।ेए जिनमें पाँच संयोजक इलेक्ट्राॅन होते हैं, को अपमिश्रित किया जाता है, तो यह सिलिकन अथवा जमैनियम के िस्टल में वुफछ जालक स्थलों में आ जाते हैं ;चित्रा 1ण्30 खद्ध। पाँच में से चार इलेक्ट्राॅनों का उपयोग चार सन्िनकट सिलिकन परमाणुओं के साथ चार सहसंयोजक बंध् बनाने में होता है। पाँचवाँ अतिरिक्त इलेक्ट्राॅन विस्थानित हो जाता है। यह विस्थानित इलेक्ट्राॅन अपमिश्रित सिलिकन ;अथवा जमैनियमद्ध की चालकता में वृि करते हैं। यहाँ चालकता में वृि ट्टणावेश्िात इलेक्ट्राॅन के कारण होती है, अतः इलेक्ट्राॅन - ध्नी अशुि से अपमिश्रित सिलिकन को द - प्रकार का अध्र्चालक कहा जाता है। ;खद्ध इलेक्ट्राॅन - न्यून अशुियाँ सिलिकन अथवा जरमेनियम को वगर् 13 के तत्वों जैसे ठए ।स अथवा ळं के साथ भी अपमिश्रित किया जा सकता है जिनमें केवल तीन संयोजक इलेक्ट्राॅन होते हैं। वह स्थान जहाँ चैथा इलेक्ट्राॅन नहीं होता, इलेक्ट्राॅन रिक्ित या इलेक्ट्राॅन छिद्र कहलाता है ;चित्रा 1ण्30 गद्ध। निकटवतीर् परमाणु से इलेक्ट्राॅन आकर इलेक्ट्राॅन छिद्र को भर सकता है, परंतु ऐसा करने पर वह अपने मूल स्थान पर इलेक्ट्राॅन छिद्र छोड़ जाता है। यदि ऐसा हो तो यह प्रतीत होगा जैसे चित्रा 1.30 - वगर् 13 और 15 के तत्वों को अपमिश्रित करके द.और च.प्रकार के अधर्चालकों की सृष्िट कि इलेक्ट्राॅन छिद्र, जिस इलेक्ट्राॅन द्वारा यह भरा गया है उसके विपरीत दिशा में चल रहा है। विद्युत क्षेत्रा के प्रभाव में इलेक्ट्राॅन, इलेक्ट्राॅन छिद्रों में से ध्नावेश्िात प्लेट की ओर चलेंगे, परंतु ऐसा प्रतीत होगाऋ जैसे इलेक्ट्राॅन छिद्र ध्नावेश्िात हैं और ट्टणावेश्िात प्लेट की ओर चल रहे हैं। इस प्रकार के अध्र्चालकों को च.प्रकार के अध्र्चालक कहते हैं। ध्नात्मक छिद्रसिलिकन परमाणु गतिशील इलेक्ट्राॅन ;इलेक्ट्राॅन नहींद्ध ;कद्ध विशु( िस्टल ;खद्ध द - प्रकार ;गद्ध च - प्रकार द.प्रकार और च.प्रकार के अध्र्चालकों के अनुप्रयोग द.प्रकार और च.प्रकार के अध्र्चालकों के विभ्िान्न संयोजनों को इलेक्ट्राॅनिक अवयव बनाने में उपयोग किया जाता है। डायोड द.प्रकार और च.प्रकार के अध्र्चालकों का एक संयोजन है और परिशोध्क के रूप में उपयोग किया जाता है। ट्रांिास्टर एक प्रकार के अध्र्चालक की परत को अन्य प्रकार के अध्र्चालक की दो परतों के मध्य अंतदबिन ;सैंडविचद्ध करके बनाए जाते हैं। दचद और चदच प्रकार के ट्रांिास्टरों को रेडियो अथवा श्राव्य संकेतों के पहचान और प्रवध्र्न में उपयोग किया जाता है। सौर सेल एक दक्ष पफोटो - डायोड है जिसका उपयोग प्रकाश - ऊजार् को विद्युत - ऊजार् में बदलने के लिए किया जाता है। जमैनियम तथा सिलिकन वगर् 14 के तत्व हैं अतः इनकी अभ्िालाक्षण्िाक संयोजकता चार है तथा चार बंध् बनते हैं, जैसे हीरे में। वगर् 13 एवं 15 अथवा वगर् 12 तथा 16 के तत्वों के सम्िमश्रण से अनेक प्रकार के ठोस पदाथर् बनाए गए हैं जिनकी औसत संयोजकता ळम या ैप के समान चार है। इनमें से वगर् 13 दृ15 के विश्िाष्ट यौगिक प्दैइए ।सच् तथा ळं।े हैं। गैलियम आसेर्नाइड ;ळं।ेद्ध अ(र्चालक त्वरित प्रतिसंवेदी होते हैंऋ इन्होंने अ(र्चालक युक्ितयों के निमार्ण में क्रंातिकारी हलचल ला दी है। र्दैए ब्कैए ब्कैम तथा भ्हज्मए वगर् 12 दृ16 के यौगिकों के उदाहरण हैं। इन यौगिकों में बंध् पूणर्तया सहसंयोजक नहीं होते तथा इनके आयनिक गुण इनमें उपस्िथत दोनों तत्वों की विद्युत ट्टणात्मकता पर निभर्र करते हैं। यह जानना बहुत रोचक होगा कि संक्रमण धतु आॅक्साइडों के वैद्युतीय गुणों में बहुत अिाक अंतर होता है। ज्पव्ए ब्तव्2 तथा त्मव्3 धतु के समान व्यवहार करते हैं। चालकता में तथा दिखने में त्मव्3 काॅपर धतु की तरह प्रतीत होता है। वुफछ अन्य आॅक्साइड जैसे टव्ए टव्2 टव्3 तथा ज्पव्3 के धत्िवक एवं रोध्ी गुण ताप पर निभर्र होते हैं। सभी पदाथो± के साथ वुफछ चुंबकीय गुण संबंध्ित होते हैं। इन गुणों की उत्पति इलेक्ट्राॅनों के1.11 चुंबकीय गुण कारण होती है। एक परमाणु में प्रत्येक इलेक्ट्राॅन एक सूक्ष्म चुंबक की तरह व्यवहार करता है। उसका चुंबकीय आघूणर् दो प्रकार की गतियों से उत्पन्न होता है ;पद्ध उसकी नाभ्िाक के चारों ओर कक्षक गति और ;पपद्ध उसका अपने अक्ष पर चारों ओर चक्रण ;चित्रा 1ण्31द्ध। चुंबकीय आघूणर् चुंबकीय आघूणर्इलेक्ट्राॅन चित्रा 1.31 - ;कद्ध इलेक्ट्राॅन की कक्षीय इलेक्ट्राॅनगति, चक्रण की दिशा;खद्ध इलेक्ट्राॅन की चक्रण गति परमाण्िवक नाभ्िाकके साथ संयुक्त चुंबकीय ;कद्ध ;खद्ध आघूणर् का निदशर्न इलेक्ट्राॅन एक आवेश्िात कण होने के कारण एवं इस प्रकार की गतियों के कारण एक छोटे विद्युत परिपथ के रूप में समझा जा सकता है जिसमें चुंबकीय आघूणर् पाया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक इलेक्ट्राॅन के साथ स्थायी चक्रण और कक्षक चुंबकीय आघूणर् संयुक्त रहता है। इस चुंबकीय आघूणर् का परिमाण बहुत कम होता है इसे मापे जाने वाली इकाइर् को बोर मैग्नेटाॅन, - ठ कहा जाता है। यह 9ण्27 ×10दृ24 । उ2 के बराबर होता है। पदाथो± को उनके चुंबकीय गुणों के आधर पर पाँच संवगो± में वगीर्कृत किया जा सकता है - ;पद्ध अनुचुंबकीय ;पपद्ध प्रतिचुंबकीय ;पपपद्ध लोहचुंबकीय ;पअद्ध प्रतिलोहचुंबकीय ;अद्धपेफरीचुंबकीय ;पद्धअनुचुंबकत्व अनुचुंबकीय पदाथर् चुंबकीय क्षेत्रा की ओर दुबर्ल रूप से आकष्िार्त होते हैं। ये चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा में ही चुंबकित हो जाते हैं। ये चुंबकीय क्षेत्रा की अनुपस्िथति में अपना चुंबकत्व खो देते हैं। अनुचुंबकत्व का कारण एक अथवा अध्िक अयुगलित इलेक्ट्राॅनों की उपस्िथति है, जो कि चुंबकीय क्षेत्रा की ओर आक£षत होते हैं। व्2ए ब्न2़ए थ्म3़ए ब्त3़ ऐसे पदाथो± के वुफछ उदाहरण हैं। ;पपद्ध प्रतिचुंबकत्व प्रतिचुंबकीय पदाथर् चुंबकीय क्षेत्रा से दुबर्ल रूप से प्रतिकष्िार्त होते हैं। भ्2व्ए छंब्स और ब्6भ्6 ऐसे पदाथो± के वुफछ उदाहरण हैं। ये चुंबकीय क्षेत्रा की विपरीत दिशा में दुबर्ल रूप से चुंबकित होते हैं। प्रतिचुंबकत्व उन पदाथो± द्वारा दशार्या जाता है जिनमें सभी इलेक्ट्राॅन युगलित होते हैं और इनमें अयुगलित इलेक्ट्राॅन नहीं हैं। इलेक्ट्राॅनों का युगलित होना उनके चुंबकीय आघूणर् को आपस में निरस्त कर देता है और वे चुंबकीय गुण नहीं दशार्ते। ;पपपद्ध लोहचुंबकत्व वुफछ पदाथर्, जैसे - लोहा, कोबाल्ट, निवैफल, गैडोलिनियम और ब्तव्2 बहुत प्रबलता से चुंबकीय क्षेत्रा की ओर आकष्िार्त होते हैं। ऐसे पदाथो± को लोहचुंबकीय पदाथर् कहा जाता है। प्रबल आकषर्णों के अतिरिक्त ये स्थायी रूप से चुंबकित किए जा सकते हैं। ठोस अवस्था में, लोहचुंबकीय पदाथो± के धतु आयन छोटे खंडों में एक साथ समूहित हो जाते हैं इन्हें डोमेन कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक डोमेन एक छोटे चुंबक की तरह व्यवहार करता है। लोहचुंबकीय पदाथर् के अचुंबकीय टुकड़े में डोमेन अनियमित रूप से अभ्िाविन्यासित होते हैं और उनका चुंबकीय आघूणर् निरस्त हो जाता है। पदाथर् को चुंबकीय क्षेत्रा में रखने पर सभी डोमेन चुंबकीय क्षेत्रा की दिशा में अभ्िाविन्यासित हो जाते हैं ;चित्रा 1ण्32 कद्ध और प्रबल चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न होता है। चुंबकीय क्षेत्रा को हटा लेने पर भी डोमेनों का क्रम बना रहता है और लौहचुंबकीय पदाथर् स्थायी चुंबक बन जाते हैं। चित्रा 1.32 - चुंबकीय आघूणर् का व्यवस्िथत संरेखण ;कद्ध लोहचुंबकीय, ;खद्ध प्रतिलोहचुंबकीय और ;गद्ध पेफरीचुंबकीय ;पअद्ध प्रतिलोहचुंबकत्व प्रतिलोहचुंबकत्व प्रदश्िार्त करने वाले पदाथर् जैसे डदव् में डोमेन संरचना लोहचुंबकीय पदाथर् के सदृश होती है, परंतु उनके डोमेन एक दूसरे के विपरीत अभ्िाविन्यासित होते हैं तथा एक दूसरे के चुंबकीय आघूणर् को निरस्त कर देते हैं ;चित्रा 1ण्32 खद्ध। ;अद्ध पेफरीचुंबकत्व जब पदाथर् में डोमेनो के चुंबकीय आघूणोर्ं का संरेखण समानांतर एवं प्रतिसमानांतर दिशाओं में असमान होता है तब पदाथर् में पेफरीचुंबकत्व देखा जाता है ;चित्रा 1ण्32 गद्ध। ये लौहचुंबकत्व की तुलना में चुंबकीय क्षेत्रा द्वारा दुबर्ल रूप से आकष्िार्त होते हैं। थ्म3व्4ए;मैग्नेटाइटद्ध और पेफराइट जैसे डहथ्म2व्4ए र्दथ्म2व्4 ऐसे पदाथो± के उदाहरण हैं। ये पदाथर् भी गरम करने पर पेफरीचुंबकत्व खो देते हैं और अनुचुंबकीय बन जाते हैं। अभ्यास 1ण्1 ‘अिस्टलीय’ पद को परिभाष्िात कीजिए। अिस्टलीय ठोसों के वुफछ उदाहरण दीजिए। 1ण्2 काँच, क्वाटर््श जैसे ठोस से किस प्रकार भ्िान्न है? किन परिस्िथतियों में क्वाटर््श को काँच में रूपांतरित किया जा सकता है? 1ण्3 निम्नलिख्िात ठोसों का वगीर्करण आयनिक, धत्िवक, आण्िवक, सहसंयोजक या अिस्टलीय में कीजिए। ;पद्ध टेट्राप़फाॅस्पफोरस डेकाॅक्साइड ;च्4व्10द्ध;अद्ध च्4 ;पगद्ध त्इ ;पपद्ध अमोनियम पफाॅस्पेफट, ;छभ्4द्ध3 च्व्4 ;अपद्ध प्लास्िटक ;गद्ध स्पठत ;पपपद्ध ैपब् ;अपपद्ध ग्रैपफाइट ;गपद्ध ैप ;पअद्ध प्2 ;अपपपद्ध पीतल 1ण्4 ;पद्ध उपसहसंयोजन संख्या का क्या अथर् है? ;पपद्ध निम्नलिख्िात परमाणुओं की उपसहसंयोजन संख्या क्या होती है? ;कद्ध एक घनीय निविड संवुफलित संरचना ;खद्ध एक अंतःवेंफदि्रत घनीय संरचना 1ण्5 यदि आपको किसी अज्ञात धतु का घनत्व एवं एकक कोष्िठका की विमाएं ज्ञात हैं तो क्या आप उसके परमाण्िवक द्रव्यमान की गणना कर सकते हैं? स्पष्ट कीजिए। 1ण्6 ‘किसी िस्टल की स्िथरता उसके गलनांक के परिमाण द्वारा प्रकट होती है’, टिप्पणी कीजिए। किसी आँकड़ा पुस्तक से जल, एथ्िाल ऐल्कोहाॅल, डाइएथ्िाल इर्थर तथा मैथेन के गलनांक एकत्रा करें। इन अणुओं के मध्य अंतराआण्िवक बलों के बारे में आप क्या कह सकते हैं? 1ण्7 निम्नलिख्िात युग्मों के पदों में वैफसे विभेद करोगे? ;पद्ध षट्कोणीय निविड संवुफलन एवं घनीय निविड संवुफलन ;पपद्ध िस्टल जालक एवं एकक कोष्िठका ;पपपद्ध चतुष्पफलकीय रिक्ित एवं अष्टपफलकीय रिक्ित 1ण्8 निम्नलिख्िात जालकों में से प्रत्येक की एकक कोष्िठका में कितने जालक बिंदु होते हैं? ;पद्ध पफलक - वेंफदि्रत घनीय, ;पपद्ध पफलक - वेंफदि्रत चतुष्कोणीय, ;पपपद्ध अंतःवेंफदि्रत 1ण्9 समझाइए - ;पद्धधत्िवक एवं आयनिक िस्टलों में समानता एवं विभेद का आधर। ;पपद्धआयनिक ठोस कठोर एवं भंगुर होते हैं। 1ण्10 निम्नलिख्िात के लिए धतु के िस्टल में संवुफलन क्षमता की गणना कीजिए। ;पद्ध सरल घनीय, ;पपद्ध अंतःवेंफदि्रत घनीय, ;पपपद्ध पफलक - वेंफदि्रत घनीय। ;यह मानते हुए कि परमाणु एक - दूसरे के संपवर्फ में हैं।द्ध 1ण्11 चाँदी का िस्टलीकरण बिब जालक में होता है। यदि इसकी कोष्िठका के कोरों की लंबाइर् 4ण्07 ×10दृ8 बउ तथा घनत्व 10ण्5ह बउ .3 हो तो चाँदी का परमाण्िवक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। 1ण्12 एक घनीय ठोस दो तत्वों च् एवं फ से बना है। घन के कोनों पर फ परमाणु एवं अंतः वेंफद्र पर च् परमाणु स्िथत हैं। इस यौगिक का सूत्रा क्या है? च् एवं फ की उपसहसंयोजन संख्या क्या है? 1ण्13 नायोबियम का िस्टलीकरण अंतःवेंफदि्रत घनीय संरचना में होता है। यदि इसका घनत्व 8ण्55 ह बउ..3 हो तो इसके परमाण्िवक द्रव्यमान 93 न का प्रयोग करके परमाणु त्रिाज्या की गणना कीजिए। 1ण्14 यदि अष्टपफलकीय रिक्ित की त्रिाज्या त हो तथा निविड संवुफलन में परमाणुओं की त्रिाज्या त् हो तो त एवं त् में संबंध् स्थापित कीजिए। .81ण्15 काॅपर बिब जालक रूप में िस्टलीकृत होता है जिसके कोर की लंबाइर् 3ण्61×10.बउ है। यह दशार्इए कि गणना किए .3गए घनत्व के मान तथा मापे गए घनत्व 8ण्92 ह बउ.में समानता है। 1ण्16 विश्लेषण द्वारा ज्ञात हुआ कि निवैफल आॅक्साइड का सूत्रा छप व् है। निवैफल आयनों का कितना अंश छप2़ और छप3़ 0ण्98 1ण्00के रूप में विद्यमान है? 1ण्17 अधर्चालक क्या होते हैं? दो मुख्य अधर्चालकों का वणर्न कीजिए एवं उनकी चालकता - ियाविध्ि में विभेद कीजिए। 1ण्18 नानस्टाॅइकियोमीट्री क्यूप्रस आॅक्साइड, ब्न 2व्ए प्रयोगशाला में बनाया जा सकता है। इसमें काॅपर तथा आॅक्सीजन का अनुपात 2रू1 से वुफछ कम है। क्या आप इस तथ्य की व्याख्या कर सकते हैं कि यह पदाथर् च.प्रकार का अधर्चालक है? 1ण्19 पेफरिक आॅक्साइड, आक्साइड आयन के षट्कोणीय निविड संवुफलन में िस्टलीकृत होता है जिसकी तीन अष्टपफलकीय रिक्ितयों में से दो पर पेफरिक आयन होते हैं। पेफरिक आॅक्साइड का सूत्रा ज्ञात कीजिए। 1ण्20 निम्नलिख्िात को चप्रकार या द.प्रकार के अध्र्चालकों में वगीर्कृत कीजिए - ;पद्ध प्द से डोपित ळम ;पपद्ध ठ से डोपित ैप 1ण्21 सोना ;परमाणु त्रिाज्या त्र 0ण्144 दउद्ध पफलक - वेंफदि्रत एकक कोष्िठका में िस्टलीकृत होता है। इसकी कोष्िठका के कोर की लंबाइर् ज्ञात कीजिए। 1ण्22 बैंड सि(ांत के आधर पर ;पद्ध चालक एवं रोध्ी ;पपद्ध चालक एवं अध्र्चालक में क्या अंतर होता है? 1ण्23 उचित उदाहरणों द्वारा निम्नलिख्िात पदों को परिभाष्िात कीजिए - ;पद्ध शाॅट्की दोष, ;पपद्ध प्रेंफकेल दोष, ;पपपद्ध अंतराकाशी, ;पअद्ध थ् - वेंफद्र। 1ण्24 ऐलुमिनियम घनीय निविड संवुफलित संरचना में िस्टलीकृत होता है। इसका धत्िवक अध्र्व्यास 125 चउ है। ;पद्ध एकक कोष्िठका के कोर की लंबाइर् ज्ञात कीजिए। ;पपद्ध 1ण्0 बउ3 ऐलुमिनियम में कितनी एकक कोष्िठकाएं होंगी? 1ण्25 यदि छंब्स को ैतब्स 2 के 10.3 मोल: से डोपित किया जाए तो ध्नायनों की रिक्ितयों का सांद्रण क्या होगा? 1ण्26 निम्नलिख्िात को उचित उदाहरणों से समझाइए - ;पद्ध लोहचुंबकत्व ;पपद्ध अनुचुंबकत्व ;पपपद्ध पेफरीचुंबकत्व ;पअद्ध प्रतिलोहचंुबकत्व ;अद्ध 12दृ16 और 13दृ15 वगो± के यौगिक कुुु छ पाठ्यनिहित प्रश्नों केेे उत्तर 1ण्14 4 1ण्15 वुफल रिक्ितओं की संख्या त्र 9ण्033 ×1023 चतुष्पफलकीय रिक्ितओं की संख्या त्र 6ण्022 × 1023 1ण्16 डछ 23 1ण्18 बबच

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